12/08/2007

कुछ खबरें फटाफट...




तीन-चार खबरें जल्‍दी-जल्‍दी बतानी हैं, क्‍योंकि एक तो ब्‍लॉग अपडेट करने का वक्‍त नहीं मिलता, दूसरे हरेक खबर के बारे में लंबा नहीं लिखा जा सकता...


सबसे पहले...जल्‍द से जल्‍द सिनेमाहाल जाएं और नई फिल्‍म देखें 'दस कहानियां'। मैंने कल देखी और इसीलिए कह रहा हूं...प्रयोगधर्मी संवेदनशील लोगों के लिए अच्‍छी फिल्‍म है...।



  • पिछले दिनों मुझे एक अनचाही कॉल आई एक नामी-गिरामी खबरिया चैनल से...मैंने कभी आवेदन नहीं किया था इसलिए चौंका...घर के बगल में होने के नाते सोचा एक बार हो आएं...हालांकि पिछले अनुभव इसकी इजाज़त नहीं दे रहे थे। मैं गया...और मैं लौट आया। इसके बीच मेरे साथ जो कुछ भी हुआ उसे आप मेरी बेवकूफी कहें...मज़ाक कहें...या टीवी वालों की सनक कहें...बात एक ही है। एक बार फिर विश्‍वास पुष्‍ट हुआ कि टीवी चैनलों में काम करना मेरे लिए अब भी संभव नहीं हुआ है। मैं इस पर एक लंबी कहानी लिख रहा हूं...एक साहित्यिक पत्रिका का मीडिया विशेषांक आने वाला है उसी के लिए...ठहर जाएं और सब्र करें...बहुत मज़ा आएगा।



  • जो सज्‍जन...ज़ाहिर तौर पर पत्रकार ही...वैकल्‍ि‍पक मीडिया की कार्यशालाओं में दिलचस्‍पी रखते हैं वे निम्‍न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं... http://www.safarr.blogspot.com/



  • बाज़ार में 'शुक्रवार' के नाम से एक नई पत्रिका आ रही है...जो सज्‍जन दिलचस्‍पी रखते हैं वे खोज-खबर ले सकते हैं।



  • चरखा विकास संवाद में संपादक की कुर्सी मेरे आने के बाद सवा साल के भीतर तीसरी बार खाली हो गई है...इच्‍छुक संपर्क करें तेज़ी से।



  • साम्राज्‍यवाद विरोधी लेखक मंच की बैठक जो प्रत्‍येक रविवार जयप्रकाश नारायण पार्क में शाम 5.00 बजे होती थी, उसमें अब ठंड के कारण कुछ तब्‍दीली की गई है...नया स्‍थान है श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस और समय है दिन में 3.00 बजे। दिन वही, रविवार।



  • पत्रकारों के लिए एक ज़रूरी पुस्‍तक 'रिलायंस : द रियल नटवर' मानस प्रकाशन से आई है...कहीं से जुगाड़ कर जरूर पढ़ें...क्‍या जाने रिलायंस पर पिछली पुस्‍तक 'पॉलिस्‍टर प्रिंस' की तरह कहीं इसे भी बाज़ार से गायब न करवा दिया जाए।

11/02/2007

हिंदी का आधुनिक कालिया मर्दन...



दरअसल, पिछले दिनों हुए नया ज्ञानोदय विवाद पर एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसका नाम रखा गया 'युवा विरोध का नया वरक'। मैंने सोचा कि साल बीतते-बीतते इस पर एक टिप्‍पणी जड़ दी जाए, सो तहलका हिंदी डॉट कॉम में मैंने अपने समीक्षा के स्‍तम्‍भ में इस पुस्तिका के बहाने विवाद पर रोशनी डालने की कोशिश की थी। अजीब है कि समाज-राजनीति के हर क्षेत्र में तहलका मचाने वाले इस माध्‍यम ने साल के सबसे बड़े साहित्यिक तहलके को पढ़ने के बाद छापने से मना कर दिया। इस पर कभी और बात करेंगे कि आखिर इसकी क्‍या वजहें हो सकती हैं, फिलहाल वह समीक्षा जस की तस जनपथ से गुज़रने वालों के लिए प्रस्‍तुत है...








साहित्य रचे जाने के अलावा कभी-कभी हिंदी जगत में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्हें लेखन में जगह मिल जाती है। चाहे वह रचनाकार की निजी अभिव्यक्ति के रूप में सामने आए या आलोचना के स्तर पर, यह बहुत कुछ घटना के वैचारिक और प्रवृत्तिगत स्तर से तय होता है कि उसे कितना स्पेस दिया जाए। आम तौर पर हिंदी में यह चलन नहीं रहा कि किसी घटना से उद्वेलित होकर कुछ लेखक गोल बना कर किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के खिलाफ हल्ला बोल दें। यह हिंदी की जनवादी परंपरा नहीं रही है, लेकिन जिस तरीके से हिंदी में सनसनी का दौर टेलीविजन चैनलों से निर्यात किया जा रहा है, वह लेखन, सम्पादन और प्रतिक्रिया यानी आलोचना पर भी आज हावी हो चला है। इसकी ताज़ा मिसाल हाल ही में छपी एक छोटी-सी पुस्तिका है जिसे नाम दिया गया है 'युवा विरोध का नया वरक'। यह पुस्तिका हिंदी के हालिया 'नया ज्ञानोदय विवाद' पर प्रकाशित की गई है। इसे कुछ अप्रवासी पटनावासियों ने लोक दायरा श्रृंखला के तहत छापा है। गौरतलब है कि लोक दायरा नाम से कुछ युवा लेखकों का समूह पटना में कुछ वर्षों पहले सक्रिय था। इससे पहले पांच पुस्तिकाएं इस श्रृंखला के तहत आ चुकी हैं।

हालांकि, पुस्तिका के प्रकाशन में ज़ाहिर तौर पर कुछ नए-पुराने युवा लेखकों की भूमिका है, लेकिन आश्चर्य तब होता है जब हम इसमें लिखने वालों की सूची में ज्ञानरंजन, राजेश जोशी, नासिरा शर्मा, कृष्णा सोबती, दिलीप चित्रे, अशोक वाजपेयी आदि वरिष्ठ लेखकों के नाम देखते हैं। दरअसल, विवाद शुरू तो हुआ था पत्रिका नया ज्ञानोदय के युवा विशेषांक में लेखकों के अपारम्परिक परिचय से, लेकिन बाद में लेखिका नासिरा शर्मा के बारे में पत्रिका में सम्पादक रवींद्र कालिया की टिप्पणी के चलते मैदान में उपर्युक्त वरिष्ठ आलोचकों-कथाकारों को उतरना पड़ा। खास बात यह है कि इस पुस्तिका के लिए विशेष तौर पर लिखने वाले कम हैं, यहां लेख व प्रतिक्रियाएं अधिकतर साभार ली गई हैं। विवाद के गर्म होने के दौरान कई लेखकों की प्रतिक्रियाएं जनसत्ता, सण्‍डे पोस्ट और राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुई थीं। मोटे तौर पर यह पुस्तिका उन्हीं का एक संकलन है।

सबसे पहले पुस्तिका में ध्यान उसके आवरण पर जाता है। आगे और पीछे दोनों ओर प्रकाशित टिप्पणी से हमें हिंदी में कालिया विरोधी लेखकों की आत्ममुग्धता और प्रूफ की त्रुटियों की भयंकर बानगी मिलती है :

'इस दायरे की खिड़कियां और दरवाज़े इसलिए खुले हैं कि साफ़ और ताज़ी हवा की गुंजाइश हमेशा बनी रहे क्योंकि यही हवा दायरे को ताकत देती है। फिलहाल इस दायरे की ताकत हैं- कृष्ण कल्पित, कुमार मुकुल, पंकज चौधरी, प्रेम भारद्वाज, स्वतंत्र मिश्र, उमाशंकर सिंह, रजनीश, हरेंद्र, अच्युतानंद मिश्र, अरविंद कुमार...।'

यहीं से यह स्पष्ट होने लगता है कि किस तरह सही मुद्दे पर प्रवृत्तिगत बात करने की बजाय इसे व्यक्ति निंदा का औज़ार बना कर खुद को स्थापित करने की चेष्टा की गई है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि आज से आठ माह पहले जब युवा विशेषांक आया था, उपर्युक्त दायरे की आधा दर्जन ताकतें दिल्ली से चल रहे एक साम्राज्यवाद विरोधी लेखक मंच का हिस्सा हुआ करती थीं और वहां यह प्रस्ताव इन्होंने रखा था कि लेखकों के परिचय के खिलाफ अभियान चलाया जाना बहुत ज़रूरी है। पुस्तिका छापने की योजना वहीं परवान चढ़ी थी, लेकिन जब मंच में इस व्यक्ति केंद्रित कुत्सा अभियान को आम सहमति नहीं मिली, तो ये ताकतें उस मंच को कमज़ोर कर के बाहर निकल गईं।

यह बात बिलकुल दीगर है कि नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया के दिल्ली आते ही साहित्यिक माहौल बदलने लगा था। उनकी संपादकीय क्षमता से पहले भी दिल्ली के युवा लेखक परिचित रहे होंगे, फिर पहले उनके दरबार में अपनी रचनाएं छपवाने के लिए मत्था टेकना और फिर कुछ की रचनाएं न छापे जाने से उद्वेलित होकर विरोध अभियान शुरू कर देना आखिर किस प्रवृत्ति का द्योतक है? इसी पुस्तिका में कृष्ण कल्पित ने एक जगह लिखा भी है :

'...इस पूरे साहित्यिक विवाद में कुछ युवा रचनाकारों का जो रूप और संवेदना प्रकट हुई - वह सचमुच महत्वाकांक्षाओं के अंधेरों से भरी हुई थी। यह लड़ाई सड़कों पर लड़ी गई - एसएमएस के जरिए, लेखों के जरिए, ब्लॉग के जरिए, परचों के जरिए।'

ज़ाहिर तौर पर यह बात सच है कि युवा विशेषांक में लेखकों का परिचय बहुत अपमानजनक तरीके से चरित्रहनन की शैली में दिया गया था, लेकिन उसका विरोध जिस प्रवृत्तिगत स्तर पर किया जाना चाहिए था वह संभव नहीं हो सका। पत्रकारिता के खराब नमूने का विरोध करने के लिए वस्तुपरक विवेक को तिलांजलि देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। इस लिहाज से पुस्तिका का हिंदी साहित्य में 'कनटेन्ट' के स्तर पर कोई खास योगदान नहीं दिखता।

हां, यह ज़रूर है कि हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता जिस दौर में पहुंच चुकी है, उसकी तस्वीर हमें पूरे विवाद को समझने और पुस्तिका पढ़ने के बाद साफ मिल जाती है। दूसरे, जिस किस्म के संपादन और भाषा की उम्मीद सुधी लेखकों से की जानी चाहिए, उस पर पुस्तिका खरी नहीं उतरती है। कम दाम में खराब काग़ज़ पर छपाई का पर्याय संपादन की गलतियां नहीं होता।

आखिर में कहने को यही रह जाता है कि हिंदी साहित्य की मौजूदा आत्ममुग्ध तस्वीर से रूबरू होना हो तो इस पुस्तिका को पढ़ें। किस तरह मुद्दे को व्यक्ति में और मैक्रो को माइक्रो में तब्दील कर दिया जाता है, खुद को मार्क्‍सवादी कहने वाले लेखकों द्वारा दी गई यह ताज़ा मिसाल है। बाकी विश्लेषण खुद कुमार मुकुल अपने आलेख 'नया ज्ञानोदय की परिचय पच्चीसी' के नीचे जड़ी टिप्पणी में कर देते हैं- कि इस आलेख को 'हंस' में न छाप पाने के पीछे कथाकार संजीव का क्या तर्क था। उनके तर्क को विस्‍तार दें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तिका साहित्यिक अपशिष्ट में फेंके गए ढेलों का ढूह भर है।

10/12/2007

त्रिलोचन, माओरी और भाषाधर्मी मित्रों के बारे में

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
'भाषाई आत्मसम्मान और एक्टिविज्म'
का सवाल


जीतेंद्र रामप्रकाश

अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्तव




'बोलना का कहिए रे भाई,
बोलत बोलत तत्त नासाई'



(मैं वाणी के बारे में क्या कहूं भाई?
वाणी की अधिकता से तो तत्व का नाश हो जाता है)



ये शब्द एक ऐसे व्यक्ति के हैं जिसे भारत में महान संत का दर्जा प्राप्त है, लेकिन यह व्यक्ति इतना विनम्र था कि इसने खुद को दास कहना ही बेहतर समझा- दास कबीर। यहां जिस संदर्भ में दास प्रयुक्त हुआ है, अंग्रेजी में उसके लिए कोई समानांतर शब्द उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजी में 'स्लेव' या 'सर्वैन्ट' भी इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। दास में अंतर्निहित संकेतार्थ एक सूफियाना विनम्रता का भाव लिए हुए है। इसमें किसी के लिए उपयोगी होने, या कहें चापलूसी का भाव नहीं है। इस शब्द की सभी लक्षणाएं उन मध्यकालीन संत कवियों की देन हैं जिनकी वाणी उतनी ही पवित्र थी जितना उनका जीवन।

भाषा शब्दों से नहीं, उनकी लक्षणाओं से ताल्लुक रखती है। भाषा में अंतर्निहित ये लक्ष्यार्थ सदियों के सांस्कृतिक पोषण का परिणाम हैं। किसी भी शब्द में छिपे संकेत जनता द्वारा प्रयुक्त अर्थच्छवियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए कोई भी भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम भर नहीं है, बल्कि सामूहिक चेतना का एक ऐसा आईना है जिसमें वहां की संस्कृति प्रतिबिंबित होती है, जिसमें उसकी पहचान की जा सकती है। इसी बुनियादी प्रस्थापना के साथ मैं आगे और कुछ बोलने का खतरा मोल ले रहा हूं और मुझे आशा है कि इस प्रक्रिया में मैं 'तत्व का नाश' नहीं होने दूंगा।

भारतीय भाषाओं के संबंध में फैली अज्ञानता, उपयोगितावादी दृष्टिकोण और अपराधबोध के बारे में कोई भी रोषपूर्ण टिप्पणी करने से पहले मुझे सर्वप्रथम अपनी सीमाओं को स्वीकार कर लेना चाहिए। मैं कोई भाषाविद्, विद्वान या विशेषज्ञ नहीं हूं। लेखन में मेरा अनुभव दूसरों की ही तरह मुख्यत: ई-मेल, एसएमएस और आधिकारिक दस्तावेज तैयार करने तक ही सीमित है। मैं ज्यादातर अपनी भाषा ही बोलता हूं और मेरी कोशिश रहती है अपने सीमित भाषाई अनुभवों को उन लोगों तक पहुंचाऊं जिन्हें इनकी दरकार है। मेरे लिए भाषा का अर्थ है 'ज़ुबान' - जिसका प्रयोग संप्रेषण, कार्य संपादन और जीवन के लिए किया जाता है। साथ ही भाषा मेरी सांसों की ध्वनि भी है और मेरा तत्व संगीत भी!

मैं भाषा का उपयोग तो करता हूं, लेकिन शुक्र है कि मैं उपयोगितावादी नहीं हूं। मेरे संपूर्ण विकास और अस्तित्व की पहचान के लिए जिस तरह से मेरे लिए माता-पिता का प्रेम उपयोगी है, उसी तरीके से भाषा का उपयोग भी अन्त:करण में कृतज्ञता और प्रेम के भाव से विच्छिन्न नहीं है। भाषा के प्रति मेरे इस भावावेग के लिए कुछ दिनों पहले तक मेरे पास कोई पारिभाषिक शब्द नहीं था। अब, मैं उस लेखक को धन्यवाद दे सकता हूं जिसने भाषाई 'विकासवाद' के ऊंचे आदर्शवादी मचान पर चढ़ कर हम जैसे लोगों को 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' (क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति अंधवादी) करार दिया है। विद्वानों को बड़े-बड़े नाम देने का बहुत शौक होता है, जैसे अंग्रेजों को था! अंग्रेज बस इतना करते थे कि इन नामों को वे शब्दकोशों में जोड़ लेते थे, मसलन कैंब्रिज शब्दकोश में पियन का अर्थ दिया हुआ है भारतीय नौकर।

हमें हमारी पहचान बताने के लिए आपको साधुवाद! आप जैसे बुध्दिजीवी विद्वानों के रहते हुए आखिर हम जैसे तुच्छ लोग अपनी पहचान भी जानने की ज़ुर्रत कैसे कर सकते हैं? (हालांकि, जैसा मैंने पहले कहा, भाषा का कुल सार उसकी लक्षणाओं में है)। तो अब हुज़ूर-ए-आला की इजाज़त से मैं 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' के इस तमग़े को उसी तरह गर्व से पहनूंगा जैसा कि हम में से कई ने 'स्यूडो सेक्युलर' (छद्म धर्मनिरपेक्ष) के तमग़े को धारण करना चुना है। मैं खुद को संबोधित करने के लिए इसका अधिक से अधिक इस्तेमाल करूंगा, और इसके लगातार प्रयोग से आप द्वारा दिए गए अर्थ को निरर्थक बना दूंगा। हमारे सामूहिक आत्मसम्मान की भावना का अर्थ मैं इस शब्द में भर दूंगा। अगर भाषा हमारी मां है, तो हुजूर इसका 'दास' बनने में हमारा सौभाग्य ही होगा लेकिन एक नौकर हम कभी न होंगे। ज़रा ज़बान संभाल के हुजूर, कहीं हम आपके लफ्ज़ न झटक लें।

'संभल के', उसने कहा, जैसे ही हम उस भरे-पूरे बाज़ार की ध्वनियों को पीछे छोड़ते हुए बाईं ओर जाती एक ऐसी गली में घुस गए जो लगता था अपने अकेलेपन में ही सहमी जा रही हो। गली में प्रवेश करते ही हमारा स्वागत ठहरे हुए पानी के एक गङ्ढे और सीवर के उस गंदले पानी से उठते दुर्गंध के भभूके से हुआ जो घरों की गंदगी साफ कर पाइपों के कंठ में घड़घड़ाते हुए नीचे की ओर आता था। इनके अलावा गली में खेलते खुशनुमा अधनंगे बच्चों के शरीर पर हमेशा मंडराते रहने वाली उन भिनभिनाती मक्खियों ने भी हमारा आवभगत किया जो भारत में काफ्का की याद दिलाती थीं। वह महिला काफी उदार थीं। यह जानते हुए कि हम राजधानी से आए थे और हर महानगरवासी की ही भांति हम भी इस छोटे से शहर में खो जाएंगे, उन्होंने हमारे फोन के जवाब में अपनी बेटी को हमें कुछ दूर तक राह दिखाने भेज दिया था। एक और मोड़, अगली गली और उसके अंत में एक बड़े से आंगन वाला सामान्य लेकिन अनगढ़ सा घर। वहां पहुंचते ही एक महिला हमें घर के अंतिम कमरे तक ले गईं। और ये रहे!

खादी का भूरा कुर्ता और चेक की नीली लुंगी पहने, दो कंबलों को तकिया बनाकर सफेद पलस्तर छोड़ती दीवार के सहारे टिके हुए बिस्तर पर चारों ओर बिखरी किताबों के बीच वह बैठे थे, त्रिलोचन। कौन त्रिलोचन? अब, मैं बिना 'तत्व' खोए उनके बारे में कुछ भी कैसे बोल सकता हूं? जीता-जागता कबीर; एक ऐसा कवि जिसने बीसवीं सदी की शायद सबसे बेहतरीन कविताएं लिखी हैं; एक अमर्त्य लेखक जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कार तक नहीं दिया गया, या एक ऐसा ग्रैंड ओल्ड मैन जिनके नाम पर सम्मानस्वरूप आपस में लड़ते-झगड़ते सभी साहित्यिक समूह एक हो जाते हैं। शायद कोई भी विवरण उनके लिए सटीक नहीं बैठता। इस 'त्रिलोचन' की जाने कितनी अर्थच्छवियां हैं।

कुछ ही दिनों पहले उन्हें सवेरे अचानक अस्पताल ले जाना पड़ा था। अब वे इस एकाकी कमरे में अपनी दुनिया में खोए हुए आराम कर रहे हैं। घर की बहू उषा जी हम लोगों के लिए कुछ नाश्ता और शरबत ले आईं। मैंने त्रिलोचन जी के स्वास्थ्य के बारे में कुछ उत्सुकता दिखाई, लेकिन उन्होेंने मेरे सवाल को अनसुना करते हुए अपनी बीमारी के बारे में कुछ भी नहीं बताया। कई बार मेरी ओर देखने के बाद उन्होंने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ी। और उन्होंने क्या-क्या बोलना चुना? अन्य लेखकों के बारे में कुछ बातें, पेड़ों, भाषाओं और बोलियों के बारे में कुछ बातें आदि; इनमें से कुछ ऐसी भाषाएं थीं जिनके नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने थे; जो शायद हमारी धरती और इस ग्रह के अन्य हिस्सों पर भी मौजूद हैं।

पर्यावरणविद् चेतावनी देते हैं, 'हमारा खूबसूरत ग्रह खत्म हो रहा है।' जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, सागरों और दुनिया के अन्य सुदूर हिस्सों में हमारे वैज्ञानिक और पर्यावरणवादी आंदोलनकारी संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि, हम में से कई इनकी पूरी तरह प्रशंसा नहीं करते हैं, लेकिन कुछ सचेतन लोग लगातार लड़ाई छेड़े हुए हैं, जो शायद एक हारी हुई लड़ाई है। मिनट दर मिनट तिल-तिल कर हमारी धरती मर रही है...वर्षा के जंगलों को नष्ट किया जा रहा है, हवा में ज़हर घुलता जा रहा है, जल प्रदूषित हो रहा है। दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं...कई चीजें हमारे बोलते-बोलते दुर्लभ हो रही हैं...पौधे, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि। जो इनके लिए लड़ रहे हैं, उन्हें शुभकामनाएं।

इसके अलावा एक और ऐसी चीज है जिसकी मौत हो रही है, बहुत शांति से। आकलन के मुताबिक हमारी धरती पर करीब 5500 से 6500 के बीच भाषाएं और बोलियां हैं। इनमें से कई लुप्त हो रही हैं, चूंकि इन्हें बोलने वाले अपने बाद की पीढ़ी को सिखाना ज़रूरी नहीं समझते। हर पखवाड़े दुनिया के किसी कोने में एक भाषा मरती है, अपने अंतिम बोलने वाले की मौत के साथ। इसके बाद कुछ नहीं बचता। न कोई गीत, न ध्वनि, न कथाएं। इसी दर से चलता रहा तो आकलन है कि इस सदी के अंत तक दुनिया की 97 फीसदी भाषाएं समाप्त हो जाएंगी।

एक भाषा की मौत हो ही जाती है तो क्या? हम हमेशा उस भाषा को सीख सकते हैं जो बची हुई है। आखिरकार, सारा मामला जिसकी लाठी उसकी भैंस का ही है! क्यों?
इससे क्या फर्क पड़ता है कि जंगलों में बाघ समाप्त हो रहे हैं.....कि किसी सुदूर वर्षा के जंगल में एक फूल की पंखुड़ियां हमेशा के लिए झड़ जाएं.....या कि एक छोटा-सा कीड़ा सहारा के रेतीले ढूहों में अंतिम बार दफन हो जाए? हमें तो फिल्में देखने और किस्तें चुकाने से ही फुर्सत नहीं है!

'यह बहस अब समाप्त हो चुकी है', ऐसा कहते हैं हमारे अंग्रेज़ीदां बुध्दिजीवी, और ऐसा कहते हुए वे हमें अंधवादी और स्तालिनवादी ठहरा देते हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं कि 'अंग्रेजी के बारे में सारी बहस समाप्त हो चुकी है, या हो जानी चाहिए।' वे कहते हैं कि अंग्रेजी के आर्थिक फायदे हैं, इसलिए हमें इसे सीखना चाहिए। ठीक! यह संपर्क का एक माध्यम है और वैश्विक भाषा है। ठीक! हिंग्लिश को हमें स्वीकार करना होगा इसलिए अंग्रेजी शिक्षण और ज्ञान आवश्यक है। ठीक है, मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं। भारतीय भाषाओं के बारे में जो लोग चीखते-चिल्लाते रहते हैं वे महज कमजोर दृष्टि वाले भावनात्मक लोग हैं जो विकास में बाधक हैं। गलत!

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंग्रेजी अवसरों को भुनाने वाली भाषा बन चुकी है और इसकी आवश्यकता स्वयं सिध्द है। लेकिन गंभीर समस्याएं तब खड़ी हो जाती हैं जब इस आवश्यकता को कोड़ा बना कर भारतीय भाषाओं के प्रेमियों पर फटकारा जाता है। इससे भी बुरा तब होता है जब अपनी मातृभाषा में दक्ष नहीं होने के बचाव में इसे इस्तेमाल किया जाता है, अपनी भाषा से संबध्द हीन ग्रंथि को इस आवश्यकता की चादर से ढंकने की कोशिश की जाती है। यह तर्क गलत तो नहीं है- यह सिर्फ सीमित तर्क है और इसे कहने का तरीका बहुत भद्दा है। 'साहबों' की भांति अक्खड़पन दिखाते हुए ये अंग्रेज़ीदां लोग अपनी सीमित दृष्टि, अपनी रणनीति का दोहरापन और अपने त्रुटिपूर्ण विश्लेषण के छिछलेपन को छुपाने के लिए ऐसा धुआं पैदा करते हैं जो लंबे समय के लिए खतरनाक साबित हो सकता है और हमारी संस्कृति की खुदकुशी के लिए पूर्वपीठिका तैयार करता है!

यह बहस भले खत्म हो चुकी हो, संघर्ष जारी है। अंग्रेजी के बारे में बहस जहां खत्म होती है, जैसा कि होना चाहिए, भारतीय भाषाओं के बारे में संघर्ष वहीं से शुरू होता है। ऐसा ही होना भी चाहिए। यह एक ऐसा संघर्ष है जहां उपयोगितावादी अंग्रेज़ीदां लोगों के साथ हम कोई संभावना नहीं देखते, लेकिन अंग्रेज़ी का एक सामान्य प्रेमी खुद-ब-खुद हमारे साथ है। आखिर एलेन गिन्सबर्ग ने अपनी अंग्रेज़ी भाषा को समृध्द करने के लिए क्या त्रिलोचन से वैदिक काव्यात्मक तत्वों को सीखने में काफी वक्त नहीं गुज़ारा?

भाषाएं किसी प्रयोगशाला के यांत्रिक कार्य या मौखिक परंपरा का हिस्सा नहीं हो सकतीं जिन्हें हम अपनी भावनात्मक पहचान के लिए बचाते फिरें। ये संचार का माध्यम हैं और इनका एक सत्व है। लेकिन कैसा संचार और कैसा सत्व? भाषा कुछ ध्वनियों का समुच्चय ही नहीं है जो बाजार के विनिमय में योगदान दे। यह उपभोग की वस्तु मात्र नहीं है। यह सजीव है। भाषाएं जीती हैं, श्वास लेती हैं, गाती और नाचती हैं, सपने देखती हैं तो प्रार्थना में सिर भी नवाती हैं। भाषाएं, जुंग के शब्दों में कहें तो 'सामूहिक अर्धचेतन' का संरक्षण करती हैं। भाषाओं में हमारे मिथक, मुहावरे और हमारी सामूहिक स्मृति संरक्षित है। ये हमारी संस्कृति को धारण करने वाला पात्र और अस्मिता की वाहक हैं। भाषा में सिर्फ परंपरागत कला की वसीयत और उनके संदर्भ ही नहीं होते, बल्कि व्यक्ति द्वारा अर्जित मूल्य और विश्वदृष्टिकोण भी विद्यमान है। वेदों से लेकर मध्यकालीन संत कवियों तथा दरगाहों पर श्रोताओं के दिलों में गूंजती कव्वालों की आवाज़ों से होते हुए 21वीं सदी के एक निरक्षर किसान तक- भाषाएं हमारे बनते-बिगड़ते दार्शनिक दृष्टिकोण की अर्थच्छायाओं को साथ लेकर चलती हैं जो सदियों तक हमें रास्ता दिखाती हैं। वे स्वप्न में मुझे अपने बेनाम और चेहराविहीन पुरखों को देखने की दृष्टि प्रदान करती हैं जिनमें वे मुझसे बातें करते हैं। किसी की मातृभाषा सिर्फ मुनाफे और नुकसान, प्रेम और गौरव का ही मामला नहीं है बल्कि आत्मबोध का भी मसला है। यह आत्म और उसे मिले उत्तराधिकार के बीच एक अपरिहार्य अंतर्फलक है। यह मेरी व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान का मामला है। और हुजूर, उस पहचान को मैं एक बर्गर के साथ खा नहीं जा सकता। और इसके लिए मैं कोई माफी नहीं मांगूंगा...।

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त्रिलोचन की ताजा तस्‍वीरों के लिए चलें उदय प्रकाश के यहां




त्रिलोचन, माओरी और भाषाधर्मी...

दरअसल, भाषा के प्रति किसी का रवैया जीवन के प्रति उसके रवैये को प्रतिबिंबित करता है। यह कुछ महत्वपूर्ण चीजों के प्रति उसके वास्तविक रवैये का विस्तार है- जैसे संबंध, प्रेम, बहुलतावाद, राजनीति, संस्कृति और मां धरती। यदि मैं भाषा को तात्कालिक व्यापार के उद्देश्य से मात्र व्यावसायिक विनिमय का औजार मानूं, तो यह ऐसी व्यापक विश्वदृष्टि का परिणाम होगा जो माल आधारित बाजार और उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज है। यदि मैं अपनी भाषा को बहुत महत्व देते हुए दूसरों की भाषा को उपेक्षा से देखूं तोयह रवैया नस्लवाद, धार्मिक और राजनीतिक अलगाववाद के ही समान है जिसके खतरे हम सभी देख चुके हैं। यदि सिर्फ मेरे हितों की खातिर कम प्रयुक्त की जाने वाली बोलियों और भाषाओं के लुप्त होने की संभावना बनती हो, तो यह रवैया अल्पसंख्यकों और हाशिए पर जी रहे लोगों के प्रति असहिष्णुता बरतने के ही समान है। यदि 'सफलता की भाषा' को सीखने की प्रक्रिया में मैं अपनी मातृभाषा बोलने की जहमत न उठाते हुए उसे आधुनिक विश्व व्यवस्था में अप्रासंगिक समझने लगूं, तो यह एक ऐसे व्यक्ति का लक्षण होगा जो सिर्फ सफलता ही नहीं चाहता बल्कि सफल, ताकतवर और वर्चस्वकारी व्यक्तियों की नकल भी बनना चाहता है।

भाषा का सवाल किसी एक नहीं, सभी भाषाओं का सवाल है। इसका संभावित उत्तर बहुवचन में ही दिया जा सकता है। अपनी भाषा के पक्ष में खड़ा होना अपनी अस्मिता के पक्ष में खड़ा होना है, लेकिन दूसरी भाषाओं का विरोध करना फासीवाद का समर्थन करना हुआ। सभी जीवित प्राणियों की भांति भाषाएं एक समाज या समूह का सत्व हैं। ये एक परिवार की अवधारणा से जाकर जुड़ती हैं। भारतीय भाषाओं के परिवार में एक-दूसरे के बीच मजबूत अंतर्सम्बन्ध है जो इसे पोषण प्रदान करता है। यह हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व में बहुलतावाद का परिचायक है और हमारे चरित्र को परिभाषित करने तथा अस्तित्व को तय करने में इसकी बड़ी भूमिका है। इसलिए एक को बचाने का अर्थ होगा कि हम सभी भाषाओं को प्रोत्साहन दें। यह संवादात्मक सह-अस्तित्व के मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना है। इस बहुलतावाद के आधार पर ही हमारा लोकतंत्र बचा रह सकेगा और प्रगति में स्थायित्व बना रह सकेगा। भारतीय भाषाओं के समर्थकों को अवमानित करना बहुलतावाद की अवमानना है। भाषाएं सजीव हैं और अंतर्संवाद से ही उनका विकास संभव है। लेकिन इसी दौरान अगर कोई 'शावनिस्ट' अपनी मातृभाषा को बचाना चाहता है, तो उसके इस सरोकार से खिलवाड़ न करें।

आज भारतीय भाषाओं को संरक्षित करना, उनका विकास करना और प्रोत्साहन देना अपरिहार्य हो गया है। पहले भाषाएं आम आदमी द्वारा गढ़ी जाती थीं और कभी-कभार दरबार के विशेषाधिकार पर यह निर्भर करता था। लोगों के बीच के अंतर्वैयक्तिक संबंधों और संवाद से ध्वनियां पैदा होती थीं जिन्हें लेखक और विद्वज्जन लिखित रूप में संरक्षित करते थे। मसलन, इसी प्रकार से उर्दू का जन्म शास्त्रीय स्रोतों जैसे लश्करी यानी लश्कर या सेना की भाषा, सरायकी यानी सराय की भाषा और दक्खिनी तथा रेख्ता और अन्य रूपों से हुआ। पिछली सदी में मीडिया और प्रौद्योगिकी का अप्रत्याशित विकास ही भाषाओं को तय करता रहा है। आज भाषा सिर्फ सराय और सड़कों पर ही नहीं गढ़ी जाती, बल्कि 'ऑन एयर' और सॉफ्टवेयर में भी बनती-बिगड़ती है। मीडिया को एक ऐसी भाषा की जरूरत है जो किताबी न हो, न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों द्वारा बनाई गई हो बल्कि उत्तेजक हो और निरंतर विस्तृत होते लक्षित वर्ग को संबोधित करती हो। भारतीय जनता किसी स्वीकृत भाषा की कम से कम सैकड़ों बोलियां इस्तेमाल करती हैं। इसीलिए एक ऐसी शब्दावली की आवश्यकता है जो ज़ुबान के आसपास ठहरती हो, जिसे सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि व्यापक भूभाग में इस्तेमाल किया जाता हो। इस वजह से मीडिया और आम आदमी, दोनों की जरूरत है कि भाषा संबंधी जागरूकता का सवाल प्राथमिक हो। और ऐसी जागरूकता एक निश्चित मात्रा में 'एक्टिविज्म' के बगैर संभव नहीं है। बस ज़रूरी यह है कि ऐसा प्रयास कठमुल्लापन और रूढ़िवादिता में न जकड़ जाए।

अपने मामले को समाप्त करने से पहले मैं कहना चाहूंगा कि मेरे ऊपर लगाए गए वर्नैक्युलर स्तालिनवादी होने के आरोप के बारे में मुझे कोई ग्लानि नहीं है। जैसा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी मेरे विद्वान मित्र धोड़पकर बताते हैं, स्तालिन की अवधारणा थी कि दुनिया की सभी भाषाएं एक दिन लुप्त हो जाएंगी और एक वैश्विक भाषा बचेगी। क्या यह उनकी भविष्यवाणी थी या वह गलती पर थे? यह सोच कर मैं कांप उठता हूं। लेकिन एक चीज के बारे में मैं निश्चित हूं। भाषा के वे नियंता जो हमारे जैसों को 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' का दर्जा देते हैं और भारतीय भाषाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं, इस मामले में खुद स्तालिनवादी हैं, चूंकि वे काफी हर्षोल्लास से एक ऐसी साम्राज्यवादी वैश्विक भाषा की विजय का जश्न मनाएंगे जो छोटी मछलियों को अपना ग्रास बना लेती हो।

तात्कालिक तौर पर त्रिलोचन मुझे ऐसे नोह की तरह दिखते हैं जो अपनी नाव में सभी भाषाई प्रजातियों को बचा ले जाने के इच्छुक हों। फिर से गलत मुहावरा! यह व्यक्ति सारी परिभाषाओं को चुनौती देता है। इसमें मेरी कम से कम सारी सीमित परिभाषाएं शामिल हैं। मैं इसे विद्वानों के ऊपर छोड़ता हूं। अब मैं उनके यहां से चलना चाहता हूं। यह जानते हुए कि वह मेरी नम्रता को अनदेखा कर देंगे, मै कहता हूं, 'अब आपको आराम करना चाहिए।' उन्होंने मेरा धन्यवाद किया। लेकिन वह पेड़ों की बात क्यों करते हैं? वह बताते हैं, 'मैंने उन सभी फलदायी और अन्य प्राचीन पेड़ों के बारे में लिखा जो मेरे हृदय से निकला।' वह क्यों नहीं सरकारी पुरस्कारों, अनुदानों और सम्मान की बात करते हैं? अपने जीवन की इस अस्त होती सांझ में भी यह व्यक्ति क्यों शब्दों, व्याकरण और विभिन्न भारतीय भाषाओं में काव्य की बात करता है? ठीक है, चूंकि मैं वर्नैक्युलर शावनिस्ट हूं, भारतीय भाषाओं के बारे में उनकी इस पीड़ा को समझ सकता हूं। लेकिन वह क्यों अरब, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों की भाषाओं की बात करते हैं? वे अंग्रेजी के बारे में भी बोलते हैं और आपको सॉनेट के काव्यात्मक तत्वों के बारे में बताते हैं। और उसी एक सांस में वे अवधी संगीत के बारे में भी बोल जाते हैं, जैसा कि उनके गांव चिरानीपट्टी के लोग गाया करते हैं। मैं ब्रह्मांड की भाषाओं के बारे में इस व्यक्ति के सरोकारों का अर्थ एरिक फ्रॉम के आलोक में ही लगा सकता हूं। उन्होंने कितने बेहतरीन ढंग से बताया था कि आत्मप्रेम संपूर्ण ब्रह्मांड, मित्रों और अजनबियों के प्रति हमारे प्रेम का ही विस्तार है।

मैं थक कर टीवी पर चैनल बदलने लगता हूं। लेकिन यहां पर भी वर्नैक्युलर शावनिस्टों ने दखल दे दिया है। क्या वे हर जगह मौजूद हैं? यह तो मंगलवासियों के हमले जैसा है। क्या सभ्य समाज ने अभी तक इन आदिम जातियों को अपना उपनिवेश बना नहीं छोड़ा है? ये आवाजें निश्चित ही किसी दूसरे ग्रह से आ रही होंगी।

बीबीसी पर एक माओरी लेखक का लंबा साक्षात्कार प्रसारित हुआ। ये माओरी क्या है? खैर, यह न्यूजीलैंड की एक आदिम भाषा है जो दुनिया की अन्य 97 फीसदी भाषाओं की तरह ही लुप्त होने के कगार पर थी। इसके बावजूद कि माओरी जाति की संस्कृति अमूमन वहां सह-अस्तित्व में ही थी, उन्होंने अपनी मौजूदगी दावे के साथ स्थापित कराने का निश्चय किया। सिर्फ भाषा के ही संदर्भ में नहीं, बल्कि अपनी समूची सांस्कृतिक अस्मिता को बचाए रखने के लिए। अब 'श्वेत आत्माएं' आसानी से उन्हें समाप्त नहीं कर सकतीं चूंकि उनकी संस्कृति एक प्रवहमान ताकत है। अब गौरव और प्रेम के साथ इस संस्कृति के सभी पहलुओं पर लोग वापस लौटने को मजबूर हैं। आदिम सभ्यता का संगम अब आधुनिक पहनावे के साथ हो गया है। घरों में कला विराजमान है, पाककला को एक नया आयाम मिला है, वैवाहिक रीतियों का फिर से पालन किया जा रहा है और इन सबके साथ सबसे महत्वपूर्ण यह है कि माओरी भाषा फिर से खिल उठी है। लोगों ने माओरी भाषा के शिक्षण केंद्र बना लिए हैं जहां बुजुर्ग अपने बच्चों को खेल-खेल में ही भाषा के संस्कार दे रहे हैं। एक प्रमुख माओरी लेखक विति इहिमेरा ने अपनी ही कहानियों पर अंग्रेजी में काम किया है जिससे उन्हें फिर से माओरी संदर्भों में स्थापित किया जा सके। टीवी पर अपने साक्षात्कार में वह कहते हैं कि हो सकता है माओरी संस्कृति प्राचीन मिस्र जितनी महान न हो, लेकिन वे उसे मरने नहीं देंगे, चूंकि उसके साथ उनकी पहचान ही समाप्त हो जाएगी और समूची दुनिया इसके सौंदर्य से वंचित हो जाएगी। शावनिस्ट कहीं के!

हमारे साथी वर्नौक्युलर शावनिस्ट और एक सचेतन पत्रकार प्रताप सोमवंशी, जिन्होंने त्रिलोचन को हरिद्वार से देहरादून ले जाकर उनके चिकित्सा का इंतजाम किया, रोज मुझे फोन करते हैं। मेरी ही तरह उनका भी ख्याल है कि त्रिलोचन अपने नाम और बीमारी से कहीं ज्यादा बड़े व्यक्ति हैं। कुछ चिकित्सकीय पहलुओं के बारे में बात करने के बाद उनके पास जीवन के कई क्षेत्रों से तमाम लोगों के अनेक किस्से सुनाने को होते हैं और वे बातें जो त्रिलोचन ने उनसे कहीं। ठहाका लगाते हुए एक घटना से दूसरी सुनाते वक्त वह उस जिजीविषा का संचार करते हैं जो उन्हें उस 'ग्रैंड ओल्ड मैन' से प्राप्त हुई। वह अक्सर इसी किस्म के वाक्यों से अपनी बात खत्म करते हैं, जैसे 'क्या आदमी है सर, मजा आ गया, शुध्द हो गए सेवा करके।'

मेरे अजनबी मित्रो, क्या फूल, पशु और हवा बचे रह सकेंगे? आप जो कोई भी हों, जहां कहीं भी हों, मुझे बताने के कृपा करें। कुछ मौन आवाजें मुझे आश्वासन देती हैं, 'कोई चिंता नहीं, हमारे साथ आओ। हम इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि अगर ये समाप्त हो गए तो हम भी खत्म हो जाएंगे।' जाने कितनी स्त्रियां दुनिया भर में इसी क्षण अपनी बालकनी में पौधों को पानी दे रही होंगी, कितने बच्चे अपने पालतू पशुओं के साथ खेल रहे होंगे और कितने प्रेमी युगल ताजा फूलों से एक दूसरे को संवार रहे होंगे।

कम से कम इस वक्त तो हुजूर वर्नैक्युलर के पैरोकारों की जीत ही नजर आती है। अब स्पाइडरमैन हिंदी बोलने लगा है, बॉण्ड भोजपुरी बोल रहा है, मोबाइल फोन में द्विभाषी कीपैड आने लगे हैं, भाषाई अखबारों ने उस इकलौते अंग्रेजी अखबार को प्रसार युध्द में पीछे छोड़ दिया है जिसका नाम सर्वोच्च दस अखबारों की सूची में आता है और अब तो टेलीविजन भी देसी हो चला है।

लेकिन हुजूर, आप तो पुनर्उपनिवेशित मस्तिष्कों की कमजोरियों और आकांक्षाओं से अच्छी तरह परिचित होंगे। आप तो जानते ही हैं कि हम में से कई आधुनिक बनने के चक्कर में अपने बेडरूम में भी अपनी भाषा बोलने से कतराते हैं। संभव है कि वर्नैक्युलर के पैरोकार लोग ही भाषा संबंधी आत्मसम्मान को जगा सकें। जबकि, आप स्तालिन जैसे लोग यह सोचते हैं कि यह सिर्फ वक्त की बात है और अंतत: वर्नैंक्युलरवादियों की हार होगी। वर्नैक्युलर शावनिस्ट अभी जिंदा हैं। हम जीतें या खत्म हो जाएं, मैं आपके हर कदम पर आपकी बौध्दिक हार का वादा करता हूं, और एक ऐसी लड़ाई का जिसे अंजाम तक हम पहुंचाएंगे।

प्रताप ने फिर से मुझे फोन किया। उन्होंने बताया कि अस्पताल के जिस कमरे में त्रिलोचन भर्ती थे वहां उन्होंने भारतीय भाषाओं के बारे कुछ लोगों को बातचीत करते सुना। वह अचानक अपने बिस्तर पर उठ बैठे और बोले, 'मत घबराओ, बस ऐसी बोलियों को विकसित करो जिनके बारे में लिखा नहीं गया है। मल्लाह, किसान और गड़रिये की भाषा खोजो, अपढ़ और धोबियों की भाषा खोजो। उनके शब्दों को अपनी भाषा की मुख्यधारा में ले आओ। फिर देखो, तुम्हारी भाषा इतनी मधुर हो जाएगी कि उसके संगीत की विजय होगी।'

मैं जानता हूं कि वह माओरी लेखक किस चीज को लेकर इतना प्रसन्न था। वह उसकी जड़ों से उसका जुड़ाव है। अक्सर इस धरती पर यात्रा के दौरान मैं उसके और एक साधारण किसान या साधु के बीच दिखने वाली समानताओं को लेकर चकित हुआ हूं। त्रिलोचन मुझे हर जगह दिखाई देते हैं, कम से कम हमारे देश के बड़े शहरों के बाहर।

उम्मीद है कि नए तरीके ईजाद किए जाएं, बोलियों के लिए नया व्याकरण और शैली बने, शब्दकोश तथा कंप्यूटर की सहायता ली जाए, लेकिन इन सबसे बढ़ कर नई अस्मिताएं पनपें। यह हमारे वक्त में एक ऐसा क्षण है जब, रुस्तम की कविता के शब्दों में हमें 'अपने पुरखों पर ध्यान लगाना होगा।'

हरिद्वार में वह शाम जैसे-जैसे गहराती गई, मेरे हमसफर एक युवा फिल्मकार तुषार त्रिलोचन के पास उनका ऑटोग्राफ लेने वापस गए। मैंने खुद से वादा किया कि अगली बार अपनी यात्रा के दौरान मैं पास में ही स्थित कलियार पीर की दरगाह पर जाऊंगा। उसके बाद हम सड़क किनारे एक नदी के पास कुछ देर के लिए रुके। मेरे जैसे छद्म-धार्मिक, छद्म-वामपंथी, छद्म-बौध्दिक और निश्चित तौर पर एक अछद्म वर्नैक्युलर शावनिस्ट ने हाथ जोड़ कर गंगा मैया से शाम की आरती में शामिल न होने के लिए माफी मांगी।

दास कबीर ने कहा था, 'तीरथ ना करिए...।' मेरे लिए त्रिलोचन तीर्थ हैं। चारों ओर से घेरती शाम के साये में हम गंगा किनारे खड़े थे, मुझे उस समय उसके प्राचीन जल की गहरी बुदबुदाहट सुनाई दी। उसके साथ ही मैंने उसी शाम को कुछ देर पहले अपने सिर पर त्रिलोचन के हाथों के स्पर्श को फिर से महसूस किया।

9/29/2007

क्‍या बुद्धिजीवी इतने नादान होते हैं...


अभी पिछले ही दिनों 21 से 24 सितम्‍बर के बीच दिल्‍ली में एक महत्‍वपूर्ण आयोजन हुआ जिसे हम मीडिया की भाषा में 'अंडर रिपोर्टेड' की संज्ञा दे सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में विश्‍व बैंक पर गठित एक स्‍वतंत्र जन न्‍यायाधिकरण की बैठक। मोटे तौर पर देखें तो यह कुछ बड़ी पूंजी वाले गैर-सरकारी संगठनों का एक जमावड़ा था जहां तथ्‍य और सामग्री के स्‍तर पर विश्‍व बैंक के खिलाफ बहुत कुछ पाने और सीखने को था। इस बैठक के पहले ही हमें कुछ ऐसी जानकारियां हाथ लगी थीं जिनके बारे में लिखने को मन कुलबुला रहा था और बैठक की समाप्ति तक यह तय हो चुका था कि कुछ चीज़ों को एक्‍सपोज़ किया जाए। फिर मेरे एक मित्र और वरिष्‍ठ पत्रकार गोपाल कृष्‍ण ने सलाह दी कि हर चीज़ पर लिखने से बेहतर होता है कभी-कभी मौन धारण करना। उनका कहना था कि फालतू तूल देने से क्‍या फायदा।

पांच छह दिन बाद मुझे लगता है कि तूल नहीं दिया तो बेहतर ही है, मामला सब्‍जेक्टिव हो सकता था। लेकिन बताने की खुजली मन में अब भी बाकी है। इस बार इस बैठक का मुख्‍य आयोजक ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नामक संस्‍था थी। हम में से कई पत्रकार साथी इस संस्‍था से वाकिफ होंगे। जानकारी के लिए बता दूं कि यही संस्‍था काम्‍बैट लॉ नामक पत्रिका प्रकाशित करती है जिसमें हमारे वरिष्‍ठ साथी रंजीत वर्मा कभी हुआ करते थे। दरअसल बात शुरू हुई इस आयोजन के लिए मीडिया डेस्‍क बनाने से। कॉम्‍बैट लॉ का काम देख रहे यूएनआई के पूर्व पत्रकार सुरेश नौटियाल के हाथ में जि़म्‍मेदारी दी गई। उन्‍होंने अपने एक मित्र को 25000 रुपये में मीडिया और जनसंपर्क का ठेका दिलवा दिया। बाद में इस व्‍यक्ति के बारे में कुछ बातें पता चलीं जिससे यह उद्घाटित हुआ कि एनजीओ में भी किस तरीके से एक-दूसरे को विचारधारा और प्रतिबद्धता को दरकिनार कर फायदा पहुंचाने की परंपरा विराजमान हो चुकी है।

एक पत्रिका आई है अंग्रेज़ी में ग्रीन ग्‍लोबल वॉयस। उसके संपादक यही सज्‍जन हैं जिनकानाम शेली विश्‍वजीत है। मैं नहीं जानता, लेकिन पत्रिका देखने पर पता चला कि सुरेश नौटियाल का नाम इसमें कन्‍ट्रीब्‍यूटिंग एडिटर की जगह लिखा है। दोस्‍ती की पुष्टि हुई। लेकिन असल बात तो बाकी है। भूमंडलीकरण, साम्‍प्रदायिकता आदि मसलों का विरोध करने वाले इस एक्टिविस्‍ट एनजीओ ने एक ऐसे आदमी को चुन लिया जो टाटा का गज़ब का मुरीद है। उपर्युक्‍त पत्रिका में टाटाज़ शो दी वे नामक एक लेख लिखा मिला। उनकी वेबसाइट पर गया तो टाटा की दो बड़ी तस्‍वीरें मुखपृष्‍ठ पर दिखीं। खैर, कुछ रैडिकल किस्‍म के लोगों के विरोध के बाद यह ठेका रद्द कर दिया गया।

लेकिन असली मसाला आखिरी दिन आया। इस बैठक के लिए एक ज्‍यूरी का गठन किया गया था जिसमें 16 सदस्‍य थे। वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जी और महाश्‍वेता देवी का भी नाम था। ये दोनों झांकने भी नहीं आए। पता चला कि महाश्‍वेता जी की तबीयत नासाज़ है। प्रभाष जी शायद 20-20 विश्‍व कप में व्‍यस्‍त रहे हों, लेकिन सवाल उठाने वाले भी खुराफाती होते हैं। लोगों ने कहा कि जाना ही था तो 'राष्‍ट्रकवि' दिनकर के भाजपा प्रायोजित कार्यक्रम में मुरली मनोहर जोशी के साथ मंच पर बैठने से बेहतर था कि उसी दिन वे अरुणा रॉय और अरुंधति रॉय के साथ ज्‍यूरी में बैठ जाते।

खैर, कुल 16 में से 7 ज्‍यूरी सदस्‍य आखिरी दिन हाजि़र रहे। अरुंधति ने खुल कर कहा कि उन्‍हें नहीं पता, विश्‍व बैंक की साम्राज्‍यवादी नीतियों का विकल्‍प क्‍या है। उनके पास जवाब नहीं हैं। लेकिन शब्‍दों के बीच में पढ़ने वालों ने समझ लिया कि उनकी मंशा क्‍या है जब वे कह बैठीं कि 'हम देख चुके हैं किस तरह अहिंसक आंदोलन नर्मदा के मामले में विफल हो चुका है'। काफी तेज समझदार लोगों ने उनके इस बयान को तहलका में हाल ही में छपे उनके एक साक्षात्‍कार से जोड़ डाला। अरुणा रॉय हास्‍यास्‍पद हो गईं जब उन्‍होंने कहा कि हमें और यात्राएं करनी होंगी। हां, उन्‍हीं की बिरादरी के संदीप पांडे शायद कोई यात्रा फिर से करने जा रहे हैं। अन्‍य चार सदस्‍यों ने भी कहा कि वे बहुत स्‍पष्‍ट नहीं हैं कि विश्‍व बैंक का जवाब कैसे दिया जाए। अब तक जो भी था, ठीक ही था लेकिन थाईलैंड से आए एक सज्‍जन ने कह डाला 'हमें विश्‍व बैंक का विरोध करने की बजाय उसे समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि वह कैसे और उदार बने।' पूरे कार्यक्रम पर इस बयान ने ऐसी लीपा पोती कि आयोजकों का चेहरा सुर्ख हो आया।

अगले दिन बड़ी मुश्किल से अपनी इज्‍जत बचाने के लिए आयोजकों ने ज्‍यूरी की ओर से एक संयुक्‍त बयान जारी करवाया। कार्यक्रम अब समाप्‍त हो चुका है। 25 लाख खर्च होने के बावजूद कहा जा रहा है कि ढाई लाख की कमी पड़ गई। लगे हाथ बता दें कि अरुंधति के जिंदाबाद ट्रस्‍ट ने कार्यक्रम के लिए शायद डेढ़ लाख दिए थे। चार दिनों तक विश्‍व बैंक को मथने के बाद क्‍या निकला, यह सवाल अहम है। लेकिन इसका जवाब न तो उपस्थित और न ही अनुपस्थित ज्‍यूरी के पास है।

शायद इन सभी विद्वानों ने वेनेजुएला का एक मॉडल पढ़ा होगा जहां शावेज की पहल पर बैंक ऑफ साउथ नाम परिघटना की शुरुआत कर दी गई है। अधिकतर लातिन अमेरिकी देशों ने विश्‍व बैंक का कर्ज चुका दिया है और खुद को आईएमएफ से अलग कर लिया है। वे अब एक क्षेत्रीय बैंक बनाने का सोच रहे हैं। हमने पूछा भी, कि क्‍या ऐसे किसी क्षेत्रीय बैंक की अवधारणा पर सवाल किया गया...कोई बात आई। आश्‍चर्यजनक रूप से...नहीं। सवाल आर्थिक विकल्‍प का था...और सारी बात राजनीतिक विकल्‍प यानी सत्‍ता के विकल्‍प के पास आकर समाप्‍त हो गई। किसी ने भी इस ओर सवाल नहीं उठाया।

इस देश के बुद्धिजीवियों का यही दुर्भाग्‍य है। हमेशा राजनीति सोचते हैं...देश भर से आए 600 लोग उन्‍हीं काग़ज़ के पुलिंदों को लेकर लौटे जो हमें भी मिले थे...जिनमें सिर्फ 10,000 के वेतन पर रखे गए एक रिसर्चर द्वारा कट, कॉपी और पेस्‍ट की कला दिखाई दे रही थी। बातें अंग्रेज़ी में हुईं...जो हिंदी में बोलना चाहे उन्‍हें कान नहीं दिया गया।

और मीडिया इस परिघटना से पूरी तरह बेखबर 20-20 से खेल रहा था। उसे इस देश पर आर्थिक साम्राज्‍यवादी हमले से कोई सरोकार नहीं। लेकिन लाख टके का सवाल ये कि जिन्‍हें सरोकार है या दिखाई देता है वे ऐसे सम्‍मेलनों में आकर अपनी ऊर्जा क्‍यों नष्‍ट कर रहे हैं।

आयोजन समिति के ही एक सदस्‍य के शब्‍दों को लें तो यह बैठक 'दरअसल एक मिनी इंडियन सोशल फोरम' थी। जहां, लोग यह समझने की लगातार कोशिश करते रहे कि आखिर विश्‍व बैंक हमारा दुश्‍मन क्‍यों है। क्‍या बुद्धिजीवी इतने नादान होते हैं...

9/11/2007

एक उम्‍मीद जो तकलीफ जैसी है...


ये पंक्तियां आलोक धन्‍वा की एक कविता की हैं...बरबस याद आ गईं। दरअसल, मैं दो दिनों पहले दिल्‍ली में आयोजित एक पुरस्‍कार समारोह के बारे में सोच रहा था। शहीद शंकर गुहा नियोगी की स्‍मृति में पत्रकारिता पुरस्‍कार का समारोह था वह राजेंद्र भवन में। अगले दिन अखबारों को देखा...अंग्रेजी को छोड़ दें तो हिंदी अखबारों को भी इस पुरस्‍कार की कोई सुध नहीं थी। उन्‍हीं हिंदी अखबारों को, जिनके सम्‍पादकीय पन्‍ने उन लेखकों/पत्रकारों के लेखों से रोज पटे पड़े रहते हैं जिन्‍हें यहां सम्‍मानित किया गया।


यह पुरस्‍कार कई मायने में अद्भुत रहा...जो स्‍मृति चिह्न दिया गया वह मजदूरों के हाथों में खड़ा धान का कटोरा था। यह छत्‍तीसगढ़ का प्रतीक था जहां शंकर गुहा नियोगी को इसलिए मार दिया गया क्‍योंकि उन्‍होंने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करने का प्रयोग किया था...वह काम जिसे आज चुनावी या गैर-संसदीय कोई भी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी शायद नहीं कर रही है।


दूसरी अद्भुत बात यह रही कि पुरस्‍कृत होने वाले हरेक पत्रकार ने पुरस्‍कार राशि किसी सामाजिक काम के लिए दे दी...ध्‍यान रखें कि यह लीक अरुंधति राय की नहीं थी। न वह मजदूरों-किसानों के लिए लिखती हैं और न ही उन्‍होंने ऐसे किसी काम के लिए बुकर की धनराशि दी थी। उनका डॉलर या पाउंड आत्‍मवीकृतियों के वीर्य पर फिसलती एक पत्रिका के लिए बहा था। यहां ऐसे लेखक थे जिन्‍होंने लंबे समय तक जिगर चाक कर लगातार खून से लिखा है...यदि मैं ज्‍यादा कह रहा हूं तो आज के मुख्‍यधारा के पत्रकारों से तुलना कर लें...चाहे वे अनिल चमडि़या हों या वासवी...या कि आनंद स्‍वरूप वर्मा और कुलदीप नैयर।


मैंने पूछा कुछ हमउम्र पत्रकारों से नियोगी के बारे में...उन्‍होंने शायद नाम भी न सुना था उनका। उन्‍हें पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से कम कुछ नहीं दिखता...और वे भारत में कम से कम रामनाथ गोयनका पुरस्‍कारों को ही मानक मानते हैं पत्रकार होने का। क्‍या कन्‍ट्रास्‍ट है कि अगले ही दिन जनमत से लाइव इंडिया बने एक चैनल के पत्रकार ने अपनी पत्रकारिता के लिए रो-रो कर माफी मांगी...पुलिस के सामने...एक शिक्षिका का शील उछालते वक्‍त उसे अपने स्टिंग के कैमरे में शायद कोई व्‍यावसायिक पुरस्‍कार दिख रहा होगा...।


इतनी ढेर सारी 24 घंटीय रिपोर्टिंग के बीच अब भी कुछ लोग हैं जो बंधाते हैं उम्‍मीद...लेकिन उनकी हालत देखकर होती है तकलीफ...वे अकेले नियोगी जैसे क्रांतिधर्मियों की सलीब ढो रहे हैं...और ये सभी किसी भी मुख्‍यधारा के अखबार में नौकरी नहीं करते..।


हमारे समय की इससे बड़ी विडम्‍बना क्‍या होगी कि समय को सबसे बेहतर समझने वाले समय के हाशिए पर हैं...





9/02/2007

दिल्ली ब्रांड संघर्ष के मायने

(यह लेख कुछ ही दिनों पहले दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हो चुका है। चूंकि इस पर काफी प्रतिक्रियाएं आईं और किसी रूद्र वर्मा नाम के सज्‍जन ने इसे ए से जेड तक शुरू होने वाले तमाम ऐसे ई-पतों पर स्‍कैन कर के फॉरवर्ड कर दिया जो लोग प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हैं, तो मुझे लगा कि इसे ब्‍लॉग पर भी प्रकाशित कर देना चाहिए। पिछले काफी दिनों से ब्‍लॉग पर कुछ न लिखने की इकलौती वजह यह रही कि मैं अपना पासवर्ड भूल गया था। आज काफी मशक्‍कत के बाद मैंने उसे खोज निकाला है)


आजादी के 60 वर्ष बीत चुके हैं और इस वर्ष का साठ फीसदी वक्त भी निकल चुका है। साठ वर्षों के दौरान जो हो न सका, उसे हासिल करने की मांग को लेकर इस वर्ष देश की राजधानी में छिड़े एक संघर्ष ने पहला चरण पूरा कर लिया है। देश की तमाम ज्वलंत समस्याओं पर मेधा पाटकर के नेतृत्व में 'संघर्ष 2007' नाम की यह परिघटना जिस उद्देश्‍य को लेकर चली थी, उसकी परिणति पिछले 13 अगस्त को भले ही राष्ट्रीय पुनर्वास नीति का मसौदा जमा किए जाने में हो गई, लेकिन नागरिक समाज और दिल्ली में स्थित जनांदोलनों के बीच अचानक कुछ बहसों की शुरुआत और पिछले ही दिनों की एक दबी-छिपी घटना ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां यह सोचा जाना लाजिमी हो चला है कि आखिर विस्थापन, दलित, स्त्री, आदिवासी, साम्प्रदायिकता, भूमंडलीकरण जैसे मुद्दों समेत विनायक सेन की गिरफ्तारी पर संघर्ष की डुगडुगी बजाने वाले दरअसल परदे के पीछे कर क्या रहे हैं? यह इसलिए और जरूरी हो जाता है क्योंकि आज जिस स्थिति में नागरिक समाज और जनसंगठनों का संघर्ष पहुंच चुका है, वहां काम के आधार पर विभाजक रेखा खींचना कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। आश्‍चर्य है कि कभी जिन कामों की उम्मीद कम्युनिस्ट पार्टियों से की जाती थी, आज उनमें से कई तो एक्टिविस्ट एनजीओ किए दे रहे हैं। इसके बावजूद उनकी बुनियादी दिक्कतें क्या हैं जो उन्हें बार-बार अविश्‍वसनीय बना देती हैं?

यह बताने की जरूरत नहीं कि वास्तव में दिल्ली और इससे बाहर कुछ ऐसे जनसंगठन हैं जो विदेषी अनुदान मिले या न मिले, मोटे तौर पर अपने बनाए एजेंडे पर चलते हैं और कमोबेश कुछ ईमानदारी से काम कर रहे हैं। देश भर के ऐसे संगठनों के लिए दिल्ली में एक समर्थन समूह भी है। यह तय करना हमेशा से कठिन रहा है कि जो संगठन खुद को विदेशी अनुदानों से मुक्त बताते हैं वे वास्तव में कितना मुक्त हैं, क्योंकि परोक्ष रूप से विदेशी अनुदान का ही पैसा उनकी पदयात्राओं जैसी चीजों में मदद करता है। इसलिए बात यहां से नहीं शुरू की जानी चाहिए। असली मसला उनके काम का है जिसे परखा भी जा सकता है। यहां हम सिर्फ एक ही कसौटी को अगर लें तो बात समझ आएगी। जनस्वास्थ्यकर्मी और मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को गिरफ्तार हुए दो महीने हो रहे हैं। दिल्ली से लेकर रायपुर तक कार्यक्रम किए गए और न सिर्फ पीयूसीएल बल्कि तमाम एनजीओ, जनसंगठनों और मोर्चों ने उनकी गिरफ्तारी के विरोध में आवाज़ भी उठाई। दिल्ली में ईमानदारी से एक कमेटी का भी गठन किया गया। अच्छे प्रयासों के बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात। हद से हद हुआ यह कि जो बिनायक सेन को नहीं जानते थे, वे जान गए। दिल्ली से गए एक पत्रकार का पीयूसीएल के पदाधिकारियों के साथ रहते हुए विनायक सेन से जेल में न मिल पाना, अपने आप में एक अद्भुत कहानी है। दिल्ली के ही एक मानवाधिकार कार्यकर्ता का कहना है कि बिनायक सेन पर कानूनी मामला उतना मजबूत नहीं है, लेकिन उनके पक्ष में उठने वाली आवाज़ें बहुत लचर हैं। इसके लिए वे शब्द 'कैजुअल अप्रोच' का इस्तेमाल करते हैं।

यह 'कैजुअल अप्रोच' सिर्फ बिनायक सेन के मामले में ही नहीं,, जमीनी संघर्ष में भी दिखता है। मोटे तौर पर यदि हम यह सैध्दांतिक रूप से मान लें कि सभी एनजीओ या गैर सरकारी संस्थाएं साम्राज्यवादी पूंजी और हितों की पोषक हैं, तो हमारे लिए सोचने को कोई सवाल ही नहीं रह जाता। लेकिन यदि हम यह रणनीतिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आज की दमनकारी और जनविरोधी स्थितियों में सभी प्रतिरोधी ताकतों को अपनी-अपनी सीमाओं के साथ एक न्यूनतम मंच पर आना चाहिए, तो जिस किस्म की दिक्कतें पैदा होती हैं वह आज दिल्ली के नागरिक समाज में स्पष्ट दिख रही हैं। पहली फांक तो वैचारिक ही है जो समाजवादी बनाम कम्युनिस्ट का रूप धारण कर लेती है। दिन के उजाले में यह फांक निजी और सामूहिक स्तर पर ढंकी रहती है लेकिन रात के धुंधलके सुरूर में कभी-कभी इसकी अभिव्यक्ति बहुत खतरनाक हो जाती है, जैसा कि पिछले दिनों हुआ।

दिल्ली के एक दलित संगठन के दलित कार्यकर्ता द्वारा एक समाजवादी नेता की दो दर्जन लोगों के सामने पिटाई इसलिए की गई क्योंकि उस नेता ने दलित कार्यकर्ता की पत्नी से छेड़छाड़ की थी। बाद में उक्त समाजवादी सज्जन द्वारा अकेले में माफी मांगे जाने ने न सिर्फ उनकी निजी छवि को नुकसान पहुंचाया, बल्कि दिल्ली में जनांदोलनों के प्रतिनिधियों के बीच और मतभेद पैदा कर दिए। यह सोचा जाना चाहिए कि आखिर क्यों आंदोलनों की सामूहिक ताकत एक निजी परिघटना से प्रभावित हो जाती है? मेधा पाटकर ने खुद कई बार इस तथ्य को स्वीकार किया है आज एनजीओ और राजनीतिक कार्य को अलग किए जाने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे अनुदानित और गैर-अनुदानित संस्थाओं को भी। इन दोनों का घालमेल ही सारी दिक्कतें पैदा कर रहा है। संभव है कि उक्त घटना की खबर मेधा पाटकर तक भी पहुंची हो, तो क्या हम उनसे एक ऐसी ईमानदार स्वीकारोक्ति की उम्मीद कर सकते हैं कि उनके इर्द-गिर्द के लोग ही व्यक्तिगत आचरण और हितों के चलते एक व्यापक आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहे हैं?

सवाल सिर्फ किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, यह बात सीधे-सीधे उस व्यापक देसी आबादी से जाकर जुड़ती है जिसका प्रतिनिधित्व दिल्ली में किया जाता है और कभी-कभार उसे रेलगाड़ियों में भर कर संसद मार्ग पर लाया जाता है। क्या इस तर्क को पुष्ट किया जा सकता है कि एक महाराष्ट्र आधारित हजारों की संख्या वाला आदिवासी जनसंगठन कॉमन स्कूल सिस्टम पर सेमिनार करे या उसके लिए दिन भर जंतर-मंतर पर जलता रहे? ऐसा नहीं है कि संस्थाओं और जनसंगठनों का नेतृत्व इस बात को समझता नहीं, लेकिन उसके लिए नागरिक स्वतंत्रता के संघर्ष से मिली कुर्सियां कभी-कभार ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठती हैं और कुर्सियों की अदला-बदली में सारा संघर्ष पार्श्‍व में चला जाता है। निजी कारणों से आंदोलनों के घालमेल ने दरअसल जिस किस्म का नुकसान इस देश को पहुंचाया है, बिनायक सेन उसी की सजा विरासत में भुगतने को मजबूर हैं। यदि आज भी इस बात को तमाम प्रतिरोधी ताकतें स्वीकार नहीं करेंगी, तो आने वाले समय में जनता की राजनीति करने वाले सभी व्यक्तियों, समूहों और संगठनों पर बेवजह एक सवालिया निशान खड़ा हो जाएगा। इसके परिणामों की कल्पना करना ज्यादा कठिन नहीं है।

6/20/2007

देर आयद, दुरुस्‍त आयद...

नारद के बारे में पिछले कुछ दिनों के भीतर हिंदी चिट्ठाकारों के बीच भड़का असंतोष दरअसल एक ऐसी स्थिति को बयान करता है जहां व्‍यावसायिक हित ओर लोकप्रियता का चरम आखिर में रीढ़ की बेशर्म मांग पर उतर आता है।साल भर पहले करीब जब मैंने जनपथ को शुरू किया तो पहला पोस्‍ट ही विवादित हो गया था। 'का गुरु चकाचक' नाम के इस पोस्‍ट की भाषा पर दुबई से लेकर रतलाम वाया बनारस कोहराम मचा और जितेंद्र चौधरी ने मुझे नारद पर से हटा दिया। उस पर से यह उलाहना भी दी गई कि 'हम तो हिंदी चिट्ठाकारों को प्रोत्‍साहित करने के लिए खुद नारद से उनके ब्‍लॉग को जोड़ लेते हैं।'

फिर मैंने एक पोस्‍ट लिखा 'जितेंद्र चौधरी की भाषाई किडिच़पों' - और एक बार फिर नारद मुनि के चेले मेरे ऊपर मय हरवा हथियार लेकर सवार हो गए। शायद मेरी जानकारी में मेरा जनपथ सबसे पहला ब्‍लॉग था जिसे नारद पर से हटाया गया, लेकिन उस वक्‍त मेरी भाषा का इतना विरोध था कि किसी ने भी नारद के खिलाफ एक शब्‍द नहीं कहा। संभव है उस वक्‍त आज के नारद विरोधियों को लोकप्रियता का डेंगू लगा रहा हो, जो कि किन्‍हीं सज्‍जन ने सलाह दी थी 'नारद जी के आशीर्वाद के बिना हिंदी ब्‍लॉगिंग की दुनिया में टिकना संभव नहीं।'

मैंने सबकी भावनाओं का ख्‍याल करते हुए वह पोस्‍ट हटा दी। उस घटना के महीने भर बाद भी मुझे धमकी भरे फोन आते रहे...मैं नहीं जानता किसने ये फोन करवाए...लेकिन आज जो नारद के खिलाफ खड़े हैं उनमें से कुछ लोग उस वक्‍त नारद का गुणगान कर रहे थे।

मैं किसी को दोष नहीं देता...लेकिन इतना जरूर पूछना चाहता हूं कि क्‍या लोकप्रिय होने के बाद ही विरोध करने का साहस आता है...।

उस घटना के बाद से मैंने नारद से कोई संबंध नहीं रखा...और धीरे-धीरे ब्‍लॉगिंग से दूर होता गया। कई वजहें थीं।

नारद का विरो‍ध अपने आप में जायज भी है और वक्‍त की मांग भी...मैं इस प्रकरण में ही नहीं बल्कि ब्‍लॉगिंग की दुनिया में कदम रखने के वक्‍त से ही नारद के फासीवादी रवैये की मुखालफत करता रहा हूं। इसलिए यह बात मेरे लिए कोई नयी नहीं।

नयी बात यह है कि यदि भविष्‍य में हिंदी के चिट्ठाकार नारद का कोई विकल्‍प चुनते हैं तो क्‍या वहां वही खतरे पैदा होने की संभावनाएं नहीं होंगी जो नारद में रहीं...भले ही उनका चरित्र सांप्रदायिक और हिंदूवादी न हो। आखिर लोकतंत्र किसी भी माध्‍यम की सबसे बड़ी मांग है...क्‍या इस सवाल को संबोधित करने की जरूरत आज नहीं है।

जो सबसे ज्‍यादा लोकप्रिय हिंदी ब्‍लॉग आज चल रहे हैं, क्‍या वहां सच्‍चे मायनों में लोकतंत्र है...क्‍या ऐसा प्‍लेटफॉर्म बनाने का साहस कोई रखता है जहां आप अपनी सब्‍जेक्टिविटी से ऊपर उठ कर लेख पोस्‍ट कर सकें...। क्‍या वहां आपका अपना एजेंडा नहीं आड़े आएगा...।

ये कुछ सवाल हैं जिन पर सोचे जाने की जरूरत है।

3/22/2007

कुमार मुकुल की एक उपयोगी कविता


जो हलाल नहीं होता...

मेरे सामने बैठा
मोटे कद का नाटा आदमी
एक लोकतांत्रिक अखबार का
रघुवंशी संपादक है

पहले यह समाजवादी था
पर सोवियत संघ के पतन के बाद
आम आदमी का दुख
इससे देखा नहीं गया
और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में
इसका नाम आने से रह गया है
यह खुशी इसे और मोटा कर देगी
इसी चिंता में
परेशान है यह
क्‍योंकि बढ़ता वजन इसे
फिल्‍मी हीरोइनों की तरह
हलकान करता है
और टेबल पर रखे शीशे में देखता
बराबर वह
अपनी मांग संवारता दिखता है

राज्‍य के संपादकों में
सबसे समझदार है यह
क्‍योंकि वही है
जो अक्‍सर अपना संपादकीय खुद लिखता है
मतलब
बाकी सब अंधे हैं
जिनमें वह
राजा होने की
कोशिश करता है

राजा,
इसीलिए
गौर से देखेंगे
तो वह शेर की तरह
चेहरे से मुस्‍कुराता दिखता है
पर भीतर से
गुर्राता रहता है

पहले
उसके नाम में
शेर के दो पर्यायवाची थे
समाजवाद के दौर में
एक मुखर पर्यायवाची को
इसने शहीद कर दिया
पर जबसे वह मानवधतावादी हुआ है
शहीद की आत्‍मा
पुनर्जन्‍म के लिए
कुलबुलाने लगी है
जिसकी शांति के लिए उसने
अपने गोत्र के
शेर के दो पर्याय वाले मातहत को
अपना सहयोगी बना लिया है

यह अखबार
इसका साम्राज्‍य है
जिसमें एक मीठे पानी का झरना है
इसमें इसके नागरिकों का पानी पीना मना है
गर कोई मेमना
(यहां का हर नागरिक मेमना है)
झरने से पानी पीने की हिमाकत करता है
तो मुहाने पर बैठे शेर की आंखों में
उसके पूर्वजों का खून उतर आता है
और मेमना अक्‍सर हलाल हो जाता है
जो हलाल नहीं हुआ
समझो, वह दलाल हो जाता है

दलाल
कई हैं इस दफ्तर में
जिनकी कुर्सी
आगे से कुछ झुकी होती है
जिस पर दलाल
बैठा तो सीधा नज़र आता है
पर वस्‍तुत: वह
टिका होता है
ज़रा सी असावधानी
और दलाल
कुर्सी से नीचे...

3/15/2007

सबसे अच्‍छा होता है मौन से निकला सवाल...

अविनाश ने मोहल्‍ले में मेरे सुबह के पत्र को जगह दे ही दी, कम से कम टिप्‍पणी में ही सही। उसका जवाब भी दिया है...जवाब क्‍या सवाल है बाकायदा। अब इतनी लंबी चिट्ठियों के बाद भी भाई अविनाश को मेरी असहमति के ठोस बिंदु समझ में नहीं आएं तो यह लाजवाब करने वाली बात है। भइया, तखल्‍लुस तो बनारसी सांड मैंने रखा है, लेकिन लगता है हकीकत कुछ और ही है...बलिहारी जाऊं मौन से निकले ऐसे सवाल पर...


कहते हैं अविनाश...

एक ठे भटकल बनारसी सांड को अब मैं क्‍या जवाब दूं। असहमति के ठोस बिंदु उनके क्‍या हैं, यही मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसलिए जब ये साफ साफ कहेंगे बनारसी सांड, तभी कोई ठीक ठीक जवाब भी दिया जा सकेगा।
अविनाश भाई,

आपका अविकल पत्र आखिर मीडियायुग पर एक टिप्‍पणी के रूप में आया...यह बात समझ में नहीं आई कि आपने जनपथ पर टिप्‍पणी क्‍यों नहीं की, जबकि दोनों ही चिट्ठों पर कमोबेश एक ही वक्‍त मैंने अपना पत्र प्रकाशित किया था। खैर, आपको आपत्ति है कि मैंने मित्रता के तकाज़े से आपको सूचना क्‍यों नहीं दी कि मैंने कोई टिप्‍पणी भेजी है...भाई ऐसा भी कहीं होता है कि टिप्‍पणी करने के बाद आप बताएं कि भइया देख लीजिए, मैंने आपकी आलोचना की है...ठीक लगे तो छाप दें...ये तो आप ही की लीक रही है कि लोगों को फोन कर कहते फिरें कि यार मेरे ब्‍लॉग पर एक कमेंट करिए ना। प्रायोजित टिप्‍पणियों से मोहल्‍ला चलाने का काम आपका हो सकता है...जरूरी नहीं कि हर भाव और शब्‍द प्रायोजित ही हो...कोई टीआरपी थोड़े ही बढ़ानी है मुझे।

दूसरे, पंकज पराशर के ब्‍लॉग से विषवमन करने का ख्‍याल न मेरा था न मैं ऐसा करता...बात सिर्फ ये है कि पंकज ने अपनी स्‍वेच्‍छा से अपने ब्‍लॉग पर भूमिका लिख कर पत्र छाप दिया...ये ज़रूर है कि इस पत्र का जिक्र मैंने उनसे किया था, उन्‍हें भेजा था...लेकिन ऐसी भी क्‍या बात कि हम आपके खिलाफ साजिश करने लगे...साजिश वही करता है जिसके वेस्‍टेड इन्‍टरेस्‍ट होते हैं...चूंकि मेरा और पंकज का पक्ष एक था इसलिए आपको यह गलतफहमी होना जायज़ है।

तीसरी बात, आपने कहा है कि मैंने अपनी आत्‍मप्रशंसा की है पत्र में...यदि वह आत्‍मप्रशंसा ही है तो आपने मेरी निंदा का बिंदु वहां से अपने आप कैसे निकाल लिया कि मुझे इसी विषवमन की वजह से नौकरियों से निकाला गया होगा...। गुरु, कोई भी वैचारिक सहमति-असहमति की बहस व्‍यक्तिगत नैतिकता और अनैतिकता के आख्‍यान के बगैर अधूरी होती है...यह उसी तरह होता है जैसे लग्‍घी से पानी पिलाना...आखिर इंसान अपने ही अनुभवों के प्रति प्रामाणिक हो सकता है, भले ही वह दुनिया भर से सीखे...और अपने कड़वे अनुभव लिखना यदि आत्‍मप्रशंसा है तो फिर शायद आप आज तक लिखा दुनिया का आधे से ज्‍यादा साहित्‍य खारिज कर रहे होंगे...

जहां तक मोहल्‍ले की ओर टहल का सवाल है, आपकी गुजारिश को मानना न मानना मेरे ऊपर निर्भर है...लेकिन आपने एक बात गलत पकड़ ली कि मैंने हरिवंश जी के योगदानों पर कोई सवाल पत्र में नहीं उठाया था...भाषा और तथ्‍यगत रिपोर्टिंग की बात करना प्रकारांतर से एक सार्वजनिक नैतिकता से जुड़े मामले को पॉलिटिकली रिड्यूस कर देना ही है...मुझे पत्रकार होने का कोई भ्रम और गुमान नहीं है, न ही अपनी राजनीतिक और सामाजिक समझ पर कोई दावा है क्‍योंकि मैं अब भी इस बात को महसूस करता हूं कि सत्‍ता और पुलिस के लिए एक फ्रीलांसर और एक संपादक में कोई फर्क नहीं होता...लाल बत्‍ती पर आई कार्ड दिखाकर गाड़ी कुदाने के जुर्माने से बच जाना तय नहीं करता कि आप पत्रकार हैं।

आपको मैंने न वर्ग-शत्रु माना है और न ही कुछ और (जैसा कि आपने खुद ही अंदाज लगा लिया...भाजपाई इत्‍यादि)। आप दोस्‍तों के दोस्‍त बनने के काबिल आदमी हैं...जीवंत हैं...अब भी उत्‍साही हैं...इतना कुछ तो है। उसके बावजूद मुझे लगता है कि हमें इस बात पर सहमत हो जाना चाहिए कि हम कुछ मामलों में घोर असहमत हैं। सिंगुर हो आने जैसी बचकानी बातें छोड़ दीजिए क्‍योंकि ये मैं भी जानता हूं कि आज जंतर-मंतर पर नंदीग्राम में किसानों की हत्‍या पर होने वाले प्रदर्शन में आप वैसे ही अनुपस्थित रहेंगे जैसे अन्‍य में रहते आए हैं...यह सब कुछ समय और पैसे की उपलब्‍धता का सवाल होता है न कि प्रतिबद्धता का...

हां, अंतिम बात। मैंने कतई आपके चैनल के मित्रों की समझ पर कोई उंगली नहीं उठाई है...सिर्फ अगम्‍भीरता की बात कही है क्‍योंकि यह माध्‍यम की मजबूरी से जुड़ा है। मैं रवीश कुमार के बोलने के अंदाज को पसंद करता हूं...जोशी को खुद मैंने कितनी बार नेपाल की रैलियां कवर करने के लिए फोन किया है और वो आए हैं, इसके लिए मैं शुक्रगुज़ार हूं...पंकज पचौरी ने एक बार भारतीय जनसंचार संस्‍थान में मेरी क्‍लास ली है...आप कहां की बात लेकर बैठ गए महाराज...

बेशक आप अपने तईं फैशनेबल बैठकों में न आएं, लेकिन कम से कम उन तमाम संघर्षों को प्रकारांतर से गाली न दें जो देश के सुदूर हिस्‍सों में चल रहे हैं क्‍योंकि दिल्‍ली में जो कुछ भी होता है वह वर्ग समाज की विभिन्‍न अभिव्‍यक्तियां हैं...फर्क सिर्फ वेस्‍टेड इन्‍टरेस्‍ट से ही आ जाता है...उसका मखौल नहीं उड़ाया जा सकता...

आपका ही
अभिषेक श्रीवास्‍तव


(अविनाश द्वारा मीडियायुग पर की गई टिप्‍पणी नीचे दी जा रही है)

अविनाश का पत्र...

यार अभिषेक, मैंने इसलिए आपके और पंकज के लिंक मोहल्‍ले से हटाये, क्‍योंकि आपने मित्रता के तकाजे के तहत मुझे इतना भी नहीं बताया कि आपको एक कमेंट भेजा है। जबकि मैं कंप्‍यूटर से कोसों दूर था। मेरे पब्लिश करने से पहले ही उसे पंकज के ब्‍लॉग पर चढ़ा दिया। सब कुछ लगभग साज़ि‍श की तरह किया। और ऐसी बात भी नहीं कि मैंने अपने स्‍टैंड से इतर कोई भाजपाइयों से जा मिला हूं, या बाज़ार की पत्रकारिता का रातोरात झंडाबरदार हो गया हूं। आपके ही एक तीखे पत्र को मैंने मोहल्‍ले में जगह दी, तो इस पत्र में तो ऐसी कोई बात भी नहीं। तथ्‍यहीन और नासमझी में लिखे आपके पत्र को छाप कर मोहल्‍ले में मुझे खुशी ही होती कि आपको लोग ढंग से देख-समझ पाते। सही-सही वर्गशत्रु खोजने में अक्षम आप जैसे खाली दिमाग बुद्धिजीवी ने मुझे ही उस रूप में देखना शुरू कर दिया है, तो दोस्‍तों के मोहल्‍ले में आपके लिए जगह क्‍यूं। बेहतर हो, आप अपने अनाम जनपथ से हमारी ओर टहल करना भी बंद कर दें। बाकी सवाल-जवाब तो होते ही रहेंगे। दिल्‍ली में रह कर देश की बात करने वालों हाल हम संसद में भी देखते हैं, मीडिया में भी और फैशनेबल मीटिंगों में भी। इसलिए चिंता नहीं, इस पर हमारी आपकी बात होती रहेगी। बहरहाल पंकज के ब्‍लॉग छपी आपकी इसी अविकल चिट्ठी के जवाब में मेरा कमेंट भी यहां अविकल प्रस्‍तुत है:मैं अपने परम प्रिय पारिवारिक और कैशोर्य काल के मित्र पंकज पराशर की भूमिका और पिछले कुछ महीनों पहले बने मित्र अभिषेक श्रीवास्‍तव, जो अब मुझमे वर्गशत्रु की छवि देखने लगे हैं, के पत्र का क्‍या जवाब दूं, जबकि इनका सार मेरी समझ में ही नहीं आ रहा है। वैसे भी उनके पत्र पर तीन प्रतिक्रियाकर्ताओं ने बिना संदर्भ जाने जिस तरह से वाहवाही की अज्ञानता परोसी है, उस पर अगर कुछ जवाब भी दूं तो इन्‍हें समझ में नहीं आएगा। पंकज की भूमिका में मेरी ओर इशारा करते हुए कुछ मुहावरे हैं। मसलन लोकतांत्रिक होने का स्‍वांग, चमकदार भाषा का दम, दुनिया को जीत लेने का ख्‍वाब, उपदेशक आदि आदि और अंतत: इसके बाद फासीवादी आदमी के रूप में होने वाली परिणति। अब इस पर अपना पक्ष रखने के लिए अभिषेक श्रीवास्‍तव की तरह अपनी प्रशंसा करने लायक बेशर्मी अरजनी होगी और इतना साहस मुझमें है नहीं। (अभिषेक ने पत्र में अपनी ज़बर्दस्‍त आत्‍मप्रशंसा की है।) और किसी भी गलीज से गलीज आदमी के बारे में भी इस तरह की भूमिका मुझे गैरवैचारिक और ईर्ष्‍या से भरी हुई लगती है। बहरहाल अभिषेक का ये पत्र मैं मोहल्‍ले में छाप देता (मोहल्‍ले में आने वाली प्रतिक्रियाएं ग़ौर से देखें माननीय श्री पंकज पराशर जी)। उन्‍होंने कमेंट के रूप में ये पत्र भेजा भी था, लेकिन उसे मैंने इसलिए रिजेक्‍ट कर दिया, क्‍योंकि उससे पहले ये पंकज के इस ब्‍लॉग पर छप गया है। अभिषेक में तो इतनी भी हिम्‍मत भी नहीं हुई कि इसे अपने ब्‍लॉग पर चढ़ाएं। (मीडिया युग आपका निजी ब्‍लॉग नहीं है, और हो सकता है ये कमेंट पढ़ने के बाद अब तक आपने अपने ब्‍लॉग पर भी अपने पत्र चढ़ा दिये होंगे।)बहरहाल, अभिषेक ने जो सवाल उठाये हैं, वे बचकाने हैं, क्‍योंकि उन्‍हें पढ़ कर यही एहसास होता है कि न तो उन्‍हें विचार या भाषा की समझ है, न समाज की और न सही-सही राजनीति की। ये सारी समझ सिर्फ इतनी भर है कि वे खुद को छोड़ कर बाकी दुनिया को औसत बता सकें। कथादेश में पत्र लिखने का आशय हरिवंश जी पर गोली चलाना नहीं था, और इसके लिए कंधे का सहारा लेने जैसी कोई बात भी नहीं थी। हरिवंश जी ने मुझ जैसे कितने ही पत्रकारों को ज़मीन दी। वो ज़मीन ऐसी थी, जिस पर खड़े होकर उनसे हम अपनी असहमति तक रख सकते थे और हमेशा रखते भी रहे। कथादेश में लिखा गया खुला पत्र इसी असहमति का एक अंश था। अभिषेक, जिन्‍हें पत्रकारिता सीखनी है और रिपोर्टिंग लायक तथ्‍यगत भाषा का खासा रियाज़ करना है, उन्‍हें नहीं मालूम है कि हरिवंश का हिंदी पत्रकारिता में क्‍या योगदान है। बहुत सारे योगदानों की बात छोड़ दें, तो एक क्षेत्रीय अख़बार को शून्‍य से शिखर पर पहुंचाने का उदाहरण ही अकेला सबसे बड़ा प्रसंग है। इस यात्रा में मैं भी हरिवंश जी के साथ आठ साल चला था, इसलिए उनके साथ मेरी असहमति के बिंदु भी उतने ही आत्‍मीय हैं, जितनी स‍हमति के बिंदु। इन बिंदुओं को समझना है अभिषेक जी, तो पहले हिंदी पत्रकारिता को एक आम आदमी के नज़रिये से देखिए। आपका बौद्धिक अतिवाद एक फैशन से ज्‍यादा कुछ नहीं। क्‍योंकि जब आप कहते हैं कि ब्‍लॉगिंग की दुनिया अराजनीतिक लोगों की दुनिया है, तो ये सब कुछ समझने के दावे जैसा ही है। और ये एक किस्‍म का अहंकार है, जो विचार और राजनीति के रास्‍ते में सबसे बड़ी बाधा है। आपने मोहल्‍ले के संदर्भ में एक टिप्‍पणी की है: 'मोहल्‍ले के अधिकतर निवासी या यहां से गुज़रने वाले ऐसे टीवी पत्रकार हैं जो या तो चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते अथवा उन्‍हें व्‍यक्तिगत संबंधों और वैचारिक मतभेदों के बीच का झीना परदा नज़र नहीं आता।' इस टिप्‍पणी में आपके भीतर बैठे स्‍वयंभू के दर्शन होते हैं। आपको शायद नहीं पता कि रवीश, पंकज पचौरी, हृदयेश या उमाशंकर सिंह की राजनीतिक-सामाजिक और पत्रकारीय समझ आपसे कहीं बहुत-बहुत ज्‍यादा है।दूसरी बात जो सवाल आप मुझसे हरिवंश जी से पूछने के लिए कह रहे हैं, वह आप खुद ही क्‍यों नहीं पूछ लेते। क्‍या आपकी यही राजनीति है कि अपने ब्‍लॉग का इस्‍तेमाल करने की जगह कभी पंकज पराशर के ब्‍लॉग से विषवमन करो, कभी अविनाश को उकसाओ। यही काम आप उन तमाम नौकरियों में करते होंगे, जहां से आपको निकाला गया होगा। इसके बाद आपके पत्र में व्‍यक्तियों से जुड़े राग-द्वेष के प्रसंग हैं, उन पर मैं इसलिए कोई जवाब नहीं देना चाहूंगा क्‍योंकि उससे कुछ हासिल नहीं होगा, और हो सकता है कि मुझे भी आपकी तरह व्‍यक्तियों के उदाहरण के साथ बात करने का रोग लग जाए।एक बात और, मुझे मेरी राह और मेरी असलियत बताने से पहले आप दिल्‍ली की गलियों के अलावा देश के नंदीग्राम और सिंगूर जैसे हिस्‍सों में घूम कर थोड़ा समाज, थोड़ी राजनीति समझें।अंत में एक शब्‍द ज्ञान देता हूं। विडम्‍बनात्‍मक कोई शब्‍द नहीं है, जो आपने अपने पहले वाक्‍य में लिखा है। इसलिए लिखते वक्‍त थोड़ा धैर्य रखें, नकली क्षोभ के प्रपंच से बचे रहें, और थोड़ा मनुष्‍य होकर लिखने की आदत डालें। आपमें बहुत संभावना है।

3/14/2007

जो हलाल नहीं होता, वो दलाल होता है...

भाई पंकज पराशर ने ठीक ही कहा था, कि मोहल्‍ले में इतना लोकतंत्र नहीं कि वहां की जम्‍हूरिया उस पत्र को प्रकाशित कर सके...मैं अब तक अपने जनपथ पर इसे डालने से बच रहा था लेकिन अब सोचता हूं कि छाप ही देता हूं...कारण, कि मोहल्‍ले में दोस्‍तों की गलियों से अविनाश ने मुझे और पंकज पराशर को बेदखल कर दिया है...शायद उन्‍होंने वैचारिक असहमति के प्रदेश को खुद-ब-खुद इतना तिक्‍त बना दिया है कि कुछ गलियां उन्‍हें नाग़वार गुज़र रही हैं। खैर, मोहल्‍ला उनका है...जनपथ तो सबका है

मामला आपको अविनाश के ब्‍लॉग से पता चल जाएगा या चल गया होगा...मैंने सिर्फ एक हस्‍तक्षेप करने की कोशिश की थी...मेरा पत्र जस का तस यहां मैं डाल रहा हूं...


अविनाश भाई,

जो लोग आपसे परिचित हैं, हरिवंश जी से और साथ ही हिंदी ब्‍लॉगिंग की दुनिया से, उनके लिए मोहल्‍ले में हरिवंश जी का एक प्रेरणा पुरुष की तरह आना हास्‍यास्‍पद और विडम्‍बनात्‍मक घटना से ज्‍यादा कुछ नहीं है। पंकज पाराशर की बात आपने काट दी यह कह कर कि वैचारिक असहमति का मैदान इतना तिक्‍त नहीं होता कि हमेशा गाली दी जाए...लगे हाथों आपने उन्‍हें पढ़ने सीखने और वैचारिक हस्‍तक्षेप करने की सलाह भी दे डाली। सज्‍जन हैं जो चार वाक्‍यों में ही अपनी टिप्‍पणी निपटा गए पंकज भाई।

आपका पोस्‍ट देख कर मुझे सबसे पहले कुमार मुकुल की प्रभात खबर पर ही लिखी कविता याद हो आई...जो हलाल नहीं होता, वो दलाल होता है...। अन्‍यार्थ न लीजिएगा, लेकिन कथादेश में भी आपने जब विनोद जी के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई थी तो उससे गोली नहीं निकली बल्कि कुछ बेहद भद्दे रंग निकले थे...मैंने आपसे तब कहा भी था आप कुछ ज्‍यादा ही विनम्र हो गए। चर्चा तो खूब हुई, लेकिन लगा नहीं कि आप विरोध कर रहे हैं। यह एक किस्‍म के रहस्‍यात्‍मक कूटनीतिक पत्र से ज्‍यादा नहीं बन सका था।

उसके बाद आपकी रांची यात्रा और फिर उस प्रकरण की परिणति आपके ब्‍लॉग पर हरिवंश जी की उपस्थिति से होने के मायने बेहतर आप ही बता सकते हैं। लेकिन एक बात कहना चाहूंगा...'असहमति के मैदान के इतना तिक्‍त न होने' का तर्क देकर आपने हमारे और अपने मित्र अरविंद शेष के ज़ख्‍मों पर अनजाने ही नमक ही नहीं कोई तीखा अम्‍ल डाल दिया है। मुझे अब भी याद है कि जनसत्‍ता में आने से पहले अरविंद जी कितनी घुटन भरी स्थितियों में जी रहे थे...वह हरिवंश ब्रांड 'अखबार नहीं आंदोलन' की एक रंजनवादी नौकरी का ही नतीजा था। और खुद आप ही यह स्‍वीकार करते हैं कि रंजन श्रीवास्‍तव को आपने प्रभात खबर में प्रवेश दिलवाया था। चलिए, वह वक्‍त की बात रही होगी, लेकिन क्‍या मैं मान लूं कि अरविंद के दर्द से आप परिचित नहीं होंगे। फिर हरिवंश जी की एक अश्‍लील और सामान्‍य स्‍वीकृति कि 'अब संपादक मैनेजर हो गया है' को छापने के क्‍या मायने।

अविनाश भाई, वैचारिक सहमति और असहमति की जब भी बात होती है तो वह इतनी लचर भी नहीं होती कि दूसरों की आंखों में धूल झोंकी जा सके। हम यह मान सकते हैं कि तमाम वैचारिक असहमतियों के बावजूद व्‍यक्तिगत संबंध अपनी जगह रहते हैं...यह व्‍यावहारिकता का तकाज़ा भले हो, लेकिन एक जनमाध्‍यम पर उसे अभिव्‍यक्‍त करना आशंकाएं खड़ी करता है। वैचारिक स्‍टैंड को लेकर भी और व्‍यक्तिगत संबंधों के संदर्भ में भी। मैं नहीं जानता कि अरविंद की इस मामले पर क्‍या प्रतिक्रिया है...संभव है कि वे अब भी आपसे वैसे ही संबंध जारी रखें...लेकिन फिर मुझे लगता है मोहल्‍ले में इस किस्‍म की आपकी तमाम हरकतें सिर्फ प्रचारचादी और लोकप्रियतावादी नजरिए से ही होती हैं...क्‍योंकि मोहल्‍ले के अधिकतर निवासी या यहां से गुज़रने वाले ऐसे टीवी पत्रकार हैं जो या तो चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते अथवा उन्‍हें व्‍यक्तिगत संबंधों और वैचारिक मतभेदों के बीच का झीना परदा नज़र नहीं आता। और आप अपनी उस बिरादरी में वैसे ही बने रहते हैं जैसे गाइड फिल्‍म में देवानंद का पवित्र साधु पात्र।

यहां मैं कतई व्‍यक्तिगत नहीं हो रहा हूं...आप ऐसा भले मान लें...क्‍योंकि पत्रकारीय नैतिकता का ही तकाज़ा था कि मैंने अब तक दस नौकरियां छोड़ी हैं और हाल ही में आपके चैनल में दिबांग के साथ 45 मिनट लंबे चले साक्षात्‍कार के बाद मुझे नहीं बुलाया गया...संभव है मुझमें कमियां रही हों...लेकिन इसका बुनियादी कारण यह था कि मैंने संजय अहिरवाल के एक सवाल के जवाब में गुजरात नरसंहार पर भाजपा के खिलाफ स्‍टैंड ले लिया था। बाद में एक टीवी पत्रकार ने ही मुझे सलाह दी थी कि भइया नौकरी ऐसे नहीं मिलती है...आपको डिप्‍लोमैटिक होना चाहिए था।

मुझे लगता है कि गुजरात नरसंहार जैसी किसी भी घटना पर डिप्‍लोमैटिक होना वैसे ही है जैसे 'वैचारिक असहमति के प्रदेश को इतना तिक्‍त न छोड़ देना कि सिर्फ गालियां दी जाएं'। आप ही का तर्क...। शायद, यह नैतिकता और वैचारिकता की उत्‍तर-आधुनिक व्‍यवहारवादी परिभाषा हो। लेकिन इसे कम से कम मैं नहीं जानता और मानता।

एक आग्रह है आखिर में...संभव हो सके तो ब्‍लॉग पर, फोन पर अथवा अगली मुलाकात में आप हरिवंश जी से एक प्रश्‍न पूछने का साहस अवश्‍य करिएगा, कि 'क्‍या संपादक के मैनेजर हो जाने की सामान्‍य टिप्‍पणी उन पर खुद लागू होती है...।' यदि वह जवाब नहीं में दें, तो एक और सवाल पूछिएगा कि दिल्‍ली के सिविल सोसायटी जैसे तमाम एनजीओ से जुड़ाव, उनकी पत्रिकाओं के कवर पेज पर 'मिस्‍टर एडिटर' के तमगे से लेकर विदेश यात्राओं तक के पीछे क्‍या माया है। क्‍या इस माया के लिए दिल्‍ली के ब्‍यूरो में प्रतिमाह 1400 रुपए पर किसी लड़के से संपादकीय पेज पर काम कराना ज़रूरी होता है...।

यदि उनका जवाब हां में हो, तो आपसे कम से कम हम पाठक मोहल्‍ले पर एक खेद पत्र की अपेक्षा अवश्‍य करेंगे। आखिर वैचारिक असहमति के बावजूद आपसे इतनी मांग तो की ही जा सकती है...मोहल्‍ला इतना तिक्‍त तो नहीं...।

गुरु, देसी भाषा में कहूं तो बिना मतलब इस तरह की चीज़ों को मोहल्‍ले में लाकर क्‍यों बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं। ब्‍लॉगिंग की दुनिया अराजनीतिक लोगों की दुनिया है...उसमें हम जैसे राजनीतिक लोगों को हस्‍तक्षेप के लिए मजबूर करने से आपके मोहल्‍ले की लोकप्रियता तो घटेगी ही, अनावश्‍यक आपके ब्रांडेड होने का खतरा भी पैदा हो जाएगा। मैं फिर आपसे गुज़ारिश करता हूं कि क्‍लास मीडियम और मास मीडियम के फर्क को समझिए...मास के सवाल क्‍लास मीडियम पर उठाएंगे तो कुछ डीक्‍लास लोगों के हस्‍तक्षेप से कुछ लोगों को डीक्‍लास होना पड़ जाएगा। यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्‍बना है...

आपका ही,
अभिषेक श्रीवास्‍तव

3/07/2007

एक प्रयास के लिए एक अपील...

साथियों,

बहुत छोटे में बात रखना चाहूंगा। दरअसल, पिछले काफी वक्‍त से दिल्‍ली में काम कर रहे कुछ पत्रकार, लेखक इस बात को बहुत शिद्दत से महसूसते रहे हैं कि कम से कम दिल्‍ली से चलाए जाने वाले राष्‍ट्रीय मीडिया में अब स्‍पेस न के बराबर रह गई है, खासकर जनपक्षीय और जनदिशा को लागू करने वाली खबरों और लेखों-फीचरों के संदर्भ में।

ऐसे में एक बड़ा सवाल हम सभी के सामने यह था और आज भी कमोबेश उसी रूप में बना हुआ है कि आखिर बड़ी पूंजी के अभाव में एकजुटता के आधार पर ही क्‍या खबरों, लेखों और फीचरों को जनसंचार के माध्‍यमों तक पहुंचाना संभव है। यदि हां, तो क्‍या ऐसे प्रयोग पहले हुए हैं...हां, पता चला कि पचास के दशक में किन्‍हीं विद्वान पत्रकार ने वैकल्पिक मीडिया नाम से कोई आंदोलन शुरू किया था...पता नहीं अखबार या पत्रिका के रूप में या किसी और। आगे इस काम को आनंदस्‍वरूप वर्मा ने बढ़ाया, लेकिन किन्‍हीं कारणों से यह रुक गया। हम सभी इसकी ज़रूरत महसूस करते हैं और भावनात्‍मक तौर पर साथ होते हुए भी अपनी-अपनी दाल-रोटी के चक्‍कर में रहे-रहे भूल जाते हैं।

ऐसे में एक बार फिर करीब कुछ पुराने, कुछ बीच की पीढ़ी के और हम जैसे कुछ नए लोगों ने तय किया है कि ऐसा कोई ढांचा विशुद्ध जनवादी स्‍वरूप में खड़ा किया जाए जो मीडिया को वैकल्पिक सूचनाएं लेखों, फीचरों और संभव हो तो ख़बरों के माध्‍यम से पहुंचा सके। इस कार्य में तकनीक का बड़ा हाथ होगा, चूंकि प्रबंधन की शब्‍दावली में कहें तो कॉस्‍ट कटिंग के लिहाज से यही इकलौता तरीका है। हमारे साथ अपने-अपने दायरों और सीमाओं में लिखने-लड़ने वाले प्रसिद्ध और अनुभवी से लेकर नए उत्‍साही पत्रकारों का सहयोग है और हम चाहते हैं इस कार्य को शुरू करने से पहले एक बार आप सबकी मंशा और समझ को लिया जाए।

एक गुज़ारिश यह है कि आप वैकल्पिक मीडिया के बारे में अपनी सोच और कल्‍पना का एक खाका रखें। दूसरे, चूंकि हम देर नहीं कर सकते, इसलिए यदि इच्‍छुक हों तो अभी से ही अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में हमारे पास लेख/फीचर/स्‍टोरी/रिपोर्ताज/साक्षात्‍कार भेजें जिसे हम जारी कर सकें। कोशिश करें कि शब्‍द सीमा 1000 के भीतर ही रहे और विषय चाहे जो भी हो, एक न्‍यूनतम जनदिशा उसमें प्रतिबिंबित हो। हमारी कोशिश रहेगी कि हम आपको वाजिब मेहनताने के रूप में प्रति लेख मानदेय राशि दे सकें, लेकिन हम यह कब से कर पाएंगे, इस पर हम भी बहुत साफ नहीं हैं चूंकि सारा मामला अख़बारों से आने वाले पारिश्रमिक पर ही टिका है।

हमें उम्‍मीद है कि आप इस कार्य में अपनी सम्‍मति देंगे और अपने सुझावों/रचनाओं से हमारा सहयोग करेंगे। फिलहाल, सुझाव और रचनाएं भेजने के लिए आप निम्‍न ईमेल आईडी का उपयोग कर सकते हैं-

vaikalpik.media@gmail.com

इससे छोटे में बात बनती नहीं, हालांकि बड़ी पोस्‍ट लिखने पर मुझे एक पाठक से गालियां मिल चुकी हैं, लेकिन कुछ चीजें आपद्धर्म होती हैं, इस नाम पर उक्‍त पाठक माफ करेंगे।


संपादक मंडल की ओर से

अभिषेक श्री‍वास्‍तव
सात मार्च 2007

3/05/2007

हर सवाल का जवाब...नहीं मिल सकता...


पिछले कई दिनों से मैं अपने चिट्ठे को अपडेट नहीं कर रहा हूं, कुछ व्‍यस्‍तताओं की वजह से और कुछ दिमागी उलझनों के कारण। खैर, पिछले तीन दिनों के भीतर मुझे दो प्रस्‍ताव आए कुछ सवालों के जवाब देने के लिए। एक अविनाश ने और दूसरे उन्‍मुक्‍त ने मुझे नामित किया।

आइए, पहले झटपट सवालों के जवाब दिए जाएं, फिर कुछ बातें की जाएं। उन्‍मुक्‍त के सवाल और जवाब-


आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
मेरी सबसे प्रिय पुस्‍तक कोई एक नहीं है, कई हैं। कुछ के नाम ले सकता हूं- कुछ विदेशी लेखकों की, जैसे तोलस्‍तोय की अन्‍ना कैरेनिना, तुर्गनेव की पिता और पुत्र, चेकोस्‍लोवाकिया की छोटा राजकुमार, एक जापानी पुस्‍तक तेत्‍सुको कुरोयानोगी की तोत्‍तो चान, एक और पुस्‍तक...नाम नहीं याद है लेखक का...एमेके...आदि। देसी किताबों में मुझे शेखर एक जीवनी से लेकर राग दरबारी, मुक्तिबोध की तमाम कविताएं, धूमिल, पाश, रघुवीर सहाय, जगदीश चंद्र...कितना कुछ है। प्रिय फिल्‍मों में कई हैं...लेकिन दिल के करीब दो फिल्‍में हैं...अमिताभ, राखी और विनोद मेहरा वाली 'बेमिसाल' और महेश भट्ट की 'ज़ख्‍म'।

आपकी सबसे प्रिय पोस्ट कौन सी है?
यह सवाल अजीब है...इसका जवाब असंभव है।

आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
जिसका कोई सामाजिक मूल्‍य हो।

क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
अभी हिंदी चिट्ठाकारी उस अवस्‍था में नहीं है कि यह किसी के व्‍यक्तित्‍व पर भी प्रभाव डाल सके।

यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
मेरे लिए यह सवाल कल्‍पनातीत है, क्‍योंकि मेरा मानना है कि भगवान जैसी कोई चीज़ संभव नहीं।


कुछ सवाल अविनाश के, जो मूल में अभय तिवारी के हैं..

आप आस्तिक हैं या नास्तिक... और क्‍यों?
मेरा मानना है कि भगवान जैसी कोई चीज़ वैज्ञा‍निक तौर पर संभव नहीं, लेकिन जीवन और इंसान के संदर्भ में बात करें तो मैं आस्तिक हूं। मेरी आस्‍था जीवन में है, संघर्षों में है, परिवर्तन में है और उस आखिरी इंसान में है जिसके लिए भगवान होने के कोई मायने नहीं हैं।

सुख की आपकी क्‍या परिभाषा है? क्‍या करने से आप सुखी हो जाते हैं या अगर नहीं हो पा रहे हैं, तो क्‍या हो जाने से आप सुखी हो जाएंगे?
सुख का अर्थ मेरे लिए है कि मैं अपनी शर्त पर जिंदगी जी पा रहा हूं कि नहीं...यानी क्‍या मैंने अपनी आवश्‍यकताओं के मुताबिक स्‍वतंत्रता अर्जित कर ली है। यदि ऐसा हो जाता है तो मैं खुद को सुखी मानने का भ्रम पाल सकता हूं। भ्रम सिर्फ इसलिए कि खुशी की कोई निजी परिभाषा नहीं संभव है, किसी की कीमत पर ही अब्‍सॉल्‍यूट सुखी रहा जा सकता है...यदि ऐसा हो तो।

क्‍या आप अपने बचपन में वापस लौटना चाहेंगे और क्‍यों या क्‍यों नहीं?
मुझे लगता है कि हर उच्‍चतर अवस्‍था पिछली अवस्‍थाओं से बेहतर होती है, फिर चाहे बचपन जैसा भी रहा हो...यह बात व्‍यक्तियों पर भी लागू होती है और सभ्‍यताओं पर भी। इसलिए ऐसी कोई आकांक्षा नहीं है।

बताएं कि औरतों के बारे में आपकी क्‍या राय है? क्‍या वे पुरुषों से अलग होती हैं? अगर हां तो किन मायनों में?
निश्चित ही औरतें पुरुषों से अलग होती हैं...शारीरिक संरचना से लेकर दिमागी संरचना तक। यह कोई बताने वाली बात नहीं। जिस तरह पुरुष एक इंसान है, सामाजिक उत्‍पाद है वैसे ही औरत भी है। मेरी राय किस संदर्भ में चाहिए, सवाल यह होना चाहिए। क्‍योंकि कोई भी इंसानी प्रजाति कोई फिल्‍म या पुस्‍तक नहीं जिसकी समीक्षा की जाए, जिस पर राय दी जाए। मैं अधिक से अधिक किसी स्‍त्री विशेष के बारे में राय दे सकता हूं, यदि मैं उससे परिचित हूं तो...अन्‍यथा अगर स्‍त्री विमर्श करना है तो फिर सवाल स्‍पष्‍ट होने चाहिए। जवाब भी फिर साफ आएंगे।

क्‍या इस देश के भविष्‍य के प्रति आप आस्‍थावान हैं?
देश से आप क्‍या समझते हैं, यदि इस पर एक बार बात हो जाए तो फिर भविष्‍य की बात की जा सकती है। यदि देश का अर्थ आठ फीसदी विकास दर जैसे जनविरोधी आंकड़ों से नहीं बल्कि यहां की 80 फीसदी कामगार मेहनतकश जनता से है, तो बिलकुल भविष्‍य उसका ही है। मेरी आस्‍था उसी में है। यदि कोई और अर्थ हो तो फिर बात आगे संभव है।


तो दोस्‍तों, सवाल-जवाब समाप्‍त हुए, लेकिन एक बात जो मैं आप सबसे पूछना चाह रहा था वो यह कि इन सवालों-जवाबों से क्‍या होगा। यदि हम एक-दूसरे को जानना ही चाहते हैं तो फिर पांच सवाल क्‍या पर्याप्‍त हैं...मुझे नहीं लगता। इसका यदि कोई और प्रच्‍छन्‍न कारण है तो बताया जाना चाहिए। मैंने अविनाश से कल पूछा भी, कि ये सवाल-जवाब का क्‍या चक्‍कर है, क्‍या खेल है। उन्‍होंने बताया कि एक-दूसरे को जानने का तरीका है। अजीब है भाई, ऐसे कहीं किसी को जाना जा सकता है भला...

चाहे जवाब देने वाला कितनी ही ईमानदारी से जवाब दे, फिर भी आप क्‍या जान पाएंगे उसके बारे में, सिवाय इसके कि शब्‍दों की बाजीगरी वह कितनी अच्‍छी करता है। अब क्‍या कहा जाए...जो है सो ठीके है...

चलिए,
नमस्‍कार

2/10/2007

बहाना चाहे कुछ भी हो, बात हो...

दोस्‍तों,

अच्‍छी बात है कि मेरे विवादास्‍पद पोस्‍ट की भाषा के बहाने वैयक्तिक स्‍तर पर ही सही, भाषा को लेकर चिट्ठाकारों के बीच कुछ सनसनी पैदा हुई है। मेरी मंशा, जैसा कि मैंने इससे पहले वाले पोस्‍ट में साफ किया था कि भाषा के जनपदीय चरित्र की उसके शहरी चरित्र से तुलना कर एक सार्थक विमर्श खड़ा करना था। कई चिट्ठाकारों ने भिन्‍न-भिन्‍न टिप्‍पणियां कीं, चाहे वे जैसी भी रही हों लेकिन अफसोस सिर्फ इस बात का है कि इन सबके केन्‍द्र में नारद से संलग्‍नता का सवाल प्रमुख रहा, जबकि भाषा पर बात सामान्‍यीकरण के मानक पर नहीं संभव है।

कुछ उदाहरण दूं। पिछले कुछ दिनों से हम बीस-पच्‍चीस मित्र, दिल्‍ली के रहवासी, इस बात को लेकर उलझे हुए हैं कि किसी भी सांस्‍कृतिक कर्म के केंद्र में क्‍या भाषा होनी चाहिए। इसी से जुड़ा सवाल राष्‍ट्रीयताओं का भी है। क्‍या भाषाएं ही राष्‍ट्रीयताओं को तय करती हैं...क्‍या भाषाई राष्‍ट्र की अवधारणा ही संभव है...कश्‍मीर में आतंकवाद और असम में उल्‍फा का संघर्ष क्‍या भाषा से उपजा राष्‍ट्रीयता का संघर्ष है और यदि है तो क्‍या उसकी व्‍याख्‍या भाषाई प्रस्‍थान बिंदु से जायज है, संभव है...।

इस तरह के तमाम सवाल हैं जो भाषा के बारे में हमारी समझ को रीइनवेन्‍ट कर सकते हैं। एक बार की बात है...मैं मधुकर उपाध्‍याय जी के यहां बैठा हुआ था...भाषा पर बात चली तो उन्‍होंने मुझे तथ्‍यात्‍मक आंकड़े दिखाए कि किस तरीके से हमारी खड़ी हिंदी पिछले दो सौ वर्षों में आंचलिक शब्‍दों और बोलियों को चट कर गई है, जैसे दीमक। लेकिन यह सवाल सिर्फ दीमक जैसे किसी आंतरिक शत्रु का नहीं है, बल्कि हिंदी के उस साम्राज्‍यवादी चरित्र का है जो खुद तो फैलता जाता है और अपने प्रति अंग्रेजी के बरक्‍स जनवाद की मांग के चक्‍कर में दूसरी भाषाओं, बोलियों और जनपदीयता के प्रति घोर असहिष्‍णु और अजनवादी हो जाता है। तीन साल पहले शायद राजकिशोर ने जनसत्‍ता में एक लेख लिखा था कि हमारी आंचलिक भाषा के संदर्भ में हिंदी क्‍यों अपराधी है। जब ऐसी बातें होती हैं तो उन्‍हें इस रूप में रिड्यूस कर देना, कि 'आप अपने घर के बच्‍चों को भी गालियां सिखाएंगे क्‍या' (जैसा कि एक टिप्‍पणी में किसी ने कहा है), दरअसल प्रकारांतर से पॉलिटिकल रिडक्‍शनिज्‍म ही होता है। वरना इतने गंभीर मसले पर चर्चा की शुरुआत करने से पहले ही सभी ब्‍लॉगर एक साथ नारद के बचाव में खड़े हो जाएं और हमारे द्वारा प्रयुक्‍त की जा रही खड़ी भाषा के वर्चस्‍ववादी स्‍वरूप के बारे में एक शब्‍द भी न कहें, यह अफसोसनाक है।

एक सज्‍जन कहते हैं कि यह सिर्फ भाव का ही नहीं, स्‍ट्रैटजी का भी सवाल है। कैसी स्‍ट्रैटजी...पूछा जाए। अंग्रेजी के साम्राज्‍य के विरोध में स्‍ट्रैटजी के स्‍तर पर आप अगर हिंदी का साम्राज्‍य ऑनलाइन फैला भी लेते हैं तो क्‍या उससे उन निम्‍न प्रसंग वाली भाषाओं और बोलियों का भला होने वाला है जहां से हमारी सभी प्रतिभाएं जन्‍म लेती हैं। मेरा मानना है कि इंटरनेट पर हिंदी का उपयोग इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि हम अंग्रेजी के समानांतर एक अन्‍य भाषा को खड़ा कर दें और प्रवासी हिंदी सम्‍मेलन टाइप के नोस्‍टैल्जिक सम्‍मेलनों में उत्‍साहित हो लें, बल्कि इसलिए कि यदि हमारे यहां प्रिंट और दृश्‍य-श्रव्‍य माध्‍यमों में हिंदी का एक विकृत रूप देखने को मिल रहा है तो साइबर स्‍पेस को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में पेश कर सकें जो मूल में सर्वसमावेशी है और डेमोक्रेटिक स्‍पेस का वाहक है।

आप, हम और सभी भलीभांति इस तथ्‍य से परिचित हैं कि अन्‍य माध्‍यमों में भाषा बाज़ार और ब्रांड से तय होती है इसलिए उनकी अपनी सीमाएं हैं। इस बात को समझ लेना होगा कि चूंकि आम तौर पर चिट्ठाकारी में बाज़ार की कोई भूमिका नहीं होती है, न ही अपने ऊपर कोई मुनाफा कमाने का दबाव होता है, इसलिए हम यदि सर्वस्‍वीकार्य भाषा शैली की बात करते हैं तो उसमें हाशिए को शामिल करना ही होगा। इस दृष्टि से नहीं कि हम अश्‍लीलता फैला रहे हैं और आपस में मज़ा ले रहे हैं, बल्कि उसके सामाजिक-राजनैतिक कार्यभारों का उल्‍लेख करते हुए भाषा को राजनैतिक लड़ाई का औज़ार बना रहे हैं।

और इस तथ्‍य को समझने में ज्‍यादा मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक मुक्ति का रास्‍ता भाषा की मुक्ति से होकर जाता है...रूढियों से मुक्ति, पांडित्‍य से मुक्ति, अंग्रेजी नहीं अंग्रेज़ियत से मुक्ति...अब अगर हिंदी का चिट्ठा जगत पहले से ही राजनीतिक मुक्ति को महसूस कर रहा हो तो यह बात अलग है...लेकिन आज भी हिंदी प्रदेश की जनता ग़ुलामी के दुष्‍चक्र से जूझ रही है।

ब्‍लॉग जैसे माध्‍यम की सबसे बेहतर भूमिका यदि कुछ हो सकती है तो यही कि हम सामूहिक रूप से भाषा को औज़ार बना कर उसके खोए रूप को लौटा सकें और इस तरीके से अन्‍य माध्‍यमों पर यह दबाव बना सकें कि वे भी आंचलिकता को लेकर चलें वरना गुज़ारा नहीं।

और हां, आखिरी बात...एक टिप्‍पणीकार शायद किड़िच-पों के अर्थ में उलझ गए हैं...यह एक देसी शब्‍द है जिसका अर्थ है अनावश्‍यक अनुद्देश्‍य किसी को छेड़ना या परेशान करना। भाषा के मूल का संस्‍कार न होने से यही दिक्‍कतें आती हैं...खैर, उम्‍मीद है इस पर बातें होती रहेंगी और व्‍यक्तियों पर कम, विषय पर बात होगी। यह मानते हुए कि हम जनपथ के राही हैं, राजपथ के नहीं। हमें राजभाषा नहीं, जनभाषा चाहिए।

यदि आप इस विषय में कोई सार्थक योगदान दे सकें तो टिप्‍पणियों को प्रकाशित कर उनका एक सार्थक संकलन बनाया जा सकता है...

2/05/2007

चौधरी की भाषाई किड़िच-पों


साथियों,

दो दिन पहले इस ब्‍लॉग पर किन्‍हीं सज्‍जन जितेंद्र चौधरी का कमेंट आया कि आपके ब्‍लॉग को नारद पर से हटाया जा रहा है। दरअसल, वह टिप्‍पणी मेरे एक पोस्‍ट 'का गुरु चकाचक' पर आई थी। अव्‍वल तो यह कि मैंने इस ब्‍लॉग को नारद से जोड़ने का कोई प्रयास भी नहीं किया, अगर खुद ही जोड़ कर खुद ही हटाने का सुख कोई ले रहा है, तो मुझे उसके द्वारा खुद की पीठ खुजलाने में कोई आपत्ति नहीं। लेकिन यह कार्रवाई बड़े सवाल खड़े करती है। यह सफाई नहीं है, मैंने उन सज्‍जन की भावनाओं का ख्‍याल रखते हुए उक्‍त पोस्‍ट को डिलीट कर दिया है, लेकिन सवाल रह जाता है कि आखिर चिट्ठा जगत में भाषा को लेकर ऐसा ब्राह्मणवाद और चौधराहट क्‍या ठीक है...

काशीनाथ सिंह की भाषा के हम सब मुरीद हैं। वह भाषा उस जनपद और जनपथ की भाषा है जहां से हम सभी आए हैं। भाषा का अपना समाजशास्‍त्र होता है और दुबई में रहने वाले व यूरोप का रोज दौरा करने वाले हमारे चिट्ठाजगत के उक्‍त साथी यदि हिंदी को अंग्रेजी के शुद्धतावादी ढांचे में समृद्ध करने का ख्‍वाब रखते हैं, तो यह अफसोसनाक है।

हम इस बात को स्‍पष्‍ट कर देना चाहते हैं कि हमारे ब्‍लॉग की भाषा आम आदमी के रोजमर्रा जीवन की दुश्‍वारियों, खीझ, असंतोष और जीवंतता की भाषा है। यदि आपको कोई आपत्ति हो तो कृपया जितेंद्र चौधरी की तरह व्‍यवहार न करते हुए भाषा पर बात करें। संभव है आपने मैनेजर पांडे की किताबें न पढ़ी हों, तो पढ़ें और समझें कि गालियां इस समाज के उस निम्‍नवर्गीय प्रसंग की तस्‍वीर हैं जहां से हिंदी भी बनती और बिगड़ती है। यह बात दीगर है कि तमाम गालियां अपने मूल में स्‍त्री विरोधी हैं, लेकिन जिस प्रवाह में इस देश की जनता गालियों का इस्‍तेमाल करती है, वहां कोई सुविचारित उद्देश्‍य नहीं होता है। वह उस जनता का खाद पानी है जो तमाम जिल्‍लत की रोटियां खाकर भी ज़िंदा है और अपने दबे विद्रोह को उस भाषा के रूप में अभिव्‍यक्‍त करती है जिससे श्रीयुत जितेंद्र चौधरी को शायद चिढ़ है।

चिढ़ है तो मत पढ़िए जनाब, लेकिन बेमतलब का किड़िच-पों मत करिए...समझ गए न...नहीं समझे तो फोटो देख कर समझ जाएंगे...इसी को कहते हैं किड़िच-पों...

अभिषेक श्रीवास्‍तव

75 वर्ष बनाम डेढ़ घंटे: हिंदी साहित्य उर्फ़ पेज थ्री संवेदना


27 जनवरी 2007 को एक अद्भुत घटना घटी...पता नहीं यह पहले ही हो गया या हमें पता बाद में चला, एक समूचा शहर अपनी तमाम संवेदनाओं, दावों और मानवीयता के साथ मौत की नींद सो गया। जानते तो हम पहले भी थे और अब भी हैं कि दिल्ली की दीवार यूं तो बहुत ठोस होती है और उसे भेद पाने के लिए हरक्यूलिस जैसी ताक़त चाहिए, लेकिन देखा पहली बार...75 वर्ष का जिया एक जीवन पंचतत्व में विलीन हो गया और साथ ही भस्म हो गईं उन लोगों की तमाम संवेदनाएं, मिट गए सबके ओढ़े हुए दुख और छीज गया लेखक होने का झीना परदा...

कमलेश्वर की मौत दरअसल देश की सांस्कृतिक राजधानी और साथ ही राजनीतिक राजधानी के तमाम बौद्धिक नुमाइंदों के बेनकाब हो जाने के लिए एक माध्यम बन गई...जाते-जाते कमलेश्वर यह सबसे ज़रूरी काम कर गए। अंत्येष्टि स्थल लोदी रोड पर जमावड़ा था दिल्ली के तमाम संपादकों, लेखकों और पत्रकारों का... और कहना न होगा कि कौन कितना दुखी था, यह उसके द्वारा टीवी चैनलों को दी जा रही बाइट, चैनलों को दिए जा रहे फोन-इन और पत्रकारों से की जा रही बातचीत में अभिव्यक्त हो रहा था।

एक ओर दूरदर्शन के महानिदेशक और बड़े कवि लीलाधर मंडलोई अपने ही सरकारी चैनल को बाइट देने में लगे हुए थे तो दूसरी ओर चित्रा मुदगल अपने फोन पर कमलेश्वर की जीवनी किसी चैनल को दिए जा रही थीं। नाम बहुत से हैं, किनकी-किनकी बात करें...बात नाम की नहीं है...क्या यह कहने में कोई संकोच हो सकता है कि यह वक्त और जगह बाइट देने की नहीं है...

हमारी दूसरी पंक्ति के लेखक...कुछ युवा और कुछ अधेड़ वहां मौजूद संपादकों और पत्रकारों से जुगाड़ भिड़ा कर इस मौत को शब्दों में ढाल कर सबसे पहले छप जाना चाहते थे...हमारे एक युवा मित्र इस बात को लेकर परेशान थे कि चूंकि अंतिम साक्षात्कार कमलेश्वर का करने का मौका उन्हें ही मिला, इसलिए अब कहां छपने की जुगत लगाई जाए। भागलपुर से आए एक अल्प चर्चित कहानीकार और फोटोग्राफर रंजन श्मशान स्थ‍ल पर साहित्यकारों के बगल में डिफॉल्ट खड़े होकर अपने चेले-चपाटों के द्वारा फोटो खिंचवाने में लगे थे...उनके उत्साह पर रोक लगाने की जब मैंने कोशिश की तो उन्होंने मुझे ही फ्रेम में उतार लेना चाहा...क्या है ये सब। क्या यह मान लिया जाए कि हिंदी प्रदेश की जनता संवेदनहीन हो चुकी है, विवेकहीन हो चुकी है अथवा यह एक शहर की मौत के संकेत हैं...कौन ज़िम्मेदार है।

बात यहीं तक रहती तो भी कम अक्षम्य नहीं है...उसी शाम गांधी शांति प्रतिष्ठान में 4.00 बजे कथाकार शिव कुमार शिव के नए उपन्यास का लोकार्पण और प्रथम सुधा सम्मान समारोह था...सुधा शिव जी की बहू का नाम है जिनका दुखद देहांत पिछले वर्ष हो गया। आधे से ज्यादा जनता डेढ़ घंटे के शोक के बाद वहीं पाई गई...हां, हम भी वहां थे यह कहने में कोई संकोच नहीं...हम गए थे देखने तमाशा कि कैसे उड़ते हैं चीथड़े ग़ालिब के...

राजेंद्र यादव, असग़र वजाहत और कई अन्य मंचस्थ...ठीक 4.30 पर...अभी कमलेश्वर की चिता की आग भी शांत नहीं हुई थी। खचाखच भरा हॉल और अपने-अपने आदमियों को मिलने वाले पुरस्कारों के बेकल इंतज़ार में जुटी साहित्यिक भीड़ जिसे पिछली रात हुई मौत से रंच मात्र लेना-देना नहीं था शायद...मैंने शिवजी से पूछा था वहीं पर कि क्या कार्यक्रम स्थगित नहीं किया जा सकता...उन्होंने 'नहीं' में जवाब दिया...माना जा सकता है कि भागलपुर से दिल्ली आई जनता की तकनीकी दिक्कतात रही होंगी...यादव जी और वजाहत साहब का क्या...क्या अपनी संवेदना को बचाने का साहस उनमें भी नहीं....

एक सज्जन हैं अजय नावरिया...दलित आलोचक...उन्हें अंत्येष्टि स्थल पर सभी को खुलेआम यह निमंत्रण देते पाया गया कि आज उन्हें पुरस्कार मिलने वाला है और सभी अवश्य आएं...क्या यह अश्लीलता से कम कुछ भी है...जी हां, उन्हें आलोचक की श्रेणी में पुरस्कार दिया गया...कहने की ज़रूरत नहीं कि क्यों और कैसे। पुरस्कार किन्हें दिए गए और क्यों...ये नाम देखकर आप खुद समझ जाएंगे...हिंदी में कहानीकार रंजन से बेहतर हैं, आलोचक अमरेंद्र और अजय नावरिया से प्रखर और टीवी पत्रकार वर्तिका नंदा से तेज...लेकिन पुरस्कारों की बगिया में एक ही प्रसून खिलता है...यह बात और आगे जाती है, खैर...

तो याद कीजिए पेज थ्री...मधुर भंडारकर की वह फ़िल्म जिसमें शहर में होने वाली मौतों पर नम होने वाली आंखों पर काले चश्मे दिखाए गए थे...अजीब बात है कि दुनिया को देखने वाला सभी का चश्मा लाल है, दिखाने वाला भी लाल...लेकिन मौत हमेशा काली ही दिखाई देती है...और काले में पारदर्शी आंसुओं को छुपाया दिखाया जा सकता है...

75 वर्ष के ए‍क जीवन को डेढ़ घंटे के शोक में बिसार दिया गया...यह हिंदी का पेज थ्री है...दरअसल, दोनों में अब कोई विभाजक रेखा नहीं रही...

1/28/2007

स्मृतिशेष: कमलेश्वर


कमलेश्वर जी के निधन की ख़बर मुझे तीन घंटे बाद मिली...और आश्चर्य मानिए कि जिस सकते में मैं था उससे ज्यादा अफ़सोस था कि तीन घंटे ग़ुज़र गए राजा निरबंसिया को गए हुए और हमें भनक तक नहीं। मैंने तुरंत उनके घर पर फ़ोन लगाया...फ़ोन उनके नाती ने उठाया यह तो मुझे बाद में पता चला, लेकिन उनका स्वर बुरी ख़बर की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था।

कैसा शहर है यह...। मैंने तमाम लोगों को तुरंत मोबाइल से संदेश भेजा, अख़बारों में फ़ोन किया...किसी को पता नहीं था कि 1963 में जिस नई कहानी की प्रवर्तक तिकड़ी के एक अदद लेखक कैलाश सक्सेना ने 'दिल्ली में एक मौत' नामक कहानी किसी सेठ दीवानचंद की मौत पर लिखी थी, वह 44 साल बाद उस कमलेश्वर पर लागू हो जाएगी।

अब कई बातें कही जाएंगी, उन्हें‍ तरह-तरह से याद किया जाएगा। सिर्फ एक संस्मरण है दो साल पहले का...जो 75 साल की अवस्था‍ में जी रहे, कैंसर से लड़ रहे एक जीवन को व्याख्यायित करने के लिए काफ़ी है। मौर्या शेरेटन होटल के कॉनफ्रेंस हॉल में सीएनएन नाम के एक अख़बार का लोकार्पण था और कमलेश्वर मुख्य अतिथि थे। सारी औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बाद अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने मालिक को सबके सामने नंगा कर के रख दिया। बड़ी शिष्टता और विनम्रता से उन्होंने कहा कि अब तक संपादक का पद अख़बारों में लिखा जाता था और वह प्रच्छन्न ही होता था...बागडोर मालिक के हाथ में होती थी। बेहतर है कि इस अख़बार का मालिक, संपादक, मुद्रक और प्रकाशक एक ही है। कम से कम इससे कोई भ्रम संपादक को लेकर इस अख़बार के संदर्भ में पाठकों को नहीं रहेगा।

ऐसा था कमलेश्वर का साहस, प्रयोग और उनकी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता...जिस अवस्था में हिंदी के नामवर लेखक देश भर में घूम-घूम कर अपना अमृत महोत्सव मनाते हैं उस अवस्था में कमलेश्वर आख़िर तक लेखकीय मूल्यों और पत्रकारीय स्वतंत्रता के लिए लिखते और लड़ते रहे। उनकी ज़बान और आवाज़ हिंदी में तब तक याद की जाती रहेगी जब तक शब्द बचे रहेंगे, उनके अर्थ बचे रहेंगे और बची रहेगी इंसानी आवाज़...आज़ादी और साहस की...

कमलेश्वर को हमारा शत्-शत् नमन...


28.01.2007

1/23/2007

सिलवडिया के फूल...


सिलवडिया के फूल यानी अमलतास के फूल...जो गर्मियों में हमारे यहां अपनी वासन्तिक सुगंधहीन लेकिन पीत छटा बिखेरते हैं। सुगंधहीन इसलिए क्‍योंकि उसकी सुगंध लेने के लिए जाना पडता है उसके पास, और चूंकि उस पर चींटे बहुत होते हैं इसलिए ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता। सिलवडिया की बेलें जहां गुलमोहर के साथ दिखाई देती हैं, वहां एक प्राकृतिक संयोग बनता है, राजनैतिक मायने निकलते हैं और कविता बनती है... इससे पहले बता दूं कि अमलतास को सिलवडिया कहते हैं अपने यहां, यह जानकारी मुझे हमारे चौबेपुर के लालजी यादव ने दी थी। लालजी हमारे यहां भैंस का दूध देते थे... ख़ैर, यह कविता 'संप्रति पथ' में कुमार मुकुल छाप चुके हैं। वहीं से साभार...
दिल्‍ली में भी
सिलवडिया के फूल खिलते हैं...
हमारे यहां जितने ही पीले...
शायद जवान
कुछ कम ख़ूबसूरत...।

हमारे यहां जंगलों में/बाग़ों में हुआ करते थे/हैं
यहां हाईवे के किनारे दीख जाते हैं
कभी-कभार।
हमारे यहां छिटके-से थे,
यहां कतारबद्ध हैं।
उनके बगल में गुलमोहर भी हुआ करते थे, हमारे यहां
यहां, वे एक सिरे से गायब हैं।

गुलमोहर की लालिमा में, सिलवडिया की पीली बेल
अर्थ रखती थी-
संयोग से उनके, जीवित हो उठती थी।
यहां पीली कतारों में वह संयोग कहां...।
गुलमोहर की ही तरह, और भी कई चीजें
हो रही हैं गायब
दिल्‍ली में,
सिलवडिया की तरह ही कई चीज़ें अपना अर्थ, खो रही हैं
दिल्‍ली में।

संयोग नहीं है, तो द्वंद्व भी गायब जान पडता है।
यहां 'होना' उपस्थिति मात्र है,
'न होना' एकल प्रलाप।

संभव है
कल कहीं मुझे गुलमोहर भी दीख जाए
सिलवडिया की बेलों के बीच।
लेकिन तब तक...
बहुत देर हो चुकी होगी,
एकल प्रलाप का अभिशाप हमारी आदत बन चुका होगा,
चीज़ों का होना/न होना हमें नहीं अखरेगा
सौंदर्यबोध शायद शेष रह जाएगा-
स्‍थूल आकृतियों में।

उपस्थिति की आडी-तिरछी

ज्‍यामितीय रेखाओं के बीच,

संरचनाओं के बहुआयामी देश-काल में,

सम्‍बन्‍धों के सेतु तलाशते,
शायद...

हम,
बचे रह सकें...।

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