9/29/2007

क्‍या बुद्धिजीवी इतने नादान होते हैं...


अभी पिछले ही दिनों 21 से 24 सितम्‍बर के बीच दिल्‍ली में एक महत्‍वपूर्ण आयोजन हुआ जिसे हम मीडिया की भाषा में 'अंडर रिपोर्टेड' की संज्ञा दे सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में विश्‍व बैंक पर गठित एक स्‍वतंत्र जन न्‍यायाधिकरण की बैठक। मोटे तौर पर देखें तो यह कुछ बड़ी पूंजी वाले गैर-सरकारी संगठनों का एक जमावड़ा था जहां तथ्‍य और सामग्री के स्‍तर पर विश्‍व बैंक के खिलाफ बहुत कुछ पाने और सीखने को था। इस बैठक के पहले ही हमें कुछ ऐसी जानकारियां हाथ लगी थीं जिनके बारे में लिखने को मन कुलबुला रहा था और बैठक की समाप्ति तक यह तय हो चुका था कि कुछ चीज़ों को एक्‍सपोज़ किया जाए। फिर मेरे एक मित्र और वरिष्‍ठ पत्रकार गोपाल कृष्‍ण ने सलाह दी कि हर चीज़ पर लिखने से बेहतर होता है कभी-कभी मौन धारण करना। उनका कहना था कि फालतू तूल देने से क्‍या फायदा।

पांच छह दिन बाद मुझे लगता है कि तूल नहीं दिया तो बेहतर ही है, मामला सब्‍जेक्टिव हो सकता था। लेकिन बताने की खुजली मन में अब भी बाकी है। इस बार इस बैठक का मुख्‍य आयोजक ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नामक संस्‍था थी। हम में से कई पत्रकार साथी इस संस्‍था से वाकिफ होंगे। जानकारी के लिए बता दूं कि यही संस्‍था काम्‍बैट लॉ नामक पत्रिका प्रकाशित करती है जिसमें हमारे वरिष्‍ठ साथी रंजीत वर्मा कभी हुआ करते थे। दरअसल बात शुरू हुई इस आयोजन के लिए मीडिया डेस्‍क बनाने से। कॉम्‍बैट लॉ का काम देख रहे यूएनआई के पूर्व पत्रकार सुरेश नौटियाल के हाथ में जि़म्‍मेदारी दी गई। उन्‍होंने अपने एक मित्र को 25000 रुपये में मीडिया और जनसंपर्क का ठेका दिलवा दिया। बाद में इस व्‍यक्ति के बारे में कुछ बातें पता चलीं जिससे यह उद्घाटित हुआ कि एनजीओ में भी किस तरीके से एक-दूसरे को विचारधारा और प्रतिबद्धता को दरकिनार कर फायदा पहुंचाने की परंपरा विराजमान हो चुकी है।

एक पत्रिका आई है अंग्रेज़ी में ग्रीन ग्‍लोबल वॉयस। उसके संपादक यही सज्‍जन हैं जिनकानाम शेली विश्‍वजीत है। मैं नहीं जानता, लेकिन पत्रिका देखने पर पता चला कि सुरेश नौटियाल का नाम इसमें कन्‍ट्रीब्‍यूटिंग एडिटर की जगह लिखा है। दोस्‍ती की पुष्टि हुई। लेकिन असल बात तो बाकी है। भूमंडलीकरण, साम्‍प्रदायिकता आदि मसलों का विरोध करने वाले इस एक्टिविस्‍ट एनजीओ ने एक ऐसे आदमी को चुन लिया जो टाटा का गज़ब का मुरीद है। उपर्युक्‍त पत्रिका में टाटाज़ शो दी वे नामक एक लेख लिखा मिला। उनकी वेबसाइट पर गया तो टाटा की दो बड़ी तस्‍वीरें मुखपृष्‍ठ पर दिखीं। खैर, कुछ रैडिकल किस्‍म के लोगों के विरोध के बाद यह ठेका रद्द कर दिया गया।

लेकिन असली मसाला आखिरी दिन आया। इस बैठक के लिए एक ज्‍यूरी का गठन किया गया था जिसमें 16 सदस्‍य थे। वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जी और महाश्‍वेता देवी का भी नाम था। ये दोनों झांकने भी नहीं आए। पता चला कि महाश्‍वेता जी की तबीयत नासाज़ है। प्रभाष जी शायद 20-20 विश्‍व कप में व्‍यस्‍त रहे हों, लेकिन सवाल उठाने वाले भी खुराफाती होते हैं। लोगों ने कहा कि जाना ही था तो 'राष्‍ट्रकवि' दिनकर के भाजपा प्रायोजित कार्यक्रम में मुरली मनोहर जोशी के साथ मंच पर बैठने से बेहतर था कि उसी दिन वे अरुणा रॉय और अरुंधति रॉय के साथ ज्‍यूरी में बैठ जाते।

खैर, कुल 16 में से 7 ज्‍यूरी सदस्‍य आखिरी दिन हाजि़र रहे। अरुंधति ने खुल कर कहा कि उन्‍हें नहीं पता, विश्‍व बैंक की साम्राज्‍यवादी नीतियों का विकल्‍प क्‍या है। उनके पास जवाब नहीं हैं। लेकिन शब्‍दों के बीच में पढ़ने वालों ने समझ लिया कि उनकी मंशा क्‍या है जब वे कह बैठीं कि 'हम देख चुके हैं किस तरह अहिंसक आंदोलन नर्मदा के मामले में विफल हो चुका है'। काफी तेज समझदार लोगों ने उनके इस बयान को तहलका में हाल ही में छपे उनके एक साक्षात्‍कार से जोड़ डाला। अरुणा रॉय हास्‍यास्‍पद हो गईं जब उन्‍होंने कहा कि हमें और यात्राएं करनी होंगी। हां, उन्‍हीं की बिरादरी के संदीप पांडे शायद कोई यात्रा फिर से करने जा रहे हैं। अन्‍य चार सदस्‍यों ने भी कहा कि वे बहुत स्‍पष्‍ट नहीं हैं कि विश्‍व बैंक का जवाब कैसे दिया जाए। अब तक जो भी था, ठीक ही था लेकिन थाईलैंड से आए एक सज्‍जन ने कह डाला 'हमें विश्‍व बैंक का विरोध करने की बजाय उसे समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि वह कैसे और उदार बने।' पूरे कार्यक्रम पर इस बयान ने ऐसी लीपा पोती कि आयोजकों का चेहरा सुर्ख हो आया।

अगले दिन बड़ी मुश्किल से अपनी इज्‍जत बचाने के लिए आयोजकों ने ज्‍यूरी की ओर से एक संयुक्‍त बयान जारी करवाया। कार्यक्रम अब समाप्‍त हो चुका है। 25 लाख खर्च होने के बावजूद कहा जा रहा है कि ढाई लाख की कमी पड़ गई। लगे हाथ बता दें कि अरुंधति के जिंदाबाद ट्रस्‍ट ने कार्यक्रम के लिए शायद डेढ़ लाख दिए थे। चार दिनों तक विश्‍व बैंक को मथने के बाद क्‍या निकला, यह सवाल अहम है। लेकिन इसका जवाब न तो उपस्थित और न ही अनुपस्थित ज्‍यूरी के पास है।

शायद इन सभी विद्वानों ने वेनेजुएला का एक मॉडल पढ़ा होगा जहां शावेज की पहल पर बैंक ऑफ साउथ नाम परिघटना की शुरुआत कर दी गई है। अधिकतर लातिन अमेरिकी देशों ने विश्‍व बैंक का कर्ज चुका दिया है और खुद को आईएमएफ से अलग कर लिया है। वे अब एक क्षेत्रीय बैंक बनाने का सोच रहे हैं। हमने पूछा भी, कि क्‍या ऐसे किसी क्षेत्रीय बैंक की अवधारणा पर सवाल किया गया...कोई बात आई। आश्‍चर्यजनक रूप से...नहीं। सवाल आर्थिक विकल्‍प का था...और सारी बात राजनीतिक विकल्‍प यानी सत्‍ता के विकल्‍प के पास आकर समाप्‍त हो गई। किसी ने भी इस ओर सवाल नहीं उठाया।

इस देश के बुद्धिजीवियों का यही दुर्भाग्‍य है। हमेशा राजनीति सोचते हैं...देश भर से आए 600 लोग उन्‍हीं काग़ज़ के पुलिंदों को लेकर लौटे जो हमें भी मिले थे...जिनमें सिर्फ 10,000 के वेतन पर रखे गए एक रिसर्चर द्वारा कट, कॉपी और पेस्‍ट की कला दिखाई दे रही थी। बातें अंग्रेज़ी में हुईं...जो हिंदी में बोलना चाहे उन्‍हें कान नहीं दिया गया।

और मीडिया इस परिघटना से पूरी तरह बेखबर 20-20 से खेल रहा था। उसे इस देश पर आर्थिक साम्राज्‍यवादी हमले से कोई सरोकार नहीं। लेकिन लाख टके का सवाल ये कि जिन्‍हें सरोकार है या दिखाई देता है वे ऐसे सम्‍मेलनों में आकर अपनी ऊर्जा क्‍यों नष्‍ट कर रहे हैं।

आयोजन समिति के ही एक सदस्‍य के शब्‍दों को लें तो यह बैठक 'दरअसल एक मिनी इंडियन सोशल फोरम' थी। जहां, लोग यह समझने की लगातार कोशिश करते रहे कि आखिर विश्‍व बैंक हमारा दुश्‍मन क्‍यों है। क्‍या बुद्धिजीवी इतने नादान होते हैं...

4 टिप्‍पणियां:

व्यालोक ने कहा…

Dear friend Abhishek,
read your article and was a bit surprised. You may ask why? because I thought and recognize you as a wise and brainy person and so I Don't expect an article like this from you.
Perturbed and confused by my this staring para. NO need to be. what I just wanted to say that after seeing the 'fancy' world of medis and all those rubbish NGOwahlas, do you still pose such a question??
Remember our days at JNU, to whom were we used to call' budhijivis'....ha ha ha....so that is the case anyway and what to talk of NGo's...They are just there for having'brainstorming', 'Bullet point presentations" and to talk abou 'transparency','accountability' and 'dpwmtrpdden'. That is it and they will just talk about this and nothing else. These ppl. will be having conference against coke and pepsi and the misuse of jground water by them but will still have bisleri and aquafina on their tablw.
They will talk about the exploitation of MNC's, and in the same breath have the lunch from Mcdonalds. Let me tell you something...last week I was working with one international NGo...there was one 'mohtarma'. We were at IIT and at the lunch time I had the duty to furnish the need...so I saw a Thelawala who was serving burgers and started counting the heads...when the burger arrive the same 'MOhtarma' said" OHo, I thought that it is coming from Mc'donalds.(with that typical girlish latkka jhatka)."??????????????????
Som mere dost, need not to worry. They will be doing their job and We will do our's.
Vyalok
-09350288101

Mornig ने कहा…

waise to mai vyalok mahashai ki tippani se poori tarah sahmat huin without any if and but....lekin phir bhichup nahi raha jata....1

Intellectuals! bade samajhdaar hote hain....nadaan nahi...! isiliye abhishekji wo aapke nahi satta ke paksh mein hote hain aur aise dabe dhanke ki aap pakad bhi na saken.

phir bhi aap lagaatar unhi baatoin ka rona kyon rote hain....!
sanskrit mein kaha gaya hai....kaha to bahut achchhe arth aur uddeshya se gaya hai..yahan prayog shayad theek na ho per phir bhi...

Intellectual= kak cheshta vako dhyanam shwan nidra tathaiv cha....!

Iske aage nahi kyonki wo achchhi baat hai aur intellectuals per lagoo nahi hoti.

Is purani bewafa duniya ka rona kab talak!

band kijiye ye artnaad!

Mornig ने कहा…

waise to mai vyalok mahashai mki tippani se shatpratishat sahmat hun ...bina kisi if but ke...
lekin phir bhi...
abhishek ji Intellectuals nadaan nahi hote bahut samajhdaar hote hain...tabh wo aapki taraf nahi satta ki taraf dikhai padte hain...
aur wo bhi kuch aise ki aap jaise sao bhi pahchan na payen..!

sanskrit mein kaha gaya hai(halanki ye kisi achchhe arth aur uddeshya se kaha gaya hai..kintu phir bhi..)

Kak cheshta vako dhyanam shwan nidra tathaiv cha....!

iske aage nahi bolenge....wo to in intellectuals per nahi lagoo hoti....!

aap kyon khwamkhakh apani energy inke saath khapate hain...!

Is purani bewafa duniya ka rona kab talak..!
Band karo ye artnad!

हर्षवर्धन ने कहा…

बुद्धिजीवियों की ये बातें कुछ समझ में नहीं आईं कि आखिर कवि कहना क्या चाह रहा है।

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