यह जगह उन तमाम लोगों के लिए है जिनके लिए कोई जगह नहीं...

7.3.07

एक प्रयास के लिए एक अपील...

साथियों,

बहुत छोटे में बात रखना चाहूंगा। दरअसल, पिछले काफी वक्‍त से दिल्‍ली में काम कर रहे कुछ पत्रकार, लेखक इस बात को बहुत शिद्दत से महसूसते रहे हैं कि कम से कम दिल्‍ली से चलाए जाने वाले राष्‍ट्रीय मीडिया में अब स्‍पेस न के बराबर रह गई है, खासकर जनपक्षीय और जनदिशा को लागू करने वाली खबरों और लेखों-फीचरों के संदर्भ में।

ऐसे में एक बड़ा सवाल हम सभी के सामने यह था और आज भी कमोबेश उसी रूप में बना हुआ है कि आखिर बड़ी पूंजी के अभाव में एकजुटता के आधार पर ही क्‍या खबरों, लेखों और फीचरों को जनसंचार के माध्‍यमों तक पहुंचाना संभव है। यदि हां, तो क्‍या ऐसे प्रयोग पहले हुए हैं...हां, पता चला कि पचास के दशक में किन्‍हीं विद्वान पत्रकार ने वैकल्पिक मीडिया नाम से कोई आंदोलन शुरू किया था...पता नहीं अखबार या पत्रिका के रूप में या किसी और। आगे इस काम को आनंदस्‍वरूप वर्मा ने बढ़ाया, लेकिन किन्‍हीं कारणों से यह रुक गया। हम सभी इसकी ज़रूरत महसूस करते हैं और भावनात्‍मक तौर पर साथ होते हुए भी अपनी-अपनी दाल-रोटी के चक्‍कर में रहे-रहे भूल जाते हैं।

ऐसे में एक बार फिर करीब कुछ पुराने, कुछ बीच की पीढ़ी के और हम जैसे कुछ नए लोगों ने तय किया है कि ऐसा कोई ढांचा विशुद्ध जनवादी स्‍वरूप में खड़ा किया जाए जो मीडिया को वैकल्पिक सूचनाएं लेखों, फीचरों और संभव हो तो ख़बरों के माध्‍यम से पहुंचा सके। इस कार्य में तकनीक का बड़ा हाथ होगा, चूंकि प्रबंधन की शब्‍दावली में कहें तो कॉस्‍ट कटिंग के लिहाज से यही इकलौता तरीका है। हमारे साथ अपने-अपने दायरों और सीमाओं में लिखने-लड़ने वाले प्रसिद्ध और अनुभवी से लेकर नए उत्‍साही पत्रकारों का सहयोग है और हम चाहते हैं इस कार्य को शुरू करने से पहले एक बार आप सबकी मंशा और समझ को लिया जाए।

एक गुज़ारिश यह है कि आप वैकल्पिक मीडिया के बारे में अपनी सोच और कल्‍पना का एक खाका रखें। दूसरे, चूंकि हम देर नहीं कर सकते, इसलिए यदि इच्‍छुक हों तो अभी से ही अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में हमारे पास लेख/फीचर/स्‍टोरी/रिपोर्ताज/साक्षात्‍कार भेजें जिसे हम जारी कर सकें। कोशिश करें कि शब्‍द सीमा 1000 के भीतर ही रहे और विषय चाहे जो भी हो, एक न्‍यूनतम जनदिशा उसमें प्रतिबिंबित हो। हमारी कोशिश रहेगी कि हम आपको वाजिब मेहनताने के रूप में प्रति लेख मानदेय राशि दे सकें, लेकिन हम यह कब से कर पाएंगे, इस पर हम भी बहुत साफ नहीं हैं चूंकि सारा मामला अख़बारों से आने वाले पारिश्रमिक पर ही टिका है।

हमें उम्‍मीद है कि आप इस कार्य में अपनी सम्‍मति देंगे और अपने सुझावों/रचनाओं से हमारा सहयोग करेंगे। फिलहाल, सुझाव और रचनाएं भेजने के लिए आप निम्‍न ईमेल आईडी का उपयोग कर सकते हैं-

vaikalpik.media@gmail.com

इससे छोटे में बात बनती नहीं, हालांकि बड़ी पोस्‍ट लिखने पर मुझे एक पाठक से गालियां मिल चुकी हैं, लेकिन कुछ चीजें आपद्धर्म होती हैं, इस नाम पर उक्‍त पाठक माफ करेंगे।


संपादक मंडल की ओर से

अभिषेक श्री‍वास्‍तव
सात मार्च 2007

4.3.07

हर सवाल का जवाब...नहीं मिल सकता...


पिछले कई दिनों से मैं अपने चिट्ठे को अपडेट नहीं कर रहा हूं, कुछ व्‍यस्‍तताओं की वजह से और कुछ दिमागी उलझनों के कारण। खैर, पिछले तीन दिनों के भीतर मुझे दो प्रस्‍ताव आए कुछ सवालों के जवाब देने के लिए। एक अविनाश ने और दूसरे उन्‍मुक्‍त ने मुझे नामित किया।

आइए, पहले झटपट सवालों के जवाब दिए जाएं, फिर कुछ बातें की जाएं। उन्‍मुक्‍त के सवाल और जवाब-


आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
मेरी सबसे प्रिय पुस्‍तक कोई एक नहीं है, कई हैं। कुछ के नाम ले सकता हूं- कुछ विदेशी लेखकों की, जैसे तोलस्‍तोय की अन्‍ना कैरेनिना, तुर्गनेव की पिता और पुत्र, चेकोस्‍लोवाकिया की छोटा राजकुमार, एक जापानी पुस्‍तक तेत्‍सुको कुरोयानोगी की तोत्‍तो चान, एक और पुस्‍तक...नाम नहीं याद है लेखक का...एमेके...आदि। देसी किताबों में मुझे शेखर एक जीवनी से लेकर राग दरबारी, मुक्तिबोध की तमाम कविताएं, धूमिल, पाश, रघुवीर सहाय, जगदीश चंद्र...कितना कुछ है। प्रिय फिल्‍मों में कई हैं...लेकिन दिल के करीब दो फिल्‍में हैं...अमिताभ, राखी और विनोद मेहरा वाली 'बेमिसाल' और महेश भट्ट की 'ज़ख्‍म'।

आपकी सबसे प्रिय पोस्ट कौन सी है?
यह सवाल अजीब है...इसका जवाब असंभव है।

आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
जिसका कोई सामाजिक मूल्‍य हो।

क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
अभी हिंदी चिट्ठाकारी उस अवस्‍था में नहीं है कि यह किसी के व्‍यक्तित्‍व पर भी प्रभाव डाल सके।

यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
मेरे लिए यह सवाल कल्‍पनातीत है, क्‍योंकि मेरा मानना है कि भगवान जैसी कोई चीज़ संभव नहीं।


कुछ सवाल अविनाश के, जो मूल में अभय तिवारी के हैं..

आप आस्तिक हैं या नास्तिक... और क्‍यों?
मेरा मानना है कि भगवान जैसी कोई चीज़ वैज्ञा‍निक तौर पर संभव नहीं, लेकिन जीवन और इंसान के संदर्भ में बात करें तो मैं आस्तिक हूं। मेरी आस्‍था जीवन में है, संघर्षों में है, परिवर्तन में है और उस आखिरी इंसान में है जिसके लिए भगवान होने के कोई मायने नहीं हैं।

सुख की आपकी क्‍या परिभाषा है? क्‍या करने से आप सुखी हो जाते हैं या अगर नहीं हो पा रहे हैं, तो क्‍या हो जाने से आप सुखी हो जाएंगे?
सुख का अर्थ मेरे लिए है कि मैं अपनी शर्त पर जिंदगी जी पा रहा हूं कि नहीं...यानी क्‍या मैंने अपनी आवश्‍यकताओं के मुताबिक स्‍वतंत्रता अर्जित कर ली है। यदि ऐसा हो जाता है तो मैं खुद को सुखी मानने का भ्रम पाल सकता हूं। भ्रम सिर्फ इसलिए कि खुशी की कोई निजी परिभाषा नहीं संभव है, किसी की कीमत पर ही अब्‍सॉल्‍यूट सुखी रहा जा सकता है...यदि ऐसा हो तो।

क्‍या आप अपने बचपन में वापस लौटना चाहेंगे और क्‍यों या क्‍यों नहीं?
मुझे लगता है कि हर उच्‍चतर अवस्‍था पिछली अवस्‍थाओं से बेहतर होती है, फिर चाहे बचपन जैसा भी रहा हो...यह बात व्‍यक्तियों पर भी लागू होती है और सभ्‍यताओं पर भी। इसलिए ऐसी कोई आकांक्षा नहीं है।

बताएं कि औरतों के बारे में आपकी क्‍या राय है? क्‍या वे पुरुषों से अलग होती हैं? अगर हां तो किन मायनों में?
निश्चित ही औरतें पुरुषों से अलग होती हैं...शारीरिक संरचना से लेकर दिमागी संरचना तक। यह कोई बताने वाली बात नहीं। जिस तरह पुरुष एक इंसान है, सामाजिक उत्‍पाद है वैसे ही औरत भी है। मेरी राय किस संदर्भ में चाहिए, सवाल यह होना चाहिए। क्‍योंकि कोई भी इंसानी प्रजाति कोई फिल्‍म या पुस्‍तक नहीं जिसकी समीक्षा की जाए, जिस पर राय दी जाए। मैं अधिक से अधिक किसी स्‍त्री विशेष के बारे में राय दे सकता हूं, यदि मैं उससे परिचित हूं तो...अन्‍यथा अगर स्‍त्री विमर्श करना है तो फिर सवाल स्‍पष्‍ट होने चाहिए। जवाब भी फिर साफ आएंगे।

क्‍या इस देश के भविष्‍य के प्रति आप आस्‍थावान हैं?
देश से आप क्‍या समझते हैं, यदि इस पर एक बार बात हो जाए तो फिर भविष्‍य की बात की जा सकती है। यदि देश का अर्थ आठ फीसदी विकास दर जैसे जनविरोधी आंकड़ों से नहीं बल्कि यहां की 80 फीसदी कामगार मेहनतकश जनता से है, तो बिलकुल भविष्‍य उसका ही है। मेरी आस्‍था उसी में है। यदि कोई और अर्थ हो तो फिर बात आगे संभव है।


तो दोस्‍तों, सवाल-जवाब समाप्‍त हुए, लेकिन एक बात जो मैं आप सबसे पूछना चाह रहा था वो यह कि इन सवालों-जवाबों से क्‍या होगा। यदि हम एक-दूसरे को जानना ही चाहते हैं तो फिर पांच सवाल क्‍या पर्याप्‍त हैं...मुझे नहीं लगता। इसका यदि कोई और प्रच्‍छन्‍न कारण है तो बताया जाना चाहिए। मैंने अविनाश से कल पूछा भी, कि ये सवाल-जवाब का क्‍या चक्‍कर है, क्‍या खेल है। उन्‍होंने बताया कि एक-दूसरे को जानने का तरीका है। अजीब है भाई, ऐसे कहीं किसी को जाना जा सकता है भला...

चाहे जवाब देने वाला कितनी ही ईमानदारी से जवाब दे, फिर भी आप क्‍या जान पाएंगे उसके बारे में, सिवाय इसके कि शब्‍दों की बाजीगरी वह कितनी अच्‍छी करता है। अब क्‍या कहा जाए...जो है सो ठीके है...

चलिए,
नमस्‍कार