अविनाश ने मोहल्ले में मेरे सुबह के पत्र को जगह दे ही दी, कम से कम टिप्पणी में ही सही। उसका जवाब भी दिया है...जवाब क्या सवाल है बाकायदा। अब इतनी लंबी चिट्ठियों के बाद भी भाई अविनाश को मेरी असहमति के ठोस बिंदु समझ में नहीं आएं तो यह लाजवाब करने वाली बात है। भइया, तखल्लुस तो बनारसी सांड मैंने रखा है, लेकिन लगता है हकीकत कुछ और ही है...बलिहारी जाऊं मौन से निकले ऐसे सवाल पर...
कहते हैं अविनाश...
एक ठे भटकल बनारसी सांड को अब मैं क्या जवाब दूं। असहमति के ठोस बिंदु उनके क्या हैं, यही मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसलिए जब ये साफ साफ कहेंगे बनारसी सांड, तभी कोई ठीक ठीक जवाब भी दिया जा सकेगा।
यह जगह उन तमाम लोगों के लिए है जिनके लिए कोई जगह नहीं...
15.3.07
सबसे अच्छा होता है मौन से निकला सवाल...
14.3.07
अविनाश भाई,
आपका अविकल पत्र आखिर मीडियायुग पर एक टिप्पणी के रूप में आया...यह बात समझ में नहीं आई कि आपने जनपथ पर टिप्पणी क्यों नहीं की, जबकि दोनों ही चिट्ठों पर कमोबेश एक ही वक्त मैंने अपना पत्र प्रकाशित किया था। खैर, आपको आपत्ति है कि मैंने मित्रता के तकाज़े से आपको सूचना क्यों नहीं दी कि मैंने कोई टिप्पणी भेजी है...भाई ऐसा भी कहीं होता है कि टिप्पणी करने के बाद आप बताएं कि भइया देख लीजिए, मैंने आपकी आलोचना की है...ठीक लगे तो छाप दें...ये तो आप ही की लीक रही है कि लोगों को फोन कर कहते फिरें कि यार मेरे ब्लॉग पर एक कमेंट करिए ना। प्रायोजित टिप्पणियों से मोहल्ला चलाने का काम आपका हो सकता है...जरूरी नहीं कि हर भाव और शब्द प्रायोजित ही हो...कोई टीआरपी थोड़े ही बढ़ानी है मुझे।
दूसरे, पंकज पराशर के ब्लॉग से विषवमन करने का ख्याल न मेरा था न मैं ऐसा करता...बात सिर्फ ये है कि पंकज ने अपनी स्वेच्छा से अपने ब्लॉग पर भूमिका लिख कर पत्र छाप दिया...ये ज़रूर है कि इस पत्र का जिक्र मैंने उनसे किया था, उन्हें भेजा था...लेकिन ऐसी भी क्या बात कि हम आपके खिलाफ साजिश करने लगे...साजिश वही करता है जिसके वेस्टेड इन्टरेस्ट होते हैं...चूंकि मेरा और पंकज का पक्ष एक था इसलिए आपको यह गलतफहमी होना जायज़ है।
तीसरी बात, आपने कहा है कि मैंने अपनी आत्मप्रशंसा की है पत्र में...यदि वह आत्मप्रशंसा ही है तो आपने मेरी निंदा का बिंदु वहां से अपने आप कैसे निकाल लिया कि मुझे इसी विषवमन की वजह से नौकरियों से निकाला गया होगा...। गुरु, कोई भी वैचारिक सहमति-असहमति की बहस व्यक्तिगत नैतिकता और अनैतिकता के आख्यान के बगैर अधूरी होती है...यह उसी तरह होता है जैसे लग्घी से पानी पिलाना...आखिर इंसान अपने ही अनुभवों के प्रति प्रामाणिक हो सकता है, भले ही वह दुनिया भर से सीखे...और अपने कड़वे अनुभव लिखना यदि आत्मप्रशंसा है तो फिर शायद आप आज तक लिखा दुनिया का आधे से ज्यादा साहित्य खारिज कर रहे होंगे...
जहां तक मोहल्ले की ओर टहल का सवाल है, आपकी गुजारिश को मानना न मानना मेरे ऊपर निर्भर है...लेकिन आपने एक बात गलत पकड़ ली कि मैंने हरिवंश जी के योगदानों पर कोई सवाल पत्र में नहीं उठाया था...भाषा और तथ्यगत रिपोर्टिंग की बात करना प्रकारांतर से एक सार्वजनिक नैतिकता से जुड़े मामले को पॉलिटिकली रिड्यूस कर देना ही है...मुझे पत्रकार होने का कोई भ्रम और गुमान नहीं है, न ही अपनी राजनीतिक और सामाजिक समझ पर कोई दावा है क्योंकि मैं अब भी इस बात को महसूस करता हूं कि सत्ता और पुलिस के लिए एक फ्रीलांसर और एक संपादक में कोई फर्क नहीं होता...लाल बत्ती पर आई कार्ड दिखाकर गाड़ी कुदाने के जुर्माने से बच जाना तय नहीं करता कि आप पत्रकार हैं।
आपको मैंने न वर्ग-शत्रु माना है और न ही कुछ और (जैसा कि आपने खुद ही अंदाज लगा लिया...भाजपाई इत्यादि)। आप दोस्तों के दोस्त बनने के काबिल आदमी हैं...जीवंत हैं...अब भी उत्साही हैं...इतना कुछ तो है। उसके बावजूद मुझे लगता है कि हमें इस बात पर सहमत हो जाना चाहिए कि हम कुछ मामलों में घोर असहमत हैं। सिंगुर हो आने जैसी बचकानी बातें छोड़ दीजिए क्योंकि ये मैं भी जानता हूं कि आज जंतर-मंतर पर नंदीग्राम में किसानों की हत्या पर होने वाले प्रदर्शन में आप वैसे ही अनुपस्थित रहेंगे जैसे अन्य में रहते आए हैं...यह सब कुछ समय और पैसे की उपलब्धता का सवाल होता है न कि प्रतिबद्धता का...
हां, अंतिम बात। मैंने कतई आपके चैनल के मित्रों की समझ पर कोई उंगली नहीं उठाई है...सिर्फ अगम्भीरता की बात कही है क्योंकि यह माध्यम की मजबूरी से जुड़ा है। मैं रवीश कुमार के बोलने के अंदाज को पसंद करता हूं...जोशी को खुद मैंने कितनी बार नेपाल की रैलियां कवर करने के लिए फोन किया है और वो आए हैं, इसके लिए मैं शुक्रगुज़ार हूं...पंकज पचौरी ने एक बार भारतीय जनसंचार संस्थान में मेरी क्लास ली है...आप कहां की बात लेकर बैठ गए महाराज...
बेशक आप अपने तईं फैशनेबल बैठकों में न आएं, लेकिन कम से कम उन तमाम संघर्षों को प्रकारांतर से गाली न दें जो देश के सुदूर हिस्सों में चल रहे हैं क्योंकि दिल्ली में जो कुछ भी होता है वह वर्ग समाज की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं...फर्क सिर्फ वेस्टेड इन्टरेस्ट से ही आ जाता है...उसका मखौल नहीं उड़ाया जा सकता...
आपका ही
अभिषेक श्रीवास्तव
(अविनाश द्वारा मीडियायुग पर की गई टिप्पणी नीचे दी जा रही है)
अविनाश का पत्र...
यार अभिषेक, मैंने इसलिए आपके और पंकज के लिंक मोहल्ले से हटाये, क्योंकि आपने मित्रता के तकाजे के तहत मुझे इतना भी नहीं बताया कि आपको एक कमेंट भेजा है। जबकि मैं कंप्यूटर से कोसों दूर था। मेरे पब्लिश करने से पहले ही उसे पंकज के ब्लॉग पर चढ़ा दिया। सब कुछ लगभग साज़िश की तरह किया। और ऐसी बात भी नहीं कि मैंने अपने स्टैंड से इतर कोई भाजपाइयों से जा मिला हूं, या बाज़ार की पत्रकारिता का रातोरात झंडाबरदार हो गया हूं। आपके ही एक तीखे पत्र को मैंने मोहल्ले में जगह दी, तो इस पत्र में तो ऐसी कोई बात भी नहीं। तथ्यहीन और नासमझी में लिखे आपके पत्र को छाप कर मोहल्ले में मुझे खुशी ही होती कि आपको लोग ढंग से देख-समझ पाते। सही-सही वर्गशत्रु खोजने में अक्षम आप जैसे खाली दिमाग बुद्धिजीवी ने मुझे ही उस रूप में देखना शुरू कर दिया है, तो दोस्तों के मोहल्ले में आपके लिए जगह क्यूं। बेहतर हो, आप अपने अनाम जनपथ से हमारी ओर टहल करना भी बंद कर दें। बाकी सवाल-जवाब तो होते ही रहेंगे। दिल्ली में रह कर देश की बात करने वालों हाल हम संसद में भी देखते हैं, मीडिया में भी और फैशनेबल मीटिंगों में भी। इसलिए चिंता नहीं, इस पर हमारी आपकी बात होती रहेगी। बहरहाल पंकज के ब्लॉग छपी आपकी इसी अविकल चिट्ठी के जवाब में मेरा कमेंट भी यहां अविकल प्रस्तुत है:मैं अपने परम प्रिय पारिवारिक और कैशोर्य काल के मित्र पंकज पराशर की भूमिका और पिछले कुछ महीनों पहले बने मित्र अभिषेक श्रीवास्तव, जो अब मुझमे वर्गशत्रु की छवि देखने लगे हैं, के पत्र का क्या जवाब दूं, जबकि इनका सार मेरी समझ में ही नहीं आ रहा है। वैसे भी उनके पत्र पर तीन प्रतिक्रियाकर्ताओं ने बिना संदर्भ जाने जिस तरह से वाहवाही की अज्ञानता परोसी है, उस पर अगर कुछ जवाब भी दूं तो इन्हें समझ में नहीं आएगा। पंकज की भूमिका में मेरी ओर इशारा करते हुए कुछ मुहावरे हैं। मसलन लोकतांत्रिक होने का स्वांग, चमकदार भाषा का दम, दुनिया को जीत लेने का ख्वाब, उपदेशक आदि आदि और अंतत: इसके बाद फासीवादी आदमी के रूप में होने वाली परिणति। अब इस पर अपना पक्ष रखने के लिए अभिषेक श्रीवास्तव की तरह अपनी प्रशंसा करने लायक बेशर्मी अरजनी होगी और इतना साहस मुझमें है नहीं। (अभिषेक ने पत्र में अपनी ज़बर्दस्त आत्मप्रशंसा की है।) और किसी भी गलीज से गलीज आदमी के बारे में भी इस तरह की भूमिका मुझे गैरवैचारिक और ईर्ष्या से भरी हुई लगती है। बहरहाल अभिषेक का ये पत्र मैं मोहल्ले में छाप देता (मोहल्ले में आने वाली प्रतिक्रियाएं ग़ौर से देखें माननीय श्री पंकज पराशर जी)। उन्होंने कमेंट के रूप में ये पत्र भेजा भी था, लेकिन उसे मैंने इसलिए रिजेक्ट कर दिया, क्योंकि उससे पहले ये पंकज के इस ब्लॉग पर छप गया है। अभिषेक में तो इतनी भी हिम्मत भी नहीं हुई कि इसे अपने ब्लॉग पर चढ़ाएं। (मीडिया युग आपका निजी ब्लॉग नहीं है, और हो सकता है ये कमेंट पढ़ने के बाद अब तक आपने अपने ब्लॉग पर भी अपने पत्र चढ़ा दिये होंगे।)बहरहाल, अभिषेक ने जो सवाल उठाये हैं, वे बचकाने हैं, क्योंकि उन्हें पढ़ कर यही एहसास होता है कि न तो उन्हें विचार या भाषा की समझ है, न समाज की और न सही-सही राजनीति की। ये सारी समझ सिर्फ इतनी भर है कि वे खुद को छोड़ कर बाकी दुनिया को औसत बता सकें। कथादेश में पत्र लिखने का आशय हरिवंश जी पर गोली चलाना नहीं था, और इसके लिए कंधे का सहारा लेने जैसी कोई बात भी नहीं थी। हरिवंश जी ने मुझ जैसे कितने ही पत्रकारों को ज़मीन दी। वो ज़मीन ऐसी थी, जिस पर खड़े होकर उनसे हम अपनी असहमति तक रख सकते थे और हमेशा रखते भी रहे। कथादेश में लिखा गया खुला पत्र इसी असहमति का एक अंश था। अभिषेक, जिन्हें पत्रकारिता सीखनी है और रिपोर्टिंग लायक तथ्यगत भाषा का खासा रियाज़ करना है, उन्हें नहीं मालूम है कि हरिवंश का हिंदी पत्रकारिता में क्या योगदान है। बहुत सारे योगदानों की बात छोड़ दें, तो एक क्षेत्रीय अख़बार को शून्य से शिखर पर पहुंचाने का उदाहरण ही अकेला सबसे बड़ा प्रसंग है। इस यात्रा में मैं भी हरिवंश जी के साथ आठ साल चला था, इसलिए उनके साथ मेरी असहमति के बिंदु भी उतने ही आत्मीय हैं, जितनी सहमति के बिंदु। इन बिंदुओं को समझना है अभिषेक जी, तो पहले हिंदी पत्रकारिता को एक आम आदमी के नज़रिये से देखिए। आपका बौद्धिक अतिवाद एक फैशन से ज्यादा कुछ नहीं। क्योंकि जब आप कहते हैं कि ब्लॉगिंग की दुनिया अराजनीतिक लोगों की दुनिया है, तो ये सब कुछ समझने के दावे जैसा ही है। और ये एक किस्म का अहंकार है, जो विचार और राजनीति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। आपने मोहल्ले के संदर्भ में एक टिप्पणी की है: 'मोहल्ले के अधिकतर निवासी या यहां से गुज़रने वाले ऐसे टीवी पत्रकार हैं जो या तो चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते अथवा उन्हें व्यक्तिगत संबंधों और वैचारिक मतभेदों के बीच का झीना परदा नज़र नहीं आता।' इस टिप्पणी में आपके भीतर बैठे स्वयंभू के दर्शन होते हैं। आपको शायद नहीं पता कि रवीश, पंकज पचौरी, हृदयेश या उमाशंकर सिंह की राजनीतिक-सामाजिक और पत्रकारीय समझ आपसे कहीं बहुत-बहुत ज्यादा है।दूसरी बात जो सवाल आप मुझसे हरिवंश जी से पूछने के लिए कह रहे हैं, वह आप खुद ही क्यों नहीं पूछ लेते। क्या आपकी यही राजनीति है कि अपने ब्लॉग का इस्तेमाल करने की जगह कभी पंकज पराशर के ब्लॉग से विषवमन करो, कभी अविनाश को उकसाओ। यही काम आप उन तमाम नौकरियों में करते होंगे, जहां से आपको निकाला गया होगा। इसके बाद आपके पत्र में व्यक्तियों से जुड़े राग-द्वेष के प्रसंग हैं, उन पर मैं इसलिए कोई जवाब नहीं देना चाहूंगा क्योंकि उससे कुछ हासिल नहीं होगा, और हो सकता है कि मुझे भी आपकी तरह व्यक्तियों के उदाहरण के साथ बात करने का रोग लग जाए।एक बात और, मुझे मेरी राह और मेरी असलियत बताने से पहले आप दिल्ली की गलियों के अलावा देश के नंदीग्राम और सिंगूर जैसे हिस्सों में घूम कर थोड़ा समाज, थोड़ी राजनीति समझें।अंत में एक शब्द ज्ञान देता हूं। विडम्बनात्मक कोई शब्द नहीं है, जो आपने अपने पहले वाक्य में लिखा है। इसलिए लिखते वक्त थोड़ा धैर्य रखें, नकली क्षोभ के प्रपंच से बचे रहें, और थोड़ा मनुष्य होकर लिखने की आदत डालें। आपमें बहुत संभावना है।
जो हलाल नहीं होता, वो दलाल होता है...
भाई पंकज पराशर ने ठीक ही कहा था, कि मोहल्ले में इतना लोकतंत्र नहीं कि वहां की जम्हूरिया उस पत्र को प्रकाशित कर सके...मैं अब तक अपने जनपथ पर इसे डालने से बच रहा था लेकिन अब सोचता हूं कि छाप ही देता हूं...कारण, कि मोहल्ले में दोस्तों की गलियों से अविनाश ने मुझे और पंकज पराशर को बेदखल कर दिया है...शायद उन्होंने वैचारिक असहमति के प्रदेश को खुद-ब-खुद इतना तिक्त बना दिया है कि कुछ गलियां उन्हें नाग़वार गुज़र रही हैं। खैर, मोहल्ला उनका है...जनपथ तो सबका है
मामला आपको अविनाश के ब्लॉग से पता चल जाएगा या चल गया होगा...मैंने सिर्फ एक हस्तक्षेप करने की कोशिश की थी...मेरा पत्र जस का तस यहां मैं डाल रहा हूं...
अविनाश भाई,
जो लोग आपसे परिचित हैं, हरिवंश जी से और साथ ही हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया से, उनके लिए मोहल्ले में हरिवंश जी का एक प्रेरणा पुरुष की तरह आना हास्यास्पद और विडम्बनात्मक घटना से ज्यादा कुछ नहीं है। पंकज पाराशर की बात आपने काट दी यह कह कर कि वैचारिक असहमति का मैदान इतना तिक्त नहीं होता कि हमेशा गाली दी जाए...लगे हाथों आपने उन्हें पढ़ने सीखने और वैचारिक हस्तक्षेप करने की सलाह भी दे डाली। सज्जन हैं जो चार वाक्यों में ही अपनी टिप्पणी निपटा गए पंकज भाई।
आपका पोस्ट देख कर मुझे सबसे पहले कुमार मुकुल की प्रभात खबर पर ही लिखी कविता याद हो आई...जो हलाल नहीं होता, वो दलाल होता है...। अन्यार्थ न लीजिएगा, लेकिन कथादेश में भी आपने जब विनोद जी के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई थी तो उससे गोली नहीं निकली बल्कि कुछ बेहद भद्दे रंग निकले थे...मैंने आपसे तब कहा भी था आप कुछ ज्यादा ही विनम्र हो गए। चर्चा तो खूब हुई, लेकिन लगा नहीं कि आप विरोध कर रहे हैं। यह एक किस्म के रहस्यात्मक कूटनीतिक पत्र से ज्यादा नहीं बन सका था।
उसके बाद आपकी रांची यात्रा और फिर उस प्रकरण की परिणति आपके ब्लॉग पर हरिवंश जी की उपस्थिति से होने के मायने बेहतर आप ही बता सकते हैं। लेकिन एक बात कहना चाहूंगा...'असहमति के मैदान के इतना तिक्त न होने' का तर्क देकर आपने हमारे और अपने मित्र अरविंद शेष के ज़ख्मों पर अनजाने ही नमक ही नहीं कोई तीखा अम्ल डाल दिया है। मुझे अब भी याद है कि जनसत्ता में आने से पहले अरविंद जी कितनी घुटन भरी स्थितियों में जी रहे थे...वह हरिवंश ब्रांड 'अखबार नहीं आंदोलन' की एक रंजनवादी नौकरी का ही नतीजा था। और खुद आप ही यह स्वीकार करते हैं कि रंजन श्रीवास्तव को आपने प्रभात खबर में प्रवेश दिलवाया था। चलिए, वह वक्त की बात रही होगी, लेकिन क्या मैं मान लूं कि अरविंद के दर्द से आप परिचित नहीं होंगे। फिर हरिवंश जी की एक अश्लील और सामान्य स्वीकृति कि 'अब संपादक मैनेजर हो गया है' को छापने के क्या मायने।
अविनाश भाई, वैचारिक सहमति और असहमति की जब भी बात होती है तो वह इतनी लचर भी नहीं होती कि दूसरों की आंखों में धूल झोंकी जा सके। हम यह मान सकते हैं कि तमाम वैचारिक असहमतियों के बावजूद व्यक्तिगत संबंध अपनी जगह रहते हैं...यह व्यावहारिकता का तकाज़ा भले हो, लेकिन एक जनमाध्यम पर उसे अभिव्यक्त करना आशंकाएं खड़ी करता है। वैचारिक स्टैंड को लेकर भी और व्यक्तिगत संबंधों के संदर्भ में भी। मैं नहीं जानता कि अरविंद की इस मामले पर क्या प्रतिक्रिया है...संभव है कि वे अब भी आपसे वैसे ही संबंध जारी रखें...लेकिन फिर मुझे लगता है मोहल्ले में इस किस्म की आपकी तमाम हरकतें सिर्फ प्रचारचादी और लोकप्रियतावादी नजरिए से ही होती हैं...क्योंकि मोहल्ले के अधिकतर निवासी या यहां से गुज़रने वाले ऐसे टीवी पत्रकार हैं जो या तो चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते अथवा उन्हें व्यक्तिगत संबंधों और वैचारिक मतभेदों के बीच का झीना परदा नज़र नहीं आता। और आप अपनी उस बिरादरी में वैसे ही बने रहते हैं जैसे गाइड फिल्म में देवानंद का पवित्र साधु पात्र।
यहां मैं कतई व्यक्तिगत नहीं हो रहा हूं...आप ऐसा भले मान लें...क्योंकि पत्रकारीय नैतिकता का ही तकाज़ा था कि मैंने अब तक दस नौकरियां छोड़ी हैं और हाल ही में आपके चैनल में दिबांग के साथ 45 मिनट लंबे चले साक्षात्कार के बाद मुझे नहीं बुलाया गया...संभव है मुझमें कमियां रही हों...लेकिन इसका बुनियादी कारण यह था कि मैंने संजय अहिरवाल के एक सवाल के जवाब में गुजरात नरसंहार पर भाजपा के खिलाफ स्टैंड ले लिया था। बाद में एक टीवी पत्रकार ने ही मुझे सलाह दी थी कि भइया नौकरी ऐसे नहीं मिलती है...आपको डिप्लोमैटिक होना चाहिए था।
मुझे लगता है कि गुजरात नरसंहार जैसी किसी भी घटना पर डिप्लोमैटिक होना वैसे ही है जैसे 'वैचारिक असहमति के प्रदेश को इतना तिक्त न छोड़ देना कि सिर्फ गालियां दी जाएं'। आप ही का तर्क...। शायद, यह नैतिकता और वैचारिकता की उत्तर-आधुनिक व्यवहारवादी परिभाषा हो। लेकिन इसे कम से कम मैं नहीं जानता और मानता।
एक आग्रह है आखिर में...संभव हो सके तो ब्लॉग पर, फोन पर अथवा अगली मुलाकात में आप हरिवंश जी से एक प्रश्न पूछने का साहस अवश्य करिएगा, कि 'क्या संपादक के मैनेजर हो जाने की सामान्य टिप्पणी उन पर खुद लागू होती है...।' यदि वह जवाब नहीं में दें, तो एक और सवाल पूछिएगा कि दिल्ली के सिविल सोसायटी जैसे तमाम एनजीओ से जुड़ाव, उनकी पत्रिकाओं के कवर पेज पर 'मिस्टर एडिटर' के तमगे से लेकर विदेश यात्राओं तक के पीछे क्या माया है। क्या इस माया के लिए दिल्ली के ब्यूरो में प्रतिमाह 1400 रुपए पर किसी लड़के से संपादकीय पेज पर काम कराना ज़रूरी होता है...।
यदि उनका जवाब हां में हो, तो आपसे कम से कम हम पाठक मोहल्ले पर एक खेद पत्र की अपेक्षा अवश्य करेंगे। आखिर वैचारिक असहमति के बावजूद आपसे इतनी मांग तो की ही जा सकती है...मोहल्ला इतना तिक्त तो नहीं...।
गुरु, देसी भाषा में कहूं तो बिना मतलब इस तरह की चीज़ों को मोहल्ले में लाकर क्यों बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया अराजनीतिक लोगों की दुनिया है...उसमें हम जैसे राजनीतिक लोगों को हस्तक्षेप के लिए मजबूर करने से आपके मोहल्ले की लोकप्रियता तो घटेगी ही, अनावश्यक आपके ब्रांडेड होने का खतरा भी पैदा हो जाएगा। मैं फिर आपसे गुज़ारिश करता हूं कि क्लास मीडियम और मास मीडियम के फर्क को समझिए...मास के सवाल क्लास मीडियम पर उठाएंगे तो कुछ डीक्लास लोगों के हस्तक्षेप से कुछ लोगों को डीक्लास होना पड़ जाएगा। यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्बना है...
आपका ही,
अभिषेक श्रीवास्तव

