
ये पंक्तियां आलोक धन्वा की एक कविता की हैं...बरबस याद आ गईं। दरअसल, मैं दो दिनों पहले दिल्ली में आयोजित एक पुरस्कार समारोह के बारे में सोच रहा था। शहीद शंकर गुहा नियोगी की स्मृति में पत्रकारिता पुरस्कार का समारोह था वह राजेंद्र भवन में। अगले दिन अखबारों को देखा...अंग्रेजी को छोड़ दें तो हिंदी अखबारों को भी इस पुरस्कार की कोई सुध नहीं थी। उन्हीं हिंदी अखबारों को, जिनके सम्पादकीय पन्ने उन लेखकों/पत्रकारों के लेखों से रोज पटे पड़े रहते हैं जिन्हें यहां सम्मानित किया गया।
यह पुरस्कार कई मायने में अद्भुत रहा...जो स्मृति चिह्न दिया गया वह मजदूरों के हाथों में खड़ा धान का कटोरा था। यह छत्तीसगढ़ का प्रतीक था जहां शंकर गुहा नियोगी को इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करने का प्रयोग किया था...वह काम जिसे आज चुनावी या गैर-संसदीय कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी शायद नहीं कर रही है।
दूसरी अद्भुत बात यह रही कि पुरस्कृत होने वाले हरेक पत्रकार ने पुरस्कार राशि किसी सामाजिक काम के लिए दे दी...ध्यान रखें कि यह लीक अरुंधति राय की नहीं थी। न वह मजदूरों-किसानों के लिए लिखती हैं और न ही उन्होंने ऐसे किसी काम के लिए बुकर की धनराशि दी थी। उनका डॉलर या पाउंड आत्मवीकृतियों के वीर्य पर फिसलती एक पत्रिका के लिए बहा था। यहां ऐसे लेखक थे जिन्होंने लंबे समय तक जिगर चाक कर लगातार खून से लिखा है...यदि मैं ज्यादा कह रहा हूं तो आज के मुख्यधारा के पत्रकारों से तुलना कर लें...चाहे वे अनिल चमडि़या हों या वासवी...या कि आनंद स्वरूप वर्मा और कुलदीप नैयर।
मैंने पूछा कुछ हमउम्र पत्रकारों से नियोगी के बारे में...उन्होंने शायद नाम भी न सुना था उनका। उन्हें पुलित्ज़र पुरस्कार से कम कुछ नहीं दिखता...और वे भारत में कम से कम रामनाथ गोयनका पुरस्कारों को ही मानक मानते हैं पत्रकार होने का। क्या कन्ट्रास्ट है कि अगले ही दिन जनमत से लाइव इंडिया बने एक चैनल के पत्रकार ने अपनी पत्रकारिता के लिए रो-रो कर माफी मांगी...पुलिस के सामने...एक शिक्षिका का शील उछालते वक्त उसे अपने स्टिंग के कैमरे में शायद कोई व्यावसायिक पुरस्कार दिख रहा होगा...।
इतनी ढेर सारी 24 घंटीय रिपोर्टिंग के बीच अब भी कुछ लोग हैं जो बंधाते हैं उम्मीद...लेकिन उनकी हालत देखकर होती है तकलीफ...वे अकेले नियोगी जैसे क्रांतिधर्मियों की सलीब ढो रहे हैं...और ये सभी किसी भी मुख्यधारा के अखबार में नौकरी नहीं करते..।
हमारे समय की इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि समय को सबसे बेहतर समझने वाले समय के हाशिए पर हैं...

