12/28/2008

बीते साल का शोकगीत...


मार्च में पिछली पोस्‍ट से लेकर अब तक जनपथ सूना पड़ा रहा। इसकी एक नहीं, कई वजहें गिनाई जा सकती हैं। बहरहाल, साल बीतने को है और पिछले नौ महीनों में चीजें देखते-समझते ही वक्‍त गुज़र गया। बच्‍चन की पंक्तियां सटीक बैठती हैं इस मौके पर....  जीवन की आपाधापी में/कब वक्‍त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूं/जो किया, कहा, सुना/ उसमें क्‍या बुरा, क्‍या भला...।  खैर, साल के अंत में कम से कम यह भाव न आए कि जनपथ परित्‍यक्‍त है और सांड़ गायब हो गया है, इसलिए एक ईयर एंडर से बीते साल को श्रद्धांजलि और नए साल का आरंभ...। 


यह साल भी खत्‍म होने को है । 
देख रहा हूं
अखबारों में ईयर एंडर 
बदलते पन्‍नों में बदलते विषय कह रहे हैं चीख-चीख कर
साल, खत्‍म होने को है। 

सोचता हूं क्‍या किया इस साल, कि औचक 
याद आती है किसी की सूक्ति 
एक समझदार व्‍यक्ति वही है जो 30 तक कम्‍युनिस्‍ट न रह जाए।

बिखर रहे हैं संदर्भ/ याद रह गई हैं सूक्तियां बस 
दिमाग में रोशनी की किरचियां बमबार्डिंग करती हैं 
लगता है, जैसे चढ़ती सर्दी में ही विचार सब्‍लाइम होते हैं। 

उलटी गिनती में याद आता है सबसे पहले 
मुंतदिर का जूता- साम्राज्‍यवाद के विरोध का प्रतीक 
और 48 करोड़ डॉलर उसकी कीमत 
मुकदमा... अभी बाकी है।

सबकी लगा दी गई है बोली 
समर्थन की, विरोध की, विरोध के प्रतीकों की 
और उसकी भी, जो नट बोल्‍ट की भांति फिट 
कभी-कभार शिकार हो जाता है उलटी धारा का 
जैसे, अपना करकरे। 

साध्‍वी जेल में है- खुश है ।
पांडे जेल में है- खुश है।
और अफजल... 
उसे लटकाने की हो चुकी है तैयारी मुकम्‍मल 
क्‍योंकि यह राष्‍ट्र येन-केन-प्रकारेण हिंदू है 
और हिंदू 
आतंकवादी हो नहीं सकता 
यह पर्याय तो मुसलमान, पारसी, ईसाई, यहूदी के लिए है। 

बढ़ा दी गई है सुरक्षा 
मेटल डिटेक्‍टर टटोल रहा है हिंदू राष्‍ट्र की नब्‍ज़ 
खड़ी हैं सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं पर 
जोहती आदेश आकाओं का, कि 
और नहीं लगने देनी है परमाणु ज़खीरे को ज़ंग।

एक बार, बस एक बार 
बिखर जाए खून अबकी ब्रह्मांड की शिराओं में 
बन जाए पहाड़ लाशों का, छू ले चांद की सतह। 
एक भूखे-नंगे-युद्धोन्‍मादी देश को देख 
हंस पड़े अरबों का चंद्रयान
अपनी आधुनिक बरतानी आंखों से 
यूरेका...यूरेका। 
और बज पड़े गृह मंत्रालय का भोंपू 
इसी की चांदनी में हुआ था 26/11
यूरेका...यूरेका। 

हम नहीं कहते 
ताज-ओ-तख्‍त जलाने वाले हिंदू थे...ना।
उन्‍हें तो सिर्फ फायदा मिला है, और 
फायदे का हत्‍या से जोड़ना 
कॉन्‍सपिरेसी की थियरी है, बल्कि 
खुद 
कॉन्‍सपिरेसी है। 

जनता फाड़ देगी कपड़े
मांगेगी फांसी तुम्‍हारे लिए अपने-अपने राम से। 
ईश्‍वर सब देख रहा है 
बोलना भी मत। 

उसी की भेजी आ रही हैं नेमतें आधुनिक विज्ञान की 
राष्‍ट्र की रक्षा करने 
इजराइल से 
अमेरिका से 
ब्रिटेन से। 
यह सब तुम्‍हारे लिए ही हो रहा है, 
भूलना भी मत। 

और कर भी क्‍या पाओगे
जंतर-मंतर जाओगे,
फाड़ोगे सुरक्षा कानूनों की प्रतियां, या 
नोंचोगे साम्राज्‍यवाद का खंबा। 
जूता तो बिक गया 
तुम्‍हारी क्‍या कीमत है भाई। 

ओह... 
देखो-देखो 
चमका है इस अंधेरे में एक हीरा 
लूथर किंग का अवतार 
कहते हैं, उसके वोट बैंक में किसान नहीं आते। 
तुम लगा सकते हो उससे उम्‍मीद 
कहता है, देगा नौकरियां दो लाख।
हमारे यहां तो खैर आजकल मंदी है।

जिस देश के सत्‍तर फीसद नौजवान नहीं जानते 
क्‍या है ग्‍लोबलाइजेशन 
वहां काहे की मंदी। 

मंदी है...

मंदी है साहस की (कह दे कोई कि ताज जलाने वाले अपने थे)
मंदी है विवेक की (बोल कर देखो कि युद्ध गलत है) 
मंदी है ज़बान की (लिख दो कि अपने 80 फीसदी की मंदी  तो सनातन है) 
मंदी है विरोध की (बस सोच कर देखो कि हिंदू आतंकवादी हो सकता है)। 

कहती है सरकार 
मंदी है पैसे की 
समझ नहीं आता। 

इसी नासमझी में 
चीजों को देखते, समझते, सहते
यह साल भी खत्‍म होने को है। 

हमने की नौकरी डट कर 
बने रहे गृहस्‍थ बारहों मास 
रमे रहे दवा-दारू, मिर्च धनिये में। 
और अब, जब विचारों के सब्‍लाइम होने का आया मौसम 
तो देखते क्‍या हैं 
एक महाजलूस तोड़ने में लगा है हमारे छंद 

भूखे-नंगे-बीमार-अपंग और खुदकुशी करते लोगों की जमीन पर
रातोरात पैदा हो गई है एक कौम। 

सब इकट्ठा हैं गेटवे ऑफ इंडिया पर 
हाथों में लिए मोम की बत्तियां 
आ रही है लाइव फीड- आपका स्‍वागत है, आज से खुल गया है ताज। 

उठ गए हैं हज़ारों कुबेरों के गुदगुदे हाथ 
पहली बार बंधी हैं इनकी मुट्ठियां 
भभक रही है लौ 
अकड़ रही है गरदन 
चांद की साजिशी छाया में 
बदल गई है इंसानी आवाज़।

एक साथ हुंकारते हैं सहस्र हुंड़ार...
युद्ध। 
युद्ध। 
युद्ध।  








3/26/2008

कुछ खबरें फटाफट...

पिछले करीब एक महीने से जनपथ सूना पड़ा है। अच्‍छा नहीं लगता, लेकिन वक्‍त का तकाजा है। लंबा लिखने का वक्‍त नहीं और वक्‍त है भी तो मौसम खराब। ऐसे में कुछ सूचनाएं फटाफट...
लेकिन उससे पहले बैकग्राउंडर...
पहली तो ये, कि मैं अब पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो चला हूं। जिन्‍हें नहीं पता है उनके लिए खबर ये है कि गत 11 जनवरी को नोएडा में मेरे मकान के सामने ही कुछ सांड़ों ने मेरे ऊपर हमला कर दिया था। जान बच गई, लेकिन स्‍कैपुला यानी पीठ के पीछे की हड्डी टूट गई और सिर फूट गया। चार दिन अस्‍पताल और एक महीने आराम के बाद अब मैं ठीक हो गया हूं।
दूसरी, मैंने नौकरी पकड़ ली है और एक महीने से इसीलिए कुछ और काम नहीं कर पा रहा था, देखते हैं कब तक यह नया हज चलता है।

अब खबरें दूसरों के लिए...
1. देशबंधु नामक अखबार अगले माह दिल्‍ली से निकलने जा रहा है, ये तो सबको पता है लेकिन अपुष्‍ट सूत्रों के मुताबिक अनिल चमडि़या ने संपादकी का कार्यभार छोड़ दिया है। नए संपादक का पता नहीं, लेकिन अगले हफ्ते दिल्‍ली में ललित सुरजन द्वारा दी जाने वाली पार्टी अपनी जगह कायम है।
2. नई दुनिया का दिल्‍ली संस्‍करण भी आने वाला है...इच्‍छुक सुरेश बाफना से संपर्क कर सकते हैं।
3. रिलायंस कारोबार नाम से एक बिजनेस चैनल ला रहा है। यह चैनल पहले आज तक वाला समूह ला रहा था। अब आज तक की हिस्‍सेदारी सिर्फ 40 फीसदी ही होगी।
4. पानीपत दैनिक भास्‍कर में बंपर भर्तियों का मौसम है। दिनेश मिश्र से संपर्क करें, नौकरी लग जाएगी।
5. झज्‍ज‍र में भास्‍कर को एक रिपोर्टर चाहिए। इच्‍छुक बिजेंदर कुमार से संपर्क कर सकते हैं।
6. जिन्‍होंने टाइम्‍स एसेंट न देखा हो, उनके लिए सूचना है कि ब्रिटिश एम्‍बैसी और अमेरिकी एम्‍बैसी में मीडिया सलाहकार और पीआरओ टाइप नौकरियां हैं। पांच-छह साल कैरियर वाले पत्रकार (पढ़ें अनुवादक) तुरंत आवेदन करें।
7. आगामी 31 और 1 तारीख को मंडी हाउस स्थित एलटीजी ऑडिटोरियम में राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए बनी एक राष्‍ट्रीय समिति की दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस है जिसमें अरुंधति राय, गदर समेत तमाम एक्टिविस्‍ट देश भर से इकट्ठा हो रहे हैं। खबर के लिहाज से अच्‍छी सामग्री मिलने की संभावना। पहुंचे सुबह साढ़े आठ बजे 31 मार्च को उद्घाटन समारोह में।
8. भोजपुरी और अवधी में दिलचस्‍पी रखने वालों के लिए अच्‍छी खबर...भोजपुरी में दो और अवधी में एक चैनल बाजार में आ रहा है। भोजपुरी का पहला चैनल 'महुआ' नाम से प्रज्ञा वाले ला रहे हैं...अंशुमान त्रिपाठी से मिल लें। इसके अलावा इंडिया न्‍यूज वाला समूह एक भोजपुरी और अवधी चैनल लाने की योजना बना रहा है। संपर्क अशोक मिश्र।
9. विचार परिक्रमा नाम की एक उम्‍दा वैचारिक पत्रिका बाजार में आने को है जिसके संपादक सहारा समय के विचार संपादक रहे विमल झा हैं। नौकरी की संभावना शून्‍य, लेकिन लिखने की अपार। विचार पक्ष वाले फ्रीलांसरों के लिए अच्‍छा मौका।
10. और अंत में सबसे बड़ी खबर...ब्‍लॉग को लेकर बहुत गंभीर और संजीदा होने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि आगामी कुछ ही महीनों में गूगल जैसी कंपनियां अपनी ब्‍लॉग स्‍पेस को समाप्‍त करने वाली हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि उनके सर्वर में काफी कचरा इकट्ठा हो गया है जिसके कारण ट्रैफिक में दिक्‍कतें आ रही हैं। इस श्रेणी में सिर्फ ब्‍लॉग ही नहीं, बल्कि ऑरकुट और फेसबुक भी शामिल हो सकते हैं जहां आपकी गतिविधियों के कोई नामोनिशान नहीं बाकी रह जाएंगे।

अब चलता हूं...किसी और दिन विस्‍तार से बताऊंगा कि एक ठे भटकल बनारसी सांड़ कैसे खुद सांड़ का शिकार हो गया। और हां, मीडिया पर मैं एक कहानी लिख रहा था...उस अनुभव के बारे में जो मुझे जी न्‍यूज के दफ्तर में प्राप्‍त हुआ था...वह कहानी भी सांड़ की भेंट चढ़ गई...अब तक अधूरी है। लेकिन वादा है कि जब भी आएगी, मजा देगी।

नमस्‍कार

2/02/2008

यूथ जर्नलिस्‍ट लीग का पहला कार्यक्रम 11 फरवरी को


हाल के दिनों में जिस तरीके से हमारे इर्द-गिर्द पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि अब हमारे शासकों को अपने ही संविधान में सुनिश्चित किए गए अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार की कोई परवाह नहीं रह गई है। पत्रकारों के लिए उन इलाकों में काम करना और ज्‍यादा मुश्किल होता जा रहा है जहां सरकारी निष्क्रियता के चलते जन असंतोष ने विद्रोह का रूप ले लिया है...इसी का नतीजा है कि अब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से लेकर एनजीओवादी कार्यकर्ताओं और सत्‍ताधारी कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के काडरों तक पर माओवादी का लेबल चस्‍पां कर दिया जा रहा है।

याद करें बिहार में सत्‍ताधारी दल के विधायक अनंत सिंह द्वारा एनडीटीवी के पत्रकारों की पिटाई की घटना को...बड़ी पूंजी से संचालित संस्‍थान का होने के नाते इन पत्रकारों को तो कुछ राहत भी मिल सकी और मामला सामने आ गया, लेकिन उन पत्रकारों का क्‍या हो जिनके पीछे न तो कोई बैनर है और न ही मुख्‍यधारा का कोई समर्थन।

हाल ही में उत्‍तराखंड के एक पूर्व पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रशांत राही को गिरफ्तार कर लिया गया था और सारे मुकदमे वही लगाए गए थे जो बिनायक सेन के ऊपर हैं। ऐसे ही आंध्र में नेट टीवी संचालित करने वाले एक वरिष्‍ठ पत्रकार श्रीसइलम और केरल के बुजुर्ग पत्रकार गोविंदन कुट्टी को गिरफ्तार किया गया है। पिछले ही माह छत्‍तीसगढ़ में एक अन्‍य पत्रकार उज्‍ज्‍वल को पुलिस ने माओवादी होने के नाम पर धर लिया।

अफसोस है कि प्रशांत राही जैसे मामले में प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया जैसी पत्रकारों की राष्‍ट्रीय संस्‍था के वक्‍तव्‍य और दिल्‍ली से गए एक अनौपचारिक प्रतिनिधिमंडल के तथ्‍यान्‍वेषण के बावजूद मामला ज्‍यों का त्‍यों है और पत्रकार बिरादरी में कोई हलचल नहीं दिखाई देती।

इस परिदृश्‍य में देश के कुछ युवा पत्रकारों ने मिल कर एक अनौपचारिक किस्‍म के मंच का गठन किया है और नाम रखा है यूथ जर्नलिस्‍ट लीग। आज पत्रकार यूनियनों के पतन और निष्क्रियता तथा पत्रकारों के बढ़ते कैरियरवादी रुझान के दौर में ऐसी पहल का स्‍वागत किया जाना चाहिए।

यह मंच अपना पहला कार्यक्रम पत्रकारों पर बढ्ते हमलों के मसले पर ही केंद्रित कर रहा है। कार्यक्रम की तिथि है 11 फरवरी 2008, स्‍थान प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया और समय दिन में 3.30 बजे। आप सभी पत्रकारों, लेखकों और जनपक्षधर समाजकर्मियों से अपेक्षा है कि इस कार्यक्रम में आकर इसका हिस्‍सा बनेंगे और आने वाले खतरों के प्रति खुद को तैयार करते हुए अपनी अगली पीढ़ी को भी आगाह करने का काम करेंगे।

यूथ जर्नलिस्‍ट लीग का सदस्‍य बनने और इस सम्‍बन्‍ध में कोई भी पूछताछ करने के लिए मेल करें
youthjournalistleague@gmail.com

1/27/2008

कविता की मौत का फ़रमान


पिछली बार भी लिखी थी
अधूरी एक कविता...


छूटे सिरे को पकड़ने की कोशिश की नहीं।
आखें बंद कर-
करता हूं जब भी कृत्रिम अंधेरे का साक्षात्‍कार
मारती हैं किरचियां रोशनी की
इलेक्‍ट्रॉनों की बमबार्डिंग में
दिखती हैं वे सारी चीज़ें, रह गईं
जो अधूरी।

एक अधूरी सदी, बीत गई जो
और नहीं कर सके हम उसका सम्‍मान।
अब, आठ बरस की नई सदी के बाद
देखता हूं वहीं कविता
छोड़ आया था जिसे
बिस्‍तर के सिरहाने
दबी कलम और नोटबुक के बीच
बगैर छटपटाहट
निरीह
निठारी की सर्द लाशों की मानिंद।

आगे जाने चखना पड़े
और कितना खून
बोटियां
करने में तेज़ लगा हूं दांतों को
मज़बूत आंतों को
पचा सकें अधूरापन जो पिछली सदी का
मोबाइल से लेकर नैनो वाया लैपटॉप
सब कुछ।

जानते हुए यह, कि
पश्चिम की दुर्गंध के लिए है अभिशप्‍त
नाक अपनी देसी, पहाड़-सी
सोचता हूं क्‍या लिखते मुक्तिबोध आज
जब...
ब्रह्म लुप्‍त है...शेष सिर्फ राक्षस
और शिष्‍यों की हथेलियों पर बना है नक्‍शा
नंदीग्राम की लथपथ अग्निपथ मेंड़ों का।


सिगरेट के एक सिरे पर जलता है अधूरा प्रेम
दूसरे पर कच्‍चा दाम्‍पत्‍य
और धुआं हो जाते हैं सारे शब्‍द
भाव
सौंदर्य

बचता है...
कमाने को पैसा
खाने को बर्गर
खरीदने को कपड़े
लगाने को पूंजी
बनाने को बिल
भरने को ईएमआई, और
बिगाड़ने को बच्‍चे।

उठते हैं एक अरब हाथ
तनी मुट्ठियों समेत
मुंह से फूटता है -

'चक दे इंडिया'

सिर उठा कर पीने वाली पूरी एक कौम
देखती नहीं नीचे
सांड़ों की रोज़मर्रा भगदड़
लो दब गया एक और निवेशक...
(इंसान नहीं)


और...
सृष्टि का राजा
स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी के कंधे पर सवार
नंग-धड़ंग
दे रहा
कविता की मौत का फ़रमान...।

कटे कबंध भांजते तलवार-
चीख पड़ते हैं असंख्‍य रमेश

'मौला मेरे ले ले मेरी जान'......।

1/24/2008

समाज सेवा या 'स्वयं' सेवा




मीडिया में कभी-कभार ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्‍हें दुर्भाग्‍यपुर्ण और हास्‍यास्‍पद एक साथ कहा जा सकता है...हाल ही में दी संडे इंडियन के एक पत्रकार ने एक स्‍टोरी की है जो मशहूर बचपन बचाओ आंदोलन के बारे में है...पता चला है कि इस स्‍टोरी पर संस्‍था के प्रमुख कैलाश सत्‍यार्थी द्वारा उन्‍हें जान से लेकर नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दी जा रही हैं...इतना तक तो ठीक है, लेकिन इससे भी दुर्भाग्‍यपूर्ण यह है कि उसी पत्रिका के कुछ लोग इस पत्रकार समेत उसके संपादक के खिलाफ बाकायदा हरवे-हथियार लेकर खड़े हो गए हैं क्‍योंकि परसों विश्‍वस्‍त सूत्रों के मुताबिक कैलाश सत्‍यार्थी ने हमेशा की तरह अपनी अंटी ढीली करते हुए कुछ सिक्‍के बरसा दिए हैं। हम पहले भी सुनते आए हैं कि किस तरह सत्‍यार्थी अपने दो-चार विश्‍वस्‍त पत्रकार गुर्गों के माध्‍यम से मीडिया को मैनेज करते रहे हैं, लेकिन पहली बार ऐसा उदाहरण सजीव प्रस्‍तुत है। हालांकि, इससे पहले भी दी संडे पोस्‍ट के पत्रकार अजय प्रकाश को एक स्‍टोरी पर उनसे ऐसी ही धमकियां मिल चुकी हैं। आखिर इस स्‍टोरी में ऐसा क्‍या है...पढ़ने पर तो नहीं समझ आता कि वस्‍तुपरकता के मानदंडों पर कहीं भी यह चूक रही हो...क्‍या कैलाश सत्‍यार्थी को इतना भी पचनीय नहीं...खुद ही पढ़ लें.....लेकिन उससे पहले यह बता दें कि जो रिपोर्ट नीचे दी जा रही है वह पत्रकार द्वारा फाइल की गई मूल रिपोर्ट है...इसमें से सत्‍यार्थी द्वारा धमकियां दिए जाने समेत कुछ और तथ्‍य प्रकाशित रिपोर्ट में से हटा दिए गए हैं...



हरेक महान शुरुआत आखिरकार लड़खड़ाने को अभिशप्त होती है. प्रत्येक महान यात्रा कहीं-न-कहीं तो समाप्त होती ही है.
-संत ऑगस्‍तीन

भारत के संदर्भ में भी यह बात नई नहीं है, बात आप चाहे जिस भी क्षेत्र की कर लें. यही बात समाज की सेवा के महान उद्देश्य और परोपकार के महान धर्म को ध्यान में रखकर शुरु हुई गैर-सरकारी, सामाजिक या फिर स्वयंसेवी संगठनों के साथ भी लागू होती है. जो विचारक या निर्देशक इनकी शुरुआत करता है. ताजा मामले की बात हम बचपन बचाओ आंदोलन, ग्लोबल मार्च या असोशिएशन फॉर वोलंटरी एक्शन(आवा) से कर सकते हैं. ये तीन नाम इस वजह से क्योंकि इन संस्थाओं का ढांचा ही ऐसा है. सारे एक-दूजे से जुड़े और अलग भी. ऊपर से इस मामले के पेंचोखम इतने कि आम आदमी तो उनको समझने में ही तमाम हो जाए या उसे यह शेर याद आ जाए- जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं. बहरहाल, मामला अभी टटका और ताजा है. इस पूरे मसले में तमाम नामचीन शख्सियतें उलझीं हैं और साथ ही मीडिया भी अपना अमला पसारे है. पूरे फसाद की जड़ में है दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित इब्राहिमपुर में मौजूद बालिका मुक्ति आश्रम. कभी हमसफर रहे दो लोग ही अब एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं. तलवारें तन चुकी हैं, बखिया उधेड़ी जा रही है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और दोनों ही खेमे एक-दूजे के चरित्र हनन पर आमादा हैं.

बहरहाल, मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इस पूरे घटनाक्रम का इतिहास जानना होगा. बालश्रम को खत्म करने और बंधुआ मजदूरों को बचाने के पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर दो महानुभाव इकट्ठा हुए. ये दोनों ही आज काफी नामचीन हैं-स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी. 80 के दशक में शुरु हुआ यह सफर काफी मशहूर हुआ और सफल भी. इसका नाम फिलहाल बचपन बचाओ आंदोलन है, पर इसकी शुरुआत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने की थी और उस वक्त संस्था के तौर पर साउथ एशियन कोलिशन अगेंस्ट चाइल्ड सर्विटयूड (साक्स) का निर्माण किया गया. इसमें पेंच केवल एक आया, जब 93-94 में स्वामी अग्निवेश इस आंदोलन से अलग हो गए. बहरहाल स्वामी अग्निवेश से इस मसले पर जब पड़ताल की गई, तो उन्होंने कुछ ऐसा बयान दिया, ''देखिए, असल में बंधुआ मुक्ति मोर्चा(बीएमएम) ने ही इस पूरे आंदोलन की शुरुआत की थी. आप जो आश्रम देखकर आ रहे हैं, वह भी असल में बीएमएम का ही बनाया हुआ था. बाद में मुझे महसूस हुआ कि कैलाश जी उसका और भी कोई इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. उसी समय हम दोनों में कुछ बातचीत हुई और मैंने अलग होने का फैसला कर लिया. ''

खैर, अब आते हैं तात्कालिक मसले पर. फिलहाल विवाद की जड़ में है बालिका मुक्ति आश्रम और कभी कैलाश सत्यार्थी की करीबी सहयोगी और इसकी संचालिका रहीं सुमन ही खम ठोंककर मैदान में आ खड़ी हुई हैं. लाखों रुपए मूल्य की यह संपत्ति किसी व्यक्ति ने संस्था को दी थी और शायद यही वजह है-तलवारें खिंचने की. मामला तब सुर्खियों में आया, जब पिछले महीने मीडिया में यहां की कुछ लड़कियों के यौन-शोषण की खबरें आईं. वे लड़कियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लाई गईं थीं और आश्रम में रह रही थीं. बच्चियों ने मसाज करवाने की बात भी स्वीकारी. साथ ही सुमन और संगीता मिंज(फिलहाल आश्रम की केयरटेकर) पर तो दलाली के भी आरोप लगे. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सेंगर इसे कुछ ऐसे बयान करते हैं, ''देखिए, हम व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन आप रांची जाकर पता करें तो इनके खिलाफ कई मामले दर्ज पाएंगे. उन पर तो एफसीआरए के तहत भी आंतरिक कार्रवाई चल रही है. उन्होंने 2004 में अपनी एक अलग संस्था द चाइल्ड ट्रस्ट बनाई और संस्था की संपत्ति को निजी तौर पर इस्तेमाल किया. अपने लिए गाड़ी खरीदी और कई सारी वित्तीय अनियमितताएं की. हमारे पास सारे जरूरी कागजात हैं और आप उनको देक सकते हैं. ''

हालांकि सुमन का इस मसले पर कुछ और ही कहना है. वह कहती हैं, ''ये सारे आरोप निराधार और बेबुनियाद हैं. मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. दरअसल यह सारा कुछ आश्रम पर कब्जा करने को लेकर है. उन्होंने तो मेरे कमरे को भी हथिया लिया और मेरे सामान को उठा लिया. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि आश्रम में सुरक्षा के लिए हमें पुलिस से गुहार करनी पड़ी है. कैलाश जी ने संस्था में अपनी बीवी और बेटे को स्थापित कर यह सारा झमेला खड़ा किया है. अगर मैं इतनी ही बुरी थी तो 22 सालों तक ये चुप क्यों रहे और मुझे बर्दाश्त क्यों करते रहे?''

खैर, अब जरा पीछे की ओर लौट कर इस पूरे विवाद की जड़ देखें. साक्स से बीबीए की यात्रा में कई पड़ाव आए. संस्था जैसे-जैसे बढ़ती गई, विवाद भी गहराते गए. आखिरकार 2004 में यह तय किया गया कि आवा एक मातृसंस्था रह जाएगी और इसके बैनर तले सेव द चाइल्डहुड फाउंडेशन, बाल आश्रम ट्रस्ट, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर और द चाइल्ड ट्रस्ट बनाए जाएंगे. यही से पूरा बवाल शुरु हुआ. सुमन का कहना है, ''आप खुद देख सकते हैं कि कैलाश जी ने किस तरह अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया. अपनी पत्नी को तो उन्होंने सेव द चाइल्डहुड...का अध्यक्ष बना दिया, तो बेटे को बाल आश्रम...का. ग्लोबल मार्च...के तो वह खुद ही मुख्तार हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी के ट्रस्ट में ही उन्होंने सारे संसाधनों का रुख कर दिया. यही सब विवाद की जड़ में है. ''

हालांकि इस संवाददाता ने जब बीबीए के वर्तमान अध्यक्ष रमेश गुप्ता से बात की, तो उनका कुछ और ही कहना था. वह बताते हैं, ''हमने तो सुमन को हमेशा ही सम्मान दिया है. लेकिन जब उसकी हरकतें नाकाबिले-बर्दाश्त हो गई तो हमें मामले को उजागर करना ही पड़ा. हमने तो उसे एक खुला पत्र भी लिखा है, उससे आप सारी बातें जान सकते हैं. उसने एक भी निर्णय का सम्मान नहीं किया. कभी भी वित्तीय पारदर्शिता नहीं दिखाई और आवा के संसाधनों का दुरुपयोग कर अपनी खुद की संस्था को पालती-पोसती रही. खुद को तो उसने जैहादी के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया, लेकिन बाकी साथियों का नाम भी नहीं लिया. यह सचमुच अफसोसनाक है. ''

राकेश सेंगर तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि जबरिया निकालने वगैरह की बात बिल्कुल बेबुनियाद है. बाल आश्रम की लीज तो वैसे भी 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी. फिर इस्तीफा भी उनसे जबरन नहीं लिया गया. जब उन्होंने संस्था छोड़ दी तो फिर वैसे ही आश्रम में उनके बने रहने की कोई तुक नहीं थी. जहां तक उनके कमरे से कुछ लेने की बात है, तो यह तो बिल्कुल अनर्गल प्रलाप है. आप खुद ही बताएं किसी स्वयंसेवी संस्था में काम करनेवाली महिला के पास 2 किलो सोना कहां से आ गया? हालांकि, कैलाश सत्यार्थी इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लेते हैं. वह कहते हैं, ''भई, मेरा तो न बाल आश्रम और न ही बालिका आश्रम से कोई लेना-देना है. वहां से तो मैं डेढ़ साल पहले ही अलग हो गया था. आप मुझसे ग्लोबल मार्च के बारे में पूछें तो कुछ बता सकता हूं.''

हालांकि अपने परिवार के बारे में पूछने पर वह बिफर पड़े. इस संवाददाता को धमकी भरे लहजे में कैलाश जी ने कहा, ''अगर मेरा बेटा या पत्नी किसी संस्था का नेतृत्व करने लायक हैं तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी वे दूसरे संस्थानों से जुड़े हैं. आप बेबुनियाद बातें न करें, वरना आपका करियर भी खतरे में पड़ सकता है. '' हालांकि इसके ठीक उलट राकेश सेंगर का कहना है कि अगर कैलाश जी के बेटे की बात साबित हो जाए तो वह सामाजिक जीवन ही छोड़ देंगे. बहरहाल, आरोपों की इस झड़ी में नुकसान सबसे ज्यादा तो उन बच्चों का हो रहा है, जिनका जीवन सुधारने के मकसद से इस आंदोलन की शुरुआत हुई है. साथ ही कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब खोजने होंगे. मसलन, वे लड़कियां अब कहां हैं, जिन्होंने मीडिया के सामने आकर मसाज की बात कबूल की थी? फिर मीडिया पर भी कुछ उंगलियां उठेंगी. जैसे, क्या हरेक रिपोर्टर ने इब्राहिमपुर जाकर पड़ताल की थी? जब यह संवाददाता बालिका आश्रम में पहुंचा, तो नजारा कुछ और ही था. वहां बाकायदा सारे काम सामान्य तौर पर ही हो रहे थे. फिलहाल वहां 25 बच्चियां हैं. जिसमें से चार वयस्क हैं. वहां सात-आठ बच्चियों के अभिभावक भी थे. जब हमने बच्चियों से बात की तो उन्होंने सारी बातों से इंकार किया. उनके अभिभावकों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए आश्रम के काम की तारीफ ही की. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन पर किसी तरह का दबाव है, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया. वहां की एक कर्मचारी बबली ने बताया, ''मीडिया ने एकतरफा रपटें छापी और दिखाई है. हमारा पक्ष किसी ने जानने की भी कोशिश नहीं की. आप खुद बताएं अगर यहां मसाज जैसे काम होते रहे हैं, तो क्या दूसरे लोग भी अपराधी नहीं सिध्द होते? फिर महिला आयोग ने जिन बच्चियों को निर्मल छाया भेजा, आप खुद उनके कागजात देख सकते हैं. उनके साथ उनके अभिभावकों ने भी अपनी सहमति से जाने की बात लिख कर दी है. यहां आप खुद आए, तो हालात आपके सामने हैं.''

बहरहाल, जब इस संवाददाता ने बाल आश्रम जाकर चीजें देखने का फैसला किया, तो उसे अंदर घुसने की अनुमति नहीं दी गई. सवाल कई हैं, जवाब अधूरे या मुकम्मल नहीं हैं. वैसे, यह कहानी किसी एक गैर-सरकारी संगठन की नहीं है. बटरफ्लाई नाम की एक संस्था में भी एक कर्मचारी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. साथ ही वहां अचानक कई कर्मचारियों की बर्खास्तगी भी विवाद का विषय है. इसी तरह ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नाम की संस्था में एक महिला कर्मी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. इसी तरह जंगपुरा में (जो दिल्ली की महंगी जगहों में से एक है) भी करोड़ों रुपए की संपत्ति को लेकर एक संस्था में खींचतान जारी है. यहां विलियम केरी स्टडी एंड रिसर्च सेंटर और क्रिश्चियन इंस्टीटयूट फॉर स्टडी एंड रिलीजन के बीच तलवारें खिंची हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं मूल रूप से एक ही हैं और एक ही व्यक्ति इनका जनक भी था. मामला यहां भी संपत्ति का ही है.बहरहाल, तालाब की सारी मछलियां गंदी ही नहीं, पर ऐसे उदाहरण इस क्षेत्र के महान उद्देश्य पर सवालिया निशान तो खड़ा कर ही देते हैं. यक्ष प्रश्न तो बचा ही रहता है, क्या ये स्वयंसेवी संगठन अपने मूल की ओर वापस लौटेंगे? क्या लोगों के कल्याण हेतु बनी संस्थाएं उसी काम में लगेंगी? या फिर, यह सिरफुटव्वल जारी रहेगी?

(प्रकाशित स्‍टोरी के लिए देखें दी संडे इंडियन का 21-27 जनवरी का अंक हिंदी में)

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