12/31/2011

12/29/2011

एक ग़ुमनाम कवि की कालजयी कविता


नेल्‍सन मंडेला
कभी-कभार कुछ रचनाएं कालजयी हो जाती हैं जो बरसों तक व्‍यक्तियों और राष्‍ट्रों के लिए प्रेरणा का काम करती हैं। ''इनविक्‍टस'' ऐसी ही एक कविता है, जिसे अंग्रेज़ कवि विलियम अर्नेस्‍ट हेनली (1849-1903) ने लिखा था। इनविक्‍टस का अर्थ होता है अपराजेय यानी जिसे जीता न जा सके। इस कविता से मेरा परिचय मेरे साथी आदित्‍य ने करवाया। उन्‍होंने मुझे ''इनविक्‍टस'' नाम की ही एक फिल्‍म के बारे में बताया जो नेल्‍सन मंडेला के जीवन पर बनाई गई थी। इसके बाद मैंने कविता के बारे में पड़ताल की, तो पता चला कि नेल्‍सन मंडेला ने 27 साल के अपने कारावास के दौरान एक पर्ची पर इस कविता को लिख कर अपने पास सहेजे रखा। मंडेला के मुताबिक यही कविता  थी जिसने उन्‍हें इतने लंबे कारावास के दौरान जि़ंदा रहने का साहस दिया। वे इस कविता को जेल में साथी कैदियों को सुनाया करते थे।


आंग सान सू की
''इनविक्‍टस'' के बारे में बर्मा की जनता की नायिका आंग सान सू की ने लिखा है, ''इस कविता ने मेरे पिता को और उनके समकालीनों को आज़ादी के संघर्ष में प्रेरणा दी है, और दुनिया भर में अलग-अलग वक्‍त पर इसने तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत का काम किया है।''

1875 में लिखी गई इस कविता की प्रासंगिकता आज भी है और कल भी रहेगी, लिहाज़ा हिंदी में इसका अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है। मुझे और कहीं भी इसका हिंदी अनुवाद नहीं दिखा है। अगर किसी के पास ऐसी कोई जानकारी हो, तो साझा करेंगे।


अपराजेय (INVICTUS)
विलियम अर्नेस्‍ट हेनली

ईश्‍वर क्‍या है, ये मैं नहीं जानता
लेकिन शुक्रगुज़ार हूं उसका कि धरती को बेधती मौत की सुरंग तले
पैठे गहरे अंधेरे में चिपटी देह के बावजूद
अजेय है आत्‍मा मेरी।   

हालात के खूंखार पंजों में कैद
ना मैं चीखा ना चिल्‍लाया
बेशिकन रहा चेहरा
चलता रहा किस्‍मत का हथौड़ा सिर पर लहूलुहान हुआ माथा
पर न झुका, न हुआ कभी दोहरा।

दर्द और आंसुओं के सैलाब के उस पार
नाचती हैं मौत की परछाइयां
बरसों से जारी दर्द का ये आलम
पर दहला न सका मुझको
रहूंगा निडर ऐसे ही
हर दम।

फर्क नहीं पड़ता मुझको
हो कितनी भी तंग राह मुक्ति की 
चाहे जितनी भीषण हो नर्क की आग
मैं
मालिक अपनी तकदीर का
अपनी आत्‍मा का सरताज।

12/22/2011

अस्‍सी में काशी, अकादमी में रग्‍घू

काशीनाथ सिंह
काशीनाथ सिंह यानी अस्‍सी के काशी को 2011 का साहित्‍य अकादमी मिल गया, ये अपने आप में अगर बड़ी नहीं तो दिलचस्‍प बात ज़रूर है। अव्‍वल तो साहित्‍य की सरकारी परिभाषा या कहें 'अकादमिक' परिभाषा में काशीनाथ सिंह जैसे लोगों की पूछ और कद्र नहीं होती। दूसरे, नामवर जी ने भी कभी छोटे भाई को, या उनकी किसी कृति को कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी के बीच उस तरह से अपना कंधा नहीं छुआया, जैसा वे अलका सरावगी या आज भी एकाध स्‍वनामधन्‍य नवोदित कवियों के लिए करते आ रहे हैं बतौर सेलिब्रिटी। बावजूद इसके अगर 'रेहन पर रग्‍घू' के लिए ही सही, काशी को साहित्‍य अकादमी दिया जा रहा है तो इसके पीछे अकादमी के प्रति कोई मुग़ालता नहीं पालना चाहिए। पिछले दिनों जिस तरह से अकादमी ने तमाम लोगों को मरने से ठीक पहले या देरी से कमपन्‍सेट किया है, 2011 का पुरस्‍कार उसी कवायद की एक कड़ी समझा जाना चाहिए। बहरहाल, अच्‍छा ही हुआ 'काशी का अस्‍सी' के लिए उन्‍हें अकादमी नहीं मिला, वरना जस्टिस काटजू की बात में वज़न जुड़ जाता कि ग़ालिब को नोबेल दिया जाए।

जिन्‍होंने 'रेहन पर रग्‍घू' नहीं पढ़ी है, उनके लिए नीचे उसकी समीक्षा प्रस्‍तुत है जो 2008 में तहलका हिंदी की वेबसाइट पर छपी थी।  इससे एक तो उपन्‍यास के बारे में आपको अंदाज़ा लग जाएगा, दूसरे एक बात ये साफ होगी कि 'रेहन पर रग्‍घू' दरअसल काशीनाथ सिंह की टिपिकल संवेदना का विस्‍तार ही है, उससे कुछ भी अलग नहीं। अपने कंटेंट में अकादमी ने जाने-अनजाने दरअसल 'काशी का अस्‍सी' को ही पुरस्‍कार दे डाला है, बस भाषा का फ़र्क है।

रेहन पर रग्‍घू: 'तन्नी गुरु' से 'मुड़ीकट्टा' होने का सफ़र

किसी ने सच ही कहा है कि उम्र अपना असर दिखाती है। ऐसा लगता था कि काशीनाथ सिंह के लेखन पर उनकी बढ़ती अवस्था का फ़र्क शायद नहीं पड़ेगा, लेकिन राजकमल से छप कर आया उनका उपन्यास 'रेहन पर रग्घू' इस बात की ताक़ीद करता है कि वास्तव में अब 'जम्बूद्वीप' के काल चक्र से शाम को गायब कर दिया गया है, यहां के निवासियों के चेहरों से हंसी गायब हो चुकी है और 'तन्नी गुरु' का 'मुड़ीकट्टा' होना कोई प्रतीकात्मक व्यंग्य नहीं, उनकी नियति में तब्दील हो चुका है। 'काशी का अस्सी' के विभिन्न संस्मरणों से लेकर पिछली पुस्तक 'घर का जोगी जोगड़ा' में अब तक जो कहानी शहर से शुरू होकर शहर पर खत्म होती थी, वह खत्म तो आज भी शहर पर ही होती है लेकिन उसकी शुरुआत उस गांव से होती है जहां से बरसों पहले लेखक का कुनबा उजड़ चुका है। यकीन मानें कि केंद्रीय पात्र रग्घू यानी रघुनाथ, खुद काशीनाथ से जरा भी अलग नहीं दिखता सिवाय इसके कि लैंडस्केप में जरा-मरा हेर-फेर और तब्दीली कर दी गई है।

एक साधारण स्कूल मास्टर रग्घू का निजी जीवन अपने परिवार से इतर कुछ भी नहीं है। दो बेटे, एक बेटी और एक पत्नी से मिल कर बनी इस पंचमेल खिचड़ी में शुरू से लेकर अंत तक रघुनाथ की नियति को ही केंद्र में रखा गया है। बड़ा बेटा एक कायस्थ लड़की से शादी कर अमेरिका चला जाता है तो छोटा बेटा एमबीए करने के नाम पर दिल्ली में एक तलाकशुदा महिला के साथ रहने लगता है। बचती है बेटी जो अब कॉलेज में लेक्चरार हो गई है, सो उसने शादी के लिए इंकार कर बाप की सारी कवायद पर पानी फेर दिया है। उसे प्रेम भी हुआ है तो एक ऐसे दलित अफसर से जिसके रिश्तेदार गांव में रग्घू के ही नहीं उसके पुरखों के भी करनिहार रहे हैं। इन तमाम पारिवारिक त्रासदियों के बीच रघुनाथ का अकेला साथी बचा है झब्बू पहलवान, लेकिन नागपंचमी की एक रात दलितों के टोले में उसकी भी हत्या हो जाती है। झब्बू का बाहुबली साया सिर पर से उठ जाने के बाद रग्घू की जमीन पट्टीदारों के झगड़े में फंस जाती है जिससे निजात पाने के लिए उन्हें शहर का रास्ता सूझता है। यह भी संयोग ही है कि अमेरिका से उनकी बहू बीएचयू में लेक्चरार बन कर वापस बनारस आ जाती है और चाहती है कि सास-ससुर साथ रहें। खुलासा बाद में होता है कि उनके बेटे ने किसी और से शादी कर ली है। काफी सकुचाते हुए मिस्टर एंड मिसेज रग्घू पहुंचते हैं बनारस की अशोक विहार कॉलोनी स्थित अपनी बहू के घर, जहां सास-बहू के सनातन तनाव के चलते मिसेज रग्घू की पटरी बहू के साथ नहीं बैठ पाती और वे बेटी के यहां मिर्जापुर चली जाती हैं। इसके बाद उपन्यास में इस पात्र का जिक्र नहीं है।

जिस गांव को रग्घू पीछे छोड़ आए, वहां बदलाव की बयार बह रही है। दलितों का सशक्तीकरण हुआ है, उन्होंने ठाकुरों-बामनों के यहां काम करने से इनकार कर दिया है। इस स्पेस को भरने के लिए ठाकुरों के करीब यादव आ गए हैं और नया जातीय समीकरण उभर रहा है। उधर जिस शहर में रग्घू गए हैं, वह मोहल्लों-महालों का नहीं बल्कि कॉलोनियों, विहारों और नगरों का शहर बन चुका है। ये वही शहर है जिसके बारे में काशीनाथ ने पहले लिखा है 'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो'। यह लुटा हुआ बनारस है,  जहां विहारों और कॉलोनियों में बसते हैं रिटायर्ड बूढ़े और अपंग, जहां रोजाना दिनदहाड़े किसी वृद्ध के लुटने-पिटने और डकैती-हत्याओं की खबर आम हो चुकी है, जहां हंसी गायब है, जहां तमाम किस्म की असुरक्षा के बीच सिर्फ गांव की स्मृतियों को बचाने की कवायद जारी है। यहीं रग्घू को बरसों बाद अपना एकाकी साथ मिलता है जो बहू के साथ दोस्ताना संबंधों के चलते सजीव हो उठता है, लेकिन गांव की ज़मीन उनका पीछा यहां भी नहीं छोड़ती। अपनी ईमानदारी और भलमनसाहत से ऊब चुके रघुनाथ के मन में अंत समय में खल पैदा होता है। जमीन के कागज़ात पर जबरन दस्तखत करवाने आए दो गुंडों के साथ सौदा कर वे अपना अपहरण करवा लेते हैं, और देखिए कि यह सुख रग्घू के लिए कितना अप्रतिम है-

'रघुनाथ जब छड़ी के सहारे बाहर आए तब उनका चेहरा बन्दरटोपी के अंदर था और रजाई लड़के के कंधे पर! वे आगे-आगे, दोनों अपहर्ता लड़के पीछे-पीछे- जैसे वे बेटों के साथ मगन मन तीरथ पर जा रहे हों।'

उपन्यास 'रेहन पर रग्घू' का आख्यान जितना सपाट दिखता है, उतना है नहीं। इसमें समूचे समाज में हो रहे बदलावों की खतरनाक आहटें हैं जो लेखक के नज़रिये से या कहें रघुनाथ के तटस्थ नज़रिये से भले ही सकारात्मक जान पड़ती हों, लेकिन जो समाज में सामूहिकता और सहकारिता को तोड़ने वाली साबित होती हैं। जहां व्यक्ति अकेला, और अकेला पड़ता जाता है। जहां सीधे-सपाट जीवन का अंत आत्मघात से बेहतर नहीं सूझता- बता दें कि उपन्यास की शुरुआत जिस अध्याय से होती है वही अध्याय उसका अंत भी होता है, जिसमें रघुनाथ आखिरकार खुद को मुक्त करने के लिए सचेतन तौर पर आत्महत्या न सही, तो बेफिक्री के आलम में जर्जर शरीर लिए तूफान में निकल पड़ते हैं। इसे हम विशुद्ध बनारसी ठाठ कह कर भी पल्ला झाड़ सकते हैं, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। खुद का अपहरण करवाना इसी प्रवृत्ति का एक भिन्न संस्करण मात्र है।  

शुरू से लेकर अंत तक कथाक्रम को विभिन्न उपाख्यानों के माध्यम से काफी दिलचस्प बनाया गया है- मसलन, रघुनाथ की बेटी का हिंदी के एक बूढ़े मास्टर के साथ प्रेम प्रसंग आदि। स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में भी एक अविवाहित महिला पात्र के माध्यम से विमर्श की कोशिश की गई है, लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि वह केंद्रीय विषय से कहीं भी विचलन है। भाषा तो खैर वही ज़मीनी और बनारसी लहजे वाली है, जिसे हम काशीनाथ सिंह की 'ब्रांड' भाषा कह सकते हैं।

जैसा कि महाश्वेता देवी कहती हैं, काशीनाथ सिंह सीधे-सादे हैं 'तीसरी कसम' के हीरामन की तरह- ठीक यही बात उपन्यास के केंद्रीय पात्र रघुनाथ पर भी लागू होती है। दरअसल,  यह रघुनाथ कोई और नहीं बल्कि देश भर की उस बुढ़ाती पीढ़ी का प्रतिनिधि है जो पिछले एक दशक में आई नवउदारवादी संस्कृति की आंधी में आत्मघात करने को अभिशप्त हो चला है। सीधी पटरी पर चलने वाले जीवन का अचानक इस दौर में अप्रासंगिक हो जाना ही रेहन पर जी रहे रग्घू की नियति है। यह दुनिया उसके लिए ऐसी टूटी मुंडेर है जहां से नीचे गिरना तय है...देरी है तो बस इस बात की कि लड़खड़ाते समय की चूल कब पूरी तरह उखड़ पाती है।
यहां भी पढ़ें

12/19/2011

अब कौन ले जाएगा हमें चमारों की गली?

22 अक्‍टूबर 1947 - 18 दिसंबर 2011
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बांहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए सरपंच के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोइरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ ना पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

12/15/2011

बनारस: एक भ्रम, एक सवाल, एक उधार


मैं पांच दिन के बाद बनारस से लौट रहा हूं। ठीक पांच दिन पहले बनारस लौटा था। दोनों ही स्थितियों में फर्क है। मन:स्थिति का फर्क। जब तीन बरस बाद इस नौ को बनारस लौटा, तो बेहद बेचैन था। बेचैनी का आलम ये कि रात एक बजे घाट चला गया और भोर होने तक वहीं रहा। बनारस में दरअसल कुछ है नहीं, जो बेचैनी को हर सके। रोहित जोशी को जब पहली बार मलइयो का स्‍वाद चखाया, तो उन्‍होंने बड़े काम की बात कही कि मलइयो की ही तरह एक भ्रम है बनारस। वास्‍तव में। दरअसल, जिस भ्रम में हम बड़े शहरों की आपाधापी में जीते हैं, उस भ्रम से बिल्‍कुल अलग किस्‍म का भ्रम है बनारस।

मसलन, बनारस आपको गति का अहसास देता है। मैं टंडन जी की दुकान पर लंका पहुंचा तो वे दिखे नहीं, उनका लड़का था। मैंने पूछा टंडन जी कहां हैं। उसने बताया कि वे बीते जून गुज़र गए। बीबीसी पर भी खबर आई थी, आपने सुनी नहीं? मैं झेंपा। एक भ्रम टूटा, लगा कि जीवन किसी के नोस्‍टाल्जिया के लिए ठहरता नहीं। भीतर घुसा विश्‍वविद्यालय में तो सब कुछ भ्रम के मुताबिक था। स्थिर। वैसा ही, जैसा नौ बरस पहले छोड़ आया था। लौटती में सिंहद्वार नहीं दिखा। उसकी जगह दाहिने हाथ पर दो बहुमंजिला इमारतें सिर ताने खड़ी थीं। सिंहद्वार बौना हो चुका था। अचानक याद आया, 'मधुर मनोहर अतीव सुंदर ये सर्वविद्या की राजधानी।' लगा कि वक्‍त आगे बढ़ चुका है, मैं ही भ्रम में था।

अस्‍सी पहुंचा। दो भ्रम टूट चुके थे, किसी भी साक्षात्‍कार के लिए तैयार था। कल्‍पनाएं आकार ले चुकी थीं। फिर झटका लगा। मनोज की दुकान यानी पप्‍पू की चाय की दुकान जस की तस थी। अस्‍सी पर मिट्टी के ढूहे बिल्‍कुल पानी उतरने के बाद जैसे पहले बचे रह जाया करते थे, वैसे ही थे। घाट पर व्‍यास महोत्‍सव चल रहा था। कोई हरियाणवी गीत बज रहा था जो अस्‍सीवासियों की समझ में नहीं आ रहा था। सीढि़यों पर ही चाय की गुमटी लगाने वाले ने डेक पर बिस्मिल्‍ला खान की शहनाई बजा कर उसे चुनौती दे डाली। शहनाई पर राग बागेश्‍वरी टाइप कुछ बज रहा था और सीढि़यों पर वही डांस चल रहा था जो मैंने पहली बार अपने एक मुसहर दोस्‍त की शादी में देखा था। बगल में भौकाल चाट वाला दो अंग्रेजिनों से मजा ले रहा था टमाटर का चाट खिला कर। कुछ भी तो नहीं बदला था।   

बदला था तो अंधरा पुल और पांडेपुर। दो नए फ्लाईओवरों को समेटी पुरानी सड़कों पर जाम की नई संभावनाएं पैदा हो गई थीं। फ्लाईओवर हर शहर को सूट नहीं करते। जब पांडेपुर का फ्लाईओवर शुरू नहीं हुआ था तो लोग उसका इस्‍तेमाल गर्मियों में हवा खाने के लिए करते थे। मामला उपयोग मूल्‍य का है। और हां, अंधरा पुल पार करते ही बाएं हाथ पर ऑटोमोबाइल्‍स की दुकानों की जो कतार है, उनमें से एक दुकान गायब थी। सिंधी ऑटोमोबाइल्‍स। यही वो दुकान थी जिस पर खड़े होकर मैं बलुआघाट और धौरहरा की बसों का इंतज़ार किया करता था, क्‍योंकि उसी एक दुकान पर टीवी हुआ करती थी। पानी का फिल्‍टर भी था। पानी पी-पी कर दुकानदार अंकल का खून जलाता था। वो दुकान अब यहां नहीं है। ये तब की बात है जब कैंट स्‍टेशन पर बस मालिकों के बीच गोली चलने के बाद बस अड्डे को अंधरा पुल पर शिफ्ट कर दिया गया था। शायद 1993...

बहरहाल, बनारस में वरुणापार, या कहें कैंट के आगे ही हमेशा तस्‍वीर बदली होती है। वरना मैदागिन से लेकर चौक, बांसफाटक, बुलानाला और गोदौलिया के पास न तो जगह है नएपन के लिए, न ही वक्‍त। ऐसा लगता है कि एक शहर है जो अपने कुछ बाशिंदों को समेटे हुए मरने को अभिशप्‍त है। एक हिस्‍सा बदलाव को रोक कर मरे जा रहा है, दूसरा बदलाव को अपना कर। बीच का कुछ भी नहीं है इस शहर में। और यहीं पैदा होता है भ्रम। स्थिरता और गति के बीच का भ्रम। आप स्थिर हैं तो भी भ्रम होगा। गतिमान हैं तब भी।

गोया भ्रम एक ऐसा सवाल हुआ जिसे पकड़ पाना ही मोक्ष हो। सूत्र यहीं से निकलता है। एक संन्‍यासी अपनी आजीविका के लिए दिन भर बैठ कर मोबाइल रखने वाला कपड़े का केस सिलता है। दूसरी ओर एक झालमुडी वाला छोटा सा खोमचा इस उम्‍मीद में लगाए बैठा है कि कोई तो आएगा। दिन के अंत में उसके पास लाई का एक दाना नहीं बचता और वो जी जाता है उसी के भरोसे। ये भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का कोई लफड़ा है। कुछ मेंटल केस है बनारस।

मणिकर्णिका पर हम लोग खड़े थे। एक चिता के पास से अचानक आवाज़ आई... एक लात मारा साले के...। मुर्दे का कोई अंग अटक गया था चिता में। कोई सलाह दे रहा था डाक्‍टर को कि एक लात मारे, सीधा हो जाएगा (डाक्‍टर यानी श्‍मशान घाट पर काम करने वाला डोम)। हमारे साथी बड़े दुखी हुए कि बताइए, यहां मरने के बाद भी इंसान की इज्‍जत नहीं है। गाली दे रहे हैं मुर्दे को...। क्‍यों करे वो शहर किसी मुर्दे की इज्‍जत जो उसकी पैदाइश से ही उसका मोल जानता है? कुल मिला कर मामला दो मन लकड़ी का ही है न, आप चाहे कहीं के कलेक्‍टर हों।

मेरे पहले वाले भ्रम दूर हो चुके हैं। कुछ नए भ्रमों के साथ ट्रेन में बैठा हूं। दिमाग बिल्‍कुल अंतरिक्ष हुआ पड़ा है। खाली समझिए तो भी ठीक, भरा समझे तो भी। फिलहाल बेचैनी तो नहीं ही है, हां, लौट जाने का अफसोस भी नहीं। बनारस हर बार कुछ न कुछ उधार चढ़ा देता है। इस बार यही सही... ।  

उड़ जाएगा हंस अकेला...

12/09/2011

तीन साल बाद बनारस: फिर बैतलवा डाल पर



आज रात 12 बजे मैं पटना से मुग़लसराय अपने तीन साथियों के साथ पहुंचा। मुग़लसराय को कभी बनारस से जुदा नहीं मान सका, सो गिरते ही चाय पीकर सबसे पहले पान दबाया। वही रस, जो नौ साल पहले छोड़ आया था। खरामा-खरामा कोहरे की चादर को चीरता हमारा टैम्‍पू पहुंचा मैदागिन में पराड़कर भवन, जहां रिहाइश का पहले से तय था। आवाज़ लगाई, तो चुन्‍नू जी बाहर आए। पूरे स्‍नेह के साथ उन्‍होंने कमरा दिखाया। काशी पत्रकार संघ के योगेश जी को सूचना दी कि हम सकुशल पहुंच गए हैं और कुछ पेट पूजा के लिए चौक की तरफ निकल रहे हैं।

रात का सवा एक और सड़कों पर दूध वाले, पुलिस वाले घूमते हुए। अचानक परांठे की तेज़ खुशबू आई। साथियों को उम्‍मीद बंधी कि कहीं कुछ पक रहा होगा। मैंने बताया कि बनारस की सड़कों पर ऐसी गंध आना आम बात है, ज़रूरी नहीं कि जो पक रहा है वो दिख ही जाए। बहरहाल ऐसा ही हुआ। सिर्फ चाय-पान की दुकानें खुली हुईं, भोजन से कुछ मिनट की देरी से चूक गए। शारदा भोजनालय में बरतन मांजे जा रहे थे। बगल में एक चाय की दुकान से तेज़-तेज़ आवाज़ें आ रही थीं, '... देखिए विचारधारा की जहां तक बात है, संघ के लोग...', और आवाज़ कोलाहल में बदल गई। हम घाट की ओर बढ़ते गए और रात दो बजे चल रही एक वैचारिक बहस से चूक गए।  घाट पर निस्‍तब्‍ध शांति थी, एक ही चौकी पर एक छतरी के नीचे एक आदमी और एक कुत्‍ता बराबर सो रहे थे, जैसे बरसों का रिश्‍ता हो। सन्‍नाटे को चीरती किसी नाव के भीतर से दो अदृश्‍य लोगों के फुसफुसाने की आवाज़ आ रही थी, '...हम कहली कि कोतवाली क भौकाल हम्‍मे मत दा...।'

हमने सोचा लौट कर चौक पर ही कुछ खाएंगे। जिस दुकान से बहस की आवाज़ें आ रही थीं, हम वहां पता करने गए कि क्‍या कुछ खाने को मिलेगा। भीड़ उतनी ही थी, लेकिन एक पक्ष शायद कूच करने की मुद्रा में था। अचानक धोती-कुर्ता और बंडी पहने एक अधेड़ पंडितनुमा जीव वहां से शुभ रात्रि कह कर निकलने लगे। सवा दो बज चुके थे। पीछे एक दाढ़ी वाले जवान सज्‍जन दिखे जिनसे वे कुछ देर पहले उलझे हुए थे। पंडितजी के मुड़ते ही उन्‍होंने बगल में खड़े दशाश्‍वमेध घाट के एसओ से कहा, 'आज फिर गुरुजी पेलाने से बच गए।' और ज़ोर का सामूहिक ठहाका लगा।

चौक की ओर लौटते वक्‍त हमने सोचा कि मक्‍खन टोस्‍ट से ही काम चला लिया जाए। बिल्‍कुल मणिकर्णिका की गली के सामने बेंच पर बैठे ही थे कि पीएसी की एक ट्रक में भरकर पुलिसवाले आए। शायद शिफ्ट चेंज का टाइम था। ये यहां नियमित होता है। बरसों से होता आया है। तीन राउंड टोस्‍ट और तीन चाय से मन तो नहीं भरा, हां पेट ज़रूर भर गया। ऐसा टोस्‍ट बनारस के अलावा मैंने कहीं नहीं खाया। पहले लंका पर टंडन जी के यहां खाता था। बरसों बाद मक्‍खन की वो परत ज़बान पर चिपकी थी। हमारे साथियों ने भी मक्‍खन लगाने के उस उदार अंदाज़ को तीन राउंड खाकर सम्‍मान दिया।

आगे बढ़ते ही पान की बारी थी। बेहद करीने से, बनारसी संस्‍कार में पगा पान खाकर साथी मदमस्‍त हुए। मैंने पूछा कि मलइयो कितने बजे मिलेगा। साथियों को मलइयों के दर्शन से रूबरू करवाया। सभी ने तय किया कि दो घंटे बाद साढ़े पांच बजे मलइयो खाने वापस आना है, फिलहाल कमरे पर चलते हैं। कमरे पर पहुंच कर सभी सोए हुए हैं। रात के साढ़े तीन बजे कुमार विजय ने चैट पर पूछा कि मैं पहुंच गया हूं क्‍या, मैंने उन्‍हें निश्चिंत किया और कल मिलने की बात कही। फिलहाल जग रहा हूं और साथियों के जल्‍दी जगने का इंतज़ार कर रहा हूं। अब पांच बजने वाला है। नींद नहीं आ रही। क्‍या करूं... बनारस से निकला आदमी आखिर कहां जाए? 

12/05/2011

किशनजी पर नवारुण भट्टाचार्य की एक कविता

बांग्‍ला के कवि नवारुण भट्टाचार्य ने माओवादी नेता किशनजी की हत्‍या पर एक कविता लिखी है जिसका अनुवाद कृपाशंकर चौबे ने किया है। यह कविता हमने चंद्रिका के ब्‍लॉग 'दखल की दुनिया' से उठाई है। अनुवाद कैसा है, इसका तो नहीं पता लेकिन विषय की गंभीरता, काव्‍यात्‍मक हस्‍तक्षेप की तात्‍कालिकता और हिंदी कविता में फैले अकाल के लिहाज से इस कविता को पढ़ना ज़रूरी हो जाता है। बांग्‍ला का मूल पाठ हमें नहीं मिल सका है, लेकिन जो भी हिंदी में आया है वो अपनी बात कह जाता है। कविता का शीर्षक है 'गौरैया'।



गौरैया


शराब नहीं पीने पर भी
स्ट्रोक नहीं होने पर भी
मेरा पांव लड़खड़ाता है
भूकंप आ जाता है मेरी छाती और सिर में

मोबाइल टावर चीखता है
गौरैया मरी पड़ी रहती हैं
उनका आकाश लुप्त हो गया है
तस्करों ने चुरा लिया है आकाश

पड़ी रहती है नितांत अकेली
गौरैया
उसके पंख पर जंगली निशान
चोट से नीले पड़े हैं होंठ व आंखें
पास में बिखरे पड़े हैं घास पतवार, एके फोर्टिसेवेन
इसी तरह खत्म हुआ इस बार का लेन-देन

ज़रा चुप करेंगे विशिष्ट गिद्धजन
रोकेंगे अपनी कर्कश आवाज़
कुछ देर, बिना श्रवण यंत्र के, गौरैया की किचिर-मिचिर
सुनी जाए।

12/04/2011

The Dirty Picture Review

'Silk' without worms preferred!
 

Can you guess the best asset of Vidya Balan? Yes, not her 'assets', but her mature and suggestive looks that make her beautiful yet completely misfit for doing a character like 'Silk'. In the last two days, I watched Silk Smitha extensively on Youtube, right from 'Sadma' to 'Reshma Ki Jawani' (and a horrible song with Shakti Kapoor titled Bango Bango Bango) and believe me, the basic problem with TDP comes out to be the cultural difference that creates a Vidya Balan and a Silk Smitha! Let me explain it!

It's not at all about acting because we expect it by default from Nasiruddeen Shah, Vidya Balan and a little bit from Imran Hashmi too (Sorry, can't lie about Tushaar)! TDP is all about acting and recreating the 80's Tamil cinema, but when you have resources and good actors, then this can't be the decisive factor. Just recall the Madrasi characters of Ramgopal Verma (Silver Mani in 'Sarkar' and a Tamil film producer in 'Agyaat', who continously keeps his mouth open saying bizarre ayyoda). Or for that matter the south Indian gangster of Anurag Kashyap in 'The Girl in Yellow Boots'. Yes, nakamaka, nakamaka... gives pace and ambience to kickstart a south based story, but it's not all about jumbling words; neither asking for dosa everytime you feel like eating something. It's essentially about the language, the accent that justifies costumes,  locations, dark faces, vermillion and other cultural symbols etc. Just think for a moment who connects with TDP? Is he/she a Tamil? No, because the film is in Hindi. So? A viewer from Hindi belt? Never, because the space-time is South Indian, except language! How pathetic it was to hear 'aapattijanak' from Tamil storywriter Ramakant's (Tushar) mouth? Or, the Hindustani diction of Tamil superstar Suryakant (Nasiruddeen Shah)? This may fit into a Hyderabadi landscape at most, but not in the Dravidian socio-cultural scenario that has witnessed a strong anti-Hindi movement over years.  And in fact, the same movement has at times proved to be the catalyst for South Indian film industry!

So, neither north Indians nor south Indians have a logic to connect with TDP. Then why people are rushing towards it? That's just for the same reason that made a Reshma 'Silk'. Combined with a powerful promo campaign and colorful Savita bhabhi type posters, with a catchy title, convincing faces and a loud music score, (that's downloadability is almost as sure as the mobile phones' penetration into urban India) it's not hard to realise 30 crores before release. The story that started Friday was just topping, and people gustling towards cinemas with their families to watch an 'A' rated movie were lured with the same elements that had recovered the production cost before the first show. Rest is just subjectivity, if you may like to call it thus. Everyone just repeating classy dialogues (the same ones that were shown in promos) after the show, but none talking about those "hot" and "dirty" scenes that lured them to cinemas! It's because....it's  because....what I said at the start... best assets of Vidya Balan are her mature and suggestive looks that make her beautiful yet completely misfit for doing a character like 'Silk'. What may be called the really bold scene (where 'Silk' in hot chilly red costumes is trying to seduce herself on a bed) looks like a classic 'Lux' ad! Throughout the film, camera focusses on Silk's assets, beeline etc., but the film viewer has a different focal point. In fact, the focal point of a viewer keeps on changing so rapidly that the camera fails to convince him and Vidya Balan constantly dominates over her character. If she is now thinking of an image makeover after TDP, someone must come to her rescue. Because it will not be the masters like Nasiruddeen Shah next time! And moreover, if it is true that "filmein sirf ek hi wajah se chalti hain...entertainment, entertainment, entertainment...", then the other side too, that Vidya Balan is not entertainment!

So this was all about actor Vs. character. Now come to the storyline. I, as a common filmviewer,  do not know about 'Silk' before her star life. Whatever is told to me on the screen makes an initial impression of what the character is all about. A girl, fled away from her home one day before her marriage, entering into a metropolitan city is a situation that needs some detailing and description. Instead, the director leads us to a bedroom where a middle-aged couple is engaged in sex and the central character working as their maid is giving background music. Now, this is something like representative pleasure, a vice that instantly hits the viewers' mind! Wasn't this avoidable? Another shot just after that where Reshma says to Amma, "Amma, tumhaari imarat dekh kar lagta hai ki kitne mazdooron ne is par kaam kiya hoga". What does the director wants to portray? What's his priority? Dialogue or character? Remember both are correlated. So the representative sex scene and these type of 'bold' dialogues form the initial character of Reshma. And remember, all this before entering the film indusry!

So, when the celeb magazine editor Naila choses to write her as 'beemaari' instead of 'bechaari'; when Suryakant says, 'aisi ladkiyan ghar mein le jaane layak nahin hoti hain'; when her mother shuts the door in front of her; or she has to hide in the bathroom when Suryakant's wife Radhika comes in abruptly; we don't feel bad, we don't feel sympathetic too. It's rather pathetic, for the simple reason that the director didn't left any space for the viewers to feel senti. This is due to the faulty character building of Reshma, where 'Silk' could never justify her claim, if it is, that she was the victim of that dirt and filth prevalent in the industry, that provoked Silk Smitha to commit suicide. A conscious viewer will naturally compare this situation with that of Fashion, where there is no such crisis because the character building of protagonist is strong, full of attitude, ambitious and "never say die" sort of thing, that leads her back into normalcy after a long spell of depression. Here it is not so (firstly due to the story that is based on reality, which is by default), but at least the suicide must be made justifiable for viewers. Just one weird incident and lo! Why should not we prefer the convincing death of Shonali (Kangna Ranaut) over Silk? The process through which an individual reaches to the conclusion of suicide is portrayed at its best in Fashion, and then the burden lies with the system that has watched silently. How can we morally shift the burden of Silk's suicide on the system (here film industry) if there is nothing to be put up in contrast?

There is always a question of morality embedded within. If the suicide of central character does not arouse rage towards the system in a common viewer, then that death is a waste. Although, here is a point! This also may be the central idea and a very strong one too, that a character remains cursed after its death. But proving a death meaningless and waste requires mettle of a different nature that you can't expect from the Luthria-Kapoor combo (And these two are not even responsible for that, when Imtiyaz Ali can create a confusion named "Rockstar"). Everything else has been said elsewhere in reviews. "The Dirty Picture", if it is all about acting (that is very much expected of such a strong crew), dialogues (expected Luthria style) and Vidya Balan's beauty (don't utter a word), is I think an average act in wholesome.

Imagine a situation where you have just Nasiruddeen Shah, Imraan Hashmi and Vidya Balan standing on heaps of dollars. Do we need then a Milan Luthria or Ekta Kapoor, or for that matter any 'Silk' to make a nice film? Morale of the story: 'Silk' without worms preferred!

(Abhishek Srivastava)


12/02/2011

कृपया वाक्‍य सुधारें

ऐ लाल फ़रेरे तेरी कसम, हिंदी कभी सही नहीं लिखेंगे हम: फ़र्जी मुठभेड़ में माओवादी नेता किशनजी
की हत्‍या के खिलाफ़ बंग भवन के बाहर शुक्रवार को हुआ प्रदर्शन
ज़रा ज़ूम कर के देखिए: बैनर मुड़ा नहीं, बिल्‍कुल तना हुआ है
अर्थ का अनर्थ: ये गलती पेंटर की है!


11/30/2011

व्‍यालोक का नया 'मौन'




चांद है टूटा हुआ या,

कि उफ़क़ पर माहताबी...

रात है सर ओढ़ कर चुपके

दुलाई में समाई...


टिमटिमाते हैं ये तारे...

हर तरफ है मौन छाया...

चल रहा चुपचाप मैं बस...

हमनफ़स कोई न आया...


एक टूटा सा हुआ पुल...एक मद्धम सा चुका सुर...

एक ट्रक दोनों तरफ है, एक कुछ बीता हुआ है...

मैं खड़ा हूं बीच धारे, जाऊं तो जाऊं कहां मैं...


याद आती है कहानी, मां मुझे जो थी सुनाती....

लोरियों के बीच थपकी, दे मुझे जो थी सुलाती....

वह कहानी भूल कर भी, मां मुझे है याद आती...


अब हूं इतनी दूर आया, मैं नहीं हूं लौट सकता,

मां मुझे वापस बुला ले, मैं तेरी गोदी में आया.....

रात का गहरा है साया, हर तरफ सन्नाटा छाया,

है कहीं कोई न चिड़िया, ना कोई आदम है पाया...


मैं अकेले पुल पै बैठा, देखता हूं रात को बस...

चीखती लहरों को बैठा ताकता मैं मौन हूं बस...


मौन है अंदर से उपजा...

मौन मेरे उर में पैठा....

क्या इसे मैं नाम भी दूं......

नाम ही जब मौन इसका......




11/27/2011

सुल्‍तान बलबन नहीं, बलबन बाबा

बलबन बाबा: महरौली के बियाबान में सुल्‍तान बलबन की सुनसान मज़ार
अनुभव कभी-कभार इतिहास को धोखा दे देता है। ये बात मुझे हाल में पता चली जब मैं घूमते-टहलते कुतुबमीनार के पीछे महरौली के जंगलों में पहुंच गया। यहां मिली सुल्‍तान बलबन की मज़ार। वही बलबन, जो गुलाम वंश का नौवां शासक था, जिसने खुद को दिल्‍ली का सुल्‍तान घोषित कर दिया था, उसके बावजूद जब बाबा फ़रीद के सामने जाता तो सिर नवा के अपराधी की तरह खड़ा हो जाता था।

मुझे वहां एक गार्ड ने बताया कि बाबा बलबन इस जंगल की रक्षा करते हैं। मैंने पूछना चाहा कि बाबा कहने का क्‍या संदर्भ, लेकिन चुप रहा। उसने मुझसे कहा कि जाने से पहले माथा टेकते हुए जाना मज़ार पर। मैंने तस्‍वीरें उतारने के बाद उसके सामने वैसा ही किया। और अचानक क्‍या हुआ बताऊं....

सिर टेकने के बाद उठाते ही इत्र की एक भीनी सी खुशबू आई। वो मुस्‍कराया। उसने कहा, मैंने कहा था न, माथा टेकते हुए जाना।

मुझे समझ नहीं आया। मैं जाकर वहां कुछ सूंघने की कोशिश करने लगा। कोई महक नहीं। फिर मत्‍था टेका। उठाते ही दोबारा वही खुशबू।

क्‍या मैं धोखे में था... पता नहीं। कम से कम दो दर्जन बार मैंने यही काम किया। जहां-जहां मत्‍था टेका, वहां-वहां नाक सटाकर सूंघा भी, लेकिन नतीजा हर बार एक ही। सूंघने पर कुछ नहीं, मत्‍था टेकने पर खुशबू।

बलबन के बाबा बनने का आखिर क्‍या यही राज़ है... कोई मुझे बतलाए... जाए, वहां एक बार होकर आए।

तस्‍वीरें झूठ नहीं बोलतीं...

पोस्‍टमॉर्टम के दौरान खींची गईं माओवादी नेता किशनजी की ये तस्‍वीरें आज सुबह  सर्कुलेट हुई हैं। अब तक वरवरा राव समेत किशनजी की भतीजी, उनकी मां और मुख्‍यधारा की राजनीति के कई नेताओं ने आरोप लगाए हैं कि किशनजी को पुलिस मुठभेड़ में नहीं मारा गया (जैसा कि सरकार का दावा है), बल्कि बिल्‍कुल चेरुकुरी आज़ाद की तर्ज़ पर गिरफ्तार कर के प्रताड़ना दी गई और फिर मारा गया। इन तस्‍वीरों के आने से पहले ये महज़ आरोप कहे जा सकते थे, लेकिन नीचे दी गई तस्‍वीरों को देखने के बाद भी कुछ कहने की ज़रूरत रह जाती है क्‍या ...????  




11/26/2011

निज़ामी बंधुओं की आवाज़ में कुन फ़याकुन लाइव


बीती जुमे रात यानी 24 नवंबर को कव्‍वाल चांद निज़ामी और उनके भाइयों ने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर रॉकस्‍टार की मशहूर कव्‍वाली कुन फ़याकुन की विशेष प्रस्‍तुति की।

चांद निज़ामी और उनके दो भाइयों को आपने रॉकस्‍टार वाली कव्‍वाली में स्‍क्रीन पर तो देखा होगा, लेकिन आवाज़ उनकी नहीं थी। कैसा लगता है एक कव्‍वाल को जब उसे कोई और आवाज़ दे, वो भी दरगाह के सामने शूट की गई एक कव्‍वाली पर ? ये सवाल हम चांद भाई से एक दिन ज़रूर पूछेंगे, लेकिन इसे हमारी बदकिस्‍मती ही कहिए कि इससे पहले पेश की गई सारी कव्‍वालियां रिकॉर्ड हो गईं, पर फ़याकुन की बारी आने से ऐन पहले कैमरे की बैटरी ने दम तोड़ दिया।

एक मोबाइल ही बचा था, लेकिन आधे रास्‍ते में वो भी बोल गया। जो कुछ बचा खुचा था, मैंने उसे जोड़-जाड़ कर दिखाने की कोशिश की है और यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिया है।

उसका लिंक मैं यहां डाल रहा हूं।

फिल्‍मी कव्‍वाली और इस लाइव कव्‍वाली में एक फर्क पैदा करने के लिए मैंने शुरू की पांच लाइनें फिल्‍म से ली हैं और उसके बाद लाइव का ट्रांजीशन है। खराब रिकॉर्डिंग और तकरीबन ना के बराबर एडिटिंग के बावजूद चांद बंधुओं की आवाज़ को सुनकर एक पुरानी कहावत का मतलब ज़रूर समझ में आ जाता है... जिसका काम उसी को साजे।

और हां, एक आखि़री और ज़रूरी बात... सारी रामायण खत्‍म हो जाने के बाद ज्ञान हुआ कि जिसे हम इतने दिनों से 'फ़ायाकुन' कहते आ रहे हैं, वो दरअसल 'फ़याकुन' है। 'फ़' और 'य' के बीच 'आ' कार नहीं है। इस जानकारी के लिए मैं असमा सलीम जी को शुक्रिया देना चाहूंगा जिन्‍होंने वक्‍त रहते मुझे दुरुस्‍त कर दिया। मैंने अपनी पिछली पोस्‍ट में इसे ठीक कर दिया है, लेकिन अख़बार में जो छप गया उसके लिए अफ़सोस ही जताया जा सकता है।
  

11/22/2011

फ़याक़ुन का जादूगर

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह: जो है तुझमें समाया वो है मुझमें समाया
या निज़ामुद्दीन औलिया, या निज़ामुद्दीन सरकार
कदम बढ़ा ले, हदों को मिटा ले
आ जा खालीपन में पी का घर तेरा
तेरे बिन खाली आजा खालीपन में
रंगरेज़ा, रंगरेज़ा
रंगरेज़ा, रंगरेज़ा

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पर लिखी गई फि़ल्‍मी कव्‍वालियों में सबसे खूबसूरत कव्‍वाली की ये पंक्तियां है। बताने की ज़रूरत नहीं कि रॉकस्‍टार फिल्‍म में अगर कुछ भी देखने लायक है तो यही एक कव्‍वाली है। मेरे अधिकतर मित्रों को लगता है कि पूरी फिल्‍म में से अगर इस कव्‍वाली के सीक्‍वेंस को निकाल दिया जाए तो फिल्‍म में जो मैजिक का एक एलेमेंट है, वो खत्‍म  हो जाएगा। जब ये सीक्‍वेंस आता है, तो ऐसा लगता है कि नंगी आंखों से दरगाह जितनी खूबसूरत दिखती है, उसे सौ गुना खूबसूरत बना दिया है कैमरे ने। क्‍या ये इम्तियाज़ अली का जादू है... या फिर उनके कैमरामैन का। क्‍या ये कामिल के बोल हैं या रहमान का संगीत... फ़याकुन का जादू कहां से पैदा होता ?

आइए आपको मिलाते हैं इस मैजिक के पीछे खड़े शख्‍स से जिसका नाम है सैयद अफ़सर अली निज़ामी। निज़ामी साहब दरगाह के इनचार्ज हैं। पिछले साढ़े सात सौ साल से इनका खानदान दरगाह की सेवा करता आ रहा है। हज़रत निज़ामुद्दीन की बहन के खानदान से आते हैं निज़ामी साहब। दरगाह की गद्दी पर बैठे हुए करीब दो दशक होने को आए। पाकिस्‍तानी मंत्री  हिना रब्‍बानी खार की जि़यारत हो या रॉकस्‍टार की शूटिंग, सब कुछ निज़ामी साहब की मंज़ूरी से होता है। और अगर आज फ़याक़ुन हमारे सामने है, तो इन्‍हीं के चलते, वरना इम्तियाज़ अली ने जो ग़लती की थी, वो कभी यहां शूट नहीं कर पाते।

सैयद अफ़सर अली निज़ामी: फ़याक़ुन का जादूगर
निज़ामी साहब बताते हैं कि जब उन्‍होंने पहले पहल ये कव्‍वाली सुनी तो इसमें हज़रत औलिया का नाम ही नहीं था। उन्‍होंने सख्‍त एतराज़ जताया और इम्तियाज़ को कहा कि वो  तुरंत रहमान को एसएमएस कर के कहें कि इसमें औलिया का नाम डाला जाए। बताते चलें कि रहमान जब ऑस्‍कर जीत कर आए थे तो दरगाह में उनकी जि़यारत का प्रबंध भी निज़ामी साहब की मंज़ूरी से ही हुआ था। ऐसे कितने ही बड़े लोग हैं जो अफ़सर निज़ामी के पास आते हैं, लेकिन निज़ामी बरसों से दरगाह के पिछले हिस्‍से में छोटे से कमरे की उसी गद्दी पर बैठे हैं जहां कभी उनके वालिद टीकरी वाले बाबा बैठा करते थे।

निज़ामी की बात को इनकार करना इम्तियाज़ के लिए नामुमकि़न था। कव्‍वाली की शुरुआत में ही निज़ामुद्दीन औलिया का नाम डाला गया। इसके बाद खुद अफ़सर साहब ने अलग-अलग एंगल से चार रात लगातार इस कव्‍वाली को शूट करवाया।

वो बताते हैं कि दरगाह पर कव्‍वाली करने वालों में चांद कव्‍वाल बहुत पुराने हैं। आपको स्‍क्रीन पर जो कव्‍वाल दिखाई देते हैं, उनके पीछे भले ही मोहित चौहान, रहमान और जावेद अली की आवाज़ हो, लेकिन चेहरे वही पुराने हैं जिन्‍हें दरगाह पर आने वाले बखूबी पहचानते हैं। अफ़सर साहब ने चांद कव्‍वाल से कहा था कि वे कभी उन्‍हें फिल्‍मों में काम दिलाएंगे। उन्‍होंने अपना वादा पूरा किया।

ये बात अलग है कि न तो इम्तियाज़ ने और न ही किसी और ने आज तक अफ़सर अली निज़ामी का कहीं भी जि़क्र किया। निज़ामी को इसका अफ़सोस भी नहीं। वे कहते हैं कि पब्लिसिटी से जितना दूर रहें, बेहतर है।

ऐसा अक्‍सर होता है कि परदे के पीछे रहने वालों से हमारी मुलाकात नहीं हो पाती और खूबसूरत चीज़ों की क्रेडिट कोई और ले जाता है। ज़ाहिर है, जो चीज़ों को ख़ूबसूरत बनाते हैं उनके पास वक्‍त ही कहां कि वे अपनी फि़क्र कर सकें।

फ़याकुन का अर्थ भी निज़ामी सा‍हब ने ही खोला। क़ुन का अर्थ होता है ''तथास्‍तु'' यानी ऐसा ही हो। लिहाज़ा फ़याक़ुन का अर्थ्‍ हुआ ''हो गया'' यानी जैसा चाहा था वही हो गया। बहरहाल, फ़याक़ुन के साथ कई और राज़ खोलते चलते हैं निज़ामी साहब, लेकिन फैज़ कहते हैं ना... ''इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो/ लब पे आए तो राज़ हो जाए'' ।

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें