1/14/2011

क्‍या भारत 1958 का अमेरिका है?

एडवर्ड आर. मरो (1908-1965)
एडवर्ड आर. मरो अमेरिका के मशहूर टीवी पत्रकार थे जो सीबीएस न्‍यूज से जुड़े हुए थे। उन्‍होंने शिकागो में 15 अक्‍टूबर 1958 को एक संगोष्‍ठी में यह व्‍याख्‍यान दिया था जो तब अमेरिका में मीडिया की स्थिति के बारे में बहुत कुछ बताता है। उस व्‍याख्‍यान को नीचे पढ़ें और तय करें कि क्‍या आज का भारतीय मीडिया ठीक पचास साल पहले के अमेरिकी मीडिया की तरह है या नहीं। समानताएं जबरदस्‍त हैं और सवाल गंभीर। इस व्‍याख्‍यान में भारत के आत्‍ममुग्‍ध टीवी पत्रकारों की उन तमाम दलीलों को भी ध्‍वस्‍त किया गया है जिसके सहारे वे राडिया से लेकर तमाम कांडों का जस्टिफिकेशन खोजते हैं। 




मैं जो कहने जा रहा हूं उससे किसी का भला नहीं होने वाला। मेरे भाषण के अंत में कुछ लोग इस रिपोर्टर पर आरोप लगा सकते हैं कि उसने खुद ही अपने आरामदायक घोंसले को बिगाड़ लिया और आपके संस्थान पर यह आरोप लग सकता है कि उसने एक सनकी या फिर खतरनाक विचारों वाले व्यक्ति का स्वागत किया। इसके बावजूद विज्ञापन एजेंसियों, नेटवर्कों और प्रायोजकों का यह सुगठित और व्यापक ढांचा हिलेगा तक नहीं। भले ही यह मेरा कर्त्तव्य न हो, लेकिन इच्छा जरूर है कि मैं आपके सामने खुलकर वे बातें रखूं और इस पर चर्चा हो कि आखिर आज रेडियो और टीवी में हो क्या रहा है।

शब्दों और छवियों का उत्पादन करने वाले इस बगीचे में आप जैसे काम करने वालों को देने के लिए मेरे पास कोई तकनीकी सलाह या परामर्श नहीं है। आप मुझे माफ करेंगे यदि मैं आपसे यह न कहूं कि जिन उपकरणों पर आप काम करते हैं वे चमत्कारिक हैं, कि आपकी जिम्मेदारी अभूतपूर्व है या फिर यह कि आपकी आकांक्षाएं अक्सर कुंठा का शिकार होती हैं। आपको यह याद दिलाना जरूरी नहीं कि जब आपकी आवाज को इतना उन्नत कर दिया जाता है कि वह देश के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाए, तब भी आपकी समझदारी या ज्ञान उतना ही बना रहता है जितना तब था जब आप शराबखाने के एक छोर पर खड़े दूसरे छोर को आवाज लगाते होते। ये सभी बातें आप जानते हैं।

जिस तरह कांग्रेसनल कमेटी के समक्ष गवाह पेश होते हैं, ठीक वैसे ही मैं यहां स्वेच्छा से आमंत्रित हूं। आपको शुरू में ही बता दूं कि मैं कोलंबिया ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम का एक कर्मचारी हूं, न कि उसका कोई अधिकारी या निदेशक और ये टिप्पणियां मेरी अपनी हैं। यदि मुझे कोई जिम्मेदार बात कहनी है, तो जाहिर है उसे कहने के लिए अकेले मैं ही जिम्मेदार हूं। मुझे अपने नियोक्ताओं से उसके लिए कोई मंजूरी लेने की जरूरत नहीं, न ही मुझे नए प्रायोजक चाहिए अथवा टीवी और रेडियो के आलोचकों से कोई पुरस्कार, यानी आप मुझे निराश नहीं कर सकते। यह मानते हुए कि इस देश में प्रसारण की वाणिज्यिक प्रणाली अपनी क्षमताओं में सर्वश्रेष्ठ व स्वतंत्र है, मैंने फैसला किया है कि मैं अपनी चिंताएं उस पर जाहिर करूंगा जो मैं समझता हूं कि रेडियो और टेलीविजन के साथ हो रहा है। इन उपकरणों ने मेरा इतना भला किया है कि मैं उसकी कीमत नहीं चुका सकता, लिहाजा मेरे दिमाग में इनसे निजी तौर पर शिकायत की कोई वजह नहीं। मेरा अपने नियोक्ताओं से कोई झगड़ा नहीं, न ही किसी प्रायोजक से या फिर रेडियो और टीवी के किसी पेशेवर समीक्षक से। इसके बावजूद एक भय मुझे लगातार जकड़े हुए है कि आखिर ये दोनों माध्यम हमारे समाज, संस्कृति और हमारी विरासत के साथ क्या कर रहे हैं।

हमारा इतिहास वैसा ही होगा, जैसा हम बनाएंगे और यदि आज से 50-100 साल बाद भी यदि तीनों नेटवर्कों की एक हफ्ते की रिकॉर्डिंग बचा कर रखी गई, तो कोई इतिहासकार उसमें उस दुनिया की वास्तविकताओं से हमारे पतन और पलायन के श्वेत-श्याम या रंगीन साक्ष्य पाएगा, जिसमें हम रहते हैं। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप सभी नेटवर्कों पर प्रसारित कार्यक्रमों को रात 8 से 11 बजे के बीच में देखें। आप पाएंगे कि यहां लगातार इस तथ्य पर बार-बार जोर दिया जाता है कि यह राष्ट्र खतरे में है। रविवार की दोपहर हालांकि, निश्चित तौर पर कभी-कभार कुछ सूचनाप्रद कार्यक्रम आते हैं जिन्हें बौद्धिक जामा पहना कर पेश किया जाता है, लेकिन रोजाना प्रसारण के सबसे महत्वपूर्ण घंटों के दौरान टेलीविजन हमें मूलतः उस दुनिया की तमाम वास्तविकताओं से दूर ले जाता है जिसमें हम रहते हैं। अगर यही स्थिति बनी रही, तो हमें एक विज्ञापनी नारे को बदल देना होगा- लुक नॉउ, पे लेटर (अभी देखें, बाद में चुकाएं)।

निश्चित तौर पर संचार के इस सबसे ताकतवर औजार का इस्तेमाल लोगों को इस वक्त की सबसे कठोर और चुनौतीपूर्ण वास्तविकताओं से दूर हटाने की कीमत तो हमें चुकानी ही होगी और यदि हमें जिंदा रहना है, तो उन चुनौतियों को सामना करना होगा। मैं वास्तव में ‘जिंदा रहने’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं। यदि इस असंपृक्तता या कहें वास्तविकता से बचने की कोई प्रतियोगिता करवाई जाए, तो शायद नीरो और शैम्बरलेन जैसे पात्र भी दोपहर के शो में टिक नहीं पाएंगे। यदि हॉलीवुड में इंडियंस की कमी पड़ जाए, तो सारे कार्यक्रमों का भट्ठा बैठ जाएगा। फिर कोई साहसी आत्मा छोटे से बजट का एक वृत्तचित्र बनाएगी जिसमें बताया जाएगा कि हम इस देश में इंडियंस के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं। यह ठीक नहीं होगा। और जाहिर है हमें अपने संवेदनशील नागरिकों को किसी भी दुखदायी चीज से हर कीमत पर बचाना चाहिए।

मैं इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हूं कि अमेरिकी जनता काफी तार्किक, परिपक्व और संयमी है जितना कि हमारी इंडस्ट्री के अधिकतर कार्यक्रम नियोजक भी नहीं सोचते। उन्हें भय है कि कोई विवाद न पैदा हो जाए, लेकिन इसे वे साबित नहीं कर सकते। आप ही की तरह मैं भी इस बात को समझता हूं कि जब किसी विवादास्पद विषय पर सबूत को बहुत शांत और सौम्य तरीके से पेश किया जाता है, तो लोग वास्तव में उसका उद्देश्य समझते हैं- वे जानते हैं कि ऐसा उत्तेजित करने के लिए नहीं, बल्कि जागरूक बनाने के लिए किया जा रहा है।

कुछ साल पहले जब हमने मिस्र और इजरायल पर एक कार्यक्रम करने की योजना बनाई थी, तो कुछ समझदार और अनुभवी मित्रों ने अपना सिर हिलाते हुए कहा- ‘तुम ऐसा नहीं कर सकते। यह तो एक भावनात्मक विवाद जैसी चीज है जिसमें तर्क की कोई गुंजाइश नहीं।’ हमने कार्यक्रम किया। उसके बाद मध्य-पूर्व के हमारे दोस्त, मिस्र के लोग और इजरायली अधिकारी, जियोनवादी और उनके विरोधी सभी ने चौंकते हुए कहा, ‘यह तो ठीक था। इसमें पर्याप्त सूचना थी। हमें कोई शिकायत नहीं।’

ऐसा ही अनुभव तब हुआ था, जब हमने धूम्रपान और फेफड़े के कैंसर से जुड़ा ढाई घंटे का कार्यक्रम किया था। चिकित्सा जगत और तंबाकू उद्योग के लोगों ने काफी डरते-सहमते हमारा सहयोग किया, लेकिन अंत में वे सभी पर्याप्त संतुष्ट थे। रेडियोधर्मी विकिरण और परमाणविक परीक्षणों पर प्रतिबंध का विषय तो खूब विवादास्पद था, लेकिन जो भी छिटपुट साक्ष्य मिलते हैं, वे बताते हैं कि हमारे दर्शक दोनों ही पक्षों को तर्क और संयम से सुनने को तैयार थे। यह कहने का अर्थ यह नहीं कि विवादास्पद विषयों के प्रस्तुतिकरण में किसी विशिष्ट या असाधारण क्षमता की जरूरत पड़ती है, बल्कि हम यह संकेत देना चाहते हैं कि इन क्षेत्रों से बचने का कोई आधार नहीं।

हाल ही में नेटवर्क के प्रवक्ताओं ने शिकायत की है कि टेलीविजन के पेशेवर आलोचक कुछ ज्यादा ही कठोर हो गए हैं। इस बात के संकेत मिले हैं कि दरअसल विज्ञापन राजस्व को लेकर छिड़ी होड़ ने इन आलोचकों के निशाने पर टेलीविजन और रेडियो को ला दिया है। मेरी मंशा इन आलोचकों का पक्ष लेने की नहीं है। उनके पास अपनी एक स्पेस है जिसमें वे अपने तईं कुछ करते रहते हैं, लेकिन यह एक तथ्य है कि अखबार और पत्रिकाएं ही जनसंचार के वे उपकरण हैं जो निरंतर और नियमित आलोचनात्मक टिप्पणियों से बचे रहते हैं। यदि नेटवर्क के प्रवक्ता इस बात पर इतने ही आक्रोशित हैं कि प्रिंट में क्या-क्या हो रहा है, तो वे आगे आएं और अखबारों व पत्रिकाओं पर नियमित आलोचनात्मक टिप्पणी करें। यह एक बहुत पुराना और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि टेलीविजन और रेडियो में काम करने वाले अधिकतर लोग प्रिंट में छपने वाली चीजों के प्रति कुछ ज्यादा ही सम्मान रखते हैं। कई बार तो ऐसे मामले आए हैं जहां अधिकारियों ने किसी कार्यक्रम पर टिप्पणी करने से मना कर दिया है जब तक कि प्रिंट में उसकी समीक्षा न छप गई हो। यह तो अजीब किस्म के आत्मविश्वास का प्रदर्शन है।

सचाई से मुंह चुराने का टीवी नेटवर्कों का सबसे पुराना बहाना यह है कि वे नए हैं। प्रवक्ता कहते हैं, ‘हम लोग अभी नए हैं और हमने न तो कोई परंपरा विकसित की है, न ही हमारे पास पुराने मीडिया जितना अनुभव है।’  अगर वे जान रहे हों, तो दरअसल वे रोजाना अपने कार्यक्रमों के माध्यम से एक परंपरा ही तो गढ़ रहे हैं और उदाहरण निर्मित कर रहे हैं। हर बार जब वे किसी राजनीतिक दबाव या वॉशिंगटन के किसी आह्वान के सामने झुक जाते हैं, हर बार जब वे किसी ऐसी चीज को प्रसारित करने से रोक देते हैं जिससे किसी समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं, तो ऐसा करके वे अपनी एक परंपरा ही बना रहे होते हैं। वे दरअसल, अर्द्धसुरक्षित रहने से संतुष्ट नहीं होते।

इससे बड़ा उदाहरण इस बात का क्या होगा कि फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन के अध्यक्ष प्रसारकों को सार्वजनिक तौर पर उनके संपादकीय से जुड़े कानूनी अधिकारों की याद दिला रहे हैं। जाहिर है कि एक स्पष्ट संपादकीय नीति के लिए, जो कि अप्रायोजित हो, जरूरी है कि एक स्टेशन या नेटवर्क जिम्मेदार रहे। आज अधिकतर स्टेशनों के पास इतना कार्यबल ही नहीं कि वे इस जिम्मेदारी को ले सकें। कार्यबल की नियुक्ति हालांकि हो सकती है, लेकिन संपादकीय कभी भी मुनाफा नहीं देता और यदि कोई कठोर बात कह दी गई हो, तो वह भावनाएं भी आहत कर सकता है। इसलिए कहीं ज्यादा आसान और कम दिक्कततलब बात यह है कि टीवी और रेडियो का इस्तेमाल सिर्फ पैसा बनाने की एक मशीन के रूप में किया जाए जिसमें से ऐसी हर चीज प्रसारित की जा सके जो कि मानहानि, अश्लीलता और आक्रामकता की वाहक न हो। इस तरीके से सत्ता का एक ऐसा धर्म पैदा होता है जिसमें जिम्मेदारी नाम की चीज नहीं होती।

जहां तक रेडियो की बात है, उसकी कठिनाइयों की पड़ताल अपेक्षया आसान है। और जाहिर है कि मैं तो सिर्फ समाचार और सूचना के संदर्भ में ही बात कर रहा हूं। रेडियो को अगर प्रगति करनी है तो उसे पीछे जाना होगा, उस दौर में, जब खबरों के बीच गाने वाले विज्ञापन देने की अनुमति नहीं थी, जब 15 मिनट की एक खबरिया रिपोर्ट के बीच में कोई कमर्शियल नहीं आता था और रेडियो से मिलने वाली सूचना तीव्रता, सतर्कता और गौरव का आभास कराती थी। हाल ही में मैंने एक नेटवर्क अधिकारी से पूछा, ‘वीकेंड पर यह पांच मिनट की तेज खबरें तीन विज्ञापनों के साथ आप क्यों चलाते हैं?’ उसने जवाब दिया, ‘क्योंकि यही वह चीज है जिसे हम बेच सकते हैं।’

अब इस तरह की जटिल और भ्रामक दुनिया में आप प्रसारण माध्यम में खबरों का तर्क ही नहीं खोज सकते जहां उनके लिए सिर्फ तीन मिनट का वक्त है। एक ही शख्स था जो ऐसा कर सकता था, एल्मर डेविस, और आज उनके जैसा कोई नहीं बचा है। अगर रेडियो की खबर को भी माल ही मानकर बेचना है, तभी स्वीकार्य होना है जब वह बेचने लायक हो, तो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसे क्या नाम देते हैं- जहां तक मेरी बात है, मैं उसे खबर नहीं कहूंगा।

जहां तक मेरी याददाश्त जाती है, मुझे याद है कि एक ऐसा समय भी था जब कारोबार में जरा से नुकसान के भय से समाचार और सार्वजनिक मामलों के विभाग में तत्काल कोई कटौती नहीं की जाती थी। तब नेटवर्क का मुनाफा सर्वोच्च स्तर पर था। कम से कम हम इस बात से तो सहमत होंगे ही कि आप स्टेशन में हों या नेटवर्क में, न्यूज रूम में काम आने वाले टाइपराइटर की जगह स्टेपल करने वाली मशीन तो नहीं ले सकती।

टीवी समाचार और सूचना के साथ एक अन्य त्रासदी यह भी है कि नेटवर्क अपने हितों की भी रक्षा नहीं करते हैं। जब मेरे नियोक्ता सीबीएस ने जरा सी मेहनत और एक अच्छे संयोग के चलते राष्ट्रपति ख्रुश्‍चेव का साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने कुछ अपशब्द कह दिए थे और नेटवर्क ने इसके लिए बकायदा खेद जताया था। यह एक दुर्लभ स्थिति थी। कई अखबारों ने सीबीएस का पक्ष लिया और उसकी सराहना की, लेकिन कई अन्य नेटवर्क बिल्कुल शांत रहे।

इसी तरह जब जॉन फोस्टर डलास ने अपना एक फैसला सुनाते हुए अमेरिकी पत्रकारों के कम्युनिस्ट चीन में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया और विरोधाभासी दलीलें इसके लिए दीं, तो नेटवर्कों ने मामूली सा विरोध किया। बाद में वे सब कुछ भूल गए। क्या इतना बड़ा राष्ट्रीय उद्योग सिर्फ हांगकांग से आ रही छिटपुट खबरों से ही जनहित की सेवा करके संतुष्ट है और अपने दर्शकों को उन विशाल बदलावों के प्रति अंधा बनाए रखना चाहता है जो 60 करोड़ लोगों के एक राष्ट्र में घट रहे हैं? मुझे एक तानाशाही सत्ता केन्द्र से रिपोर्टिंग की कठिनाइयों को लेकर कोई भ्रम नहीं, लेकिन हमारे ब्रिटिश और फ्रेंच साथी अपने यहां जनहित की बेहतर सेवा कर पा रहे हैं क्योंकि चीन में बैठे उनके रिपोर्टर कुछ बेहद उपयोगी सूचनाएं लेकर आ रहे हैं।

रेडियो और टीवी समाचार के साथ बुनियादी दिक्कत यह है कि दोनों ही उपकरण शो बिजनेस, विज्ञापन और समाचार तीनों के बेमेल मिश्रण के रूप में विकसित हुए हैं। ये तीनों कुछ अटपटे किस्म के धंधे हैं और जब आप तीनों को एक छत के नीचे लाते हैं, तो जो गुबार उठता है उसकी धूल कभी नहीं बैठ पाती। नेटवर्कों का शीर्ष प्रबंधन कुछेक अपवादों को छोड़कर विज्ञापन, शोध, सेल्स या शो बिजनेस में प्रशिक्षित होता है, लेकिन कॉरपोरेट ढांचे का चरित्र ही ऐसा होता है कि खबरों और सार्वजनिक मामलों पर भी आखिरी और निर्णायक फैसला इन्हीं को लेना होता है। अक्सर ऐसा होता है कि इसके लिए न तो इनके पास समय होता है और न ही योग्यता। मुट्ठी भर लोगों के लिए यह आसान नहीं कि वे एक साथ सभी फैसले ले लें। मसलन, करोड़ों डॉलर का कोई नया स्टेशन खरीदना, कोई नई इमारत बनाना, विज्ञापन की दर बदलना, कोई सोप ओपेरा बेचना, हालिया कांग्रेसनल जांच से जुड़ी संपादकीय लाइन तय करना, एक नए कार्यक्रम के प्रचार पर कितना खर्च किया जाए, यह तय करना, वाइस प्रेसिडेंट के अधिकारों और उन पर व्यय पर क्या जोड़ा और घटाया गया आदि। और इतना सब करते हुए ठीक उसी दिन उन तमाम समस्याओं पर एक परिपक्व और विचारपूर्ण फैसला भी दे देना जो समाचार व सार्वजनिक मामलों की जिम्मेदारी निभा रहे कर्मियों से सीधे जुड़ी है।

कई बार कॉरपोरेट और सार्वजनिक हितों के बीच टकराव भी होता है। अक्सर एक आक्रोशित दर्शक की ओर से मिली प्रतिक्रिया के मुकाबले वॉशिंगटन से आए किसी प्रभावशाली फोन या पत्र को ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है। अक्सर आलोचनाओं को हवा देने के लिए जानबूझ कर एक गैर-जिम्मेदाराना और अनावश्यक चीज को प्रसारित कर दिया जाता है।

कई मौकों पर संपादकीय फैसले आर्थिकी के खिलाफ चले जाते हैं। ऐसा कोई कानून तो है नहीं जो कहता हो कि अपना काम करने से पैसे का नुकसान होता है। बहुत दिन नहीं हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने टीवी पर राष्ट्र के नाम संदेश दिया था। वह सोवियत संघ और कम्युनिस्ट चीन के साथ युद्ध की आशंकाओं पर बात कर रहे थे, जो जाहिर तौर पर एक जरूरी विषय था। दो नेटवर्कों सीबीएस और एनबीसी ने इस प्रसारण को सवा घंटे देरी से प्रसारित किया। यदि यह फैसला वित्तीय को छोड़ अन्य किसी वजह से लिया गया था, तो यह बताने की जहमत दोनों में से किसी ने भी नहीं उठाई। बहरहाल, सवा घंटे का समय उस अवधि का दोगुना है जितने में सोवियत संघ से दागा गया एक आईसीबीएम अमेरिका के प्रमुख शहरों को अपना निशाना बना लेगा। यह मानना मुश्किल है कि यह फैसला उन लोगों द्वारा लिया गया जो खबरों को प्यार करते हैं, खबरों की समझ रखते हैं और सम्मान करते हैं।

अब तक मैं नकारात्मक पहलुओं के बारे में ही बात कर रहा था और यह फेहरिस्त लंबी हो सकती है। लेकिन जैसा के मैंने कहा और मैं मानता भी हूं कि इस देश में रेडियो और टीवी का मुक्त उद्यम किसी भी अन्य उद्यम से ज्यादा बड़ा है। इसके वादों को पूरा करने के लिए जरूरी है कि यह मुक्त हो, उद्यमशील हो। यहां मैं यह नहीं कह रहा कि नेटवर्क और स्टेशन धर्मार्थ काम करें। लेकिन अधिकारों के विधेयक या संचार कानून आदि में ऐसा कुछ भी नहीं लिख जो कहता हो कि ये अपने मुनाफे साल दर साल तब तक बढ़ाते चले जाएं जब तक कि देश का पूरी तरह पतन न हो जाए। मैं यह नहीं कह रहा कि खबरों और सूचनाओं को फाउंडेशनों और निजी ग्राहकी से अनुदान मिलना चाहिए। मैं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हूं कि नेटवर्कों का विस्तार हो रहा है और सार्वजनिक मामलों से जुड़े कार्यक्रमों पर भारी राशि खर्च होती है जिनसे कोई फायदा होने की गुंजाइश नहीं होती। सीबीएस में ऐसे कई कार्यक्रमों का संचालन करने का मुझे अवसर मिला है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरे वरिष्ठों ने किसी कार्यक्रम को सिर्फ इसीलिए नहीं नकार दिया क्योंकि उसकी लागत ज्यादा थी।

लेकिन हम सभी जानते हैं कि जरा से समय में आप अधिकतम दर्शकों तक एक टिकाऊ कार्यक्रम के साथ नहीं पहुंच सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि नेटवर्क पर अधिकतर स्टेशन या कोई भी स्टेशन उसे चलाने को तैयार नहीं होगा। कोई भी लाइसेंसधारी जो जनहित में प्रसारण के लिए अनुदान का आवेदन करता है, उसे कार्यक्रम के कंटेंट को लेकर कुछ वचनबद्धताएं जाहिर करनी होती हैं। सीधे-सीधे कहें, तो तमाम लाइसेंसधारकों ने इन वादों को तोड़ा है। दरअसल, ये जो पैसा बनाने की मशीन है, उनके विवेक को भोंथरा कर देती है। इसका इकलौता उपचार यह है कि एफसीसी पर्यवेक्षण करे और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करे। लेकिन, कई लोगों की नजर में यह संघीय एजेंसी द्वारा कार्यक्रम के कंटेंट पर नजर रखे जाने जैसी खतरनाक बात है।

इसलिए ऐसा लगता है कि हम कार्यक्रमों के लिए धर्मार्थ सहयोग या सब्सिडी पर भरोसा नहीं कर सकते; हम ‘टिकाऊ रास्ता’ भी नहीं अपना सकते क्योंकि सारी लागत नेटवर्क अकेले वहन नहीं कर सकता; और एफसीसी उन लोगों को अनुशासन में नहीं ला सकता जो जनता की सुविधाओं का दुरुपयोग करते हैं। तो फिर इसका जवाब क्या हो? क्या हम अपने-अपने सुविधाजनक घोंसलों में पड़े रहें और यह मान लें कि जब हम नौकरी पर होते हैं, तो न्यूनतम समय के दौरान जनता को सूचित करने के साथ ही इन औजारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निपटा देते हैं? या फिर हम यह मानें कि इस गणराज्य को बचाना हफ्ते में सातों दिन हमारी एक जिम्मेदारी है जिसके लिए ज्यादा जागरूकता, बेहतर कौशल और कहीं अधिक प्रतिबद्धता की दरकार है, जितना कि हमने सोचा भी नहीं।

मैं तो इस असंतुलन के भार से ही दबा जा रहा हूं कि हरेक चीज के लिए ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक कैसे पहुंचा जाए जबकि देश के हालात के बारे में कहीं कोई अध्ययन मौजूद नहीं है। हेवुड ब्राउन ने एक बार कहा था, ‘कोई भी राजनीतिक इकाई तब तक स्वस्थ नहीं होती, जब तक उसमें खुजली न होने लगे।’ मैं चाहूंगा कि टेलीविजन बेहोश करने वाले मादक कार्यक्रमों की अंतहीन बाढ़ लाने की बजाय खुजली करने वाले कुछ कार्यक्रम पैदा करे। ऐसा किया जा सकता है। जरूरी नहीं कि इसके लिए हमें गलत आदमी को ही चुनना पड़े। इस भ्रम में न रहें कि इन नेटवर्कों के मुखिया उन तमाम चीजों को नियंत्रित करते हैं जो उनके नेटवर्क पर दिखाई देती हैं। उन सबकी पसंद इससे बेहतर है। वे सभी अपने शेयरधारकों के लिए जिम्मेदार हैं और मेरे हिसाब से ये सभी सम्मानित लोग हैं, लेकिन उन्हें निश्चित तौर पर उन चीजों की एक प्राथमिकता सूची बनानी होगी कि वे लोगों के बाजार में क्या बेच सकते हैं।

और यहीं हम ऊपर उठाए गए सभी सवालों की जड़ तक पहुंच जाते हैं। एक अर्थ में यह मोटे तौर पर उस शब्द के इर्द-गिर्द घूमता है जो अक्सर मैडिसन एवेन्यू पर सुनाई पड़ जाता है- कॉरपोरेट छवि। मैं ठीक-ठीक नहीं जानता कि इसका मतलब क्या है, लेकिन एक अंदाजा यह है कि यह विज्ञापन के बिल चुकाने वाले निगमों की उस इच्छा का प्रतिबिंब है कि उनकी भी एक सार्वजनिक छवि हो, या फिर यह मान लेने की इच्छा कि वे सिर्फ आत्मारहित इकाइयां नहीं हैं जो डॉलरों के पीछे भाग रही हैं। वे यह चाहते हैं कि हम मान लें कि उन्हें सार्वजनिक लाभ और निजी या कॉरपोरेट लाभ के बीच अंतर करना आता है। तो सवाल यह है- क्या बड़े निगम जो रेडियो और टीवी कार्यक्रमों के लिए खर्चा करते हैं, इतने समझदार हैं कि अपने माल और सेवाओं की बिक्री के लिए उस समय का विशुद्ध उपयोग कर सकें? क्या यह उनके अपने और उनके शेयरधारकों के हित में है? एक घंटे के टीवी कार्यक्रम का प्रायोजक महज विज्ञापन के छह मिनट ही नहीं खरीदता, बल्कि व्यापक दायरे में वह तय करता है कि एक घंटे का कुल प्रभाव क्या पड़ेगा। यदि वह हमेशा बिना चूके हुए अधिकतम संभव दर्शकों तक पहुंच पाता है, तब सचाई से पलायन की यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर अनुदानित होती रहेगी और इसका बचाव करने वाले लगातार इस बारे में भाषण देते रहेंगे कि वे जनता को वह दे रहे हैं जो वह चाहती है, या ‘यह जनता का फैसला है।’

मैं यह नहीं मानने को तैयार हूं कि इन विशाल निगमों के बोर्ड अध्यक्ष और निदेशक यह चाहते हैं कि उनकी कॉरपोरेट छवि सिर्फ एक गूंजने वाले चैंबर में पवित्र आवाज की तरह हो, या फिर रेफ्रिजरेटर का दरवाजा खोलती एक खूबसूरत लड़की अथवा बात करने वाले घोड़े तक सीमित हो। वे बेहतर चाहते हैं और कुछ मौकों पर उन्होंने इसे प्रदर्शित भी किया है। लेकिन अधिकतर व्यक्ति जिनकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी शेयरधारकों के पैसे को विज्ञापन पर खर्च करने की है, उन्हें मीडिया की वास्तविकताओं से 5, 6 या दर्जनों निरोधक स्तरों के सहारे दूर कर दिया जाता है जिनमें वाइस प्रेसिडेंट से लेकर जनसंपर्क अधिकारी, वकील और विज्ञापन एजेंसियां शामिल होती हैं। उनका धंधा सिर्फ माल बेचना होता है और प्रतिस्पर्द्धा कड़ी होती है।

लेकिन, यह राष्ट्र उन काली शैतानी ताकतों के साथ होड़ में है जो अपने नियंत्रण में आने वाले हरेक औजार का इस्तेमाल अपने लोगों का दिमाग खाली करने और उसमें भविष्य के नारे, संकल्प और आस्थाएं भरने में किए जा रहे हैं। यदि हम ऐसे ही चलते रहे, तो हम दरअसल अमेरिकी जनता के दिमाग को उस दुनिया के साथ संपर्क से बिल्कुल काट देंगे जो लगातार हमें घेरती जा रही है। हम एक महान प्रयोग में लगे हुए हैं जहां यह खोजा जा रहा है कि क्या एक मुक्त सार्वजनिक राय इस राष्ट्र के मामलों का प्रबंधन करने के लिए कोई सीधा तरीका मुहैया करा सकती है या नहीं। हम इसमें नाकाम भी हो सकते हैं, लेकिन हम लगातार खुद को विकलांग बनाते जा रहे हैं।

आइए, एक छोटी सी प्रतियोगिता रखते हैं। न सिर्फ साबुन, सिगरेट या ऑटोमोबाइल बेचने की, बल्कि परेशानी में पड़ी एक सशंकित, लेकिन ग्रहणशील जनता को सूचित करने की प्रतियोगिता। क्यों नहीं आखिर 20 या 30 विशाल निगम जिनका रेडियो और टेलीविजन पर प्रभुत्व है, प्रत्येक यह तय करते हैं कि वे हर साल अपने एक या दो नियमित कार्यक्रम छोड़ देंगे और यह समय नेटवर्कों को देंगे जिससे यह संदेश प्रसारित किया जाएः ‘यह एक छोटा सा प्रयास है, हमारे मुनाफे का एक छोटा सा हिस्सा। इस रात हम आपको कोई सिगरेट या ऑटोमोबाइल बेचने नहीं जा रहे; यह सिर्फ एक शिष्टाचार है यह दिखाने के लिए कि हम विचारों के महत्व में यकीन रखते हैं।’ मेरे हिसाब से इस कार्यक्रम को निर्मित करने का खर्च नेटवर्कों को खुद देना पड़ेगा। विज्ञापनदाता और प्रायोजक का बस नाम रहेगा, लेकिन कार्यक्रम के कंटेंट से उसका कोई लेना-देना नहीं होगा। क्या इससे कॉरपोरेट छवि पर कोई दाग लगेगा? क्या इस पर शेयरधारक आपत्ति करेंगे? मुझे नहीं लगता क्योंकि जिस आधार पर हमारा बहुलतावादी समाज टिका हुआ है, वह मेरे हिसाब से यह है कि लोगों को यदि बिना मिलावट के पर्याप्त शुद्ध सूचना मिल जाए, तो वे किसी भी तरह भले ही बार-बार विचार करने के बाद सही फैसले पर ही पहुंचेंगे। यदि यह आधार ही गलत हुआ, तो न सिर्फ कॉरपोरेट छवि, बल्कि निगमों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इस देश में एक पुराना मुहावरा हुआ करता था। जब कोई ज्यादा बात करता था, तो उसे कह दिया जाता था, ‘गो हायर ए हॉल।’ इस प्रस्ताव के तहत प्रायोजक को हॉल किराए पर लेना होगा यानी एयरटाइम खरीदना होगा; स्थानीय स्टेशन ऑपरेटर फिर कार्यक्रम चलाएगा- उसे चलाना ही होगा। इसके बाद नेटवर्कों का काम है कि वे हॉल को भरें। मैं यहां किसी संपादकीय नीति की बात नहीं कर रहा, बल्कि सीधे तौर पर एक निष्पक्ष और अप्रायोजित सूचना के खुलासे की बात कर रहा हूं जिसे आसानी से लोग ग्रहण कर सकें। बस एक बार हम सूचनाओं और विचारों के महत्व को जोर से बताएं। आइए फर्ज करें कि हम यह कह रहे हों कि किसी रविवार की रात जो समय आम तौर पर एड सुलिवन का होता है, उस समय हम अमेरिकी शिक्षा पर एक क्लीनिकल सर्वेक्षण करवाएं। और हफ्ते- दो हफ्ते बाद जो समय स्टीव एलेन को समर्पित होता है, उसमें मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीति का विश्लेषण करवाया जाए। क्या ऐसा करने से प्रायोजकों की कॉरपोरेट छवि को नुकसान पहुंचेगा? क्या शेयरधारक उठ खड़े होंगे और शिकायत करेंगे? क्या इसके अलावा और कुछ भी होगा क्या, कि कम से कम लाखों लोग उन विषयों पर जरा से जागरूक हो सकेंगे जो इस देश और बदले में निगमों का भविष्य तय करते हैं? यह तरीका नेटवर्कों के बीच एक वास्तविक प्रतिस्पर्द्धा को भी जन्म देगा कि आखिर सूचना के विश्वसनीय प्रस्तुतिकरण के मामले में कौन किसको पीछे छोड़ सकता है। यह तरीका उन कुशल युवाओं की क्षमताओं को बाहर लाने का एक रास्ता बनेगा जो समर्पित हैं और बेचने के दौरान सचाई को छुपाने के तरीके खोजने के अतिरिक्त भी कुछ और करना चाहते हैं।

रेडियो और टेलीविजन का इस्तेमाल एक मुक्त समाज के हित में करने के अन्य आसान तरीके भी हो सकते हैं, लेकिन मुझे और कोई तरीका ऐसा नहीं दिखता जिसे इतनी आसानी से मौजूदा व्यावसायिक तंत्र के ढांचे में लागू किया जा सके। मैं नहीं जानता कि आप किसी कार्यक्रम की सफलता या विफलता को कैसे आंकेंगे। इसके अलावा जिन निगमों ने एक रात का वक्त ऐसे कार्यक्रमों को दिया था, उन्हें क्या फायदा हुआ है यह भी साबित करना आसान नहीं होगा। लेकिन मैं एक बात दावे से कह सकता हूं कि निगमों के निदेशक और यहां तक कि वे सभी शेयरधारक जिन्होंने ऐसी पहल को प्रायोजित किया था, वे निगम और देश के बारे में कुछ बेहतर अहसास से भरे होंगे।

यह संभव है कि मौजूदा तंत्र बगैर किसी बदलाव और प्रयोग के बचा रह सकता है। हो सकता है कि पैसा बनाने वाली मशीन के भीतर किसी किस्म की सनातन गति हो, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। एक देश में जनसंचार मीडिया काफी हद तक उस राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक वातावरण का प्रतिबिंबित करता है जिसमें वह फल-फूल रहा होता है। यही वजह है कि हमारा मीडिया ब्रिटिश, फ्रेंच, रूसी या चीनी मीडिया से अलग है। हम फिलहाल काफी सम्पन्न, स्वस्थ और सुविधा सम्पन्न हैं। हमारे भीतर एक एलर्जी बनी हुई है कि हमें दुखद या परेशान करने वाली सूचनाओं से बचना है। हमारे मास मीडिया में यह बात साफ दिखाई पड़ती है। लेकिन जब तक हम अपने मोटे मुनाफे से ऊपर नहीं उठ जाते और यह स्वीकार करें कि टेलीविजन का मुख्य इस्तेमाल हमें विकृत करने, भ्रमित करने, रंजित करने और सचाई से बचाने के लिए किया जा रहा है, तब तक टेलीविजन में पैसा लगाने वालों, इसे देखने वालों और इसके लिए काम करने वालों के सामने जो तस्वीर उभरेगी, वह बिल्कुल अलग होगी और तब तक काफी देर हो चुकी होगी।

मैं इस बात की पैरवी नहीं करता कि हम टेलीविजन को एक बंद बाड़ा बना दें जहां लंबे बालों वाले लोग हमारी संस्कृति और सामरिक सुरक्षा को लेकर लगातार रोते रहें। लेकिन मैं यह चाहूंगा कि कभी-कभार टेलीविजन उस दुनिया की कठोर वास्तविकताओं को दिखाए जिसमें हम रहते हैं। मैं चाहूंगा कि ऐसा मौजूदा ढांचे के भीतर ही हो और जो लोग इसे वित्तपोषित करते हैं वे ही उसका श्रेय ले लें। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप नतीजों को किससे मापते हैं- नील्सन, ट्रेंडेक्स या साइलेक्स से। असली बात ऐसी पहल करने की है। आप जनता को वह दे रहे हैं जो वह चाहती है इस बारे में तमाम जबानी जमाखर्च के बावजूद यह जिम्मेदारी आसानी से तय की जा सकती है। यह बड़े कारोबारों, बड़े चैनलों और शीर्ष पर बैठे लोगों के ऊपर है। जिम्मेदारी कोई ऐसी चीज नहीं जो किसी को थमाई जाए या उसे तैनात कर दिया जाए और यह निश्चित तौर पर अच्छे नतीजे देती है- अच्छा कारोबार और अच्छा टेलीविजन।

शायद कोई भी इस बारे में ऐसा कुछ नहीं करने वाला। मैंने आलोचनात्मक परिदृश्य के बरक्स ऐसी एक पहल को इसलिए रेखांकित किया है क्योंकि मैं इससे बेहतर कुछ नहीं सोच सकता। किसी ने कभी कहा था- शायद मैक्स ईस्टमैन ने, कि ‘वह प्रकाशक अपने विज्ञापनदाता की सबसे अच्छी सेवा करता है जो अपने पाठकों की सबसे अच्छी सेवा करता है।’ मैं नहीं मानता कि रेडियो और टेलीविजन या वे निगम जो कार्यक्रमों को वित्तपोषित कर रहे हैं, वे वास्तव में श्रोताओं और दर्शकों या फिर खुद की सच्ची सेवा कर रहे हैं।

मैंने शुरू में कहा था कि हमारा इतिहास वैसा ही होगा जैसा हम बनाएंगे। यदि हम ऐसे ही चलते रहे, तो इतिहास हमसे अपना बदला लेगा और हम किसी भी तरीके से बच नहीं पाएंगे।

हम मोटे तौर पर एक नकलची समाज हैं। अगर एकाध निगमों ने मेरे सुझाव पर अमल किया, तो यह प्रक्रिया बहुत तेजी से आगे बढ़ेगी; जो आर्थिक बोझ पड़ेगा उसे सहा जा सकता है और फिर एक सबसे रोमांचक परिघटना हमारे सामने आएगी- इस राष्ट्र के आम घरों में सचाई और विचारों का पहुंचना।

वे लोग जो कहते हैं कि लोग इस पर ध्यान नहीं देंगे, लोग इसमें दिलचस्पी नहीं लेंगे, लोग कुछ ज्यादा ही आत्मसंतोषी हैं, असंपृक्त हैं और चीजों से बचते हैं, उनके लिए मेरे पास एक ही जवाब हैः एक रिपोर्टर की राय में इसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं। अगर वे सही भी हों, तो आखिर उन्हें नुकसान क्या होने वाला है? क्योंकि वे अगर सही हैं, और यह उपकरण सिर्फ मनोरंजन करने और सचाई से दूर रखने के ही लायक है, तब हम जल्द ही देखेंगे कि सारी लड़ाई हम हार गए।

यह उपकरण हमें सिखा सकता है, जागरूक बना सकता है और हां, प्रेरित भी कर सकता है। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है और उसी हद तक, जहां तक मनुष्य उन साध्यों के लिए उसका इस्तेमाल करने को संकल्पित हो। अन्यथा यह एक बक्से के भीतर तारों और रोशनियों का कबाड़ ही होगा। अज्ञानता, असहिष्णुता और अंसपृक्तता के खिलाफ एक महान और शायद निर्णायक लड़ाई लड़ी जानी है। टीवी का हथियार इसमें उपयोगी साबित हो सकता है।

स्टोनवॉल जैक्सन, जो हथियारों के इस्तेमाल के बारे में कुछ जानकारी रखते थे, उन्होंने कथित तौर पर कहा था, ‘जब युद्ध आता है, तो आपको तलवार निकाल लेनी चाहिए और म्यान फेंक देनी चाहिए।’ टेलीविजन के साथ दिक्कत यह है कि एक ओर जब अस्तित्व की लड़ाई छिड़ी हुई है, वह अपने म्यान में ज़ंग खा रहा है।

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