1/07/2011

कठिन अभिव्‍यक्ति

असाध्‍य वीणा भाग-2
यह कठिन समय की अभिव्‍यक्ति है।
समय से भी कठिन-
कठिनतर।
जो काफी जोर लगाने पर आती भी है,
तो जाती बिखर-
समय में दम तोड़ती पसलियों की तरह,
जैसे हवा में
चूर-चूर। 

अभिव्‍यक्ति को समेटना, दरअसल
लिखना है समय का एक दस्‍तावेज।
और जब उखड़ी हो खुद समय की चूल,
तो हर अभिव्‍यक्ति बन जाती है दस्‍तावेज, जिसे
रोकने को होते हैं उद्धत
सभी पहरेदार
पुलिस, मिलिटरी, अफसर, बौद्धिक-
कि कहीं कालखंड पर जमी
विश्‍वासघात की उनकी धूल उड़ने न पाए।

न हो जाए कहीं वक्‍त का परदाफाश
और उनका भी
जो आत्‍मा के भीतर अपने
फिट किए हुए एक इम्‍पोर्टेड सेंसर
मरे जाते हैं इसी चिंता में दिन-रात
कि निकल न जाए कुछ अटपट
बेढंगा, अप्रासंगिक, अतिवादी बयान
भड़का दे जो
आंतरिक सुरक्षा के सरमायेदारों को।



एक अनजाना भय, कि
क्‍या होगा हमारे बच्‍चों और बीवियों का
रहता है उन्‍हें घेरे।
'भगवान सबकी रक्षा करता है'
यह बात सिर्फ दूसरों के लिए है-
वे जानते हैं।

इसीलिए जब कभी विरले धड़कता है दिल उनका
तो रख लेते हैं हाथ औचक
अपनी बाईं जेब पर
इस आशंका में कि कहीं
घनघना न रहा हो मोबाइल फोन
कोई अननोन नंबर, सरकारी जैसा कुछ।
और आश्‍वस्‍त होकर कि ऐसा नहीं है
चल पड़ते हैं आगे
अपने बच्‍चों और बीवियों के लिए।

इनके सेंसर का असर दूर तक होता है
बियाबान जंगलों तक में
और वह पैदा भी होता है किसी 'भगवान की लाठी' सरीखी मार
की अदृश्‍य आशंका से।
इसीलिए
वे जानते हैं अच्‍छी तरह
कि अभिव्‍यक्ति का पकना, उबलना और फूट पड़ना
नहीं कोई स्‍वतंत्र परिघटना
इसकी मार भी होती है दूर तक।
ऐसे उनका समूचा जीवन
अदेखे भयों और आशंकाओं की चढ़ जाता है भेंट।
ऐसे एक-एक भय
एक-एक आशंका से बनता हमारा समय
हो जाता है बेहद कठिन
और अभिव्‍यक्ति
समय से भी कठिन-
कठिनतर।

जो धीरे-धीरे आती ही नहीं
सीख जाती है दबे रहना
जैसे आप हों किसी अत्‍याधुनिक बाजार में
और दूर तक न हो कोई शौचालय
तो सीखना ही पड़ता है इच्‍छाओं को दबाना
और विकल्‍प ही क्‍या है।
अक्‍सर जब होने लगता है ऐसा कुछ
तो घटता है चमत्‍कार
शक्‍लें एक-सी हो जाती हैं
और पेट भी
जम जाता है कब्‍ज़
फूल जाते हैं पेट, और
उड़ जाती है चेहरे की रंगत
ठीक इस मुल्‍क के गृह मंत्री के जैसी।
घर के बाहर घूरे पर बैठे कुत्‍ते से भी लगने लगता है डर
पहचान में नहीं आते फोटोस्‍टेट जीव साफ-साफ,
जो संसद से लेकर मोहल्‍ले तक
तय करते हैं हमारे जीवन की चर्या को। 

समय हो जाता है और कठिन
अभिव्‍यक्ति समय से भी कठिन-
कठिनतर।

देश को चलाते हुए
दरअसल, ये डरते हैं हमसे- 
कि हम हुए जब बदशक्‍ल और स्‍थूल
तो बचे हैं कैसे कुछ लोग
सुंदर और साफ।

तब ये बनाते हैं कानून
लिखते हैं संविधान
उठने-बैठने
बोलने-चालने
पढ़ने-लिखने
खाने-पीने के।
बनाते हैं आईडी कार्ड।
कहते हैं कि ये हैं बुनियादी अधिकार
जो मिलने ही चाहिए
मनुष्‍यों को।

उन्‍हें चिंता है हरेक के पहचान की
और अपहचाने आतंक की भी।
तब वे पास कराते हैं एक विधेयक
अभिव्‍यक्ति की आजादी का
जो कहता है-
कि पीछे के रास्‍ते निकलने वाली अभिव्‍यक्ति ही सच्‍ची है
बाकी सब आतंक।

अंत में वे खींचते हैं नक्‍शा
एक महान जनतंत्र का
जिसमें जेलें नहीं दिखाई जातीं, न ही
फांसी के तख्‍ते।
जिसमें दिखते हैं सिर्फ पेट और मुंड
गुत्‍थमगुत्‍था
निहारते दूरदर्शन पर गृह सचिव को
बोलते-
'राष्‍ट्रहित में करें उपभोग इतना, कि
खिंच आए क्षितिज पर अभिव्‍यक्तियों का बहुरंगी इंद्रधनुष।'

अचानक हो उठते हैं सक्रिय करोड़ों पेट और मुंड
धीरे-धीरे गरमाता है महान जनतंत्र 
जलते हैं जंगल, चट्-चट्
सिमटती है नदियां
पिघलते हैं पहाड़
फट पड़ती है धरती।



मुस्‍कुराते हैं बौद्धिक, पुलिस, अफसर, नेता
और नागरिक
जब नितंबों के बीच छटपटाती
उनकी समय से भी कठिन-
कठिनतर अभिव्‍यक्ति
चुपके से कहीं गुम हो जाती है।

बिना किसी शोर-शराबे के
समय ऐसे बदलता है
इस देश में।  

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