11/30/2011

व्‍यालोक का नया 'मौन'




चांद है टूटा हुआ या,

कि उफ़क़ पर माहताबी...

रात है सर ओढ़ कर चुपके

दुलाई में समाई...


टिमटिमाते हैं ये तारे...

हर तरफ है मौन छाया...

चल रहा चुपचाप मैं बस...

हमनफ़स कोई न आया...


एक टूटा सा हुआ पुल...एक मद्धम सा चुका सुर...

एक ट्रक दोनों तरफ है, एक कुछ बीता हुआ है...

मैं खड़ा हूं बीच धारे, जाऊं तो जाऊं कहां मैं...


याद आती है कहानी, मां मुझे जो थी सुनाती....

लोरियों के बीच थपकी, दे मुझे जो थी सुलाती....

वह कहानी भूल कर भी, मां मुझे है याद आती...


अब हूं इतनी दूर आया, मैं नहीं हूं लौट सकता,

मां मुझे वापस बुला ले, मैं तेरी गोदी में आया.....

रात का गहरा है साया, हर तरफ सन्नाटा छाया,

है कहीं कोई न चिड़िया, ना कोई आदम है पाया...


मैं अकेले पुल पै बैठा, देखता हूं रात को बस...

चीखती लहरों को बैठा ताकता मैं मौन हूं बस...


मौन है अंदर से उपजा...

मौन मेरे उर में पैठा....

क्या इसे मैं नाम भी दूं......

नाम ही जब मौन इसका......




11/27/2011

सुल्‍तान बलबन नहीं, बलबन बाबा

बलबन बाबा: महरौली के बियाबान में सुल्‍तान बलबन की सुनसान मज़ार
अनुभव कभी-कभार इतिहास को धोखा दे देता है। ये बात मुझे हाल में पता चली जब मैं घूमते-टहलते कुतुबमीनार के पीछे महरौली के जंगलों में पहुंच गया। यहां मिली सुल्‍तान बलबन की मज़ार। वही बलबन, जो गुलाम वंश का नौवां शासक था, जिसने खुद को दिल्‍ली का सुल्‍तान घोषित कर दिया था, उसके बावजूद जब बाबा फ़रीद के सामने जाता तो सिर नवा के अपराधी की तरह खड़ा हो जाता था।

मुझे वहां एक गार्ड ने बताया कि बाबा बलबन इस जंगल की रक्षा करते हैं। मैंने पूछना चाहा कि बाबा कहने का क्‍या संदर्भ, लेकिन चुप रहा। उसने मुझसे कहा कि जाने से पहले माथा टेकते हुए जाना मज़ार पर। मैंने तस्‍वीरें उतारने के बाद उसके सामने वैसा ही किया। और अचानक क्‍या हुआ बताऊं....

सिर टेकने के बाद उठाते ही इत्र की एक भीनी सी खुशबू आई। वो मुस्‍कराया। उसने कहा, मैंने कहा था न, माथा टेकते हुए जाना।

मुझे समझ नहीं आया। मैं जाकर वहां कुछ सूंघने की कोशिश करने लगा। कोई महक नहीं। फिर मत्‍था टेका। उठाते ही दोबारा वही खुशबू।

क्‍या मैं धोखे में था... पता नहीं। कम से कम दो दर्जन बार मैंने यही काम किया। जहां-जहां मत्‍था टेका, वहां-वहां नाक सटाकर सूंघा भी, लेकिन नतीजा हर बार एक ही। सूंघने पर कुछ नहीं, मत्‍था टेकने पर खुशबू।

बलबन के बाबा बनने का आखिर क्‍या यही राज़ है... कोई मुझे बतलाए... जाए, वहां एक बार होकर आए।

तस्‍वीरें झूठ नहीं बोलतीं...

पोस्‍टमॉर्टम के दौरान खींची गईं माओवादी नेता किशनजी की ये तस्‍वीरें आज सुबह  सर्कुलेट हुई हैं। अब तक वरवरा राव समेत किशनजी की भतीजी, उनकी मां और मुख्‍यधारा की राजनीति के कई नेताओं ने आरोप लगाए हैं कि किशनजी को पुलिस मुठभेड़ में नहीं मारा गया (जैसा कि सरकार का दावा है), बल्कि बिल्‍कुल चेरुकुरी आज़ाद की तर्ज़ पर गिरफ्तार कर के प्रताड़ना दी गई और फिर मारा गया। इन तस्‍वीरों के आने से पहले ये महज़ आरोप कहे जा सकते थे, लेकिन नीचे दी गई तस्‍वीरों को देखने के बाद भी कुछ कहने की ज़रूरत रह जाती है क्‍या ...????  




11/26/2011

निज़ामी बंधुओं की आवाज़ में कुन फ़याकुन लाइव


बीती जुमे रात यानी 24 नवंबर को कव्‍वाल चांद निज़ामी और उनके भाइयों ने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर रॉकस्‍टार की मशहूर कव्‍वाली कुन फ़याकुन की विशेष प्रस्‍तुति की।

चांद निज़ामी और उनके दो भाइयों को आपने रॉकस्‍टार वाली कव्‍वाली में स्‍क्रीन पर तो देखा होगा, लेकिन आवाज़ उनकी नहीं थी। कैसा लगता है एक कव्‍वाल को जब उसे कोई और आवाज़ दे, वो भी दरगाह के सामने शूट की गई एक कव्‍वाली पर ? ये सवाल हम चांद भाई से एक दिन ज़रूर पूछेंगे, लेकिन इसे हमारी बदकिस्‍मती ही कहिए कि इससे पहले पेश की गई सारी कव्‍वालियां रिकॉर्ड हो गईं, पर फ़याकुन की बारी आने से ऐन पहले कैमरे की बैटरी ने दम तोड़ दिया।

एक मोबाइल ही बचा था, लेकिन आधे रास्‍ते में वो भी बोल गया। जो कुछ बचा खुचा था, मैंने उसे जोड़-जाड़ कर दिखाने की कोशिश की है और यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिया है।

उसका लिंक मैं यहां डाल रहा हूं।

फिल्‍मी कव्‍वाली और इस लाइव कव्‍वाली में एक फर्क पैदा करने के लिए मैंने शुरू की पांच लाइनें फिल्‍म से ली हैं और उसके बाद लाइव का ट्रांजीशन है। खराब रिकॉर्डिंग और तकरीबन ना के बराबर एडिटिंग के बावजूद चांद बंधुओं की आवाज़ को सुनकर एक पुरानी कहावत का मतलब ज़रूर समझ में आ जाता है... जिसका काम उसी को साजे।

और हां, एक आखि़री और ज़रूरी बात... सारी रामायण खत्‍म हो जाने के बाद ज्ञान हुआ कि जिसे हम इतने दिनों से 'फ़ायाकुन' कहते आ रहे हैं, वो दरअसल 'फ़याकुन' है। 'फ़' और 'य' के बीच 'आ' कार नहीं है। इस जानकारी के लिए मैं असमा सलीम जी को शुक्रिया देना चाहूंगा जिन्‍होंने वक्‍त रहते मुझे दुरुस्‍त कर दिया। मैंने अपनी पिछली पोस्‍ट में इसे ठीक कर दिया है, लेकिन अख़बार में जो छप गया उसके लिए अफ़सोस ही जताया जा सकता है।
  

11/22/2011

फ़याक़ुन का जादूगर

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह: जो है तुझमें समाया वो है मुझमें समाया
या निज़ामुद्दीन औलिया, या निज़ामुद्दीन सरकार
कदम बढ़ा ले, हदों को मिटा ले
आ जा खालीपन में पी का घर तेरा
तेरे बिन खाली आजा खालीपन में
रंगरेज़ा, रंगरेज़ा
रंगरेज़ा, रंगरेज़ा

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पर लिखी गई फि़ल्‍मी कव्‍वालियों में सबसे खूबसूरत कव्‍वाली की ये पंक्तियां है। बताने की ज़रूरत नहीं कि रॉकस्‍टार फिल्‍म में अगर कुछ भी देखने लायक है तो यही एक कव्‍वाली है। मेरे अधिकतर मित्रों को लगता है कि पूरी फिल्‍म में से अगर इस कव्‍वाली के सीक्‍वेंस को निकाल दिया जाए तो फिल्‍म में जो मैजिक का एक एलेमेंट है, वो खत्‍म  हो जाएगा। जब ये सीक्‍वेंस आता है, तो ऐसा लगता है कि नंगी आंखों से दरगाह जितनी खूबसूरत दिखती है, उसे सौ गुना खूबसूरत बना दिया है कैमरे ने। क्‍या ये इम्तियाज़ अली का जादू है... या फिर उनके कैमरामैन का। क्‍या ये कामिल के बोल हैं या रहमान का संगीत... फ़याकुन का जादू कहां से पैदा होता ?

आइए आपको मिलाते हैं इस मैजिक के पीछे खड़े शख्‍स से जिसका नाम है सैयद अफ़सर अली निज़ामी। निज़ामी साहब दरगाह के इनचार्ज हैं। पिछले साढ़े सात सौ साल से इनका खानदान दरगाह की सेवा करता आ रहा है। हज़रत निज़ामुद्दीन की बहन के खानदान से आते हैं निज़ामी साहब। दरगाह की गद्दी पर बैठे हुए करीब दो दशक होने को आए। पाकिस्‍तानी मंत्री  हिना रब्‍बानी खार की जि़यारत हो या रॉकस्‍टार की शूटिंग, सब कुछ निज़ामी साहब की मंज़ूरी से होता है। और अगर आज फ़याक़ुन हमारे सामने है, तो इन्‍हीं के चलते, वरना इम्तियाज़ अली ने जो ग़लती की थी, वो कभी यहां शूट नहीं कर पाते।

सैयद अफ़सर अली निज़ामी: फ़याक़ुन का जादूगर
निज़ामी साहब बताते हैं कि जब उन्‍होंने पहले पहल ये कव्‍वाली सुनी तो इसमें हज़रत औलिया का नाम ही नहीं था। उन्‍होंने सख्‍त एतराज़ जताया और इम्तियाज़ को कहा कि वो  तुरंत रहमान को एसएमएस कर के कहें कि इसमें औलिया का नाम डाला जाए। बताते चलें कि रहमान जब ऑस्‍कर जीत कर आए थे तो दरगाह में उनकी जि़यारत का प्रबंध भी निज़ामी साहब की मंज़ूरी से ही हुआ था। ऐसे कितने ही बड़े लोग हैं जो अफ़सर निज़ामी के पास आते हैं, लेकिन निज़ामी बरसों से दरगाह के पिछले हिस्‍से में छोटे से कमरे की उसी गद्दी पर बैठे हैं जहां कभी उनके वालिद टीकरी वाले बाबा बैठा करते थे।

निज़ामी की बात को इनकार करना इम्तियाज़ के लिए नामुमकि़न था। कव्‍वाली की शुरुआत में ही निज़ामुद्दीन औलिया का नाम डाला गया। इसके बाद खुद अफ़सर साहब ने अलग-अलग एंगल से चार रात लगातार इस कव्‍वाली को शूट करवाया।

वो बताते हैं कि दरगाह पर कव्‍वाली करने वालों में चांद कव्‍वाल बहुत पुराने हैं। आपको स्‍क्रीन पर जो कव्‍वाल दिखाई देते हैं, उनके पीछे भले ही मोहित चौहान, रहमान और जावेद अली की आवाज़ हो, लेकिन चेहरे वही पुराने हैं जिन्‍हें दरगाह पर आने वाले बखूबी पहचानते हैं। अफ़सर साहब ने चांद कव्‍वाल से कहा था कि वे कभी उन्‍हें फिल्‍मों में काम दिलाएंगे। उन्‍होंने अपना वादा पूरा किया।

ये बात अलग है कि न तो इम्तियाज़ ने और न ही किसी और ने आज तक अफ़सर अली निज़ामी का कहीं भी जि़क्र किया। निज़ामी को इसका अफ़सोस भी नहीं। वे कहते हैं कि पब्लिसिटी से जितना दूर रहें, बेहतर है।

ऐसा अक्‍सर होता है कि परदे के पीछे रहने वालों से हमारी मुलाकात नहीं हो पाती और खूबसूरत चीज़ों की क्रेडिट कोई और ले जाता है। ज़ाहिर है, जो चीज़ों को ख़ूबसूरत बनाते हैं उनके पास वक्‍त ही कहां कि वे अपनी फि़क्र कर सकें।

फ़याकुन का अर्थ भी निज़ामी सा‍हब ने ही खोला। क़ुन का अर्थ होता है ''तथास्‍तु'' यानी ऐसा ही हो। लिहाज़ा फ़याक़ुन का अर्थ्‍ हुआ ''हो गया'' यानी जैसा चाहा था वही हो गया। बहरहाल, फ़याक़ुन के साथ कई और राज़ खोलते चलते हैं निज़ामी साहब, लेकिन फैज़ कहते हैं ना... ''इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो/ लब पे आए तो राज़ हो जाए'' ।

11/16/2011

यहीं कहीं है लोर्का की क़ब्र


फेदरिको गार्सिया लोर्का
स्‍पेन के समकालीन इतिहास की सबसे बड़ी पहेली को सुलझाने का दावा एक स्‍थानीय इतिहासकार ने किया है। दक्षिण में स्थित ग्रेनाडा शहर के रहने वाले मिगेल कबालेरो पेरेज़ का कहना है कि उन्‍होंने महान नाटककार और कवि लोर्का की असली क़ब्र खोज निकाली है।

ब्‍लड वेडिंग, येर्मा और दी हाउस ऑफ बर्नार्दा आल्‍बा जैसी रचनाओं के लेखक फेदरिको गार्सिया लोर्का को स्‍पेन के गृह युद्ध के शुरुआती दिनों में एक दक्षिणपंथी बंदूकधारी दस्‍ते ने गोली मार दी थी। लोर्का के जीवन के आखिरी 13 घंटों के घटनाक्रम को जोड़ने के लिए पेरेज़ ने पुलिस और सैन्‍य अभिलेखों को छानने में तीन बरस बिता दिए।

उन्‍होंने अब दावा किया है कि आधा दर्जन पुलिसवालों और बंदूकधारियों के जिस दस्‍ते ने लोर्का समेत तीन अन्‍य बंदियों को गोली मारी थी, उनकी पहचान उन्‍होंने कर ली है। पेरेज़ ने उनकी क़ब्र को भी खोज निकालने की बात कही है। लोर्का की मौत के लिए उन्‍होंने ग्रेनाडा के कुछ बेहद रईस परिवारों और खुद गार्सिया कुल के बीच लंबे समय से चली आ रही सियासी और कारोबारी रंजि़श को जि़म्‍मेदार ठहराया है।

दी लास्‍ट 13 आवर्स ऑफ गार्सिया लोर्का नाम की किताब में अपनी खोज को प्रकाशित करने वाले पेरेज़ कहते हैं, 'मैंने लोगों के इक़बालिया बयानात लेने की जगह अभिलेख सामग्री में तथ्‍यों को खोजने का फैसला लिया क्‍योंकि इतने ढेर सारे तथाकथित गवाह अपने-अपने तरीके से तथ्‍यों को तोड़-मरोड़ देते हैं।'

कबालेरो ने बताया कि शुरू में उनका ख्‍याल था कि साठ के दशक में स्‍पेन के एक पत्रकार एदुआर्दो मोलीना फजार्दो द्वारा इकट्ठा की गई सूचनाओं का सत्‍यापन किया जाए क्‍योंकि यह  पत्रकार खुद तानाशाह फ्रांको का समर्थन करने वाले अतिदक्षिणपंथी संगठन फलांगे का सदस्‍य रहा था। 

कबालेरो के मुताबिक, 'अपनी राजनीतिक संबद्धता के चलते फजार्दो की उन लोगों तक आसान पहुंच थी जो उसे हंसी-खुशी सचाई बयां करने को तैयार थे। अभिलेखों में अधिकतर वे ही बातें सामने आईं जो उसने बताई थीं, लिहाज़ा यह मानना भी तर्कसंगत ही होगा कि उसने लोर्का की क़ब्रगाह का जो पता बताया था, वो सही था।'

माना जाता है कि जिस जगह पर लोर्का को दफ़नाया गया, वहां किसी ने पानी की तलाश में एक गड्ढा खोदा था। यह जगह विज्‍नार और अल्‍फाकार नाम के दो गांवों के बीच स्थित एक फार्म कार्तिजो दे गज़पाचो के पास खुले मैदान में है। सन 1971 में इतिहासकार इयान गिब्‍सन ने लोर्का की कब्र का जहां पता दिया था, वहां से यह जगह महज़ आधा किलोमीटर की दूरी पर है। गिब्‍सन की बताई जगह पर 2009 में खुदाई हुई थी और उस पर काफी विवाद भी हुआ, लेकिन वहां सबूत के तौर पर कोई हड्डी नहीं मिली थी।

कबालेरो बताते हैं, 'इस नई जगह की खोज में वाकई दम है, क्‍योंकि यह रिहायशी इलाके से पर्याप्‍त दूर है, कि यहां न तो देखा जा सकता है और न ही यहां हुई कोई आवाज़ सुनाई दे जा सकती है। हां, आप वहां कार से ज़रूर पहुंच सकते हैं, और इसकी तस्‍दीक करने के लिए यह  जानना ज़रूरी है कि निश्चित तौर पर रात में यहां लोगों को गोली मारने के लिए उन्‍हें हेडलाइट की ज़रूरत पड़ी होगी।' कबालेरो यहां पानी की खोज करने वाले एक शख्‍स को लेकर गए थे। उसने वहां पानी खोजने के लिए लोर्का के दौर में प्रचलित पुराना तरीका अपनाया जिसमें एक टहनी से भूजल स्‍तर की थाह ली जाती है। उसने बताया वहां शायद एक भूमिगत जल स्रोत था। कबालेरो कहते हैं, 'इसलिए यह मानना तर्कसंगत होगा कि किसी ने यहां भूमिगत जल स्रोत की तलाश में निश्चित तौर पर एक गड्ढा खोदा होगा।'

एक पुरातत्‍व विज्ञानी जेवियर नवारो ने यहां ज़मीन में एक गड्ढे की पहचान की है जिससे यहां क़ब्र होने के संकेत मिलते हैं। स्‍पेन के दूसरे इलाकों में गृह युद्ध के दौर की करीब आधा दर्जन क़ब्रों की खोज कर चुके नवारो के मुताबिक, 'यह सोचना गलत न होगा कि यहां एक क़ब्र है। इससे खोज निकालना काफ़ी आसान है। एक तजुर्बेकार पुरातत्‍ववेत्‍ता को बस सतह से करीब 40 सेंटीमीटर मिट्टी निकालनी होगी, और वह बता देगा कि यह ज़मीन पहले कभी खोदी गई है या नहीं।'     

सन 1936 की गर्मियों में करीब आधा दर्जन बंदूकधारियों के एक गिरोह ने सैकड़ों संदिग्‍ध  वामपंथियों को गोली मार दी थी। मारे गए लोगों में लोर्का भी थे। तानाशाह फ्रांको के कुत्‍सा राष्‍ट्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के इस काम के बदले इन हत्‍यारों को 500 पेसेटा का पुरस्‍कार और पदोन्‍नति मिली। कबालेरो कहते हैं, 'मैं इन्‍हें भाड़े के हत्‍यारे कहना ज्‍यादा पसंद करूंगा क्‍योंकि इनमें भले कुछ लोग स्‍वयंसेवक रहे हों, लेकिन कुछ पुलिसकर्मी भी थे जिनके इंकार करने पर खुद मारे जाने का डर था।' कहते हैं कि एक ने तो शिकायत भी की थी कि यह नौकरी 'उसे पागल किए दे रही है'। दस्‍ते में शामिल कुछ को तो पता भी नहीं था कि लोर्का कौन है। कबालेरो के मुताबिक, 'ये कविता पढ़ने वाले लोग नहीं थे क्‍योंकि लोर्का के पाठक अधिकतर अभिजात्‍य थे। लोर्का के बजाय इन बंदूकधारियों की ज्‍यादा दिलचस्‍पी उन दो अराजकतावादियों में रही होगी जो उनके साथ मारे गए थे, क्‍योंकि वे दोनों ज्‍यादा कुख्‍यात थे।' इसके बावजूद दस्‍ते के दो कमांडर लोर्का को जानते थे। उनमें एक 53 साल का अक्‍खड़ पुलिसवाला मारियानो अजेन्‍जो था और दूसरा कमांडर अंतोनियो बेनाविदे जो कि स्‍वयंसेवक था, लोर्का के पिता की पहली पत्‍नी का रिश्‍तेदार था। बताया जाता है कि बाद में बेनाविदे ने गर्व से एलान किया था, 'मैंने उस मोटी बुद्धि वाले को सिर में गोली मारी थी।'

दक्षिणपंथी रोल्‍दान परिवार की लोर्का के पिता के साथ सियासी रंजि़श थी। इसी परिवार ने शहर के फ्रांको समर्थक प्रशासनिक अधिकारियों को लोर्का को गिरफ्तार कर गोली मारने के लिए राज़ी किया था। रोल्‍दान कुल का ही एक सदस्‍य बेनाविदे गोली मारने वाले दस्‍ते का सदस्‍य बना। उसका एक चचेरा भाई कुछ ही महीने पहले मंचित लोर्का के नाटक दी हाउस ऑफ बर्नार्दो आल्‍बा में अभिनय कर चुका था। लोर्का ने इस नाटक में उसे खलनायक की भूमिका दी थी और जान-बूझ कर अपने दुश्‍मन आल्‍बा परिवार पर निशाना साधा था। कबालेरो के मुताबिक, 'वे लोग लोर्का के पिता से नाराज़ थे, लेकिन अपना बदला उन्‍होंने बेटे को मार कर लिया।' 

बेनाविदे को छोड़ दें तो बंदूकधारी दस्‍ते के किसी भी सदस्‍य को अपने किए पर गर्व नहीं था। कबालेरो बताते हैं, 'उनमें से किसी ने भी इस सब के बारे में अपने परिवार से बात तक नहीं की। उन्‍हें आज भी प्‍यारे बुजुर्गों वाला सम्‍मान हासिल है, क्‍योंकि उन्‍होंने गृह युद्ध के बारे में अपनी ज़बान हमेशा बंद रखी।'


11/11/2011

बारह घंटे

दिन के एक बजे पहुंचा था जब मैं यहां
तब बज रही थीं चूडि़यां
रो रहे थे बच्‍चे
चल रहा था टीवी
और सो रहे थे साहब...


बारह घंटे बीत चुके
कुछ भी नहीं बदला इस दरम्‍यान
खामोशी इतनी भी नहीं है
होनी चाहिए जो रात के एक बजे
गिलास के गिरने के बीच अचानक चीखता है एक बच्‍चा
और दोनों को थामने की कोशिश में
एक साथ
बज उठती हैं उसकी चूडि़यां फिर से

शायद ऐसा ही रोज़ होता होगा यहां
और हम गढ़ लेते हैं मुहावरे बैठे-बैठाए
कि बस
दिन के उजाले में जल चुका है आसमान
कह देते हैं
सुबह होने को है।

ये मेरे परिवार का एक विस्‍तार है
मेरे ही घर की औरत
मेरे ही घर के बच्‍चे
और साहब भी मेरे ही रिश्‍तेदार।

कैसे कहूंगा अगली बार 
कि असल सवाल दुनिया को समझने का नहीं
बदलने का है...
?



प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें