12/29/2012


12/27/2012

एक अनाम बलात्‍कृता का बयान

(दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार लड़की आज देर रात इलाज के लिए सिंगापुर भेज दी गई। कल यानी 27 दिसंबर को दिन में एक बार फिर इंडिया गेट पर लोग जुटेंगे। पिछले आठ दिनों के दौरान चीज़ें इतनी तेज़ी से घटी हैं कि बहुत कुछ समझ में नहीं आया। दिल्‍ली में चलती बस में बर्बर सामूहिक बलात्‍कार, चार दिन के भीतर सभी दोषियों की गिरफ्तारी, देश भर में आक्रोश, प्रदर्शन, फिर अचानक हिंसा का दौर, पुलिस का दमन, एक सिपाही की मौत और फिर उसके दोषियों की गिरफ्तारी। लड़की के बयान और मृत सिपाही के पोस्‍टमॉर्टम की तकनीकी गड़बडि़यों से बेपर्द सरकारी झूठ, आनन-फानन में उसे विदेश भेजने का सरकारी फैसला... हर कोई बोल रहा था, सब लिख रहे थे। सबका कोई न कोई पक्ष था। आक्रोश का एक सैलाब उमड़ा जिसमें विवेक धुंधला था। जहां विवेक दिखा, वहां संवेदना नदारद थी। जहां संवेदना थी, वहां फतवे दिए जा रहे थे। जो चुप थे, वे तटस्‍थ ठहराए जा रहे थे। भीड़ में होना अपने समय में होना माना गया। और समय- उसकी चूल उखड़ी हुई थी। इतना आक्रोश, इतनी आवाज़, कि सब चीख रहे थे और कोई किसी की नहीं सुन रहा था।
 
ऐसे में 'काफिला' पर 25 दिसंबर को किसी अनाम बलात्‍कृता का एक लेख छपा। पता नहीं कितनों ने पढ़ा। पढ़ने के बाद लगा गोया मनों पानी सिर पर उंडेल दिया गया हो। यह सरकारी पानी नहीं था वाटर कैनन का... शायद, आंखों का पानी था। मुझे लगा कि यही मेरा बयान हो सकता है। देर से सही, अनूदित सही। मैं नहीं जानता कि जिसने इसे छापा है उसकी यह संपादकीय तरकीब है या वास्‍तव में किसी पीडि़ता का बयान। भीतर से लेकिन लगता है कि यह मेरी बात है। अब तक कही गई/लिखी गई तमाम बातों को मैं एक तरफ रखता हूं। जिसने भोगा है, उससे ज्‍यादा सच्‍चा कौन हो सकता है। हम वास्‍तव में बलात्‍कार के बारे में कुछ नहीं जानते। शायद, इसे पढ़ने के बाद कुछ जान सकें... मॉडरेटर)

 

कौन जाने क्‍या होता है बलात्‍कार?  

 
साभार: दि गार्डियन


बलात्‍कार इसलिए होते हैं क्‍योंकि अधिकतर लोगों को इसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता।  

ऐसा कहना कि बलात्‍कार की शिकार औरतें इसे समझती हैं, उनके बारे में कुछ ज्‍यादा ही बड़ी राय बना लेने जैसा होगा। इसका तात्‍कालिक असर बस एक गहरा और अदृश्‍य घाव है। सालों तक काउं‍सलिंग के बावजूद जो दर्द देता है। एक हदस सी बनी रहती है। इसके आगे दुनिया की सब ताकतें, इंसानी हों या रूहानी, छोटी पड़ जाती हैं। शायद ही कभी इस अपराध की शिकायत दर्ज होती होगी। औरतों को मजबूत बनाने के बजाय हमारा कानूनी तंत्र इतने कम मामलों में सज़ा सुनाता है कि वह खुद सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है।

ऐसा अपराध करने वाले, यानी बलात्‍कारी भी, बलात्‍कार के बारे में उतना ही कम या बराबर जानते हैं जितना कि पीडि़त। वे गिरफ्तारी से, लोगों की नज़र से, शर्मिंदगी से बच निकलते हैं, और यही बात उनके मनोविकार को बढ़ावा देती है। शायद वे जानते हों, या शायद नहीं भी, कि बलात्‍कार सेक्‍स का नहीं, दरअसल सत्‍ता का मसला है।

कानून बनाने वालों को नहीं पता कि ऐसे मामलों में क्‍या करना है। दुनिया की सबसे प्रबुद्ध सरकारें भी बलात्‍कार की सबसे कम सज़ा सुनाती हैं।

मीडिया इसे लेकर उतना ही उत्‍तेजित रहता है जितना और चीज़ों के बारे में। लेकिन उसकी सारी रिपोर्टिंग, सारा एक्टिविज्‍म किसी काम का नहीं है, उससे कुछ नहीं होगा क्‍योंकि वह जल्‍द ही दूसरे मसलों में उलझ जाएगा।

प्रदर्शनकारी बलि का बकरा तलाश कर संतुष्‍ट हो जाते हैं। कभी-कभार उन्‍हें कामयाबी मिल जाती है, अकसर नहीं भी। वे खराब कानून व्‍यवस्‍था का मुद्दा उछालते हैं और उन पर आंसू गैस छोड़ दी जाती है क्‍योंकि सरकार को लगता है वे अशांति फैला रहे हैं।

बलात्‍कार की शिकार जानती हैं कि उनके ज़ख्‍म कभी नहीं भरने वाले (बशर्ते वे ज़ख्‍मों के चलते दम न तोड़ दें या फिर खुदकुशी न कर बैठें)। बलात्‍कार उनके ऊपर, उनके रिश्‍तों पर, बच्‍चों पर कितने तरीकों से असर डालता है, यह समझने में ही उन्‍हें बरसों लग सकते हैं। अपराधी को मिला दंड उनके लिए सांत्‍वना पुरस्‍कार जैसा होता है। यह बात अलग है कि अपराध के आंकड़ों के मुताबिक कुछ साल ऐसे रहे जब दर्ज कराए गए मामलों में आधे से कम में ही सज़ा हो पाई।

कुछ ज्‍यादा गुस्‍साए हुए लोगों का मानना है कि फांसी की सज़ा इसका एक हल हो सकती है, लेकिन यह बलात्‍कार के खिलाफ कारगर हो, ऐसा नहीं है। मसलन, एक चार साल की बच्‍ची का बलात्‍कार आप नहीं रोक सकते यदि बलात्‍कारी परिवार के भीतर ही बैठा हो क्‍योंकि ऐसी हालत में उस बच्‍ची को शिकार होने से कोई नहीं बचा सकता। फांसी की सज़ा ऐसे किसी आदमी को नहीं रोक सकती जो बरसों की दमित यौन इच्‍छा और यौन शिक्षा के अभाव के चलते महिलाओं को उपभोग की वस्‍तु के रूप में देखता हो। यह मनोविकार हालांकि सामाजिक रूप से हमारे यहां स्‍वीकार्य है। भले ही उस आदमी को आप जेल भेज दें, लेकिन दरअसल उसे अंदाज़ा ही नहीं है कि वह किस किस्‍म का अपराध कर रहा था। दुर्भाग्‍य से उसके बाद की पीढ़ी के आदमी और औरत भी इस बात को नहीं समझ पाएंगे। चूंकि इंसाफ शायद ही कभी होता दिखता है, इसलिए फांसी पर लटकाना किसी भी दूसरी सज़ा के बराबर ही साबित होगा। कुछ लोग शायद इस बात से खुश हो सकते हैं, भले ही हमें एक भी राक्षस से छुटकारा मिले या न मिले।

महिलाएं अपने बलात्‍कारी बेटों, पिताओं, और कभी-कभार पतियों को बचाती ही रहेंगी। वे जानती हैं कि परिवार के भीतर एक दुराचारी आदमी के खिलाफ खड़ा होना सभी के लिए सब कुछ को हमेशा के लिए बदल देगा, और उन्‍होंने अपने प्रशिक्षण से जो सीखा है वह दरअसल इसका ठीक उलटा है। वो यह, कि लंबी दौड़ में चीज़ों को नज़रंदाज़ करना, उनसे मुंह मोड़े रखना ही शायद सब के लिए बेहतर है- और शायद ऐसा ही है भी। और इस तरह, अन्‍याय का दुश्‍चक्र पूरा हो जाता है।

इस दुनिया में बेशक ऐसे आदमी हैं (इस देश की बात छोडि़ए) जो शायद जानते हैं कि अपनी बीवियों और बेटियों के मुकाबले अपनी कारों और पालतू जानवरों के साथ बेहतर व्‍यवहार कैसे किया जाता है।  

बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता... और यही इसकी तार्किक परिणति है।

 

12/22/2012

''अजित अंजुम से अपेक्षा है कि वे अफसोस प्रकट करेंगे''


वक्तव्य

विभिन्न माध्यमों से पता चला है कि पिछले दिनों हिंदी के वयोवृद्ध लेखक राजेन्द्र यादव के साथ उनके घर जाकर अजित अंजुम नाम के व्यक्ति ने, जो टीवी का पत्रकार बतलाया जाता है, बदसलूकी और गाली-गलौज किया।
यह अत्यंत शर्मनाक और खेदजनक घटना है।
हो सकता है अजित अंजुम की राजेन्द्र यादव से कुछ शिकायतें हों। हम उस मामले में कोई भी पक्ष नहीं ले रहे हैं। लेखक के रूप में हमारा मानना सिर्फ यह है कि जब विवाद लेखन को लेकर हो और दो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों के बीच हो तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से हल किया जाना चाहिए।
हम इस तरह के व्यवहार की भर्त्सना करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि अजित अंजुम अपने इस व्यवहार के लिए अफसोस प्रकट करेंगे।     
 
- नामवर सिंह                      
- केदारनाथ सिंह                 
- अशोक वाजपेयी               
- आनंदस्वरूप वर्मा            
- मंगलेश डबराल               
- मैत्रेयी पुष्पा                     
- पंकज बिष्ट                         (मो. 9868302298)
- प्रेमपाल शर्मा                  
- भारत भारद्वाज            

 
नोटः सभी लेखकों ने फोन पर स्वीकृति दी हुई है। इस संबंध में किसी भी बात के लिए पंकज बिष्ट से संपर्क किया जा सकता है।

12/13/2012

मां, जिसने राजनीति से दूर रखा, आज बहुत खुश है...

सुशासन बाबू के कुशासन में परिवर्तन का एक नया चेहरा उभरा है। खानदानी कम्‍युनिस्‍टों की परंपरा से निकले इस सुर्ख युवा चेहरे की पसंद की फेहरिस्‍त में एक ओर स्‍वामी विवेकानंद हैं तो दूसरी ओर सचिन तेंदुलकर, मुंशी प्रेमंचद, ए.बी. बर्द्धन और बॉलीवुड की फिल्‍म 'थ्री ईडियट्स'। देश की सबसे पुरानी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ ने 28 साल बाद पटना युनिवर्सिटी में हुए चुनावों में जब क्‍लीन स्‍वीप नहीं किया था, उससे हफ्तों पहले अंशु कुमारी का नाम सोशल मीडिया के लती प्रगतिशील युवाओं की ज़बान पर चढ़ गया था। 9 फरवरी 1990 को जन्‍मी एम.कॉम (अंतिम वर्ष) की छात्रा अंशु के पास पीयूएसयू महासचिव पद पर काम करने के लिए बमुश्किल साल भर का वक्‍त है, लेकिन उनके सपनों और विचारों की दुनिया बहुत बड़ी है। अंशु की चिंताओं का दायरा व्‍यापक है। उन्‍हें इस बात से परेशानी है कि 70 साल पुरानी एक पार्टी आज भी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी छाप क्‍यों नहीं छोड़ पा रही है। उन्‍हें चिंता इस बात की है कि देश में नेताओं की इतनी भीड़ क्‍यों है जबकि क्रांतिकारियों की फसल क्‍यों खत्‍म हो रही है। चुनाव प्रचार में उनके साथियों ने अंशु से कहा था- आप नेता नहीं क्रांतिकारी लगती हैं। अंशु को इस बात की खुशी है। वे क्रांतिकारी ही बने रहना चाहती हैं। उन्‍हें नेता नहीं बनना। लेकिन वे अरविंद केजरीवाल की तरह 'शॉर्ट टर्म की क्रांति' भी नहीं करना चाहतीं। 

कारवां बढ़ता रहेगा... 

अंशु कुमारी से फोन पर हुई लंबी बातचीत ने उम्‍मीद जगाई है कि हिंदी पट्टी अभी संभावनाओं से खाली नहीं हुई है। एक उम्‍मीद और जगी है कि युवाओं की आबादी के मामले में दुनिया में नंबर एक भारत अपनी इस नई फसल से निराश नहीं होगा। अफसोस है तो बस इस बात का, कि इस ऐतिहासिक पल की सुध दिल्‍ली में बैठे नेताओं ने अब तक नहीं ली। अंशु जब कहती हैं कि उनके पास दिल्‍ली की पार्टी लीडरशिप से अब तक कोई फोन नहीं आया, तो उनकी आवाज़ सधी रहती है। वे जानती हैं कि क्रांति के पुराने फॉर्मूलों से इस देश में बदलाव नहीं लाया जा सकता। आइए, इस देश के युवाओं के सबसे ताज़ा बदलावकारी चेहरे पर एक नज़र डालते हैं, खुद अंशु की ज़ुबानी। 


''समाज के खिलाफ आवाज़ उठाने के क्रम में मेरे पिता की हत्‍या कर दी गई थी। कुछ लोग थे जो नहीं चाहते थे कि परिवर्तन हो। हम लोगों को घर में हमेशा से इसके बाद राजनीति से दूर रहने को कहा जाता था। हम लोग बहुत कुछ खो चुके थे। मेरे चाचा नहीं रहे थे। मेरे पापा नहीं रहे। दादाजी नहीं रहे, दादी नहीं रहीं। हम लोग बचपन में अच्‍छे घर से बिलांग करते थे। दिल्‍ली में हम लोगों का अपना घर था। इतना कुछ खोने के बाद आदमी सतर्क हो जाता है न... इसलिए हम लोगों को अलाउ नहीं होता था कि हम लोग राजनीति में जाएं। 

हम लोग इनवॉल्‍व भी होना चाहते थे, तो वहां की सामंती ताकतें धमकियां देती थीं कि आप लोग बच कर रहिए नहीं तो फिर से याद दिलाना होगा... हमारे यहां अमरजीत कौर का, सुभाषिनी जी का स्‍पीच होता था। उन लोगों के साथ रहना जाना होता था। घर से था कि राजनीति से दूर रहना है, लेकिन माहौल तो बचपन से वही था... मम्‍मी इसमें इनवॉल्‍व थीं न! मम्‍मी लगातार पॉलिटिक्‍स में इनवॉल्‍व रहीं, तो मां कहीं आती-जाती है तो बच्‍चा भी साथ में आता-जाता है न! मेरी मां भी कम्‍युनिस्‍ट हैं। संगठन में हैं। मां लेकिन मना करती थी... बोलती थी कि जाओ यहां से, तुम लोगों को ये सब नहीं सुनना है। लेकिन बचपन से इसी माहौल में थे, तो कितना कोई दूर रखेगा! 

बहुत छोटे थे, तो जब पापा और चाचा का डेथ हुआ था, क्रिमिनल लोगों ने मारा था, तो बचपन में जब गांव जाते थे तो दुख होता था।  सोचते थे कि बदला लेना है। लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते गए, तो लगा कि इस सब से कोई फायदा नहीं है। लेकिन एक चीज़ हमेशा होता था कि जब कुछ भी गलत होता था तो बर्दाश्‍त नहीं होता था... बाद में लोग कॉलेज में बोलते थे कि तुम्‍हारे में लीडरशिप क्‍वालिटी है... अच्‍छा लगता था। लेकिन मेरी मम्‍मी कहती थीं कि ऐसा नहीं है... लेकिन आज मम्‍मी बहुत खुश हैं। जब हम खड़े हुए थे तो बहुत खुश थीं, लेकिन ऊपरी मन से बोलती थीं कि क्‍या ज़रूरत है इस सब का। आज वो सबको खुश होकर सबको बता रही हैं। 

...दिल्‍ली से भी कुछ लोग आए हुए थे, जैसे लेनिन... लेकिन वो लोग प्रचार के लिए नहीं आए थे, सिर्फ ऑब्‍जर्वेशन के लिए। हम लोगों को समझाए कि कैसे क्‍या करना है। बहुत लोगों का फोन आया, लेकिन दिल्‍ली से अब तक कोई फोन नहीं आया है। बिहार स्‍तर पर जितने भी लोग थे, जैसे शुत्रुघन बाबू का, बेगूसराय से, राजस्‍थान से, फोन आया सबका। आया भी होगा दिल्‍ली-विल्‍ली से तो हम नहीं रिसीव कर पाए होंगे... ये भी हो सकता है। 

भारत को बोला जाता है कि कृषि प्रधान देश है। हम देखते हैं कि हमारे किसान लोग इसलिए खेती करते हैं कि जीवनयापन करना है। अधिकांशत: ऐसा ही करते हैं। हमें लगता है कि वे ये सोच कर खेती करें कि वो हमारा व्‍यवसाय हो, अर्निंग करेंगे ज्‍यादा से ज्‍यादा, टेक्‍नोलॉजी के साथ... अपने दिमाग को ज्‍यादा से ज्‍यादा यूज़ करेंगे, प्रॉफिट में रहेंगे, अगर ये सोचें तो ठीक रहेगा। इनमें अवेयरनेस की कमी है। हमें बताया जाता है कि हमारे पास रिसोर्सेज़ की कमी है, लेकिन रिसोर्सेज़ की कमी का आज तक हम डाटा नहीं देखे। दरअसल, रिसोर्सेज़ का ऑप्टिमम युटिलाइज़ेशन नहीं हो पा रहा है। जो किसान पढ़े-लिखे नहीं हैं, उन लोगों को अगर नाटक के थ्रू, एनजीओ के माध्‍यम से मोटिवेट किया जाए, तो मोटिवेशन से प्रोडक्‍शन बढ़ेगा। 

फिर एक और चीज हमको सबसे बुरा लगता था... अगर पॉलिटिक्‍स का बात करें तो, संसद वगैरह में लोग कुर्सियां एक-दूसरे पर फेंकते रहते हैं। आप सोच सकते हैं कि हम लोग अपने देश को किस तरह प्रोजेक्‍ट कर रहे हैं। पूरा देश देखता है उनको। जो आदमी, हम ही लोग के  बीच से चुन के वहां पहुंचता है, वो अगर ऐसा बिहेव करता है, तो आम आदमी उससे क्‍या सीख पाएगा। ये सब बहुत बड़ा कारण है कि देश में करप्‍शन बढ़ता जा रहा है। ये सब बंद होना चाहिए। ये सब हमारे देश को बहुत गंदा संदेश देता है। बहुत शर्मनाक है ये सब। 

अब देखिए, हम ही लोग पॉलिटिक्‍स में आए हैं...लोग बोलते हैं कि क्‍या ज़रूरी है पॉलिटिक्‍स में आने का... अगर हम ही लोग ये सोचेंगे तो परिवर्तन कैसे होगा। फिर तो वही गाली-गलौज, वही कुर्सीपलट। क्रांति तो युवा ही देगा न... देश को क्रांति की ज़रूरत है। 

...अन्‍ना हजारे? बहुत शॉर्ट टर्म है उन लोगों का काम। अब देखिए क्‍या होता है कि नेता लोग शांति पर भाषण देते हैं। लंबा-लंबा स्‍पीच देते हैं। जब आप आई कॉन्‍टैक्‍ट कर के ही नहीं बात कर पा रहे हैं तो क्‍या फायदा... ठीक है, लोग अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़े... इतना अशांति हो गया है देश में तो लोग जहां से कुछ मिल रहा है वहीं जुड़ने लगते हैं... लोग बहुत हड़बड़ाए हुए रहते हैं न। सबको शॉर्ट कट चाहिए। 

एक चीज़ और बताएं... ज़रा हट के... कुछ दिन पहले हम लोगों के पार्टी का गोष्‍ठी हो रहा था। जेएनयू से भी लोग आए हुए थे। आप जानते हैं पार्टी की स्‍थापना 1936 की है... ये जो विचारधारा है वो समाजवादी है, पूंजीवादियों की अवहेलना करती है। मेरे दिमाग में बैठे हुए एक सवाल आया कि हम लोग 1936-37 से समानता की विचारधारा पर काम करते आ रहे हैं, न्‍याय के लिए लड़ते हैं, कुरीतियों के खिलाफ लड़ते हैं, फिर भी हमारा आंदोलन रा ष्‍ट्रीय क्‍यों नहीं बन पाया? ये बहुत बड़ा क्‍वेश्‍चन है। बहुत दिन हो गया... हम लोग अलग दिशा में भी नहीं जा रहे। वजह... बहुत सारा है... हमको तो बहुत दिन नहीं हुआ पॉलिटिक्‍स में आए हुए। लेकिन हमको लगता है कि हम लोगों को अपने सोच को थोड़ा सा लोगों के हिसाब से बदलना चाहिए। उसमें एडीशनल चेंजिंग को लाते हुए पेश करना होगा ताकि लोग इसको बेकार के चीज़ों में नहीं लें, अच्‍छे से समझ सकें... 

...विवेकानंद बोलते थे कि बहुत दिनों बाद ऐसा होगा कि जो हम लोग अभी विदेशों का रहन-सहन अपनाते हैं, वो लोग हमारी शांति को देख के हम लोगों के रहन-सहन को अपनाना शुरू होगा... और उसी समय भारत का पतन होगा... विवेकानंद तो आदर्श नहीं, लेकिन उनका कुछ-कुछ सोच अच्‍छा लगता है। जैसे, अवधेश कुमार मेरे आदर्श हैं... 

हमको प्रेमचंद अच्‍छे लगते हैं। हमको मधुशाला बहुत अच्‍छी लगती है... वो सुकून देता है कि, चलो... मधुशाला के अलावा अभी एक पढ़ रहे थे स्‍त्री... हां, वो भी अच्‍छा लगा। उपन्‍यास ज्‍यादा हम नहीं पढ़ पाए हैं... पढ़ाई को लेके हम ज्‍यादा ही.. ये रहते थे। क्रिकेट के बारे में मत ही पूछिए, वैसे सचिन अच्‍छे लगते हैं। मूवी देखते हैं, बहुत कम लेकिन... थ्री ईडियट्स, रंग दे बसंती, मदर... जो कुछ सिखाता हो, समाज को बदलने का बात करता हो। हीरो-हीरोइन का गाना बजाना नहीं अच्‍छा लगता है। 

...अभी जब खड़े हुए थे, तो लोग बोल रहे थे कि आप नेता नहीं, क्रांतिकारी लगती हैं। हमें ज़रा भी दुख नहीं लगा क्‍योंकि सच बताते हैं, हम नेता बनना ही नहीं चाहते हैं। देश में बहुत नेता हो गए हैं, क्रांतिकारियों की ज़रूरत है अब... क्रांति मने परिवर्तन होना चाहिए हमारे समाज में, देश में। आप लोग रूरल का बात नहीं कर रहे हैं, अरबन एरिया का बात कर रहे हैं... अंदर का जो रहन-सहन है... हम तो अभी भी जाते हैं घर तो वही देखते हैं जो दस साल, पंद्रह साल पहले देखते थे। लोग न मूवी को देख के, सीरियल को देख के अपना लाइफस्‍टाइल बदलने में लगे हुए हैं, लेकिन अपनी क्‍वालिटी और एजुकेशन को नहीं देख पा रहे हैं। इतना ही खुल के वे विचारों, शिक्षाओं को ग्रहण करने लगें, तब जाकर परिवर्तन होगा। कुछ-कुछ ऐसा होना चाहिए कि जो आदमी को मोटिवेट कर सके... हर आदमी में इतना कैपेसिटी, एनर्जी होता है कि उसे अगर मोटिवेट कर दिया जाए तो बहुत कुछ हो सकता है। 

लालूजी का राज तो बाप रे... खोखला ही कर के चले गए। एक चीज है, लालूजी जब 1990 में आए थे तो जाति को लेकर के... अब नीतिश जी का भी... जैसे चुनाव हुआ था न तो उसमें था क्‍या कि सारे जो उम्‍मीदवार थे बोलते थे कि विश्‍वविद्यालय को केंद्रीय विश्‍वविद्यालय में बदल देंगे.. सारे के सारे। हमसे जब पूछा गया तो हम बोले कि इतना तत्‍कालीन समस्‍याएं दिखाई देती हैं कि उतना बड़ा हम सोच ही नहीं पाते। उस समय हमसे भी मीडिया पूछा था, तो हम भी बोले थे कि मेरा भी कोशिश रहेगा कि केंद्रीय विश्‍वविद्यालय बन जाए तो बिहार को फायदा होगा। लेकिन महसूस होता था कैम्‍पस में कि, जैसे हमारे नीतिश जी हैं... माननीय मुख्‍यमंत्री... कई सालों से राजनीति किए जा रहे हैं कि बिहार को विशेष राज्‍य का दर्जा दिलवाएंगे। यही राजनीति हमको कैम्‍पस में महसूस होता था कि केंद्रीय विश्‍वविद्यालय बनवाएंगे। हमको बहुत हंसी आती थी... वैसे हम पूरे कैम्‍पेनिंग में वादा नहीं किए थे... मेरा यही कहना था कि आप सब देख रहे हैं... ऐसे आदमी को चुनिए जो आपके अपने बीच का हो... क्‍या होना चाहिए, क्‍या नहीं, सबको पते हैं।  

अभी यहां लिंगदोह कमेटी आई थी इलेक्‍शन में... हमसे मीडिया पूछा लिंगदोह कमेटी के बारे में, हम बोले लिंगदोह अंकल जी को तो हम देखे ही नहीं नोमिनेशन के बाद। कमेटी बोल रही थी कि आप पांच हजार रुपया खर्च कर सकते हैं। एक-एक उम्‍मीदवार थे जो दूसरे संगठन के, उनका एक दिन में पांच हजार से ज्‍यादा पेट्रोल पर खर्च होता था। ई सब बेवकूफी टाइप लगता था... लोगों को ये सब बात समझ में आया... लोग हमको 960 वोट से जिताए। अध्‍यक्ष 1700 वोट पाए हैं और मेरा था 2100 वोट। पूरी युनिवर्सिटी में हमको सबसे ज्‍यादा वोट मिला। एंटी संगठन हमसे बोले कि आप अध्‍यक्ष के लिए क्‍यों नहीं खड़ी हुईं, तो मेरे लिए ये गर्व की बात थी। 

खुशी तो हो रही है, लेकिन अब एक अलग सा जवाबदेही, रिसपॉन्सिबिलिटी लग रहा है। लोगों ने इतने वोटों से जिताया है। हम लोग को तो बहुत सा बात पता भी नहीं है कि क्‍या-क्‍या हम लोग का अधिकार है... इतने साल बाद चुनाव हुआ है। हम लोग का कहना है कि सबको अच्‍छा शिक्षा मिले, डेमोक्रेटिक कैंपस हो। 

देखिए, अगस्‍त में तो अगला चुनाव सुन रहे हैं, लेकिन दिसंबर तक होगा। इसीलिए जिम्‍मेदारी ज्‍यादा लग रहा है कि इतना कम समय है... 

अभी पॉलिटिक्‍स में जाने का तो नहीं सोचे हैं। अभी कैंपस में हम अच्‍छा कर सकेंगे तभी आगे जाएंगे। हम नहीं चाहते हैं कि उन नेताओं में खडे हों जिन्‍हें लोग गालियां देते हैं। गाली सुनने को हम पॉलिटिक्‍स में नहीं जाएंगे, कुछ परिवर्तन कर सके, तभी सोचेंगे...''  

(अभिषेक श्रीवास्‍तव से फोन पर हुआ संवाद ) 


12/10/2012

एफडीआई वोट: संसदीय 'लेजिटिमेसी' की एक और साजि़श


अभिषेक श्रीवास्‍तव



अब, जबकि संसद के दोनों सदनों में मल्‍टीब्रांड रीटेल में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश के खिलाफ भाजपा का अविश्‍वास प्रस्‍ताव गिर गया है और 'तकनीकी' रूप से यूपीए सरकार की जीत हुई है, कुछ बातें विस्‍तार से की जा सकती हैं। एफडडीआई के पक्ष या विपक्ष में जो भी दलीलें मौजूद हैं, उनका भाजपा द्वारा लाए गए अविश्‍वास प्रस्‍ताव से कोई लेना-देना नहीं, इस बात को सबसे पहले समझ लेना बहुत जरूरी है। एफडीआई के पक्ष या विपक्ष की सैद्धांतिकी और एफडीआई पर संसदीय राजनीति दो निहायत ही अलग चीजें हैं। इसके निहितार्थ सू्त्रवाक्‍य के रूप में ऐसे समझिए कि-

1) संसद में एफडीआई पर मतदान में यूपीए सरकार की जीत अपने आप में एफडीआई के पक्ष की सैद्धांतिकी की जीत नहीं है।
2) संसद में भाजपा, वामदल समेत एफडीआई विरोधी अन्‍य दलों (सपा और बसपा को छोड़ दें) की हार अपने आप में एफडीआई के विरोध की सैद्धांतिकी की हार नहीं है।
3) लोकसभा में सपा और बसपा के वॉकआउट तथा एफडीआई पर उनके विरोधी पक्ष को जोड़ कर देखना भ्रामक हो सकता है।
4) राज्‍यसभा में एफडीआई पर यूपीए को बसपा का समर्थन उसकी पूर्व घोषित एफडीआई पर नीति के उलट हो, यह जरूरी नहीं।
5) एफडीआई पर संसदीय राजनीति के अब तक घटे किसी भी अध्‍याय में धर्मनिरपेक्षता आधारित कोई भी तर्क प्रणाली इसे समझने में आपकी मदद नहीं कर सकती।

आइए, जरा इन बातों को विस्‍तार से समझते हैं। लोकसभा और राज्‍यसभा में एफडीआई पर वोटिंग के संदर्भ में सबसे ज्‍यादा टीका-टिप्‍पणी सपा और बसपा की भूमिका को लेकर हुई है। दो तरह की बातें कही जा रही हैं। पहली आलोचना तकनीकी किस्‍म की है जिसमें यह गिनाया जा रहा है कि अगर लोकसभा में पूरे 545 सदस्‍य उपस्थित होते और सभी वोटिंग करते, तो अपनी-अपनी पार्टियों के पूर्व घोषित पक्ष के मुताबिक वे यूपीए सरकार पर भारी पड़ जाते। इसी आधार पर यह कहा जा रहा है कि ऐसे निर्णायक मौकों पर सदन से गायब हो जाना या बहिष्‍कार कर देना एक 'धंधा' बन चुका है। इस तरह की आलोचना करने वालों से दो सवाल पूछे जा सकते हैं। पहला तो ये कि क्‍या जरूरी है कि जो सांसद गैर-मौजूद रहे, वे वहां रहकर भी वही वोट देते, जो उनकी पार्टी की पूर्व घोषित नीति है? यहां टीडीपी के उन तीन राज्‍यसभा सांसदों का ध्‍यान रखें जिन्‍होंने पार्टी व्हिप के बावजूद शुक्रवार को सदन में अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करवाई। तकनीकी पक्ष पर आलोचना करने वालों से दूसरा सवाल यह बनता है कि यदि एफडीआई जैसे जनविरोधी और पूंजी हितैशी मुद्दे की बात न होकर यहां कोई ऐसा मुद्दा होता जो लंबी अवधि में वास्‍तव में इस देश की बहुसंख्‍य जनता का फायदा करता, तब भी क्‍या वे आंकड़ो पर आधारित दलील तक टिके रहते? दरअसल, 545, 471, 218, 253 जैसी संख्‍याओं से जिस किस्‍म की अर्थछवियां और तर्क प्रणाली विकसित करके मल्‍टी ब्रांड रीटेल में एफडीआई का विरोध किया जा रहा है, वह हमें दो खतरों की तरफ ले जा रहा है। पहला खतरा तो यही है कि हम संसदीय कार्यपणाली की आलोचना करने के लिए उन्‍हीं संसदीय औजारों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं जिनकी मदद से हमारे नेताओं ने संसद को धोखा बना दिया है। दूसरे, इस तरह की आलोचना में वैचारिक कंटेंट गायब है। ऐसा लगता है गोया एफडीआई पर संसदीय राजनीति और सपा-बसपा के असंबद्ध व्‍यवहार से आहत टिप्‍पणीकार दोनों ही अपने-अपने पाले में खड़े रहकर एफडीआई को अंतत: आंकड़ेबाजी के एक खेल में तब्‍दील करने का काम किए जा रहे हैं। संसद में ऐसा सचेतन तौर पर होता है जबकि पिछले तीन दिनों से इस पर लिख-पढ़ रहे लोग अनजाने में 'तकनीकी' जगलरी में फंस गए हैं।

जो लोग इस मुद्दे पर तकनीकी आलोचना नहीं कर रहे, वे सपा-बसपा के वॉकआउट को भाजपा विरोधी सेकुलर राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। 7 दिसंबर 2012 के द हिंदू का संपादकीय देखें जिसमें कहा गया है कि सपा और बसपा के लोकसभा से वॉकआउट करने के पीछे उनकी सेकुलर राजनीति है। यह तर्क समझ से परे है। आइए,  अलग-अलग सपा और बसपा दोनों के सिद्धांत और व्‍यवहार के बीच की फांक का जायजा लेते है। पिछले कुछ दिनों के दौरान यह बात कई जगह प्रमुखता से आई है कि भारत के असंगठित रीटेल क्षेत्र में अधिकतर कामगार मुस्लिम हैं। मिस्‍त्री, कारीगर, किराना की दुकान चलाने वाले, दर्जी, रंगरेज, रफूगर, ताला बनाने वाले से लेकर सब्‍जी और फल बेचने वालों पर नजर डालिए, तो अधिकतर मुस्लिम नज़र आएंगे। कुछ जगहों पर असंगठित रीटेल क्षेत्र में मुस्लिमों का आंकड़ा 40 फीसदी तक बताया गया है। इसी समुदाय की पीठ पर खड़े होकर फिर से उत्‍तर प्रदेश की सत्‍ता में आए मौलाना मुलायम बड़े अच्‍छे से जानते हैं कि अपने वोट बैंक के बीच कोई संदेश कैसे भेजा जाता है और उसके उलट असल राजनीति कैसे की जाती है। आप कहते रहिए कि लोकसभा में सपा का बहिष्‍कार यूपीए सरकार को जिता गया, लेकिन मुलायम ने ऐसा करके एक तीर से दो शिकार किए। पहला तो ये, कि अपनी सनातन मजबूरी यानी सीबीआई से बचने के लिए कांग्रेस का समर्थन चुपके से कर दिया जबकि दूसरी ओर वॉकआउट का इतना हल्‍ला मचा कि प्रदेश के मुस्लिमों समेत समूची आबादी में ये संदेश चला गया कि मौलाना ने छोटे-छोटे कारीगरों और दुकानदारों के पेट पर लात मारने वाले एक फैसले के खिलाफ संसद का बहिष्‍कार किया है। यह दावा तो नहीं किया जा सकता, लेकिन मौटे तौर पर जनता की समझ का अंदाजा लगाते हुए कहा जा सकता है कि जब तक चीख-चीख कर न समझाया जाए, तब तक वह नहीं समझेगी कि यह वॉकआउट दरअसल, तकनीकी रूप से एफडीआई को समर्थन का पर्याय था। इस तरह समाजवादी पार्टी ने अपने पूर्व घोषित पक्ष को अंत तक सार्वजनिक वैधता दिलाए रखी और कोने में सौदा कर लिया। यह तकरीबन वैसी ही बात है कि मंच पर खड़े होकर आप सत्‍ता को गाली दें और समझौते की मेज पर लोट जाएं। इस कवायद को जिन्‍हें सीबीआई के संदर्भ में समझना है वे बाखुशी समझ सकते हैं। हालांकि, सीबीआई का फंदा एक दलील के तौर पर सिद्धांत और व्‍यवहार के बीच की फांक का राजनीतिक सरलीकरण कर देता है। यह बात बसपा के संदर्भ में ज्‍यादा साफ तौर पर समझी जा सकती है।

बसपा ने राज्‍यसभा में यूपीए का समर्थन किया है जबकि लोकसभा में वह वॉकआउट कर गई है। एफडीआई पर संसद के भीतर ही इस दोगलेपन को कैसे परिभाषित करेंगे? यहां सीबीआई की दलील काम नहीं आएगी। पहले सिद्धांत की बात करते हैं। दलित राजनीति में आंबेडकरवादी धारा (जिसकी बसपा भी पोषक है, बल्कि सबसे प्रमुख) हमेशा से यह मानती आई है कि विदेशी पूंजी इस देश में जातिवादी शोषण की बेडि़यों को कमजोर करेगी। डॉ. आंबेडकर कहा करते थे कि अंग्रेजी शेरनी का दूध है; डॉ. चंद्रभान प्रसाद अंग्रेजी देवी के मंदिर तक आ गए; 2005 में सेज (विशेष आर्थिेक प्रक्षेत्र) अधिनियम पर दलित पार्टियों और संगठनों की पक्षधर एकता से आगे बढ़ते हुए एफडीआई पर राज्‍यसभा में बसपा ने खुलकर यूपीए का समर्थन कर दिया और अब जरा एक दलित-पिछड़ा  बुद्धिजीवी(?) का दिलचस्‍पी की हद तक मूर्खतापूर्ण फेसबुक स्‍टेटस देखिए- अगर भाजपा और सीपीएम दोनों एक साथ एफडीआई का विरोध कर रही हैं, तो एफडीआई में जरूर वंचितों का कोई फायदा होगा...।' यह सिलसिला यूं ही नहीं बना है। मायावती को तो खैर, आइडियोलॉजी आदि से क्‍या ही लेना-देना, बावजूद इसके यदि अपनी कार्रवाई के समर्थन में वे पारंपरिक अंबेडकरवादी दलील दे डालें, तो आप क्‍या कर लेंगे? यह बात इतनी भी दूर की कौड़ी नहीं, हां यह भी सच है कि उनके वोट बैंक का एफडीआई के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। देखिए कि किस तरह सपा और बसपा दोनों को ही कठघरे में खड़ा करना कितना मुश्किल हो जाता है जब आप उनके किए का तर्क तलाशने चलते हैं। एक अंग्रेजी के अखबर ने अपने संपादकीय में 8 दिसम्‍बर 2012 को ठीक ही लिखा है कि एफडीआई चुनावी मुद्दा बनने नहीं जा रहा। क्‍या भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा चुनावी मुद्दा बना था? क्‍या उड्डयन क्षेत्र में एफडीआई आज आपको याद भी है?


साभार: ऑर्गनाइज़र 
जैसा कि सबसे ऊपर कहा, एफडीआई वोट पर यूपीए की जीत 'तकनीकी' है। समझने वाली बात यह है कि सिर्फ जीत ही तकनीकी नहीं है, बल्कि हारने-जीतने का यह समूचा खेल ही तकनीकी है। संसद और संसदीय राजनीति की अपनी एक तकनीक होती है जहां गंभीर से गंभीर 'नैतिक' मुद्दा भी तकनीक का शिकार हो जाता है। उसके पक्ष या विपक्ष में प्रस्‍ताव भी तकनीकी ही होता है और मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाने वाली प्रक्रिया का हर चरण सिर्फ और सिर्फ तकनीकी होता है जो अंतत: किसी 'जेनुइन' प्रश्‍न को एक तकनीकी 'हां' और 'ना' में बदल देता है। बंद गली वाली बहसों के लिए कुख्‍यात अर्णब गोस्‍वामी को कितनी भी गालियां दी जाएं, लेकिन वह दरअसल 'लोकतंत्र का मंदिर' है जहां 'एज़' और 'नोज़' देश को बेचकर खा जाने वाली नीतियों पर बहस की गुंजाइश को खत्‍म कर के दलाली की गुंजाइश को जिंदा किए रखते हैं। इसीलिए, न तो समाजवादी पार्टी को वॉकआउट करने में शर्म आती है, न ही बसपा को राज्‍यसभा में यूपीए की मदद करने में शर्म आती है। यही वजह है कि 2002 में एफडीआई लाने की नाकाम कवायद कर चुकी भाजपानीत एनडीए की आस्‍था मात्र दस साल में पलट जाती है और भाजपा एफडीआई के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव ला देती है। आस्‍था पलटती भी है तो ऐसी पलटती है कि लोकसभा में हारने के बाद न तो सुषमा स्‍वराज को शर्म आती है न ही सीताराम येचुरी को- विडंबना देखिए कि तकनीक के इस पूरे खेल में हार के बाद अपनी जीत घोषित करने के लिए उसी 'नैतिकता' का सहारा लिया जाता है जिसे बीस बरस पहले हमारी संसदीय राजनीति घोल कर पी चुकी है। नैतिकता का यह अवसरवादी डायरिया अगले दिन के अखबारों के संपादकीय में भी दिखता है जो लिखते हैं कि 'यूपीए की तकनीकी जीत हुई है, नैतिक नहीं'। यह दिक्‍कत दरअसल हमारी है कि हम अब भी संसद की चक्‍की में नैतिकता के बीज खोजते फिरते हैं।

सबसे ऊपर एफडीआई के पक्ष या विपक्ष की सैद्धांतिकी और एफडीआई पर संसदीय राजनीति के बीच फर्क के जो निहितार्थ मैंने गिनाए हैं, ज़रा उन पर दोबारा नज़र डालें। अब यह बात शायद साफ हो स‍के कि संसद में उठने वाले मुद्दों, होने वाली बहसों, मतदान और फैसलों आदि का कम से कम दो चीजों से संबंध नहीं है- पहला, लोकतांत्रिक चुनावों से (चुनाव में जीत/हार से) और दूसरा एक राज्‍य के तौर पर भारत की नीतिगत दिशा से। कोई दल या सांसद संसद में क्‍या स्‍टैंड लेता है, उससे उसकी चुनावी किस्‍मत तय नहीं होती। भारतीय जनता की किस्‍मत तो वह बिल्‍कुल नहीं तय करता। एक सवाल पूछने का मन करता है कि क्‍या कोई ऐसा शख्‍स है जिसे लग रहा था कि एफडीआई वोट पर यूपीए सरकार हार जाएगी? यूपीए की जगह एनडीए सरकार होती तब भी यही होता जो आज हुआ है। यह बात शायद दस साल बाद और बेहतर समझ आ सके। मामला उस आवारा सामराजी पूंजी का है जिसे इस देश में नया पता-ठिकाना तलाशना है क्‍योंकि उसके अपने देश में उसकी दाल नहीं गल रही। हमारे यहां जनप्रतिनिधि बन कर संसद में बैठे लोग बुनियादी तौर पर उस पूंजी के चाकर हैं। रस्‍मी तौर वे संसद में कुछ परंपराएं निभा लेते हैं। भाजपा का अविश्‍वास प्रस्‍ताव और उस पर मतदान इसी की एक झलक था। आखिर पिछले सत्र में भाजपा ने 'संसदीय गरिमा' को जो नुकसान पहुंचाया था और जनता के मन में जो खटास भर दी थी, उसका रेचन करने की जिम्‍मेदारी तो सभी दलों के जिम्‍मे थी। इस बार एफडीआई पर 'स्‍वस्‍थ बहस' को देख-सुन कर लोगों को वास्‍तव में लगा है कि संसद ने अपना काम ठीक से किया है, उनका भरोसा संसदीय लोकतंत्र में वापस बैठ गया है। कुछ समझदार लोग सुषमा स्‍वराज, अरुण जेटली आदि की दलीलों के मुरीद हो गए हैं। मेरा मानना है कि यदि टीआरपी की गणना चालू रहती (जो ट्राई ने चार महीने के लिए रोक दी है), तो शायद एफडीआई पर संसदीय बहस की टीआरपी सबसे ज्‍यादा होती। सोचिए, फिर यह 'जीत' किसके खाते में जाती है? 

यह यूपीए की 'तकनीकी जीत' नहीं, उस संसदीय लोकतंत्र की जीत है जिसे धोखे की टट्टी की तरह जनता की आंखों के सामने लटका दिया गया है ताकि पिछले दरवाज़े से उसका गला घोंटने का सामान आयात करने में सहूलियत हो सके। इस पिछले दरवाज़े का इस्‍तेमाल हर दल अपने-अपने तरीके से करता है, सो इस बार बसपा और सपा ने कर लिया। बस इतनी सी बात है। आखिर संसदीय 'लेजिटिमेसी' के अलावा इस देश के शासकों को और चाहिए भी क्‍या!  

12/08/2012

500 हत्‍यारों के सवा अरब साझीदार!!!

पिछले 22 साल में जम्‍मू और कश्‍मीर में 8000 से ज्‍यादा लोगों की गुमशुदगी, 70,000 से ज्‍यादा लोगों की मौत और 6000 अज्ञात अपहचानी क़ब्रों का गुनहगार कौन है? क्‍या आप उनके नाम जानते हैं? भारतीय नियंत्रण वाले कश्‍मीर में मानवाधिकार पर अंतरराष्‍ट्रीय जन पंचाट (आइपीटीके) और गुमशुदा लोगों के माता-पिताओं के संगठन (एपीडीपी) ने दो बरस की मेहनत के बाद एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट चौंकाने वाली है। कुल 355 पृष्‍ठ की इस रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्‍लंघन के 214 मामलों के गुनहगार 500 से ज्‍यादा सरकारी अधिकारियों का परदाफाश किया गया है। इनमें भारतीय सेना के दो मेजर जनरल, तीन ब्रिगेडियर, नौ कर्नल, तीन लेफ्टिनेंट कर्नल, 78 मेजर, 25 कैप्‍टन समेत एक अवकाश प्राप्‍त पुलिस महानिदेशक का भी नाम शामिल है। यह रिपोर्ट गुरुवार को कश्‍मीर में जारी की गई थी। सिवाय दी हिंदू के और किसी मुख्‍यधारा के अखबार ने इसे प्रकाशित नहीं किया है (http://www.thehindu.com/news/national/top-army-police-officials-involved-in-human-rights-abuse-in-kashmir/article4171847.ece) टीवी चैनलों की तो बात ही छोड़ दें। संसद चल रही है, लेकिन तीन दिन के दौरान कहीं कोई जि़क्र तक किसी सदन में इस रिपोर्ट का नहीं आया। कश्‍मीर के गुनहगारों के नाम पर इस हैरतनाक राष्‍ट्रीय चुप्‍पी ने हम सब को हत्‍यारों का साझीदार बना दिया है।
 
रिपोर्ट ''अलेज्‍ड परपेट्रेटर्स: स्‍टोरीज़ ऑफ इमप्‍यूनिटी इन जम्‍मू एंड कश्‍मीर'' बहुत लंबी है, इसलिए हम यहां इसका सार दे रहे हैं। पूरी रिपोर्ट नीचे दिए गए आवरण पर क्लिक कर के डाउनलोड की जा सकती है।
 
रिपोर्ट डाउनलोड करने के लिए इस चित्र पर क्लिक करें

Alleged Perpetrators: Stories of Impunity in J&K

 
Executive Summary
This report, prepared over two years using information gleaned mostly from official State documents, portrays the state of impunity prevalent in Jammu and Kashmir. Where identities of individual perpetrators of crimes are known it seeks a process of accountability for institutional criminality.
 
In the highly militarized space of Jammu and Kashmir, it reveals an entrenched culture of impunity. Cases of human rights vio lations committed by members of various State forces are analyzed within the context of an occupation, an armed conflict, and a state of structural impunity. These have evolved within State institutions, including the armed forces, and traverse the application and interpretations of special laws, and finally the judicial system itself.
 
The defining feature of human rights violations here is that in the name of countering militant violence the Indian State authorizes armed forces to carry out every kind of operation, often without adherence to laws and norms. In a majority of cases crimes are n ot noted or investigated at all. Therefore, any listing or analysis of cases in this report would inevitably be an incomplete one.
 
However, even the rudimentary statistics contained in it reveal an appalling picture. Out of 214 cases a list emerges of 50 0 individual perpetrators, which include 235 army personnel, 123 paramilitary personnel, 111 Jammu and Kashmir Police personnel and 31 Government backed militants/associates. The designations of some of these alleged perpetrators points to a deep institutional involvement of the Indian State in the crimes. Among the alleged perpetrators are two Major Generals and three Brigadiers of the Indian Army, besides nine Colonels, three Lieutenant Colonels, 78 Majors and 25 Captains. Add to this, 37 senior officials of the federal Paramilitary forces, a recently retired Director General of the Jammu and Kashmir Police, as well as a serving Inspector General.
 
This report also seeks to turn the focus on identities of alleged perpetrators of crime and atrocity. Therefore, rather than a general reference to, for  example,  the  Rashtriya  Rifles,  names  and  ranks  of  officers  of  this  counter-insurgency  force  are  mentioned.  This  stems  from  the understanding that despite a culture of systemic impunity that exonerates perpetrators, it is individuals who commit violations, and they must first and foremost bear responsibility for their acts. By naming names the report seeks to remove the veil of anonymity and secrecy that has sustained impunity. Only when the specificity of each act of violation is uncovered can institutions be stopped from providing the violators a cover of impunity.
 
The institutional culture of moral, political and juridical impunity has resulted in enforced and involuntary disappearance of an estimated 8000 persons [as on Nov 2012], besides more than 70,000 deaths, and disclosures of more than 6000 unknown, unmarked and mass graves. The last 22 years have also seen regular extra-judicial killings punctuated by massacres. The Gow Kadal [Srinagar] massacre of around 50 persons on 21 January 1990 and other mass killings discussed in this report are symbolic reminders of the persistent human rights violations in Jammu and Kashmir.
 
The concept of individual criminal responsibility is well established under international criminal law. From Nuremberg to the United Nations ad hoc tribunals – like the International Criminal Tribunal for Rwanda, and the International Criminal Tribunal for the Former Yugoslavia - to the most recent, the International Criminal Court [ICC], the focus of international law has gradually moved from laying responsibility for crimes from the general the State to the individual – the perpetrator.
 
This is not to suggest that the institutions and the State bear no responsibility: in fact, it is clear that it is the Indian State that fosters a climate of impunity in Jammu and Kashmir. As principles of command responsibility have been elaborated and evolved under international criminal law, along with other principles of individual criminal responsibility, such as Joint Criminal Enterprise, it is clear that individual perpetrators of crimes own only a certain part of the final responsibility. This is particularly true in case of organized structures such as the armed forces, where senior officers [and often, the government] also bear responsibility.
 
But, by focusing on individuals, the anonymity that protects the perpetrators of actual crimes can be eroded. By specifically naming alleged perpetrators, institutional cover is no longer allowed to shield them, thereby allowing for greater transparency and accountability. To facilitate justice, understanding of the specific is critical in order to allow for a greater understanding of the general.
 
Cases presented in this report reveal that there is an overwhelming reluctance to genuinely investigate or prosecute the armed forces for human rights violations. There is an occasional willingness to order compensatory relief, but not to bring the perpetrators to justice. Without adequate prosecution, and fixing of individual criminal responsibility, monetary compensation is at best a weak palliative measure, and at worst a bribe to buy the silence of the victims.
 
The role of the judiciary in a conflict zone is a vital and, often, only hope available for ensuring justice. It must serve as an effective check on the executive and be vigilant in ensuring that human rights of individuals are not violated. Despite the occasional passing of st rong orders, this report contains numerous examples of the High Court effectively condoning the continuation of violations. The general experience in Jammu and Kashmir has been that the judiciary has allowed itself to be conscious of the power and will of the executive, thereby rendering itself subservient to the State.
 
Domestic processes of justice also do not appear willing to consider violations within this conflict in the light of relevant international humanitarian law i.e. the Geneva Conventions (1949), the Additional Protocols (1977), or international criminal law, as Ind ia has not yet legislated on crimes of Genocide, Crimes against Humanity and War Crimes. Domestic Indian law does not even criminalize Enfo rced Disappearance or Torture‖, which means that it is unable to prosecute perpetrators of such crimes, thus depriving the people of appropriate instruments to force prosecution.

Unwillingness of the Indian State to address human rights issues in Jammu and Kashmir has been most recently displayed by the Government of Jammu and Kashmir Home Department submission to the State Human Rights Commission [on 13 August 2012] about action taken on its recommendations of 19 October 2011 regarding unmarked and mass graves in three districts of North Kashmir. This submission exhibits an unwillingness to correctly appreciate the concerns of its own State institution, the SHRC, and a purported inability to take any action. For example, on the question of conducting Deoxyribose Nucleic Acid [DNA] tests on the bodies interred in the graves, it is stated that with only
15/16 recognized labs in the Government as well as in the Private Sector, in the entire country a comprehensive process cannot be undertaken.
Instead, a ludicrous and unique solution is put forward: a blood relation of the victim should be in a position to indicate with fair amount of certainty the exact location of the graveyard and the grave which is now sought to be re-opened. This unwillingness of the Indian State to critique itself therefore requires focused attention from the international community.
 
In the context of the Kashmir conflict the IPTK does not consider this report to be a definitive or exhaustive list of alleged perpetrators. It merely seeks to begin a process of accountability. The cases chosen are those where the IPTK has received information. In a State where institutions – such as the police have proven ineffective, a majority of the violations have in fact not been investigated. Therefore, the names of alleged perpetrators in a majority of cases are officially unknown, though certainly part of living public memory.
 
This report does not attempt to travel through the chain of command to establish the full list of all possible perpetrators who could be held responsible for specific crimes. Further investigations would be necessary to understand more comprehensively the role of superior authorities involved in these crimes.
 
What is striking is that the documents in possession of the State itself indict the armed forces and the police by providing reasonable, strong and convincing evidence on the role of the alleged perpetrators in specific crimes.
 
The IPTK does not however believe that the entirety of the crime, including the role of alleged perpetrators, is captured in any one of the specific cases analyzed. Drawing from principles of Command Responsibility and Joint Criminal Enterprise under international criminal law, it is clear that only further non-partisan investigations would bring to light the entirety of criminality and culpability for each of the crimes documented in this report.
 
Despite available documents that indict the alleged perpetrators, the response of the Jammu and Kashmir Police, Government of Jammu and Kashmir and the Indian State has been woefully inadequate. From denial of sanction for prosecuting members of armed forces u nder the Armed Forces (Jammu and Kashmir) Special Powers Act, 1990 [AFSPA] to limited prosecutions of members of the Jammu and Kashmir Polic e and civilian associates of the armed forces, the Indian State and its functionaries appear to have played a direct role in the commission of crimes and subsequent cover ups.
 
The list of alleged perpetrators, their ranks, units and area of operations strongly suggest that the crimes listed within th is report occurred across Jammu and Kashmir, across various armed forces and the police, and at various levels of the hierarchy of each of these government forces.
 
The cases discussed in this report go contrary to the Indian State narrative of human rights violations as mere aberrations. Crimes in Jammu and Kashmir have not been committed despite the Indian State but because of it. The structures of the Indian State, including the Government of Jammu and Kashmir, must be accused of not just standing by while human rights violations have taken place, but carry a far hi gher culpability. They must be accused of willfully putting in place structures specifically meant to carry out these crimes.
 
For reasons attributable more to the IPTK and less to the all pervading criminality in the region, districts such as Baramulla, Kupwara and Srinagar receive more focused attention in this report, although the cases are from all over Jammu and Kashmir. The official designations of the alleged perpetrators and the geographical spread of the crimes committed against the people of Jammu and Kashmir indicate a decisive will of the Indian State, carried out by its functionaries as part of a design.
 
Numerous cases in this report reveal that volumes of evidence exist of crimes committed by specific perpetrators, assisted by a system where impunity is available right from the commission of the crime to the ultimate cover up.
 
Based on the information before it, the IPTK cannot conclusively pronounce on the guilt of any of the alleged perpetrators, b ut it is clear that enough evidence exists to warrant further action. However, in the absence of any institutional or political will to take the evidence to its natural conclusion – a trial where the crime and the guilt of a perpetrator can be proven beyond reasonable doubt the Indian State stands indicted.

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