1/02/2012

माज़ी से दामन मेरा अटका सौ-सौ बार...

एक छोटा सा शेर कैसे-कैसे और किन-किन संदर्भों में लागू हो सकता है, उसकी ताज़ा मिसाल 1 जनवरी 2012 को मेरे साथ हुई दुर्घटना है। ये बताने से पहले कि क्‍या हुआ, ज़रा बैकग्राउंडर पर नज़र डाल लेते हैं।

बात 2003 की है। जिन लोगों ने दिल्‍ली में यूपी बॉर्डर पर ग़ाज़ीपुर का फ्लाईओवर बनते देखा और महसूस किया है, वे मेरा दर्द साझा करेंगे। उस वक्‍त ग़ाज़ीपुर की तथाकथित रेडलाइट पर सिर्फ धूल उड़ा करती थी और जाम लगा करता था। क्षितिज पर सूरज डूब रहा हो या उग रहा हो, एकाध उचकी हुई क्रेन से लटका लोहे का फंदा हमेशा धरती को चुनौती देता था। ऐसा दृश्‍य आजकल आपको जनपथ पर देखने को मिल जाएगा। बात तब की है। एक शाम किसी ड्राई डे पर मैं और व्‍यालोक पाठक आनंद विहार के ठेके से लौट रहे थे। सात बजे के आसपास, जब जाम अपने परवान पर था और हर रास्‍ता एक सा दीखता था, कोई ऑटो जाने को तैयार नहीं हो रहा था। हमने तय किया कि एक डीटीसी बस में बैठ कर सड़क पार कर लेंगे। सबसे पीछे की सीट पर हम बैठ गए। उस वक्‍त बस जाम में फंसी थी। जाम खुला। सारी गाडि़यां चलीं, लेकिन हमारी बस घोड़े की तरह उचकी और हिनहिना कर बैठ गई। पता चला पिछला टायर पंचर हो गया है। बड़े अरमान से लंबे समय बाद हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बैठे थे, आधे घंटे बाद भी खुद को वहीं पाकर भनभना गया मन। सोचा आज से पब्लिक ट्रांसपोर्ट में नहीं चलेंगे।

यह संकल्‍प साल भर पहले भी मैं एक बार ले चुका था, जब अपनी पत्‍नी को उसके घर छोड़ कर आते वक्‍त पालम में रात साढ़े नौ बजे मुझे मुनीरका की कोई बस नहीं मिली थी। जेब में पैसे नहीं थे और रात पालम रेलवे स्‍टेशन पर गुज़ारनी पड़ी थी। मेरे मित्र बहुत गाली देते थे मुझे उस दौरान क्‍योंकि यूनीवार्ता में मेरी तनख्‍वाह होती थी 6000 और ऑटो से दफ्तर आने-जाने में मैं 3000 फूंक देता था। मेरा लॉजिक लोग तब भी नहीं समझते थे।

खैर, ग़ाज़ीपुर की घटना के बाद न मैं और न ही व्‍यालोक डीटीसी से चले। बात 2005 की है जब मैं शादी कर चुका था। मित्रों के कई बार ये कहने पर कि घर चलाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, एक बार पत्‍नी के आग्रह पर मैं साउथ एक्‍स में नोएडा की 392 में बैठ गया। अनुभव से लिया सबक भुला दिया। नतीजा, ठीक डीएनडी के बीचोबीच बस में शॉर्ट सर्किट हो गया। धुआं निकलने लगा और भगदड़ मच गई।

इसके दो साल बाद की बात है जब हम लोग हर इतवार आईटीओ के शहीद पार्क में नियमित साहित्यिक-सांस्‍कृतिक बैठकें किया करते थे। हमारे नियमित और मौसमी साथी थे अजय प्रकाश। उन्‍होंने भी नई-नई शादी की थी। सितंबर 2007 रहा होगा। अजय और उनकी पत्‍नी प्रेमा ने आग्रह किया घर चलने का, शायद लिट्टी चोखा का प्रोग्राम था। आईटीओ से हम डीटीसी में बैठे। ठीक आईटीओ पुल के बीचोबीच आकर फिर शॉर्ट सर्किट हुआ और बारिश में भीगते हुए हम सभी पांडव नगर पैदल पहुंचे।

अभी हफ्ता भर पहले कॉफी हाउस पर अजय प्रकाश पूछने लगे कि आप कैसे जाएंगे, मैंने सकुचाते हुए जवाब दिया कि ऑटो से जाऊंगा। पता नहीं उन्‍हें मेरे ये अनुभव याद हैं या नहीं, लेकिन अब भी बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है जब सामने वाला कहता है कि चलिए मेट्रो से चलते हैं और मैं ऑटो से निकल जाता हूं। पिछले हफ्ते बड़ी मुश्किल से पंकज बिष्‍ट जी के साथ मेट्रो से कनॉट प्‍लेस तक गया, मना नहीं कर सका।

ऐसा नहीं कि मेट्रो से मुझे कोई दिक्‍कत है, लेकिन अनुभव के मामले में मेट्रो और डीटीसी मेरे लिए तकरीबन एक से रहे। इसीलिए कल यानी साल के पहले दिन, जबकि मेरा मूड सुबह-सुबह रसूलन बाई की ठुमरी सुन कर चउचक था, पत्‍नी ने जब कहा कि उनके घर मेट्रो से चलना है तो मैं तजुर्बे को धता बताते हुए तैयार हो गया। पालम पहुंचा। शाम को वहां रहा और रात नौ बजे निकलने को हुआ, तो याद आया कि भाई, इस बार तो सब कुछ ठीक जा रहा है। मैंने ससुराल में ही पत्‍नी को चेताया कि मेट्रो से चलना ठीक नहीं है, कैब मंगा लेते हैं। वो नहीं मानीं। लिहाज़ा ठीक रात 9.20 पर द्वारका सेक्‍टर 21 में वैशाली की मेट्रो पर चढ़ा। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास बन चुका है।

अगले ही स्‍टेशन पर उद्घोषणा हुई कि 'तकनीकी खराबी के कारण इस यात्रा में विलम्‍ब हो सकता है'। मैंने कोई मौका नहीं गंवाया, तुरंत रेडियो टैक्‍सी को फोन किया कि द्वारका सेक्‍टर 14 के स्‍टेशन पर आ जाए। पूर्वाभास में मेरा काफी यक़ीन है, मैं जानता था कि कुछ तो होगा आज। कैब वाले का फोन अब तक नहीं आया है। (कंपनी का नाम है सुपरकैब्‍स, सबसे सस्‍ता होने का दावा करती है एनसीआर में, कभी मत डायल कीजिएगा, धोखा खा जाएंगे)। बहरहाल, मेरी पत्‍नी आश्‍वस्‍त थीं कि मेट्रो में ये सब होता ही रहता है। सच मानिए, दो घंटे में हम पटेल नगर पहुंचे, ठीक साढ़े ग्‍यारह बजे। कोई चारा नहीं था। एक मित्र ने बताया कि इंडिया टीवी पर तकनीकी खराबी की खबर चल रही है। मैंने कस्‍टमर केयर पर फोन किया, किसी ने नहीं उठाया। मोबाइल पर खबर देखी कि 1 जनवरी से ही डीएमआरसी का हेल्‍पलाइन नंबर बगैर सूचना के बदल दिया गया है। फिर मैंने एक पीआरओ महेंदर यादव को फोन लगाया (9810497397), ये भी नहीं उठा। फिर मैंने कंट्रोल रूम फोन लगाया (22561231), जिन सज्‍जन ने उठाया उन्‍होंने बड़ी विनम्रता से कहा कि मैं अनुज दयाल (सीपीआरओ, डीएमआरसी) को मेल कर दूं। खरामा-खरामा चल रही मेट्रो में मेरा खून 99 डिग्री सेंटीग्रेड पर पहुंच चुका था। मैंने ट्वीट किया। फेसबुक पर गाली दे डाली। कोई सुनवाई नहीं।

रात एक बजे के आसपास गाड़ी निर्माण विहार पहुंची और रुक गई। मैंने फिर कंट्रोल रूम फोन लगाया। उसने शुभ सूचना दी कि फॉल्‍ट ठीक हो गया और गाडि़या नॉर्मल चल रही हैं। मैंने कहा, गाड़ी तो खड़ी है। वो चुप हो गया। फिर मैंने स्‍टेशन मैनेजर को फोन लगाया (8800793201), फोन नहीं उठा। फिर मैंने निर्माण विहार के स्‍टेशन मैनेजर के लैंडलाइन पर मिलाया, फोन काट दिया गया (64736452)। तीन बार के बाद किसी ने उठाया और बेहद निरुपाय-असहाय सी हालत में माफी मांग ली। कहा, सर वोल्‍टेज नहीं आ रहा है लाइन में। मैं फिर नेट पर गया। देखा, कल ही मेट्रो मैन श्रीधरन ने किसी मंगू सिंह को डीएमआरसी के मैनेजिंग डायरेक्‍टर का पद सौंपा है। मैंने फिर फेसबुक पर लिखा। अब डेढ़ बज चुके थे। उद्घोषणा हुई- ये गाड़ी तकनीकी खराबी के कारण सिर्फ आनंद विहार तक जाएगी। आनंद विहार पहुंचने में करीब 20 मिनट लग गए। बाहर कोई ऑटो नहीं, कोई रिक्‍शा नहीं। सवा दो बजे घर पहुंचा हूं बड़ी मुश्किल से।

मेरी पत्‍नी इस बात को अब समझ चुकी हैं कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मेरा रिश्‍ता बुनियादी तौर पर गड़बड़ है। मेरे पीछे अब भी शायद चार-पांच महिलाएं आनंद विहार पर ऑटो-रिक्‍शे का इंतज़ार कर रही हैं। एक वृद्ध कपल ग़ाजि़याबाद शहर जाने के लिए बेबस खड़ा है। तीन लोगों की ट्रेन छूट चुकी है। और सारे पीआरओ/सीपीआरओ चैन की नींद सो रहे हैं।

फि़लहाल, एक ही शेर बार-बार याद आ रहा है....

माज़ी से दामन मेरा अटका सौ-सौ बार
माज़ी ने दिया हमको झटका सौ-सौ बार
चले थे माज़ी के दोश पर चढ़ने हम
माज़ी ने ला-ला कर पटका सौ-सौ बार।

(माज़ी यानी अतीत और दोश यानी कंधा)

नए साल की रात ऐसे बीतेगी, भला किसने सोचा होगा...


NO TO DELHI METRO!!!

4 टिप्‍पणियां:

व्यालोक ने कहा…

हा हा हा हा....तुम्हारे साथ बुनियादी दिक्कत है कि तुम प्रेम के चक्कर में अपना सबक भूल गए, जबकि मैं आखिरी चवन्नी तक अब भी ऑटो का ही प्रयोग करता हूं...नए साल पर ससुराल जाने का कुछ तो प्रसाद मिलना ही था....

Rahul Singh ने कहा…

मान लिया जाय कि साल भर का कोटा पहले दिन पूरा हो गया...
(शब्‍द पुष्टिकरण हटाने पर विचार करें)

Rangnath Singh ने कहा…

हमारे संगे त आज तक ऐसन लोचा ना भयल ह.....तू मेट्रो और बस बड़े सही ना हवुआ :-) तोरे नीयन सवारी चढ जाए ता हम बस और मेट्रो से उतर जायिला :-) :-)

विजय कुमार झा ने कहा…

भाई, सही में आपका जवाब नहीं है। इस तरह की समस्‍याएं कुछ खास लोगों के साथ ही होती है,ताक‍ि वह प्रासंगि‍क हो सके। देखि‍ए न, उपर से फल गरिने की घटना न्‍यूटन के साथ ही हुई और वे सभी को बता गए। मैं तो सोचता हूं क‍ि आपके साथ इस तरह की घटना होती रहे ताक‍ि आप कम सोने के बजाय लि‍ खने पर ज्‍यादा मन लगा सकें।

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें