2/27/2012

समकालीन तीसरी दुनिया का मार्च अंक

समकालीन तीसरी दुनिया का मार्च अंक आ गया है। यह विश्‍व पुस्‍तक मेले में हॉल नंबर 11 के स्‍टॉल 133-134 पर भी उपलब्‍ध है। पढ़ने और डाउनलोड करने के लिए नीचे दी गई तस्‍वीर पर क्लिक करें...


2/17/2012

अफलातून, पांडे और बुद्धिजीवियों का संकट

बुद्धिजीवियों की हालत बहुत दयनीय है। पूरी जि़ंदगी वे जनता के नाम की माला जपते हुए बिता देते हैं लेकिन जब कभी जनता के बीच जाते हैं तो जनता उन्‍हें भाव नहीं देती। उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे ही नज़ारे पिछले दिनों अपने दौरे पर मुझे देखने को मिले। दो तस्‍वीरें आपसे साझा कर रहा हूं।

पहली तस्‍वीर बनारस के कैंट विधानसभा क्षेत्र से खड़े समाजवादी जन परिषद के उम्‍मीदवार अफलातून की है। अफलातून अपने ज़माने में बीएचयू के प्रखर छात्र नेता रहे हैं। अपने समकालीनों के मुकाबले वे सोशल मीडिया पर कहीं ज्‍यादा सक्रिय रहते हैं। उनके साथ एक समृद्ध विरासत उनके दादा महादेव देसाई की जुड़ी हुई है जो महात्‍मा गांधी के पीए थे।

अफला अफला अफला अफलातून...


टंडनजी की अड़ी पर अफलातून का प्रचार

बनारस पहुंचने के दूसरे दिन 12 फरवरी की शाम साथी रोहित प्रकाश को मछली खाने का मन हुआ, तो हम लोग बढि़या मछली की खोज में गोदौलिया से बंगाली टोला की ओर निकले। रात के साढ़े नौ बज रहे होंगे। मछली तो नहीं मिली, लेकिन हम जैसे ही सोनारपुरा चौमुहानी पर पहुंचे, देखा कि अफलातून एक बैनर और कविता के दो पोस्‍टर टांगे एक चौकी पर खड़े हैं और एक माइक हाथ में लिए ज़ोर-ज़ोर से भाषण दे रहे हैं। मैंने स्‍कूटर रोक दिया। सोचा कुछ सुन लिया जाए। ध्‍यान से देखा तो मंच पर तीन लोग थे और मंच के नीचे लगी कुर्सियों पर मात्र चार लोग, जिनमें अफलातून जी की पत्‍नी भी शामिल थीं। बड़ी महत्‍वपूर्ण बातें कर रहे थे अफलातून, लेकिन बनारस की गलियों का जनजीवन एक बुद्धिजीवी की गुहार से बेखबर अपनी मस्‍ती में डूबा हुआ था। लोग आ-जा रहे थे लेकिन किसी ने भी पलट कर देखने की ज़हमत नहीं उठाई। ठीक एक किलोमीटर पीछे मदनपुरा में दिग्विजय सिंह आए हुए थे और वहां लोगों का हुज़ूम उमड़ा पड़ा था।



समाजवादी कविता से कैसे भरेगा पेट...?
क्‍या वजह हो सकती है? क्‍या बुद्धिजीवियों ने कभी सोचने की कोशिश की है? कविता के पोस्‍टर वाली राजनीति क्‍या जनता के बीच अब प्रासंगिक रह गई है? जान कर अच्‍छा लगा कि कविताएं अपने जानने वाले समाजवादी राजेंद्र राजन की लिखी हुई थीं, जो पिछले कई साल से जनसत्‍ता में नौकरी कर रहे हैं। राजेंद्र राजन ने ही 2003 में जनसत्‍ता में मुझे पहली बार छापा था, उन्‍हें इसी के लिए मैं याद रखता हूं। बनारस के ही रहने वाले हैं राजेंद्र जी और किशन पटनायक के साथ लंबा रिश्‍ता रहा है उनका। देखिए कि कैसे बनारस का आदमी बनारस की ही कविता को और बनारस के छात्रों के लिए संघर्ष करने वाले उम्‍मीदवार को ठुकरा रहा है।

बनारस के एक सम्‍मानित पत्रकार हैं सुफल जी, जो आजकल लंबे समय से यूनीवार्ता दिल्‍ली में हैं। उनके यहां से मेरा बचपन का पारिवारिक संबंध है। वहीं बैठा हुआ था तो अफलातून जी की बात उठी। उनके बड़े भाई गोपाल जी ने उम्‍मीद जताई कि अफलातून पांच हज़ार वोट तो ले ही आएंगे। नुक्‍कड़ सभा में अफलातून जी की पत्‍नी भी भरोसा जताती हैं कि सीपीआई-एमएल ने उन्‍हें समर्थन दे दिया है। समर्थन? वो भी एमएल का? क्‍या पिद्दी, क्‍या पिद्दी का शोरबा? लखनउवा कहावत है जो बनारस में फिट बैठ रही है।

बहरहाल, उधर लखनऊ में तो बुद्धिजीवियों ने एक पूरी पार्टी ही बना डाली है। नाम है नैतिक पार्टी। नैतिक पार्टी के पांच सिद्धांतों पर गौर कीजिए-
  • जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, आगे बढ़ना है।
  • जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, हक़ से जीना है।
  • जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, साथ-साथ जीना है।
  • जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, खूब जीना है।
  • जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, नैतिकता से जीना है।
कितनी खूबसूरत बात है। और कितनी सहजता से कही गई है। हम अमीनाबाद में प्रकाश की कुल्‍फी खाने पहुंचे थे। देखा तो चौराहे पर जाम लगा है और करीब पचासेक लोग हाथ में झाड़ू लिए लहरा रहे हैं। सबके सिर पर सफेद गांधी टोपी थी जिस पर नीले में लिखा था नैतिक पार्टी। ट्रैफिक पुलिस का गोलंबर नेता का मंच बना हुआ था और मंच पर खड़े थे नैतिक पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष श्री चंद्रभूषण पांडे। पांडे जी ने 1987 में ही ‘चालीस साल’ नामक पुस्तक लिखकर तहलका मचा दिया था। न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने देश की भ्रष्ट व्यवस्था का चित्रण पुस्तक में किया था।

तलवार और कलम की लड़ाई में ये नामाकूल झाड़ू कहां से आया?

न्यायाधीश रहते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश पर उन्होंने भ्रष्‍ट आचरण का आरोप लगाया था और तमाम न्यायाधीशों के द्वारा माफी मांगने के सुझाव को नकारते हुए अपने बयान पर डटे रहे। ‘चालीस साल’ लिखने पर उन्हें उच्च न्यायालय की यंत्रणा झेलना पड़ी। न्यायालय पर टिप्पणी करने पर अनेक बार मानहानि का मुकदमा लड़ना पड़ा और उच्च न्यायालय द्वारा उनका इस्तीफा मंजूर न करके उन्हें नौकरी से बर्खास्त करके पेंशन आदि बन्द कर दिया गया। जब वह बुरी तरह बीमार थे, अस्पताल में भर्ती थे, नाक में, मुंह में नली लगी हुई थी, तभी उच्च न्यायालय ने लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्‍ट्रेट को भेज कर बर्खास्तगी का आदेश तामील कराया, ताकि वह इस सदमे को झेल न पाएं, लेकिन पांडे जी ने हार नहीं मानी। फिलहाल वह उत्तराखंड सरकार में अपर महाधिवक्ता हैं।

नैतिकता है तो नाना भी मांगता... बोले तो नाना पाटेकर...
देवरिया से 1999 में चुनाव लड़ कर हार चुके पांडे जी का कहना है कि बड़े से बड़े घर को साफ करने के लिए झाड़ू की ही ज़रूरत पड़ती है, लिहाज़ा झाड़ू उनका उपयुक्‍त चुनाव चिह्न है जिससे वे देश से भ्रष्‍टाचार को झाड़ फेंकेंगे। आसपास कम से कम हज़ारों लोग अमीनाबाद के मार्केट में घूम रहे हैं लेकिन किसी को कोई मतलब नहीं कि एक बार आकर पांडे जी को सुन जाए। उनके समर्थक कुछ गरीब जैसे दिखने वाले लोग हैं। सभी झाड़ू लहरा रहे हैं। पांडे जी ने बुद्धिजीवी रहते हुए भी लोकप्रिय और आसान शैली अपनाई है। लेकिन सब बेअसर।

नैतिक पार्टी ने लखनऊ पूर्वी 173 से अपना उम्‍मीदवार प्रो. डॉ. इंद्र सेन सिंह को बनाया है। सिंह सा‍हब हॉर्टिकल्‍चर वैज्ञानिक हैं। कैलिफोर्निया से पढ़े हैं। उच्‍च शिक्षा के क्षेत्र में दस पुरस्‍कार पा चुके हैं। हमने सोचा कि जब तक सिंह साहब के बोलने की बारी आएगी, चल कर सामने बैठ कर कुल्‍फी खाते हैं, फिर उन्‍हें सुनने आएंगे। मुश्किल से दस मिनट बाद जब हम बाहर निकले, तो नज़ारा बदला हुआ था। लगा ही नहीं कि दस मिनट पहले वहां जनसभा हो रही थी। सब साफ। चारों ओर सिर्फ़ बाज़ार।

कबीर वाणी याद आने लगी- कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। आज न कोई घर फूंकने को तैयार है न ही जरा सा भी दाएं या बाएं देखने को। सब अपनी सीधी लकीर में बेखबर चले जा रहे हैं। कबीर रहते तो पागल ही हो जाते ये देख कर। कहीं ये कोई गहरी साजि़श तो नहीं...

न दाएं न बाएं, गरदन बिल्‍कुल सीधी रखने का लोकतांत्रिक अभ्‍यास

पांडे जी, सिंह साहब या अफलातून को ये सवाल खुद से पूछना चाहिए कि जिस जनता के लिए वे लड़ रहे हैं, वो उन्‍हें भाव क्‍यों नहीं देती। कहीं जनता ही तो गलत नहीं हो गई। अगर ऐसा ही है, तो यही सही। लेकिन लोकतंत्र जब तक काग़ज़ पर भी है, हम कैसे मान लें कि जनता गड़बड़ है। गड़बड़ी कहां है? क्‍या आप बता सकते हैं?

2/10/2012

'समयांतर' के फरवरी 2012 विशेषांक का मूल अतिथि संपादकीय

हिंदी की वैचारिक पत्रिका 'समयांतर' का फरवरी विशेषांक 'विकास बनाम अस्तित्‍व' निकालने की जि़म्‍मेदारी इस बार मुझे दी गई थी। अंक अब बाज़ार में आ चुका है और उसमें अतिथि संपादक की जगह मेरा नाम किसी रामाज्ञा शशिधर के साथ डाला गया है। इसकी सूचना मुझे अंक के प्रेस में जाने से एक दिन पहले दे दी गई थी, इसलिए संपादक / स्‍वामी की स्‍वतंत्रता के लिहाज़ से इस पर सवाल उठाने का कोई अर्थ नहीं, हालांकि जनवरी अंक में अतिथि संपादक के तौर पर मेरे नाम की ही लिखित घोषणा की गई थी। बहरहाल, इस अंक के लिए मैंने जो संपादकीय लिख था, उसे संपादक पंकज बिष्‍ट ने लौटा दिया था और सीधे विषय प्रवर्तन करने वाला एक संपादकीय लिखने को कहा था। बदला हुआ संपादकीय तो आप पत्रिका में पढ़ ही सकते हैं जो मूलत: अंक की विषयवस्‍तु के परिचय से ज्‍यादा कुछ नहीं। मूल संपादकीय मैं नीचे डाल रहा हूं जिसे लिखने में मुझे काफी वक्‍त लगा था। चूंकि अंक बाज़ार में आ चुका है, लिहाज़ा इस संपादकीय को सार्वजनिक करने में मुझे कोई नैतिक दिक्‍कत नज़र नहीं आती, दूसरे किसी न किसी रूप में तो इसका उपयोग होना ही चाहिए।


इस साल की शुरुआत हर साल से कुछ अलग हुई। पिछले साल शुरू हुआ 'ऑक्‍युपाई वॉल स्‍ट्रीट' अब 'ऑक्‍युपाई द माइंड' की शक्‍ल ले चुका था, तो वर्चुअल दुनिया सोपा और पीपा के निशाने पर आ गई थे। इस शोरशराबे के बीच हमारे यहां कुछ पढ़े-लिखे लोग जयपुर साहित्‍य मेले में तो कुछ वर्धा के हिंदी विश्‍वविद्यालय निकल लिए। इधर पंकज पचौरी ने पीएमओ में अपनी जगह बना ली। इस बीच इंडियन एक्‍सप्रेस ने जेपी और मोंसेंटो के पैसे से साहस की पत्रकारिता को नवाज़ा तो उधर सरकार ने गणतंत्र दिवस पर दंतेवाड़ा के एसपी अंकित गर्ग को गैलेंट्री अवॉर्ड दे डाला, जिस पर एक आदिवासी महिला को नग्‍न कर के प्रताडि़त करने का आरोप है। मौसम लगातार 'अल निनो' फैक्‍टर से जूझते हुए रंग बदलता रहा, जबकि पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में लोकतंत्र का मौसम बदलने के लाखों वादे कर डाले, बगैर इस बात की परवाह किए कि वादों को ज़मीन पर उतारने के लिए इतना पैसा कहां से आएगा।   
ताज़ा अंक
दरअसल, पैसा अब समस्‍या रह नहीं गया है। सवाल सिर्फ इतना है कि आप चाहते क्‍या हैं। नेता, नौकरशाह, पत्रकार, अखबार, जज-वकील सब जानते हैं कि पैसा कहां है। बंगाल के एक गरीब मास्‍टर के बैंक खाते से अचानक हजारों करोड़ रुपए बरामद होना बानगी भर है। जिस समाज के लिए पैसा दिक्‍कत न रह जाए, उस समाज को चलाने के लिए ईमान की भी ज़रूरत कम ही पडती है। इसे इस तरह समझा जाए कि अगर अन्‍ना हजारे भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाते हैं, उसमें लाखों लोग जुड़ते हैं, तो इस बात का बहुत मतलब नहीं रह जाता कि आंदोलन चलाने के लिए पैसा कैसे और कहां से आए। जाहिर है, पैसे के प्रति आश्‍वस्‍त होने के बाद ही आंदोलन छेड़ा गया था। यानी पैसे की चांदनी में ईमान का सवाल नहीं उठता, जबकि तलछट के लिए ईमान अफोर्डेबल नहीं है। कुल मिला कर ये संकट ईमान का है जो ऊपर से दिखता है।
लेकिन पत्रकारिता के पुराने फॉर्मूले 'फॉलो द मनी' पर चलें, तो समझ में आता है कि आखिर ईमान बिना बताए कैसे बिगड़ जाता है। हम उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी के व्‍यक्तिगत ईमान पर सवाल नहीं उठा रहे जिन्‍होंने करोड़ों लोगो को उजाड़ने वाले जेपी ग्रुप और किसानों को मारने वाले मोंसेंटो के पैसे से पत्रकारों को नवाज़ा। हमें राष्‍ट्रपति के व्‍यक्तिगत ईमान पर भी शक नहीं जिन्‍होंने ऐसे एसपी को नवाज़ा जिसने एस्‍सार को जंगल में पाइपलाइन बिछाने दिया और उससे रिश्‍वत लेने का आरोप आदिवासियों पर लगा दिया। जयपुर गए लेखकों की साहित्यिक समझ पर भी हमें शक नहीं, जिन्‍होंने केन सारो विवा की हत्‍यारी डच शेल कंपनी के पैसे पर एक हफ्ते ऐय्याशी की। वैसे तो हमें पंकज पचौरी से भी शिकायत क्‍यों हो, उन्‍होंने कब कहा कि वे सरकारी दलाल नहीं हैं? दरअसल, जिस महीन तरीके से अस्तित्‍व के हर कोने में लुटेरी कंपनियों-निगमों का पैसा रेंग कर पैठ चुका है, जिसे हम ईमान का बिगड़ना कहते हैं, वो आज बहुत 'स्‍वाभाविक' लगता है। धीरे-धीरे इसी 'स्‍वाभाविक' ने हमारी भाषा, लोकाचार, हंसी-मज़ाक, पसंद-नापसंद, प्रतिबद्धता, विरोध सबकी केंचुल में अपनी जगह बना ली है। हमारी हां और ना दोनों से ही धरती लुटती है, और हम सिर हिलाए जाते हैं। 

नया संपादकीय जो छपा है
नतीजा? हम अपनी धरती से अब कट गए हैं। हम अपने जैसों से कट गए हैं। मार्क्‍स के शब्‍दों में कहें तो, हम खुद से 'एलिनेट' हो गए हैं। इसीलिए लुटेरी कंपनियों का पैसा हमें अखरता नहीं। खुद को उससे दूर दिखाने के हमारे पास सौ तर्क होते हैं। और अगर हम हिंदी के कवि, कहानीकार या कुछ हैं, तब तो कहना ही क्‍या। अपनी कविता में गांव की रूमानियत को याद करना, तुलसी के चौरे को बचा ले जाना, या ऐसी ही 'एग्‍जॉटिक' छवियों में अतीत की शवसाधना हमारा धर्म होता है। हम बाज़ार से डरते हैं, उसी में रहते हैं और उसे समझे बगैर लगातार गाली भी देते हैं। हमारा 'एलिनेशन' हमें 'हिपोक्रिट' बनाता है। 
'एलिनेशन' और 'हिपोक्रिसी' के इस दौर में धरती की चिंता कैसे की जाए, ये बड़ा सवाल है। धरती की चिंता करना अपनी हवा, पानी, जंगल, जमीन, उस पर रहने वाले लोगों, आने वाली पीढि़यों और समूची इंसानियत की चिंता करना है। इतनी बड़ी चिंता साहित्‍य में करना ठगकर्म है। बड़ा संकट यह है कि ऐसी तमाम चिंताएं अंग्रेज़ी में पर्याप्‍त की जा रही हैं, लेकिन हिंदी वाले कायदे से उल्‍था भी नहीं कर पा रहे। समयांतर का ये विशेषांक धरती को लेकर हमारी इसी चिंता से उपजा है। विषय की व्‍यापकता और हिंदी में मूल लेखन के दोहरे संकट के बीच हमने ये अंक निकाला है। विशेषांक का एक उद्देश्‍य हिंदी के लेखक-पाठक जगत में ये समझ रोपना है कि धरती की बात करना अनिवार्यत: पर्यावरण या पारिस्थितिकी जैसा कोई विशिष्‍ट विज्ञान नहीं। एक ही राजनीति और एक ही आर्थिकी है, जो हमें और इस धरती के दूसरे छोर पर बैठे हमारे जैसों को प्रभावित कर रही है। अरुंधती राय के शब्‍दों में, धरती को लूटने की विचारधारा अब आस्‍था का रूप ले चुकी है।
लूट जब आस्‍था बन कर समूची धरती को अपनी आगोश में ले रही हो, तो बाकी सारी आस्‍थाएं सान पर आ जाती हैं। लूट की इस आस्‍था को समझे बगैर हम चाहे कुछ कर लें, खुद को बचा नहीं पाएंगे, धरती तो दूर की चीज़ है। बहरहाल, अंक आपके हाथ में है। फैसला आपका।


2/08/2012

यह पलाश के फूलने का समय है- अनुज लुगुन

 
यह पलाश के फूलने का समय है
रेत पर बने बच्चों के घरौन्दों से
उठ रहा है धुआं
हवाओं में घुल रहा है बारूद
चट्टानों से रिसते पानी पर
सूरज की चमक लाल है और
जंगल की पगडंडियों में दिखाई पड़ता है दंतेवाड़ा
यह पलाश के फूलने का समय है ।
 
यह पलाश के फूलने का समय है ।
नियमगिरि से निकले नदी के तट पर
कन्दू पक कर लाल है
हट चुकी है मकड़े की जाली
गुफ़ाओं की ख़बर है
खदानों में वेदान्ता का विज्ञापन टंगा है,
साखू के सागर सारंडा की लहरों में
बिछ गई हैं बारूदी सुरंगें
हर दस्तक का रंग यहां लाल है ।
यह पलाश के फूलने का समय है।
 
दूर-दूर तक जंगल का
हर कोना पलाश है
साखू पलाश है
केन्दू पलाश है
पलाश आग है
आग पलाश है
जंगल में पलाश के फूल को देख
आप भ्रमित हो सकते हैं कि
जंगल जल रहा है
जंगल में जलती आग को देख
आप कतई न समझें पलाश फूल रहा है
 
यह पलाश के फूलने का समय है
और, जंगल जल रहा है।

Face-to- face with Jan Myrdal

By Sankar Ray
He has an excruciating sciatic pain, had an open heart surgery and problematic prostrate at 85, but all this doesn’t stop him moving around to keep his intellectual clock ticking away. His epistemological coverage is spellbinding –politics, linguistics, sexuality and pornography. He wrote several books, covering a diverse area and among those 30-plus books, one is a biography of the famous Swedish playwright Johan August Strindberg
Jan Myrdal

Little wonder, he has immense knowledge, thanks to his linguistic flexibility.

And that’s Jan Myrdal whose life is an epitomisation of what the Latin dramatist and philosopher Terence ( born: 195 BC , died 159 BC ) – Homo sum; humani nil a me allienum puto ( I am a man, and reckon nothing human alien to me), rephrasing which Karl Marx famously said, " I am human and nothing humane is alien to me, the crux of his libertarian principles, trampled by all official communist parties from the very beginning of the 20th Century. His father Gunnar was a Nobel laureate in economic sciences and mother Ava got Nobel Peace Prize, Jan joined the Communist Party of Sweden in 1939 but had quit the party following split in the party.

Flanked by Jnanpeeth laureate Mahasweta Devi and leftist political commentator and author Sumanta Banerjee at an interactive session under the aegis of Frontier Weekly on 28 January at the Kolkata Book Fair, Jan made no bones of his pessimism about the ‘official Left’ in Europe. Their influence and ‘acceptability’ has been waning and they are ‘ paid and fostered’ by the government.

He reiterated what he wrote- "India has never been ‘‘non-violent’’. Neither from the rulers or the ruled. As a movement against the rulers non-violence gave rise to a library of books but it was not non-violence that forced the British to (partially) leave. The oppressed masses have always been struggling."

While disagreeing with those who think Fascism is lurking within the Indian polity – endorsing the definition on fascism – ‘open terrorist dictatorship of finance capital" (Georgy Dimitrov), Jan admitted, " you have a "complex and very difficult situation" with democratic space intact. But he stated in his treatise in an ingenuous tone, "The rich in India are getting richer. 36 billionaires constitute a third of India’s GDP. They are disgustingly rich and behave like other such ruling classes always have. They are morally upset when the oppressed and starving demand their right. They talk with horror in their Parliament and their press if the victims defend themselves when private goondas or regular forces of the ruling class–Salwa Judum and Green Hunt–kill, rape and torch to establish law and order."

Nonetheless, essentially an incorrigible optimist, the Swedish author and activist informed about the new endeavour in the European arena " We have been trying to build an international movement" – a movement of solidarity in Europe. " The crisis is deepening in the industrialized countries".

The previous day Jan released his book,
Red Star Over India released- English translation of the original in Swedish, Röd stjärna över Indien, published by Kolkata-based Setu Prakashani. It’s a narrative of his visit to Bastar areas where the class struggle goes on with the cadres of Communist Party of India (Maoist) on the one side and the Chhatisgarh state government on the other side under the rightwing Hindutvavadi Bharatiya Janata Party that has an bonhomie on medieval repression on the oustee Adivasis, caressed by the Maoists in forest areas with the Indian National Congress-led United Progressive Alliance-II government at the centre. He and his Indian friend, a well-known civil rights activist, Gautam Navlakha were invited to Dandakaranya for discussions with the CPI(Maoist ) general secretary Ganapathi a k a Mupalla Laxman Rao, available polit bureau members and leading cadres who took the two around the Bastar region. . They saw how situation "was much different from that of 1980. The party is an All-India party and a revolutionary and democratic state organization, the Janata Sarkar—the people’s power—is step by step supplanting the state organization of the ruling class" " I have not translated this and so I am unable to judge how good it is but I welcome every criticism, directly written to me or the publisher", he quipped. " Your crisis is also very deep", he said addressing the participants both on the 27 and 28 January. He was replying to a question about the future of Left as a sequel to the shrinking strength of industrial workers and swelling of unorganized workers. "You have to have a leadership" with official Left having no role to pay, he felt.

He has lived in India, Iran, Afghanistan and the US. His first wife, Nadya, was a Bengali. His latest title reveals how he was maltreated by the British police who refused to let him meet his Bengali wife and parents-in-law Kali and Paula Ghosh in 1950. " My father-in-law was a very renowned journalist and a correspondent of Blitz weekly.

Jan cautioned again copying the Soviet, Chinese, Vietnamese, Cuban or any model for revolutionary model Instead of trying to ape the Soviet, Chinese or Latin American model, develop your own he opined ". But he suggested that a ‘broad alliance or front’ be formed "This is the crucial time to emphasize on practice and organization," he added.

At the intereactive session, Mahasweta Devi, reiterated her work among a denotified tribe in the Jangalmahal The abject poverty and absence of essential amenities like water, healthcare, sanitation and roads, and the hardships they face in their daily life beggar description. "The problems in Jangalmahal cannot be solved from outside. To do so, one needs to integrate with the people," she said while commenting on the on-going government bid to take on insurgency through firepower on the one hand and development blitzkrieg on the other

(Courtesy Frontier Magazine)

2/04/2012

आओ देखो, गलियों में बहता लहू...

नवीन जिंदल
कल खबर आई कि नवीन जिंदल भारत की सीईओ बिरादरी में सबसे ज्‍यादा वेतन पाने वाले शख्‍स के रूप में लगातार दूसरे साल बाज़ी मार ले गए हैं। पिछले साल वे 67.21 करोड़ रुपए वेतन के नाम पर घर ले गए, बोनस-वोनस अलग से। आखिर कौन हैं नवीन जिंदल? आप उन्‍हें युवा सांसद कह सकते हैं मीडिया की भाषा में। आम आदमी को तिरंगा झंडा फहराने की कोर्ट से आज़ादी दिलवाने वाला क्रूसेडर कह सकते हैं मीडिया की भाषा में। कारोबारी भाषा में आप उन्‍हें जिंदल स्‍टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) का मालिक भी कह सकते हैं। कई चेहरे लेकिन नाम एक नवीन जिंदल।

नवीन जब नवीन के साथ मिल जाए तो एक अतिनवीन परिघटना जन्‍म लेती है। सोचिए और कौन नवीन है इस देश में जिसका नवीन जिंदल के साथ कोई रिश्‍ता है?  जी हां, नवीन पटनायक, उड़ीसा के मुख्‍यमंत्री। जिस दिन नवीन जिंदल ने नवीन पटनायक से उड़ीसा में अपना कारखाना लगाने के लिए 6400 एकड़ ज़मीन मांगी थी, उसी दिन इस देश में सियासत और कारोबारी दुनिया को बांटने वाली लकीर मिटने लगी थी। लोकतंत्र और पूंजी के दो छोर पर खड़े दो नवीनों ने जब हाथ मिलाया तो कोई नहीं जानता था कि इस नवीन मेल से कौन सा रंग उभरेगा। बीते 25 जनवरी को उड़ीसा के अंगुल में इस मेल का असली रंग सड़कों पर बिखरा दिखा। लोगों के माथे पर दिखा। महिलाओं के चेहरे पर दिखा। बच्‍चों के शरीर पर दिखा। लाल और सिर्फ लाल।

नवीन जिंदल की नई पहचान

अब नवीन जिंदल के बायोडाटा में एक और परिचय जुड़ गया है। अंगुल के 40 गांवों के लोग उन्‍हें मानवाधिकारों का हत्‍यारा मान चुके हैं और दोनों नवीनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

ज़रा पीछे की कहानी भी सुन लीजिए। सन 2006 में जीएसपीएल ने अंगुल में अपने स्‍टील प्‍लांट का निर्माण कार्य शुरू किया। तब से लेकर अब तक 40 गांवों के 25000 परिवार यानी एक लाख से ज्‍यादा लोग प्रभावित और विस्‍थापित हो चुके हैं जिनमें 20 फीसदी अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं। कंपनी ने इन्‍हें स्‍थायी नौकरियों, कौशल प्रशिक्षण केंद्र,  मुआवज़े, पुनर्स्‍थापन, पुनर्वास और विकास का वादा किया था। किसी को आज तक स्‍थायी नौकरी नहीं मिली। करीब 3000 प्रभावित लोगों को कंपनी हालांकि 2700 रुपए प्रति व्‍यक्ति देती रही ताकि यहां असंतोष को थामा जा सके। लेकिन जैसे ही कंपनी की चारदीवारी का निर्माण कार्य पूरा हुआ, तो उसने अचानक बिना बताए इस मदद को रोक दिया और प्रभावित गांवों में पानी आदि की सुविधा भी रोक दी। इसे अब तीन महीने हो चुके हैं।

प्रभावित लोगों ने कंपनी के अधिकारियों ईडी राकेश झा, अंगुल के जि़ला प्रशासन और राज्‍य सरकार समेत डीजीएम शर्मा से शिकायत की। कहीं से कोई जवाब नहीं आया। 19 जनवरी को पूरी तरह विस्‍थापित गांव कलियाकाता के लोग कंपनी के दफ्तर अधिकारियों से मिलने आए। सुरक्षा गार्डों ने उनसे बुरा बरताव किया और एक गर्भवती महिला  को मारा। इस घटना के बाद 40 प्रभावित गांवों के लोग एक हो गए और इन्‍होंने निर्माण कार्य को शांतिपूर्ण ढंग से रोक दिया। बीते 24 जनवरी को कंपनी और सरकारी अधिकारियों ने हस्‍तक्षेप किया और लोगों से वादा किया कि एक संयुक्‍त बैठक बड़ा कराजंग बिरंकेश्‍वर मंदिर में रखी जाएगी। इस बैठक में वे खुद नहीं आए, तो अगले दिन लोगों ने कंपनी के अधिकारियों से मिलने का तय किया।

गणतंत्र  दिवस से ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी को करीब एक हज़ार प्रभावित लोग कंपनी के सुवर्णपुर गेट पर आए और अधिकारियों से मिलने की मांग की। कंपनी के सुरक्षा बलों, पुलिस और मजिस्‍ट्रेट की वहां पहले से मौजूदगी थी। उन्‍होंने योजनाबद्ध तरीके से गेट खोल कर पहले लोगों को भीतर आने दिया। उसके बाद जो हुआ, वो तस्‍वीरों में है। करीब 400 महिलाओं और पुरुषों को बुरी तरह मारा गया जिनमें 94 को गंभीर चोटें आईं। इनमें 3 साल का बच्‍चा मनजीत साहू भी था।

ज़रा इन तस्‍वीरों को देखिए।

तुम पूछोगे क्‍यों नहीं करती उसकी कविता उसके देश के फूलों और पेड़ों की बात
आओ देखो गलियों में बहता लहू, आओ देखो गलियों में बहता लहू...

अगर अब भी आपको लगता है कि मामला हमसे काफी दूर का है, महानगरों में कम से कम ऐसी हालत नहीं, तो आप गफ़लत में हैं। इन्‍हीं नवीन जिंदल के बडे भाई पृथ्‍वीराज जिंदल दिल्‍ली में ला चुके हैं ज़हरीले डायोक्‍सीन का एक ऐसा ज़खीरा जो भोपाल गैस कांड को भी लजा सकता है। कोर्ट के आदेशों को ताक पर रख कर दिल्‍ली के बीचोबीच बनाए जा रहे भविष्‍य के एक श्‍मशान की बात हम आगे विस्‍तार से करेंगे।

जो लोग कॉरपोरेट और राजनीति के रिश्‍तों की आलोचना करते हैं, उन पर अब हंसी आती है। वे पिछड़े हुए लोग हैं, क्‍योंकि नवीन जिंदल खुद पूंजीपति भी हैं और जन प्रतिनिधि भी। रतन टाटा ने तो संत दिखने की चाहत में ''बनाना रिपब्लिक'' की आशंका जताई थी। क्‍या हम उससे काफी आगे नहीं निकल आए।

2/02/2012

खिलौने के गुब्‍बारे सी ठहरी जि़ंदगी: शिंबोर्स्‍का की एक कविता


विस्‍साव शिंबोर्स्‍का (2 जुलाई 1923-1 फरवरी 2012)



मौत की घड़ी में

स्‍मृतियों का आवाहन करने के बजाय

मैं फरमान दूंगी  

ग़ुम हो चुकी चीज़ों की वापसी का।



खिड़कियों से, दरवाज़ों से

लौट आएं छाते, एक सूटकेस, मेरे दस्‍ताने, एक कोट

ताकि कह सकूं मैं:

ये मेरे किस काम के?



एक सेफ्टी पिन, ये वाली या वो वाली कंघी,

एक पेपर रोज़, एक धागा, एक छुरी

ताकि कह सकूं मैं:

मुझे किसी का कोई अफ़सोस नहीं।



चाबी, तुम जहां कहीं भी हो,

पहुंच जाना वक्‍त पर

ताकि मैं कह सकूं:

हर चीज़ में ज़ंग लग चुकी है, मेरे दोस्‍त, ज़ंग।



मान्‍यताओं और सवालों के बादल घुमड़ पड़ें तब

छा जाएं मेरे ऊपर

तब मैं कह सकूंगी:

कि सूरज डूब रहा है।



ओ घड़ी, निकल आओ तैर कर नदी से बाहर

थाम लेने दो मुझे अपना हाथ

ताकि कह सकूं मैं:

अब तो वक्‍त बतलाने का नाटक मत करो।



हवा में पिचका, सिकुड़ा खिलौने वाला गुब्‍बारा

भी उतर आए नज़र में

और मैं कह सकूं:

अब यहां बच्‍चे नहीं रहते।


(अंग्रेजी से अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव)

राफेल कहीं दूसरा बोफोर्स तो नहीं?

आजकल फ्रांस के साथ हुए राफेल सौदे का बडा हल्‍ला है, लेकिन दस महीने पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखी गई एक चिट्ठी बताती है कि राफेल सौदा कैसे किया गया, इसमें क्‍या घपला हो सकता है और इस खबर को क्‍यों भारतीय मीडिया में दबा दिया गया।

चिट्ठी के जि़क्र से पहले पाकिस्‍तान के एक पुराने अख़बार फ्रंटियर पोस्‍ट का जि़क्र ज़रूरी है जिसने 30 जुलाई 2011 को ही इस चिट्ठी के हवाले से अपने यहां खबर छाप दी थी। ये चिट्ठी हमारे देश में चिट्ठियां लिखने के लिए कुख्‍यात सुब्रमण्यम स्‍वामी ने मनमोहन सिंह को लिखी थी। भारतीय तकनीकी मूल्‍यांकन कमेटी द्वारा लड़ाकू विमानों की खरीद में एम-एमआरसीए को छांटे जाने के ठीक दो दिन बाद स्‍वामी ने ये चिट्ठी लिखी जिसमें प्रधानमंत्री को इस बात से अवगत कराया गया कि राफेल को एम-एमआरसीए पर तरजीह दिए जाने की वजह फ्रेंच राष्‍ट्रपति की पत्‍नी कार्ला ब्रूनी और सोनिया गांधी के बीच हुई कई दौर की बातचीत है। दिलचस्‍प ये है कि इस बातचीत को अंजाम देने में दो विदेशी महिलाओं का हाथ था जो सोनिया गांधी की बहनें हैं।

स्‍वामी की चिट्ठी पढ़ने के लिए तस्‍वीर पर क्लिक करें

स्‍वामी ने दावा किया कि उनके पास ठोस सबूत इस बात के हैं कि फ्रेंच सरकार के साथ एक समझौता लिखा गया जिसमें फ्रेंच एयरक्राफ्ट राफेल को खरीदने के लिए रिश्‍वत देने का अनुबंध हुआ। उस दौरान सोनिया गांधी के परिवार के सदस्‍य फ्रांस के सेंट ट्रोपेज़ में थे। ये  जानकारी स्‍वामी को अपने पूर्व फ्रेंच छात्रों और जानने वालों से मिली। ये समझौता किए जाने के दौरान सोनिया गांधी की दोनों बहनें और बोफोर्स मामले के कुख्‍यात आरोपी क्‍वात्रोची भी मौजूद थे, जिसमें तय किया गया कि किसको कितनी रिश्‍वत दी जानी है।

29 अप्रैल 2011 को लिखी चिट्ठी में स्‍वामी कहते हैं, ''कार्ला ब्रूनी और सोनिया गांधी के बीच हुई बातचीत के बारे में कुछ विश्‍वसनीय जानकारी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि फ्रांस के साथ लड़ाकू विमानों की खरीद में भारी रिश्‍वतखोरी पर एक समझौता हुआ है।''

स्‍वामी की सूचना  कितनी भी विश्‍वसनीय हो, लेकिन सोनिया गांधी को टार्गेट करने का उनका पुराना एजेंडा रहा है, लिहाजा इस चिट्ठी पर आश्‍चर्य करने की ज़रूरत नहीं। अचरज तब होता है जब भारतीय सैन्‍य प्रतिष्‍ठान पर टिप्‍पणी करने वाले वरिष्‍ठ स्‍तंभकार मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता 11 मई 2011 के दैनिक पायोनियर में कहते हैं, ''भारतीय वायुसेना राफेल को इसलिए नहीं तरजीह देती कि वे उसे चांद लाकर दे रहे हैं। इसके पीछे एक बैक चैनल उच्‍चस्‍तरीय इटैलियन कनेक्‍शन भी है।''

अब या तो अशोक मेहता ने स्‍वामी की चिट्ठी पढ़ी है या फिर उनके अपने स्रोत हैं। स्‍वामी सोनिया गांधी का नाम ले लेते हैं, मेहता ''इटैलियन'' कनेक्‍शन बताते हैं। मोटे तौर पर बात एक ही है।

बहरहाल, अशोक मेहता का वह स्‍तंभ अब वेब पर उपलब्‍ध नहीं है।

ये बात अलग है कि न तो चिट्ठी और न ही मेहता के स्‍तंभ के आधार के तौर पर कोई ठोस सबूत दिए गए हैं। लेकिन जिस दिशा में ये मामला जा रहा है, सवाल उठ सकता है कि कहीं राफेल का सौदा दूसरा बोफोर्स तो नहीं बनने जा रहा...

(खबर और तस्‍वीर का स्रोत)

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