4/06/2012

400 करोड़ का ''पैशन''

जितेन्द्र कुमार


सचिन तेंदुलकर ने 25 मार्च को मुंबई में एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस बुलाई और अपनी इच्छा जाहिर की कि वह अगले विश्व कप (2015) में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं। मुंबई के एक सात सितारा होटल में उन्होंने यह भी कहा कि वह जब तक चाहेंगे क्रिकेट खेलते रहेंगे। उनका तो यहां तक कहना था कि जो लोग आज कह रहे हैं कि मुझे क्रिकेट से रिटायर हो जाना चाहिए, क्या उनके कहने से मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया था।
वैसे देखिए तो इसमें कोई बड़ी बात भी नहीं है- जिस किसी भी भारतीय खिलाड़ी ने व्यक्तिगत रूप अपने नाम सबसे ज्यादा रिकॉर्ड बनाया है उसमें सचिन बेजोड़ है। वह क्रिकेट का ऐसा अकेला खिलाड़ी है जिसके पास लगभग वे सारे रिकॉर्ड हैं जो दुनिया में किसी भी क्रिकेटर के पास नहीं हैं, हालांकि इस रिकॉर्ड की कीमत देश को कई बार मैच हारकर चुकानी पड़ी है। (वैसे इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रिकेट की दुनिया एकदिवसीय क्रिकेट को मिलाकर कुल 11 देशों में ही सिमट जाती है।)
सचिन तेंदुलकर के 2015 के विश्व कप तक क्रिकेट खेलने की मंशा को देखकर लोगों के मन में दो तरह की बातें एक साथ आईं।  जो लोग सचिन के अंधभक्त हैं, उन्हें लगा कि यह बहुत ही अच्छी बात है क्योंकि उनके भक्त अब भी मानते हैं कि अगर सचिन उस समय तक खेलते रहे तो विश्व कप जीतने का सपना एक बार फिर से साकार हो सकता है। हालांकि अंधभक्तों को यह समझाना लगभग असंभव हो गया है कि ऐसा क्योंकर हुआ कि सचिन के पिछले 6 विश्व कप में खेलने के बावजूद भारतीय टीम एक बार ही विश्व विजेता बन पायी है। दूसरा, उस तरह के लोग हैं जिनका कहना है कि भले ही सचिन तेंदुलकर यह कहें कि वह तीन-चार साल और क्रिकेट खेलना चाह रहे हैं, लेकिन क्या सचमुच समय उनके साथ है? क्या सही में वे इतने समय तक खेल पाएंगे? शायद उनके मन में एक चिंता इस बात को लेकर भी है कि अगर सचिन वास्तव में (भले ही जो दबाव हो) इतने दिनों तक क्रिकेट खेलते रहे तो क्या उनकी भी स्थिति महान ऑलराउंडर कपिल देव की तरह तो नहीं हो जाएगी जिन्हें कितने लंबे समय तक खिलाड़ी के रूप में दयनीय स्थिति में लोगों को देखना पड़ा?
हालांकि सचिन को चाहने वाले लोग समर्थ हैं इसलिए वे तरह-तरह के तर्क के साथ लोगों को यह बताने में कामयाब हो जाते हैं कि अगर सचिन जैसा महान खिलाड़ी जब तक खेलना चाहे तो किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए। उनका तर्क तो वहां तक चला जाता है कि सचिन से ज्यादा किस खिलाड़ी ने देश को इतना दिया है, इसलिए यह उनके ऊपर छोड़ देना चाहिए कि कब वह क्रिकेट से रिटायर होना चाहते हैं!
लेकिन सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट, उनके समर्थक और आलोचकों के इतर भी कुछ सवाल हैं जो बराबर महत्‍वपूर्ण हैं।
सचिन तेंदुलकर का जब 1989 में भारतीय क्रिकेट में पदार्पण हुआ उस समय देश में उदारीकरण की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी और साल भर के भीतर उदारीकरण किसी न किसी रूप में पूरे देश में दिखने लगा था। क्रिकेट में उदारीकरण की पहली पैदाइश सचिन था जिसे हम ब्रांड सचिन कह सकते हैं। वैसे तो, इससे पहले भारतीय खेल जगत में एक दूसरा स्टार कपिल देव भी था लेकिन वह अपने कैरियर की ढलान पर था, इसलिए उन्हें बाजार का इतना लाभ नहीं मिला। लेकिन सचिन का कैरियर तो भूमंडलीकरण के साथ ही आगे बढ़ना शुरू हुआ है। आकलन है कि आज सचिन की वार्षिक आय लगभग 400 करोड़ रुपए है। इसलिए यह बिना किसी कारण के नहीं हुआ है कि जब सचिन तेंदुलकर मुंबई के सात सितारा होटल में पूरी दुनिया के मीडिया के सामने अपने भविष्य की योजनाएं बता रहे थे, तो उनके बैकग्राउंड में उन सभी 17 ब्रांड के लोगो लगे थे जिनका वह विज्ञापन करते हैं।

ज़बान से लेकर तलुवे तक ब्रांडिंग का राष्‍ट्रवादी ''पैशन''

इसके अलावा यह शायद पहली बार हुआ है कि सचिन तेंदुलकर खेल योजना का खुलासा कर रहे हैं और उनके बगल में उनकी पत्नी अंजली तेंदुलकर बैठी हैं, साथ ही ब्रांड सचिन को मैनेज करने वाली फर्म वर्ल्ड स्पोर्ट ग्रुप के वरिष्ठ पदाधिकारी भी बैठे हैं। हां, इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है कि दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेटर की इतनी महत्वपूर्ण घोषणा में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का एक अदना कर्मचारी भी मौजूद नहीं था। हमें अभी कुछ दिन पहले राहुल द्रविड़ के विश्व क्रिकेट से संन्यास लेने संबंधी घोषणा वाली उस प्रेस काफ्रेंस को नहीं भूलना चाहिए जिसमें बीसीसीआई के खुद अध्यक्ष मौजूद थे।
इसलिए जब सचिन तेंदुलकर से उस प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में पूछा जाता है तो वह कहते हैं अब मेरा कोई ऐसा ख्वाब नहीं रह गया है, जो पूरा नहीं हुआ है। मेरी दो ही ख्वाहिश थी- एक भारत के लिए खेलना और दूसरा विश्व कप जीतना। महत्वपूर्ण बात यह है कि सचिन की दोनों इच्छाएं पूरी हो गई हैं, लेकिन वह पैशन के लिए खेलना चाहते हैं। और हां, इतना ही नहीं, वह यह भी चाहते हैं कि पैशन के चलते जितने दिनों तक खेलते रहें और जितने भी रिकार्ड बनें, उन्‍हें कोई भारतीय ही तोड़े (राष्ट्रवाद की परकाष्ठा, अन्ना हजारे के हर मंच पर बजने वाली मशहूर पंक्ति- दिल दिया है जां भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए....)। हालांकि सचिन तेंदुलकर को यह भी पता है कि उनके रिकॉर्ड के अगल-बगल में भारतीय तो क्या कोई विदेशी भी नहीं है, लेकिन पैसा कमाने के लिए राष्ट्रवाद का चस्का तो जरूरी है!
जनसत्‍ता, 10 अप्रैल 2012, समांतर
हालांकि इसी पैशन के चलते भारत को और कई मैच हारने पड़े हैं। याद कीजिए जिस दिन सचिन तेंदुलकर का 100वां शतक लगा था उस दिन बांग्‍लादेश जैसी सबसे कमजोर टीम के सामने भी 95 रन से 100 रन पर पहुंचने के लिए उसे 36 गेंदों का सामना करना पड़ा था। जो लोग क्रिकेट की बारीकी को समझते हैं उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि अब विटवीन द विकेट सचिन की वो रफ्तार नहीं रही जो आधुनिक क्रिकेट में सबसे जरूरी मानी जाती है।
लेकिन फिर भी सचिन तेंदुलकर पैशन के लिए क्रिकेट खेलना चाहते हैं, शायद कपिल देव की तरह जिन्हें रिचर्ड हेडली का 431 विकेट का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए दयनीय बन जाने की हद तक खेलते रहना पड़ा था। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय क्रिकेट का पहला ब्रांड कपिल देव ही थे, जिन्हें न सिर्फ रिकॉर्ड के लिए बल्कि बाजार को बताने के लिए भी खेलना पड़ा था। और शायद यही कारण है कि उदारीकरण के सबसे बड़े ब्रांड (400 करोड़ रुपए की वार्षिक कमाई करने वाले) सचिन तेंदुलकर को बीसीसीआई के साथ बैठकर नहीं, बल्कि 17 अंतरराष्ट्रीय लोगो लगाकर अपनी मैनेजमेंट फर्म के साथ बैठकर बताना पड़ता है कि वह 2015 का विश्वकप खेलना चाहते हैं।    
(लेखक यूएनआई टीवी के ब्‍यूरो प्रमुख हैं। यह लेख जिस अखबार के लिए लिखा गया था, उसने इसे नहीं छापा। लेख का कंटेंट पढ़ कर आप समझ गए होंगे कि वह अखबार कोई भी हो सकता है)

1 टिप्पणी:

Ek ziddi dhun ने कहा…

जितेंद्र सही कह रहे हैं।

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