4/27/2012

बूढ़े गिद्ध का नया शिकार: विष्‍णु खरे बनाम व्‍यालोक पाठक

गुंटर ग्रास की कविता पर विष्‍णु खरे के हस्‍तक्षेप के बहाने जो बात-बहस शुरू हुई थी, उसमें निजी चिट्ठियों वाला सिलसिला और पहलू अब भी जारी है, अलबत्‍ता अब यह द्वंद्व युद्ध मेरे और पाणिनी आनंद से होते हुए व्‍यालोक पाठक तक पहुंच गया है। पिछले कुछेक दिनों के दौरान विष्‍णु खरे ने व्‍यालोक को ठीक वैसे ही निजी आक्षेप वाले पत्र भेजे जिसके लिए उन्‍हें हम जानते आए हैं। ''जानते आए हैं'' इसलिए क्‍योंकि धीरे-धीरे उनके पुराने ''पाप'' खुलने लगे हैं। मसलन, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय से पढ़े-लिखे एक युवक के बारे में पिछले हफ्ते जानकारी मिली जिसके लोर्का के एक अनुवाद पर विष्‍णु खरे ने उसे ई-मेल लिख कर डांटा था। नतीजा यह हुआ कि कविता-कहानी-अनुवाद की दुनिया में एक फूल जो खिल रहा था, वह बेवक्‍त मुरझा गया। फिलहाल व्‍यालोक के जवाब और विष्‍णु खरे के असहिष्‍णु बाण जस के तस मैं नीचे चिपकाए दे रहा हूं। पुराने ''पाप'' की गठरी अभी खुलनी बाकी है। मूल विषय पर जितनी बातें आएंगी, उन्‍हें तो जनपथ पर मैं लगाऊंगा ही, लेकिन जब निकली हुई बात  दूर तलक चली जाए तो हरेक रास्‍ते का प्रकाशन ज़रूरी होता है। इसलिए और ज्‍यादा कि यह समझ आ सके कैसे एक आत्‍ममुग्‍ध बूढ़ा गिद्ध (जानने वाले जानते हैं कि यह संबोधन किसका है) चुन-चुन कर अपने नए-नए शिकार खोज रहा है। उसे बिल्‍कुल यह आभास नहीं कि उसकी प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। लिहाजा यह पत्राचार तिथिवार आपके सामने है।   

On Mon, Apr 23, 2012 at 11:05 PM, Vishnu Khare <vishnukhare@gmail.com> wrote: 

अभिषेक श्रीवास्तव शायद कुछ निकटवर्तियों को अपने बल्क-मेल भेजते हैं. जब उन्होंने मेरा प्रत्युत्तर अपने ब्लॉग पर लगाने से इनकार किया तो मैंने उसे एक अटैचमेंट में बदल कर  उन्हीं के एक पत्र की मदद से उन प्राप्तकर्ताओं को भेजने की कोशिश की. लेकिन जैसा कि मुझे शक़ था, वह अटैचमेंट उनमें से किसी के पास नहीं खुला, मेरा "इंट्रो" ज़रूर पढ़ा जा सका. तब अविनाशजी का फोन आया कि वे उसे लगाना चाहेंगे. मैंने कहा कि चूंकि मैं "जनपथ" के "इनर सर्कल" को भेज ही रहा था सो अब वह "पब्लिक डोमेन" में है, आप चाहें तो लगा लें. इसी प्रक्रिया से वह आप तक भी पहुंचा था, यह आप जानते हैं.

ब्लॉग-दुनिया ने हमें कितने बौद्धिक आलस्य से भर दिया है, आपका जुमला "खतो-किताबत का गट्ठर" इसका सुबूत है. उस "गट्ठर" में आधा तो आपके मित्र का ही था. यूं भी कुल-जमा दो हज़ार के आस-पास शब्द होंगे लेकिन आपके युवा सर के लिए यह गट्ठर है. तब आपका कोमल- ध्यान दें मैं पिलपिला नहीं कह रहा हूँ- मस्तिष्क असली, कई हज़ार शब्दों के गट्ठर कैसे उठा पाता होगा? कितनी वेदना होती होगी? "बिहार में सामाजिक कामों से" आप जुड़े हैं- क्या कुर्सीतोड़ आरामतलबी में या एनजीओ सुपरवाइज़री में?

मोहल्ला का मूषक मैं पहले भी कभी नहीं था, अब भी नहीं हूँ- आप लोगों के उस विशेषाधिकार का हनन मुझसे बर्दाश्त  नहीं होगा. इसी सन्दर्भ मैं अविनाशजी को लिख चुका हूँ कि मोहल्ला को लेकर मेरी कुछ आपत्तियां और रिज़र्वेशंस हैं और हम दोनों भविष्य में उन पर बात करने को सहमत हुए हैं.

आप  नाबदान और पीकदान का फर्क़ भूल चुके लगते हैं. नाबदान उस नाली को कहते हैं जिसमें हर तरह का गँदला पानी बहता है. कुछ लोगों के दिमाग और सोच को नाबदान कहा जा सकता है. पीकदान में सिर्फ थूका जाता है लेकिन वह साफ़ होता रहता है. इसीलिए मैंने नेट के अधिकांश हिंदी इस्तेमाल को पीकदानी नहीं, नाबदानी कहा. आप भंडैती को गाली समझते हैं जबकि वह farce या विदूषकत्व का पर्याय है. आप "न जाने किस मुंह से क्या क्या त्याग करने" पर संभ्रांत आपत्ति कर रहे हैं लेकिन भूलते या नहीं जानते हैं कि यह आपके मित्र अभिषेक जी का ही जुमला था- जिसे मोहल्ला के अविनाशजी ने इतना बॉक्स-ऑफिस समझा था कि उसे हैडिंग के योग्य माना- और उन्हें ही साभार लौटा दिया गया है.

आपने जो शेर उद्धृत किया है वह तालाब के एक ऐसे मेंढक का दृष्टिकोण है जिसने समंदर के बारे में कुछ सुना तक नहीं है. समंदर यूं तो चाँद के साथ हर शाम अपने आपे से बाहर होता है लेकिन जब से बना है हजारों बार प्रलय ला चुका है. मिथक में तो उसने कृष्ण के यादव-कुल और द्वारका का नाश किया ही, 2004 में उसने ढाई लाख मानवों की बलि ली, 2011 में तोहोकू में हजारों को फिर ले गया और इण्डोनेशियाई त्सुनामी का आतंक अभी-अभी कम हुआ है. ऐसे शेरों के भरोसे मत रहिए. आप तो जागरूक, कर्मठ सोशल वर्कर हैं- ऐसा न हो कि त्सुनामी फिर आए और आप मलबे और लाशों के बीच इस तरह का मार्मिक, हौसलाअफज़ा कलाम पेश करते हुए घूमते फिरें.

मैंने विषयांतर नहीं किया बल्कि शायद विषय-प्रवर्तन ही किया. असल में हिंदी में कुछ कुंठित, अयोग्य, अपनी उचक्की करतूतों के कारण ही बेरोजगार किन्तु ब्लॉग के ज़रिये काम मिलने तक  येन-केन-प्रकारेण चर्चा में बने रहने को समुत्सुक, नाना प्रकार की चालाक निंदा-स्तुति करते हुए,  ईर्ष्यावश सबसे पहले हिंदी साहित्य पर हमला करने वालों का एक गिरोह सक्रिय है, जिसके सदस्य जब कुछ पा जाते हैं तो तत्काल ब्लॉगबाज़ी छोड़ कर अफसरों, संपादकों या मालिकों के  सामने फुल-टाइम दुम हिलाने लगते हैं और उनकी जगह उन्हीं जैसे नए "स्ट्रगलर्स" ले लेते  हैं. इनमें "बाहर" के भी ऐसे कई संदिग्ध लोग जुड़ जाते हैं जिनकी साहित्यिक महत्वाकांक्षाएँ जितनी विराट हैं, प्रतिभा उतनी ही कम है. साहित्य सिर्फ प्रतिभा, प्रतिबद्धता और सृजन-संघर्ष की बपौती है, किसी और की नहीं, लेकिन यह भयावह है कि आज जिसे देखो वह हिंदी का लेखक बनना चाहता है जबकि हिंदी में न कोई पैसा है, न सामाजिक पहचान. फिर भी साहित्य में कुछ ऐसा है कि उसकी हाशिये की स्थिति का बखान और मखौल करते हुए भी इस तरह के इतने मार तमाम लोग चाहते हैं कि काश, हम एक लेखक के रूप में पहचाने जाएँ. ऐसे हुडुकलुल्लू जब तक कस्बों में रहते हैं तब तक साहित्य, पत्रकारिता और टेलीविज़न के दोन कोर्लेओनियों और आकाओं के जानी दुश्मन की तरह दीखते-लिखते हैं, लेकिन दिल्ली आकर पहली फुर्सत में उन्हीं के जूते चाटते हुए जब कुछ पा लेते हैं तो उनके कारसेवक और मरजीवड़े बन जाते हैं. कई लोग दिल्ली न आकर भी वैसा कर लेते हैं.

मैं फिर कहता हूँ कि राजनीतिक रूप से जितनी प्रतिबद्ध और जुझारू आज की हिंदी कविता है उतनी संसार की और कोई दूसरी नहीं, जबकि पचास-पचास वर्षों से लिख रहे शीर्षस्थ हिंदी कवियों को उनके सारे संग्रहों से रायल्टी या पारिश्रमिक के एक लाख रुपये भी नहीं मिले होंगे. अच्छी अच्छी पत्रिकाएँ कवियों को यदि मुआवजा देती भी हैं तो वह रक़म दोनों के लिए  शर्मनाक होती है. आज आप कहानी और उपन्यास तक लिख कर महीने में दस हज़ार रुपये नहीं कमा सकते. महाभारत में कई चीज़ों पर आश्चर्य प्रकट किया गया है- मेरे लिए आज का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि ग़रीबों,  मजलूमों और कुछ प्रतिबद्धों को छोड़कर जब उसके इर्दगिर्द (इन तीनों पशुओं से क्षमा मांगते हुए) अधिकांशतः कुत्ते, सियार और लकड़बग्घे ही हैं तो हिंदी लेखक लिखता ही क्यों है.

द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद जितने युद्ध और मानवता-विरोधी षड्यंत्र अमेरिका और अमेरिका- प्रेरित-समर्थित देशों ने किए हैं, उन सबके विरुद्ध हिंदी में कम-से-कम एक कविता तो होगी, जबकि स्वयं ग्रास कह रहा है उसके जीवन की यह पहली इस तरह की कविता है. हिंदी में फलस्तीन को लेकर बीसियों कविताएँ हैं. यासर अरफात और महमूद दरवेश के प्रति जितना आदर और स्नेह हिंदी कवियों में रहा है उतना विश्व के किसी अन्य साहित्य में कम-से-कम मेरे देखने में तो नहीं आया.

लेखक कहलाने के योग्य हर साहित्यकार सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द और सही भाषा को केन्द्रीय महत्त्व देता है यह कहना उतना ही घिसा-पिटा है जितना यह कहना कि आज सूर्य पूरब से उगा. और मार्क्सवाद सरीखे चिंतन और उससे प्रेरित लेखन में तो भाषा के महत्व को अतिरंजित किया ही नहीं जा सकता. मार्क्सवादी भाषाशास्त्र नामक चीज़ भी है और संसार के कई आधुनिक भाषाशास्त्री मार्क्सवाद से भी कमोबेश प्रभावित हैं. आप भ्रष्ट भाषा में कुछ भी  प्रतिबद्ध लिख नहीं सकते. सटीक, सुस्पष्ट, तार्किक भाषा के बिना मार्क्सवाद सरीखे वैज्ञानिक विषय पर पक्ष-विपक्ष दोनों में कुछ भी सार्थक बोल, लिख और सोच पाना असंभव है. सच तो यह है कि ऐसी भाषा पत्रकारिता, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, हर तरह के ज्ञान विज्ञान ही नहीं, जीवन के हर पहलू में अनिवार्य है. भाषा के साथ सृजनात्मक, प्रयोगधर्मा आज़ादी निराला, शमशेर, मुक्तिबोध सरीखे विरले महान लेखकों द्वारा ही बरती (देने दी) जा सकती है.

इस सन्दर्भ में आपने जो प्रूफ-रीडिंग और एडिटिंग की क्लास लेने की बात कही है वह हिंदी के आप जैसे लोगों के बौद्धिक उठाईगीरेपन और मतिमंदता को ही दर्शाती है. ये दोनों हुनर, जो हर तरह की पत्रकारिता और लेखन-प्रकाशन के लिए अनिवार्य  हैं, आप और आपके अभिषेक-पाणिनिद्वय सरीखे मित्रों के लिए, तुच्छ और अपमानजनक हैं. पिछले कुछ वर्षों से हिंदी में एक ऐसी पीढ़ी दाखिल हुई है जिसे सही भाषा बोलना, पढ़ना, लिखना नहीं आता और वह उस पर उद्दंड गर्व करती है. आंचलिकता का एक साथ ढोंग और स्यापा करते हुए, हिंदी से ही लाभ उठाते हुए,  उसने हिंदी के हर तरह के भ्रष्ट इस्तेमाल को "अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता" का एक अराजक राजनीतिक नकली मसला बना डाला है. हुडुकलुल्लुओं का एक झुण्ड हिंदी को अधिकतम भ्रष्ट करने पर आमादा है और यदि उसका विरोध किया जाए तो वह हिंदी साम्राज्यवाद की ब्लैकमेल करने लगता है. मैं संसार की किसी भाषा का विरोधी नहीं. किन्तु कुछ भाषाएँ अपना काम कर चुकी हैं और कुछ भाषाएँ अब कई कामों की नहीं रहीं. यह एक तटस्थ, निर्मम, विश्वव्यापी, अनंत प्रक्रिया है. प्रूफ रीडिंग और एडिटिंग को लेकर आपके मन में जो ताच्छिल्य है वह दोमुंही भाषायी चालाकी का लक्षण है. वैसे इससे यह भी पता चलता है कि आप पत्रकारिता में प्रवेश क्यों नहीं पा सके होंगे.

अंत में, जो प्रश्न मैंने आपके जोड़ीदार पाणिनि जी से पूछा था, उसे आपसे भी करता हूँ. हिंदी के तो आप जानी दुश्मन लगते ही हैं, दईमारी संस्कृत ने आपका क्या बिगाड़ा है कि आप भी उसके श्लोकों के साथ बलात्कार करने पर उतारू हैं:

उष्ट्रानां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः
परस्परं प्रशंसन्ति अहोरूपं अहोध्वनिः

किमधिकं? शान्तं पापं.

विष्णु खरे


On Tue, Apr 24, 2012 at 10:50 AM, Vyalok Pathak <vyalok@gmail.com> wrote:

श्रीमन्,

सर्वप्रथम धन्यवाद कि आपने मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति को प्रत्यक्ष संबोधित इतना लंबा मेल लिखने के लिए समय निकाला। दूजा, यह जानकर अच्छा लगा कि आप मोहल्ला के मूषक न कभी थे, न हैं। बहरहाल, मुझे शायद ग़लत पता था कि एक बार के नकार को नकार ही माना जाता है, उस पर इनर और आउटर सर्कल की बहानेबाजी नहीं की जाती। चरित्र शायद कनॉट प्लेस के गलियारों से बढ़कर है न, प्रभो।

गट्ठर का प्रयोग मुहावरा था, सर न कि मेरा बौद्धिक आलस्य। आप भी तो इस बात को मानेंगे न कि आप दोनों के बीच हुए बौद्धिक आदान-प्रदान में प्रलाप अधिक है, मसले की बात कम। मेरे मित्र का केवल एक खत आपसे अधिक है, सर जी और यह कोई वजह नहीं कि आप दोनों के बीच हुए मेल-युद्ध को बहस के गिर्द समझा जाए, इसी वजह से मैने गट्ठर का प्रयोग किया। आपको नागवार लगा, तो क्षमा। हां, आपको अपनी रोजाना पढ़ाई का ब्योरा देना मेरी नैतिक बाध्यता नहीं हैं।  आपने मेरी नौकरी को लेकर जो 'बिलो द बेल्ट' प्रहार किया है, उस पर केवल इतना बता दूं कि फिलहाल बिहार में हूं, इसके पहले छह महीने तक मध्य प्रदेश के मंडला, बिछिया और कई ऐसे गांवों की खाक छान कर आय़ा हूं, जिनका आपने शायद नाम भी न सुना हो। मैं 'बैगा ' जनजाति के साथ काम करता था, और रोज़ाना करीबन 150 किलोमीटर की यात्रा भी। फिलहाल भी मैं कोई कुर्सीतोड़ आरामतलबी नहीं कर रहा, अपने निर्वाह के लिए दस घंटे की एक नौकरी कर रहा हूं।

तीसरी बात यह कि पीकदान रोज़ साफ होता है, तो उसमें खाना तो नहीं खाया जाता न सर। और गुरुदेव, आपके उच्छृंखल भाषा-प्रवाह को सही ठहराने के तर्क भी अद्भुत हैं। अभिषेक ने किया, तो मैं भी करूंगा...बहुत खूब। तो खाक, बड़प्पन दिखाया आपने। हां, लगे हाथों यह भी बता दूं कि नेट पर मैं बहुत कम चक्कर लगाता हूं। मेरा अपना कोई ब्लॉग नहीं, और मोहल्ला पर मैं बस हस्तक्षेप करता हूं, वह भी इसलिए कि आज के दौर में सोशल मीडिया एक जरूरी प्लेटफॉर्म बन गया है। साथ ही, आपने मेरी कूपमंडूकता का हवाला देते हुए समंदर के बारे में जो कुछ भी कहा, उस पर मुझे आश्चर्य होता है। शेर में बरसात का हवाला है, गुरुदेव, जो आप समझ नहीं पाए या नज़रअंदाज़ कर गए। बारिश आने से तो तालाब ही बौराते हैं सर, समंदर पर उससे क्या फर्क पड़ेगा ? जैसे, "छुद्र नदी भरि चली तोराई, जस थोरेहुं धन खल इतराई......"। वैसे भी आप कितनी प्रलय ला रहे हैं, वह तो दर्शनीय है ही।

चौथी बात यह गुरुदेव कि हिंदी के बारे में आपने जो कहा, उससे में पूर्णतया सहमत हूं। इसी वजह से समकालीन साहित्य की ग़लाज़त से दूर भी, और हां कुछ उदाहरण तो मैंन पहले भी गिनाए ही थे। हां, कवियों-लेखकों की प्रतिबद्धता के कुछ उदाहरण देते तो हम जैसे कमअक्लों को बात और समझ में आती। साथ ही, याद दिला दूं कि  मैंने अमेरिका के समर्थन में पट्टियां और झंडे नहीं उठा रखे हैं।

अंतिम बात यह श्रीमन्, कि मैं अगर एडिटिंग और प्रूफ रीडिंग को बेकार का काम समझता, तो अपने जीवन के आट-नौ बहुमूल्य वर्ष इन्हीं कामों को नहीं देता। आप पत्रकारिता में मेरे प्रवेश को लेकर भी ग़लत हैं, सर। मैं आईआईएमसी के 2002-03 बैच के हिंदी पत्रकारिता का छात्र था, माया (जब श्रीकांत त्रिपाठी के संपादकत्व में उसके पुनर्प्रकाशन की कोशिश हुई), द संडे इंडियन, ईटीवी से लेकर दैनिक भास्कर तक अपनी सेवा दे चुका हूं। हां, पत्रकारिता के नाम पर उल्था करने और दूसरों की गंदगी साफ करने से जब ऊब गया, तो फिलहाल सबैटिकल पर हूं। इसमें पत्रकारिता की कक्षाएं लेता हूं, घूमता हूं और मेहनत से रोटी कमाता हूं। यह सब मैं आपको लिखता भी नहीं, लेकिन आपकी हीन-ग्रंथि से झल्लाकर विवश हुआ हूं। आप आखिर क्यों तीन लैपटॉप, नेट कनेक्शन और मार-तमाम चीजों की दुहाई देते हैं और दूसरों के बारे में बिना जाने अयाचित टिप्पणी करते हैं, श्रीमन्।

इत्यलम्।
विनयावनत

व्यालोक

पुनश्चः आपने जो मेरी हिंदी और संस्कृत की दुहाई दी है, उसके लिए धन्यवाद, हालांकि आपने मेरी हिंदी और संस्कृत में कौन सी ग़लती देखी, वह स्पष्ट नहीं। हां, आपने मेरा ज्ञानवर्द्धन जरूर किया है कि 'संदर्भ' के बाद 'में' लगाए बिना भी वाक्य को बढ़ाया जा सकता है ('इसी संदर्भ मैं अविनाशजी'..... वाला आपका वाक्य देखें) और हेडिंग के बदले हैडिंग लिखा जा सकता है। श्लोक में विवाहेषु लिख कर आप कितने ऊंटों का विवाह एक साथ करा रहे हैं, समझ नहीं पाया (देवे-देवयोः-देवेषु, समझेंगे, श्रीमान)। क्या आप नहीं जानते कि विवाह तो विवाह ही होता है, एक का हो या अनेक का, उसमें गीत तो गाए ही जाएंगे। इसी तरह प्रशंसन्ति और प्रशंस्येते, दोनों ही के प्रयोग को आप देखें।  बाक़ी, अंत में अहोरूपं का म और अहोध्वनि का म मिलकर 'अहोरूपमहोध्वनि'  हो गया। हां, इसके ''  के बाद आधे अ का निशान (जो अंग्रेजी के एस की तरह होता है) मुझे नहीं मिल पाया, इसके लिए क्षमा। लट् लकार में प्रयुक्त 'गर्दभा संति गायकाः ' और 'गीतं गायंति गर्दभाः' दोनों ही व्याकरणिक तौर पर अशुद्ध शायद नहीं हैं, हां पाठभेद ज़रूर हो सकता है, और आपका मौलिक सृजन भी। तो, अपने यहां तो क्षेपकों की परंपरा ही रही है। बहरहाल, आपके ध्यानाकर्षण के लिए मैं आभारी हूं।


On Wed, Apr 25, 2012 at 2:43 PM, Vishnu Khare <vishnukhare@gmail.com> wrote:

जब तक कोई व्यक्ति स्वयं को वैसा सिद्ध न कर दे, मैं उसे तुच्छ नहीं मानता. फिर समझाने की कोशिश करता हूँ. जब अभिषेकजी ने मेरा मेल लगाने से इनकार कर दिया तो मैंने उसे उनके उस अन्तरंग  मंडल ("इनर सर्कल") को भेजने की कोशिश की जो उनकी स्थायी सूची पर है ताकि उसे मालूम हो जाय कि अभिषेकजी को उत्तर दिया गया था और वह क्या था. अब यदि उस सूची में अविनाशजी थे तो मैं उनके पते को उससे साफ़ तो नहीं कर सकता था. फिर अविनाशजी ने मुझसे उसे लगाने की बाकायदा अनुमति माँगी और मैंने दी. यदि मुझे मोहल्ला पर आने की हसरत होती तो मैं आपको लिखे गए मेरे पत्र को उन्हें भी सीसी कर चुका होता. विश्वास कीजिये, वे उसे अब तक सहर्ष लगा चुके होते और अब भी भेजूं तो लगा देंगे. मोहल्ला पर जाने की हवस आपको है- आप उसे "सोशल  मीडिया का ज़रूरी प्लेटफ़ॉर्म" समझते हैं. अपनी-अपनी समझ की बात है.

देख रहा हूँ कि बिहार में समाज सेवा करते हुए भी आप कनाट प्लेस को भुला नहीं पा रहे हैं. दिल्ली में चालीस बरस रहा लेकिन औसतन प्रति वर्ष दो बार भी वहाँ जाना नसीब न हुआ. अधिकांश दफा तो मोहन सिंह प्लेस के कॉफ़ी हाउस के लिए, वह भी 1970 के दशक तक ही गया. 2000-2010 के बीच तो कब गया यह भी याद नहीं.

भाई, मैं तो यह कह रहा था कि जब आपको कुछ सौ शब्द गट्ठर लगते हैं तो आपकी कोमल ग्रीवा समाज-सेवा का बोझ कैसे उठाती होगी. नागवार आपको लगा है, मुझे क्यों लगेगा.

आप मेरे बारे में बहुत कम जानते हैं, मैं आपके जानने लायक भी नहीं, किन्तु जब आप मुझे मंडला, बिछुआ और बैगाओं के बारे में चुनौतीपूर्ण ढंग से बताते हैं तो मुझे आपके आत्मपावन   मूर्खतापूर्ण अहंकार पर तरस आता है. मैं मध्य प्रदेश के ठेठ आदिवासी इलाके के जिले छिन्दवाड़ा के मुख्यालय छिन्दवाड़ा में पैदा हुआ हूँ. ज़रा देखिएगा मंडला वहाँ से कितनी दूर है. बिछिया, बिछुआ और गाँवों के ऐसे कई नाम गोंडवाना में बहु-प्रचलित हैं. वह सारा इलाका हमारा है. बीसियों गोंड बचपन से मेरे मित्र और सहपाठी रहे हैं. मेरी पहली शिक्षिका एक गोंड ईसाई थीं. मेरे घर के ठीक पीछे गोंडों का एक बाड़ा था जिसमें लगभग पचास गोंड रहते होंगे. मुझे जीवन में पहली बार मछली एक गोंड परिवार ने दिखाई और खिलाई थी जिसे हमने अपने अधिक मुसीबत के दिनों में एक कमरा किराये पर दिया था. वे हमारे परिवार जैसे थे. इनमें से कुछ संकेत मेरी कविताओं में 1970 से हैं.

आप सन्दर्भ देखना ही नहीं चाहते. जब मोहल्ला पर कुछ जाहिलों ने यह आरोप लगाया कि मैं नेट समझता नहीं हूँ, नेट की दुनिया से ईर्ष्यालु हूँ, नेट पर लोगों को काम करने नहीं देना चाहता, तब मैंने वह सब बताना अनिवार्य समझा. जैसे मेरे गोंडों के साथ उपरोक्त संबंधों के बारे  है. मेरे पास 1997 से कंप्यूटर है उसके बाद भी मुझसे बीसियों इंटरव्यू लिए गए होंगे, मैंने एक बार भी नेट में मेरी गहरी दिलचस्पी और गतिविधि का ज़िक्र नहीं किया, मेरा कोई फोटो डेस्कटॉप या लैपटॉप के साथ नहीं छपा. मैं यह मान कर चलता हूँ कि आज का कोई भी बुद्धिजीवी, जो अफोर्ड कर सकता है, एक डेस्कटॉप तो रखता ही होगा या साइबर-कैफे जाता होगा. लेकिन हिंदी के कुछ अहंकारी युवा मूर्ख समझते हैं कि उन्होंने ही कंप्यूटर ईजाद किया है. उन्हें रिअलिटी चेक देना ज़रूरी था. वे पलटकर बिलबिलाने लगते हैं. अब इसका तो कोई इलाज़ ही नहीं है.

आप लिखते हैं कि प्रतिबद्धता के कुछ उदाहरण तो देते. जब कुछ सौ शब्दों में आपकी कमर टूट गयी तो उदाहरण देने में उसकी कितनी दुर्दशा होगी. लेकिन यह मामला और गंभीर है. ब्लॉग पर मुफ्तिया जानकारी पा लेने वाले लोगों ने स्वयं को बौद्धिक जूँ, चीलर और खटमल जैसा parasite  बना डाला है. मैं पत्रों में बीसियों कवियों के नाम दे चुका हूँ. आप उन्हें पढ़ते क्यों नहीं हैं? आप पत्रिकाओं को क्यों नहीं देखते? मैं ब्लॉग पर यह निर्लज्जता और अज्ञान देख कर दंग होता  हूँ कि मुक्तिबोध, धूमिल या आलोक धन्वा जैसों  की पुरानी कविताएँ लगाने के बाद भी लोग लिखते हैं कि अरे, ये लोग कहाँ थे, इनकी और रचनाएँ (हराम में) पढवाइए.

आप इतना नहीं देख पा रहे हैं कि "सन्दर्भ में मैं" में दुहराव के कारण 'में' टाइप होने से रह गया और बाद में भी मेरी निगाह में नहीं आ पाया. अब आपने ही आठ को आट टाइप कर दिया तो क्या वह कोई गलती है जिसे लेकर बैठ जाऊं? या जहां आप सोशल वर्क कर रहे हैं वहां आठ को आट बोलते-लिखते हैं?

शेर की व्याख्या को लेकर आपसे बहस व्यर्थ है. आपने बारिश में समंदर को देखा नहीं है. समंदर मानव-निर्मित और उतना सीमित नहीं है. फिर भी वह रोज़ अपनी सीमाएं तोड़ता है  वर्ना हर तटवर्ती इलाके में पुश्ते क्यों बनाए जाते? सागर पर शायद भूमि से ज्यादा बारिश होती होगी और लगातार उसके परिणामों पर खोज हो रही है. शायरी या कविता को बहुत ज्यादा विज्ञान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए लेकिन साहित्य प्रमाणित या सत्यापनीय तथ्यों से खिलवाड़ नहीं कर सकता, वाहवाही के लिए भी नहीं.

हैडिंग का सवाल आपने अच्छा उठाया है. अंग्रेजी के इस तरह के शब्दों को नागरी में अक्सर लोग '' की मात्रा से लिखते हैं.लेकिन '' पर '' की मात्रा लगाइए और सिर्फ 'हे' पढ़िए और फिर heading . क्या हम head  को 'मेड' ( made ) की तरह पढ़ते हैं? यदि आप दोनों के उच्चारण सही कर रहे हैं तो आप पाएँगे कि 'हेडिंग' लिखना ठीक नहीं है. अंग्रेजी की यह स्वर-ध्वनि 'हे' और 'है' के बीच की है और १९२०-३० की हिंदी पुस्तकों में इसके लिए हे में ए की मात्रा के ठीक साथ चंद्राकार कम्पोज़ किया जाता था. आप देख कर बताइए कि कामिल बुल्के made  को मेड क्यों लिखते हैं और आपके हेड को हे´ड क्यों? मुझे तो नैट को भी नेट लिखने से नफरत है. खैर, अब तो 'हंस' उड़ गया और 'हंस' कर बोलो को एक जैसा लिखा और कम्पोज़ किया जाने लगा है. आप हेडिंग ही लिखें लेकिन साथ में कम-से-कम  आइ.आइ.एम. तो लिखें. हिंदी में ९० प्रतिशत लोग किस बेवकूफी में अंग्रेजी अक्षर आइ को आई लिखते हैं यह समझ के बाहर है.

मैंने कब लिखा कि पीकदान में खाना खाइए? मैं तो आपको नाबदान में ही खाने से रोक भी नहीं रहा हूँ.

आप किसी असली संस्कृत पंडित से पूछ लें, फिर आपके श्लोक पर बात करें.

श्रीकांत त्रिपाठी जी से मेरा थोड़ा परिचय है. कभी भेंट हो तो मेरी याद दिलाइएगा.

विष्णु खरे


On Thu, Apr 26, 2012 at 9:48 AM, Vyalok Pathak <vyalok@gmail.com> wrote:


श्रीमन्,

मुझे तुच्छ न समझने के लिए आपका धन्यवाद। आपका मेल मिला, मुझे बहुत लंबा-चौड़ा जवाब देने लायक नहीं लगता, बस कुछ बिंदुवार बातें बताता हूं।

1. आप सचमुच वाक्यों को नहीं पढ़ते, या फिर अपने हिसाब से उनका अर्थ निकालते हैं। मैंने सोशल मीडिया को एक ज़रूरी प्लेटफ़ॉर्म बताया था, न कि मोहल्लालाइव को। मुझे छपास की हवस नहीं सरजी, और इसके लिए मुझे आपसे या किसी से सनद नहीं चाहिए।

2. कनॉट प्लेस अगर आप दस वर्षों में नहीं गए हैं, तो आपको जाना चाहिए। खूबसूरत जगह है। रहा सवाल, आपको जानने का, तो थोड़ी-बहुत जानकारी मैं भी रखता हूं। मैंने अपने बारे में बताया था, न कि आपके बारे में अज्ञानी था। आपकी यह अद्भुत अदा है। मैंने तो आपके द्वारा मुझ पर लगाए कोमलता के आरोप का जवाब दिया था, बस। और हां, गोंडों की समाजार्थिक स्थिति वही है, जो राजस्थान में मीणाओं और बिहार में कुर्मियों की। तो, बैगा और गोंड का अंतर, उनके गांवों की स्थिति और पूरा वातावरण आपको बताने की जरूरत नहीं गुरुदेव।

3. आप कब तक मुक्तिबोध, धूमिल वगैरह की दुहाई देंगे, मुझे नहीं पता। इसका आदर्श जवाब तो यही है कि मैं निराला और प्रसाद की बात करने लगूं। बात आज की यानी 2012 की हो रही थी।

4. मैं बिल्कुल जानता था कि संदर्भ के साथ 'में' क्यों नहीं लगा है? मानवीय ग़लतियां होती ही रहती हैं श्रीमन्, लेकिन वह आप भी तो मानें। आपने तो सीधे मुझे हिंदी और संस्कृत का जनाजा उठाने वाला करार दिया। संपूर्ण कोई नहीं होता, और वही बताने की चेष्टा मैंने आपको की। अच्छा लगा कि एक ही उदाहरण में आप मान गए। हेडिंग का मसला भी मेरे लिए हेडेक नहीं है। आख़िर भाषा तो बहता नीर है, बशर्ते उसका रुख़ ही न मोड़ दिया जाए। पाठभेद होते ही हैं। आखिर, आप भी तो लगातार 'फुलस्टॉप' लगा रहे हैं, जबकि मैं 'पूर्णविराम ' का प्रयोग कर रहा हूं। संस्कृत के श्लोक के संदर्भ में मैंने तो आप ही को विद्वान मानकर कुछ जिज्ञासाएं की थीं। आप लगता है, आंतरिक तौर पर उससे सहमत भी हैं (या जवाब तलाश रहे हैं), वरना जूं, चीलर, बौद्धिक उठाईगीरे, परजीवी और पता नहीं क्या-क्या विशेषणों से विभूषित करनेवाली आपकी लेखनी इस मसले पर इतनी चुप रहे, यह आश्चर्य का विषय है।

5. श्रीकांत जी से अगर मैं मिला तो जरूर आपका उल्लेख करूंगा।

विनयावनत,
व्यालोक

इस प्रसंग से जुड़ी और सामग्री नीचे देखें:

... बाहर कभी आपे से समंदर नहीं होता
बिसनू, कौन कुमति तोहे लागी
मूर्खों सावधान, मैं सिंह हूं जो तुम्‍हें आहार बना सकता हूं
जाहिल इज़रायल विरोधियों को नहीं दिखता ईरान का फासीवाद
गुंटर ग्रास की विवादित कविता हिंदी में: 'जो कहा जाना चाहिए'

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