5/31/2012

एक 'ठहरी हुई विचारधारा' से संवाद की इतनी उतावली क्‍यों राकेश जी?

हेडगेवार के जीवनीकार प्रो. राकेश सिन्‍हा के लेख का जवाब कवि-पत्रकार रंजीत वर्मा ने भेजा है। उन्‍होंने अपने जवाब में आवाजाही को लेकर फैले आग्रहों के पीछे की राजनीतिक साजि़श को पकड़ा है और इस संदर्भ में संघ पर कुछ सवाल खड़े किए हैं।   



रंजीत वर्मा
आवाजाही के हक में जो लोग हैं उन्होंने लंबे-लंबे लेख तो लिखे हैं लेकिन कहीं भी इस आवाजाही को परिभाषित करने की कोशिश नहीं की है। फिर भी उनके लेखों से आवाजाही का जो आशय निकल कर सामने आता है वह यह है कि कोई भी अगर विपरीत विचारधारा के मंच पर जाता है तो इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये बल्कि इसे बढ़ावा देना चाहिये। क्योंकि अब जैसा कि सभी लोग एक स्वर में मान रहे हैं कि समय बदल गया है- जिसे हम यों भी कह सकते हैं कि जिस तरह से कोई जाति अछूत नहीं रही उसी तरह से कोई विचार भी अछूत नहीं रहा। या फिर इसको राकेश सिन्हा के शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि ''दुनिया में अनेक बदलाव आये हैं। बंद दिमाग और बंद समाज नापसंद किया जा रहा है।'' अगर सचमुच यही आशय है उनका जो आवाजाही के हक में खड़े हैं, तो अचानक कई सवाल हैं जो मन में घुमड़ने लगते हैं।



पहला सवाल तो यह है कि आखिर इस बात पर जोर क्यों दिया जा रहा है कि विपरीत विचारधारा वालों के मंच पर जाया जाए? ऐसे बहुतेरे मंच हैं, जैसे कि वर्चुअल स्पेस से लेकर अखबार, पत्रिकाएं और कई सारी अकादमियां और विश्‍वविद्यालय जहां इस तरह के संवाद होते हैं और हो भी रहे हैं। फिर क्या जरूरत है संवाद करने के लिए एक निश्चित चेहरे वाले मंच पर जाने की? दरअसल देखा जाए तो संवाद अपने समय से किया जाता है यानी कि समय पर जिसकी पकड़ होती है, वही संवाद करने में भी सक्षम होता है। यहां किसी व्यक्ति, किसी मंच की जरूरत नहीं पड़ती। जरूरत शायद उसे पड़ती है जो अपनी सक्षमता को लेकर आशंकित होता है- या तो व्यक्तिगत मेधा की भारी कमी की वजह से या फिर वह जिस वैचारिक ज़मीन से आता है उसकी संदिग्धता की वजह से। किसी भी धर्म या जाति के बाहर भी इंसान हैं, इसलिए कोई भी ऐसा विचार जो धर्म या जाति से नाभिनालबद्ध है वह कभी भी समस्त मानव समुदाय की बात नहीं कर सकता। यहीं लगे हाथ यह भी कहा जा सकता है कि संवाद चूंकि समाज में वैसे भी कम हो गया है इसलिए कम से कम समानधर्मा विचार वालों को चाहिये कि वे एक ऐसा पब्लिक प्लेटफॉर्म तैयार करें जिसमें जनता की भी समान रूप से भागीदारी संभव हो सके। 



दूसरा सवाल यह है कि सिर्फ एक को ही क्यों बुलाया जा रहा है और सिर्फ उससे ही क्यों उम्मीद की जा रही है कि वह आये? वे जवाब में कह सकते हैं- क्योंकि वे एक बड़े कवि हैं या पत्रकार हैं या बुद्धिजीवी हैं और अपने किसी तय विषय पर वे उनके विचार सुनना चाहते हैं तो इसमें बुरा क्या है। ठीक है, कोई बुराई नहीं है, लेकिन अगर उनके साथ उनकी ही विचारधारा के और हजार पांच सौ लोग चले जाएं उनकी गोष्‍ठी में, तब? उनका जवाब हो सकता है कि बहुत अच्छी बात होगी तब तो, स्वागत है सबका। अगर वे सचमुच ऐसा बोलते हैं तो इससे बड़ा झूठ उन्होंने शायद ही कभी कहा होगा। क्योंकि ऐसा कभी देखने में नहीं आया कि साथ में उन्होंने और भी तमाम लोगों को बुलाया हो।

अब जैसे कि राकेश सिन्हा की संस्था इंडिया पॉलिसी फाउन्डेशन ने मंगलेश डबराल को बुलाया लेकिन उन्होंने उनके ही संगठन जन संस्कृति मंच से किसी और को नहीं बुलाया। यानी कि आप समझ सकते हैं मेरा सवाल मात्रात्मकता को लेकर है। वे बतायें कि आखिर कितने लोगों की एक साथ आवाजाही होनी चाहिये? यह जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि एक को बुलाने पर ऐसा लगता है मानो उसका शिकार करने को बुलाया जा रहा है। और दूसरी बात यह लगती है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला जो श्रेष्ठ मस्तिष्क है, वह सब एक पावर स्ट्रक्‍चर के अंदर आ जाये। यह खतरनाक कोशिश है जो सभी स्तरों पर चल रही है। साहित्य में भी और अन्य बुद्धिजीवियों के बीच भी। राजनेताओं और कॉरपोरेट हस्तियों ने तो इसकी शुरुआत ही की है। क्या यह संसद के बाहर एक संसद बनाने की कोशिश है जहां उनके चुने हुए बुद्धिजीवी बैठें और बहस मुबाहिसे कर विरोधी विचारधारा वालों के साथ परस्पर 'सहयोग करें'। यहां मैं यह सवाल नहीं करूंगा कि चुने हुए सांसदों के बीच ऐसी क्या बहस होती है कि उसे प्रेरणादायी माना जाए और बाहर एकदम विपरीत विचारधारा वाले बुलाये गये बुद्धिजीवियों की एक संसद लगायी जाए, लेकिन यह सवाल मैं जरूर करूंगा कि क्या है वह सहयोग जिसे करने के लिए संसद लगाने की बेचैनी एक तबके में देखी जा रही है, जिसका प्रतिनिधित्व करते हुए राकेश सिन्हा अपने लेख में कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो वह 'बौद्धिक कायरता' और 'मानसिक विकलांगता' मानी जाएगी? इसी सवाल के साथ यह सवाल भी मैं जरूर करूंगा कि कॉरपोरेट हस्तियां आपस में मिल कर एक दूसरे को सहयोग करते हुए लूट का जो नक्‍शा तैयार किये बैठी हैं या वे राजनीतिज्ञ जो इस लूट और हत्या में समान रूप से साझीदार बने हुए हैं, आखिर कैसे संघी बुद्धिजीवियों को प्रेरित कर रहे हैं? खैर, वे चाहे जैसे भी प्रेरित हो रहे हों, लेकिन सवाल तो यह है ही कि वे वामपंथियों को इसमें क्यों घसीटना चाहते हैं। क्या अपनी प्रामाणिकता के लिए? बौद्धिक जगत में अपनी स्वीकृति के लिए? और साथ ही वामपंथी कुशाग्रता को संदेह के कठघरे में खड़ा कर देने के लिए?



राकेश सिन्हा ने अपने लेख में जेपी का उदाहरण बहुत सही दिया है। सन 74 के इस छात्र आंदोलन से लेकर 77 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बीच सबसे बड़ा फायदा जनसंघियों को हुआ। ये अपनी दीया छाप छवि से इन्हीं सालों में उबरे और सन अस्सी के बाद जब जनता पार्टी की सरकार गिर गयी और जनता पार्टी टूटी, तो पुराने संघियों ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। लेकिन इस पार्टी का चेहरा पुराने जनसंघ के चेहरे से बिल्कुल भिन्न था क्योंकि इसमें ऐसे कई युवा भी शामिल थे जिन्होंने राजनीति की शुरुआत 74 के इस छात्र आंदोलन से की थी यानी कि जिनकी कोई संघी पृष्ठभूमि नहीं थी। इन सबके परिणामस्वरूप समाज में राजनीतिक रूप से इन्हें व्यापक स्वीकृति मिली। राजनीतिक रूप से सफल होने वाले अपने इसी प्रयोग को वे बौद्धिक दुनिया में भी आजमाना चाहते हैं। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें मार्क्‍सवादियों का साथ चाहिये।



राकेश सिन्हा को अपनी तरफ से सबसे बड़े बुद्धिजीवी के रूप में संघ ने सामने रखा है ताकि वामपंथी बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हों और संवाद के लिये तत्पर हों। अगर बौद्धिकता का यही स्तर उनका सर्वोच्च है, तो मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि किसी भी तरह की समझदारी भरी बातचीत इन संघियों से नहीं की जा सकती है। खामख्‍वाह  ये संवाद के लिए लालायित होकर खुद को कुंठित कर रहे हैं। देखिये, अपने पहले ही पैराग्राफ में वे क्या लिखते हैं- ''वामपंथ से जुड़ी बौद्धिक धारा अभी भी साठ व सत्तर के दशक में ही ठहरी हुई है। इस ठहराव को दूर करने के सभी प्रयासों पर रेड ब्रिगेड का हल्ला बोल शुरू हो जाता है।'' मैं यहां यह नहीं कहूंगा कि मिराजकर वाला प्रकरण जो उन्होंने रखा है उसे बिना ऐतिहासिक समझ के रखा है (क्योंकि यह समझ उनके पास है ही नहीं। इस समझ को विकसित करने के लिए ऐतिहासिक व द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समझ जरूरी होती है जो उन्हें हेडगेवार दे नहीं सकते थे) यानी कि तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर रखा है। मैं यह भी नहीं कहूंगा कि 67 में नक्सलबाड़ी के आंदोलन ने एक बौद्धिक विस्फोट को जन्म दिया था जिसे दुनिया ने बसंत के वज्रनाद के रूप में जाना, फिर वे कैसे मिराजकर के उदाहरण को सत्तर के दशक की मार्क्‍सवादी बौद्धिकता की परख मान रहे हैं। मैं इस तरह के कोई सवाल उनसे नहीं करूंगा। हां, मैं उनसे यह जरूर पूछूंगा कि आज वामपंथ की बौद्धिक धारा अगर साठ व सत्तर के दशक में ठहरी हुई है तो वे उनसे संवाद क्यों करना चाहते हैं? वे इस ठहराव को दूर करने के प्रयास क्यों कर रहे हैं? मर जाने दें उन्हें अपनी मौत। एक अप्रासांगिक विचारधारा जी कर भी क्या करेगी?



अपने लेख के अंतिम से तीसरे पैराग्राफ में वे लिखते हैं- ''यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि परंपरागत खांचों में बंद होकर हम नवसाम्राज्यवादियों एवं विदेशी एवं देशी  पूंजी की सांठगांठ का मुकाबला नहीं कर पायेंगे।'' यह तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन वे पहले यह तो बतायें कि विदेशी व देशी पूंजी से वे क्यों लड़ना चाहते हैं? फिर यह भी बतायें कि अगर उन्होंने लड़ाई शुरू कर दी है तो वे कौन सी रणनीति अपनाये हुए हैं? जो कुछ भी रणनीति उन्होंने अपना रखी है, उसके बारे उनके अलावा और किसी को जानकारी है या नहीं? वे यह भी बतायें कि उन्होंने जो रणनीति अपनायी है वह माओवादियों से कितनी भिन्न है? साथ ही वे यह भी बतायें कि एक-दो ही साझा कार्यक्रम चलाने के लिए माओवादियों से उन्होंने बातचीत की या नहीं? अकेले खड़े हैं वे कॉरपोरेट लूट के खिलाफ! जान गंवा रहे हैं अपनी! ओह! यह मैं क्या कहने लगा! आप भला माओवादियों से क्यों बात करेंगे? ओह, यह तो आप ही हैं जो छत्तीसगढ़ में उनकी जान ले रहे हैं। यह तो आप ही हैं जो उड़ीसा में बीजद के साथ मिलकर उनके सफाये में लगे हैं।



फिर आप कैसे लड़ रहे हैं विदेशी-देशी पूंजी की सांठगांठ से, जो आप बिल्कुल महफूज हैं? आप कहते हैं अमेरिका पड़ा है आपके पीछे! तो यह भी बताइये कि अब तक क्या-क्या किया उसने आपके साथ? क्या सोवियत संघ में आपका ही शासन था जो अमेरिका की आंखों में खटकता था? अमेरिका के पांवों में कील सा चुभता क्यूबा का राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो आपके स्कूल का छात्र है कोई? और चे ग्वेवारा- जिसे बोलीविया के जंगल में घेर कर मारा अमेरिका ने और जिसे मारने के लिए करोड़ों डॉलर बहा दिये उसने- वह क्या कोई संघी था? अमेरिका के साथ युद्धाभ्यास कर चुकी भारतीय सेना माओवादियों के खिलाफ उतर चुकी है। आपको मारने किसकी सेना आगे बढ़ रही है?


मुझे किसी की कविता की दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

एक नंबर के गद्दार और फरेबी हो तुम
मैं नहीं मेरे कारतूस बात करेंगे तुमसे।



   
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5/30/2012

साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं...

प्रो. राकेश सिन्‍हा ने अपने ब्‍लॉग और फेसबुक पर आवाजाही के संदर्भ में वामपंथियों के खिलाफ जो लेख लिखा था जिसे हमने बाद में जनपथ पर साभार लगाया, उसका जवाब चंचल जी ने अपने ब्‍लॉग पर दिया है। बलराज मधोक, जेपी और आडवाणी जैसे कई प्रसंगों का जि़क्र कर के चंचल जी ने अतीत में संघ के सेक्‍टेरियन रवैये की पोल खोल दी है। राकेश सिन्‍हा से प्रतिसंवाद की शैली में लिखा गया चंचल जी का लेख नीचे जस का तस हम दिए दे रहे हैं- मॉडरेटर

चंचल जी
ओम जी ने क्या कहा, मंगलेश डबराल से कहां चूक हुई, 'आवाजाही' में कौन किस से टकराया हमें नहीं मालूम. फेसबुक पर प्रो. राकेश सिन्हा का लंबा आलेख पढ़ा. प्रो. सिन्हा ने 'संघ' के बारे में, उसके बचाव में और साम्यवादियों की हरकतों पर खुली टिप्पणी की है.

मैं व्यक्तिगत रूप से ओम थानवी और मंगलेश डबराल को जानता हूं. और जब 'जानने' की बात करता हूं तो उसका मतलब महज मेल मिलाप से नहीं होता, ज़हनी तौर पर वे कहां हैं इससे हम वाकिफ हैं. प्रो.साहिब, आपकी भाषा में कहें तो ये लोग 'कुजात' हैं. इनके पास न तो कोई संगठित गिरोह है न ही उसकी उकसाऊ तमीज़. इंसान के हक और हुकूक की बात करने वाले ये लोग अपने तर्क पर खड़े हैं, ये लोग पुरुषार्थवादी हैं, अनुदानभोगी नहीं. सिन्हा साहिब ये बातें आपको अजीब लगेंगी लेकिन इनका खुलना भी ज़रूरी है. आप कहते हैं कि डबराल को आपने बुलाया. जनाब इसका मतलब साफ़ है कि कुछ सोच कर ही आपने बुलाया होगा, कल को यह कहने के लिए कि देखिये हम 'अछूत' नहीं हैं, हमारी पांत में डबराल साहिब भी बैठ चुके हैं. (यह बात इसलिए कह रहा हूं कि आपने अपने आलेख में कई जगह कई बार उन नामों का जि़क्र किया है जिन्होंने गाहे बगाहे आपको अपने बगल में चलने की अनुमति दे दी. उदाहरण के लिए आपने जेपी का जिक्र किया).

बहरहाल, सिन्हा साहिब! आप साम्यवादियों को जब 'गरिया' रहे थे मैं बड़े गौर से उस हिस्से को निहार रहा था जिसे आप छुपा रहे थे. आपने साम्यवादियों को जो कुछ भी सुनाया वो सब आप पर भी तो लागू होते हैं. आप अतीत की चर्चा कर रहे थे- किस तरह से एक साम्यवादी ने डांगे साहब को जन्मदिन पर बधाई दी और उसे पार्टी से निकाल दिया गया. संघ ने क्या किया है? आपको तो याद होगा जनसंघ आज भी ज़िंदा है और उसके अध्यक्ष बलराज मधोक को आज तक तन्हाई मिली है कि उसने भी यही गलती की थी. अडवानी और जसवंत सिंह के साथ क्या हुआ था? महज़ इतना ही न कि उन्होंने जिन्ना को सेकुलर कह दिया? आपका आरोप सही है सिन्हा साहिब कि साम्यवादियों की नीति और नियति जनतंत्र और बोलने की आजादी की कटती नहीं है. लेकिन संघ भी तो उसी तानाशाही का हामी है, रास्ते भले ही अलग हों. आप अपने को 'विश्व' कहते हैं, वे अपने को 'अंतरराष्‍ट्रीय' कहते हैं. उनके हर फैसले 'अगल' 'बगल' से होते हैं, आपके 'पीछे से'. भारत की आजादी देश के लिए ही नहीं दुनिया के लिए बड़ी घटना थी, आप दोनों पैदा हो चुके थे, जवान हो चुके थे. आप दोनों ने बराबर का पाप किया है- आजादी की लड़ाई के विरोध में खड़े होकर अंग्रेजों का साथ देना, फिर भारत के बंटवारे का समर्थन करना किसी से छुपा नहीं है.

सिन्हा साहिब आप तो पढ़ने में अव्‍वल रहे हैं. आपने संघ को पढ़ने पर ही ज्यादा जोर दिया है. आपने समाजवादियों और नेहरू के रिश्ते पर गलत तर्क पेश कर दिया. आप जहां बैठे हैं 'तीनमूर्ति' में, वहां दस्तावेज है. एक बार पलट कर देख लीजिए- डॉ. लोहिया और जेपी के बीच मत भेद है, मन भेद नहीं है और मत भेद का कारण केरल में बनी पहली समाजवादी सरकार है. थानू पिल्लई की सरकार ने मजदूरों पर गोलीबारी की थी तो डॉ. लोहिया ने सरकार से इस्तीफा मांग लिया था. त में आपने जेपी आंदोलन की चर्चा की. उस आंदोलन में भाग लेना आपकी मजबूरी थी, मन नहीं था. जन दबाव में आपने जेपी के कंधे का सहारा लिया. आपको याद है यहां आपने एक बार फिर साम्यवादियों की तरह तानाशाही (आपातकाल) का समर्थन किया- बीस नहीं चौबीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन कर के.

सिन्हा साहिब! आपको शुक्रिया कहता हूं, आपके ही बहाने कम से कम संघ खुले मंच पर तो आया. एक बात भूल रहा था- नाथूराम के सवाल पर आपने चालाकी से अपने आपको बचाया और एक 'महिला' ने आपको गले से लगा लिया... इसका दूसरा रुख भी है. संघ ने कभी नाथूराम की इस कायरतापूर्ण हरकत की खुले शब्दों में निंदा भी की है...?

सिन्हा साहिब, हम आप से कहीं मिले हैं...    नमस्कार.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के छात्र संघ अध्‍यक्ष रह चुके हैं। जीवन के छह दशक में टाइम्‍स ऑफ इंडिया, एनएसडी, रेलवे मंत्रालय, विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और संगठनों का पड़ाव इन्‍होंने तय किया है) 



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5/29/2012

अब ज़रा संघ के आइने में देखिए वामपंथी संकीर्णता का अक्‍स!

(पिछले डेढ़ महीने से आवाजाही पर जो बहस चल रही थी, उसमें वाम दायरे के बाहर से पहला संगठित और सक्रिय हस्‍तक्षेप आया है। मंगलेश डबराल जिस संस्‍थान के मंच पर बोलने गए थे, उस इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के निदेशक और हेडगेवार के जीवनीकार प्रो. राकेश सिन्‍हा ने बड़े सिलसिलेवार ढंग से अपने ब्‍लॉग और फेसबुक पर एक आलेख प्रकाशित किया है। जनपथ पर वहां से साभार लेकर चिपकाया जा रहा है। यह लेख बहुत महत्‍वपूर्ण है और निश्चित तौर पर एक गंभीर बहस की मांग करता है। कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के भीतर आवाजाही से संबंधित जिन ऐतिहासिक संदर्भों को प्रो. राकेश सिन्‍हा ने उठाया है, वे बेहद मौजूं हैं। अब तक जितने भी आलेख विभिन्‍न वेब पत्रिकाओं और जनसत्‍ता में छपे हैं, उनमें कहीं भी इस विषय को उसकी ऐतिहासिकता में नहीं देखा गया, न ही किसी ने ऐसी कोशिश की। पूरी बहस को व्‍यक्तिगत बना कर हिसाब चुकता करने की जो कोशिशें जनसत्‍ता में हुई हैं, यह आलेख उसी प्रक्रिया की परिणति है। आप लाख गाली देते रहें संघ को, लेकिन वामपंथी संकीर्णता के बारे में इतने सघन विश्‍लेषण और विवेकपूर्ण आलोचना की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। एक मायने में यह आलेख हिंदी जगत के निंदा प्रेमी वामपंथियों को आईना दिखा रहा है। क्‍या किसी के पास प्रो. सिन्‍हा की चिंताओं-आलोचनाओं का जवाब है? राकेश सिन्‍हा की आरंभिक टिप्‍पणी के साथ पूरा लेख अविकल नीचे हम दे रहे हैं- मॉडरेटर)



प्रो. राकेश सिन्‍हा
(जनसत्‍ता ने अपने चार रविवारीय अंकों में वैचारिक एवं बौद्धिक संवाद पर बहस चलाई. कई न्यूनताओं के बावजूद यह एक सराहनीय एवं अभिनंदनीय सम्पादकीय प्रयोजन है. इसने संवाद के प्रति सदिच्छा एवं काल्पनिक एवं कालवाह्य प्रवृत्तियों को सार्वजनिक बहस में लाने का काम किया है. बहस का कारण मंगलेश डबराल का भारत नीति प्रतिष्ठान में आना निमित्त मात्र है. बहस थानवी जी के हस्तक्षेप आलेख "आवाजाही के हक़ में' (जनसत्ता, 29 अप्रैल) से शुरू हुई लेकिन तीन वेब पत्रिकाओं (मोहल्ला, जनपथ और जानकीपुल) और फेसबुक पर इस पर इस लेख के छपने के दो हफ्ते पहले से चर्चा हो रही थी जिससे मेरे जैसे अनेक लोग अनजान थे. थानवी जी ने वेब दुनिया की बहस को व्यर्थ नहीं जाने दिया और उसकी पृष्ठभूमि में हस्तक्षेप किया. इसी प्रसंग में उठे सवालों पर मैं अपनी बात रख रहा हूं)


बात भारत नीति प्रतिष्ठान की एक गोष्ठी (14 अप्रैल) से शुरू होती है. कवि-पत्रकार मंगलेश डबराल इसकी अध्यक्षता करने आये थे. उनकी स्वीकृति में कहीं भी अगर-मगर नहीं था. गोष्ठी का विषय "समांतर सिनेमा का सामाजिक प्रभाव" था. सुश्री पूजा खिल्लन ने अपना परचा पढ़ा. डबराल जी ने अपना विषय बखूबी रखा और जाते-जाते उन्होंने प्रतिष्ठान एवं 'द पब्लिक एजेंडा' (जिसके वे संपादक हैं) के बीच बौद्धिक सम्बन्ध का प्रस्ताव देते गए. लगभग तीन घंटे वे प्रतिष्ठान में रहे और इस दौरान वे इसके कार्यों को समझाने बूझने का प्रयास करते रहे. जब उन्होंने प्रतिष्ठान में अपनी उपस्थिति को 'चूक' (देखें जनसत्‍ता 'वह एक चूक थी', 13 मई 2012) बताया तो मैं अचम्भित रह गया. मुझको अचरज इस बात का नहीं हुआ कि वे भी अपराध बोध का शिकार हो गए बल्कि यह जानकर हुआ कि वामपंथ से जुडी बौद्धिक धारा अभी भी साठ व सत्तर के दशक में ही ठहरी हुई है. इस ठहराव को दूर करने के सभी प्रयासों पर रेड ब्रिगेड का हल्ला बोल शुरू हो जाता है)



1969 की एक घटना इस सम्बन्ध में अत्यंत ही प्रासंगिक है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े नेता एसएस मिराजकर ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमेन एसएस डांगे को उनके सत्तरवें जन्मदिन पर शुभकमाना सन्देश भेजा जिसमें उन्हें 'क्रांतिकारी योगदान' के लिए दीर्घायु होने की कामना की. बस, वामपंथी राजनीति में तलवारबाजी शुरू हो गयी. पार्टी ने मिराजकर को इस सामाजिक शिष्टाचार के लिए 'कारण बताओ नोटिस' भेज दिया. मिराजकर ने जो जवाब दिया वह डबरालजी के स्पष्टीकरण से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। मिराजकर ने  लिखा, "मैंने इस पर गंभीरता से सोचा और अब भी नहीं समझ पाया कि मुझे क्या स्पष्‍टीकरण देना चाहिए. बात यह है कि मैंने शुभकामना सन्देश बिना ज्यादा सोचे जल्दीबाजी में भेज दिया. मुझे  सन्देश को लिखते समय अधिक सावधान रहना चाहिए था. निस्‍संदेह मैंने जरूरत से ज्यादा अपना कदम आगे बढ़ा दिया.  मैं पार्टी से अनुरोध करता हूं कि इस राजनीतिक चूक के लिए जो भी उचित हो वह कार्रवाई करे". पार्टी के महासचिव पी सुंदरय्या आगबबूला हो गए और उन्होंने कुछ इस अंदाज़ में उन्हें पुनः पत्र भेजा, "आपकी सफाई आपकी चूक से ज्यादा खतरनाक है. आपने राजनीतिक चूक बताकर विषय की गंभीरता को समझने का प्रयास नहीं किया है". एक साल बाद उन्हें पार्टी से रास्ता दिखा दिया गया. तब और अब में दुनिया में अनेक बदलाव आये हैं.  बंद दिमाग और बंद समाज नापसंद किया जा रहा है. तब स्टालिन और ट्रोट्स्की के संघर्ष को वामपंथ आइना मानता था. क्या वही स्थिति भारत के वामपंथ की आज भी है?



मै हाल में प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता भोगेन्द्र झा का तीनमूर्ति पुस्तकालय में 'ओरल हिस्ट्री'  के अंतर्गत लिए गए साक्षात्कार को पढ़ रहा था. उसमें झा ने उस वातावरण का जीवंत चित्रण एक प्रसंग सुनाकर किया है. उन्होंने पार्टी में स्टालिन के एक निर्णय (तेहरान से लाल सेना हटाने) का विरोध किया। तब नेतृत्व ने उनसे कहा- "क्या बोल रहे हो? कम्युनिस्ट पार्टी या स्टालिन के द्वारा गलती?"  झा ने प्रतिप्रश्न किया कि "क्या यह संभव नहीं कि स्टालिन भी गलती कर सकता है?" इस पर नेतृत्व ने जो जवाब दिया वह अत्यंत मजेदार है: "क्या यह संभव नहीं है कि तुम लडके नहीं लड़की हो?"



साठ व सत्तर के दशक की वैचारिक कट्टरता एवं संकीर्णता तीन बातों के द्वारा बौद्धिकता को नियंत्रित करने का काम करती रही: वैचारिक प्रेरणा जो साहित्यकारों और समाजशास्त्रियों को वैचारिक तरीके से बौद्धिक कार्य करने के लिए उद्वेलित करती रही. यह कुछ हद तक संकीर्णता से मुक्त थी. अन्य दो बातें 'दबाव' 'डर'  था जो वैचारिक एवं स्वतंत्रता का आत्मसमर्पण करने के लिए बाध्य करते रहे। आज प्रेरणा लुप्त हो गई और डर एवं दबाव का प्रयोग हो रहा है. साहित्य क़ी व्यापक आधारभूमि कोई विचारधारा तो हो सकती है परन्तु उसे लक्ष्मण रेखा और मिराजकर फेनोमिना के तहत मापना उसकी स्वायत्तता और उद्भव को रोकने जैसा होगा. यही कारण है कि 'प्रगतिशील' लेखक संघ पार्टी लेखक संघ में तब्दील होकर रह गया है. 'रेड ब्रिगेड' स्वतंत्रता, वैयक्तिकता और सामाजिकता सबको बांधकर रखना चाहता है. यही कारण है कि चंचल चौहान स्वयं प्रगतिशील लेखक संघ की विरासत और आज की स्थिति के बीच की खाई को महसूस कर सकते हैं. थानवी जी के लेख में उन्हें जिस अन्तरराष्ट्रीय पूंजी का लेखक संघ को बदनाम करने का षडयंत्र नजर आया, वह सत्तर के दशक की मानसिकता का द्योतक  है. यदि हम इस अन्तरराष्ट्रीय पूंजी के खतरों और बाजारवादी ताकतों के षडयंत्र को समझ जायें तो हमें संवाद करी आवश्यकता महसूस होगी. परम्परागत शत्रुता अब लेखागार का विषय बन गई है. असली खतरा तो उसी बाजार की ताकतों से है, लेकिन वामपंथ को तो आरएसएस से लड़ना है। यदि कल संघ मार्क्स को पढने लगे तो ये मार्क्स को भी प्रतिक्रियावादी घोषित कर देंगे.



आप जान लीजिये जब समाजशात्री और लेखकों का संघ पार्टी के पूर्णकालिकों के हाथों में चला जाता है तब उसमें नारेबाजों का ही महत्व बढ़ता है. फिर निराला, निर्मल, नामवर घर के भीतर के शत्रु समझ लिए जाते हैं. देखिये, हाल में नामवर सिंह के प्रति किस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया है! रामविलास शर्मा को अंत में 'संघी' घोषित कर दिया गया. पूछिए इन नारेबाजों से वामपंथ को उन्होंने किस अंतरराष्ट्रीय ताकत से मिलकर क्षति पहुंचाने का काम किया था?



मुझे आश्चर्य डबरालजी के माफीनामे से इसीलिए हुआ कि वे मिराजकर की तरह पार्टी कार्यकर्ता नहीं हैं. मैंने उन्हें बुलाया था. वे स्वयं नहीं आये थे. उन्होंने बेहिचक अपनी बात रखी थी. मैं वामपंथ के बीच के झगड़े में पड़ना मुनासिब नहीं समझता हूं, पर बौद्धिक जगत से जुड़ा विषय है अतः इसे नकारा भी नहीं जा सकता है. वास्तव में उदय प्रकाशजी के साथ जो हुआ वह वैचारिक अनैतिकता की मिसाल है. वे अपने भाई की मृत्यु के बाद उनके लिए आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गए थे और वहां योगी आदित्यनाथ के साथ मंच साझा करने के कारण वे 'काफ़िर' घोषित कर दिए गए! इसमें डबरालजी भी शामिल थे। यही असली चूक थी जिसे सही साबित करने के लिए उन्होंने प्रतिष्ठान में अपनी सहर्ष व सहज उपस्थिति को चूक बता दिया.



जनसत्ता के विमर्श में जिस प्रकार से व्‍यक्तिगत तौर पर भाषा एवं भावनाओ का प्रयोग किया गया उसने विमर्श के वास्तविक लक्ष्य को पीछे छोड़ देने का काम किया है. एक दूसरे के विचारो को समझने या आदान-प्रदान करने  की जगह कीचड़ उछालने और दृष्टिकोणों में बहस खो गई. यह वामपंथ जगत में व्याप्त परस्पर अविश्वास, असहिष्णुता के साथ घोर व्यक्तिवाद का प्रमाण है. संघ विरोध के नाम पर कब तक छद्म एकता का प्रदर्शन होता रहेगा? आरएसएस के नाम पर वैचारिक बहस को कितने दिनों तक आप रोक सकते हैं? संघ एक ठोस वैचारिक आधार पर खड़ा है. देश में तमाम जनतांत्रिक परिवर्तनों का सारथी रहा है. सामाजिक-आर्थिक विषयो पर इसका progressive unfoldment जिन्हें नजर नहीं आता है उन पर सिर्फ हैरानी ही व्यक्त की जा सकती है. अंतरराष्‍ट्रीय पूंजी को यदि किसी ताकत से आशंका और भय दोनों है तो वह आरएसएस ही है. इसलिए अमेरिका के निशाने पर वामपंथ से कहीं अधिक संघ है.



मैं दिसम्बर में कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर गया और एक वरिष्ठ नेता से खुलकर इस प्रश्न पर बातचीत की. उनसे मैंने एक सवाल किया: 'भाजपा में मुस्लिम इक्‍का-दुक्‍का हैं यह बात तो समझ में आती है पर कम्युनिस्ट पार्टियां  जिनका इतिहास मुस्लिम लीग के साथ आजादी के पहले सहयोग का रहा है और जो आजादी के बाद उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों की बात सबसे ज्यादा करती आई हैं, क्यों नहीं वे 1-2 फीसदी भी मुसलमानों को आकर्षित कर पाने में सक्षम हो पाई हैं?' मुसलमान उनसे क्यों नहीं जुड़ते हैं? अतः वास्तविक प्रश्न उनके बीच सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण को समझने और समझाने का है जो वर्तमान सामाजिक दर्शन के होते संभव नहीं लगता है। इसी दर्शन ने न सिर्फ तजमुल हुसैन, एमएच बेग, एएए फैजी एवं आरिफ मोहम्मद खान  जैसे प्रगतिशील चिंतकों को हाशिये पर रखा है.



विचारधाराओं के बीच विरोध होना स्वाभाविक है पर परंतु उनके बीच परस्पर सहयोग और संवाद को रोकना  बौद्धिक कायरता और मानसिक विकलांगता मानी जाएगी. जेपी ने इसे अच्छी तरह समझा था, इसीलिये वे संवाद के जीवंत प्रतीक माने गये हैं. तीस के दशक में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के भीतर कम्युनिस्टों से मेलजोल करती रही और अति होने के बाद उनसे उसने नाता तोडा था. वे हर तरफ से गाली सुनते रहे पर संवाद की परंपरा को जारी रखा. 1953 की एक घटना है. नेहरू के आग्रह और आमंत्रण पर वे उनसे मिलने गए। फिर तो तूफान खड़ा हो गया. लोहिया जी और उनके शिष्य मधु लिमये ने सार्वजनिक रूप से उनकी कटु आलोचना की. जेपी ने 9 मार्च 1953 को जारी बयान में कहा कि यह दुखद साबित हुआ, तो नेहरू ने 18 मार्च 1953 को बयान जारी कर जेपी के बारे में फैलाई जा रही गलतफहमियों पर टिप्‍पणी की, "किसी पर दोषारोपण की मैं कड़ी निंदा करता हूं." जेपी ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बैतूल अधिवेशन में कहा कि "अगर पार्टी का मैं सदस्य नहीं तो पूरे देश भर घूमता, कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों के नेताओ से मिलता, उन्हें अपने विचार का बनाने की कोशिश करता." 1973 से 1978 तक वे संघ के करीब बने रहे. यह उनका अवसरवाद था या लोकतंत्र और परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक? वे मधु लिमये की तरह नारेबाज नहीं थे, अतः वैचारिक और राजनीतिक क्षेत्रों में आजीवन योगदान करते रहे.



संवाद उद्देश्यपूर्ण होता है. पहल करने वालों को अवश्य आलोचना का शिकार होना पड़ता है। थानवी जी ने मेरे सम्बन्ध में ब्लॉग से अनेक टिप्पणियां उद्धृत कीं जिसमें से एक में मुझे 'विषैला विचारक' कहा गया. मैं विचलित नहीं हुआ. ऐसे तो मैं अपने पिताजी जो वामपंथी रहे और कामरेड इन्द्रदीप सिन्हा और योगेन्द्र शर्मा के साथी थे- उनसे भी लगातार वैचारिक बहस करता रहता था. इसे ही वैचारिक लोकतंत्र कहते हैं. मैंने कभी नहीं सोचा था कि वैचारिक कट्टरता विश्वविद्यालयों में इतनी अधिक है कि लोग एक दूसरे को शत्रु भाव से देखते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एमए की परीक्षा में मैं प्रथम  आया. मेरे शैक्षणिक जीवन में तीसरी बार मुझे स्‍वर्ण पदक मिला. मैंने एमए में "पॉलिटिकल आइडियाज़ ऑफ डॉ. केबी हेडगेवार'' पर डिसर्टेशन लिखा था. तब कुछ फैकल्‍टी सदस्‍यों ने मुझे चेताया था कि यह मेरे कैरियर के लिए अच्छा नहीं होगा. पर सब कुछ लाभ-हानि  और मान-सम्मान को सामने रखकर ही नहीं किया जाता है. मैं अपनी राह पर चला. एमफिल के साक्षात्कार में एक  मार्क्सवादी प्रोफेसर ने मुझसे पूछा कि "What is difference between you and Nathuram Godse?" मैंने बड़े अस्वाभाविक तरीके से अपनी उत्तेजना को रोककर अकादमिक मर्यादा को बनाए रखा. पता नहीं मेरा जवाब  कितना सटीक था, "Every supporter of Anandpur Sahib Resolution is not Beant Singh & Satwant Singh , so every adherent of Hindu Rashtra is not Nathuram Godse." एक वरिष्ठ (महिला) प्राध्यापक ने उठकर मुझे गले लगा लिया। विज्ञान भवन में जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने मेरी डॉ. हेडगेवार की जीवनी का विमोचन किया था, तब अपने संक्षिप्त लेखकीय उद्बोधन में मैंने इस प्रसंग को सुनाया था. लेकिन इन चीजो ने मुझे काम से कम  sectarian नहीं बनने दिया. इसीलिए समाजवादी एवं मार्क्सवादियों से मैं सतत विमर्श करता रहता हूं. बौद्धिक एवं व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी, प्रतिबद्धता और मूल्यों के प्रति निष्ठा यदि नहीं है तो चाहे आप जिस भी विचारधारा के हों और जिस भी अख़बार में स्तंभकार हों या पुस्तकों को छापने का कारखाना चलाते हों या जितने भी मंचों पर मुख्य अतिथि बनते हों, आप इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाएंगे. सच्चरित्रता और जन प्रतिबद्धता बौद्धिकता को स्थायी  भाव  प्रदान करते हैं. वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, दोनों को इस आइने में अपनी-अपनी स्थिति का मूल्यांकन करना चाहिए.



भारत नीति प्रतिष्ठान आरम्भ से (सितम्बर 2008) ही स्वतंत्र विमर्श को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहा है. सभी प्रकार के विचारकों को आमंत्रित किया जाता रहा है. इनमें वामपंथ से जुड़े लोग भी हैं. आना या नहीं आना उनके हाथ में है. छल या झूठ का सहारा नहीं लिया गया. सत्य बताकर उन्हें बुलाया गया. छल और छद्म  से बौद्धिक लड़ाई थोड़े दिनों तक लड़ी जा सकती है परंतु उसकी आयु सीमित होती है. प्रो. अमिताव कूंडू जेएनयू के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं, जब उन्हें मैंने प्रतिष्ठान के हस्तक्षेप पत्र में लिखने और श्री जगमोहन जी के साथ उसे IIC में लोकार्पण के लिए आमंत्रित किया तो मुझे आशंका थी कि उन्हें संघ के नाम पर रोकने का प्रयास होगा. इसलिए मैंने उनके चैम्बर में जाकर बता दिया कि मैं डॉ. हेडगेवार का जीवनी  लेखक हूं तथा सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पर मैंने अपने मोनोग्राफ "रोटी, रोजगार और राज्य का साम्प्रदायीकरण" में उसकी वैधानिकता और निष्कर्षों पर सवाल खड़ा किया है. हमारे बीच परस्पर विश्‍वास स्थापित हुआ. वे लोकार्पण करने आये और एक परचा भी लिखा. मेरा अनुमान ठीक निकला, नारेबाजों ने उन्हें रोकने की खूब परंतु असफल कोशिश की थी. रामशरण जोशी हों या कमर आगा या अभय कुमार दुबे या डॉ. रामजी सिंह, सब समझ बूझ कर आरंभिक भड़काऊ प्रतिरोधों के बावजूद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहे. आशुतोष (आईबीएन 7) जब हाल में आये तो उन्होंने एक ट्वीट किया क़ि "मेरा होसबोलेजी (संघ के सहसरकार्यवाह) के साथ मंच साझा करना अनेक मित्रों को अच्छा नहीं लगा होगा." मुझे लगता है कि सभी प्रतिरोधों और विपरीत वातावरण के बावजूद संवाद की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. अभी और भी पत्थर फेंके जाएंगे पर प्रक्रिया रूकने वाली नहीं है. उन लोगों को अपनी गलतफहमियां दूर कर लेनी चाहिए कि वामपंथ के लोगों के आने से प्रतिष्ठान या संघ को वैधानिकता मिलती है. हेडगेवार-गोलवलकर अधिष्ठान मजबूत धरातल पर है और वैधानिकता का मुहताज नहीं है. यह संवाद तो नए संदर्भों क़ी आवश्यकता है और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि परंपरागत खांचों में बंद होकर हम नव-साम्राज्यवादियों एवं विदेशी एवं देशी पूंजी की साठगांठ का मुकाबला नहीं कर पाएंगे. वे हमारी नादानी पर शायद मुस्कुरा रहे होंगे.



बौद्धिक जगत में तीन बातें होती हैं- perception, interpretation और facts.   प्रायः धारणा  को जो लोग प्रथम स्थान देकर विमर्श करते हैं वे असफल होते हैं. प्रतिष्ठान तथ्य को प्राथमिकता देता है, फिर व्याख्या का और धारणा का नंबर अंत में आता है. विमर्श में जीत-हार किसी विचारधारा की नहीं होती है, सिर्फ समाजोपरक विचार  आगे बढ़ता है. स्वामी दयानंद सरस्वती ने कसाही के तीन सौ मूर्ति पूजक ब्राह्मणों के साथ अकेले संवाद किया था. इसने समाज की चेतना को मजबूत बनाने का काम किया था.



इसलिए वैचारिक धरातल पर आवाजाही आज और भी जरूरी है। वैचारिक बहुलता (ideological pluralism)  और एक दूसरे के प्रति सदिच्‍छा में आस्था होना इसके लिए आवश्यक है। वामपंथ में स्टालिनवाद को आदर्श मानने वाले स्वतंत्र और सदिच्‍छायुक्त विमर्श को वामपंथ की पराजय मानते हैं। इसी विडंबना ने डबराल विवाद को जन्म दिया. संवाद का पहला चरण इसी चक्रव्यूह को तोडना था।

(साभार: इंडियन फोर्थ एस्‍टेट)


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