5/07/2012

ये डरे हुए लोग हैं, अंत तक कहेंगे आप नकली हैं: रंजीत वर्मा

(प्रियदर्शन जी के जवाब पर रंजीत वर्मा ने टिप्‍पणी भेजी है और मेरे द्वारा उठाए गए क्रोनी जर्नलिज्‍म के सवाल को इस बहस से हटाने की बात कही है। बहस मूल विषय यानी कविता की राजनीति और राजनीतिक कविता पर रहे, इसमें मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है। मैं भी यही चाहता हूं, लेकिन 'क्रोनी जर्नलिज्‍म' के प्रयोग के बाद एक अजीब सा विरोधाभास उभर कर सामने आया है जिसे रखना यहां ज़रूरी है। जिस लेखक के विचार को संपादित किया गया (रंजीत वर्मा) उसने तो अपनी विनम्र उदारता में या कहें विषय पर बने रहने के आग्रह के चलते भास्‍कर के संपादक को बरी कर दिया, लेकिन दिलचस्‍प ये है कि जिससे जुड़ा प्रसंग हटाया गया है (प्रियदर्शन) उसने मुझे भेजे एक निजी मेल में खुद संपादक को जि़म्‍मेदार ठहरा दिया है और अपने जवाब में स्‍वीकार किया है कि यह उनके साथ अन्‍याय है। पाठक खुद तय करेंगे कि 'क्रोनी' संपादन का पलड़ा कैसे ऊपर-नीचे हो रहा है और संपादन के भुक्‍तभोगी द्वारा संपादक को बरी किए जाने व इसका लाभ पाए लेखक द्वारा संपादक को जि़म्‍मेदार ठहराए जाने के पीछे आखिर कौन सी मंशा काम कर रही है।)

रंजीत वर्मा
मेरे आलेख का जवाब देने में प्रियदर्शन जी ने जो मेहनत की है उसका सम्मान करते हुए मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उसका नोटिस लूं और एक मुकम्मल सा जवाब दूं। बात मुद्दे पर हो यानी कि राजनीतिक कविता पर ही हो, इसलिए जरूरी है कि 'क्रोनी जर्नलिज्म' के सवाल को इस बहस से हटा दिया जाए क्योंकि लेख को लेकर भास्कर में जो भी काट-छांट किये गए, मेरा ऐसा मानना है कि वह अखबार की नीति के तहत किये गए होंगे न कि किसी से मित्रता निभाने की वजह से। अगर मित्रता वाली ही बात होती तो विमल झा, प्रियदर्शन के ही नहीं मेरे भी मित्र हैं। किसी भी अखबार का दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है और उसे राजनीतिक पार्टी का मुखपत्र समझना भूल है। इसके बावजूद इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तमाम काट-छांट के बावजूद लेख का जो मूल स्वर था उसे उसकी पूरी मौलिकता के साथ बचाये रखा गया है। इसलिए अखबार के संपादक से मेरी कोई शिकायत भी नहीं है। इस संदर्भ में अभिषेक श्रीवास्तव ने जो भी टिप्पणी अपनी ओर से की है मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखता और न ही लेख पर लगाये गए उनके शीर्षक से मैं सहमत हूं क्योंकि वे मुद्दे से भटकाते हैं। उदाहरण के तौर पर प्रियदर्शन के जवाब को ही आप देख सकते हैं। शीर्षक में ही उलझ कर रह गए वे। उन्हें लगा कि मेरा पूरा लेख उन पर केंद्रित है जबकि मैंने भास्कर में छपे उनके लेख से सिर्फ एक उद्धरण भर लेकर यह बताने की कोशिश की थी कि कितने स्तर पर यह विरोध चल रहा है। मेरे लेख के केंद्र में वह प्रवृत्ति है जो हमेशा जनवादी और प्रगतिशील साहित्य के खिलाफ सर उठाती दिखती है। अशोक वाजपेयी को मैं इस प्रवृत्ति के अगुवा के रूप में देखता हूं। प्रियदर्शन को मैं एक छोटे से मोहरे के तौर पर देखता हूं।



मैंने अपने लेख में यह कहीं नहीं लिखा है कि अशोक वाजपेयी और प्रियदर्शन मिलकर कोई साजिश कर रहे हैं। प्रियदर्शन के साथ मिल कर अशोक वाजपेयी आखिर कौन सी साजिश रच लेंगे। उनके पास एक से एक महारथी हैं, उन्हें भला प्रियदर्शन से क्या काम जो साहित्य की दुनिया में कब आते हैं और कब चले जाते हैं किसी को पता भी नहीं चलता। अपने लेख में साजिश वाली बात जो मैंने लिखी है वह यों है- 'यह कह कर कि जो क्लास मुक्तिबोध में है वही अज्ञेय में भी है इसलिए दोनों एक तरह के राजनीतिक कवि हैं एक साजिशपूर्ण अवधारणा है।' यह विचार अकेले अशोक वाजपेयी के लिए मैंने व्‍यक्‍त किए हैं। प्रियदर्शन यहां कहीं से नहीं आते हैं।   



जहां तक मैं समझता हूं मैंने अपने लेख में प्रियदर्शन पर कोई भी व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की है लेकिन उन्होंने शुरूआत ही व्यक्तिगत टिप्पणी से की है और आगे भी कई जगहों पर इसी तरह से टिप्पणी करते चले गए हैं। ऐसा उन्होंने किसी क्षुद्रतावश किया होगा मैं नहीं मानता बल्कि मुझे तो लगता है कि यह सब अनजाने में होता चला गया। नहीं तो भला सोचिये कि जिस आदमी से संक्षिप्त परिचय हो या यों कहिये कि परिचय न के बराबर हो, उस पर भला प्रियदर्शन कैसे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी कर सकते हैं क्योंकि वे खुद इस बात को मानते हैं कि बिना परिचय के किसी को कलावादी भी नहीं कहा जा सकता। यानी कि जो बात लेखन देख कर या विचार जान कर कही जाती है उसके लिए भी वे मानते हैं कि व्यक्तिगत परिचय का होना बहुत जरूरी है। जब स्थिति यह है तो भला क्या इस पर यकीन किया जा सकता है कि मेरे जैसे अपरिचित आदमी पर वे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी करेंगे, कभी नहीं। दरअसल देखा जाये तो यह सब अनजाने में उनसे हो गया है। अब वे भी क्या करें जब जीवन को सुखमय बनाने के लिए किसी को रात दिन हजार बार अपने पैंतरे और रास्ते बदलने पड़ते हों तो वैसे लोग इस तरह की समस्याओं से घिर ही जाते हैं। तभी तो आप देखेंगे कि ऐसा सिर्फ व्यक्तिगत छींटाकशी करने के मामले में ही नहीं हुआ है बल्कि उनके पूरे लेख में इस समस्या के चिह्न सर्वत्र देखने को मिलते हैं- वहां पर भी जहां वे अपनी स्थापनाएं रख रहे होते हैं और वहां पर भी जहां वे अपनी सफाई रख रहे होते हैं। सोच समझ कर लिखी गयी पंक्ति और अनजाने में लेख में आ गयी पंक्ति एक दूसरे का पीछा करती आती रहती हैं। पहले वे काफी सोच समझ कर एक पंक्ति लिखते हैं कि तभी दूसरी पंक्ति अनजाने में चली आती है और वह पहले की पंक्ति को काटती निकल जाती है। यह पहली पंक्ति उनकी सोच समझ कर ओढ़ी हुई पंक्ति होती है जिसके बारे में वे मुतमईन होते हैं कि इसे सब पसंद करेंगे, क्योंकि वह हर तरह से आजमायी हुई पंक्ति होती है जबकि दूसरी पंक्ति उनके व्यक्तित्व के गोपनीय अंधेरे से निकल कर आती है जिसे वे मुस्कुराते चेहरे, शालीन व्यवहार और फकीराना अंदाज के पीछे यत्नपूर्वक दफ्न किये होते हैं। यही उनका असली चेहरा है जो उनकी बौद्धिकता के नकाब को फाड़कर निकल आता है। लेख में जो शब्द दर शब्द असली नकली का छाया युद्ध देखने को मिलता है और फिर इस सबसे जो अंतरविरोध पैदा होता है वह बहुत दयनीय है। भला इस तरह के अंतरविरोध से ग्रस्त आदमी कैसे किसी कवि के अंतरद्वंद्व को समझ सकता है जो गुंटर ग्रास की कविता की पहली ही पंक्ति में देखने को मिलता है- 'मैं क्यों खामोश रहा/ क्यों लंबे समय से छिपाता रहा/ उसे जो प्रत्यक्ष है और युद्धों की कवायदों में आजमाया जाता रहा है...' (मंगलेश डबराल का अनुवाद)। यह सिर्फ सवाल नहीं है खुद से बल्कि पश्‍चात्‍ताप भी है यहां और सारे राज एक-एक कर बोल देने की तैयारी भी- 'वह कहा ही जाना चाहिये/ जिसे कल कहने पर मुमकिन है बहुत देर हो जाये।'



गुंटर ग्रास की कविता क्या वो तो मेरा लेख भी नहीं समझ पाये। मैंने उनसे कहीं नहीं पूछा है कि वे क्यों लिखते हैं। अपने लेख में जब मैं यह सवाल कर रहा होता हूं तो यह सवाल हिंदी के तमाम कवियों से होता है, खुद से भी न कि किसी एक से। और किसी एक से पूछूंगा भी तो प्रियदर्शन से क्यों जिनके बारे मैं जानता भी नहीं कि वे कविता भी लिखते हैं। लेकिन वे इस सवाल को अपने पर लेते हुए जवाब देने बैठ गए और पूरे दो पैराग्राफ लिखा। और लिखा क्या जरा इसकी भी बानगी देख लीजिए। वे कहते हैं कि वे इसलिए लिखते हैं ताकि उन्हें पैसे और प्रसिद्धि मिले, हालांकि फिर जैसी कि उनकी नियति है वे विरोधाभास में जाते हुए रो पड़ते हैं कि हिंदी लेखन में आखिर प्रसिद्धि ही कितनी है। यहां पैसे की बात वो अनजाने भी सामने नहीं आने देते, लेकिन 'प्रसिद्धि की कामना का दबाव' के पीछे पैसे की छाया कोई भी चाहे तो देख सकता है। फिर उन्हें अचानक लगता है कि जवाब बहुत व्यावसायिक किस्म का या यों कहिये कि स्वार्थी किस्म का हो गया, तो वे तुरत आगे जोड़ते हैं कि जीवन को तह दर तह समझने के लिए लिखते हैं। लेकिन सोच समझ कर भी वे यह नहीं लिख पाये कि किसका जीवन। यह अभी उन्होंने पता नहीं क्यों गोपनीय रखा है। दरअसल, ऐसे लोगों के पास कई 'हिडन एजेंडा' होता है। हालांकि वे कहेंगे कि इसमें हिडन एजेंडा वाली क्या बात है, लेकिन इनके लिखने का अंदाज देखिये- 'यह लेख सफाई देने के लिए नहीं लिखा है- हालांकि जब लिखा ही है तो अपने आप सफाई चली आती है।'



आगे वे अपनी राजनीति का खुलासा करते हुए कहते हैं कि वे हिंसा के खिलाफ हैं लेकिन वे यह नहीं कहते कि वे राज्य की हिंसा के खिलाफ हैं क्योंकि यही वह हिंसा है जो दूसरी हिंसा को पैदा करती है। वे यह भी नहीं कहते कि विषमता के खिलाफ जो लड़ रहे हैं वो कौन हैं। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि उनकी लड़ाई में शरीक न होने का उन्हें अफसोस है या यह उनके लिए राहत की बात है। वे खुद ही बहस में कूदे और अंत आते-आते घोषणा करते निकल जाते हैं कि वे खुद को इस बहस से अलग कर रहे हैं।



ध्यान से देखा जाये तो वे यहां बहस करने आये भी नहीं थे। वो सिर्फ इस बात का विरोध प्रकट करने आये थे कि भूल कर भी अंबानी पर हमला मत करो। ऐसा वे इसलिए करने नहीं आये थे कि उन्हें अंबानी से प्रेम है या अंबानी से उनकी कोई जान-पहचान है बल्कि यह उनकी स्वामिभक्ति है। खैर इसमें खराबी ही क्या है। क्यों न करें वो स्वामिभक्ति? किसे नहीं मालूम कि जो लोग कारपोरेट लूट के खिलाफ देशभक्त की तरह खड़े हैं उनके खिलाफ सरकार सेना उतार चुकी है और वही सरकार स्वामिभक्तों के लिए खजाने का मुंह खोली हुई है। आप क्या चाहते हैं कि प्रियदर्शन जाकर सरकारी सेना से टकरा जाएं और वह भी 'जनता की पलटनिया' के भरोसे जो कहीं दिखती नहीं।



ये इतने डरे हुए लोग हैं कि जिसे वे नकली क्रांतिकारिता कहते हैं वह भी उनकी नींद उड़ा देने के लिये काफी है क्योंकि इनके आका को नहीं मालूम कि क्रांतिकारिता भी नकली होती है। भनक मिलते ही फायर कर देगा तुरत नौकरी से। वैसे लुके-छिपे यह दलील देते ये हमेशा देखे जा सकते हैं कि जब असली क्रांतिकारिता का वक्त आयेगा तो वे वहां जरूर खड़े मिलेंगे। लेकिन जबतक यह स्थिति नहीं है वे असली चाटुकारिता करेंगे क्योंकि वे असली जीवन जीते हैं। उन्हें असल से प्यार है। आप भले ही उन्हें उनकी चाटुकारिता या स्वामिभक्ति के लिये उन्हें कोसिये, लेकिन वे अंत तक यही कहेंगे कि वे असली हैं और आप नकली।


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2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

जिस तरह से रंजित वर्मा ने भास्कर के संपादक का बचाव किया है उससे तो यही लगता है कि वे भास्कर में अपना स्पेस बचाने के प्रयास में हैं. रंजित वर्मा लेखक नहीं हैं वे तो लेख की दुकान हैं. ऐसे लेखकों को फर्क नहीं पड़ता कि संपादक उनके लेख के साथ क्या करता है जब तक लेख का चेक उनके घर आता रहता है.
रहमान, नई दिल्ली

बेनामी ने कहा…

अगर मित्रता वाली ही बात होती तो विमल झा, प्रियदर्शन के ही नहीं मेरे भी मित्र हैं। किसी भी अखबार का दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है और उसे राजनीतिक पार्टी का मुखपत्र समझना भूल है। यह बहुत अच्छी बात लिखी है श्री वर्मा ने. अखबार में छपने के लिए मित्रता जरूरी है वर्ना बहुत से जानकार लेखक है तो रंजित ही क्यूँ छपते है.
अरविन्द सेन

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