5/27/2012

पहले अपना घर साफ करें

बहुत दिन बाद किसी अखबार में कुछ कायदे का छपा है। आज का जनसत्‍ता पढि़ए- ओम थानवी के लिए नहीं, आशुतोष भारद्वाज के लिए- ठीक सामने वाले पन्‍ने पर। नहीं पढ़ पाए, तो यहां वह लेख पढि़ए...


आशुतोष भारद्वाज

पिछले सवा दो वर्षों में हिंदी के मसलों पर रिपोर्टिंग का पहला त्रासद अनुभव यह रहा कि बुजुर्ग और नामचीन लेखकों से फोन पर उनका वक्तव्य मांगिए तो अधिकतर ‘‘अब इस पर क्या कहा जाए, रहने दें...’’ की मुद्रा में फोन रख देते हैं। दिलचस्प है कि बांग्ला या कन्नड़ के वरिष्ठ लेखक मुद्दे से अनजान होने के बावजूद न सिर्फ फोन पर पूरी बात पूछते-सुनते, बल्कि अपनी बेबाक राय भी देते हैं।

हिंदी के वरिष्ठ लेखक सार्वजनिक बयान देने से क्यों बचते-डरते हैं? क्या किसी अन्य क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ होंगे? मसलन, किसी अर्थशास्त्री, राजनेता या पुलिस अधिकारी से कोई प्रश्न पूछे जाने पर वह किसी रिपोर्टर से कहेगा कि ये सब छोड़िए, बाकी सब ठीक है? क्या कर रहे हैं इन दिनों... आइए कभी।

दूसरा त्रासद अनुभव, ये सम्मानीय बुजुर्ग जवाब तो नहीं देते, लेकिन फोन रखते वक्त हौले से सरका देते हैं- वैसे हमें मालूम है कि किसके कहने पर आप यह लिख रहे हैं। अगले दिन खबर छपने पर युवा लेखक-मित्र बेधड़क खुद को आपका स्वयंभू और एकमात्र हितैषी मान आपको तिकड़मी सलाह देते हैं- क्यों कर रहे हैं यह सब? क्यों किसी को हीरो बना रहे हैं? आप अच्छा लिख रहे हैं, अपना काम करिए न।

यह दिलचस्प है। अपनी भाषा यानी अपने जीवन के एक महत्त्वपूर्ण मसले पर एक कायर-कातर और शातिर-शायराना चुप्पी, अगर कोई दूसरा बोले तो उस पर निहित स्वार्थ और किंचित षड्यंत्र का ठप्पा, इसके कोई मायने नहीं कि रिपोर्टर फोन के उस ओर खड़े व्यक्ति से कभी नहीं मिला है।

अगर आदर्श चुनाव संहिता, चिकित्सक का हिपोक्रेटिक हलफनामा, सांसद की संवैधानिक शपथ हैं तो लेखकीय आचार संहिता भी होनी चाहिए। किसी के निजी जीवन से हमें सरोकार नहीं, लेकिन उन सार्वजनिक लम्हों में जब इंसान बतौर लेखक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है तो उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जो मूल्य उसके शब्द प्रस्तावित करते हैं उनके लिए वह कुरबान होने की कुव्वत रखेगा। अपने शब्द पर न्योछावर होने की बेझिझक और बेखौफ हुंकार लेखक होने की अनिवार्य शर्त है। मसलन, उसका शब्द अगर सत्ता-विरोधी है तो वह अपने लेखकीय जीवन में सत्ता की चाकरी नहीं करेगा। वह न कहें-लिखें जिसे आपका आचरण अवैध बना दे। जो सत्यापित कर सकें सिर्फ वही लिखें। बस।

इस संहिता की ललकार पर हमारे कई सम्मानित बुजुर्ग और युवा लेखक अपनी हस्ती लुटा चुके मिलेंगे। मसलन, वे वयोवृद्ध आलोचक, जिनकी सराही और प्रकाशनार्थ संस्तुत की गई किताब को एक बड़ा प्रकाशन छापने से मना कर देता है। यह उस किताब से कहीं अधिक जूरी के अध्यक्ष का तिरस्कार है। क्या आलोचक का काम महज किताबों का लोकार्पण करना और मंच से बोलना है? अपने कहे-लिखे शब्द के सम्मान की रक्षा कौन करेगा? क्या उनसे यह अपेक्षा न हो कि किताब पर होने वाला हर वार सबसे पहले वे अपनी काया पर सहेंगे?

या वे लेखक जो पुलिसिया बर्बरताके खिलाफ लिखते-बोलते हैं, लेकिन चुपचाप उस भूतपूर्व पुलिसिए के दरबार में जा खड़े होते हैं, जो भारत के इतिहास में शायद पहले ऐसे कुलपति बने हैं, जिनके खिलाफ फर्जी प्रमाण-पत्र बनवाने के मामले में एफआइआर दर्ज हो चुकी है। उन पर कई दलित छात्र उत्पीड़न का और लेखिकाएं अपमान का आरोप लगाती हैं। आपको अपने निजी जीवन में किसी के भी साथ मित्रता, अंतरंगता रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन बतौर लेखक कहीं शिरकत करने से पहले क्या यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि आपकी उपस्थिति आपके शब्द और लेखक बिरादरी को तिरस्कृत तो नहीं करेगी?

कोई प्रकाशक या संपादक अपनी अर्थवत्ता लेखक और उसकी रचना से ग्रहण करता है। अपने यहां उलट है। प्रकाशक मानते हैं कि उन्होंने अनेक लेखकों को खड़ा किया है- क्या था वह हमारे यहां छपने से पहले, हमने बनाया उसे। अद्भुत दंभ, जिसे खुद लेखक की कातरता ने रक्तपोषित किया है।

किसी पत्रिका के दफ्तर जाइए, लेखक अपनी रचना का रोली, चावल, कपूर, बत्ती बना कर संपादक की आरती उतारते मिलेंगे- कल ही पूरी की है, देख लीजिएगा जरा। संपादक बताएगा कि स्वीकृत रचनाओं की कतार बहुत लंबी है, तो कहेंगे- थोड़ा जल्दी कर दीजिएगा न। एकाध कोई आगे पीछे कर दीजिएगा।

जिस इंसान के भीतर लेखकीय संयम नहीं, उसे अपने शब्द की ताकत पर भरोसा नहीं तो फिर संपादक बिना उसकी याचना का लुत्फ उठाए क्यों उसे छापे! भले वह आपकी रचना जल्दी छाप दे, लेकिन क्या आप इस मासूम भुलावे में हैं कि संपादक आपका सम्मान करेगा? आप जैसे ही दरबार से उठ कर जाएंगे, वह अन्य सभासदों के सामने तुरंत आपका और आपकी रचना का चीर हर लेगा। आपने अपनी गरिमा तो आरती की थाली में स्वाहा कर दी, जिसे आपने अनगिन जागती रातों में संजोया, जो घनघोर नाउम्मीदी-नाकामी के लम्हों में आपके साथ अंतिम स्वप्न की तरह जीती रही, कम-अज-कम उस कृति को तो ऐसी सभाओं में दांव पर मत लगाइए। प्रकाशक को शक्तिमान किसने बनाया? लेखक की कायरता, अपने शब्द पर अविश्वास और छपास-ललक ने। अगर साल-छह महीने देर से छपेगा या नहीं भी छपेगा तो क्या उसकी कलम को लकवा मार जाएगा, लैपटॉप कोमा में चला जाएगा?

यही ललक उसे लोकार्पण मंडप ले जाती है, वह बड़े लोकार्पणकार का जुगाड़ करता है, लेकिन यहां भी कुंठित होता है कि वरिष्ठ लेखक ने उसकी तारीफ में कुछ घिसे हुए जुमले तो मंच से कहा, लेकिन बिना उसकी किताब पढ़े यों ही चला आया था। किताब के   पन्ने मोड़, रास्ते में प्रकाशक की कार से आते वक्त नोट्स जैसा कुछ बना लाया था।

प्रचारलोलुप यह इंसान अब भी नहीं खैर करता, अपने शब्द को पोला-पोपला-पिलपिला बनाए जाता है। किताब आ गई, लोर्कापण हो गया और अब यह बेमुरव्वत और बेनमक जंतु समीक्षक के दरबार पहुंचता है- कहीं कुछ देख लीजिएगा हो सके तो जरा। सुधी समीक्षक के श्रीचरणों मेंअपनी हस्ताक्षरित किताब भिजवाता है, भेजने से पहले दो, उसके बाद चार फोन करता है। कई सारी प्रतियां अन्य बुजुर्ग लेखकों को ससम्मान भेंट करने जाता है- नई किताब आई है मेरी, आप देख लेते जरा।

जरा! कुछ और भी बाकी था या है? अपनी किताब को बेइज्जत करने से बेहतर वह अपनी कलम तोड़, लैपटॉप फोड़ फांसी क्यों नहीं लगा लेता? वह क्यों नहीं इस आत्मविश्वास में बेफिक्र होकर जीता है कि अगर उसका शब्द सच्चा है तो उसे किसी समीक्षक-प्रचारक की दरकार नहीं। उसकी किताब अपना रास्ता खुद बनाएगी।

मित्रो, बेवकूफी है संपादक-प्रकाशक के खिलाफ अभियान। भ्रष्ट आचार तो इस लेखक नामक जंतु का ही है, जो स्वघोषित एंटी-एस्टैब्लिशमेंट है, अनाम, अज्ञात या दूर देश के दुश्मन गढ़ता है; बुश, सरकोजी से लेकर किन्हीं चेहराहीन प्राणियों पर दिन-दोपहर फेसबुकिए मुक्के बरसाता है; प्रगतिवादिता, अन्याय, क्रांति जैसे मशहूर जुमलों की विराट इमला लिखता है; प्रेम, मानवता, सहिष्णुता का मंत्रोच्चार करता है, समाज के हर वर्ग, राजनेता, फिल्मकार, व्यापारी आदि पर अंतिम फतवा अपना स्वयंभू अधिकार समझता है, लेकिन अपने कर्मों से पूरी लेखक बिरादरी को तिरस्कृत करता है।

विरोध इसी प्रजाति का होना चाहिए, भले वह कविता कहता, कहानी बोलता या आलोचना सुनाता हो। सबसे पहले इस जंतु को इस खुशफहमी से जुदा करें कि वह लेखक है। चार-छह कागज काले करने से कोई लेखक नहीं बनता। आप अच्छा लिख रहे हैं, लिखते होंगे; आपकी रचनाएं देशी-विदेशी कई भाषाओं में अनूदित होकर चर्चित हुई होंगी, हुआ करें; लेकिन आपको समझना चाहिए कि लेखक होना एक अपूर्व नैतिक क्रिया है। लेखक कहलाने की अर्हता कठोर है, बलिदान मांगती है। लेखक भाषा का सेनापति है, रचना उसे समाज और साहित्य का अनिवार्य और अंतिम दूत बनाती है। उसे अधिकार और दायित्व देती है कि वह अपनी भाषा और उसे बरतने वाले प्राणियों के सम्मान के लिए आंधी-तूफान, घनघोर लालच और लिप्सा के लम्हों में भी सैनिक की तरह मोर्चा बांधे मिलेगा। अगर आपका आचरण आपके शब्द का विलोम है, आप शब्द की रक्षा नहीं कर सकते तो आप खुद तय करें कि आपको क्या कहा जाए।

आखिर आप भी तो स्कूल-कॉलेज के दिनों में पहली मर्तबा शब्द के पास अंतिम उम्मीद की भांति गए थे कि इसकी आंच में अपनी रूह और हड्डियां गलाएंगे, पिघले रसायन की ताप से एक बेहतर दुनिया रचेंगे। उम्र ने भले समझा दिया कि दुनिया शायद यों नहीं बदलेगी, लेकिन खुद को स्वाहा करने का जज्बा काहे भूल आए। डॉलर के बरक्स रुपए की तरह शक्ति के समक्ष शब्द के अवमूल्यित होते जाने के दौर में इतना तो हम कर ही सकते हैं कि हर वह व्यक्ति, जो लेखकीय आचार संहिता अपने जीवन में लागू करने में असमर्थ हो अपनी भाषा की गरिमा की खातिर खुद को शब्दकार न माने। प्रकाशक-संपादक ठहरे बाहरी प्राणी, उनसे बाद में निपट लेंगे। पहले अपने घर की तो सफाई हो।

साभार: जनसत्‍ता, 27 मई 2012

कोई टिप्पणी नहीं:

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें