5/28/2012

अनंतर का लोकतंतर ऐसा ही होता है

अभिषेक श्रीवास्‍तव

जनसत्‍ता में 20 अप्रैल को संपादक ओम थानवी ने अपने स्‍तम्‍भ 'अनन्‍तर' में जब 'आवाजाही के हक में' आधा पन्‍ना रंगा था, उसी दिन इस लपकी गई बहस के मंतव्‍य से 'कुछ गर्द हट' गई थी। 14 अप्रैल को मंगलेश डबराल का इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के मंच पर जाना, 16 अप्रैल से मेरे और विष्‍णु खरे के बीच शुरू हुई मेला-मेली, 20 अप्रैल को बहस का जनसत्‍ता में शिफ्ट हो जाना और 27 मई को 'अनन्‍तर' से ही बहस का पटाक्षेप- पूरे डेढ़ महीने की इस कवायद में आखिर हिंदी के बड़े लेखकों, एक हिंदी अखबार के संपादक और खुद इस बहस में शामिल स्‍टेकहोल्‍डर्स ने वास्‍तव में किया क्‍या? आइए, ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं।

ताकि गर्द कुछ हटे: ओम थानवी

होना था क्‍या  

मंगलेश डबराल द्वारा राकेश सिन्‍हा के मंच की अध्‍यक्षता एक राजनीतिक मसला था, ठीक वैसे ही जैसे उदय प्रकाश का पुरस्‍कार प्रकरण। एक सेलीब्रेटेड लेखक के सार्वजनिक आचरण पर जो आपत्तियां उठी थीं, वे दरअसल साहित्‍य और राजनीति के अंतर्सम्‍बंधों पर बहस को जन्‍म दे रही थीं। विष्‍णु खरे के जो मेल आए और उसके बाद गुंटर ग्रास की विवादित कविता पर तमाम जगहों पर जो बात फैली, उसके केंद्र में भी एक सेलीब्रेटेड लेखक की राजनीति और साहित्‍य के बीच विरोधाभास/एकता पर ही बहस को होना था।

क्‍या हो गया

आज जब 'जनसत्‍ता' ने इस प्रकरण को अपने तईं निपटा दिया, तो ज़रा देखिए कि पांच हफ्ते में मोटे तौर पर क्‍या-क्‍या हुआ:

- मंगलेश डबराल ने अपने आचरण को 'चूक' बताया।

- विष्‍णु खरे ने जनसत्‍ता (पढ़ें पत्रकारिता) को ओम थानवी के योगदान पर सवाल खड़े किए और बदले में अपना योगदान गिनवाया।

- आनंद स्‍वरूप वर्मा ने मंगलेश डबराल की 'चूक' को ही चूक बता दिया और जनसत्‍ता के संपादक की 'निकृष्‍टता' के कारण उससे सम्‍बंध तोड़ लेने की कहानी बताई।

- वामपंथी लेखक संगठन से संबद्ध चंचल चौहान और के. विक्रम राव जैसे लोग अचानक सक्रिय हो गए।  

- पहली बार मोहल्‍लालाइव ने और दूसरी बार जानकीपुल ने ओम थानवी का 'अनन्‍तर' अपने यहां चिपका कर उसका प्रचार किया।

- जनसत्‍ता ने पिछले पांच हफ्ते में जो भी सामग्री इस प्रकरण पर प्रकाशित की, अधिकांश ब्‍लॉग से उठाई गई थी।

- बाकी जनसत्‍ता और उसके संपादक की 'लोकतांत्रिकता' के बारे में किसने क्‍या कहा, मसलन पंकज सिंह या सुधीश पचौरी, ये सारी बातें सिर्फ ओम थानवी जानते हैं जो उन्‍होंने 27 मई के 'अनन्‍तर' में लिखी हैं।

साफ है कि जनसत्‍ता में जिस तरह बहस को पर्सनल बनाया गया और मूल बहस को सिरे से गायब कर डाला गया, उससे एक बड़ी पुरानी कहावत गलत साबित हो गई, कि 'आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास'। दरअसल, हरि भजन को कोई आया ही नहीं था, सब कपास ओटने आए थे और अपने-अपने हिस्‍से का ओट कर कट लिए।

सबसे ज्‍यादा किसने ओटा


ओम थानवी
खबरों की पत्रकारिता का एक पुराना आसान फॉर्मूला है 'चेज़ दी मनी'। जहां पैसा न हो, वहां इसे इस तरह पढ़ा जाता है कि फायदा किसे हुआ। मूल बहस को छोड़ दीजिए जिस पर किसी ने बात ही नहीं की। जो हुआ, हम उससे हुए फायदे को ज़रा देखें, तो बहुत मेहनत नहीं करनी होगी। ओम थानवी ने बहस जनसत्‍ता में शिफ्ट की, 'विरोधी' विचारों को जगह दी (आनंद स्‍वरूप वर्मा और मंगलेश डबराल, जिन्‍हें साभार लिया गया था) और अंतत: बहस को खत्‍म करने के क्रम में सबको एक साथ निपटा दिया। इस निपटान में उन्‍होंने शरद दत्‍त, पंकज सिंह, सुधीश पचौरी आदि से अपने 'लोकतांत्रिक' होने की पुष्टि करवा ली और अंत में विष्‍णु खरे की लिखी प्रशस्ति को स्‍कैन कर के चिपका दिया। 'लोकतंत्र', 'सहानुभूति', 'गलतबयानी' और 'आत्‍मश्‍लाघा' के इस 'अनन्‍तर' में दरअसल ओम थानवी ने कहावत पलट डाली- कपास तो खूब-खूब ओट लिया, लगे हाथ हरि भी बन गए। बोले तो चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का मेरे बाप का!  

आइए, अब सिलसिलेवार 'अनन्‍तर' में घुसते हैं 'ताकि गर्द कुछ हटे'।

'मुखौटे' का लोकतंत्र

शुरुआती डेढ़ कॉलम में ओम थानवी लोकतांत्रिकता और उदारता की मुहर अपने ऊपर लगाते हैं। इसके लिए वे आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का भी सहारा लेते हैं। दरअसल, ऐसा कर के वे अपनी लोकतांत्रिकता को बहुतों के मुकाबले छोटा ठहरा देते हैं। क्‍या राकेश सिन्‍हा उनसे कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जो मंगलेश डबराल को अपने मंच पर अध्‍यक्ष बना रहे हैं? क्‍या राकेश सिन्‍हा से ज्‍यादा लोकतांत्रिक विभूति नारायण राय नहीं जो अपने तमाम विरोधियों को शरण दिए जा रहे हैं? क्‍या राय से ज्‍यादा लोकतांत्रिक रमन सिंह नहीं जो नामवर सिंह के साथ मंच साझा कर रहे हैं? क्‍या उनसे भी बड़े लोकतांत्रिक नरेंद्रभाई मोदी नहीं जिनके सद्भावना मंच पर मुसलमान नेता विराजते हैं? क्‍या इस देश की बहुदलीय राजनीति कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जहां वाम, दक्षिण, मध्‍यमार्गी सब एक ही संसद में बैठते हैं? क्‍या अमेरिकी प्रशासन उससे भी बड़ा लोकतांत्रिक नहीं जिसके विश्‍वविद्यालयों में नोम चोम्‍सकी सरीखे उसके आलोचक पढ़ा रहे हैं? यदि लोकतांत्रिकता की ओम थानवी वाली परिभाषा को देखें, तो वे सबसे छोटे कद के लोकतांत्रिक साबित होंगे क्‍योंकि उनके पास अपने विरोधियों को देने के लिए एक ऐसा मंच है जिससे व्‍यापक जनता (पढ़े हिंदी पाठक) का कोई परिचय नहीं। दूसरे, वे ऐसे ही लोकतांत्रिकों की कतार में खड़े नज़र आएंगे क्‍योंकि जिस लोकतंत्र की बात वे कर रहे हैं, वैसा लोकतंत्र दरअसल व्‍यक्तियों की सत्‍ता को कायम करने के लिए अपनाया जाता है। आप देखिए कि एक मंच पर खड़े दो विरोधी विचार के लोगों में से फायदा उसी को होता है जिसकी 'सत्‍ता' बड़ी होती है, छोटी सत्‍ता वाला बदनाम ही होता है। ओम थानवी इस बदनामी को 'असहिष्‍णुता' कहते हैं। जिस कदर विचारधाराओं को कपड़ा बनाने की साजि़शें पिछले कुछ दशकों में चली हैं, जिस कदर किसी विचारधारा के अनुरूप सार्वजनिक आचरण पिछले दिनों में दूभर बना दिया गया है, 'आवाजाही' से परहेज़ शायद ऐसे में कमिटमेंट का एक प्रतीक भर है और मुझे लगता है कि यही एक जेस्‍चर है जिससे आप अपने होने का, अपने स्‍टैंड का सार्वजनिक संदेश देते हैं। ओम थानवी कह रहे हैं इसे भी छोड़ो, यह लोकतांत्रिक नहीं। उनका लोकतंत्र दरअसल झूठा है। यह जन की सत्‍ता नहीं, व्‍यक्ति की सत्‍ता का औज़ार है। होशियारी देखिए ज़रा, कि जब तक लोगों को आपका चमकदार चेहरा दिख रहा है तब तक आप तर्क और तथ्‍य गिनाते हैं, जैसे ही कोई 'मुखौटा' कह देता है आप भाग्‍यवादी हो जाते हैं। शायद इसीलिए ओम थानवी कहते भी हैं, कि ''...ऐसी प्रतिक्रियाओं को सविस्‍तार प्रकाशित किया (...) तो इसलिए भी कि उदार रवैये की बात 'मुखौटा' न लगे।' यानी ओम थानवी का 'मुखौटा' न दिखे, इसके लिए वे सचेतन प्रयास करते हैं। वे चूंकि हमारे तर्कों को भी समझते हैं, लिहाज़ा डिसक्‍लेमर दे देते हैं, ''...लेकिन दुर्भाग्‍य देखिए कि फिर भी वह कुछ को मुखौटा ही लगी।'' तर्क और भाग्‍यवाद का यह घालमेल कहां ले जा रहा है, सोचिए? जिन्‍हें मुखौटों की पहचान है उन्‍हें तो आपने खारिज कर दिया, और जिन्‍हें मुखौटे दिखते नहीं (या यह कहें कि जिन सबने मुखौटे पहन रखे हैं और नहीं चाहते कि वे दूसरों को दिखें) उन सबको आपने गले लगा लिया। कहीं वह 'मुखौटों' का लोकतंत्र तो नहीं जिसकी बात ओम थानवी कर रहे हैं? यदि ऐसा है, तब तो वे ठीक कह रहे हैं क्‍योंकि लोकतंत्र दरअसल मुखौटा ही तो है जिसे ओम थानवी से लेकर जॉर्ज बुश तक अलग-अलग हितों के लिए लगाते हैं। अब इसका क्‍या किया जाए यदि ओम थानवी की सत्‍ता बेहद छोटी है (शायद कुछेक हज़ार पाठकों की), इसीलिए शायद 'जनसत्‍ता' का नाम आज उनके लिए मुखौटे का काम कर रहा है। यह बात अलग है कि हिंदी का सत्‍ता विमर्श ही इतना टुच्‍चा है कि 'जनसत्‍ता' भी एक सत्‍ताधारी की तरह इसमें नुमाया हो जाता है। ओम थानवी इस लिहाज़ से कुछ भी अलग और मौलिक नहीं कर रहे। वही कर रहे हैं जो निर्मल बाबा करते हैं- जनता (पढ़ें मुट्ठी भर लेखक-पाठक) की आस्‍था के सैलाब में अपना मुखौटा चमकाते हुए अपनी सत्‍ता कायम रखने का काम।                

आनंद स्‍वरूप वर्मा का मामला: झूठ दर झूठ  

पहली ही पंक्ति देखिएगा, ''...बचे आनंद स्‍वरूप वर्मा'', बिल्‍कुल क्राइम ब्रांच के किसी फिल्‍मी अफसर की तरह अगले एनकाउंटर से पहले बोला जाने वाला संवाद। बहरहाल, सबसे पहले ओम थानवी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का इस्‍तेमाल अपने हक़ में करते हैं। उदय प्रकाश वाले प्रकरण में कबाड़खाना का लिंक उन्‍होंने दुरुस्‍त दिया है, लिहाज़ा बरी होने को लेकर उनका आत्‍मविश्‍वास सही भी है लेकिन एक राष्‍ट्रीय दैनिक के संपादक के तौर पर उन्‍हें कौन बरी करेगा? वे लिखते हैं, ''पूंजीवाद और सर्वहारा की बात करने वाले दोनों 'सहारा' की सेवा में थे।'' इससे क्‍या साबित होता है? एक पत्रकार कहां नौकरी करेगा? बनिया के यहां ही न? जनसत्‍ता भी तो बुनियादी तौर पर बनिया की दुकान ही है न? हां, बनिया से पत्रकार नाता क्‍यों तोड़ता है, यह देखे जाने वाली बात हो सकती है। आगे देखिए, ''वर्मा जी की मेहरबानी है कि निकृष्टताका उदाहरण यह दिया है उनके किसी लेख में जनयुद्ध शब्द पर मैंने इनवर्टेड कोमालगा दिया, या नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड के हाथों किसी कटवाल की बर्खास्तगी मुझे रास नहीं आई। देर तक दिमाग पर जोर डाले रहा कि नेपाल में एक कनक दीक्षित को छोड़ किसी दूसरे शख्स को ठीक से जानता भी नहीं, यह कटवाल कौन हैं! बाद में गूगल पर देखा कि नेपाल के सेनाध्यक्ष थे।'' दक्षिण एशिया की पहली माओवादी सरकार के पतन की वजह जो व्‍यक्ति बना, उसका नाम भारत के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय हिंदी दैनिक के संपादक को गूगल पर खोजना पड़ रहा है! ये बात ध्‍यान देने वाली है कि 'इनवर्टेड कॉमा' वाले प्रसंग के बाद भी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लेख जनसत्‍ता में छपे थे, बाद में जब माओवादी सरकार गिरी तो एक लेख से कटवाल वाला प्रसंग हटा देने संबंधी ओम थानवी की बात पर आनंद स्‍वरूप वर्मा ने लिखना छोड़ दिया (आनंद स्‍वरूप वर्मा के मुताबिक)। समझ सकते हैं कि जिस 'राष्‍ट्रीय संपादक' को राजशाही समर्थक हिंदूवादी कनकमणि दीक्षित ही नेपाल के नाम पर याद आते हों, और जिन्‍हें वे ठीक से जानते हों, उससे ये उम्‍मीद करना संभव नहीं कि ऐसे राजनीतिक मसले पर वह कुछ समझ रखता होगा जो अमेरिकी सीआइए की हिट लिस्‍ट में पहले नंबर पर रहा। अगले पैरा में देखिए, '' वर्मा यह नहीं बताते जनसत्ता में आठ बरस उन्होंने इनवर्टेड कोमाया अन्य किसी तरह के बाधा के बगैर कैसे लिखा, न यह कि जनसत्ता  के अलावा किस राष्ट्रीय दैनिक ने उन्हें लगातार पहले पन्ने पर जगह दी- बाकायदा नाम के साथ, जैसे स्टाफ को देते हैं। हमने उनसे नियमित स्तंभ भी लिखवाया। क्या हमें मालूम नहीं था कि उनकी विचारधारा क्या है, या यह कि उनके लिए देश की किसी भी समस्या से बड़ी चीज नेपाल का माओवादी आंदोलन है?'' ओम थानवी आठ साल का श्रेय ले रहे हैं, जबकि आनंद स्‍वरूप वर्मा जनसत्‍ता के खुलने से ही उसमें लिखते रहे हैं (सती कांड पर दो वर्षों को छोड़ दें तो) और प्रभाष जोशी के ज़माने में दक्षिण अफ्रीका से लगातार दस दिन उन्‍होंने पहले पन्‍ने पर लीड खबर लिखी थी। आनंद स्‍वरूप वर्मा का जनसत्‍ता से जुड़ा होना उनकी विचारधारा के चलते नहीं था बल्कि नेपाल विशेषज्ञ की हैसियत से था। ओम थानवी ने जो भी दावे किए हैं, वे सब आत्‍मश्‍लाघा से प्रेरित हैं क्‍योंकि जनसत्‍ता से जिन लेखकों को प्रभाष जोशी ने जोड़ा था, उन्‍हें कुछ मामलों में आगे बढ़ाए रखना ओम थानवी की मजबूरी भी थी और आनंद स्‍वरूप वर्मा इसी मजबूरी का एक नाम थे क्‍योंकि नेपाल पर कनकमणि दीक्षित तो कम से कम जनसत्‍ता पाठकों की पसंद नहीं हो सकते थे। दूसरे अखबारों  का सवाल पूछ कर ओम थानवी ने ओछी बात कर दी। क्‍या आनंद स्‍वरूप वर्मा का नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, लातिन अमेरिका या भूटान पर काम अखबारों की कतरनों का मोहताज है?  बहरहाल, और देखिए, ''क्या आपको भी लगता है कि उन्होंने एक इनवर्टेड कोमाके मुद्दे पर राब्ता तोड़ दिया?'' वास्‍तव में नहीं, क्‍योंकि आनंद स्‍वरूप वर्मा खुद ऐसा नहीं कह रहे, उन्‍होंने तो कटवाल प्रकरण के बाद राब्‍ता तोड़ने की बात अपने पत्र में कही थी, जिसे आज ओम थानवी को गूगल पर खोजना पड़ रहा है। ओम थानवी की राजनीतिक समझ को ''मुट्ठी भर माओवादियों'' के प्रयोग से ही समझा जा सकता है। जब वे कहते हैं कि ''एक स्‍वतंत्र अखबार मुट्ठी भर माओवादियों के संघर्ष को सारी जनता का युद्ध नहीं ठहरा सकता'', तो वे भूल जाते हैं कि माओवादी चुनाव में हिस्‍सा ले चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी पिछले चुनावों में जनादेश पाई सबसे बड़ी पार्टी है (हो सकता है भूले न हों, पता ही न हो)। इससे भी बड़ा अपराध ओम थानवी अपने पद के खिलाफ यह कर जाते हैं कि ऐसी बात उस दिन छापते हैं जिस दिन पूरी दुनिया की निगाह नेपाल पर लगी है क्‍योंकि 27 मई ही वहां संविधान लिखे जाने की आखिरी तारीख है। संयुक्‍त राष्‍ट्र से लेकर बीजेपी के नेताओं तक को 27 मई के बाद नेपाल की स्थिति पर गहरी चिंता है, और ओम थानवी उसी दिन पूछ रहे हैं कि भई ये कटवाल कौन है? गलतबयानी, आत्‍मश्‍लाघा और काट-छांट के संपादकीय अधिकार के घालमेल से इस प्रकरण में ओम थानवी ने, मुहावरे में कहें तो, दरअसल अपने ही शब्‍दों को अपने पैरों पर मार लिया है।

चंचल चौहान की बात: भोंथरा संवेदन या बदमाशी (नादानी)  

जब नेपाल समझ में न आए, तो 'विश्‍व पूंजीवाद' कैसे समझ आ सकता है? चंचल चौहान का यह बयान, कि ''अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी दुनिया भर में यह विचार या चेतना फैला रही है कि विचारधारा और विचारधारा से लैस संगठन व्यर्थ हैं'', ओम थानवी के या तो सिर को बिना छुए निकल गया या वे खुद को नादान दिखाने की कोशिश में यह अर्थ लगा बैठे कि ''जनसत्‍ता जनवादी लेखक संघ के विरुद्ध किसी अंतरराष्‍ट्रीय षडयंत्र में शरीक है।'' आप समझिए कि राजनीति-दर्शन का एक सामान्‍य वाक्‍य कैसे भोंथरे संवेदन (या थेथरोलॉजी) का शिकार हो जाता है। चंचल चौहान जो कह रहे हैं, वह संभव है जलेस का नाम लिए जाने से उत्‍प्रेरित हो, लेकिन उनकी बात सामान्‍य तौर पर सही है। इस सामान्‍यीकृत वाक्‍य को भी ओम थानवी पर्सनल बना देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सामने वाला कोई गंभीर बात कह रहा हो और आप सब कुछ सुनने के बाद कह दें कि मुझे भूख लगी है।

मंगलेश डबराल का संदर्भ: सफेद झूठ  

ओम थानवी पहले तो मंगलेश डबराल के स्‍पष्‍टीकरण को 'मज़ेदार' कह के मज़ा ले लेते हैं, लेकिन बाद में खुद फंस जाते हैं। वह कहते हैं, '' बहस मुख्यत: जनपथऔर मोहल्ला लाइवपर चली। तीन सौ से ज्यादा प्रतिक्रियाएं वहां शाया हुर्इं, पर मंगलेश जी का पक्ष कहीं पर सामने नहीं आया।'' यह झूठ है, सरासर झूठ। आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र जिस पन्‍ने पर 'जनपथ' पर छापा है, उसी के ठीक नीचे मंगलेश डबराल का 'चूक' वाला स्‍पष्‍टीकरण भी मौजूद है (http://www.junputh.com/2012/05/blog-post.html) और ओम थानवी इससे कतई इनकार नहीं कर सकते क्‍योंकि 20 मई के जनसत्‍ता में जो आनंद स्‍वरूप वर्मा का मंगलेश डबराल के नाम पत्र उन्‍होंने छापा है, उसके नीचे 'साभार जनपथ' लिखा है। ज़ाहिर है, ऊपर दिए जिस पेज से उन्‍होंने आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र उठाया या उठवाया होगा, उसके एक लाइन नीचे लिखे को उन्‍होंने जान-बूझ कर नज़रअंदाज़ कर दिया है- ''मंगलेश डबराल का वह स्‍पष्‍टीकरण, जिसकी प्रतिक्रिया में उपर्युक्‍त पत्र भेजा गया है।'' (यह बात ठीक है कि मंगलेश जी ने यह पत्र मुझे नहीं भेजा था, मैंने इसे अशोक पांडे की फेसबुक वॉल से उठाया था) ज़ाहिर है मंगलेश जी की ओर से अशोक पांडे अपनी दीवार पर 'खांस' आए थे, लेकिन उसकी मुनादी 'जनपथ' पर समय रहते हो चुकी थी। यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है। उन्‍होंने जब बहस ही खत्‍म कर दी है, तो उनकी सेहत पर इससे फर्क नहीं पड़ता है और वैसे भी उनसे जवाब ही कौन मांगने जा रहा है, जब उन्‍हें नामवर जी की मुअनजोदड़ो पर 'स्‍नेहवश' कही बात 'सबसे उल्‍लेखनीय' लग रही हो। एक बात पूछी जानी चाहिए, क्‍या मंगलेश जी को ओम थानवी काट-छांट का संपादकीय अधिकार नहीं देंगे? क्‍या अब भी वे मंगलेश जी को अपने अ‍धीन ही मानते हैं?

और अंत में आत्‍मरति

विष्‍णु खरे के बहाने अंत में आखिर संपादकीय संभोग का सुख ओम थानवी ने ले ही लिया, लेकिन विष्‍णु खरे की बात की दूसरी अर्थच्‍छवियां शायद वे समझ नहीं सके। विष्‍णु खरे इतने भी मूर्ख नहीं कि ओम थानवी को राजेंद्र माथुर के बाद का अद्वितीय हिंदी संपादक ठहरा दें। ध्‍यान से पढि़ए, उसमें लिखा है, ''राजेंद्र माथुर के बाद 'अपनी तरह के' अद्वितीय हिंदी दैनिक संपादक ओम थानवी के लिए''। क्‍या समझ आया? 'अपनी तरह के' ऐसे ही नहीं लिखा विष्‍णु खरे ने, यह एक कालजयी प्रशस्ति और प्रमाण पत्र है कि कल को ओम थानवी यदि कुछ भी कर बैठें, तब भी 'अपनी तरह के' ही रहेंगे।

मेरा पक्ष

मुझसे मेरा पक्ष किसी ने नहीं पूछा, लेकिन इतना लंबा लिखने के बाद कुछ तो कहना बनता ही है। पहली बात, इतने लब्‍धप्रतिष्‍ठ लोगों ने मिल कर डेढ़ महीने में सिर्फ और सिर्फ कीचड़ का उत्‍पादन किया, जिसे एक-दूसरे पर उछाला। अच्‍छी बात यह हुई कि बाकी लोगों ने तो गर्द हटाने की फिक्र नहीं की, लेकिन ओम थानवी ने गर्द हटाने के चक्‍कर में खुद को धो दिया। उनके लोकतंत्र और उनकी सत्‍ता के साथ सहानुभूति बनती है। जहां तक साहित्‍य और राजनीति के बीच मूल बहस का सवाल है, तो 'जनपथ' पर वह अविराम जारी है अलग-अलग प्रसंगों के रास्‍ते।

आशुतोष भारद्वाज का लेख
अच्‍छी बात बस एक हुई है कि कीचड़ में एक कमल खिल गया है। 27 मई को 'अनन्‍तर' के ही सामने वाले पन्‍ने पर आशुतोष भारद्वाज ने अपने लेख में एक सीख दी है 'पहले अपना घर साफ करें'। चाहें तो ओम थानवी इसे छापने का श्रेय ले सकते हैं और हम उन्‍हें धन्‍यवाद भी देंगे इतना सच्‍चा लेख छापने के लिए, लेकिन हम क्‍यों भूल जाएं कि आशुतोष उनके स्‍टाफर हैं। क्‍या कोई बाहर का व्‍यक्ति लिख कर भेजता तब भी वे ऐसे ही छापते? यह सवाल काल्‍पनिक है, लेकिन मौजूं है। कीचड़ भी अपना, कमल भी अपना। यही है ओम थानवी का लोकतांत्रिक सपना। अनन्‍तर का लोकतंतर ऐसा ही हो सकता है।





  

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