5/30/2012

साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं...

प्रो. राकेश सिन्‍हा ने अपने ब्‍लॉग और फेसबुक पर आवाजाही के संदर्भ में वामपंथियों के खिलाफ जो लेख लिखा था जिसे हमने बाद में जनपथ पर साभार लगाया, उसका जवाब चंचल जी ने अपने ब्‍लॉग पर दिया है। बलराज मधोक, जेपी और आडवाणी जैसे कई प्रसंगों का जि़क्र कर के चंचल जी ने अतीत में संघ के सेक्‍टेरियन रवैये की पोल खोल दी है। राकेश सिन्‍हा से प्रतिसंवाद की शैली में लिखा गया चंचल जी का लेख नीचे जस का तस हम दिए दे रहे हैं- मॉडरेटर

चंचल जी
ओम जी ने क्या कहा, मंगलेश डबराल से कहां चूक हुई, 'आवाजाही' में कौन किस से टकराया हमें नहीं मालूम. फेसबुक पर प्रो. राकेश सिन्हा का लंबा आलेख पढ़ा. प्रो. सिन्हा ने 'संघ' के बारे में, उसके बचाव में और साम्यवादियों की हरकतों पर खुली टिप्पणी की है.

मैं व्यक्तिगत रूप से ओम थानवी और मंगलेश डबराल को जानता हूं. और जब 'जानने' की बात करता हूं तो उसका मतलब महज मेल मिलाप से नहीं होता, ज़हनी तौर पर वे कहां हैं इससे हम वाकिफ हैं. प्रो.साहिब, आपकी भाषा में कहें तो ये लोग 'कुजात' हैं. इनके पास न तो कोई संगठित गिरोह है न ही उसकी उकसाऊ तमीज़. इंसान के हक और हुकूक की बात करने वाले ये लोग अपने तर्क पर खड़े हैं, ये लोग पुरुषार्थवादी हैं, अनुदानभोगी नहीं. सिन्हा साहिब ये बातें आपको अजीब लगेंगी लेकिन इनका खुलना भी ज़रूरी है. आप कहते हैं कि डबराल को आपने बुलाया. जनाब इसका मतलब साफ़ है कि कुछ सोच कर ही आपने बुलाया होगा, कल को यह कहने के लिए कि देखिये हम 'अछूत' नहीं हैं, हमारी पांत में डबराल साहिब भी बैठ चुके हैं. (यह बात इसलिए कह रहा हूं कि आपने अपने आलेख में कई जगह कई बार उन नामों का जि़क्र किया है जिन्होंने गाहे बगाहे आपको अपने बगल में चलने की अनुमति दे दी. उदाहरण के लिए आपने जेपी का जिक्र किया).

बहरहाल, सिन्हा साहिब! आप साम्यवादियों को जब 'गरिया' रहे थे मैं बड़े गौर से उस हिस्से को निहार रहा था जिसे आप छुपा रहे थे. आपने साम्यवादियों को जो कुछ भी सुनाया वो सब आप पर भी तो लागू होते हैं. आप अतीत की चर्चा कर रहे थे- किस तरह से एक साम्यवादी ने डांगे साहब को जन्मदिन पर बधाई दी और उसे पार्टी से निकाल दिया गया. संघ ने क्या किया है? आपको तो याद होगा जनसंघ आज भी ज़िंदा है और उसके अध्यक्ष बलराज मधोक को आज तक तन्हाई मिली है कि उसने भी यही गलती की थी. अडवानी और जसवंत सिंह के साथ क्या हुआ था? महज़ इतना ही न कि उन्होंने जिन्ना को सेकुलर कह दिया? आपका आरोप सही है सिन्हा साहिब कि साम्यवादियों की नीति और नियति जनतंत्र और बोलने की आजादी की कटती नहीं है. लेकिन संघ भी तो उसी तानाशाही का हामी है, रास्ते भले ही अलग हों. आप अपने को 'विश्व' कहते हैं, वे अपने को 'अंतरराष्‍ट्रीय' कहते हैं. उनके हर फैसले 'अगल' 'बगल' से होते हैं, आपके 'पीछे से'. भारत की आजादी देश के लिए ही नहीं दुनिया के लिए बड़ी घटना थी, आप दोनों पैदा हो चुके थे, जवान हो चुके थे. आप दोनों ने बराबर का पाप किया है- आजादी की लड़ाई के विरोध में खड़े होकर अंग्रेजों का साथ देना, फिर भारत के बंटवारे का समर्थन करना किसी से छुपा नहीं है.

सिन्हा साहिब आप तो पढ़ने में अव्‍वल रहे हैं. आपने संघ को पढ़ने पर ही ज्यादा जोर दिया है. आपने समाजवादियों और नेहरू के रिश्ते पर गलत तर्क पेश कर दिया. आप जहां बैठे हैं 'तीनमूर्ति' में, वहां दस्तावेज है. एक बार पलट कर देख लीजिए- डॉ. लोहिया और जेपी के बीच मत भेद है, मन भेद नहीं है और मत भेद का कारण केरल में बनी पहली समाजवादी सरकार है. थानू पिल्लई की सरकार ने मजदूरों पर गोलीबारी की थी तो डॉ. लोहिया ने सरकार से इस्तीफा मांग लिया था. त में आपने जेपी आंदोलन की चर्चा की. उस आंदोलन में भाग लेना आपकी मजबूरी थी, मन नहीं था. जन दबाव में आपने जेपी के कंधे का सहारा लिया. आपको याद है यहां आपने एक बार फिर साम्यवादियों की तरह तानाशाही (आपातकाल) का समर्थन किया- बीस नहीं चौबीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन कर के.

सिन्हा साहिब! आपको शुक्रिया कहता हूं, आपके ही बहाने कम से कम संघ खुले मंच पर तो आया. एक बात भूल रहा था- नाथूराम के सवाल पर आपने चालाकी से अपने आपको बचाया और एक 'महिला' ने आपको गले से लगा लिया... इसका दूसरा रुख भी है. संघ ने कभी नाथूराम की इस कायरतापूर्ण हरकत की खुले शब्दों में निंदा भी की है...?

सिन्हा साहिब, हम आप से कहीं मिले हैं...    नमस्कार.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के छात्र संघ अध्‍यक्ष रह चुके हैं। जीवन के छह दशक में टाइम्‍स ऑफ इंडिया, एनएसडी, रेलवे मंत्रालय, विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और संगठनों का पड़ाव इन्‍होंने तय किया है) 



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2 टिप्‍पणियां:

Prahar ने कहा…
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Prahar ने कहा…

चंचल जी नमस्कार आप एक बड़े पत्रकार है लेकिन माफं कीजिएगा जिस प्रकार के भाषा का प्रयोग आपने किया है वह कहां तक सही है आपने अपने जवाब में लिखा कि राकेश जी वामंपथियो को गाली दे रहे है, मैं पूरा लेख पढा है और शायद आपने भी पढा ही होगा क्या कहीं भी आपको लगा कि राकेश जी ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया है। राकेश जी ने यह लेख संवाद की प्रक्रिया को भय व बंधनमुक्त बनाने के उद्देश्य से लिखा है लिकेन लगता है कि अच्छे उद्देश्य के लिए किये जा रहे प्रयास को विफल करने में आपको महारत हासिल है। आपने संघ का जो उदहारण दिया तो मैं भी आपका संघ के बारे में कुछ बताना चाहता हूं, एक बार जामा मस्जिद के तत्कालीन इमाम बाला साहेब से मिलने झण्डेवाला कार्यलय गये लेकिन जब वह नमाज का समय होने जाने कारण वहां से जाने लगे तो बाला साहेब ने उन्हें वहीं नमाज पढने के लिए कहा ताकि और वार्ता हो सके और इमाम साहेब ने उन्ही नमाज अदा की। 1978 में दिल्ली में विद्या भारती द्वारा आयोजित 25,000 बच्चों के शिविर ‘बाल संगम’ के समापन समारोह में मंच पर बालासाहब के साथ उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम भी उपस्थित हुए थे। नवम्बर 2011 में पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी अपने लखनऊ प्रवास के दौरान शिया नेता कल्बे जब्बाद के घर गये थे। इसी प्रकार कई उदाहरण है जब संघ से जुड़े हुऐ व्यक्ति विभिन्न विचारधाराओ के मंच पर जाकर अपनी बात रखी। ताजा उदहारण ले तो राकेश जी ने संघ से जुडे होने के बावजूद अपने मंच पर वामपंथियो को न सिर्फ बुलाया बल्कि उनको गरिमापूर्ण स्थान भी दिया इसे लेकर संघ में किसी प्रकार की हाय तोबा नहीं मची इसके ठीक उलट आपका एक साथी इनके मंच पर आया तो पूरे वाम खेमे में हाय तोबा मच गई आरोप प्रत्यारोप के दौर शुरु हो गये अंतत दवाब में आकर उनको बिना किसी गलती के माफ़ी मागनी पड़ी इस प्रकरण से तो साबित होता है कि कौन संवाद को बांध कर रखना चाहता है। वैसे अपने विचारो को सिर्फ और सिर्फ अपने मंचो पर ही रखना तो कायरता है। सही मान्ये में बुद्धिजीवी तो वह जो तर्को के आधार पर व विपरित परस्थितियों में भी अपने विचारो का लोहा मनवा सके। वामपंथ का दायर दिन प्रत्तिदिन सिकुरता जा रहा है इसका एक बड़ा कारण इनकी छोटी होती मानसिकता है, किसी के किसी अन्य विचाराधारा के मंच पर चले जाने से अगर उसका विचार परिवर्तित हो जाता है तो यहां उस व्यक्ति की नहीं अपितु उसके विचार की कमी है कि वह जिस विचार से जुड़ा हुआ है उसमें इतना तर्क नहीं कि वह उसे अपने से बांध कर रख सके। मंगलेश डबराल जी के प्रकरण के बाद तो लगता है कि वर्तमान में वामपंथ के विचारक कुप मंडकुता का शिकार हो गये है जो अपने को अपने द्वारा बनाई गई बुद्धिजीवी की दुनिया के बाहर नहीं आना देना चाहते है। वामपंथी स्वपनदोष का भी शिकार हो चुके हो उन्हें लगता है कि ज्ञान पर उनका एकाधिकार है और उनके द्वारा प्रतिवादित विचार के बाहर न तो कोई विचार है न ही कोई बुद्धिजीवी।

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