5/31/2012

एक 'ठहरी हुई विचारधारा' से संवाद की इतनी उतावली क्‍यों राकेश जी?

हेडगेवार के जीवनीकार प्रो. राकेश सिन्‍हा के लेख का जवाब कवि-पत्रकार रंजीत वर्मा ने भेजा है। उन्‍होंने अपने जवाब में आवाजाही को लेकर फैले आग्रहों के पीछे की राजनीतिक साजि़श को पकड़ा है और इस संदर्भ में संघ पर कुछ सवाल खड़े किए हैं।   



रंजीत वर्मा
आवाजाही के हक में जो लोग हैं उन्होंने लंबे-लंबे लेख तो लिखे हैं लेकिन कहीं भी इस आवाजाही को परिभाषित करने की कोशिश नहीं की है। फिर भी उनके लेखों से आवाजाही का जो आशय निकल कर सामने आता है वह यह है कि कोई भी अगर विपरीत विचारधारा के मंच पर जाता है तो इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये बल्कि इसे बढ़ावा देना चाहिये। क्योंकि अब जैसा कि सभी लोग एक स्वर में मान रहे हैं कि समय बदल गया है- जिसे हम यों भी कह सकते हैं कि जिस तरह से कोई जाति अछूत नहीं रही उसी तरह से कोई विचार भी अछूत नहीं रहा। या फिर इसको राकेश सिन्हा के शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि ''दुनिया में अनेक बदलाव आये हैं। बंद दिमाग और बंद समाज नापसंद किया जा रहा है।'' अगर सचमुच यही आशय है उनका जो आवाजाही के हक में खड़े हैं, तो अचानक कई सवाल हैं जो मन में घुमड़ने लगते हैं।



पहला सवाल तो यह है कि आखिर इस बात पर जोर क्यों दिया जा रहा है कि विपरीत विचारधारा वालों के मंच पर जाया जाए? ऐसे बहुतेरे मंच हैं, जैसे कि वर्चुअल स्पेस से लेकर अखबार, पत्रिकाएं और कई सारी अकादमियां और विश्‍वविद्यालय जहां इस तरह के संवाद होते हैं और हो भी रहे हैं। फिर क्या जरूरत है संवाद करने के लिए एक निश्चित चेहरे वाले मंच पर जाने की? दरअसल देखा जाए तो संवाद अपने समय से किया जाता है यानी कि समय पर जिसकी पकड़ होती है, वही संवाद करने में भी सक्षम होता है। यहां किसी व्यक्ति, किसी मंच की जरूरत नहीं पड़ती। जरूरत शायद उसे पड़ती है जो अपनी सक्षमता को लेकर आशंकित होता है- या तो व्यक्तिगत मेधा की भारी कमी की वजह से या फिर वह जिस वैचारिक ज़मीन से आता है उसकी संदिग्धता की वजह से। किसी भी धर्म या जाति के बाहर भी इंसान हैं, इसलिए कोई भी ऐसा विचार जो धर्म या जाति से नाभिनालबद्ध है वह कभी भी समस्त मानव समुदाय की बात नहीं कर सकता। यहीं लगे हाथ यह भी कहा जा सकता है कि संवाद चूंकि समाज में वैसे भी कम हो गया है इसलिए कम से कम समानधर्मा विचार वालों को चाहिये कि वे एक ऐसा पब्लिक प्लेटफॉर्म तैयार करें जिसमें जनता की भी समान रूप से भागीदारी संभव हो सके। 



दूसरा सवाल यह है कि सिर्फ एक को ही क्यों बुलाया जा रहा है और सिर्फ उससे ही क्यों उम्मीद की जा रही है कि वह आये? वे जवाब में कह सकते हैं- क्योंकि वे एक बड़े कवि हैं या पत्रकार हैं या बुद्धिजीवी हैं और अपने किसी तय विषय पर वे उनके विचार सुनना चाहते हैं तो इसमें बुरा क्या है। ठीक है, कोई बुराई नहीं है, लेकिन अगर उनके साथ उनकी ही विचारधारा के और हजार पांच सौ लोग चले जाएं उनकी गोष्‍ठी में, तब? उनका जवाब हो सकता है कि बहुत अच्छी बात होगी तब तो, स्वागत है सबका। अगर वे सचमुच ऐसा बोलते हैं तो इससे बड़ा झूठ उन्होंने शायद ही कभी कहा होगा। क्योंकि ऐसा कभी देखने में नहीं आया कि साथ में उन्होंने और भी तमाम लोगों को बुलाया हो।

अब जैसे कि राकेश सिन्हा की संस्था इंडिया पॉलिसी फाउन्डेशन ने मंगलेश डबराल को बुलाया लेकिन उन्होंने उनके ही संगठन जन संस्कृति मंच से किसी और को नहीं बुलाया। यानी कि आप समझ सकते हैं मेरा सवाल मात्रात्मकता को लेकर है। वे बतायें कि आखिर कितने लोगों की एक साथ आवाजाही होनी चाहिये? यह जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि एक को बुलाने पर ऐसा लगता है मानो उसका शिकार करने को बुलाया जा रहा है। और दूसरी बात यह लगती है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला जो श्रेष्ठ मस्तिष्क है, वह सब एक पावर स्ट्रक्‍चर के अंदर आ जाये। यह खतरनाक कोशिश है जो सभी स्तरों पर चल रही है। साहित्य में भी और अन्य बुद्धिजीवियों के बीच भी। राजनेताओं और कॉरपोरेट हस्तियों ने तो इसकी शुरुआत ही की है। क्या यह संसद के बाहर एक संसद बनाने की कोशिश है जहां उनके चुने हुए बुद्धिजीवी बैठें और बहस मुबाहिसे कर विरोधी विचारधारा वालों के साथ परस्पर 'सहयोग करें'। यहां मैं यह सवाल नहीं करूंगा कि चुने हुए सांसदों के बीच ऐसी क्या बहस होती है कि उसे प्रेरणादायी माना जाए और बाहर एकदम विपरीत विचारधारा वाले बुलाये गये बुद्धिजीवियों की एक संसद लगायी जाए, लेकिन यह सवाल मैं जरूर करूंगा कि क्या है वह सहयोग जिसे करने के लिए संसद लगाने की बेचैनी एक तबके में देखी जा रही है, जिसका प्रतिनिधित्व करते हुए राकेश सिन्हा अपने लेख में कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो वह 'बौद्धिक कायरता' और 'मानसिक विकलांगता' मानी जाएगी? इसी सवाल के साथ यह सवाल भी मैं जरूर करूंगा कि कॉरपोरेट हस्तियां आपस में मिल कर एक दूसरे को सहयोग करते हुए लूट का जो नक्‍शा तैयार किये बैठी हैं या वे राजनीतिज्ञ जो इस लूट और हत्या में समान रूप से साझीदार बने हुए हैं, आखिर कैसे संघी बुद्धिजीवियों को प्रेरित कर रहे हैं? खैर, वे चाहे जैसे भी प्रेरित हो रहे हों, लेकिन सवाल तो यह है ही कि वे वामपंथियों को इसमें क्यों घसीटना चाहते हैं। क्या अपनी प्रामाणिकता के लिए? बौद्धिक जगत में अपनी स्वीकृति के लिए? और साथ ही वामपंथी कुशाग्रता को संदेह के कठघरे में खड़ा कर देने के लिए?



राकेश सिन्हा ने अपने लेख में जेपी का उदाहरण बहुत सही दिया है। सन 74 के इस छात्र आंदोलन से लेकर 77 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बीच सबसे बड़ा फायदा जनसंघियों को हुआ। ये अपनी दीया छाप छवि से इन्हीं सालों में उबरे और सन अस्सी के बाद जब जनता पार्टी की सरकार गिर गयी और जनता पार्टी टूटी, तो पुराने संघियों ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। लेकिन इस पार्टी का चेहरा पुराने जनसंघ के चेहरे से बिल्कुल भिन्न था क्योंकि इसमें ऐसे कई युवा भी शामिल थे जिन्होंने राजनीति की शुरुआत 74 के इस छात्र आंदोलन से की थी यानी कि जिनकी कोई संघी पृष्ठभूमि नहीं थी। इन सबके परिणामस्वरूप समाज में राजनीतिक रूप से इन्हें व्यापक स्वीकृति मिली। राजनीतिक रूप से सफल होने वाले अपने इसी प्रयोग को वे बौद्धिक दुनिया में भी आजमाना चाहते हैं। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें मार्क्‍सवादियों का साथ चाहिये।



राकेश सिन्हा को अपनी तरफ से सबसे बड़े बुद्धिजीवी के रूप में संघ ने सामने रखा है ताकि वामपंथी बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हों और संवाद के लिये तत्पर हों। अगर बौद्धिकता का यही स्तर उनका सर्वोच्च है, तो मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि किसी भी तरह की समझदारी भरी बातचीत इन संघियों से नहीं की जा सकती है। खामख्‍वाह  ये संवाद के लिए लालायित होकर खुद को कुंठित कर रहे हैं। देखिये, अपने पहले ही पैराग्राफ में वे क्या लिखते हैं- ''वामपंथ से जुड़ी बौद्धिक धारा अभी भी साठ व सत्तर के दशक में ही ठहरी हुई है। इस ठहराव को दूर करने के सभी प्रयासों पर रेड ब्रिगेड का हल्ला बोल शुरू हो जाता है।'' मैं यहां यह नहीं कहूंगा कि मिराजकर वाला प्रकरण जो उन्होंने रखा है उसे बिना ऐतिहासिक समझ के रखा है (क्योंकि यह समझ उनके पास है ही नहीं। इस समझ को विकसित करने के लिए ऐतिहासिक व द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समझ जरूरी होती है जो उन्हें हेडगेवार दे नहीं सकते थे) यानी कि तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर रखा है। मैं यह भी नहीं कहूंगा कि 67 में नक्सलबाड़ी के आंदोलन ने एक बौद्धिक विस्फोट को जन्म दिया था जिसे दुनिया ने बसंत के वज्रनाद के रूप में जाना, फिर वे कैसे मिराजकर के उदाहरण को सत्तर के दशक की मार्क्‍सवादी बौद्धिकता की परख मान रहे हैं। मैं इस तरह के कोई सवाल उनसे नहीं करूंगा। हां, मैं उनसे यह जरूर पूछूंगा कि आज वामपंथ की बौद्धिक धारा अगर साठ व सत्तर के दशक में ठहरी हुई है तो वे उनसे संवाद क्यों करना चाहते हैं? वे इस ठहराव को दूर करने के प्रयास क्यों कर रहे हैं? मर जाने दें उन्हें अपनी मौत। एक अप्रासांगिक विचारधारा जी कर भी क्या करेगी?



अपने लेख के अंतिम से तीसरे पैराग्राफ में वे लिखते हैं- ''यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि परंपरागत खांचों में बंद होकर हम नवसाम्राज्यवादियों एवं विदेशी एवं देशी  पूंजी की सांठगांठ का मुकाबला नहीं कर पायेंगे।'' यह तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन वे पहले यह तो बतायें कि विदेशी व देशी पूंजी से वे क्यों लड़ना चाहते हैं? फिर यह भी बतायें कि अगर उन्होंने लड़ाई शुरू कर दी है तो वे कौन सी रणनीति अपनाये हुए हैं? जो कुछ भी रणनीति उन्होंने अपना रखी है, उसके बारे उनके अलावा और किसी को जानकारी है या नहीं? वे यह भी बतायें कि उन्होंने जो रणनीति अपनायी है वह माओवादियों से कितनी भिन्न है? साथ ही वे यह भी बतायें कि एक-दो ही साझा कार्यक्रम चलाने के लिए माओवादियों से उन्होंने बातचीत की या नहीं? अकेले खड़े हैं वे कॉरपोरेट लूट के खिलाफ! जान गंवा रहे हैं अपनी! ओह! यह मैं क्या कहने लगा! आप भला माओवादियों से क्यों बात करेंगे? ओह, यह तो आप ही हैं जो छत्तीसगढ़ में उनकी जान ले रहे हैं। यह तो आप ही हैं जो उड़ीसा में बीजद के साथ मिलकर उनके सफाये में लगे हैं।



फिर आप कैसे लड़ रहे हैं विदेशी-देशी पूंजी की सांठगांठ से, जो आप बिल्कुल महफूज हैं? आप कहते हैं अमेरिका पड़ा है आपके पीछे! तो यह भी बताइये कि अब तक क्या-क्या किया उसने आपके साथ? क्या सोवियत संघ में आपका ही शासन था जो अमेरिका की आंखों में खटकता था? अमेरिका के पांवों में कील सा चुभता क्यूबा का राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो आपके स्कूल का छात्र है कोई? और चे ग्वेवारा- जिसे बोलीविया के जंगल में घेर कर मारा अमेरिका ने और जिसे मारने के लिए करोड़ों डॉलर बहा दिये उसने- वह क्या कोई संघी था? अमेरिका के साथ युद्धाभ्यास कर चुकी भारतीय सेना माओवादियों के खिलाफ उतर चुकी है। आपको मारने किसकी सेना आगे बढ़ रही है?


मुझे किसी की कविता की दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

एक नंबर के गद्दार और फरेबी हो तुम
मैं नहीं मेरे कारतूस बात करेंगे तुमसे।



   
बहस को फॉलो करने के लिए नीचे के लिंक देखें :

साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं...
मुझे नए कठघरों से परहेज़ नहीं
अनंतर का लोकतंतर ऐसा ही होता है
मंगलेश, तुम्‍हारी चूक पर मैं हैरान हूं
हिंदी लेखकों को वहम है कि मार्क्‍सवादी होना ही राजनीतिक होना होता है
हिंदी साहित्‍य और गुल्‍ल्‍क भरने की सुविधाजनक राजनीति

    

   



  





 

   



         


2 टिप्‍पणियां:

Mohinder ;mnthakur2009@gmail.com; ने कहा…

kindly read once more whatever you have written and you will realise your folly!! Halla bol brigade, as rakesh sinha expressed his apprehension that more stones would be thrown by them, became active. You are nothing more ranjit Verma than a camp follower of Halla bol.I laughed by after going through your piece. I request Jupud to contact some articulated Marxist to respond Sinha , otherewise people willchange their impression regarding Marxist scholars!! thanks Mohinder

Prahar ने कहा…

रंजीत वर्मा जी आपके परिचय में कहा गया है कि आपमें कवि-पत्रकार दोनो के गुण है लेकिन माफ किजियेगा आपने जो यह जबाव लिखा है इस में दोनो का ही अभाव दिखाई पड़ता है। आपने जो सबसे पहला सवाल उठाया है उसमें आपने कहा किसी मंच पर जाकर संवाद वही करता है जो अपनी सक्षमता को लेकर आशंकित होता है- या तो जिसमें मेघा की कमी होती है, महात्मा गांधी संवाद को सबसे कारगर हथियार मानते थे उन्होने अपने जीवन में इसका भरपूर प्रयोग भी किया फिर व चाहे खिलाफत आन्दोलन के वक्त मुस्लमानो से संवाद स्थापित करना हो या महोम्द अली जिन्ना से किया गया संवाद हो।तो क्या आपके कथनि के अनुसार महात्मा गांधी के अन्दर प्रतिभा,बौधिकता की कमी थी। राकेश जी अपनी लेखनी में नेहरु-जेपी के बीच संवाद का उदहारण दिया है, जेपी ने कहा था कि अगर संघ फासिसट है तो मैं भी फासिसट हूं तो यहां अगर आपके कुटिल चश्मे से देखे तो नेहरु व जेपी दोनो ही प्रतिभाहीन थे। आपने दूसरा सवाल उठाया है कि सिर्फ एक को ही क्यों बुलाया तो यहां आपको मंगलेश जी के विपरित मंच पर जाने की चुभन है या हमारे द्वारा उनको बुलाये जाने से आप परेशान है। लगता आपने अपना सारा ज्ञान बिना राकेश जी के पूरा लेख को पढे ही उढेल दिया है। राकेश जी ने अपने आलेख में जिक्र किया उनके प्रतिष्ठान को बने अभी तीन साल ही हुए इन तीन सालो में कमर आगा, अमिताब मटु, रामशरण जोशी, अभय कुमार दूबे, जैसे लोगो विभिन्न कार्यक्रमों में शिरकत की है। इन सभी लोगो नें संवाद के महत्व को समझा इसलिए इन्हें संघ सर्मथित राकेश जी के मंच पर जाने में परहेज नहीं किया। अगर आप जैसा प्रमामपत्र दाता हो तो उसेक अनुसार अपने अपने क्षेत्र के इन दिग्जों में प्रतिभा की कमी है और इनकी बौद्धिक पृष्ठ भूमि कमजोर है। इन लोगो को अपने बौद्धिकता, क्षमता, प्रतिभा को साबित करने के लिए आप जैसे हल्ला- बोल बिग्रेड के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
आपने जब एक उदहारण में 74 के आन्दोलन में छात्रो की भागी दारी की बात कही तो आपके यह भी ज्ञान होना चाहिए की इस आन्दोलन में अखिल भारतीय विर्धाथी परिषद ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया था जो संघ की एक छात्र ईकाई है। CPM के नेता ए.के गोपालन नें आपतकाल में संघ की भूमिका की सार्वजनिक रुप से तारीफ की थी। आप एक कवि है एक कवि को इतिहास की जानकारी होनी चाहिए आपने लेखनी तो बहुत कर लिया है कभी कभी तोड़ा पढ भी लेना चाहिए।
जिस प्रकार से मंगेलश डबराल व उदय प्रकाश पर परस्पर आक्रमण हुआ है तो क्या साहित्य व बौधिकता को ट्रेड यूनियन के अधीन कर देना चाहिए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लेकर जिस प्रकार से संघ के वरिष्ठतम नेता दतो पंत ठेंगड़े व स्वदेशी जागरण मंच ने संघर्ष किया है क्या उस स्तर तक जाकर किसी वामंपथी ने काम किया है।
आप जैसे लोग जब वैचारिक धरातल पर जब अपने को खड़ा करने में अक्षम हो जाते है तो आप अपनी कुख्यात हाल बोल नीती आ जाते है और मरने मारने की बात कहने लगते है।आपका विचार बुद्धी के विवेक रुपी खांचे से नहीं अपितु बन्दुक के नली से निकता है।
नवनीत

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