6/06/2012

बिहार में लगी आग, तो दिल्‍ली के संपादकों ने छोड़ा धुआं...

पिछले हफ्ते मुखिया की हत्‍या के बाद उधर बिहार जल रहा था, इधर राष्‍ट्रीय कहे जाने वाले अखबारों के संपादकों के पश्चिम से धुआं उठ रहा था। यह लेख दिल्‍ली से छपने वाले कुछ 'राष्‍ट्रीय' अखबारों को एक के बाद एक भेजा गया था छापने के लिए। दो संपादकों के बयानों पर गौर कीजिएगा- 'यह काफी संवेदनशील मामला है' और 'यह तो कॉन्‍ट्रोवर्सियल विषय है'। दिल्‍ली के किसी अखबार ने 'संवेदनशील' और कॉन्‍ट्रोवर्सियल' मुद्दे पर लिखा यह लेख नहीं छापा। मुखिया की हत्‍या में कौन सी 'संवेदना' और 'कॉन्‍ट्रोवर्सी' है, ये तो 'राष्‍ट्रीय' संपादक ही बेहतर जानें, लेकिन अब भी लखनऊ और पटना में कुछ पानी बचा है। आज लखनऊ से छपने वाले डेली न्‍यूज़ एक्टिविस्‍ट (डीएनए) ने यह लेख छापा है और कल पटना से प्रकाशित होने वाले नवबिहार में यह छप रहा है। इसे पढ़ा जाना चाहिए और तथाकथित क्षेत्रीय अखबारों को उनके हक़ का धन्‍यवाद दिया ही जाना चाहिए।

शो मस्‍ट गो ऑन?

रंजीत वर्मा


ये खलनायकों के महानायक कहे जाने के दिन हैं। ये मासूमों को साफ कर देने और हत्यारों के साफ छूट जाने के दिन हैं। यहां मातम के हजार कारण हैं लेकिन सफल लोग कहते हैं- शो मस्ट गो ऑन। कैसा शो? यही, जो बिहार में देखने को मिल रहा है। जिस तरह वे आग का खेल खेलते, बंदूक लहराते ब्रहमेश्‍वर मुखिया के शव को लिए आरा से पटना तक आये, क्या यही शो? सोलह साल हो गये जब बथानी टोला हुआ, लेकिन आज तक क्यों एक को भी इस जुर्म के लिये सजा नहीं हो पायी? क्यों उनमें से कुछ पकड़ में आने के बाद भी पटना उच्च न्यायालय से रिहा कर दिये गये? हिंदू में खबर आयी कि उसके रिपोर्टर से बिहार के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि ऐसा सुना जा रहा है कि बथानी टोला के कातिलों को बरी करने के लिए बिहार सरकार ने पटना उच्च न्यायालय को प्रभावित करने की कोशिश की थी। यानी कि निचली अदालत से जो इन लोगों को सजा सुनायी गयी थी, वह सही थी और उन्हें पक्का यकीं था कि अगर अपीलीय अदालत यानी कि पटना उच्च न्यायालय को प्रभावित नहीं किया गया तो वे छूट नहीं पायेंगे। छोडि़ये, अब इस विस्तार में जाने की क्या जरूरत है। कुछ इधर-उधर की बात हो गयी तो अदालत कहेगी कि उसकी अवमानना की जा रही है। लेकिन फैसला जो आया है, वह तो जन संपत्ति का हिस्सा है। उस पर तो बात की ही जा सकती है।



हालांकि इस फैसले पर भी आप क्या बात करेंगे। अभियोजन पक्ष के एक भी गवाह को अदालत ने सच्चा नहीं पाया। किसी न किसी वजह से उसे लगा कि सभी झूठ बोल रहे हैं। वह भी, जिसकी आंखों के सामने कई लोगों सहित उसके बच्चों और पत्नी का कत्ल कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि वह कैसे बच गया जबकि वह जिस गड्ढे में छिपकर सब देखने की बात कर रहा है वह मात्र चार से पांच फुट गहरा था। अदालत ने इस बात में भी झोल देखा कि घटना ढाई बजे दिन की है और पुलिस चौदह घंटे बाद अगले दिन साढ़े चार बजे सुबह घटनास्थल पर जब पहुंचती है तो यही आदमी यानी कि किशुन चैधरी पुलिस को पूरी घटना के बारे बताता है। तो आखिर चौदह घंटे वह कहां रहा? क्या उसी गड्ढे में? इस पर वह क्यों चुप है? ध्यान देने की बात है कि जिरह में उससे ऐसा कोई सवाल नहीं किया गया था जो वह उसका जवाब देता, फिर भी कोर्ट ने पता नहीं क्यों इसे उसकी चुप्पी समझा और उस पर शक किया। वैसे वह अकेला नहीं था पूरी घटना को देखने वाला। और भी लोग थे। कोई कह रहा था कि वह टोले के पीछे के बंसवाड़ी में छुपा था जबकि कोई कह रहा था कि वह वहीं जो झाडि़यां थीं उसी में छुपा था। और कोई कह रहा था कि वह घर के पिछवाड़े के जंगल में छुपा था। कोर्ट ने कहा कि ये सारी चीजें घर के बगल में एक साथ कैसे हो सकती हैं। यह भी कैसे हो सकता है कि वही आदमी कभी झाड़ी बोलता है तो कभी जंगल बोलता है। इनमें से कुछ गवाहों को उच्च न्यायालय ने इसलिये भी नहीं माना कि क्योंकि अदालत में उनसे जिरह किया ही नहीं गया था। बहरहाल अंत आते-आते कोर्ट को इस निष्कर्ष पर पहुंचते थोड़ी भी देर नहीं लगी कि घटना के वक्त ये सब घटनास्थल पर थे ही नहीं, इसलिये इनकी गवाही को विश्‍वसनीय नहीं माना जा सकता।



पटना उच्च न्यायालय ने सहार थाना के ऑफिसर इनचार्ज- जो इस मामले के जांच अधिकारी भी थे- की गलती का फायदा भी अभियुक्तों को पहुंचाया। कोर्ट ने कहा कि एफआइआर में उसके दर्ज किये जाने की तारीख तो है लेकिन समय नहीं लिखा गया है। जिस वायरलेस मैसेज पर पुलिस बथानी टोला पहुंची थी उसका हवाला एफआइआर में नहीं दिये जाने को भी अदालत ने काफी माना अभियुक्तों को छोड़ देने के लिये। एक बात और ध्यान देने की है कि निचली अदालत ने 3 मई 2011 को इन्हें सजा सुनायी थी और इसके बाद 11 महीने के अंदर ही उच्च न्यायालय अपना फैसला सुना देता है। लंबित मामलों से परेशान अदालत में यह तेजी गौर करने लायक है। इन अभियुक्तों को रिहा करने की बेचैनी आखिर किसे थी और क्यों थी? क्या ऐसा नहीं लगता है कि अगर उच्च न्यायालय सही फैसला सुनाता तो एक बार फिर बिहार में जातीय संघर्ष की जो आशंका जतायी जा रही है, वह स्थिति शायद नहीं होती?



यह सवाल बिहार सरकार या ब्रहमेश्‍वर मुखिया के समर्थकों या हत्यारों को चकित करे या नहीं लेकिन दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को इसने ज़रूर चकित कर दिया। 1 जून को हुई मुखिया की हत्या के ठीक दो दिन पहले दुनिया भर के 300 बुद्धिजीवियों ने, जिसमें कि नॉम चॉम्‍सकी भी शामिल हैं, भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर इस न्याय व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। यही पत्र बिहार सरकार को भी भेजा जाना  चाहिये था जो इस फैसले पर चुप्पी साधे बैठी थी। 7 मई 2012 को मुखिया ने बिहार सरकार को धमकाते हुए कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की न सोचे। भला ऐसी सरकार से गुहार लगाने का भी क्या फायदा जो एक अपराधी की धमकी के सामने हथियार डाले बैठी थी। इसे कहीं से अतिशयोक्तिपूर्ण बात समझने की जरूरत नहीं। देखा नहीं आपने, जिस दिन वे वारदातों को अंजाम देते आरा से पटना आ रहे थे, उस दिन राज्य के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों कानून व्यवस्था की चिंता ताक पर रख कर पटना से गायब हो गये थे।



खैर यह सब तो जो है वह तो है ही, लेकिन एक सवाल और है जो हालांकि इस घटना से थोड़ा हट कर है पर किसी को भी परेशान कर देने के लिये काफी है। सोचने वाली बात है कि बिहार का पूरा विपक्ष जिस तरह से बिना यह चिंता किये कि इससे किसानों की छवि खराब होगी छाती पीट-पीट कर ब्रहमेश्‍वर मुखिया को किसान नेता कह रहा है, क्या यह अपने आप में कम शर्मनाक और भ्रामक है? समय आ गया है कि किसान अब सिर्फ उसे ही कहा जाये और समझा जाये जो जमीन जोतने-बोने का काम खुद करते हैं न कि उन्हें जो जमीन के मालिक बने बैठे हैं और खेती का काम करने वालों को खेत मजदूर कहते हैं और फिर मजदूरी के सवाल पर खतरनाक इरादों के साथ बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जैसी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं।    

 

                    


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