6/10/2012

न्याय की बैसाखी पर मौत की इबारत



अंजनी कुमार
8 जून 2012... सेशन कोर्ट, इलाहाबाद। सुबह 11 बजे से न्याय के इंतज़ार में हम लोग खड़े थे। सीमा आज़ाद और विश्वविजय कोर्ट में हाजि़र नहीं थे। वकील ने बताया कि जज साहब दोपहर बाद ही बैठेंगे, वह अभी भी 'न्याय' को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं। हम लोगों के लिए इस व्यस्तता को जान पाना व देख पाना संभव नहीं था। कमरा न. 23 के आसपास गहमागहमी बनी हुई थी। तेज धूप और उमस में छाया की तलाश में हम आसपास टहल रहे थे, बैठ रहे थे और बीच-बीच में कोर्ट रूम में झांक आ रहे थे कि जज साहब बैठे या नहीं। सीमा की मां, बहन, भाई, भांजा व भांजी और कई रिश्तेदार व पड़ोसी इस बोझिल इंतज़ार को एक उम्मीद के सहारे गुज़ारने में लगे थे। मैंने अपने दोस्त विश्वविजय के चचेरे भाई और वकील के साथ बातचीत और इलाहाबाद विश्वविद्यालय को देख आने में गुज़ार दिया।



विश्‍वविजय और सीमा आज़ाद


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस लॉन में जहां हम लोगों ने पहला स्टडी सर्किल शुरू किया था, वहां बैठना मानो एक शुरूआत करने जैसा था। 1993 में बीए की पढ़ाई करते हुए विकल्प छात्र मंच और बाद में इंकलाबी छात्र सभा को बनाने का सफ़र यहीं से हमने शुरू किया था। विश्वविजय रिश्ते में भवदीय था लेकिन छात्र जीवन और राजनीति में हमसफ़र। हम आपस में बहुत लड़ते थे। इस लड़ने में हम लोगों के कई हमसफ़र थे। हम जितना लड़ते, हमारे स्टडी सर्किल और संगठन का विस्तार और उद्देश्यों की एकजुटता उतनी ही बढ़ती गई। 1996 के अंत में मैं गोरखपुर चला गया। इलाहाबाद से प्रस्थान करने तक विश्वविजय शाकाहारी से मांसाहारी हो चुका था, खासकर मछली बनाने में माहिर हो चुका था। वह एक अच्छा कवि बन चुका था और प्रेम की धुन में वह रंग और कूची से प्रकृति को सादे कागज़ पर उतारने लगा था। उसके बात करने में व्यंग्‍य और विट का पुट तेजी से बढ़ रहा था। 1997 में गांव के और वहां के छात्र जीवन के अध्ययन व इंकलाबी छात्र सभा के सांगठनिक विस्तार के लिए मैं पूर्वांचल के विशाल जनपद देवरिया चला गया। बरहज, लार, सलेमपुर, गौरीबाजार, चौरीचौरा, खुखुन्दु आदि कस्बों व गांवों पर वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की गहरी पकड़ बढ़ती जा रही थी। दो बार लगभग 35 किमी का लंबा दायरा चुनकर रास्ते के गांवों का अध्ययन किया। इसमें न केवल गांव की जातीय व जमीन की संरचना एक हद तक साफ हुई, साथ ही अपने जातीय व वर्गीय पूर्वाग्रह भी खुल कर सामने आए। इस बीच विश्वविजय से मुलाकात कम ही हुई। इंकलाबी छात्र सभा के गोरखपुर सम्मेलन में विश्वविजय से मुलाकात के दौरान वह पहले से कहीं अधिक परिपक्व और मज़बूत लगा। वह छात्र मोर्चे में पड़ रही दरार से चिंतित था। 1999 में मैं बीमार पड़ा। महीने भर के लिए इलाहाबाद आया। उस समय तक इंकलाबी छात्र सभा की इलाहाबाद इकाई में दरार पड़ चुकी थी। आपसी विभाजन के चलते साथियों के बीच का रिश्ता काफी तंग हो चुका था। इन सात सालों में हम सभी दोस्तों के बीच जो बात मुख्य थी वह सामाजिक सरोकारों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना थी और लोगों को पंगु बनाने की नीति के प्रति गहरी नफ़रत थी। सन 2000 में ऑपरेशन के लिए दिल्ली आना पड़ा और फिर यहीं का होकर रह गया। इस बीच विश्वविजय से बहुत कम मुलाकात हुई। दो बार गांव में और दो बार इलाहाबाद। मेरा इंकलाबी छात्र सभा से रिश्ता टूट चुका था। विश्वविजय इस मोर्चे पर डटा रहा। वह इस बीच गांवों के हालात के अध्ययन के लिए इलाहाबाद के आसपास गया। उसने मुलाकात के समय फूलपुर के किसानों और शंकरगढ़ के दलित व आदिवासी लोगों के जीवन के बारे में काफी कुछ बताया। बाद के दिनों में विश्वविजय से सबसे अधिक मुलाकात और बात नैनी जेल में हुई। हम दोनों के बीच लगभग बीस सालों के बातचीत के सिलसिले में परिवार का मुद्दा हालचाल जानने के उद्देश्य से आता था। लेकिन इस 8 जून को यह सिलसिला भी टूट गया।

शाम पांच बजे 'न्याय की इबारत' सुनने के बाद सारी बेचैनी को समेटे हुए कोर्ट से बाहर आने से पहले विश्वविजय से गले मिला और कहा- 'जल्दी ही जेल में मिलने आऊंगा।' वह काफी शांत था। व्यंग्‍य और विट की भाषा कभी न छोड़ने वाला विश्वविजय मेरा हाथ पकड़े हुए भवदीय रिश्ते की भाषा में लौट आया। मानो लगा कि हम 1992 की चौहद्दी पर लौट गए हों- गांव से आए हुए दो नवयुवकों और हम दोनों को गाइड करने, भोजन बनाकर खिलाने वाले मेरे अपने बड़े भाई के सान्निध्‍य में। मेरे बड़े भाई हम दोनों के इलाहाबाद आने के बाद एक साल में ही नौकरी लेकर इलाहाबाद से चले गए। और फिर भाईपने से मुक्त हम दोनों अलग-अलग इकाई थे। और इस तरह हम एक जुदा, स्वतंत्र और एक मक़सद की जि़ंदगी जीते हुए आगे बढ़ते गए। हमारा समापवर्तक जो बन गया था, उससे हमारा परिवार भी चिंतित था। पर, उस कोर्ट में हम 1992 की चौहद्दी पर लौट गए थे। विश्वविजय कोर्ट में जिम्मेदारी दे रहा था- ''अम्मा बाबूजी को संभालना...हां...ख्याल रखना...।' मैं कोर्ट से बाहर आ चुका था।

लौटते समय मेरा दोस्त संयोगवश मुझे उन्हीं गलियों से लेकर गया जहां मेरे गुरु और हम लोगों के प्रोफेसर रहते थे, जहां हमने इतिहास और इतिहास की जि़म्मेदारियों को पढ़ा और समझा था। यहीं मैंने लिखना सीखा, यहीं अनगढ़ कविता को विश्वविजय ने रूप देना सीखा। हम उन्हीं गलियों से गुज़र रहे थे- अल्लापुर लेबर चौराहे से- मज़दूरों और नौकरी का फॉर्म भरते व शाम गुज़ारते हज़ारों युवा छात्रों की विशाल मंडी से। इन रास्तों से गुज़रना खुद से जिरह करने जैसा था। सिर्फ सीमा और विश्वविजय के साथ कोर्ट में न्यायाधीश के द्वारा किए व्यवहार से, उसके 'न्याय' से जूझना नहीं था। हम जो पिछले बीस साल गुज़ार आए हैं, जिसमें हमारे लाखों संगी हैं और लाखों लोग जुड़ते जा रहे हैं, उनकी जि़ंदगी से जिरह करने जैसा।


लगभग छह महीने पहले गौतम नवलखा ने सीमा आज़ाद का एक प्रोफाइल बनाकर भेजने को कहा। मैंने लिखा और भेज दिया। उसे उस मित्र ने कहां छापा, पता नहीं। मैं इस उम्मीद में बना रहा कि आगे विश्वविजय और सीमा का प्रोफाइल लिखने की ज़रूरत नहीं होगी। कई मित्रों ने कहा कि लिखकर भेज दो, पर एक उम्मीद थी सो नहीं लिखा। लिखना जिरह करने जैसा है। इस जिरह की जरूरत लगने लगी है। यह जानना और बताना ज़रूरी लगने लगा है कि सीमा और विश्वविजय के जीवन का मसला सिर्फ मानवाधिकार और उसके संगठन से जुड़कर चलना नहीं रहा है। सीमा एक पत्रिका की संपादक थी और उससे सैकड़ों लोग जुड़े हुए थे। विश्वविजय छात्र व जनवाद के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहा। और कम से कम इलाहाबाद के लोगों के लिए कोई छुपी और रहस्यपूर्ण, षडयंत्रकारी बात नहीं थी यह। यह एक ऐसा खुला मामला था जिसे सारे लोग जानते थे और कार्यक्रमों के हिस्सेदार थे। सीमा आज़ाद का यह प्रोफाइल अपने दोस्तों के लिए एक रिमाइंडर की तरह है:

6 फरवरी 2010 की सुबह इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर रीवांचल टेªन से उतरते ही सीमा व उनके पति विश्वविजय को माओवादी होने व राज्य के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। दोनों के ऊपर यूएपीए- 2005 के तहत मुकदमा ठोक दिया गया। इसके बाद कोर्ट में एक के बाद एक ज़मानत की अर्जी पेश की गई, पर हर बार यह अर्जी खारिज कर दी गई। ज़ाहिरा तौर पर ज़मानत न देने के पीछे सीमा आज़ाद के खतरनाक होने का तमगा ही राज्य के सामने अधिक चमक रहा होगा। आज जब लोकतंत्र पूंजी, कब्ज़े व लूट की चेरी बन जाने के लिए आतुर है, तब खतरनाक होने के अर्थ भी बदलता गया है। मसलन, अपने प्रधानमंत्री महोदय को युवाओं का रेडिकलाइजेशन डराता है। इसके लिए राज्य मशीनरियों को सतर्क रहने के लिए वे हिदायत देते हैं। सीमा आज़ाद उस दौर में रेडिकल बनीं जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं हुआ करते थे। तब उन्होंने विश्व बैंक के तहखानों से निकल कर इस देश के वित्त मंत्री का पद संभाला था। साम्राज्यवादियों के इशारे पर उन्होंने खुद की बांह मरोड़ लेने की बात कही थी। इसके बाद तो पूरे देश के शरीर को ही मरोड़ने का सिलसिला चल उठा। उस समय सीमा आज़ाद का नाम सीमा श्रीवास्तव हुआ करता था। उसने इलाहाबाद से बीए की पढ़ाई की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एमए किया। 1995 तक ब्रह्मांड की गतिविधियों में ही उसकी ज्यादा रुचि बनी रही। बृहस्पति के चांद जो लड़ी की तरह दिखते हैं उसे वह टेलीस्कोप से घंटों देखती रहती थी। देर रात तक ग्रहों व तारों की तलाश में वह पिता से कितनी ही बार डांट खा चुकी थी। उस समय तक देश पर उदारीकरण की अर्थनीति का राजनीति व आम जीवन पर असर खुलकर दिखने लगा था। सीमा ने ब्रह्मांड की गतिकी को जेडी बरनाल की पुस्तक हिस्टरी ऑफ साइंस के माध्‍यम से समाज की गतिकी के साथ जोड़कर देखना शुरू किया। समसामयिक विज्ञान व दर्शन में आई हुई रुकावट में उसने अपने समाज की गति के सामने बांध दिए गए बंधों को समझना शुरू किया। 1995-96 में छात्र व महिला मोर्चे पर उसकी गतिविधियां बढ़ने लगीं। जूलियस फ्यूचिक की पुस्तक 'फांसी के तख्ते से' को पढ़कर वह सन्नाटे में आ गई थी। उसे पहली बार लगा कि समाज की गति पर बनाई गई भीषण रुकावटें वहीं तक सीमित नहीं हैं। ये रुकावटें तो मनुष्य के जीवन की गति पर लगा दी जाती हैं। सीमा श्रीवास्तव नारी मुक्ति संगठन के मोर्चे पर 2001 तक सक्रिय रहीं जबकि इंकलाबी छात्र मोर्चा के साथ बनी घनिष्ठता 2004 तक चली। सीमा ने प्रेम विवाह किया और फिर घर छोड़ दिया। नाम के पीछे लगी जाति को हटाकर आज़ाद लिखना शुरू किया। यह एक नई सीमा का जन्म था- सीमा आज़ाद। उसने पैसे जुटाकर बाइक खरीदी। समाचार खोजने के लिए वह लोगों के बीच गई। लोगों की जिंदगी को खबर का हिस्सा बनाने की जद्दोजेहद में लग गई। उसकी खबरें इलाहाबाद से निकलने वाले अखबारों में प्रमुखता से छपती थीं। वह इलाहाबाद शहर के सबसे चर्चित व्यक्तित्वों में गिनी जाने लगी थी। वह मानवाधिकार, दमन-उत्पीड़न, राजनीतिक-सामाजिक जनांदोलनों, किसान-मजदूरों के प्रदर्शनों का अभिन्न हिस्सा होती गई। उसने जन मुद्दों पर जोर देने व समाज और विचार से लैस पत्रकारिता की ज़रूरत के मद्देनज़र 'दस्तक-नए समय की पत्रिका' निकालनी शुरू की। पत्रिका को आंदोलन का हिस्सा बनाया। उसने हज़ारों किसानों को उजाड़ देने वाली गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना के खिलाफ पत्रिका की ओर से गहन सर्वेक्षण किया। इस परियोजना से होने वाले नुकसान को बताने के लिए इसी सर्वेक्षण को पुस्तिका के रूप में छाप कर लोगों के बीच वितरित किया। आज़मगढ़ में मुस्लिम युवाओं को मनमाना गिरफ्तार कर आतंक मचाने वाले एसटीएफ व पुलिस की बरजोरी के खिलाफ दस्तक में ही एक लंबी रिपोर्ट छापी। सीमा की सक्रियता मानवाधिकार के मुद्दों पर बढ़ती गई। वह पीयूसीएल- उत्तर प्रदेश के मोर्चे में शामिल हो गई। उसे यहां सचिव पद की जि़म्मेदारी दी गई। सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी के समय तक उत्तर प्रदेश में युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी सामने थी जो मुखर होकर मानवाधिकारों का मुद्दा उठा रही थी। पतित राजनीति, लूट करने वाली अर्थव्यवस्था, बढ़ती सामाजिक असुरक्षा, दंगा कराने की राजनीति और अल्पसंख्यकों व दलितों के वोट और उसी पर चोट करने की सरकारी नीति के खिलाफ बढ़ती सुगबुगाहट राज्य व केंद्र दोनों के लिए खतरा दिख रही थी। इस सुगबुगाहट में एक नाम सीमा आज़ाद का था। दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले से किताब खरीद कर लौट रही सीमा को देश की सुरक्षा के लिए खतरा घोषित कर उनके पति के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। जब देश प्रेम व देश द्रोह का अर्थ ही बदल दिया गया हो तब यह गिरफ्तारी एक प्रहसन के सिवा और क्या हो सकती है!
सीमा और विश्वविजय को देश के खिलाफ षडयंत्र के अभियोग में दस-दस साल का कठोर कारावास और दस-दस हज़ार रुपये का दंड और देशद्रोह के मामले में दोनों को आजीवन कारावास और बीस-बीस हज़ार रुपये का दंड दिया गया। प्रतिबंधित साहित्य रखने के जुर्म में अलग से सजा। यूएपीए की धाराओं 34ए, 18ए, 20ए, 38 और आईपीसी के तहत कुल 45 साल का कठोर कारावास और आजीवन कारावास की सज़ा दोनों को दी गई। दोनों को ही बराबर और एक ही सज़ा दी गई। इन धाराओं और प्रावधानों पर पिछले दसियों साल से बहस चल रही है। ऐसा लग रहा है कि न्याय की बैसाखी पर मौत की इबारत लिख दी गई है। जो बच जा रहा है उनके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं, पर ईश्वर पर भरोसा करने वाले लोग इसे भगवान की महिमा कहते हैं।

8 जून को कोर्ट में सीमा के पिताजी नहीं आए। वे निराशा और उम्मीद के ज्वार-भाटे में खाली पेट डूब उतरा रहे थे। उस रात वह घर किस तकलीफ से गुज़रा होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। विश्वविजय के अम्मा और बाबूजी केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा पर थे। शायद कोई महिमा हो जाय। मैं खुद पिछली सुनवाइयों को सुनने और न्यायाधीश के रिस्‍पॉन्‍स से इस निष्कर्ष पर पहुंच गया था कि सेशन कोर्ट इतिहास रचने वाला है। मैं अपनी आकांक्षाओं में डूबा हुआ इतिहास रचना के चारित्रिक गुण को ही भूल गया। यह भूलना न तो सायास था और न ही अनायास। बस एक आकांक्षा थी, एक सहज तार्किक इच्छा थी, कि सीमा-विश्वविजय को अब बाहर आ जाना चाहिए और कि यह न्यायाधीश थोड़ा ढंग से सुन और गुन रहा है। हम जेलों में बंद उन लाखों लोगों को भूल ही गए जिन्हें देशद्रोह के आरोप में बेल पर भी नहीं छोड़ा गया है। हम भूल ही गए कि अब तक हज़ारों लोगों को इन्हीं आरोपों के तहत गोली मार दी गई और उसे जेनुइन इनकाउंटर बता दिया गया। हम मनोरमा देवी से लेकर सोनी सोरी तक इतिहास को भूल ही गए। हम भूल ही गए कि देश और देश का भी चारित्रिक गुण होता है। हम भूल ही गए कि शासकों का अपना चरित्र होता है। हम भूल ही गए संसद में बैठे चेहरों का राज़, हम भूल ही गए भूत बंगले की कहानी, हम भूल ही गए गुजरात और बिहार, हम भूल ही गए पाश और फैज़ की नज्‍़म... हम भवदीय आकांक्षाओं में डूबे हुए लोग न्याय की बैसाखी पर उम्मीद की एक किरण फूट पड़ने का इंतजार कर रहे थे...।

यह लिखते हुए इंकलाबी छात्र सभा के हमसफ़र साथी कृपाशंकर- जो कानपुर जेल में है और जिससे मिले हुए सालों गुज़र गए और अब तक मिल पाना संभव नहीं हो पाया- की याद ताज़ा हो आई। वह किस हालात में है, नहीं जानता पर सीमा और विश्वविजय के सामाजिक जीवन को मिला दिया जाय तो उसका प्रोफाइल बनकर तैयार हो जाएगा। गणित, विज्ञान, दर्शन और उतावलेपन का धनी यह मेरा दोस्त जेल की सींखचों में कैसे बंद जीवन जी रहा है, इसे याद कर मन तड़प उठता है। सन 2000 में ऑपरेशन कराने के बाद मैं देहरादून एक साल के लिए रहा। उस समय वह रेलवे की नौकरी में चला गया था। 2002 के आसपास वह मुझसे दिल्ली में मिला और बताया कि उसने नौकरी छोड़ दी है। उसने मुझे बधाई दी। उस समय मैं जनप्रतिरोध का संपादन कर रहा था और एआईपीआरएफ के लिए जनसंगठनों का मोर्चा बनाकर किसान व मज़दूर विरोधी नीतियों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन में भागीदार हो रहा था। इराक पर हमले के लिए खिलाफ व्यापक संयुक्त मोर्चे में काम करते हुए मैं दिल्ली वाला बन रहा था। और उसने अपने बारे में बताया कि वह किसान मोर्चे पर काम करने का निर्णय ले रहा है और कि वह जल्दी ही नौकरी छोड़ देगा। इस साथी से मुलाकात कर इस बीच के गुज़रे समय के बारे में उससे ज़रूर पूछना है। हालांकि यह पूछना एक औपचारिकता ही होगी। आज के दौर में जनसरोकार और इतिहास की जि़म्मेवारियों में हिस्सेदार होने का एक ही अर्थ है: जनांदोलनों के साथ जुड़ाव और जन के साथ संघर्ष। जिस देश की अर्थव्यवस्था पर सूदखोरों और सट्टेबाजों की इस कदर पकड़ बन चुकी हो कि प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक देश के भविष्य के बारे में सट्टेबाजों की तरह अनुमान लगाने लगे हों, वहां लोगों के सामने दो ही तरह का भविष्य बच रहा है- एक: जिस हद तक हो इस देश को लूट लिया जाय (जिसका परिदृश्य खुलेआम है)। दो: जन के साथ हिस्सेदार हो लूट और कत्लेआम से खुद को और देश को बचा लिया जाय (इस परिदृश्य पर देशद्रोह, नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद की छाया है)।

यह विकल्प नहीं है। यह अस्तित्व का विभाजन है, जिसे मध्यवर्ग विकल्प के तौर पर देख रहा है और चुन रहा है। यह इसी रूप में हमारे सामने है। आइए, जनांदोलनों और जनसंघर्षों के हिस्सेदार लोगों के पक्ष में अपनी एकजुटता बनाएं और जेलों में बंद साथियों को न्याय की बैसाखियों पर लिखी मौत की इबारत से मुक्त कराने के लिए अपनी एकजुटता ज़ाहिर करें और उनकी रिहाई के लिए जनसमितियों का निर्माण करें।

 लेखक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।


8 टिप्‍पणियां:

Rajesh ने कहा…

Behtreen Lekh..Allahabad lower court ke is fiasle ki purjor Mukhalfat ki jarurat hai.

Bhupen ने कहा…

jald hi kuchh karna chahiye-bhupen

Rajesh Upadhyay ने कहा…

इस लेख की बहुत ज़रूरत थी. उम्मीद है, इस फैसले के खिलाफ अपील की तैयारी हो रही होगी. नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए और देशद्रोह की प्रचलित परिभाषाओं और कानूनों के खिलाफ ज्यादा बड़े आंदोलन की ज़रूरत है.

nisan ने कहा…

10 saal ka karabas seema ke liye,yeh nyay ka apman hai.jahan karodon rupiyon ki durneeti karanewalon ko jamanaat mil hi jata hai,seema ke sath hazaron log ko jamanat milta nahi.yeh prahasan ke khilaph awaz uthe.apka
lekh samayopajogi hai.dastak ko hum
bahoot miss karate hain.
lenin kumar,bhubaneswar

nisan ने कहा…

10 saal ka karabas seema ke liye,yeh nyay ka apman hai.jahan karodon rupiyon ki durneeti karanewalon ko jamanaat mil hi jata hai,seema ke sath hazaron log ko jamanat milta nahi.yeh prahasan ke khilaph awaz uthe.apka
lekh samayopajogi hai.dastak ko hum
bahoot miss karate hain.
lenin kumar,bhubaneswar

चन्द्रिका ने कहा…

shukriya...anjani ji itani sari jankari ke liye.....abhishek bhai dakhalkiduniya par ise post kar raha hu saabhar.

सुशील ने कहा…

अंजनी जी,
राजेश जोशी की बेहद चर्चित कविता का ध्यान आ रहा है :
" धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाएंगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगीं उन्हें काफिर करार दिए जाएंगे।
सबसे बडा् अपराध है इस समय में
निहत्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नही होंगे मारे जायेंगे "....

सीमा आज़ाद और विश्वविजय के बहाने शासकों नें विरोध की आवाज़ को दबाने का कुकृत्य किया है | हम सोलीडेरीटी में एक साथ हैं और सीम-विश्वविजय देशद्रोही नहीं हैं |

बेनामी ने कहा…

मुजरिम करार आपने फिर भी दिया हमे
इल्जाम में जरा भी हकीकत नही मिली.
साथी महेंद्र की ये पंक्तियाँ विश्वविजय और सीमा की आवाज लगती है.
--दिनेश

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