8/29/2012

संघ, इंटेलिजेंस और अफसरशाही का खिचड़ी आंदोलन

अंजनी कुमार

 
यह खबर इंडियन एक्‍सप्रेस में 20 अगस्त 2012 को मुख्य पृष्ठ पर छपी थी। इस खबर को उस समय छापा गया जब अन्ना की विदाई खुद अन्ना ने ही तय कर दी और बाबा रामदेव चूहे की पूंछ की तरह हिलते हुए इस आंदोलन के जीवित रहने का संकेत दे रहे थे। सच्चाई सबको मालूम थी कि रामलीला मैदान में चल रही उठापटक कब का खत्म हो चुकी है। 2014 की तैयारी में इस उठापटक की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी। यह जो हुआ, सिर्फ धींगामुश्ती नहीं थी। यह देश की सत्ता पर काबिज होने के खूनी खेल के प्रयोग की एक नई पृष्‍ठभूमि थी। यह 1990 के बाद उभरकर आए नौकरशाहों और नव-जमींदारों का फासीवादी प्रयोग था जिसका पाठ आए दिनों में और भी अधिक खूनी तथा राजनीतिक तौर पर और अधिक जनद्रोही होगा। यह देश के प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक संरचना के पुनर्गठन के एक प्रस्ताव का देशव्यापी प्रयोग था जिससे देश के प्रगतिशील दिमागको और अधिक चौड़ा कर फासीवादी घोड़े को पूरी रफ्तार से दौड़ाया जा सके।
 
 
इस खबर में जिस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का जिक्र है उसने नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई की भारत यात्रा का 2010 में खर्च वहन किया था। इस काम को संगठित कराने में कश्मीर से लेकर माओवाद पर अपनी पकड़ बनाने का दावा करने वाले एक वामपंथी पत्रकार ने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया, इस बात की चर्चा उस समय हुई थी। साथ ही एक अन्य वामपंथी पत्रकार ने इस मुद्दे पर बाबूराम को चेताया भी था। उस यात्रा में वामपंथी मंचों से अपनी साम्राज्यवाद परस्त लाइन को खूब रखा। प्रचंड व बाबूराम के नेतृत्व में सीपीएन-माओवादी ने नेपाल में राजशाही के खिलाफ चल रहे जनयुद्ध के समय 2002 में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर हो रही बेइज्जतीको ठीक करने के लिए यूरोप व अमेरिका से अपील की थी। यह पत्र भारत के लिए भी था। खुला भी और हाथों हाथ पहुंचाने का भी जिसका एस.डी. मुनी ने अभी हाल ही में खुलासा किया। बहरहाल, प्रो. एस.डी. मुनी के माध्यम से उस समय भारत की केंद्र में बैठी भाजपा सरकार के साथ संपर्क साध कर अपने बारे में बनी धारणा को ठीक करने का आग्रह किया गया था। यह पिछले दिनों अखबार की सुर्खियों में बना रहा। शायद इस कारण भी कि इस आग्रह व संपर्क के बाद सीपीएन-माओवादी के नेतृत्व का भारत सरकार के अंदरूनी हिस्सों से रिश्ता मजबूत बनता गया और बाद में एक दूसरे पर रॉ का एजेंट होने का आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि सबसे अधिक इस तरह के आरोप बाबूराम भट्टाराई पर ही लगे। यह एकीकृत सीपीएन-माओवादी पार्टी में विवाद और आलोचना-आत्मालोचना का एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी बना।
बहरहाल, आइए, द इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर को पढ़ें:
 
सी जी मनोज नई दिल्ली, 19 अगस्त: नई दिल्ली की कूटनीति का हृदयस्थल माने जाने वाले इलाके चाणक्‍यपुरी में एक आला दर्जे का संस्थान जो थिंकटैंक भी है, स्थित है। इसके लिए जमीन नरसिंहराव की सरकार ने मुहैया करवाई। इस पर भूतपूर्व गुप्तचर अधिकारी और आरएसएस के प्रसिद्ध स्वयंसेवकों के एक समूह की पकड़ है। ये हाल में देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, खासकर बाबा रामदेव के नेतृत्व वाले आंदोलन के पीछे काम करने वाली गुपचुप ताकतें हैं।

वास्तव में यह विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन ही था जहां बाबा रामदेव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा बनाने का निर्णय लिया गया। यह अन्ना हजारे के पहले भूख हड़ताल पर बैठने के एक दिन पहले की बात है। इस फाउंडेशन के निदेशक अजीत डोभाल हैं। ये इंटेलिजेंस ब्‍यूरो के भूतपूर्व निदेशक हैं। यह फाउंडेशन ही था जिसने रामदेव और टीम अन्ना के सदस्यों को एक साथ लाने का पहली बार गंभीर प्रयास किया।


विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का उद्घाटन 2009 में हुआ। यह 1970 के शुरुआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भूतपूर्व महासचिव एकनाथ रानाडे और इसी के प्रचारक पी. परमेश्वरन की अध्यक्ष्यता में स्थापित एक परियोजना है।
पिछले साल के अप्रैल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक के एन गोविंदाचार्य के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और फाउंडेशन ने मिलकर भ्रष्टाचार व ब्लैक मनी पर सेमिनार किया। इसमें रामदेव व टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी ने हिस्सा लिया।
 
12 अप्रैल को दो दिवसीय इस सेमिनार के अंत में भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चाबनाया गया। इसके संरक्षक बने रामदेव और गोविंदाचार्य बने संयोजक। इसमें डोभाल के साथ अन्य सदस्य थे: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एस गुरुमुर्ति, एनडीए सरकार में भारत के राजदूत का प्रभार संभालने वाले भीष्म अग्निहोत्री, प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन, जो इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ बेंगलोर में हैं और भाजपा के ब्लैक मनी पर बने टास्क फोर्स के अजीत डोभाल व वेद प्रताप वैदिक।
इस दो दिवसीय सेमिनार के अंत में जारी किये गए पत्र में यह बताया गया कि रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा युद्ध करने का फैसला लिया है और लोगों का ध्यान खींचने वाले एक्शन कार्यक्रम व समानधर्मा भ्रष्टाचार विरोधी संगठन, संस्थान और व्यक्तियों तक पहुंचने के कार्यक्रम के लिए तत्काल ही इस मोर्चे की घोषणा की गई।
इस सेमिनार के तुरंत बाद ही हजारे की भूख हड़ताल शुरु हो गई और अप्रैल के अंत में रामदेव ने रामलीला मैदान में 4 जून से विरोध कार्यक्रम की घोषणा कर दी। यह यूपीए सरकार के खिलाफ पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था।
इस सच्चाई के बावजूद कि यह संस्थान सरकार द्वारा दी गई जमीन पर है, इस फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में गुप्तचर विभाग के भूतपूर्व अधिकारी, रिटायर प्रशासक, कूटनीतिज्ञ और सेवानिवृत्त सेना के लोग बैठते हैं। इसमें रॉ के भूतपूर्व मुखिया ए.के. वर्मा, भूतपूर्व सेना प्रमुख विजय सिंह शेखावत, भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख एस. कृष्णास्वामी व एस.पी. त्यागी, भूतपूर्व सीमा सेना बल के प्रमुख प्रकाश सिंह, भूतपूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा उपसलाहकार सतीश चंद्रा और भूतपूर्व गृह सचिव अनिल बैजल शामिल हैं।
उक्त सेमिनार के बारे में पूछने पर डोभाल ने बताया कि यह मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का है और इसमें बहुत से लोगों के साथ सुब्रमण्‍यम स्वामी, न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया, न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, लोक सभा के भूतपूर्व मुख्य सचिव सुभाष कश्यप और भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्‍त एन. गोपालस्वामी भी शामिल हुए थे।
यद्यपि डोभाल ने इन बातों के साथ कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को समर्थन देते हैं, यह भी कहा कि विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की इन विरोध प्रदर्शनों में कोई भूमिका नहीं है। उनके अनुसार- हम इस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं कि यह समय है जब मजबूत, स्थिर, सुरक्षित और विकासमान भारत दुनिया के मामले में तय हुए चुकी नियति में अपनी भूमिका का निर्वाह करे और राष्ट्रों के सौहार्द में अपने आकांक्षित स्थान को हासिल करे। भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी भारत को बर्बाद कर रहे हैं। हम लोगों को इस मुद्दे पर आत्मरक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।
रामदेव और अन्ना के अलावा एक और शख्स थे जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मोर्चा गठित करने का एलान किया। वह थे सुब्रमण्‍यम स्वामी जिन्होंने भारत में भ्रष्टाचार विरोधी एक्शन कमेटी बनाई। हालांकि इस कमेटी की पहली बैठक में मुख्य अतिथि थे रामदेव और गोविंदाचार्य, गुरुमुर्ति, डोभाल और बैद्यनाथन भी यहां उपस्थित थे।
गोविंदाचार्य से फाउंडेशन के रिश्ते के बारे में पूछने पर गोविंदाचार्य ने यह बताया कि वह बहुधा आते ही रहने वालोंमें हैं। ''रामदेव और मैं अगस्त 2010 से लगातार एक दूसरे से संपर्क में हैं (रामदेव दिसंबर 2010 में गुलबर्ग गए थे और गोविंदाचार्य के भारत विकास संगम में हिस्सा लिया था)। वह अक्सर विवेकानंद फाउंडेशन में आते हैं। उनके लिए दिल्ली में ऐसे तो कुछ जगहें हैं पर फाउंडेशन आना उनके लिए सबसे आसान है और दूसरों के लिए भी यहां एक दूसरे से मिलना आसान है।’’
गोविंदाचार्य ने यह भी स्वीकार किया कि सेमिनार रामदेव और अन्ना कैंप को साथ लाने में कुछ हद तक नजदीकी संचालन का कामकरेगा, यह भी उम्मीद की गई थी।
संघ चिंतक ने इस सूत्रबद्धता को किसी भी तरह से नकारा नहीं। यह पूछने पर कि इससे तो यह बात बनना तय है कि विवेकानंद केंद्र और फाउंडेशन आरएसएस से जुड़े हुए हैं, उन्होंने कहा, ‘कोई इस हद तक पहुंच सकता है... सांगठनिक तौर पर आरएसएस इसमें शामिल नहीं होता है। स्वयंसेवक ही पहलकदमी लेते हैं।
हालांकि डोभाल के अनुसार फाउंडेशन स्वतंत्र है और इसका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है। हमारी उनके (रामदेव) के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं है। हम में से वहां कोई गया भी नहीं। यह स्वतंत्र और पंजीकृत इकाई है। हम लोग सरकारी फंड नहीं लेते हैं।
मुकुल कनितकर जो पहले इस फाउंडेशन से जुड़े हुए थे, उन्‍होंने बताया कि फाउंडेशन द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर आयोजित सेमिनारों में प्रशासकीय अधिकारी व साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी भी भागीदारी करते रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि इसी हफ्ते फाउंडेशन में केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा द हिस्टॉरिसिटी ऑफ वैदिक एंड रामायण एरा: साइंटिफिक एविडेंस फ्रॉम द डेप्थ ऑफ ओशियन टू द हाइट ऑफ स्काईनामक पुस्तक का विमोचन करने वाली हैं। 



रामदेव के अभियान के साथ अपने जुड़ाव के बावजूद गोविंदाचार्य यह महसूस करते हैं यह आंदोलन अब खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा कि दोनों (अन्ना और रामदेव) का आंदोलन सत्ता और पार्टी राजनीति के ब्लैक होल में घुस कर खत्म हो गया... रामदेव अब भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले या उसका हिस्सेदार बन गए हैं।

 

8/21/2012

Unite against Oppression: Julian Assange





I am here because I cannot be closer to you.
Thank you for being here.
Thank you for your resolve and your generosity of spirit.
On Wednesday night after a threat was s ent to this embassy and the police descended on the building, you came out in the middle of the night to watch over it and you brought the world’s eyes with you.
Inside the embassy, after dark, I could hear teams of police swarming into the building through the internal fire escape.
But I knew that there would be witnesses.
And that is because of you.
If the UK did not throw away the Vienna Conventions the other night, it is because the world was watching.
And the world was watching because you were watching.
The next time somebody tells you that it is pointless to defend the rights we hold dear, remind them of your vigil in the dark outside the Embassy of Ecuador, and how, in the morning, the sun came up on a different world, and a courageous Latin American nation took a stand for justice.
And so, to those brave people:
I thank President Correa for the courage he has shown in considering and granting me political asylum.
And so I thank the government and the Foreign Minister, Ricardo Patiño, who have upheld the Ecuadorian constitution and its notion of universal rights in their consideration of my case.
And to the Ecuadorian people for supporting and defending their constitution.
And I have a debt of gratitude to the staff of this embassy whose families live in London and who have shown me hospitality and kindness despite the threats that they have received.
This Friday there will be an emergency meeting of the foreign ministers of Latin America in Washington D.C. to address this situation.
And so I am grateful to the people and governments of Argentina, Bolivia, Brazil, Chile, Colombia, El Salvador, Honduras, Jamaica, Mexico, Nicaragua, Peru, Venezuela and to all other Latin American countries who have come to the defence of the right to asylum.
To the people of the United States, the United Kingdom, Sweden and Australia who have supported me in strength while their governments have not. And to those wiser heads in government who are still fighting for justice. Your day will come.
To the staff, supporters and sources of WikiLeaks whose courage, commitment and loyalty have seen no equal.
To my family and to my children who have been denied their father: forgive me. We will be reunited soon.
As WikiLeaks stands under threat, so does the freedom of expression and the health of our societies.
We must use this moment to articulate the choice that is before the government of the United States of America.
Will it return to and reaffirm the values it was founded on?
Or will it lurch off the precipice dragging us all into a dangerous and oppressive world in which journalists fall silent under the fear of prosecution and citizens must whisper in the dark?
I say that it must turn back.
I ask President Obama to do the right thing.
The United States must renounce its witch-hunt against WikiLeaks.
The United States must dissolve its FBI investigation.
The United States must vow that it will not seek to prosecute our staff or our supporters.
The United States must pledge before the world that it will not pursue journalists for shining a light on the secret crimes of the powerful.
There must be no more foolish talk about prosecuting any media organization, be it WikiLeaks or the New York Times.
The US administration’s war on whistle-blowers must end.
Thomas Drake, William Binney, John Kirakou and the other heroic US whistle-blowers must - they must - be pardoned and compensated for the hardships they have endured as servants of the public record.
And the Army Private who remains in a military prison in Fort Leavenworth Kansas, who was found by the UN to have endured months of torturous detention in Quantico Virginia and who has yet - after two years in prison - to see a trial, must be released.
And if Bradley Manning really did as he is accused, he is a hero, an example to us all and one of the world’s foremost political prisoners.
Bradley Manning must be released.
On Wednesday, Bradley Manning spent his 815th day in detention without trial. The legal maximum is 120 days.
On Thursday, my friend, Nabeel Rajab, was sentenced to 3 years for a tweet.
On Friday, a Russian band was sentenced to 2 years in jail for a political performance.
There is unity in the oppression.
There must be absolute unity and determination in the response.
Julain Assange is founder of WikiLeaks

8/14/2012

‘If we use Margo instead of Lifebuoy, they will comment’

Debabrata Mohanty : Bhubaneswar, Tue Aug 14 2012, 01:55 hrs


Days before the CPI(Maoist) central committee expelled top Orissa leader Sabyasachi Panda for “betraying the party and the revolution”, he had written to the leadership about mindless killings by cadres, harassment from seniors and general disenchantment. 

Panda, 43, wrote two letters on June 1 to CPI(Maoist) general secretary Muppala Laxaman Rao alias Ganapathy, politburo members Prashant Bose alias Sumit, Narayan Sanyal alias Vijay, and other Maoist cadres. It is not clear if they reached their intended recipients. “As I have not got proper democracy to discuss or write the political opinion... and as there is no scope for an immediate solution of our long-standing problems, I would like to write this,” Panda said in the letters, running into 39 pages and accessed by The Indian Express.

Excerpts:

8/09/2012

London 2012 Olympic sponsors list: who are they and what have they paid?

How much are companies pouring into sponsoring London 2012? We've compiled the first list of how much they are spending. (Courtesy: Guardian Datablog)
Who is footing the London 2012 sponsorship bill? Thanks to the London 2012 site, we know who the sponsors are - but what we haven't had so far is what the individual deals are worth. This is, says London 2012, "confidential commercial information". So, we've been forced to put it together ourselves. Based on our reporting, this is how it comes out:

8/07/2012

More IIMC passouts chosing not to be in media: MSG Research




An Evaluation of Journalism Training:  Social and Professional Utility

The report of the First Press Commission has recommended that minimum wage for journalists should be based on minimum eligibility criteria for entering the profession. Though the Commission was of the view that preference should be given to those holding a degree or diploma in journalism, it should not restrict others from entering the profession.1 

The Second Press Commission (1982), too, stressed the need for special training as criteria for entering the profession as in the case of a lawyer or a medical practitioner. “Training in journalism should be encouraged but it should not be made mandatory to require license”.2 What the first and second Press Commissions had suggested, albeit cautiously, has now turned into the minimum eligibility to be a journalist or work with any media organization. With the availability of a good number of degree or diploma holders in journalism, it is important to know if the profession has really gained something worthwhile and if the journalists trained at various institutions are really enjoying the profession.

8/06/2012

Bail comes as B'day gift for Seema a day later



The Allahabad High Court has granted bail to journalist and civil right activist Seema Azad and her husband Vishvijay. The couple were convicted by a lower court on June 8, 2012, on charges of sedition. They were accused of having links with banned Maoist outfit and were held guilty for 'waging war against the nation'.

8/03/2012

Pune Blasts are Result of Caste War

By Feroze Mithiborwala & Kishore Jagtap

01 August, 2012

Low intensity crude bombs have exploded in 4 locations in Pune, though no causalities have been reported. But again, why have these blasts occurred at this very moment & what is the underlying political context of this terror attack, is the moot point & hence this analysis after conferring with our Dalit-OBC activists friends in Mumbai & in Pune.

In our analysis this is a Chitpawan Brahmanical-Manuwadi reaction to the restoration of the true Samadhi-Burial Shrine of Saibai, the first wife of Shivaji Maharaj.
It also marks a welcome, though a little too warm, for Shri Sushilkumar Shinde, the first Dalit (so-called untouchables) Home Minister of independent India.
Thus in our assessment, this series of terror attacks, is part of the ongoing caste war that has once again erupted all across Maharashtra, especially ever since the struggle over the true paternal lineage of Shivaji Maharaj, the widely loved, iconic & revered king.

But today marked a major historic turning point in the battle. The Samabhaji Brigade, led by the Maratha community (which in the last 2 decades, is rediscovering its non-Brahmin religio-cultural identity with the emergence of Shiv Dharma), but also includes activists from the Shudra-Ati-Shudra or the Dalit-OBC sections, destroyed the so-called Samadhi or burial site of Waghya, Shivaji's non-existent pet dog. This fact has been proved in a remarkable work of research by Shri Ananth Darvatkar – “Advaiti Chatrapti Shri Sambhaji Maharaj”.

The claim of the Bahujan movement is that this site actually marks the burial place of Saibai, the first wife of Shivaji Maharaj & the mother of his philosopher son, Sambhaji Maharaj , who again has been the target of Brahmanical calumny. The point to be noted is that neither did Waghya the pet dog exist & nor was Ramdas the Guru of Shivaji . In fact recent research shows that Ramadas never even met Shivaji Maharaj, but the attempt has always been to impose a Brahmin as the true brain & power behind the throne.

For the last few years, the Bahujan movement led by journalist Sudhakar Lad & by Vilas Kharat, a writer has petitioned the government of Maharashtra to put an end to this vile calumny. But the government failed to respond.

Thus at 3pm today, the activists of the Sambhaji Brigade destroyed the false site in Raigadh & restored it to the memory of Saibai.

Soon sms's were sent all across Maharashtra & the rest of the country to celebrate this victory after a long struggle. In the evening activists had decided to distribute sweets, burst fire-crackers & organize victory rallies. But now after the blasts, all plans have been cancelled & obviously so.

As one would recall, this is part of the ongoing struggle over the true legacy of Shivaji Maharaj, who until now has been misused & appropriated by the Hindutva-Brahmaical right wing, but now has been reclaimed by the Bahujan & progressive secular movements.

Also it is a historical fact that it was Krantiveer Jotiba Phule who discovered the Samadhi of Shivaji Maharaj, which was in ruins & unkown to the masses. He also founded the Satya Shodak Movement (The Movement to Seek Truth) on the 24 th of September, the day that marks the true Rajya Abhishek or the enthroning ceremony by the Shakya culture , which again was non-Brahmin. Later Balgangadhar Tilak a conservative casytest Brahmin appropriated the symbolism of Shivaji Maharaj. Whilst the liberal upper castes refer to him as Lok Manya Tilak, the Bahujan masses call him Bhatt Manya Tilak.

Due to the fact that Shivaji Maharaj was committed to the anti-caste struggle, his paternal lineage was a matter of extremely vicious whispering campaign by the Brahmanical sections for the past four centuries. The true father of Shivaji Maharaj was Shahaji, but the Brahmins made lewd jokes about Dadaji Kondev, a Brahmin as the real father & thus insulting the memory of Jijau Mata, who was both the mother & guru of Shivaji Maharaj.

This too erupted into a controversy due to the book written by James Laine & he was helped along in his research by the conservative Brahmin scholars of Bhandarkar Institute in Poona, a centre of extremism, with 3 of its “researchers” under investigation for the Malegaon terror attacks by the ATS then led by Shri Hemant Karkare , who as we were aware was martyred during the Mumbai 26/11 terror attacks.

The Sambhaji Brigade removed the statue of Dadaji Kondev from the rest of the family & this has truly angered the Brahmins, especially the most casteist & racist of them all - the Chitpawan Brahmins, who interestingly are also Israel's most important supporters in India.

An unholy alliance of casteists, supremacists, racists, Zionists & imperialists!!
Today after the destruction of the false burial site & its dedication to the memory of Saibai, the Bahujan activists had decided to organize a victory rally in Pune - & thus the terror attacks across Pune!!

Also the blast has occurred when Sushilkumar Shinde has been appointed as the Home Minister & it marks the first time that a Dalit has occupied this post in the history of independent India.

To go back into a similar context in history, Pandit Jawaharlal Nehru the first PM of Independent India wanted to appoint Dr. Babasaheb Ambedar as the Chief Justice of the Supreme Court , as he rightly felt that he would be the best person to uphold the legal & constitutional principles. But he was opposed by Vallabh bhai Patel on the grounds that “how can the lawyers from the upper caste Brahmins, Kayasthas & Banias, bow before an untouchable & say - My Lord”. This fact has been recorded in a book “25 Years of my Association with Dr. Baba Saheb Ambedkar” (pg 74), written by Sohanlal Shastri a very close companion of Dr. Ambedkar, one of the greatest revolutionary figures in the history of the world.

This also again symptomatic of the unfolding political crisis that grips the ruling caste-class elite, as we head for the crucial general elections of 2014. The ongoing ethno-communal clashes that have erupted in Assam, to more than the 40 riots in various towns of Uttar Pradesh, the relentless targeting of the Muslim community on false terror charges, even as the investigations into Brahmanical terror are covered up, basic charge sheets not framed & thus suspects released on bail. This even as the socio-economic & political crisis worsens on all fronts.

Thus the politics of terror & riots are a strategy of mass control.

We are indeed in for a long & dangerous haul.


Feroze Mithiborwala is a peace activist in Mumbai. He led the Asia to Gaza peace flotilla.
Kishore Jagtap is a Mumbai-based human rights and social activists
Courtesy: Countercurrents.org

8/01/2012

समाजवाद आ तो गया है...



व्‍यालोक




अब आ गया है देश में समाजवाद,
नहीं होता इस देश में कोई भी बड़ा,
हो गए हैं सभी बराबर,
बौने, छोटे और टुच्चे..........

अब यहां पनपते हैं केवल कुकुरमुत्ते,
नहीं होता कोई भी गुलाब,
या फिर ओल ही सही,
सब हैं कुकुरमुत्ते,
छोटे और बराबर........

अब नहीं होता कोई,
तिलक, भगतसिंह, अंबेडकर या नेहरू भी,
होते हैं अब
अखिलेश, माया और राहुल
सभी बराबर, एक जैसे.....
देश में समाजवाद आ गया है......


नहीं होते अब,
प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध या धूमिल भी
हो रहे हैं अब,
अ ब स......
सभी बराबर, एक ही जैसे.....
कहा न, देश में समाजवाद आ गया है......


नहीं होता अब,
हाजी मस्तान, अरुण गवली या दाउद इब्राहीम भी,
होते हैं अब,
दलाल सारे,
त्यागी, भाटिया, असगरी जैसे छुटभैए...
करते हैं जो बस उगाही....
सबके सब एक जैसे.....
समाजवाद जो आ गया है.......



नहीं होते अब,
चारु मजूमदार जैसे विप्लवी,
ऐतिहासिक परिवर्तनकामी....
हो रहे हैं अब,
अनाम, अज्ञात, तथाकथित माओवादी,
जिनकी जद में हैं...
वर्ग शत्रु के साथ ही,
निर्दोष, मासूम, सर्वहारा भी.....
यहां समाजवाद आया नहीं है...
लाया जा रहा है.....


नहीं होता अब,
कोई भी अनूठा या अकेला....
सभी बिल्कुल एक जैसे,
बराबर और बौने,
एक भीड़ का हिस्सा....
आखिर, देश में समाजवाद जो आ गया है..............................


प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें