10/31/2012

कहानी तीन गांवों की: आखिरी किस्‍त

अभिषेक श्रीवास्‍तव

 
ओंकारेश्‍वर के घाट पर खडी स्‍टीमर और पीछे दिख रहा है ओंकारेश्‍वर बांध
 
समय कम था, लेकिन नर्मदा में नहाने का लोभ संवरण हम नहीं कर पाए। सीधे ओंकारेश्वर के अभय घाट पर पहुंच कर हमने नदी के पास नहाने के लिए बनी सुरक्षित जगह पर खुद को ताज़ादम किया। यह घाट वैसे घाटों जैसा कतई नहीं था जैसे हम बनारस या इलाहाबाद में देखते हैं। यहां की नाव भी नाव नहीं, स्टीमर थी। पंडे और छतरी तो यहां कल्पना की चीज़ हैं। नहाने वालों में अधिकतर शहरी किस्म के मध्यवर्गीय लोग थे जो पिकनिक मनाने के मूड में दिख रहे थे। नर्मदा अपनी गति से बह रही थी। दाहिनी ओर विशाल ओंकारेश्वर बांध खड़ा था और बाईं ओर एक सुरंग खोदी जा रही थी जिसमें से बाद में नर्मदा की एक धारा को सिंचाई के लिए निकाला जाएगा। तपते हुए घाट से ऊपर सीढ़ी चढ़ कर पहुंचना कष्टप्रद था, लेकिन भूख कदमों को तेज किए दे रही थी।
 
 
सेकुलर राष्‍ट्र की साम्‍प्रदायिक सीढि़यां
अचानक सीढि़यों से पहले सारा उत्साह काफूर हो गया। ऐसा लगा कि बस यही देखना बाकी था। पहली सीढ़ी पर काले खडि़ये से लिखा था, ‘‘जम्बू से मुसलमानों का सफाया। इस्लाम का पेड़ खत्म।’’ दूसरी पर लिखा था, ‘‘औरत की मुंडी काट...।’’ आखिरी सीढ़ी पर लिखा था, ‘‘नाई की मुंडी काट, उलटा पेट मुसलमानों को पेल।’’ बाकी तीन सीढि़यों पर भी ऐसा ही कुछ लिखा था जो आसानी से पढ़ने में नहीं आ रहा था। मेरे साथी ने ड्राइवर शर्मा से पूछा कि ये जम्बू क्या होता है। उसने पूरे आत्मविश्वास से बताया कि जम्बू माने जम्मू और कश्मीर। फिर उसने अपनी टिप्पणी मुस्कराते हुए की, ‘‘मुसलमानों को जम्मू और कश्मीर से खत्म कर देना चाहिए। बहुत कट्टर होते हैं।’’ लौटती में हमारी नज़रें सतर्क हो चुकी थीं। घाट के बाहर पूजा सामग्री की दुकानों के बीच हिंदू हेल्पलाइन के टंगे हुए बैनर भी दिख गए। इसके बाद एक कतार में तकरीबन सारे बाबाओं और माताओं के आश्रम दिखते गए। दो बज चुके थे और ट्रेन सवा चार बजे की थी। हम अब भी इंदौर से 70 किलोमीटर दूर थे।

 

ऊपर पहुंच कर ओंकारेश्वर रोड पर हमने खाना खाया और इंदौर की ओर चल पड़े। रास्ते में ड्राइवर शर्मा से हमने जानना चाहा कि इस इलाके की असल समस्या क्या है। उसने जवाब में हमें खंडवा के एक नेता की कहानी सुनाई। तनवंत सिंह कीर नाम का यह कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की कैबिनेट में मंत्री रहा था। शर्मा ने बताया कि कीर ने भ्रष्टाचार से बहुत धन-दौलत इकट्ठा कर ली थी लेकिन लोगों के दुख-दर्द के प्रति इसका कोई सरोकार नहीं था। पिछले साल लंबी बीमारी के बाद कीर की मौत हो गई। कहते हैं कि मरते वक्त इसके शरीर में कीड़े पड़ गए थे। अपने सवाल से शर्मा के इस असंबद्ध जवाब को मैं जोड़ने की कोशिश करने लगा। लगा जैसे दिमाग में कीड़े रेंग रहे हों। घंटे भर के सफर में जाने कब नींद आ गई। आंख खुली तो हम इंदौर बाइपास पर थे और साढ़े तीन बज चुके थे। पिछले चार दिनों में पहली बार बाहर मौसम सुहावना हो चला था। हलकी बौछारें पड़ रही थीं। स्टेशन पहुंचते-पहुंचते वापस धूप हो गई। दिल्ली की इंटरसिटी सामने खड़ी थी। दिल्ली लौटने के एक दिन बाद भोपाल से एक मित्र का फोन आया। उसने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टर गुप्ता के बारे में कुछ चौंकाने वाली जानकारियां दीं जिनमें एक सूचना मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार द्वारा उन्हें आवंटित हुए किसी मकान आदि के बारे में थी। यह सच हो या झूठ, लेकिन कुछ धुआं घोघलगांव में उठता हमें दिखा तो था।

 

आज जब मैं बड़े जतन से यह कहानी लिख रहा हूं, तो खरदना, घोघलगांव और बढ़खलिया के बमुश्किल पांच हजार ग्रामीणों के साथ पिछले दिनों घटा सब कुछ हलका पड़ चुका होगा क्योंकि ऐसे ही 25000 और लोग किसी दूसरे सत्याग्रह का शिकार हो गए हैं। दिलचस्प है कि ये सारे सत्याग्रह मध्यप्रदेश से ही उपज रहे हैं। ग्वालियर में राजगोपाल नाम के एनजीओ चलाने वाले एक कथित गांधीवादी नेता ने 25000 भूमिहीनों को ज़मीन का सपना दिखाया था। वे उन्हें लेकर दिल्ली की ओर पैदल बढ़े तो उनकी तस्वीरें भी घोघलगांव के जैसे वायरल हो गईं। अचानक आगरे में एक समझौता हुआ और इसे आदिवासियों की जीतकरार दिया गया। सिर्फ दैनिक दी हिंदू ने एक आदिवासी की आवाज़ को जगह दी, ‘‘हम यहां इतनी दूर से कागज के एक टुकड़े पर दस्तखत करवाने थोड़ी आए थे। यह हमारे साथ धोखा है।’’ अभी गूगल पर देखता हूं तो बढ़खलिया गांव का नाम भी अकेले दी हिंदू की ही एक खबर में आया था। ऐसी खबरों से हालांकि सत्याग्रहोंपर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे नेता अपने निजी कोनों में टाइम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हैं।

 

कुछ संभवतः भले लोगों पर से भरोसा उठ जाए, इसके लिए सारे अच्छे लोगों के भरोसे के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। इसीलिए, मैंने जो कुछ देखा, सुना, गुना, सब लिख मारा। ज़रूरी नहीं कि यही सच हो, लेकिन अब तक सुने, देखे और पढ़े गए सच से ज्यादा प्रामाणिक है, इसका दावा करने में मुझे दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इस कहानी के सारे पात्र, सारी जगहें, सारी घटनाएं, सारे बयान वास्तविक हैं सिवाय एक नाम के- मेरे साथ चौबीस घंटे रहा वह युवतर अखबारी जीव। उसकी तमाम उलटबांसियों के बावजूद अंत में मुझे भरोसा हो चला था कि उसने शायद बेहद करीब से चीज़ों को देखा है। शायद इसीलिए चलते-चलते उसने कहा था कि जल्द ही वह पत्रकारिता को छोड़ देगा क्योंकि ‘‘शहर में अकेले रह कर खाना बनाना और कपड़े धोना लंबे समय तक नहीं चल सकता।’’ उसकी बताई वजह बिल्कुल विश्वास के काबिल नहीं है। लेकिन क्या करें, विश्वास के लायक तो कई और चीज़ें भी नहीं थीं जिन्हें हम देख कर आए हैं। अकेले उसी पर माथा क्यों खपाएं। बेहतर होगा कि बनारस के घाटों की अनगिनत सीढि़यों पर जाकर सिर पटक आएं जिन पर कम से कम मैंने आज तक कुछ भी लिखा नहीं देखा है। (समाप्‍त)

पहली किस्‍त
दूसरी किस्‍त
तीसरी किस्‍त
चौथी किस्‍त

 

10/28/2012

कहानी तीन गांवों की: चौथी किस्‍त


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


किशोर कुमार की याद में बना स्‍मारक 
एक अक्टूबर की सुबह। तड़के ड्राइवर शर्मा का फोन आ गया। दस मिनट में तैयार होकर हम नीचे थे। रास्ते में खंडवा के बाहर उन्होंने किशोर कुमार की समाधि पर गाड़ी रोकी। बगल से श्मशान घाट को रास्ता जा रहा था। यह भी किशोर कुमार को समर्पित था। सवेरे-सवेरे श्मशान और समाधि देखने की इच्छा न हुई। हमने गाड़ी आगे बढ़ाने को कहा। इसके बाद शर्मा जी का व्याख्यान शुरू हुआ। उन्होंने गिनवाना चालू किया कि कैसे अपनी पार्टी के साथ वे चार धाम और जाने कितने ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर आए हैं। उनके विवरण का लब्बोलुआब यह था कि हम सीधे नर्मदा में स्नान करने अब ओंकारेश्वर जा रहे हैं और वहां दर्शनकर के ही घोघलगांव की ओर कूच करेंगे। हमने दूरियों का हिसाब लगाया। इस हिसाब से 35 किलोमीटर अतिरिक्त पड़ रहा था। वक्त कम था क्योंकि शाम को इंदौर से सवा चार बजे दिल्ली की गाड़ी भी पकड़नी थी। हमने बड़ी विनम्रता से उनसे पूछा कि क्या दर्शनकरना ज़रूरी है। सिर्फ नहाने से काम नहीं चल सकता? उनके चेहरे पर उदासी साफ छलक आई। इसके बाद हमने ज़रा और दिमाग लगाया और उनसे कहा कि वे सनावद से गाड़ी घोघलगांव की ओर मोड़ लें। काम निपटाने के बाद वक्त बचेगा तो नहा भी लेंगे। हमने उन्हें तर्क दिया कि कर्म ही असली धर्म है। यह सुनते ही वे तुरंत राज़ी हो गए। 

रास्ते में एक जगह उन्होंने नाश्ते के लिए गाड़ी रोकी। यह देशगांव था। कितना खूबसूरत नाम! हमारी कल्पना में भी नहीं था कि इस नाम का कोई गांव हो सकता है। इस बार पोहा और जलेबी के साथ हमने फाफरा का भी ज़ायका लिया। साथी राहुल का सुझाव था इससे बेहतर होता कच्चा बेसन ही फांक लेते।

सनावद से पहले एक रास्ता भीतर की ओर कटता है जो सीधे घोघलगांव की ओर जाता है। ड्राइवर शर्मा जी को यह रास्ता मालूम था। बाद में उन्होंने बताया कि अपने बेटे का रिश्ता उन्होंने यहां के एक गांव में तय किया था, इसीलिए वे इस इलाके से परिचित हैं। पूरा इलाका पहाड़ी था। यहां कपास भारी मात्रा में पैदा हो रही थी। सोयाबीन के खेत बीच-बीच में दिख जाते थे। मिट्टी काली थी और ज़मीन में पर्याप्त नमी दिख रही थी। पहली बार जहां गाड़ी रोक कर ड्राइवर ने रास्ता पूछा, वहां एक चाय की दुकान पर बैठे लोगों ने बताया कि यहां तीन घोघलगांव हैं। कौन से में जाना है। हमने जल सत्याग्रह का नाम लिया, तब जाकर रास्ते का पता चला। दिन के करीब साढ़े नौ बजे हमने घोघलगांव में प्रवेश किया।  

जल सत्‍याग्रह का पंडाल 
गाड़ी से उतरते ही लगा गोया कल रात कोई मेला यहां खत्म हुआ हो। बिल्कुल सामने नाग देवता का मंदिर था जिसके चबूतरे पर अधेड़, बूढ़े और जवान कोई दर्जन भर लोग बैठे होंगे। बगल के पेड़ पर एक पोस्टर लगा था जिसके बीच में महात्मा गांधी थे और चारों तरफ नेहरू, सरदार पटेल, भगत सिंह, शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस आदि की तस्वीरें। और पेड़ के साथ ही शुरू होती थी बांस की दर्जनों बल्लियां जो बाईं ओर एक पोखरनुमा जगह तक नीचे की ओर तक लगाई गई थीं। इन बल्लियों पर टीन की नई-नई कई शेड टिकी थीं। भीतर पीले रंग के चार बैनर नज़र आ रहे थे। दो पर लिखा था ‘‘पुनर्वास और ज़मीन दो नहीं तो बांध खाली करो’’ और बाकी दो पर ‘‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’’। 


इसी टीन शेड के नीचे लोगों ने जल सत्याग्रह किया था। यही वह जगह थी जहां टीवी चैनलों की ओबी वैन पार्क थीं। यही वह जगह थी जो अगस्त के आखिरी सप्ताह में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। हम शेड के भीतर होते हुए नीचे तक उतरते चले गए जहां अंत में एक छोटा सा पोखर सा था। करीब जाकर हमने देखा। यह वास्तव में एक नाला था जो बांध का पानी आने से उफना गया था। जल सत्याग्रही इसी में बैठे थे। उनके बैठने के लिए एक पटिया लगी थी और सहारे के लिए इसमें बांस की बल्ली सामने से बांधी गई थी। उस वक्त पानी दो फुट नहीं था, जैसा कि सुचंदना गुप्ता टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखती हैं। वह लगातार बढ़ रहा था। आज भले दो फुट रह गया हो। 

सत्‍याग्रहियों और महिला संगठन की सूची  
जो लोग पानी में बैठे थे, वे सब के सब इसी गांव से नहीं थे। यह सूचना मंदिर के दाहिनी ओर लटके लंबे-लंबे फ्लेक्स के पीले बैनरों से मिल जाती है जिन पर 51 सत्याग्रहियों की नाम गांव समेत सूची दर्ज है। सबसे पहला नाम बड़़ी वकील चित्तरूपा पलित का है, जिनका कोई गांव नहीं। उनके नाम के आगे गांव वाली जगह खाली है। इसके बाद गांव कामनखेड़ा, घोघलगांव, ऐखण्ड, टोकी, सुकवां, गोल, गुवाड़ी, धाराजी, कोतमीर, नयापुरा के कुल 51 नाम हैं। घोघलगांव से कुल 14 नाम हैं। इन बैनरों के नीचे एक पुराना बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है ‘‘महिला संगठन समिति ग्राम घोघलगांव एवं टोकी’’। इसमें 82 महिलाओं के नाम दर्ज हैं और सभी के नाम के आगे निरपवाद रूप से बाईलिखा है। मंदिर से करीब बीस फुट पहले एक और बोर्ड लगा है जिस पर गांव वालों की ओर से लिखा गया है कि कोई भी शासकीय अधिकारी इस गांव में उनकी अनुमति के बगैर प्रवेश नहीं कर सकता।


हमें मुआयना करता देख एक व्यक्ति ने सरपंच के लड़के को बुलाने के लिए किसी को भीतर भेजा था। हमने देखा सफेद बनियान पहने एक गठीला नौजवान हमारी ओर चला आ रहा था। उसकी चाल में ठसक थी और उसकी धारदार मूंछ के किनारों पर तनाव था। यह कपिल तिरोले था। उसने आते ही हमारे आने का प्रयोजन पूछा। हमने परिचय दिया और गांव में घूमने की इच्छा ज़ाहिर की। उसने बताया कि उसकी मां यहां की सरपंच हैं। सुनकर अच्छा लगा, लेकिन हमारी उम्मीद से उलट उसने मिलवाया अपने पिता राधेश्याम तिरोले से। धारदार मोटी मूंछों वाले राधेश्याम जी के बाल मेहंदी की लाली लिए हुए थे। वे एक मकान के चबूतरे पर जम कर बैठ गए। करीब दर्जन भर अधेड़ और आ गए। बातचीत शुरू हुई तो कुछ लोगों ने अपने हाथ-पैर दिखाए। नई चमड़ी आ रही थी। चबूतरे की दीवार पर नर्मदा बचाओ आंदोलन का पोस्टर लगा था जो 1 जुलाई की विशाल संकल्प रैली के लिए ‘‘चलो ओंकारेश्वर’’ का आह्वान कर रहा था। उसके ठीक ऊपर किसी ने बजाज की मोटरसाइकिल ‘‘बिना चेक तुरंत फाइनेंसका पोस्टर चिपका दिया था। बिना चेक के मोटरसाइकिल कैसे फाइनेंस होती है? हमने पूछा। जवाब में एक साथ सब हंस दिए। यह गांव खुलने को तैयार नहीं दिखता था। हम अभी सोच ही रहे थे कि यहां बातचीत कैसे शुरू हो, तब तक कपिल तिरोले अपना मोबाइल लेकर हमारे पास आया। उसने मोबाइल मुझे पकड़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए, आलोक भइया का फोन है। बात कर लीजिए।’’ फोन पर एनबीए के आलोक अग्रवाल थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या टाइम्स से हैं?’’ मैंने उन्हें साफ किया कि हमारे साथी राहुल इकनॉमिक टाइम्स से हैं लेकिन हम लोग टाइम्स के लिए कोई ऑफिशियल रिपोर्टिंग करने नहीं आए हैं।’’ मैंने एनजीओ क्षेत्र के एकाध परिचित नामों का उन्हें संदर्भ दिया और आश्वस्त किया कि वे चिंता न करें। उसके बाद पता नहीं कपिल से आलोक अग्रवाल की क्या बात हुई, कपिल हमें अपने घर के भीतर ले गए। राधेश्याम जी को भी शायद तसल्ली हो गई थी। इसके बाद एक-एक कर के अपनी मांगों का बैनर उन्होंने हमें दिखाया। कुल आठ मांगें बिल्कुल इसी क्रम में थीं।

-ओंकारेश्वर बांध में 189 मीटर से आगे पानी न बढ़ाया जाए।
-जमीन के बदले जमीन, सिंचित एवं न्यूनतम दो हेक्टेयर जमीन दी जाए।
-प्रत्येक मजदूर को 2.50 लाख रुपए का विशेष अनुदान दिया जाए।
-धाराजी के पांच गांवों की जमीनों का भू-अर्जन कर पुनर्वास करें।
-अतिक्रमणकारियों को पुनर्वास नीति अनुसार कृषि जमीन दी जाए।
-छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाए।
-परिवार सूची से छूटे हुए नामों को शामिल करें।
-पारधी तथा संपेरों को उचित अनुदान दिया जाए।

ये हैं सरपंच पति श्री राधेश्‍यम तिरोले 

अचानक फोन पर करवाई गई बात से हम जरा असहज से हो गए थे। मैंने कपिल से पूछा कि क्या जब भी कोई आता है वे इसी तरह आलोक अग्रवाल को फोन करते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘करना पड़ता है। हम लोग नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोग हैं न। कोई गलत आदमी भी आ सकता है।’’ और वो गांव के बाहर वाला बोर्ड अधिकारियों के लिए? ‘‘हां, कोई भी सरकारी अधिकारी हमारी अनुमति के बिना भीतर नहीं आ सकता। वे लोग यहां आकर लोगों को भड़काते हैं, बहकाते हैं’’, कपिल ने बताया। हमारे सामने एक अधेड़ उम्र के गंभीर से दिखने वाले सज्जन भी थे। उन्होंने अपना नाम चैन भारती बताया। अचानक याद आया कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टर ने जिन दो ग्रामीणों के बयानों का इस्तेमाल किया था, वे और कोई नहीं बल्कि राधेश्याम तिरोले और चैन भारती ही थे। मैंने पूछा कि क्या उन लोगों को टाइम्स ऑफ इंडिया की 15 सितम्बर वाली रिपोर्ट की खबर है जिसमें उनके नाम का इस्तेमाल कर के आंदोलन को बदनाम किया गया है। कपिल ने बताया कि आलोक अग्रवाल ने ऐसी किसी रिपोर्ट का जिक्र जरूर किया था, हालांकि इन लोगों ने उसे देखा नहीं है। मैं वह रिपोर्ट साथ ले गया था। मैंने उन्हें दिखाया। कपिल ने करीने से सजाई अपने अखबारों की फाइल में उसे कहीं रख लिया। हमने जानना चाहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टर के साथ कौन-कौन आया था। कपिल बोले, ‘‘एक तो यहीं के लोकल पत्रकार थे।’’ वह अनंत महेश्वरी के बारे में बात कर रहा था, जिसका नाम सुचंदना गुप्ता की रिपोर्ट में भी है। ‘‘इसके अलावा एक आदमी था जिसको मैं पहचान रहा था। मैंने फोन कर के पता किया...वो बढ़वा का रहने वाला था। बीजेपी का था’’, कपिल ने कहा। वहां बैठे एक और अधेड़ सज्जन ने जोड़ा, ‘‘हां, उस मैडम की डायरी में हर पन्ने पर कमल का फूल बना था।’’

सरपंच पुत्र कपिल तिरोले (बाएं) और चैन भारती गोस्‍वामी (दाएं) 
सवाल उठता है कि अगर गलत रिपोर्टिंग बीजेपी की शह पर हुई है, तो बीजेपी को घोघलगांव के आंदोलन से क्या खुन्नस थी? जबकि यह इकलौता गांव रहा जहां शिवराज सरकार ने मांगें मान लीं? हमने जानना चाहा। कपिल ने बताना शुरू किया, ‘‘यहां आंदोलन के करीब नौवें रोज खंडवा के सांसद अरुण यादव आए थे। वो सुभाष यादव के पुत्र हैं, कांग्रेस से हैं। वो आए और बोले कि मैं जाता हूं, केंद्र में बात रखता हूं। केंद्र में जाकर उन्होंने पर्यावरण मंत्री से बात की। 17 तारीख को वे जवाब लेकर यहां दोबारा आए। वे आकर खटिया पर बैठे ही थे कि पांच मिनट में पानी उतरना शुरू हो गया। जैसे वे आए, पानी उतरना शुरू हो गया।’’ चैन भारती ने बात को थोड़ा और साफ किया, ‘‘यहां की स्थिति दो मायनों में अलग थी। पहली तो यह कि यहां संगठन मजबूत था। दूसरी यह कि यहां कोर्ट का आदेश लागू था कि 189 मीटर पर मुआवजा/बंदोबस्ती करने के बाद ही पानी बढ़ाया जाएगा। हम कोर्ट की मांग को लेकर बैठे थे, इसलिए हमारे ऊपर कोई भी कार्रवाई किया जाना कानून के दायरे से बाहर होता।’’ लेकिन हरदा में जो दमन हुआ वह तो गैर-कानूनी ही था? चैन बोले, ‘‘हां, तो वहां 162 मीटर पर कोर्ट की रोक नहीं थी न!’’ कपिल ने सधे हुए स्वर में कहा, ‘‘और असली बात यह है कि यहां कांग्रेसी सांसद था इसलिए हमारी बात मान ली गई। हरदा की तरह यहां बीजेपी का सांसद होता तो यहां भी अत्याचार करना आसान होता। वैसे वहां कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह गए थे, लेकिन तब तक पुलिस कार्रवाई कर चुकी थी।’’ चैन ने बात को समेटा, ‘‘हरदा में बीजेपी का सांसद और विधायक दोनों होने के कारण वहां लोगों को उठवाना आसान हो गया।’’ बात बची बढ़खलिया की, तो आलोक अग्रवाल के एक फोन कॉल ने ही आंदोलन को खत्म कर डाला। खंडवा के कांग्रेसी सांसद अरुण यादव को कुछ कर पाने का मौका ही नहीं मिला। कपिल ने बीच में टोका, ‘‘वैसे यहां कैलाश विजयवर्गीय और विजय साहा भी आए थे, लेकिन वे तो हमारी विरोधी पार्टी के हैं न!’’ मैंने पूछा, ‘‘तो आप लोग कांग्रेस समर्थक हैं?’’ इसका जवाब भी कपिल ने ही दिया, ‘‘न हम कांग्रेस के साथ हैं, न बीजेपी के साथ। हमें सिर्फ मुआवजा चाहिए।’’ ठीक यही बात खरदना में सुनील राठौर ने भी कही थी।

बाढ़ में तबाह हो चुकी तुअर की फसल 
हमने डूब का क्षेत्र देखने की इच्छा ज़ाहिर की। तीन चमचमाती मोटरसाइकिलों पर राधेश्याम तिरोले, चैन भारती व दो और सज्जन हमें लेकर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चल दिए। गांव की आबादी जहां खत्म होती थी और डूब का पानी जहां तक पहुंच कर लौट चुका था, वहां एक झुग्गीनुमा बस्ती दिख रही थी। हमने जिज्ञासा जताई। राधेश्याम ने बताया कि यह पारधियों की बस्ती है। मैंने पूछा कि ये लोग तो सीधे डूब के प्रभाव में आए थे, तो क्या इनमें से भी कोई सत्याग्रह में शामिल था? राधेश्याम तल्ख स्वर में बोले, ‘‘नहीं, शिकारी हैं ये लोग। सब बीजेपी के वोटर हैं। शराब पीकर दंगा करते हैं।’’ एक जगह पहुंच कर मोटरसाइकिल से हम उतर गए और खेतों में आ गए जहां बीटी कपास और तुअर की नष्ट फसल गिरने के इंतजार में खड़ी थी। फसल को जलाकर पानी वापस जा चुका था। 189 से 190 मीटर यानी सिर्फ एक मीटर की ऊंचाई ने 350 एकड़ की खेती बरबाद कर दी, भारती ने बताया। प्रति एकड़ कपास पर औसतन 14,000 रुपए की लागत का नुकसान हुआ था। हम करीब बीस मिनट उस दलदली जमीन पर चलते रहे। वे हमें एक पहाड़ी के ऊपर ले जा रहे थे जहां से समूचे इलाके को एक नज़र में देखा जा सकता था।

बीटी कपास इस बार बरबाद हो गया 
सामने दिखाते हुए राधेश्याम ने बताया, ‘‘ये रही कावेरी नदी जो आगे जाकर नर्मदा में मिल जाती है। दूसरी ओर है कावेरी का नाला। हमारा गांव इस नदी और नाले के बीच है। एक बार ओंकारेश्वर बांध से पानी रोक दिया जाता है तो पीछे की ओर कावेरी नदी और नाले दोनों में जलस्तर बढता जाता है।’’ तो आप लोग कहां खड़े थे, नदी में या नाले में? हमने पूछा। चैन ने बताया कि नदी के पानी में खड़ा होना संभव नहीं होता, इसीलिए वे नाले के अंत में खड़े थे बिल्कुल गांव के प्रवेश द्वार के पास। ठीक वही जगह जहां से होकर हम आए थे। यह पहाड़ी आबादी से करीब पांच किलोमीटर पीछे रही होगी। बीच में 350 एकड़ डूबी हुई ज़मीन थी और पारधियों की बस्ती। जमीन के लिए चल रहे आंदोलन में पारधियों का डूबना सवाल नहीं था क्योंकि वे बीजेपी के वोटर हैं!    

कावेरी नाले का वह हिस्‍सा जहां 17 दिन तक जल सत्‍याग्रह चला 

हम गांव लौट आए। चलते-चलते हमने पूछा, ‘‘कैसा लगता है आप लोगों को कि आपके गांव को अब लोग टीवी के माध्यम से जान गए हैं?’’ एक अधेड़ मुस्कराते हुए बोले, ‘‘हां, हमारे आंदोलन की नकल कर के अब तो समुंदर में भी लोग खड़े होने लगे हैं।’’ उसका इशारा कुदानकुलम न्यूक्लियर प्लांट के विरोध में समुद्र में सत्याग्रह करने वाले ग्रामीणों की ओर था। सबसे विदा लेकर हम उस जगह की ओर बढ़े जहां ऐसा लगता था मानो कल रात कोई मेला खत्म हुआ हो। सरपंच पति राधेश्याम तिरोले ने वहां लगे सारे बैनरों के आगे खड़े होकर तस्वीर खिंचवाई। उनकी पत्नी से हम नहीं मिल पाए। वे महिला संगठन के बोर्ड में दर्ज एक नाम भर थीं। गाड़ी में बैठते ही ऐसा लगा मानो हम किसी जेल से छूटे हों। (क्रमश:) 

अलविदा घोघलगांव... 

10/27/2012

कहानी तीन गांवों की: तीसरी किस्‍त

अभिषेक श्रीवास्‍तव

(गतांक से आगे)
हमने अपने अखबारी जीव से जानना चाहा कि इस गांव की दिक्कत क्या है। उसने बताया कि यहां शुरू में सब ठीक था, लेकिन बाद में नर्मदा बांध प्राधिकरण के किसी सीईओ और बीजेपी विधायक की साठगांठ से लोग बंटते चले गए। इसके अलावा डूब से सबसे ज्यादा अगर किसी गांव को खतरा है तो वो बढ़खलिया ही है, लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि यहां के जल सत्याग्रह की खबर कहीं नहीं छपी। जिन्होंने आंदोलन करवाया, उन्हीं ने पुलिस का डर दिखा कर तुड़वा दिया। सबसे बड़े अफसोस की बात तो ये है कि जब गांव में पानी आने लगा तब लोगों को पता चला कि यह गांव भी डूबने वाला है जबकि यह बात हरसूद के डूबने के वक्त से ही साफ थी। पहली बार उसने चैंकाने वाली बात कही, ‘‘सर, सारी लड़ाई दो मीटर की है। अब इसी में किसी को 219 रुपए का चेक मिल जाता है तो कोई दोहरा मुआवजा लेने की कोशिश करता है।’’ दोहरा मुआवजा? मतलब? उसने सपाट चेहरे से कहा, ‘‘कई लोग हैं जिन्होंने अपनी जमीन डूबने के बाद उन जगहों पर ज़मीन खरीद ली जो बाद में डूबने वाली थीं। इससे उन्हें दो जगह का मुआवज़ा मिल गया। पानी में खड़े कई लोग इनमें से हैं।’’
 
अब तो यह बोर्ड भी नहीं दिखता, सब कुछ नया-नया है
वहां से निकलते वक्त सोया के खेतों के बीच बियाबान में एक दुमंजि़ले मकान में लगे दो एयरकंडीशनर देख कर हमारी बची-खुची ज़बान भी बंद हो गई। खरदना से हम बहसते निकले थे। बड़खलिया ने हमें गहरी सोच में धकेल दिया। यात्रा की असली चमक हालांकि अभी 30 किलोमीटर आगे थी। नया हरसूद, जहां हमारे साथी को श्राद्ध के लिए जाना था।
 
स्टेट हाइवे से नया हरसूद बिल्कुल किसी औद्योगिक नगरी की तरह चमक रहा था। जैसे ट्रेन में रात में टिमटिमाती बत्तियां अचानक दीख जाती हैं। चारों ओर बिल्कुल सन्नाटा था। घुप्प अंधेरा। और दूर बत्तियों की कतार, जिनकी ओर हम तेज़ी से बढ़े जा रहे थे। हवा ठंडी थी। मौसम शांत। अचानक लगा कि जंगल के बीच किसी ने विकासको लाकर रख दिया हो। यह नया हरसूद था। पक्की सड़कें। दोनों ओर दुकानें। पक्के मकान। पूर्वांचल के किसी भी मध्यम कहे जा सकने वाले शहर से बेहतर तरतीब में गढ़ा हुआ एक पुनर्वास स्थल। इतना व्यवस्थित तो खंडवा शहर भी नहीं था। शहर में प्रवेश करने के करीब आधा किलोमीटर बाद एक चौराहा पड़ा। नाम देख कर नज़रें ठिठक गईं- भगत सिंह चौक। सड़कों पर सन्नाटा था। दोनों ओर एकाध दुकानें खुली हुई थीं। हमारा युवा साथी किसी को फोन कर के दवा की दुकान पर बुला रहा था। अचानक उसने गाड़ी रुकवाई। दाहिने हाथ पर सड़क पार एक दवा की दुकान थी जहां से एक अधेड़ वय के सज्जन सफेद सफारी सूट में चले आ रहे थे। ‘‘ये मेरे अंकल हैं’’, उसने मिलवाया। उसने बताया कि उसे पत्रकारिता में लाने का श्रेय इन्हीं को जाता है। वो बचपन में इन्हीं की एजेंसी के अखबार बांटा करता था। श्राद्ध कार्यक्रम उनकी पत्नी का था जहां उसे जाना था। हालचाल और अगली बार मिलने के औपचारिक आश्वासन के बाद हम निकलने लगे तो अखबारी जीव ने कहा, ‘‘सर, ओंकारेश्वर जाना मत भूलिएगा। मैं वहां फोन कर देता हूं। हमारा रिपोर्टर आपको अच्छे से दर्शन करवा देगा।’’ मैंने उसे गले लगाया, उसके अंकल को हमने नमस्कार किया और आगे बढ़ गए।
 
 
 
दर्शन वाली बात में हम अटक गए थे, या कहें पिछली रात से ही अटके हुए थे। दरअसल, बढ़खलिया से यहां के रास्ते में उसने नया हरसूद के बारे में काफी जानकारी दी थी। मसलन, उसके पिता को यहां हर कोई जानता है। अपनी बिरादरी में सबसे ज्यादा वही पढ़ा लिखा है। हरसूद डूबने के बाद मछुआरे यहां से गायब हो गए हैं। कभी यहां हरसूद से उजड़ कर पचीस हजार लोग आए थे, लेकिन अब आबादी सिर्फ दस हजार रह गई है। उसकी सारी सूचनाएं टूटी-फूटी और असम्बद्ध थीं, लेकिन उसके भीतर हरसूद नहीं बल्कि इस नए शहर को लेकर नॉस्टेल्जिया ज्यादा था। मान लें कि उसकी उम्र 22 साल भी रही होगी, तो बचपन के 14 साल उसने पुराने हरसूद में ज़रूर गुज़ारे होंगे। फिर उसकी स्मृति में उस हरसूद से जुड़ा कुछ भी क्यों नहीं था? हमने उससे देसी मुर्गा खिलाने का आग्रह किया, तो उसने मुंह बिचका दिया। वह शुद्ध शाकाहारी निकला। उसका शाकाहार खाने तक सीमित होता तो ठीक था लेकिन बातचीत के दौरान उसकी राजनीतिक पसंद में जब यह अचानक ज़ाहिर हुआ तो हम ज़रा चौंके थे, ‘‘सर, आइ लाइक नरेंद्र मोदी’’ राहुल ने बेचैन होकर उसके पिता और भाई का नाम पूछ डाला। ‘‘सर, फादर का नाम हनीफ भाई तांगे वाला है और भाई का नाम इकराम है। वे ऑटो चलाते हैं।’’ हमारी शहरी धारणाएं टूट चुकी थीं। उधर वो श्राद्ध तर्पण कर रहा था।
 
यही सब गुनते-बतियाते हम खंडवा की ओर निकल पड़े। काफी रात हो चुकी थी। नए हरसूद से बाहर निकलने के रास्ते में कम से चार जगह एक ही बोर्ड लगा दिखा जिन पर लिखा था- स्कॉच। ड्राइवर ने बताया उस जगह का नाम छनेरा था। हरसूद उजड़ने के बाद यहां जिस तेजी से सामाजिक ताना-बाना टूटा है, नए हरसूद में उस खाली जगह को यही स्कॉचभर रही है। हमारे पीछे छूट गए साथी ने भी बताया था कि कैसे यह समूचा शहर मुकदमों की दास्तान है। हरसूद से जब लोग नया हरसूद आए थे, उसके बाद जमीन-जायदाद से जुड़े मुकदमों की बाढ़ आ गई। आज की तारीख में करीब 25000 याचिकाएं लंबित पड़ी हैं और दो इंसानों के बीच एक हलफनामे का रिश्ता शेष रह गया है।
 
हम वापस हाइवे पर आ गए। ठंडी हवा में ओवरलोड दिमाग लहर मार रहा था। सोने के लिए घंटे कम थे क्योंकि अगले ही दिन दर्शनके लिए तड़के निकलना था। खंडवा में होटल पहुंचकर हमने ड्राइवर को सवेरे साढ़े छह बजे वापस आने की हिदायत दी और पूरा रूट मैप उसे समझा दिया। वह भी खुश था कि हमारे बहाने उसे दर्शनहो जाएंगे। (क्रमश:)
 

10/25/2012

कहानी तीन गांवों की: दूसरी किस्‍त


अभिषेक श्रीवास्‍तव 

(गतांक से आगे)

हम आगे बढ़ चुके थे, लेकिन दिमाग खरदना में ही अटका था। गाड़ी में हमारी आपस में बहस भी हो गई। इस चक्कर में हमने ये जानने की कोशिश तक नहीं की कि हम जा कहां रहे हैं। हरदा शहर पहुंच कर टीवी चैनल के पत्रकार साथी को उतरना था जो हमारे साथ यहीं से जुड़े थे। उन्हें लेने आए थे एक दूसरे टीवी पत्रकार जो हमारे लिए कुछ खाने-पीने को भी लाए थे। उन्होंने आग्रह किया कि एक बार हरदा का ज़रदा चख कर ज़रूर देखा जाए। यहां अपने किस्म का पान मिलना तो मुश्किल था। सिर्फ मीठा पत्ता रखा था। एक कांच के डिब्बे में से कुछ सूखी पत्तियां निकाल कर पान वाले लड़के ने उसमें ढेर सारा चूना भर दिया और तर्जनी से मलने लगा। कुछ देर में यह सादी पत्ती जैसा दिखने लगा। मीठे पत्ते में उसे भर कर उसने पान को लौंग से बांध दिया। यह मेरे लिए नया था। पान मुंह में दबा कर हम लोगों ने उनसे विदा ली। शाम के पांच बज चुके थे। हम बढ़खलिया गांव की ओर बढ़ रहे थे। हरदा पीछे छूट चुका था और असर छोड़ने से पहले ही ज़रदा घुल कर खत्म हो चुका था। मुंह का ज़ायका खराब हो गया था।


खंडवा-हरदा रोड पर ऐसे दृश्‍य आम हैं 
अब गाड़ी में एक स्थानीय अखबारी जीव के साथ मैं था और साथी राहुल। दूसरे साथी को जीव कहना दो वजहों से है। पहला इसलिए कि उन्होंने अपना नाम कहीं भी लिखने से मना किया हुआ है। दूसरे, ऐसा जीव हमने वास्तव में पहले कभी नहीं देखा था। सिर्फ दो साल हुए हैं उसे पत्रकारिता में आए। बेहद विनम्र, संकोची और सहजता की हद तक असहज। पिछली रात जब वे हमें बस अड्डे पर लेने आए थे, तो हमने दबाव डाल कर अपने साथ होटल में उन्हें चाय पिलाई और खाना खिलाया। उस रात शहर में गणेश प्रतिमा विसर्जन की धूम थी। इंदौर से लेकर खंडवा तक इस उत्सव के चलते मध्यप्रदेश का एक भी सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था। लगता था हम महाराष्ट्र में आ गए हों। हमारा होटल भी बॉम्बे बाज़ार में था। शायद किसी ने इंदौर में हमसे सही ही कहा था कि इंदौर में खड़े होकर आप मध्यप्रदेश को नहीं समझ सकते। खंडवा के लिए भी यह बात सही थी। पहली मुलाकात में उस युवतर बंधु ने बताया कि उसकी आज नाइट ड्यूटी है। ‘‘शहर बहुत संवेदनशील है। कुछ भी हो सकता है आज रात।’’ इस दौरान अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर नौकरी तक की पूरी कहानी उसने सुना डाली। यह भी कि वे हरसूद के रहने वाले हैं। उनकी भी ज़मीनें डूबी हैं। उनके पिता हरसूद में तांगा चलाते थे और अब भी नए हरसूद में यही काम करते हैं। हमें लगा था कि उसके साथ घूमना सार्थक हो सकता है क्योंकि एक डूब प्रभावित व्यक्ति चीज़ों को बेहतर तरीके से हमें दिखा सकता है।

बढ़खलिया पर गिरती अंधेरे की चादर 
लेकिन पिछली रात से अब अगले दिन की शाम हो चुकी थी और उसने हमें सिर्फ दो जानकारियां दी थीं। एक अपने बारे में और दूसरी ‘‘पवित्र’’ नर्मदा के बारे में, जिसमें डुबकी लगाना और ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना बहुत महात्म्य का काम है। दरअसल, जिस बढ़खलिया गांव में वे हमें ले जा रहे थे, वहां छात्र जीवन में वे अखबार बांटा करते थे और इसी से पत्रकार बनने की ललक उनमें पैदा हुई। वहां जाने की एक और वजह यह थी कि वे बढ़खलिया से परिचित थे और उसके आगे रास्ते में नया हरसूद पड़ता था जहां उन्हें एक करीबी परिवार के श्राद्ध कार्यक्रम में शामिल होने जाना था। हमने कार्यक्रम को उन्हीं के हिसाब से चलने दिया, लेकिन यह रास्ता इतना आसान भी नहीं था। बढ़खलिया जाने वाली प्रधानमंत्री ग्राम सड़क के गड्ढे में हमारी गाड़ी बिदक गई और ड्राइवर साहब अड़ गए। एकाध गांव वालों की मदद से गड्ढा पार तो हो गया, लेकिन मदद का नेतृत्व करने वाले सज्जन हमारे मोबाइल नंबर के लिए पीछे पड़ गए। बोले, ‘‘सर, लगता है कोई बहुत ज़रूरी फाइल के लिए इतनी रात को गांव जा रहे हैं। मैं फलाने वर्मा और आप? नंबर दीजिए न? डायरी ले आता हूं...।’’ बड़ी मुश्किल से जान छूटी और नज़र गाड़ी के डम्पर की ओर पहली बार गई। देखा, तो नीचे भारतीय जनता पार्टी लिखा हुआ था। ज़रूरी फाइल का मर्म समझ में आ गया, लेकिन उस अखबारी जीव पर पहली बार गुस्सा आया। यह गाड़ी उसी ने करवाई थी। बढ़खलिया में प्रवेश करते-करते पूरा अंधेरा हो चुका था।


बाएं हाथ पर पहली रोशन सी एक गुमटी के पास गाड़ी रुकी, तो अचानक भीड़ जुट गई। लोगों ने हमारे साथ मौजूद जीव को पहचान लिया था। कुछ लोगों से राम-राम के बाद उसने हमारा परिचय कराया और सबके साथ हम चल दिए डूब का इलाका देखने। दरअसल, यहां डूब का मामला थोड़ा अलग है। पानी यहां भी इंदिरा सागर बांध यानी नर्मदा का ही है, लेकिन जानने वाली बात ये है कि जो पानी इस गांव को डुबो रहा है वह दरअसल हरसूद के डूब क्षेत्र का विस्तार है। यानी 2004 में नर्मदा के पानी में डूबे 700 साल पुराने शहर हरसूद से यह गांव बिल्कुल सटा हुआ है। गांव में बिजली नहीं थी। नीम अंधेरे में हम मुश्किल से 200 मीटर आगे गए होंगे कि लगा जैसे गांव खत्म! अंधेरे में ज़मीन और पानी का फर्क मिट गया था! सामने अंतहीन समुद्र था। गले में पीला गमछा डाले दुबले-पतले एक शख्स ने बताया, ‘‘यही हरसूद है साहब। उस पार जहां पेड़ दिख रहे हैं, वहीं स्टेट हाइवे है। हरसूद से खंडवा वाली मेन रोड। और वो देखिए रेलवे स्टेशन, जो डूब चुका है।’’ उसे सब कुछ दिख रहा था। मैं सिर्फ हिलते पानी को देखे जा रहा था। एक शहर जिसके नीचे दबा हुआ था। एक गांव जो दफन होने के इंतज़ार में आखिरी सांसें गिन रहा था। 

इसी पानी के नीचे दबा है हरसूद और बीच में बढ़खलिया का इकलौता हैंडपम्‍प  

उसका नाम मैंने नहीं पूछा, लेकिन वो बोलता रहा, ‘‘वो देखिए गांव का इकलौता हैंडपंप... दिख रहा है न... हैंडल निकला हुआ.. हां, वही।’’ एक महिला मेरे पीछे खड़ी थी। उसने अपना नाम कमला बताया, बोली, ‘‘यही एक हैंडपंप था। अब यही पानी पाते हैं हम लोग... सड़ा हुआ। इसी में जानवर भी नहाते हैं।’’ अचानक पीले गमछे वाला बोल पड़ा, ‘‘सर, कुछ दबंग लोग हैं यहां। उनके पास ट्यूबवेल है लेकिन वे इनको पानी नहीं पीने देते।’’ पीछे से एक आवाज़ आई, ‘‘ट्यूबवेल में भी कहां तीन दिन से पानी आ रहा है?’’ मैंने हैंडपंप की तस्वीर लेनी चाही तो फ्रेम में पानी भरती एक महिला भी दिख गई। अचानक पीले गमछे वाला करीब आया और कान में बोला, ‘‘सर, अब हम लोग कुछ नहीं बोल पाएंगे। वो देखो, दबंग लोग आ रहे हैं। आप चलो यहां से।’’ उसके मुंह से शराब का भभूका आया। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। अंधेरे को चीरती दो मोटरसाइकिलें धीरे-धीरे चली आ रही थीं।

एक नौजवान मोटरसाइकिल से उतरा। बाकी लोग कुछ पीछे की ओर हट गए। उसने अपना नाम रामचंद्र मीणा बताया। उसके साथ दो और युवक थे। हमारा परिचय लेने के बाद उसने सबसे पहले बताया कि यहां भी घोघलगांव और खरदना के साथ-साथ जल सत्याग्रह हुआ था। अजीब बात है कि हम इतनी देर से यहां थे, लेकिन अब तक इस बात का जि़क्र किसी ने क्यों नहीं किया था? किसी अखबार में भी जल सत्याग्रह के संबंध में बढ़खलिया का नाम नहीं दिखा था। मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘‘कितने दिन चला था यहां पर?’’ ‘‘सर, 14 दिन तक चला था। लोग पानी में वैसे ही खड़े थे जैसे बाकी जगहों पर, लेकिन यहां खत्म करवा दिया गया।’’ इतने में हमारे साथी अखबारी जीव अपनी बात को उससे बचाते हुए अंग्रेज़ी में फुसफुसाए, ‘‘सर, ही इज़ ऐन इम्पलॉई ऑफ एनबीए’’’ रामचंद्र दबंग था या कर्मचारी, लेकिन मेरी दिलचस्पी उसमें बढ़ गई थी। मैंने पूरी घटना उससे समझने की कोशिश की।

रामचंद्र मीणा (सबसे दाएं) और उसके साथी सत्‍याग्रह स्‍थल पर 
दरअसल, बढ़खलिया में घोघलगांव के बाद दूसरे नंबर पर जल सत्याग्रह शुरू हुआ। हरदा के खरदना में इसके बाद शुरू हुआ। यहां भी मेधा पाटकर नहीं आई थीं। रामचंद्र मीणा के मुताबिक तब वे धार जि़ले में किसी धरने पर बैठी थीं। यहां का आंदोलन एनबीए के कर्मचारीविकास भाई चला रहे थे। रामचंद्र ने बताया, ‘‘जिस दिन खरदना में ग्रामीणों को पानी से निकालने के लिए पुलिस आई, वहां से आलोक अग्रवाल ने विकास जी को फोन किया। उन्होंने विकास से कहा कि आंदोलन खत्म कर दो नहीं तो वहां भी पुलिस आ जाएगी।’’ और फोन रखते ही यहां आंदोलन के अंत की घोषणा कर दी गई। लोग तुरंत पानी से बाहर निकल आए। इस घटना की एक और तह रामचंद्र के अलावा दूसरे युवकों से बात कर के खुलती है। रामचंद्र अपने घर में चाय बनवाने गए थे, उस दौरान कुछ लोगों ने हमें बताया कि यहां का सरपंच दबंग है और भाजपाई विधायक तथा नर्मदा बांध के अधिकारियों के साथ उसकी साठगांठ है। दरअसल आंदोलन टूटने के पीछे वजह यह थी कि विधायक ने इसे खत्म करवाने का दबाव सरपंच पर डाला था। वे बताते हैं कि ग्रामीणों में एकता नहीं है। यहां एक तरफ कुछ दबंग लोग हैं और दूसरी ओर कमज़ोर आबादी। आधे से ज्यादा लोग यहां मीणा हैं, हालांकि यहां के मीणा सवर्ण हैं। इसके अलावा पटेल हैं और कुछ ब्राह्मण भी हैं। आदिवासी इस गांव में हैं ही नहीं और पिछड़े भी नहीं के बराबर हैं। आर्थिक रूप से यह गांव उतना कमज़ोर नहीं है, लेकिन आंदोलन के शुरू होने से लेकर टूटने तक की पूरी कहानी भाजपाई विधायक, सरपंच आदि की सरमायेदारी का सिलसिला है। वे तमाम लोग आंदोलन से बाहर रखे गए थे जिनका किसी भी गुट से लेना-देना नहीं था।


सरकारी मज़ाक : डेढ़ बीघा ज़मीन का मुआवज़ा 219 रुपए!

पीले गमछे वाला पतला दुबला आदमी इन्हीं में से एक था। वह जबरदस्ती हमें कमला मीणा के घर ले गया। इनके पूर्वज राजस्थान टोंक से आए थे। अधिकतर परिवारों का मूल राजस्थान ही है। गाय बांधने वाली जगह पर पानी है। रसोई की फर्श अब भी गीली है और धंस रही है। दो पीछे के कमरे एक बार डूब कर उपरा चुके हैं। सर्वे में डूब के क्षेत्र में सिर्फ एक कमरा आया था। दूसरे कमरे के बारे में कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई थी! बाढ़ के सर्वे का इससे बड़ा मज़ाक और क्या हो सकता है? मुनादी हुई नहीं और घर डूब गया। इस घर के पीछे से होते हुए हम जहां पहुंचते हैं, वह जगह उजड़ चुकी है। दो कमरे हैं। ताला बंद। दीवारें ढहने को हैं। ज़मीन दलदली है। जंगली पौधों का साम्राज्य है। पीले गमछे वाला कहता है, ‘‘साहब, ये मेरा घर! दो आरे (करीब डेढ़ बीघा) जमीन डूब गई। ढाई लाख की जगह 40,000 प्रति एकड़ का हिसाब लगा कर मुआवजा दिया गया। आप देखना चाहेंगे? अभी आता हूं।’’ 

कह कर वो गायब हो गया। बाकी लोग हमें लेकर आगे बढ़ गए जहां रामचंद्र मीणा चाय लेकर इंतजार कर रहा था। देर काफी हो चुकी थी। हमने चाय के लिए मना किया। हमारे साथी अखबारी जीव बोले, ‘‘यहां लोग चाय का मना करने पर बुरा मान जाते हैं। जल्दी पी लीजिए, फिर निकलते हैं।’’ खड़े-खड़े हम चाय सुड़क रहे थे और लोगों का मजमा बढ़ता जा रहा था। अचानक कहीं से पीले गमछे वाला निकल कर बीच में आ गया और उसने कागज का एक टुकड़ा ऐन मेरे मुंह के सामने कर दिया। ये क्या है? ‘‘सर, मैं पंडित हूं। झूठ नहीं बोलता। मुआवजे का चेक है- 219 रुपए! दो आरे की कीमत 219 रुपए दी गई! खाता खुलवाने में ही 500 रुपया लगता है।’’ 

सड़क वही, बस दृश्‍य बदल चुका है...  
हम हतप्रभ थे। मैंने उसका चेहरा हलकी रोशनी में किया और तस्वीर उतारने लगा तो पीछे से आवाज़ आई- ‘‘मढ़वा कर दीवार पर लटका ले।’’ उसने पास आकर धीरे से कहा, ‘‘सर, दबंग लोग हैं। आप निकल लो।’’ इस बार हमने उसकी बात मान ली। गाड़ी बढ़खलिया से निकल चुकी थी। (क्रमश:) 


10/22/2012

कहानी तीन गांवों की : पहली किस्‍त

अभिषेक श्रीवास्‍तव 


बचपन में सुदर्शन की लिखी एक कहानी पढ़ी थी हार की जीत। घटनाओं के विवरण छोड़ दें तो बाकी सब याद है। इसमें एक पात्र था बाबा भारती जिसके पास सुलतान नाम का एक बांका घोड़ा हुआ करता था। एक बार सुलतान पर डाकू खड़गसिंह का दिल आ गया। उसने राह में एक अपाहिज का भेस धरकर बाबा भारती का घोड़ा छीन लिया। इसके बाद बाबा भारती ने उससे एक बात कही थी कि वह चाहे तो घोड़ा ले जाए, लेकिन बदले में वचन दे कि इस घटना का जि़क्र किसी से नहीं करेगा क्योंकि ऐसा करने से गरीब अपाहिजों पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा। इस कहानी की इकलौती यही बात मुझे आज तक याद है। शायद इसीलिए कुछ चीजों के मामले में एक विशुद्ध नैतिक आग्रह लगातार मन के भीतर बना रहता है। शायद यही वजह रही होगी कि मध्यप्रदेश के घोघलगांव से लौटने के दो हफ्ते बाद तक रोज़ चाह कर भी अपना यात्रा संस्मरण मैं नहीं लिख पा रहा था। यह ठीक है कि मैंने न तो किसी को ऐसा वचन दिया है, न ही मुझसे किसी बाबा ने ऐसा कोई वचन लिया है। इसलिए कहानी तो मैं कहूंगा।

अगस्‍त के आखिरी सप्‍ताह में वायरल हुई घोघलगांव की यह तस्‍वीर 

यह कहानी तीन गांवों की है। मैंने ऊपर घोघलगांव का नाम अकेले इसलिए लिया क्योंकि दुनिया के संघर्षों के मानचित्र पर अब यह परिचित हो चला है। याद करिए कि अगस्त के आखिरी हफ्ते में एक तस्वीर बड़े संक्रामक तरीके से फेसबुक से लेकर अखबारों और चैनलों समेत हर जगह फैल गई थी। इसमें कुछ ग्रामीणों को बांध के पानी में खड़ा दिखाया गया था। वे बांध की ऊंचाई को कम करने की मांग कर रहे थे। मामला ओंकारेश्वर बांध का था और जगह थी मध्यप्रदेश का खंडवा जिला। भारी जनसमर्थन उमड़ा। ऑनलाइन पिटीशन चलाए गए। मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजे गए। 10 सितम्बर को हमें बताया गया कि ग्रामीणों की जीत हुई है। इसके दो दिन बाद हरदा जिले के एक गांव की बिल्कुल ऐसी ही तस्वीरें प्रचार माध्यमों में वायरल हो गईं। यहां मामला इंदिरासागर बांध की ऊंचाई का था। 12 सितम्बर की रात यहां पुलिस का दमन हुआ। ग्रामीणों की कोई मांग नहीं मानी गई। उन्हें जबरन पानी से खींच कर बाहर निकाला गया, ऐसी खबरें आईं। इन दोनों घटनाओं को एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर छपी, 'रियलिटी बाइट्सः खंडवाज़ मेड फॉर टीवी प्रोटेस्ट' जिसमें घोघलगांव के आंदोलन को फर्जी और टीवी पर प्रचार बटोरने के उद्देश्य से गढ़ा हुआ बताया गया था। (http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-09-15/india/33862213_1_water-jal-satyagrah-agitators) ठीक तीन दिन बाद 18 सितम्बर को नर्मदा बचाओ आंदोलन की चित्तरूपा पलित के हवाले से उपर्युक्त रिपोर्ट का खंडन इसी अखबार में छपा कि खंडवा का आंदोलन टीवी प्रचार के लिए नहीं था। (http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-09-18/india/33925092_1_omkareshwar-dam-jal-satyagraha-water-level) खंडन के जवाब में 15 सितंबर की रिपोर्ट लिखने वाली पत्रकार सुचंदना गुप्ता ने अपने अनुभव का हवाला दिया और अपने निष्कर्षों पर अड़ी रहीं। ज़ाहिर है गुप्ता की खबर का चारों ओर असर हुआ था।

एक आंदोलन के खंडन-मंडन का यह सिलसिला अंतहीन सा दिखता था जिसमें सत्य और तथ्य सब धुंधले हो चुके थे। ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सा दिखने वाला एक विरोध प्रदर्शन छोटी सी अखबारी रिपोर्ट के बाद इस तरह चिंदी-चिंदी हो जाएगा, अपने सरोकार के लिए लड़ रहे ग्रामीणों की विश्वसनीयता इस तरह अचानक खतरे में पड़ जाएगी, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पत्रकार सुचंदना गुप्ता के दावे ग्रामीणों से उनकी बातचीत और गांव के दौरे पर आधारित थे। इसे यूं ही नहीं जाने दिया जा सकता था। इसके उलट 17 दिनों तक पानी के भीतर खड़े रह कर अपनी चमड़ी गलाने वाले ग्रामीणों को इतने सस्ते में बदनाम हो जाने देना भी ठीक नहीं था। सच जानने का एक ही तरीका था कि उन गांवों में खुद पहुंचा जाए जहां जल सत्याग्रहहुआ था। शायद यही सोच लिए हम 28 सितम्बर की सुबह इंदौर पहुंचे। हम यानी मैं और मेरे साथी राहुल कुमार, जो इकनॉमिक टाइम्स के पत्रकार हैं। हमें सबसे पहले घोघलगांव पहुंचने की बेचैनी थी, लेकिन विडंबना देखिए कि तकनीकी कारणों से अपनी यात्रा के आखिरी दिन ही हम वहां पहुंच सके। अब लगता है कि एक लिहाज से यह ठीक ही रहा क्योंकि चीज़ों को समझने की ज़मीन तब तक तैयार हो चुकी थी। यह ज़मीन हालांकि अपनी नहीं थी।

किशोर कुमार की अड़ी: खंडवा में पोहा-जलेबी की लालाजी की दुकान 
इंदौर में एक दिन बिताकर हम 29 सितम्बर की शाम बस से खंडवा पहुंचे। वहां पहुंचने पर पता चला कि घोघलगांव आधे रास्ते में सनावद के पास ही छूट गया था। यानी घोघलगांव से हम करीब अस्सी किलोमीटर आगे थे जबकि हरदा की दूरी ठीक उलटी दिशा में करीब 130 किलोमीटर है। दूरियों का हिसाब लगाते हुए हमने सबसे पहले हरदा जाने की योजना बनाई क्योंकि वहां से लौटती में हरसूद को देखना भी संभव हो पाता। एक स्थानीय अखबारी जीव के साथ 30 सितम्बर की सुबह खंडवा की मशहूर जलेबी और पोहा खाने के बाद हम निकल पड़े हरदा के खरदना गांव की ओर, जहां जल सत्याग्रहनाकाम रहा था। हमें अखबारों ने बताया था कि यहां पुलिस ने आधी रात 200 ग्रामीणों को पानी में से उठा लिया था। खंडवा से हरदा के रास्ते में दिखने वाली दो चीज़ों से आप इस इलाके की सामाजिक-आर्थिक हैसियत का पता लगा सकते हैं। पहली सोयाबीन की फसल है जो सड़क के दोनों ओर धरती पर पीली चादर की तरह बिछी हुई थी। सोया के अलावा और कोई फसल ऐसी नहीं थी जिस पर हमारा ध्यान बरबस चला जाता। हमें खेतों में विशाल हारवेस्टर दिखे। एकाध सड़क पर भी दौड़ रहे थे। उन पर पंजाब या हरियाणा की नंबर प्लेट थी। पता चला कि यह सोया की कटाई का मौसम है। ये हारवेस्टर मालिक पंजाबी हैं जो यहां कटाई के एवज में आम तौर पर पैसे की जगह सोया ही वसूलते हैं। दस बोरे की कटाई पर हारवेस्टर मालिक को एक बोरा सोया मिल जाती है। चूंकि कटाई हारवेस्टर से होती है, तो यहां के किसानों के पास रकबा भी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश और बिहार या उड़ीसा के नज़रिये से देखें तो यहां के किसान बहुत बड़े नज़र आएंगे क्योंकि औसत जोत 50-70 एकड़ की है जिनमें सिर्फ नकदी फसलें होती हैं।


हरदा का ऐतिहासिक घंटाघर 
बहरहाल, हरदा में प्रवेश का पता शहर में मौजूद एक ऐतिहासिक घंटाघर देता है। इस पर तारीख लिखी है 15 अगस्त 1947 और यहां से हमें करीब 30 किलोमीटर और भीतर जाना है। कुछ देर के बाद हमारी रफ्तार कम हो जाती है। हम स्टेट हाइवे से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनी एक संकरी सड़क पर आ जाते हैं। सड़क पक्की है, बीच-बीच में हिचकोले हैं और कहीं-कहीं चार दिन पहले हुई बारिश के निशान मौजूद हैं। करीब 25 किलोमीटर बाद रास्ता कच्चा है। लगता है हम गांव में आ गए। आबादी की शुरुआत का पता देता एक हैंडपम्प और एक छोटी सी गुमटी है जहां चार-पांच लोग बैठे हैं। पूछने पर पता चलता है कि यही गांव खरदना है। हमारे साथ मौजूद एक स्थानीय टीवी पत्रकार पहले यहां आ चुके हैं। वे सरपंच के लड़के को फोन लगाते हैं, तब तक हम वहां मौजूद लोगों को अपना परिचय देते हैं। गांव भीतर की ओर बिल्कुल उजाड़ दिख रहा है। पता चलता है कि अधिकतर लोग आज सोया की कटाई में गए हुए हैं। यहां मौजूद एकाध युवक हमें उस जगह लिए चलते हैं जहां सत्याग्रह हुआ था।


आंदोलन की राख: हरदा का खरदना गांव 
‘‘यहीं बैठते थे हम लोग रात-रात भर’’, नीम के पेड़ के नीचे एक बुझे हुए चूल्हे की ओर इशारा करते एक अधेड़ बताते हैं। पेड़ के ठीक सामने से जो महासागर शुरू होता है, उसका ओर-छोर नहीं दिखता। इसी के भीतर 29 गांव डूब चुके हैं या टापू बन गए हैं। वहां तक सिर्फ नाव से जाया जा सकता है। जहां पानी शुरू होता है, वहां दो भैंसे नहा रही हैं और कुछ दूरी पर एक झंडा पानी में खड़ा है। ‘‘लाल झंडा? ये क्या है?’’ सहसा मैंने पूछ लिया। अधेड़ ने बताया, ‘‘यहीं हम लोग खड़े होते थे। ये आंदोलन की निशानी है।’’ मैंने जिज्ञासावश बात आगे बढ़ाई, ‘लाल ही क्यों? नीला क्यों नहीं? किसने बताया कि लाल झंडा लगाना है?’’ एक शहरी हो चुके दिमाग के लिए उसका जवाब अप्रत्याशित और अकल्पनीय था, ‘‘नर्मदा का पानी है न ये... मां नर्मदा। हम लोग नर्मदा को माता मानते हैं, इसीलिए लाल रंग है।’’



खरदना में जल सत्‍याग्रह स्‍थल जहां बस एक लाल झंडे की निशानी बाकी है  
मां नर्मदा के अविकल बहाव में सरकार ने एक दीवार खड़ी कर दी थी। इसी दीवार को नर्मदा सागर बांध या इंदिरा सागर बांध कहते हैं। जब तक दीवार की ऊंचाई आड़े नहीं आई थी, नर्मदा से सिंचित इस ज़मीन का सारा सुख अब तक की तमाम पीढि़यों ने भरपूर भोगा। अचानक एक दिन सिर्फ एक मीटर के अनकहे खेल ने 300 गांवों को अपनी जद में ले लिया। नौजवान सुनील राठौर यहां के आंदोलन के नेता हैं। उनकी चमचमाती बाइक के आगे उनकी बिटिया राधिका का नाम लिखा है। एक सधे हुए नेता की जबान में वे बताते हैं, ‘‘बिना मुनादी के बांध की ऊंचाई इन्होंने बढ़ा दी। डूब क्षेत्र में 300 गांव आते हैं। 29 गांव डूब गए। चूंकि यहां प्रभावित गांवों की संख्या ज्यादा हैं, इसलिए सरकार ने हमारी मांगें नहीं मानीं। घोघल में कम गांव डूब क्षेत्र में हैं, तो वहां झुनझुना थमा दिया।’’ पहली बार मैंने ध्यान से सभी चेहरों को देखा। सबके हाथ में मोबाइल है। नौजवानों के पास मोटरसाइकिल है। सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा नौजवान नौवीं पास है क्योंकि यहां से इंटर कॉलेज 35 किलोमीटर दूर है। और किसी के पास कोई काम नहीं। ‘‘नरेगा में काम मिलता है या नहीं?’’ कोई जवाब नहीं। अधिकतर युवाओं को नरेगा के बारे में नहीं पता। हां, एक की जेब में नया-नया यूआइडी कार्ड ज़रूर चमक रहा है। वह उसे आज ही मिला है। उसे नहीं पता इसका क्या करना है, लेकिन जेब से बाहर निकला इसका एक हिस्सा शायद उसकी पहचान में इजाफा कर रहा है।


कटाई के सीज़न में खाली हाथ खरदना के नौजवान 

हमने सुनील से पूछा, ‘‘क्या समस्या है आपकी? आखिर पानी में खड़े होने की नौबत क्यों आ गई? इतना संपन्न गांव तो है आपका?’’ सुनील बोले, ‘‘जब हमारा आंदोलन हुआ, तब जाकर भैंसवाड़ा में 15-17 घरों के 140 लोगों को बाहर निकाला गया। उनकी ज़मीनों को अभी भी नहीं लिया गया है। वह आज भी वैसी ही पड़ी है। अब वे परिवार कहां जाएंगे सर? हम वैसे ही मर रहे हैं, अब नहीं लड़ेंगे सरकार से तो क्या करेंगे?’’ सरकार ने घोघलगांव में तो मांगें मान ली हैं। खरदना के लोगों से उसे आखिर क्या दिक्कत है? सुनील कहते हैं, ‘‘सर, कांग्रेसियों ने हमारी मदद की थी, हो सकता है इसलिए...।’’ हमने विस्तार से जानना चाहा। सुनील बोलते गए, ‘‘जैसे... भूरिया जी यहां आए थे (कांतिलाल भूरिया)। जिस दिन हमारा सत्याग्रह समाप्त हुआ था, उस दिन उनके यहां आने का समय 10 बजे तय था। इसके पहले प्रशासन ने हम लोगों को दस, साढ़े दस बजे उठा लिया। भूरिया जी को तो प्रशासन ने यहां से नौ किलोमीटर पहले रातातलाई में रोक दिया। वहां से भूरिया जी पैदल आए, लेकिन हम लोगों के निकाले जाने के बाद।’’ उसने बताया कि कांतिलाल भूरिया ने यहां आकर  आश्वासन दिया था कि चूंकि गांव वाले कानून के मुताबिक लड़ रहे हैं, इसलिए उनकी सभी मांगें मानी जानी चाहिए। एक युवक ने बताया कि कांग्रेस के अजय सिंह भी यहां आए थे। सबने हामी में सिर हिला दिया।

बीच-बीच में सुनील और उनके साथी नाव वाले को फोन लगाते रहे ताकि वे हमें डूब क्षेत्र दिखा सकें। बात नहीं बनी, तो वे हमें लेकर गांव के भीतर चल दिए। सुनील राठौर के पिता इस गांव के सरपंच हैं और यहां के आंदोलन के प्रणेता। हालांकि गांव के स्तर पर कोई कमेटी या संघर्ष समिति जैसा कुछ भी नहीं बना है। यहां की लड़ाई नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले ही चल रही है। लोग बातचीत में बार-बार किसी आलोक भइयाका नाम ले रहे थे। हमने पूछा कि क्या मेधा पाटकर यहां आंदोलन के दौरान आई थीं। लोगों ने बताया कि यहां ‘‘सुप्रीम कोर्ट की बड़ी वकील’’ चित्तरूपा पलित मौजूद थीं और आलोक भइयाभी थे। कौन आलोक भइया? ‘‘आलोक अग्रवाल, एनबीए वाले’’, सुनील ने बताया। वह हमें अपने घर ले गया। उसके पिता घर में नहीं थे, लेकिन हमें वहां देखकर करीब पचासेक गांव वाले इकट्ठा हो गए। बाहर के कमरे में रखा टीवी, फ्रिज उसे ड्राइंग रूम की शक्ल दे रहा था। हाथ-मुंह धोकर हम पानी पीने लगे, तो सबसे बुजुर्ग दिख रहे एक व्यक्ति ने जनरेटर चलाने के लिए किसी से कहा। हमने मना कर दिया, लेकिन प्रस्ताव दिलचस्प था। ‘‘लाइट कब आती है’’, हमने पूछा। पता चला कि 4 सितम्बर से बिजली गायब है। महीना भर होने को आया, प्रशासन बिजली काटे हुए है और वजह यह बताई गई है कि पानी में बिजली का तार गिर कर करेंट फैला सकता है। यानी महीने भर से टीवी की खबरों से दूर? सुनील बोले, ‘‘हां, पता ही नहीं चल रहा कहां क्या हो रहा है? यहां जो लोग पानी में खड़े थे उनमें एक की महामारी से मौत हो गई। कहीं कोई खबर नहीं आई।’’

सरपंच के बेटे सुनील राठौर (सबसे बाएं) के साथ खरदना के गांव वाले 

हमने 62 वर्षीय बुजुर्ग से जानना चाहा कि उनकी लड़ाई किस बारे में है। उनका नाम बोंदार बडि़यार था। वे बोले, ‘‘इस गांव में कभी कोई दिक्कत नहीं थी। खूब सिंचित जमीन है। सोया, कपास, तुअर सब उगता है। खूब पैसा है। दिक्कत यह हो गई कि बिना मुनादी किए बांध की ऊंचाई 260 से 262 कर दी गई और डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों की जमीन पहले से नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि रबी की फसल डूब गई। खरीफ का समय आने तक ज़मीन दलदली रहती है जिससे इस मौसम में खेती करना भी मुश्किल होता है। यह लगातार हो रहा है। फिर हमारे बीच नर्मदा बचाओ वाले लोग आए। उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे लड़ना है...।’’ बीच में सुनील ने टोका, ‘‘हां, बिल्कुल अहिंसावादी लड़ाई। हम लोग एनबीए के लिए समर्पित हैं सर। और हम लोग अन्ना हजारे जी और अरविंद केजरीवाल जी के साथ भी हैं।’’ राहुल ने पूछा, ‘‘लेकिन वे दोनों तो कब के अलग हो गए?’’ ‘‘पता नहीं सर, महीने भर से बिजली गायब है, क्या मालूम। लेकिन हम लोग उनके साथ हैं।’’ हमने बुजुर्ग से पूछा, ‘‘पानी में 17 दिन खड़े रहने के बाद लड़ाई पर कोई फर्क पड़ा है क्या?’’ ‘‘हां, सुप्रीम कोर्ट में केस हो गया है।’’ केस तो पहले भी चल रहा था? फिर इस जल सत्याग्रह से लड़ाई के तरीके और अंजाम पर क्या फर्क पड़ा? सवाल को सुनील ने लपक लिया, ‘‘लड़ाई पहले भी कानूनी थी, अब भी कानूनी ही है। हमें सिर्फ मुआवजा चाहिए।’’ कुछ लोगों ने उसकी हां में हां मिला दी। ‘‘फिर मुआवजे के बाद?’’ सामने बैठे एक अधेड़ से मैंने पूछा। ‘‘कुछ नहीं..’’, बीच में टोकते हुए सुनील बोले, ‘‘लड़ेंगे न! उसके बाद भी सच्चाई के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे। पहले जमीन के बदले जमीन दो, नहीं तो सही मुआवजा दो, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कहा है।’’

बात चल पड़ी थी, लेकिन बीच में हलवा आ गया। फिर चाय भी आ गई। आटे का हलवा शुद्ध घी में डूबा हुआ था। शहरी पेट के लिए इसे पचा पाना ज़रा मुश्किल था। इस बीच सुनील जबलपुर हाई कोर्ट के 2009 के आदेश की एक प्रति लेकर आए। ‘‘ये देखिए सर, कोर्ट का ऑर्डर है। जमीन के बदले जमीन।’’ मैंने पूछा, ‘‘ये कहां से मिला?’’ वे बोले, ‘‘है न सर, सब डॉक्युमेंट है। चित्तरूपा पलित जी बड़ी वकील हैं। वही हमारा केस लड़ रही हैं। हम सब लोग एनबीए के साथ हैं। पापा नहीं हैं वरना वे सारा केस आपको समझाते।’’ हलवा खत्म हो चुका था। प्लेट में सिर्फ घी बचा था। मैंने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘अब आप लोगों के हाथ-पैर ठीक हैं?’’ कुछ लोगों ने जवाब में पैर सामने कर दिए, ‘‘हां, ठीक हो रहा है। दवा किए न, सबको रोज़ मरहम-पट्टी होता था।’’ उठते हुए मैंने फिर पूछा, ‘‘तब? आगे की रणनीति क्या है?’’ सामने सफेद शर्ट और धोती में काफी देर से शांत बैठे एक शख्स बोल उठे, ‘‘सर, सच बताएं, हम लोग पुलिस की लाठी से डर गए हैं। गांव में पहली बार पुलिस आई थी। हम सब डरे हुए हैं।’’ मैंने सबकी आंखों में देखना चाहा। कुछ में मौन सहमति थी। कुछ उठने को बेचैन दिखे। सुनील उस वक्त भीतर गया हुआ था शायद प्लेट रखने!

इंदिरा सागर बांध के डूब में आए 29 गांवों का विहंगम दृश्‍य 

जाते-जाते गांव के बुजुर्ग हमसे मंदिर चलने का आग्रह करने लगे। काफी देर हो चुकी थी, लेकिन मना करना ठीक नहीं लगा। एक टेकरी के ऊपर प्राचीन मंदिर था जिसमें दुर्गा की गोद में गणेश विराजे थे। यह प्राचीन मूर्ति थी। गांव वालों ने उसके ठीक सामने एक भव्य मंदिर बनवा दिया था और बिल्कुल वैसी ही प्रतिमा की नकल संगमरमर में ढाल कर वहां स्थापित कर रखी थी। हमने जानना चाहा कि प्राचीन मूर्ति को ही क्यों नहीं नए मंदिर में स्थापित किया गया या फिर मूल स्थल पर ही मंदिर क्यों नहीं बनवा दिया गया। कोई साफ जवाब नहीं मिल सका। हां, यहां आना इस लिहाज से सार्थक रहा कि मंदिर की छत पर खड़े होकर समूचे डूब क्षेत्र को एक बार में देखा जा सकता था। ऐसा लगा गोया हम खुद किसी टापू पर खड़े हों। चारों ओर पानी और जंगल के सिवा कुछ नहीं था। शाम धुंधला रही थी। हमारे साथ जो दो स्थानीय पत्रकार आए थे, वे जल्दी निकलने का आग्रह कर रहे थे क्योंकि अगला गांव काफी दूर था।


धारा 144 का शासनादेश

लौटते वक्त आंगनवाड़ी की दीवार पर धारा 144 का शासनादेश चस्पां दिखा। गाड़ी रुकवा कर हमने तस्वीर उतार ली। तारीख पड़ी थी 11 सितम्बर। उसी के अगले दिन यहां आंदोलन टूटा था, कांतिलाल भूरिया आए थे और एनबीए के लोग व छिटपुट पत्रकार आखिरी बार देखे गए थे। पिछले बीस दिन से यहां कानून का राज है और बिजली गायब है। जिनके लिए धारा 144 लगाई गई थी, उन्हें भी कानून पर पूरा भरोसा है। एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि चित्तरूपा पलित की अंग्रेज़ी बड़ी अच्छी है, वे सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा ज़रूर जीत जाएंगी। (क्रमश:) 

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