10/12/2012

जैंजिबार के दिन और रातें: आखिरी किस्‍त

(इस श्र्ंखला को आरंभ में 12 किस्‍तों में प्रस्‍तुत करने की योजना थी, लेकिन बीच में कुछ मित्रों का सुझाव आया कि पोस्‍ट बहुत छोटी लग रही है। इसे और लंबा होना चाहिए। सुझाव पर अमल करते हुए मैंने दो छोटी किस्‍तों को लंबा कर दिया जिसके कारण यह श्रृंखला दस किस्‍तों में ही निपट जा रही है। लिहाज़ा इस लंबे यात्रा वृत्‍तान्‍त की यह दसवीं और आखिरी  किस्‍त पेशे खि़दमत है- मॉडरेटर)  

प्रो. विद्यार्थी चटर्जी 
जैंजि़बार फिल्म महोत्सव के स्वाहिली भाषा में लिखे मोटो का अर्थ है जहाजि़यों के साथ इतिहास की सैर। जैंजि़बार की सैर इतिहास की ही सैर है। यहां विभिन्न फसलों, मसालों, पशुओं, आचार-व्यवहार और संस्थानों का एक सांस्कृतिक मिश्रण है जो अलग-अलग जगहों से आए हैं। अलग-अलग जहाज़ी अपने साथ सभ्यता के टुकड़े लेकर आए जिनसे मिल कर यह धरती मुकम्मल हुई। मसलन, चावल मलाया से आया तो लौंग आई इंडोनेशिया से। पुर्तगाल से सांड़ की लड़ाई यहां आई, अरब से इस्लाम आया तो ब्राज़ील से काजू और मेवा। दिलचस्प तथ्य यह है कि गायें यहां भारत से इस उम्मीद में मंगाई गईं कि वे यहां का कचरा खाकर जज़ीरे को साफ रख सकेंगी।

जैंजिबार की मशहूर लौंग 
जैंजि़बार यदि तमाम वस्तुएं आयात करता था तो उसके निर्यात में दिलचस्प मसालों से लेकर खतरनाक गुलाम तक हुआ करते थे। एक दौर में हज़ारों-लाखों गुलाम अफ्रीका से बरास्ते जैंजि़बार लोगों की बर्बरता व लोभ की भूख मिटाने को मंगाए जाते थे। इस कारोबार को अंजाम देते थे अरब के व्यापारी और अफ्रीकी कबीलाई सरदार उनकी मदद करते थे। इस धंधे में यूरोपियों के आने से पहले अरब ही गुलामों के सौदागर हुआ करते थे। सैकड़ों साल बीते जब दास प्रथा का अंत हुआ। आज भी हिंद महासागर के किनारों पर गुलामों के पुराने शिविर मौजूद हैं जहां जाकर देखा जा सकता है कि अंग्रेज़ों द्वारा यह व्यापार बंद करने से पहले उनके साथ क्या किया गया था। ऐसा नहीं था कि अचानक अंग्रेज़ों का हृदय परिवर्तन हो गया था। बात बस इतनी थी के प्रेस और सियासी हलकों में गुलामों की सौदागरी की तगड़ी आलोचना होना शुरू हो चुकी थी।

स्‍टोन टाउन शहर में गुलामों की एक जेल 
(ऊपर दी  गई जेल का वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें) 

जैंजि़बार के इतिहास पर गुलामी एक बदनुमा दाग की तरह है। इतिहास का कोई भी छात्र, विदेशी हो या स्थानीय, इससे जुड़ी छवियों और तस्वीरों को अनदेखा करना गवारा नहीं कर सकता। जैंजि़बार के सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व का साधुवाद कि उसने गुलामों के व्यापार नामक मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध को दबाने का काम नहीं किया। फिल्मों में गुलामी प्रथा की अभिव्यक्ति पर 20 जुलाई 2006 को एक दिन की कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया था जो कि फिल्म महोत्सव का ही एक हिस्सा था। अतीत को हाथ से न फिसलने देने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों और दर्शकों के दिमाग में एक ही सवाल कौंध रहा था- ‘‘क्या सिनेमा गुलामों के व्यापार की त्रासदी को उसी गहराई से अभिव्यक्त कर सकता है?’’ सम्मेलन के उद्देश्य के बारे में जेडआईएफएफ के कैटेलॉग में लिखा था, ‘‘एक साल की तैयारी का नतीजा है कि यहां ऐसी प्रतिष्ठित शख्सियत इकट्ठा हुई हैं जिन्होंने न सिर्फ अतीत बल्कि हमारे दौर पर भी गुलाम प्रथा के प्रभाव और उसके महत्व के प्रति बढ़ती अंतरराष्ट्रीय जागरूकता में अपना योगदान दिया है। जब इंसानी पीड़ा की बात बाती है, तो अतीत, वर्तमान और भविष्य में बंटवारा असंभव हो जाता है। जैंजि़बार, जो कभी गुलामों के लिए जाना जाता था, आज ऐतिहासिक कुधारणाओं का शिकार बन गया है।’’

गुलामों के बाज़ार की याद में बना एक स्‍मारक 
दो या तीन सौ साल पहले मौजूद जिस गुलामी प्रथा के बारे में लोग जानते हैं, वह भले ही दुनिया से गायब हो चुकी हो लेकिन समकालीन इतिहास पर करीबी नज़र डालने से पता चलता है कि यह आज भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में ज्यादा ‘‘अभिजात्य’’ रूपों में मौजूद है। मसलन, अपने देश को ही लें जिसके बारे में अकसर सरकारें, नौकरशाही और प्रेस व उच्च जातियां दावा करती नज़र आती हैं कि वैश्वीकरण, उदारीकरण इत्यादि के चलते यह उभरती हुई कामयाब अर्थव्यवस्था बन चुका है। लेकिन क्या ऊंची आवाज़ में किए जाने वाले ये दावे सच्चे हैं? हमारे यहां आज भी बाल श्रम मौजूद हैं जहां करोड़ों छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों का शोषण होता है और उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है। क्या यह गुलामी का ही एक रूप नहीं? साल दर साल कौडि़यों के बदले बच्चों को गुलामी में धकेला जाता है और इनके ताकतवर मालिक इन्हें मारते-पीटते हैं जिनके उत्पीड़न के तरीकों पर कभी भी सत्ताधारी तबके की ओर से सवाल नहीं खड़े किए जाते। सदियों पहले तीनों महाद्वीपों के यूरोपीय स्वामी या अरब व्यापारी जो कुकृत्य करते थे, क्या यह इक्कीसवीं सदी का उसी का संस्करण नहीं है? इस आलोक में देखें तो जैंजि़बार में हुई वह कॉन्फ्रेंस महज अतीत के इतिहास पर नहीं बल्कि हमारे तथाकथित सभ्य दौर पर भी एक रायशुमारी साबित हुई। इंसानों की इंसानों के प्रति अमानवीयता नहीं बदलती, जो बदलता है वह सिर्फ इस बुराई की अभिव्यक्ति होता है। पुराना पड़ जाने पर मुखौटे उतार लिए जाते हैं और समय की ज़रूरत के हिसाब से नए मुखौटे गढ़ लिए जाते हैं।


(गुलामों के व्‍यापार का इतिहास देखें इस वीडियो में) 

जैंजि़बार के बर्बर अतीत की याद दिलाते यदि गुलामों के शिविर वहां हैं, तो यहां की इमारतों, मकानों, दफ्तरों, प्रार्थना स्थलों और बाज़ारों का वास्तु भी एक ऐसी चीज़ है जो जैंजि़बार को रहस्यों के आवरण में लपेटे हुए है। ज़ाहिर है कई स्रोतों के प्रभाव से यह जो देश बना है, इसे देख कर एकबारगी सांस थम जाती है। द्वीप के इस हिस्से को जिसे स्टोन टाउन कहते हैं, 1988 में ही युनेस्को ने विरासत स्थल की सूची में जोड़ लिया था। यह शैवाल पत्थरों से बना शहर है। यहां की कई इमारतें उन्नीसवीं सदी की पैदाइश हैं जो अब झरने लगी हैं, हालांकि इन्हें देखकर इनके निर्माताओं की कल्पना और कौशल पर रश्क होता है। संकरी गलियों में खड़ी इन इमारतों के दरवाजों और बालकनी पर की गई नक्काशी आपका ध्यान बरबस खींचती है। लकड़ी के विशाल दरवाज़ों पर महीन डिज़ाइन बने हैं जो स्वाहिली संस्कृति का हिस्सा हैं और जिन पर भारतीय और अरबी वास्तुकला के निशान हैं। रात के धुंधलके में ये इमारतें मायावी परछाइयां गढ़ती हैं, खासकर वहां जहां स्ट्रीटलाइट खराब हो या नहीं हो। इन्हें देख कर ऐसे में आप सहम सकते हैं। ऐसा माहौल बन जाता है कि आपकी कल्पना के घोड़े दौड़ने लगते हैं और आपका दिमाग बग़दाद या अरब की सैर पर निकल पड़ता है। अचानक आपको उस सुल्तान की कहानी याद आ जाती है जो चीथड़ों में लिपटा अपनी जनता के बीच नीम अंधेरे में उनके दुख-दर्द जानने को निकल पड़ता हो; या फिर उस भिखारी की याद ताज़ा हो उठती है जो सुल्तान की रसोई से उठते धुएं से अपना पेट भरता था। यहां पहली बार आने वाले किसी सैलानी को एक जादुई भय अपनी आगोश में जकड़ लेता है।

एक नक्‍काशीदार दरवाज़ा 
 मुझे विदेश में कई फिल्म महोत्सवों में जाने का मौका मिला है। यूरोप में मैं जहां कहीं गया, वहां के फिल्म महोत्सव अच्छे थे लेकिन कुछ हद तक निर्वैयक्तिक और प्रत्याशित से थे। इनमें कौशल को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी, गोया आप हमशक्ल इंसानों के बीच नहीं हों बल्कि मशीनों से बात कर रहे हों। नाकामी या गड़बड़ी की गुंजाइश हमेशा एक अंधेरे की तरह होती है जो हमें उत्तेजित करती है, हमारे वजूद के किनारों को घेरे रहती है। बदकिस्मती से इन कामयाब भौतिकतावादियों के यहां यह नहीं मिलती। जर्मनी और हॉलैंड सुंदर जगहें हैं, लेकिन मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि वहां एक बार से ज्यादा जाया जा सकता है या नहीं। पश्चिम के विशाल और तड़क-भड़क वाले फिल्म महोत्सवों के बरक्स जैंजि़बार के इस आयोजन की स्मृति को मैं अपने आखिरी दिनों तक साथ संजो कर रखना चाहूंगा। एक ऐसी स्मृति, जिसे आप अपने यहां अपने लोगों के साथ साझा करना चाहते हैं, जो दुर्भाग्य से अफ्रीकी महाद्वीप से और बारिश व सूरज की रोशनी में लगातार नहाए उसके इस छोटे से हिस्से से सर्वथा अपरिचित हैं। जैंजि़बार मेरे थके हुए बुढ़ाते कदमों जैसा मद्धम है, लेकिन सरसामी में देखे गए एक सपने जैसा चमकदार है।

बारह दिन पहले जिस छोटे से विमान में मैं यहां आया था, वैसे ही एक विमान में मैंने जैंजि़बार को विदा कहा। वे बारह दिन, जिनमें मैंने बरसों की पैदल यात्राओं से सदियों का इतिहास नाप लिया। नैरोबी पहुंचकर मैं कुछ बड़े विमान में अफ्रीकी, यूरोपीय और भारतीय मूल के कुछ कारोबारियों के साथ बंबई के लिए चल दिया। वही केनिया एयरवेज़ की फ्लाइट, वही स्वागत, गिलास में सेब का रस ढालते या फलियों का पैकेट थमाते हाथों में वैसी ही विनम्रता। बंबई पहुंच कर कलकत्ता के लिए एक और विमान। छह साल का वक्त जैंजि़बार को पूरी तरह भुलाने के लिए काफी नहीं है। (समाप्‍त) 

यादों में बसा बारिश और सूरज में नहाया जादुई जैंजिबार 

(अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव) 





1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपके साथ जैजिबार की यात्रा करके। शुक्रिया इसे पढ़वाने के लिये।

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