11/13/2012

छपने लायक हो, तो मैं तालिबानी विचार भी छाप सकता हूं: ओम थानवी

12 नवंबर 2012 को जनसत्‍ता में छपे शंकर शरण के खाप समर्थक लेख 'हिंदू विवाह और गोत्र' के बाद हमने अखबार और उसके संपादक से कुछ सवाल पूछे थे। मामले को सार्वजनिक डोमेन में रखने के लिए उक्‍त पोस्‍ट की लिं‍क संपादक आम थानवी समेत कई लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को भी हमने मेल की थी। ओम थानवी की ओर से पहला जवाब रात दो बजे के आसपास ही आ गया था, जो बात को टालने के अंदाज़ में था। जब दोबारा उनसे वही सवाल पूछे गए, तो उन्‍होंने बात को साफ़ करते हुए एक और पत्र भेजा। 13 नवंबर को दिन भर चले पत्राचार में ओम थानवी के अलावा अविनाश दास, योगेश कुमार शीतल और रंगनाथ सिंह ने हस्‍तक्षेप किया। सारे पत्र मैं नीचे जस के तस चिपका रहा हूं, लेकिन सबसे पहले  ओम थानवी का वह पत्र जिसमें उन्‍होंने एक दिलचस्‍प बात कही है कि अगर छपने लायक हो तो वे किसी खाप प्रतिनिधि, तालिबानी दहशतगर्द या हिंदू आतंकी का लेख भी छाप सकते हैं। इस पर पब्लिक डोमेन में चर्चा होनी ही चाहिए।  


Nov 13, 2012, 12.36 p.m. पर ओम थानवी की मेल 



प्रिय अभिषेक जी,

आप जनसत्ता के इतने शुभचिंतक हैं, यह बड़ी दिलासा देने वाली बात है।
मेरे ख़याल में मैंने आपके सवाल का जवाब दे दिया था। कोई बात साफ़ न हुई हो तो बता दिया करें।
आपने पूछा है -- क्‍या लोकतंत्र और न्‍याय के बुनियादी मूल्‍यों के पार जाकर किसी लेखक के विचार एक अखबार को स्‍वीकार्य हो सकते हैं? मेरा जवाब है -- हो सकते हैं। आरक्षण के विरोध में हमने जो लेख छापे वे इसका प्रमाण हैं। शंकर शरण, जगमोहन सिंह राजपूत, तरुण विजय आदि के लेख भी हमें 'धर्म-संकट' में ले जाते रहे हैं, पर ऐसे विचार देश में हैं मौजूद यह बताना मुझे उन पर परदा डालने से महत्त्वपूर्ण जान पड़ता है। विश्वास रखें, ऐसा मैं पूरी जिम्मेवारी के साथ करता हूँ। और इसी ज़िम्मेवारी और दरियादिली के चलते किसी "खाप प्रतिनिधि, तालिबानी दहशतगर्द या हिंदू आतंकी" का लेख भी छाप दे सकता हूँ, बशर्ते उसमें कुछ ऐसा हो जो छपने के लायक़ हो। यह तभी पता चलेगा जब लेख सामने आएगा। यानी इसका निर्णय मैं हमेशा वह लेख विशेष पढ़ कर करूंगा, लेखक का नाम, जाति, विचार, धर्मं, अपराध, पुण्य आदि का खाता देखकर नहीं।
वेबसाइट से सामग्री उठाने की जांच दिल्ली लौट कर ख़ुद करूंगा। सही निकलने पर कार्रवाई होगी। टाइम-न्यूज़वीक बड़े नाम हैं। फ़रीद ज़कारिया को निलंबित किया, फिर छपने भी लगे। मैं इस मामले में ज़्यादा निर्मम हूँ।
और महाराज, जनसत्ता के आप जैसे दोस्त हैं कहाँ। छोड़ कर मत जाइएगा। टाइम का काम चल जाएगा। हमारा बिगड़ जाएगा।

आपका,
ओम थानवी

Nov 13, 2012, 1.39 p.m. पर रंगनाथ सिंह की मेल 

प्रिय ओम थानवी जी,

संपादक के तौर पर लेख में प्रस्तुत प्रतिगामी विचारों को प्रकाशित करने के लिए आप स्वतन्त्र हैं. यह आपका विशेषाधिकार है कि आप जनसत्ता को किन गहराईओं तक ले जाते हैं !
किन्तु, 'चोरी' की सामग्री को जनसत्ता में प्रकाशित करवाने में सफल रहे शंकर शरण से स्पष्टीकरण माँगना और पाठकों का हक में उसे सार्वजनिक करना एक संपादक (चाहे वो किसी भी पंथ का हो) का नैतिक दायित्व बनता है.
मुझे विश्वास है कि हिन्दी अख़बारों-चैनलों के तमाम संपादकों की तरह आप भी हिन्दी पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए सतत चिंतित रहते होंगे. लेकिन ऐसे कुछेक अवसरों पर जब जनसत्ता के बचे-खुचे प्रतिबद्ध पाठक पाठक भी चिंतित हो जाएँ, आपको चिंता-चिंतन से उबरकर (हलकी-फुलकी ही सही) कोई कारर्वाई जरूर करनी चाहिए.
जाहिर है कि अभिषेक की चिंताएं उसकी अकेली की नहीं हैं.

सस्नेह
रंगनाथ सिंह

Nov 13, 2012, 10.51 a.m. पर अविनाश दास की मेल 

अभिषेक जी, 99 फीसदी समाज जैसा है, जैसा चल रहा है, उसका एक वैचारिक आधार है। धर्म, जाति, गोत्र, ऊंच नीच वही आधार है। आपकी हमारी या ओम जी की कल्‍पना का समाज अलग है और उसका वैचारिक आधार भी मौजूदा समाज से उन्नत और प्रगतिशील। अखबार में छपे किसी विचार से हमारी असहमति हो सकती है - हमें देखना यह चाहिए कि वहां ज्‍यादा किस तरह के विचार छप रहे हैं। शंकर शरण घोषित तौर पर संघी मानसिकता के विचारक हैं। बीजेपी के शासनकाल में वह एनसीईआरटी के डायरेक्‍टर भी थे। बीजेपी से ही जुड़े तरुण विजय जनसत्ता में छपते हैं। लेकिन मेरी जानकारी में अस्‍सी फीसदी जनसत्ता के लेखक-स्‍तंभकार प्रगतिशील मूल्‍यों में आस्‍था रखने वाले लोग हैं। वैसे भी सती प्रकरण पर छपे बीस साल पुराने संपादकीय को शंकर शरण के लेख से जोड़ कर जनसत्ता को कठघरे में खड़ा करना मुझे सही नहीं जान पड़ता। इसी अखबार में कुछ संपादकीय सती प्रकरण के खिलाफ भी छपे।
खाप और हरियाणा में दलित उत्‍पीड़न के खिलाफ जनसत्ता में छपे एक लेख का लिंक देखें : http://mohallalive.com/2010/06/01/arvind-shesh-writeup-on-mirchpur/
जनसत्ता में ही सती प्रथा के खिलाफ छपा एक लेख देखें : http://mohalla.blogspot.in/2008/07/blog-post_22.html
कुछ और लेख जनसत्ता के संदर्भ में और जनसत्ता से कॉपी करके मोहल्‍ला लाइव पर छपे हैं। उन्‍हें भी एक नजर देखना चाहिए : http://mohallalive.com/tag/jansatta


Nov 13, 2012, 10.24 a.m. पर अभिषेक श्रीवास्‍तव की मेल 

ओम जी,
दिवाली मुबारक।

आपके जवाब से यह साफ़ नहीं हो रहा कि आप लेखक की वैचारिक आज़ादी के पक्ष में हैं या सती प्रकरण से इस मामले की तुलना किए जाने के खिलाफ़ हैं।
क्‍या लोकतंत्र और न्‍याय के बुनियादी मूल्‍यों के पार जाकर किसी लेखक के विचार एक अखबार को स्‍वीकार्य हो सकते हैं? यदि ऐसा है, तो फिर कल को कोई खाप प्रतिनिधि, तालिबानी दहशतगर्द या हिंदू आतंकी अपने द्वारा की गई हत्‍याओं को जायज़ ठहराते हुए पुरातनतम संदर्भों से भरा एक वैचारिक लेख आपके यहां भेजता है, तो यही माना जाना चाहिए कि आप उसे छाप देंगे! आप ''लेखकों के विचार जनसत्‍ता के नहीं'' वाली दलील देते हुए इतनी सी बात क्‍यों नहीं समझते कि जनसत्‍ता और पंजाब केसरी का पाठक वर्ग एक नहीं है। जनसत्‍ता में शंकर शरण जैसे लेख छापना दरअसल कुछ बीमार विचारों को एक स्‍वस्‍थ परंपरा वाले प्रकाशन के माध्‍यम से 'लेजिटिमेसी' दिलाने के बराबर है।
आप मानें या ना मानें, लेकिन यह लेख इस बात का संकेत देता है कि आपकी 'लोकतांत्रिकता' और 'आवाजाही' का सिद्धांत कुछ लोगों द्वारा मिसएप्रोप्रिएट किया जा रहा है। वे लोग भीतर के भी हो सकते हैं, बाहर के भी। आपके अखबार का इस्‍तेमाल हो रहा है और इसका सीधा असर पाठकों पर पड़ रहा है।
मेरा काम आगाह करना था, सो मैंने किया। आपने मेरे एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया, कोई बात नहीं। लेकिन एक संपादक की न्‍यूनतम जिम्‍मेदारी निभाने की उम्‍मीद हम आपसे करते हैं। जिस वेबसाइट से शंकर शरण ने अपनी सामग्री उठाई है (जो कि बेनामी है) उसे जाकर एक बार देख लें। मैं जानता हूं कि न तो शंकर शरण कोई फ़रीद ज़कारिया हैं जो कि माफ़ी मांगें, न ही आप टाइम पत्रिका के संपादक हैं कि उन्‍हें दंडित करें। और वैसे भी यह हिंदुस्‍तान है। मामला सिर्फ इतना है कि हम लोग जिस लगन से टाइम/न्‍यूज़वीक पढ़ते हैं, उससे कुछ कम लगन से ही जनसत्‍ता पढ़़ते रहे हैं।
बाकी, हम सोचते हैं कि एक पाठक के बतौर जनसत्‍ता का हमें क्‍या करना है।

शुभकामनाएं
अभिषेक श्रीवास्‍तव

Nov 13, 2012, 09.17 a.m. पर योगेश कुमार शीतल की मेल 

आदरणीय थानवी जी,

आपके इस बात से सहमती है कि ये विचार लेखक के हैं, और शंकर शरण को भी अन्य लेखकों की तरह अपने विचार अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है। लेकिन जनसत्ता का ये लेख पहले कहीं और प्रकाशित हो चुका है। जनसत्ता से हम नैतिकता और मौलिकता की उम्मीद करते हैं। अगर ऐसा न करते तो आपका ध्यान इस और आकृष्ट नहीं करते।
प्रभाष जी संघी थे, ये सबको पता है।

योगेश कुमार शीतल 

Nov 13, 2012, 1.58 a.m. पर ओम थानवी की मेल 

प्रिय अभिषेक जी,

आपकी मेल मिली। अपने विचारों से अवगत कराने के लिए धन्यवाद।
जनसत्ता में विभिन्न विचार विभिन्न लेखों में विभिन्न लेखक व्यक्त करते हैं। वे लेखकों के विचार होते हैं, जनसत्ता के नहीं। सती प्रकरण पर मेरे आने से पहले छपे सम्पादकीय से इस स्वतंत्र लेख की तुलना करने का क्या औचित्य बनता है, यह आप ही जानते होंगे। मेरे संपादन में सती और खाप तंत्र की अमानुषिकता पर क्या सम्पादकीय छपे, आप इसकी पड़ताल करते तो उसमें शायद कोई तुक निकल भी आती।
दिवाली की शुभकामना।

सप्रेम। ओम थानवी





3 टिप्‍पणियां:

Santosh ने कहा…

साथियों ! अगर खाप और सती जैसे समर्थकों के विचार बाहर आयेंगे नहीं तो उनका विरोध कैसे होगा ? खाप एक सच्चाई है ..जरा उसके भी तर्क तो देखें ! मैं जानना चाहता हूँ कि बेशर्मी के साथ वे अपना तर्क रखते हैं ! यकीन मानिए..शंकर शरण जैसों लेखकों की मानसिकता को समझने के लिए हमें उनका लिखा पढना ही होगा ! तर्क को तर्क से ही काटा जा सकता है..पाबंदी लगाने से नहीं ! अब दूसरा मुद्दा -- क्या इसे जन सत्ता में छपना चाहिए या नहीं ? तो इसका उत्तर ओम थानवी जी ने दिया है ! मेरा मुद्दा ये है कि जनसत्ता क्या किसी राजनैतिक प्रतिबद्धता को पकड़ कर चलने वाला अखबार है क्या ? मैंने वीरेन्द्र यादव जी का भी लेख जनसत्ता में छ पते देखा है ! क्या उम्मीद की जानी चाहिए जन सत्ता से ? हिन्दू में १० १० पेज के भाजपा सरकारों के विज्ञापन रूपी लेख छपते हैं और साथ साथ उनकी निर्मम आलोचना भी उसी पत्रिका में होती है ! इसे क्या समझूँ ?

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

छपने लायक हो तो...

वाह! क्या बात है. छपने (और बेहद पठनीय - 50 शेड्स ऑफ ग्रे?) लायक तो पॉर्न भी बहुत होता है. शायद कभी जनसत्ता में वह भी पढ़ने को मिले!!!

सञ्जय झा ने कहा…

@लायक तो .............garda kar diye mahaguru.......


pranam.

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