11/17/2012

एक उम्‍मीद जो तकलीफ़ जैसी थी: जनसत्‍ता का सती प्रसंग

 
जनसत्‍ता के 12 नवंबर 2012 अंक में छपे खाप का समर्थन करते शंकर शरण के लेख पर पिछले पोस्‍ट में हमने वरिष्‍ठ लेखक उदय प्रकाश की प्रतिक्रिया देखी जिसमें उन्‍होंने इसके संपादकीय इतिहास के विरोधाभासों की ओर इशारा किया है। जिन्‍होंने जनसत्‍ता पर इसके शुरुआती दिनों से करीबी नज़र रखी है, उनमें वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा भी हैं। देवराला कांड के बाद छपे बनवारी के लिखे सती समर्थक संपादकीय के संदर्भ में आनंद स्‍वरूप वर्मा ने 'हंस' पत्रिका में एक लंबी टिप्‍पणी नवंबर 1987 के अंक में की थी। संजोग से इस बार भी नवंबर का महीना है और सती समर्थक संपादकीय के ठीक पचीस साल बाद खाप समर्थक लेख जनसत्‍ता में छपा है। उदय प्रकाश के बताए विरोधाभासों को सोदाहरण समझने के लिए 25 साल पुराना 'हंस' का वह लेख काफी कारगर होगा जिसे शायद आज की युवा पीढ़ी को पढ़ने का मौका नहीं मिला हो। यह लेख जनसत्‍ता और प्रभाष जोशी के जिन पचीस साल पुराने संपादकीय कुकृत्‍यों को गिनवाता है, उन्‍हें पढ़ कर तो यही लगता है कि मामला विरोधाभास का उतना नहीं है, जितना लोकतंत्र और आधुनिकता के बदलते मुहावरों के बरक्‍स जनसत्‍ता के संपादकीय मानस के ठस रह जाने का है। उस दौर के जनसत्‍ता ने सती से लेकर नवरात्र और नरबलि तक तमाम विषयों के समर्थन में लिखा, लेकिन तब का भारतीय समाज आज के समाज से गुणात्‍मक रूप से अलग था। सामान्‍य विवेक और तर्कबुद्धि के विपरीत अपनी शुरुआत से ही वैचारिक प्रतिगामिता का वाहक जनसत्‍ता हो सकता है कि ढाई-तीन दशक पहले के पाठकों को अवैज्ञानिकता के माहौल में कुछ दे पाने में सक्षम रहा हो, लेकिन आज उदारीकरण के दो दशक बीत जाने के बाद सामान्‍य वैज्ञानिक सोच से लैस हो चुका मध्‍यवर्गीय उपभोक्‍ता खाप समर्थक विचार को नहीं पचा सकता। दरअसल, यह गुणात्‍मक और मात्रात्‍मक रूप से बदल चुके देश-काल के समक्ष गतिरुद्ध रह गए एक अखबार का खड़ा हुआ कन्‍ट्रास्‍ट है जो शंकर शरण के लेख को देवराला कांड से कहीं बड़ा मानवरोधी अपराध बना देता है।
 
'हंस' में छपे आनंद स्‍वरूप वर्मा के इस लेख की आखिरी पंक्तियां गौरतलब है- ''18 सितंबर 1987 के बाद से 'जनसत्‍ता' हाथ में लेते समय एक क्षीण सी आशा रहती है कि शायद प्रभाष जोशी ने सती प्रथा के समर्थन में लिखा संपादकीय वापस ले लिया हो।'' यह बात अलग है कि जनसत्‍ता ने ऐसा अब तक नहीं किया है। ओम थानवी उन्‍हीं के वारिस हैं, इसलिए खाप समर्थक शंकर शरण के लेख पर अगले पचीस साल तक वे भी प्रभाष जी की ही लकीर पीटेंगे, बशर्ते समय के बहाव में ठहर चुका जनसत्‍ता तब तक बचा रहे। 
 

जनसत्‍ता के वैचारिक ज़रायम का इतिहास जानने-समझने के लिए आनंद स्‍वरूप वर्मा का नवंबर 1987 के 'हंस' में छपा लेख ''हिन्‍दी पत्रकारिता: संदर्भ प्रभाष जोशी'' हम यहां अविकल प्रस्‍तुत कर रहे हैं।



 

हिन्दी पत्रकारिता: संदर्भ प्रभाष जोशी

('हंस', नवंबर, 1987)
 
आनंद स्‍वरूप वर्मा
इसमें कोई शक नहीं कि अबसे लगभग चार वर्ष पूर्व जनसत्ताके प्रकाशन ने हिंदी पत्रकारिता में एक क्रांति का सूत्रपात किया। लंबी प्रतीक्षा के बाद 17 नवंबर 1983 को प्रभाष जोशी के संपादन में जनसत्ता के पहले अंक के बाजार में आते ही पाठकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। इमरजेंसी के दिनों में ही इंडियन एक्प्रेस ने सरकार विरोधी अखबार के रूप में जनता के बीच अपना सिक्का जमा लिया था और हिंदी का प्रबुद्ध पाठक यह सोचकर मन मसोस लेता था कि इंडियन एक्प्रेसके टक्कर का कोई हिंदी अखबार नहीं है। हिंदी पाठकों के लिए प्रभाष जोशी का नाम बहुत परिचित नहीं था- वह कुछ समय तक प्रकाशित प्रजानीतिसाप्ताहिक के संपादक रह चुके थे- पर जनसत्ताएक्सप्रेस समूह से निकल रहा है, इतना ही लोगों के लिए काफी था।
 
 
प्रभाष जोशी ने उप संपादकों और रिपोर्टरों की टीम में एकदम युवा पत्रकारों को शामिल किया और वरिष्ठ पदों पर बनवारी, मंगलेश डबराल, सतीश झा आदि को लिया। प्रभाष जोशी के मुकाबले बनवारी और मंगलेश डबराल के नामों से हिंदी पाठक ज्यादा परिचित थे। रघुवीर सहाय के संपादन काल में दिनमानसे जुड़े बनवारी ने वर्षों तक गंभीर और विचारोत्तेजक लेखों और टिप्पणियों से पाठकों के बीच अपनी साख बना ली थी। मंगलेश डबराल हिंदी के प्रगतिशील वामपंथी कवि होने के साथ कई अखबारों और पत्रिकाओं के जरिए अपनी संपादन प्रतिभा दिखा चुके थे और इन्हें भी पाठकों का भरपूर विश्वास प्राप्त था। बेशक, हिंदी की अखबारी दुनिया के लिए सतीश झा का नाम बिल्कुल नया था पर अंग्रेजी के फाइनेन्सियल एक्सप्रेसको छोड़कर हिंदी पत्रकारिता में पदार्पण करने की खबर ने उन्हें अनायास ही पाठकों के लिए स्वीकार्य बना दिया था। बाद के दिनों में आर्थिक मामलों पर लिखे उनके लेखों को पढ़ कर सबने महसूस किया कि जोशी जी का चुनाव सही ही था।
 
यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि 1980 के दशक की शुरुआत जनता पार्टी की सरकार के प्रति आम जनता के मोहभंग तथा सत्ता में श्रीमती इंदिरा गांधी की पुनर्वापसी से हुई थी। 1977 में अपनी पराजय के बाद संन्यास लेने के लिए आतुर इंदिरा गांधी को नयी जिंदगी मिली थी जिसने सत्ता से लिपटे रहने की उनकी लालसा को अत्यंत पाशविक रूप दे दिया था। वह अपने छोटे पुत्र संजय गांधी के लंपट दोस्तों को अपने इर्द गिर्द तरजीह देने लगी थीं और दक्षिण भारत के अनेक राज्यों, उत्तर पूर्व तथा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा एवं पंजाब में अपनी पार्टी के पिट जाने का दर्द भूलने के लिए उत्तर भारत पर समूचा ध्यान केंद्रित कर रही थीं। यहां अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी को निरस्त करने के लिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद के जिहादी के रूप में अपनी छवि बनानी शुरू कर दी थी।
 
इंदिरा गांधी मीडिया की ताकत को बखूबी पहचानती थीं। हिंदी पत्रकारिता में किस हद तक गैर कांग्रेसवाद के सिद्धांतकार लोहिया के अनुयायी घुसे हुए हैं, इसे उन्होंने इमरजेंसी से पूर्व जे.पी. आंदोलन के दौरान ही ताड़ लिया था। उन्हें यह भी पता था कि जनता पार्टी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्रालय भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास होने से 1977 से 1980 के बीच मीडिया में पुराने जनसंघियों ने भी अच्छी खासी घुसपैठ बना ली थी। मनचाही राजनीति करने के लिए मीडिया में प्रमुख पदों पर बैठे सरकार विरोधी तत्वों का सफाया जरूरी था।
आपको याद होगा कि 1980 से 1983 के बीच दिल्ली की अखबारी दुनिया में बड़े पैमाने पर संपादकों के निकालने रखने का सिलसिला शुरू हुआ जिसने हिंदी पत्र पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया। दिनमानसे रघुवीर सहाय को हटा कर कन्हैयालाल नंदन को संपादक बनाया गया। साप्ताहिक हिंदुस्तानसे मनोहर श्याम जोशी को हटाकर शीला झुनझुनवाला को तथा नवभारत टाइम्स से अज्ञेय को हटा कर राजेन्द्र माथुर को संपादन का भार सौंपा गया। अखबार के मालिकों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव डालकर सरकार को इस तरह का फेरबदल कराने में कामयाबी मिल गयी। इन घटनाओं से बुद्धिजीवियों और पाठकों के एक वर्ग को बड़ी हताशा और चिंता हुई। उनकी चिंता कितनी सही थी इसे आने वाले वर्षों में दिनमानऔर साप्ताहिक हिंदुस्तानने लगातार गिरते स्तर के रूप में साबित कर दिया।
 
यहां इन बातों के उल्लेख का मकसद यह बताना है कि एक अच्छे अखबार के लिए, जो खासतौर से प्रतिपक्ष के विचारों को अभिव्यक्ति देता हो, वस्तुगत स्थितियां पूरी तरह तैयार थीं। प्रबुद्ध पाठक वर्ग से लेकर विरोधी दल के राजनीतिज्ञों तक सभी को जनसत्ताजैसे अखबार का इंतजार था। ऐसे किसी अखबार से लोगों ने काफी अपेक्षाएं पाल रखी थीं। प्रभाष जोशी ने जनसत्ताके पहले अंक में लिखा कि ‘‘वह (अखबार) अपने पाठकों और दुनिया के बीच एक पुल होता है। संवाद का जरिया होता है, मंच होता है, वह पाठक की निजी आस्थाओं और उसकी सार्वजनिक निष्ठाओं को साधता है। वह अपने पाठकों की आशा, आकांक्षाओं और जीवन मूल्यों का आईना होता है। वह पाठकों से बनता है और पाठकों को बनाता है लेकिन यह अर्थवान प्रक्रिया बिना विश्वसनीयता के नहीं चल सकती। जनसत्तायह विश्‍वसनीयता कमाने के लिए निकल रहा है।’’ (पत्र, पाठकों के नाम 17 नवंबर 1983)
 
इसमें कोई शक नहीं कि जनसत्ताको पाठकों की यह विश्वसनीयता मिली। शानदार ले आउट और आधुनिक फोटो कंपोजिंग तथा खूबसूरत छपाई के साथ निकले इस अखबार की सफलता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि प्रकाशन शुरू होने के सात महीने में इसकी प्रसार संख्या एक लाख और तेरहवें महीने में दो लाख को पार कर गयी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह एक चमत्कारी घटना थी- कोई भी हिंदी दैनिक इतने कम समय में इतना बड़ा पाठक वर्ग तैयार नहीं कर पाया था।
 
सबकी खबर ले! सबको खबर दे!नारे के साथ शुरू इस अखबार ने हिंदीभाषी प्रदेशों से लेकर सुदूर दक्षिण के राज्यों तक की खबरों को प्रायः फीचर शैली में प्रकाशित किया। इन फीचरों में एक सरकार विरोधी तेवर रहता था, शाश्वत पुलिस जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद रहती थी, सरकारी नीतियों की बेलाग आलोचना मिलती थी, खास-खबर और खोज-खबर जैसे स्तंभों के अंतर्गत प्रकाशित सामग्री को पढ़ते समय किसी साप्ताहिक में प्रकाशित रिपोर्ट के पढ़ने का सुख मिलता था और यही वजह है कि तमाम इलाकों में एक दिन देर से पहुंचने के बावजूद जनसत्ता का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे।
 
प्रभाष जोशी भाग्यवादी हैं। क्रिकेट खिलाड़ी गावस्कर पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा भी था कि भाग्य और अवसर के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता। भाग्य और अवसर ने प्रभाष जोशी को हिंदी पत्रकारिता के शिखर पर जब पहुंचा दिया और सरकार विरोधी (व्यवस्था विरोधी नहीं) तेवरों के कारण जब उन्होंने जनता का विश्वास जीत लिया तब उन्हें यह चिंता हुई कि हिंदी वालों को उनकी अस्मिता का एहसास कराया जाय। वैसे तो जून 1984 में ही पंजाब में ब्लू स्टार ऑपरेशन के बाद उन्होंने अपने उग्र हिंदूवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करके एक बहुत बड़े पाठक वर्ग को झटका दिया था, लेकिन शीघ्र ही उसका प्रतिकार भी उन्होंने कर लिया और जनसत्ताअचानक पंजाबी सिखों में बेहद लोकप्रिय हो उठा। लेकिन वह अस्थायी था, मूलतः लोगों के दिलो दिमाग में प्रभाष जोशी जिस तरह हिंदू कट्टरता, सड़े गले मूल्यों, पुरातनपंथी विचारों और मानव विरोधी बर्बर मान्यताओं का मीठा जहर घोल रहे थे, उसे पहचानने में भाषा की उनकी बाजीगरी बहुत बड़ी बाधा थी। लेकिन सितंबर 1987 में राजस्थान के दिवराला नामक गांव में सती होने की घटना पर प्रकाशित संपादकीय ने लोगों को उद्वेलित कर दिया और सती प्रथा के पक्ष में लिखे इस संपादकीय के खिलाफ पाठकों और बुद्धिजीवियों का रोष उमड़ पड़ा। प्रभाष जोशी और बनवारी (जो 1 जून 1987 से स्थानीय संपादक बना दिये गये हैं) को संभवतः पहली बार महसूस हुआ कि जिन पाठकों की प्रशंसा से वे अब तक इतरा रहे थे और अपनी सफलता की चकाचौंध से अंधे हो रहे थे, उनके प्रति उनकी जवाबदेही भी है और वे पलट कर संपादकों को कठघरे में खड़ा भी कर सकते हैं।
 
सती कांड ने प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के प्रशंसकों को अचानक सन्निपात की स्थिति में डाल दिया। अभी तीन वर्ष पूर्व तक जिस अखबार के साथ अपने को जुड़ा महसूस कर लोग गौरव का अनुभव कर रहे थे, उसके बहिष्कार की अपील पर वे हस्ताक्षर करने लगे। इस प्रकरण का सबसे दुःखद पहलू यह है कि प्रभाष जोशी या बनवारी में से किसी ने भी अपनी भूल स्वीकारते हुए 18 सितंबर के संपादकीय को वापस लेने की महानता नहीं दिखायी बल्कि एक निहायत अमानवीय मुद्दे को आत्मसम्मान का प्रश्न बना बैठे। ये दोनों संपादक इस बर्बर कृत्य के पक्ष में लिखे संपादकीय को केंद्र में रखते हुए निहायत घटिया स्तर का ध्रुवीकरण कराने में लग गये और अपने लिए सर्टीफिकेट जुटाने लगे। काफी कोशिश के बाद हिंदी कवि बाबा नागार्जुन से उन्हें अपने चरित्र का प्रमाण-पत्र भी मिल गया कि ‘‘जनसत्ता ने जिस तरह अभिव्यक्ति की आजादी के तहत राजनीति, संस्कृति, साहित्य और समाज में जो भूमिका निभायी है, मैं उसे नहीं भुला सकता... जनसत्तासे पहली बार सामाजिक सोच की व्याख्या करने में गलती हुई है और उसके विरोध में पूरे अखबार का बायकाट करना मूर्खता होगी। जनसत्ताने हमेशा अल्पसंख्यकों की बात प्रमुखता से रखी है और वैज्ञानिक सामाजिक सोच को आगे बढ़ाया है।’’ (नागार्जुन का इंटरव्यू, जनसत्ता, 7 अक्टूबर 1987)
 
सती कांड पर जनसत्ताके संपादकीय से व्यक्तिगत तौर मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ हालांकि किसी पत्रकार के इस स्तर पर पतित हो जाने की मैंने कल्पना नहीं की थी। वैसे, जिसने भी जनसत्ताके कांग्रेस विरोधी तेवर की आंच से दूर हटकर सामाजिक संदर्भों से जुड़े प्रश्नों पर प्रकाशित लेखों को ध्यान से पढ़ा होगा उसने आसानी से उस प्रक्रिया को समझ लिया होगा जिसकी चरम परिणति सती प्रथा के समर्थन में लिखे संपादकीय में हुई थी।
 
बाबा नागार्जुन सहित जिन लोगों को यह भ्रम है कि जनसत्ताने वैज्ञानिक सामाजिक सोच को आगे बढ़ाया है’, उन्होंने या तो जनसत्ताको ठीक से पढ़ा नहीं, प्रभाष जोशी और बनवारी के लेखों पर ध्यान नहीं दिया या उस अखबार में कार्यरत आलोक तोमर, राकेश कोहरवाल, महादेव चौहान, कुमार आनंद, राजेश जोशी आदि जैसे तेज तर्रार युवा रिपोर्टरों की रिपोर्टों के आधार पर अनुमान लगा लिया कि अखबार और संपादकों की विचारधारा भी प्रगतिशील होगी। इन लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि प्रभाष जोशी, बनवारी, और किसी ज्योतिर्मय आदि के नाम से समय-समय पर प्रकाशित लेखों में पाठकों को बताया जाता रहा है कि नवरात्रि पर व्रत रहने से क्या लाभ होते हैं, पिंडदान करने से किस तरह पितर तृप्त होते हैं, सूर्यग्रहण पर दान करने से मनुष्य का इहलोक और परलोक कैसे सुधरता है, श्री गणेशाय नमः के जाप के साथ काम शुरू करने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं तथा सती प्रथा और नरबलि- जी हां, ध्यान दें नर बलि- को बर्बर मानने वाले पश्चिमी तौर तरीकों और आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा में रंगे लोग हैं।
 
1986 में इंदौर से बुरहानपुर जाते हुए प्रभाष जोशी को जगह दुर्गोत्सव के लिए मंडप बनते दिखायी देते हैं और उन्हें भारतीय नारी के देवी रूप अज्ञेर नवरात्रि के महात्म्य की याद आ जाती है। वह पाठकों को बताते हैं कि ‘‘नवरात्रि के नवों दिन नियम ध्यान से रहा जाता है जैसे सब लोगों को देवी आ जाती हैं। और देवी आने का मतलब है कि व्यक्ति, परिवार और समाज शरीरातीत हो गया है। दुर्गा पूजा के दिनों में किसी बंगाली को मां कहते हुए देखो तो साफ लगता है कि उसे देवी चढ़ गयी हैं। किसी गुजराती को गरबा करते हुए देखो तो भी लगता है कि किसी दिव्य शक्ति ने उसे ले लिया है’’ (या देवी सर्वभूतेषु, प्रभाष जोशी, 10 अक्टूबर 1986)। इसके बाद लगभग एक हजार शब्दों में जोशी जी ने भारतीय समाज में देवी के स्थान को रेखांकित करते हुए भारतीय नारी की शक्ति का वर्णन किया है और पाठकों के मन में अपने प्रगतिशील होने का भ्रम पैदा किया है लेकिन निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत लेख की अंतिम पंक्तियां इस भ्रम को तोड़ देती हैं- ‘‘नवरात्रि पर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते या सुनते हुए अगर आप अपने भयों, कुंठाओं और विकृतियों के बारे में सोच सकें और उनसे मुक्त हो सकें तो आपके घर से लेकर देश भर में ऐसी ऊर्जा प्रकट होगी जो जीवन को दिव्य बना सकती है। मुझे नवरात्रि का उत्सव इसीलिए एक तरह की आंतरिक स्वाधीनता का उत्सव लगता है। दुख यही है कि बहुत साल जी लेने के बाद इस नवरात्रि में इस स्वाधीनता का बोध हुआ।’’ हमें भी दुख है कि जोशी जी को इतनी देर में यह बोध हो सका- पहले हो गया होता तो वह किसी मंदिर या मठ में पंडा से लेकर धर्माचार्य तक कुछ भी होते और हिंदी पत्रकारिता उनकी कृपादृष्टि से बच जाती।
 
इसी क्रम में एक और लेख देखिए जिसे बनवारी ने लिखा है। बनवारी को पश्चिमी सभ्यता का फोबियाहै। पुरातनपंथी रूढ़िवादी और कट्टर धर्मांधता से ग्रस्त बनवारी को लगता है कि पश्चिमी सभ्यता और आधुनिकता ने भारत की परंपराओं और रीति रिवाजों को छिन्न भिन्न कर दिया है। रीतियों और कुरीतियों में फर्क किये बिना उन्हें भारत की हर परंपरा प्यारी है और जो भी इसका विरोध करता है उसे वह पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित कहने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।
 
अपने लेख श्री गणेशाय नमःमें गणेश जी की महिमा का वर्णन शुरू करने से पूर्व उन्होंने यूरोप के लोगों के एकांगी चिंतन को कोसा है और कार्ल मार्क्स की इस बात के लिए भर्त्सना की है कि उन्होंने श्री हनुमान का मजाक उड़ाते हुए भारतीयों को वानर देव की पूजा करने वाला कहा था। इसके बाद श्री गणेशकी महिमा का वर्णन करते हुए वह लिखते हैं कि ‘‘श्री गणेश को विघ्न विनाशक माना जाता है इसलिए ऐसा कोई काम नहीं है जिसे उन्हें याद किये बिना शुरू किया जा सकता हो... पौराणिक कथा के अनुसार श्री गणेश जी की दो पत्नियां हैं- ऋद्धि और सिद्धि। ऋद्धि का मतलब होता है गति। लेकिन गति अपने आप में पर्याप्त नहीं है। उसका कल्याणकारी होना भी जरूरी है। तभी वह सार्थक हो सकती है। सिद्धि का मतलब है जो उसे सार्थक बनाये। श्री गणेश जी की इन दोनों पौराणिक पत्नियों का हमारे इहलौकिक लक्ष्य तय करने में बुनियादी महत्व रहा है’’ (‘श्री गणेशाय नमः’, बनवारी, 28 अगस्त 1987)। इस लेख की अंतिम पंक्तियां हैं- ‘‘हमने अपनी प्राकृतिक संपन्नता नष्ट कर दी है, एक दूसरे के सुख दुख को समझने और उसी के अनुसार अपने इहलौकिक लक्ष्य तय करने की सामर्थ्य खो दी है। यह विकास हमारे रास्ते की बाधा ही है, हमारे कल्याण में विघ्न ही है। इसको दूर करने के लिए हमें श्री गणेश जी की शरण में जाना पड़ेगा। श्री गणेशाय नमः।’’
 
बनवारी प्रायः गाय को गऊ माता कहते हैं लेकिन इससे हमें एतराज नहीं होना चाहिए- यह तो अपनी अपनी श्रद्धा की बात है। भारत के लिए गाय जैसे उपयोगी जानवर को कोई माता कह रहा हो तो यह गाय को सम्मान ही देना है। एतराज तब होता है जब वह इस भूखंड पर रहने वाले हर व्यक्ति को हिंदू मानने लगते हैं। भूतपूर्व राष्ट्रपति जैल सिंह की मथुरा यात्रा पर लिखी उनकी टिप्पणी पर ध्यान दें- ‘‘राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह आज मथुरा में जन्माष्टमी मना रहे हैं। हमारे सामाजिक और धार्मिक उत्सवों से जुड़ने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष तो वे हैं ही, उन्होंने हमारी परंपरा और तत्व चिंतन को भी अच्छी तरह आत्मसात किया है... पिछले सप्ताह उन्होंने पशु चिकित्सकों के सम्मेलन में गऊ माता के बारे में जो कहा था वह किसी दूसरे राष्ट्रीय कर्णधार से सुनने को नहीं मिल सकता। इससे पहले मास्टर तारा सिंह के स्मृति समारोह में उन्होंने कहा था कि देश में फैले सभी धर्मों और मतों की मां सनातन धर्म है इसलिए उनमें कोई भेद या टकराव देखना सही नहीं है। इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है क्योंकि हिंदू कहे जाने पर किसी का धर्म या पूजा पद्धति बदल नहीं जाती। इसका मतलब तो इस भूखंड में रहने वाले उन सब लोगों की तरफ इशारा करना है जो कि यहां की सनातन परंपरा को आत्मसात किये हुए हैं। इसलिए हिंदू कहे जाने पर हमें गर्व होना चाहिए... ज्ञानी जैल सिंह या उन्हीं के रुतबे का कोई नेता हमारी आस्था के इन सभी केंद्रों का जीवन उन्हें लौटाने की प्रतिज्ञा कर ले तो देश में आज जो थकावट और विचारहीनता दिखाई दे रही है, शायद उससे कुछ पार पाया जा सके’’ (‘हमें अपनी आस्था की तरफ लौटना है’, बनवारी 27 अगस्त 1986) बनवारी वर्णाश्रम व्यवस्था को भी आदर्श मानते हैं हालांकि यह कहते हैं कि कोई भी व्यवस्था तुलनात्मक तरीके से ही बेहतर हो सकती है, आदर्श नहीं हो सकती। उनका मानना है कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था में जरूरत के मुताबिक संशोधन कर दिये जायें या उनके उद्देश्यों को पूरा करने वाली नयी संस्थाएं खड़ी की जायें। लेकिन यह काम अपनी सभ्यता में आस्था रखकर ही हो सकता है, अनास्था रखकर नहीं। (वर्णाश्रम व्यवस्था के मायने’, बनवारी 25 अक्टूबर 1986)
 
प्रभाष जोशी किस तरह की पत्रकारिता को प्रतिष्ठित करने में लगे हैं- यह आज तक नहीं समझ में आता? ‘जनसत्तामें हर महीने कम से कम आठ दस लेख इस तरह के आते ही रहते हैं जिनमें अंधविश्वासों, धर्म के नाम पर चल रही मूर्खताओं और निहायत अवैज्ञानिक सोच पर टिकी मान्यताओं को प्रचार दिया जाता है। इतनी बड़ी प्रसार संख्या वाले अखबार के संपादक ने लोगों को अपने काल से भी सौ वर्ष पीछे धकेल देने का मानों संकल्प कर रखा हो। मैं यहां बिना किसी टिप्पणी के महज चार उद्धरण प्रस्तुत करता हूं और आप खुद देखें कि समाज के लिए आज इनकी क्या प्रासंगिकता है और इन विषयों में किसी ऐसे अखबार की क्या भूमिका होनी चाहिए जो अपने जनपक्षीय होने का दावा करता है।
 
1- ‘‘देवी भागवत पुराण के अनुसार गंगा वापस बैकुंठ लोक चली गयी हैं और हम आप जिसे देवापगा मानते हैं वह एक सामान्य नदी भर है। अपने कर्मों से अधोगति को प्राप्त हुए लोगों की राख छूकर ही उन्हें सद्गति देने वाली दिव्य सत्ताका वास उस ढाई हजार किलोमीटर लंबी नदी में नहीं है, जो गंगोत्री से गंगा सागर तक बहती है... गंगा की पुण्यप्रदता क्यों लुप्त हुई या बैकुंठ में क्यों वापस चली गयी? इस संबंध में भागवत पुराण में भी एक प्रसंग आया है। भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर आने के लिए मनाते हैं तो वह पूछती है ‘‘लोग मेरे जल में अपने पाप धोयेंगे। उन एकत्रित हुए पापों से मैं कैसे निस्तार पाऊंगी?’’ भगीरथ ने कहा कि कामना और आसक्ति से ऊपर उठे शांत और ब्रम्हनिष्ठ लोग तुम्हारे तट पर निवास करेंगे। उनके स्पर्श से ही एकत्रित पापों का निस्तार हो जायेगा।’ (‘इसीलिए गंगा मैया पृथ्वी से चली गईं’, ज्योतिर्मय, 6 जून ’87)
2- ‘‘मान्यता है कि ग्रहण के समय सूर्यदेवता पर संकट आता है और उसके निवारण के लिए निर्दिष्ट आचारों का पालन करना चाहिए। मान्यता सही है या गलत, इस पचड़े में न पड़कर सिर्फ इतना ही देखें कि इष्ट आराध्य पर आये संकट को टालने के लिए जो कुछ करने को कहा गया है, वह कितना आग्रहपूर्ण होना चाहिए... उपाय कोई अति कष्ट साध्य या महंगे और बहुत समय खपाने वाले नहीं हैं। संक्षेप में ये उपाय स्नान, होम, देवों की पूजा, ग्रहण के समय श्राद्ध, दान और पुनः स्नान है। विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि ग्रहण के समय भोजन नहीं करना चाहिए। यह भी कहा गया है कि न केवल ग्रहण काल में बल्कि उसके चार प्रहर पहले से ही भोजन बंद कर देना चाहिए... कोई कृत्य या आचार संपन्न नहीं करने पर देवसत्ताएं दंड देने या जो उपलब्ध है उसे छीन लेने के लिए नहीं आ धमकतीं। इस दृष्टि से तो कोई हानि नहीं है लेकिन उन आचारों के लाभ से वंचित रह जाने को हानि माने तो ऐसे विधि विधानों की उपेक्षा के कारण भारी नुकसान होता रहा है।’’ (‘हमारे संस्कारों का ग्रहण मोक्ष कब होगा’, ज्योतिर्मय, 22 सितंबर’87)
3- ‘‘पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देश का सबसे विशाल समारोह है। कुंभ को छोड़कर देश के और किसी समारोह में इतने भारतीय शामिल नहीं होते। जिस समारोह से देश के इतने लोगों की श्रद्धा और गरिमा जुड़ी हुई हो, उसके गौरव का अहसास हमारी सरकार को नहीं है। अगर उसे यह अहसास होता तो भगवान जगन्नाथ के वाहन गरुण की मूर्ति दिल्ली के सी.बी.आई. अफसरों ने जबरन अपने पास न रोक रखी होती... पिछले साल भी इस बात को लेकर भगवान जगन्नाथ के मंदिर के पुजारियों, पुरी के प्रतिष्ठित व्यक्तियों और श्रद्धालुओं में काफी असंतोष था और उनका मानना है कि रथ यात्रा के समय भगवान जगन्नाथ ने गरुड़ के आसन न होने पर अपना रोष संकेत में प्रकट किया था। इस बार भी ऐसा हुआ लेकिन श्रद्धा और संस्कार से कटे हुए सरकारी तंत्र पर इसका कोई असर नहीं हुआ’’ (‘अधूरा असंतोष’, संपादकीय, 30 जून 1987)
4- ‘‘स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने पहनने आदि की वस्तुओं से नहीं होती क्योंकि भौतिक उपकरणों की आवश्यकता स्थूल शरीर को ही पड़ती है... इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वालों को जिस प्रकार इंद्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मों से उत्पन्न सुगंध रसास्वादन करते हुए तृप्ति अनुभव करता है... पूर्वजों के छोड़े हुए धन में कुछ अपनी ओर से श्रद्धांजलि मिलाकर उनकी आत्मा के कल्याण के लिए दान कर देना चाहिए। यही सच्चा श्राद्ध है।’’ (‘श्राद्ध से तृप्त होते हैं पितर’, आचार्य श्रीराम शर्मा, 22 सितंबर 1987)
 
उपरोक्त उद्धरण केवल जून और सितंबर के अखबारों से लिए गये हैं। जनसत्ता में इस तरह के लेख लगातार प्रकाशित होते रहे हैं और इस कर्मकांडी पत्रकारिता को देखकर पता नहीं चलता कि प्रभाष जोशी संपादकी कर रहे हैं या पंडागिरी। यही वजह है कि दिवराला के रूप कुंवर के सती होने पर जब जनसत्ता ने 18 सितंबर 1987 के संपादकीय में लिखा कि ‘‘लाखों विधवाओं में से कोई ही सती होने का संकल्प करती है और उसका यह आत्मोत्सर्ग लोगों की श्रद्धा और पूजा का केंद्र बन जाये यह स्वाभाविक ही है’’ तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। यह संपादकीय प्रभाष जोशी ने लिखा हो या बनवारी ने- कोई फर्क नहीं पड़ता। दोनों कर्मकांडी हैं, दोनों धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बोलने वालों को या तो कम्युनिस्ट कह देते हैं या पश्चिमी सभ्यता से आक्रांत। दोनों हिंदू सांप्रदायिकता की लहर पर डूबते उतराते धर्मांधता के ऐसे अंधेरे सागर में पहुंच चुके हैं जिससे बाहर आना अब उनके वश की बात नहीं। उल्टे, वे कुछ पैंतरे बदलते वामपंथियों और प्रगतिशीलता की वैशाखी पर घिसटती जिंदगी जी रहे कवियों, पत्रकारों को अपनी ओर खींचने में लगे हैं और इन हत-तेज कवियों पत्रकारों के निहित स्वार्थ भी उन्हें उसी अंधे सागर की तरफ ठेल रहे हैं।
 
18 सितंबर के संपादकीय को देख बहुतों ने टिप्पणी की कि ये संपादक द्वय कल इन्हीं तर्कों के आधार पर दास-प्रथा, नर-बलि आदि का भी समर्थन कर देंगे और इसका विरोध करने वालों को पश्चिमी सभ्यता के पोषक करार देंगे। उनकी जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि यह काम किया जा चुका है। बेशक, एक सरकार विरोधी अखबार को पढ़ते रहने के कारण केवल खूबियों पर ध्यान देने की अभ्यस्त हमारी आंखों ने कभी इन पंक्तियों पर ध्यान ही नहीं दिया- ‘‘देवी को मनाने के लिए पहले हमारे यहां नर-बलि दी जाती थी। फिर पशु-बलि दी जाने लगी। पश्चिमी ढंग से विकास करने वाले राजनेता, प्रशासक, वैज्ञानिक और उद्योगपति बलि की इस प्रथा को बर्बर और पिछड़े समाज की निशानी बतायेंगे। लेकिन उनसे पूछना चाहिए कि औद्योगिक विकास की देवी को खुश करने के लिए जो नरबलि वे रोज दे रहे हैं वह किस सभ्य और सुसंस्कृत समाज की प्रथा है?’’ (‘नरबलि ली और शहीद बना दिया’, प्रभाष जोशी, 10 दिसंबर 1986)। प्रभाष जी, पश्चिमी ढंग से विकास करने वाले ही नर-बलि को बर्बर और पिछड़े समाज की निशानी बतायेंगे? आप आगे फरमाते हैं- ‘‘देवी के सामने बलि देने वाला आदमी पूजा करता है इसलिए उसमें कोई अपराध या पाप भाव नहीं होता। और तो और उसे शर्म भी नहीं होती कि देवी का वरदान लेने के लिए उसने किसी को बलि कर दिया। देवी को प्रसन्न करने के लिए तो यह पूजा अनिवार्य है।’’ इन पंक्तियों को दिवराला की सतीशीर्षक संपादकीय के इस अंश के साथ रखकर देखिए- ‘‘रूपकुंवर किसी के धमकाने या उकसाने पर सती नहीं हुई और न ही उसके अपने जीवन में ऐसी कोई अनोखी निराशा छा गयी थी कि पति के साथ जल जाने के सिवाय उसके पास कोई चारा न बचा हो... इसलिए इसे न तो स्त्रियों के नागरिक अधिकार का सवाल कहा जा सकता है और न स्त्री-पुरुष में भेदभाव का। यह तो एक समाज के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों का मामला है।’’ इतना सब लिखने के बाद जिस प्रकार सती वाले संपादकीय में बचाव के रास्ते के रूप में एक पंक्ति डाल दी गयी थी कि ‘‘सती का हमारे यहां मतलब रहा है सत् पर दृढ़ रहने वाली स्त्री और सत् आचरण से तय होता है, चिता पर आत्मदाह से नहीं’’ जिसका इस्तेमाल 19 सितंबर को महिलाओं द्वारा किये घेराव के बाद 20 सितंबर को लिखे संपादकीय में किया गया, उसी प्रकार नर बलि वाले लेख में प्रभाष जोशी ने एक पंक्ति अंत में जड़ दी थी- ‘‘नर-बलि की बर्बर प्रथा एक सभ्य सुसंस्कृत और विकसित समाज को शोभा नहीं देती।’’
 
पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का विरोध करने के नाम पर जनसत्ता ने क्या क्या गुल खिलाये हैं, इस पर एक ग्रंथ ही लिखा जा सकता है पर मैं यहां जितेंद्र बजाज (जो अब चंडीगढ़ संस्करण के संपादक हैं) के एक लेख से और मंदिरों के सरकारी अधिग्रहण के मामले से इस प्रसंग को समाप्त करूंगा। कर्नाटक में शिमोगा जिले के चंद्रकुट्टी गांव में रेणुकाम्मा नाम की देवी का एक मंदिर है जहां वरदा नदी में स्नान करने के बाद लोग पूरी तरह निर्वस्त्र होकर जुलूस की शक्ल में पूजा के लिए जाते हैं। इस वर्ष कुछ समाजसेवियों ने इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठायी और प्रशासन की मदद से इसे रुकवा दिया। अब इससे क्षुब्ध होकर जितेंद्र बजाज ने व्यंगात्मक शैली में एक लेख लिखा जिसकी पंक्तियों पर ध्यान दें- ‘‘... लेकिन सभ्यता के साथ नंगे होने का भी कोई शऊर होता है, कोई सलीका होता है, किसी बड़े होटल रेस्टोरेंट का डिस्को या कैबरे घर हो। गुलाबी अंधेरे में रंग बिरंगी रोशनियां जल बुझ रही हों। कर्णभेदी उत्तेजक संगीत चल रहा हो। वहां कपड़ों का उतर जाना सभ्य ही नहीं, कलात्मक भी हो सकता है। इस तरह के नंगेज की कलात्मकता की तसदीक हमारे देश की ऊंची अदालतें भी कर चुकी हैं... लेकिन यह क्या हुआ कि न कोई व्यापारिक संदर्भ हो, न शैक्षणिक, न कलात्मक और आप किसी देवी की पूजा में नंगे होकर खड़े हो जायें। सिर्फ श्रद्धा में तो नंगे होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इन देसी लोगों की यही समस्या है। ये लोग सही काम भी इस तरह बेशऊर तरीके से किया करते हैं। सभ्य तौर तरीके ये लोग समझ ही नहीं पाते।’’ (‘आधुनिकता के अहंकार से रेणुकाम्मा को मत देखिए’, जितेंद्र बजाज, 23 मार्च 1987)
 
इसी लेख में उन फर्जी डॉक्टरों का पक्ष लिया गया है जो तथाकथित सुश्रुत के तरीके से राजस्थान के गांवों में मोतियाबिंद का आपरेशन कर रहे थे। इन डॉक्टरों ने कइयों की आंखें फोड़ दीं और जयपुर उच्च न्यायालय ने इन फर्जी डॉक्टरों को आजीवन कैद की सजा सुनायी थी। बजाज ने व्यंग्य किया कि ‘‘इन लोगों को कौन बताये कि किसी डिग्रीधारी डॉक्टर के हाथों अंधा होने में कोई बुराई नहीं है।’’ इसी प्रकार झाड़-फूंक, जादू-टोना के पक्ष में दलील देते हुए बजाज ने लिखा- ‘‘बड़े अस्पताल के ऊंचे डॉक्टर के सोफे पर लेटकर ऊंचे-ऊंचे विदेशी मनोवैज्ञानिकों की पोथियों के मुताबिक जादू टोना करवाने का अपना महत्व है। उसका अपना पूरा तंत्र है।’’
 
मजे की बात यह है कि जितेंद्र बजाज को वैज्ञानिक विषयों पर लिखने के लिए नियुक्त किया गया था। दिल्ली संस्करण में अपने अल्पकालिक सेवा के दौरान उन्होंने जिस जहालत भरी मानसिकता को अपने लेखों में व्यक्त किया उससे प्रसन्न होकर उन्हें चंडीगढ़ संस्करण का संपादक बना दिया गया।
 
आंध्र प्रदेश सरकार ने एक कानून बनाया जिसके अनुसार मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए सरकार उन पर नियंत्रण करेगी। इसके विरोध में जनसत्ताने कई संपादकीय और लेख प्रकाशित किये तथा तरह तरह के तर्कों से इसे धर्म विरुद्ध बताया। एक लेख की पंक्तियों पर गौर करें- ‘‘अग्नि पुराण में आयी बातों के आधार पर निर्णय सिंधु और व्यवस्था निबंधों में कहा गया है कि जिनका यज्ञोपवीत न हुआ हो और जो त्रिकालसंध्या न करता हो उनके संरक्षण में आने से देव-प्रतिमा दूषित होती है। ऐसी प्रतिमा की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिए और उसके बाद ही पूजा आरती आरंभ होनी चाहिए। मंदिर और धर्मादा कानून के संबंध में यह आपत्ति भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि उसके लागू होने पर सारे देवालय देवविहीन हो जायेंगे। जरूरी नहीं कि जिन अफसरों को मंदिर का प्रशासनिक अधिकारी बनाया जायेगा, वे उपवीतधारी होंगे और नियमपूर्वक संध्या करते होंगे।’’ (‘मंदिरों पर कब्जा क्यों चाहती है आंध्र प्रदेश सरकार’, 27 जुलाई 1987)
 
प्रभाष जोशी ने पंजाब समस्या और क्रिकेट पर खूब लिखा है- देश के शायद ही किसी और अखबार ने पंजाब पर और संपादक की कलम से लिखे क्रिकेट पर इतने अधिक लेख प्रकाशित किये हों। ब्लू स्टॉर ऑपरेशन के दौरान राजधानी से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के दोनों संपादकों- प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर में तो मानों होड़ लग गयी थी कि सैनिक कार्रवाई के संदर्भ में इंदिरा गांधी और सेना की प्रशंसा में कौन कितना बढ़िया लिख सकता है। प्रभाष जोशी ने श्रीमती गांधी की प्रशंसा करते हुए लिखा कि ‘‘गनीमत है कि इतनी देर तक पार्टी के पीलिया से पीली पड़ी प्रधानमंत्री की आंखों और डंडा उठाने से पहले कांपते हाथों ने कुछ देखा और किया।’’ राजेंद्र माथुर ने 6 जून 1984 के अपने संपादकीय में एक भारतावतारका दर्शन किया तो प्रभाष जोशी ने भारतीय सेना द्वारा इस्पात के अक्षरों से भारत की धरती पर लिखे शब्दपढ़े। अपने एक संपादकीय में सेना की प्रशंसा करते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा- ‘‘एकता के सेनापति लेफ्टिनेंट जनरल रणजीतसिंह दयाल को पूरे देश का सत श्री अकाल। गुरुगोविंद सिंह के इस सच्चे सिख ने आज फिर साबित कर दिया कि खालसा पंथ देश को तोड़ने और निहत्थे बेकसूर लोगों को मारने वालों को बर्दाश्त नहीं करेगा।’’ (संपादकीय, 8 जून 1984) लेकिन मजे की बात यह है कि फोड़े को चीरा लगा कर आतंकवाद का पस निकालना जरूरी थालिखने वाले प्रभाष जोशी ने 9 जून 1984 को ही श्रीलंका सरकार की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों की भर्त्सना करते हुए लिखा कि ‘‘इन गिने चुने आतंकवादियों के नाम पर ही सरकार ने बहुत सारे निरंकुश अधिकार प्राप्त कर लिये हैं... असली मकसद आतंकवादियों से निबटना नहीं बल्कि राजनीतिक मंसूबों पर अमल करने का है।’’
 
ब्लू स्टॉर ऑपरेशन के बाद से ही हिंदी पत्रकारिता का उग्र हिंदूवाद साफ साफ उभरकर सतह पर आ गया। इसमें निरंतर विकास ही होता गया। यही वजह है कि क्रिकेट का दीवाना संपादक (‘‘अपन कोई डॉक्टर नहीं जो मरीज को बुरे हाल पर न छोड़ने की कसम लिये हों। अपन खेल के दीवाने हैं’’, प्रभाष जोशी, 4 मई 1987) जब भारत और पाकिस्तान के बीच मैच देखता है तो उसकी सारी खेल भावना गायब हो जाती है और वह एक हिंदू मानसिकता से ग्रस्त दर्शक बनकर रह जाता है। पहले यह देख लें कि जोशी जी ने अपने क्रिकेट प्रेम का बयान किन शब्दों में किया है- ‘‘क्रिकेट के लिए इस गरीब कलम घसीट को पागल समझने वाले पाठक माई बाप अपने को कोई कांटे की जोड़दार कशमकश आज भी वही धड़कन देती है जो 1948 में इंदौर में वेस्टइंडीज के मैच को देखने वाले दस बरस के लड़के को हुई थी।’’ (‘भले ही मेजबानी को हम रह गये’, प्रभाष जोशी, 4 मार्च 1987) इसी लेख की इन पंक्तियों को देखें- ‘‘मार्गरेट अल्वा की लोकतांत्रिक सरकार में दम हो तो टी.वी. और रेडियो पर क्रिकेट दिखाना और सुनाना बंद कर दें। फिर देखें क्या मजा आता है।’’
 
दीवानगी का आलम यह है कि देश में बड़ी से बड़ी घटना हो जाय उससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर क्रिकेट का कोई मैच रोमांचक हो जाय तो जोशी जी का एक लेख जनसत्ताके पहले पेज पर जरूर दिखायी दे जायेगा। जो व्यक्ति 1956 से ही टोटली गिवेन टु क्रिकेट’ (4 सितंबर 1986 को परिवर्तनमें प्रकाशित इंटरव्यू) यानी क्रिकेट के पीछे पूरी तरह दीवाना हो, उसकी खेल भावना को हिंदू सांप्रदायिकता ने किस तरह दबोच लिया इसकी मिसाल ये पंक्तियां हैं- ‘‘भारतीयों को पाकिस्तान से हारना जितना बुरा लगता है उतना किसी देश की टीम से किसी खेल में हारना नहीं। और पाकिस्तान तो मानता है कि मांस, मच्छी, अंडे आदि खाने वाले जो मुसलमान हमलावर खैबर के दर्रे से आये इसीलिए तो जीते और राज करते रहे कि दाल-चावल खाने वाले हिंदुओं से ज्यादा ताकतवर थे और इसलिए उन पर राज करने के लिए ही बने थे। लेकिन जब अंग्रेज जाने लगे और जम्हूरियत आने लगी तो लीग के नेताओं को लगा कि हिंदू बहुमत में हैं इसलिए उनका राज हो जायेगा। अब तक अंग्रेजों के रहते वे अल्पसंख्यक होते हुए भी हिंदुओं के बराबर और पुराने बादशाह और नवाब होने के कारण उनसे ऊपर थे। अब नीचे हो जायेंगे। राज करने वालों पर राज किया जायेगा। इसलिए भारतीय प्रजातंत्र के बजाय लीग ने अपनी अलग तानाशाही पाकिस्तान में बनवा ली। तब से भारत के विरोध में खड़े होकर मूंछ पर ताव देते रहना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जरूरी यह भी है कि वह अपने को दाल-भात और इडली-डोसा खाने वाले हिंदुस्तानियों से ज्यादा ताकतवर माने। आप देखिए इमरान खान तेज गोलंदाजी करते हुए कैसी पठानी दिखाते हैं और जहीर अब्बास और जावेद मियांदाद के सामने कोई भी भारतीय गोलंदाज पाकिस्तान में टिक क्यों नहीं पाता था।’’ (‘जिया के क्रिकेट में कूटनीति ज्यादा है,’ प्रभाष जोशी, 12 फरवरी 1987)
 
अपने इसी लेख में आगे चलकर प्रभाष जोशी इतने उत्तेजित हो गये कि भाषा पर भी नियंत्रण खो बैठे और पागलों की तरह प्रलाप करने लगे। जरा इन पंक्तियों पर ध्यान दें- ‘‘इस बार भारत में भारत को हराने के पक्के इरादे से इमरान खान घोड़े पर चढ़कर आये थे और अपनी गोलंदाजी को बड़ी तोप बता रहे थे। पहले टेस्ट में मद्रास में श्रीकांत ने खुद इमरान खान और उनके सबसे घातक गोलंदाज कादिर की गेंदों में भुस भर दिया। श्रीकांत ने इमरान की ऐसी बेरहमी से धुनाई की है कि पहले किसी बल्लेबाज ने नहीं की थी। इडली डोसे ने तंदूरी मुर्गे और गोश्त दोप्याजा में मसाले की जगह भूसा भर दिया,’’ धन्य हो जोशी जी और धन्य है आपका खेल प्रेम। अगर आपका बस चले तो आप इन खिलाड़ियों का गला ही दबोच दें।
 
पाकिस्तानी खिलाड़ियों के खिलाफ जोशी के इस बेशर्मी भरे प्रलाप की वजह यह थी कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिया क्रिकेट मैच देखने जयपुर आ रहे थे। नवंबर 1986 में राजीव गांधी ने श्रीनगर की एक सभा में कहा था कि अगर पाकिस्तान ने इस बार भारत पर हमला करने की कोशिश की तो यह उसका वाटरलूसाबित होगा। उन्होंने कहा कि वह अपने यहां खालिस्तानी आतंकवादियों को शरण और प्रशिक्षण दे रहा है। प्रभाष जोशी काफी समय तक इसे सही नहीं मानते थे- ‘‘पाकिस्तान बंगलादेश का बदला जरूर लेना चाहता है लेकिन यह भी जानता है कि सिख अलगाववाद को अगर उसने खुलकर हवा दी तो अफगानिस्तान में नाकेबंदी कर के बैठे रूस के कारण भारत पाकिस्तान को बलूचिस्तान और सिंध में तोड़ सकता है। अपने अस्तित्व की कीमत पर पाकिस्तान खालिस्तानी खेल नहीं खेलेगा।’’ (‘हिंदू सिख संकट और दुविधाएं’, 12 अक्टूबर 1984) फिर मार्च 1987 में भी जोशी जी ने लिखा कि ‘‘पंजाब को तोड़ने के लिए पाकिस्तान का हव्वा कई सालों से छोड़ा जा रहा है’’ पर रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद आंदोलन को लेकर जिस तेजी से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण शुरू हुआ और इसकी भर्त्सना करने की बजाय जनसत्ताजिस तरह रामजन्मभूमि आंदोलन का समर्थक बनता गया, उससे प्रभाष जोशी बार बार पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग करने लगे- ‘‘जरूरी हो तो भारत के पास इतने सैनिक और इतनी बंदूकें हैं कि वह पंजाब में आतंकवादियों के साथ साथ पाकिस्तान से भी निपट सकता है। ऐसे निश्चय और ऐसी सख्ती के बिना अब पंजाब पर काबू नहीं पाया जा सकता।’’ (‘अब कोई शर्टकट नहीं है’, प्रभाष जोशी 15 मई 1987)
 
मेरठ के दंगों के बाद तो जनसत्ता ने यह घोषित ही कर दिया कि अल्पसंख्यकों की आक्रामकता बढ़ रही है और बहुसंख्यकों को इस आक्रामकता का सामना काफी दिनों से करना पड़ रहा है- ‘‘इधर कुछ सालों से अल्पसंख्यक आक्रामकता सामान्य मर्यादाएं लांघ गयी है और बहुसंख्यकों में इसकी व्यापक प्रतिक्रिया दिखायी दे रही है। इसका एक कारण बाबरी मस्जिद आंदोलन भी है। इस आंदोलन का कोई औचित्य किसी हिंदू को समझ में नहीं आ सकता और न ही वह अपनी श्रद्धा को लेकर कोई समझौता करने के लिए तैयार हो सकता है।’’ (‘एकता ऐसे नहीं होगी,’ संपादकीय 26 जून 1987)। मेरठ के दंगों के बाद प्रशासन द्वारा सभा जुलूसों पर रोक लगा दी गयी थी, रथयात्रा की इजाजत नहीं दी जा रही थी। इस पर जनसत्ताने टिप्पणी की कि ‘‘दुनिया के किसी देश की सरकार अपने लोगों के सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों पर इस तरह की मनमानी पाबंदी नहीं लगा सकती।’’ लोगों ने इस पाबंदी का उल्लंघन किया और जनसत्ताने लिखा- ‘‘मेरठ के लोगों ने दिखा दिया कि आम भारतीयों के धार्मिक कार्यक्रमों से खिलवाड़ के क्या नतीजे निकल सकते हैं।’’ (‘मेरठ में रथयात्रा’, संपादकीय 4 जुलाई 1987)
 
इस लेख के पाठकों को यह सोचकर हैरानी हो रही होगी कि जनता के खिलाफ सरकार द्वारा की जा रही हर साजिश में शामिल रहने वाला अखबार कैसे अपनी सरकार विरोधी छवि बना सका। यह एक पहेली जरूर है लेकिन अबूझ नहीं। कम से कम प्रभाष जोशी और बनवारी तो इसे समझते ही होंगे कि राजीव गांधी के खिलाफ लिखना उनकी मजबूरी है। राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी, बनवारी में यही फर्क है। मैंने अपने पिछले लेख में कहा था कि राजेन्द्र माथुर जो कुछ लिख रहे हैं, यह उनकी विचारधारात्मक गड़बड़ी है, दलाली नहीं। लेकिन प्रभाष जोशी का मामला कुछ और है। सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध में एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका का सीधे सीधे टकराव राजीव गांधी से हो गया है और मालिकों के साथ खड़ा होना संपादक की अलिखित सेवा शर्तों में से एक शर्त है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि प्रभाष जोशी, राजीव गांधी के प्रशंसक रहे हैं, बनवारी राजनीति में वंश परंपरा के समर्थक हैं और जनसत्ताविश्वनाथ प्रताप सिंह का आलोचक रहा है। सत्ताधारी वर्ग वी.पी. सिंह के रूप में एक विकल्प तैयार करने में लगा है और राजीव गांधी की सरकार से परेशान गोयनका के अफसरों को नित नये तर्क गढ़ने पड़ते हैं।
 
खानदानी हुकूमत को बनवारी कैसे ठीक मानते हैं इसे देखिए- ‘‘कई पीढ़ियों का राज्य अपने आप में बुरा नहीं होता। उसमें एक तरह की स्थिरता ही आती है। लेकिन उसका फायदा तभी होता है जब रघुकुल की तरह हर पीढ़ी लोक-मर्यादाओं की कसौटी पर अपने आपको कसती हुई अच्छा शासक होने की साधना करती रहे। अगर वे शासक अपनी कमजोरियां छुपाने और अपनी निरंकुशता बढ़ाने के लिए वंशवाद का इस्तेमाल कर रहे हों तो इसके खतरनाक नतीजे ही निकलेंगे।’’ (‘क्या राजीव गांधी का विकल्प नहीं है?’ बनवारी, 2 मई 1987)। बनवारी वंशवाद को मानते हैं बशर्ते इसका इस्तेमाल कमजोरियां छुपाने के लिए न हो। प्रभाष जोशी राजीव गांधी को काफी पहले ही इसका सर्टीफिकेट दे चुके हैं और बता चुके हैं, कि यह खराबी तो इंदिरा गांधी में थी, राजीव इससे मुक्त है- ‘‘यह सहज आत्मविश्वास उनमें (राजीव में) वह आक्रामकता भी नहीं आने देता जो दरअसल अंदरूनी कमजोरी को छुपाने की कोशिश होती है और जो इंदिरा गांधी में अक्सर दिखायी देती थी।’’ (‘मेकअप से काम नहीं चलता’, प्रभाष जोशी, 12 सितंबर 1985)
 
वी.पी. सिंह पर जिन दिनों डहिया ट्रस्ट के घोटाले का आरोप लगाया जा रहा था, उस समय तक न तो राजीव और गोयनका का झगड़ा इतना तीव्र हुआ था और न वी.पी. सिंह किसी वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभर कर आये थे। इस संदर्भ में जनसत्ताने अपने संपादकीय में लिखा- ‘‘कैमूर की पहाड़ियों में करीब तेरह हजार एकड़ जमीन इस तरह के न्यासों में है जो हदबंदी कानून से बचने के लिए कामगारों और कुत्ते, बिल्लियों तक के नाम चढ़ी हुई है। विश्वनाथ प्रताप सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उन्हें इन सब घोटालों की पूरी जानकारी थी और इन न्यासों पर उनसे पहले से आरोप लगते रहे थे। क्या उन्होंने कभी उन पर भी छापे पड़वाये थे? यह सवाल इसलिए उठाने जरूरी हैं कि शासक पार्टी में व्यक्तिगत ईमानदारी और सार्वजनिक जिम्मेदारी को अलग-अलग कर के देखने की परंपरा चल रही है। क्या बेईमान कुटुंब या बेईमान राजनैतिक दल से रिश्ता रखते हुए काबीना मंत्री स्तर का राजनैतिक नेता अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी से संतुष्ट हो सकता है? (‘सार्वजनिक ईमानदारी का सवाल’, संपादकीय, 5 सितंबर 1986) राजीव सरकार के साथ एक्सप्रेस प्रतिष्ठान का जैसे-जैसे तनाव बढ़ता गया, वी.पी. सिंह की खूबियां इन अखबारों में निखरती चली गयीं।
 
दिसंबर 1984 में चुनाव के मौके पर प्रभाष जोशी ने राजीव गांधी का विश्लेषण करते हुए जितने लेख लिखे उनमें एक अपील होती थी जिसका सीधा सीधा संदेश था कि एक बार इस नौजवान को आजमा कर तो देखिए! राजीव गांधी को लगातार इंदिरा गांधी के समकक्ष रखकर उनकी खूबियां गिनायी जाती थीं। इसलिए जब मैं प्रभाष जोशी के इन लेखों को- लोकतंत्र के ये बेशर्म रक्षक’, ‘कलई उतर गई है’, ‘कांग्रेसी सत्ता ही देश होने की गारंटी है?’ - देखता हूं, जिनमें सीधे सीधे राजेन्द्र माथुर के लेख ईमानदार कलम पर तीन बोझपर प्रहार किया गया है तो हंसी आती है। जोशी जी ने अपने लेख लोकतंत्र के ये बेशर्म रक्षक’ (25 अप्रैल 87) में राजेन्द्र माथुर को इंगित करते हुए लिखा- ‘‘यह लेख सत्ता प्रतिष्ठान के उन नये पुराने वकीलों के लिए भी नहीं है जो अपना काला कोट संभालते और तुतलाते हुए जनता की अदालत में बबुआपन के कुतर्क दे रहे हैं... इन बेचारे वकीलों की आत्मा, जबान और कलम पर ईमानदारी का बड़ा बोझ है... ये ईमानदार कलमें हैं जिनमें बेईमानी जिम्मेदारी के साथ निकलती है...’’
जोशी जी से कौन कहे कि हुजूर आप भी तो राजीव गांधी को लेकर इसलिए गदगद थे क्योंकि ‘‘उन्होंने वे तनाव दूर किये जो उनकी मां ने खड़े किये थे। वे समझौते किये जिन्हें इंदिरा गांधी कभी भी कर सकती थी लेकिन नहीं करती थीं। उस विपक्ष को सह अस्तित्व का भरोसा दिया जो केंद्र में कोई चुनौती की ताकत नहीं रखता था’’ (‘उबारा नहीं तो उबाया भी नहीं’, प्रभाष जोशी, 31 अक्टूबर 85)। आपको क्यों 1987 में यह महसूस हो सका कि ‘‘राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी की हत्या को बेशर्मी से भुना कर तीन चौथाई मत पाया।’’ यह बात तो 1985 में भी आपको मालूम थी जब आपने लिखा- ‘‘प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी से जो भी मिला है, उसने एक आकर्षण महसूस किया है और उनके बारे में एक मधुरता और लगाव लेकर लौटा है। सत्ता का एक प्रभा मंडल होता है और किसी भी तरह की सत्ता वाले आदमी में से जैसे तरंगें निकलती हैं जो लोगों को लुभाती भी हैं और दूर भी धकेलती हैं। राजीव गांधी की उपस्थिति में जो असर होता है उसमें भी राजनैतिक सत्ता का हाथ होगा पर पिछले सोमवार को प्रधानमंत्री के दफ्तर में कोई 30 संपादकों से घंटे भर की बातचीत के दौरान एक बार अचानक लगा कि यह मामला सिर्फ सत्ता और सुंदरता का नहीं है’’ (‘मेकअप से काम नहीं चलता’, प्रभाष जोशी, 12 सितंबर 1985)
 
जोशी जी मुग्ध थे- राजीव की सुंदरता और विनम्रता पर। यह पढ़ते समय मुझे पुष्पा भारती का एक लेख याद आता है जिसमें उन्होंने लिखा था- आह, मैं अपने देश के प्रधानमंत्री को इतने निकट से देख रही हूं। उनके पिघले सोने सा रंग, उन्नत ललाट, बेहद सुंदर कटावदार बड़ी अंखियां, सुंदर नासिका और कुद कुछ भिंचे से, बहुत कोमल गुलाबी जिल्दवाले अधर! (धर्मयुग, 9 जून 1985)
 
अपने इसी लेख में प्रभाष जोशी राजीव की खूबियों का वर्णन करते हुए लिखते हैं- ‘‘वे भले ही कोमल और सुंदर लगते हों पर बढ़ते हाथ से उनमें लाजवंती जैसा कुम्हलाना नहीं है, न कछुए की तरह अपने सारे अंग वे ढाल की पीठ के नीचे सिकोड़ते हैं... राजीव गांधी सुनने, सुनाने और आलोचना या रचनात्मक सुझाव को बिना चिढ़े मान लेते हैं। इस बात की ताईद विपक्ष के बजरबट्टू नेताओं से लेकर नेहरू खानदान के नाम से ही बिचकने वाले सनकी तक करते हैं। राजीव गांधी अपनी मुस्कान और अपने खुलेपन से तनाव, टकराव और कटुता को दूर कर के जैसे आपको निःशस्त्र कर देते हैं... राजीव गांधी में अगर एक जवान आदमी का यह सहज आत्मविश्वास और खुलापन नहीं होता तो वे अपनी सत्ता और स्थिति के प्रति इतने आश्वस्त नहीं होते...’’ (‘मेकअप से काम नहीं चलता’, प्रभाष जोशी, 12 सितंबर 1985)
 
18 सितंबर 1987 के बाद से जनसत्ताहाथ में लेते समय एक क्षीण सी आशा रहती है कि शायद प्रभाष जोशी ने सती प्रथा के समर्थन में लिखा संपादकीय वापस ले लिया हो।
 
 

5 टिप्‍पणियां:

Pankaj Molekhi ने कहा…

Jabardast piece hai, boss. Padh kar chakshu khul gaye

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

जानता था..पर इतना नहीं. इसे शेयर किया है और संभाल कर रख भी लिया है..

' मिसिर' ने कहा…

बड़ा मूल्यवान लेख है ,आँखे खोल देने वाला ! सुन्दर विश्लेषण ,सशक्त प्रस्तुति !

Unknown ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ओम थानवी ने कहा…


दिवराला काण्ड पर 1987 के जिस सम्पादकीय की आनंद जी ने बात की, वह जनसत्ता में छपा तब मैं राजस्थान पत्रिका में था। मेरे ज़िम्मा सम्हालने के बाद भी एक सती हुई और उस वक़्त (2002 में) यह सम्पादकीय जनसत्ता में छपा। चाहें तो इस पर भी नज़र दौड़ा सकते हैं, आँख थोड़ी खुलेगी ही। -- ओम थानवी

चीख और कालिख

मध्‍यप्रदेश के पटना तमोली नामक गांव में अपने पति की चिता पर कूदी या धकेली गयी गुट्टूबाई के जीवन का दुखद अंत इक्‍कीसवीं सदी के भारत में मौजूद मध्‍यकालीन बर्बरता की कहानी कहता है। इस जघन्‍य घटना के बाद यह आशंका भी होती है कि धर्म को एक उन्‍माद में बदल डालने वाले इस घोर हिंदुत्‍ववादी दौर में कहीं इस सती के पीछे-पीछे मंदिर और मेले का विद्रूप कर्मकांड शुरू न हो जाए। अगर उस स्‍त्री ने किसी बदहवासी में यह फ़ैसला किया हो तब भी यह निंदनीय है कि इसे रोकने की जगह वहां इकट्ठा लोग - जिनमें उसके कोख-जाये भी शामिल थे - एक तरह से इसका समर्थन करते रहे। ऐसी ख़बरें भी आयी हैं कि एक पुलिस अधिकारी ने उसे बचाने की कोशिश की और गांव वालों ने पथराव कर उसे घायल कर दिया। यह और भी चिंता और शर्म की बात है। इससे भी ज्‍यादा शर्मिंदा करने वाली शंका यह है कि कुछ लोगों ने उसे चिता पर धकेल दिया था।

पति के साथ जला दी जाने वाली ऐसी औरतों की कथाएं बीते समय में और सुनने में आयी हैं। इन अवसरों पर वह कर्मकांडी दृश्‍य नहीं बन पाया, जो करीब डेढ़ दशक पहले दिवराला में रूपकंवर के जल मरने पर पैदा किया गया था। लेकिन इससे सिर्फ इतना भर निष्‍कर्ष निकल सकता है कि स्त्रियों को जला डालने और फिर उनको आभामंडित करने वाली अमानुषिक सती प्रथा के समर्थक अगर शर्मिंदा नहीं तो डरे हुए ज़रूर हैं। डेढ़ दशक पहले जली रूपकंवर या इस सप्‍ताह जल कर मरी गुट्टूबाई की स्थिति और नियति में बुनियादी फर्क नहीं है। हमारे समाज में लड़कियों का जीवन अब भी ईश्‍वर जैसे किसी पति की एकनिष्‍ठ प्रतीक्षा का दूसरा नाम है। विवाह के बाद यह प्रतीक्षा ऐसी ठोस आर्थिक-सामाजिक निर्भरता में बदल जाती है जिसके कारण पति के न रहने पर स्‍त्री को अपना जीवन व्‍यर्थ ही नहीं, अभिशप्‍त भी लगने लगता है। ऐसी स्त्रियां पूरी तरह दूसरों पर आश्रित, चलती-फिरती लाश जैसी हो जाती हैं। जो यह लाश होने से इनकार करती हैं और जीवन को जीवन की तरह जीने का जतन करना चाहती हैं, उन्‍हें अक्‍सर संदेह और हिकारत की नज़र से देखा जाता है।

यानी एक तरह से यह सतीत्‍व भारत में स्‍त्री की अमानुषिक स्थिति के बेहद क्रूर चरम की तरह आता है - उस छल के जघन्‍य प्रमाण की तरह, जिसमें यातना और अत्‍याचार को स्‍त्री के लिए गौरव के क्षण में बदला जाता है। स्त्रियों के इस तरह जल मरने में वह क्रूर विडंबना है, जिसका वास्‍ता उस सामाजिक संरचना से है, जिसमें थोड़ी-बहुत हेरफेर और उदारता तो हमें स्‍वीकार्य है, मगर ऐसा मूलभूत बदलाव नहीं, जिससे पुरुष वर्चस्‍व की ज़ंजीरें टूटती हों। निश्‍चय ही बीते कुछ वर्षों में भारत के नागर समाज में स्‍त्री की स्थिति में कुछ फर्क आये हैं, लेकिन इस बदलाव से वह विशाल ग्रामीण भारत अब तक अछूता है, जिसमें दिवराला और पटना तमोली जैसे हादसे घटते हैं। लेकिन इस समाज से और उसके ज़रूरी सवालों से हमारी बेख़बरी का भी क्‍या ऐसी हत्‍याओं में हाथ नहीं है? आधुनिक भारत के इतने सारे नक्‍शे बनाने-सजाने के बाद भी अगर एक मध्‍ययुगीन भारत बचा हुआ है, जिसमें अमानवीय प्रथाएं अट्टहास करती हैं और जलती हुई स्त्रियों की चीख़ें धूप और अगरबत्ती और मंत्रोच्‍चार में दबा दी जाती हैं, तो इसके शर्म की कुछ कालिख हमारे माथे पर भी है।
(जनसत्ता: 8 अगस्‍त, 2002)

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