12/27/2012

एक अनाम बलात्‍कृता का बयान

(दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार लड़की आज देर रात इलाज के लिए सिंगापुर भेज दी गई। कल यानी 27 दिसंबर को दिन में एक बार फिर इंडिया गेट पर लोग जुटेंगे। पिछले आठ दिनों के दौरान चीज़ें इतनी तेज़ी से घटी हैं कि बहुत कुछ समझ में नहीं आया। दिल्‍ली में चलती बस में बर्बर सामूहिक बलात्‍कार, चार दिन के भीतर सभी दोषियों की गिरफ्तारी, देश भर में आक्रोश, प्रदर्शन, फिर अचानक हिंसा का दौर, पुलिस का दमन, एक सिपाही की मौत और फिर उसके दोषियों की गिरफ्तारी। लड़की के बयान और मृत सिपाही के पोस्‍टमॉर्टम की तकनीकी गड़बडि़यों से बेपर्द सरकारी झूठ, आनन-फानन में उसे विदेश भेजने का सरकारी फैसला... हर कोई बोल रहा था, सब लिख रहे थे। सबका कोई न कोई पक्ष था। आक्रोश का एक सैलाब उमड़ा जिसमें विवेक धुंधला था। जहां विवेक दिखा, वहां संवेदना नदारद थी। जहां संवेदना थी, वहां फतवे दिए जा रहे थे। जो चुप थे, वे तटस्‍थ ठहराए जा रहे थे। भीड़ में होना अपने समय में होना माना गया। और समय- उसकी चूल उखड़ी हुई थी। इतना आक्रोश, इतनी आवाज़, कि सब चीख रहे थे और कोई किसी की नहीं सुन रहा था।
 
ऐसे में 'काफिला' पर 25 दिसंबर को किसी अनाम बलात्‍कृता का एक लेख छपा। पता नहीं कितनों ने पढ़ा। पढ़ने के बाद लगा गोया मनों पानी सिर पर उंडेल दिया गया हो। यह सरकारी पानी नहीं था वाटर कैनन का... शायद, आंखों का पानी था। मुझे लगा कि यही मेरा बयान हो सकता है। देर से सही, अनूदित सही। मैं नहीं जानता कि जिसने इसे छापा है उसकी यह संपादकीय तरकीब है या वास्‍तव में किसी पीडि़ता का बयान। भीतर से लेकिन लगता है कि यह मेरी बात है। अब तक कही गई/लिखी गई तमाम बातों को मैं एक तरफ रखता हूं। जिसने भोगा है, उससे ज्‍यादा सच्‍चा कौन हो सकता है। हम वास्‍तव में बलात्‍कार के बारे में कुछ नहीं जानते। शायद, इसे पढ़ने के बाद कुछ जान सकें... मॉडरेटर)

 

कौन जाने क्‍या होता है बलात्‍कार?  

 
साभार: दि गार्डियन


बलात्‍कार इसलिए होते हैं क्‍योंकि अधिकतर लोगों को इसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता।  

ऐसा कहना कि बलात्‍कार की शिकार औरतें इसे समझती हैं, उनके बारे में कुछ ज्‍यादा ही बड़ी राय बना लेने जैसा होगा। इसका तात्‍कालिक असर बस एक गहरा और अदृश्‍य घाव है। सालों तक काउं‍सलिंग के बावजूद जो दर्द देता है। एक हदस सी बनी रहती है। इसके आगे दुनिया की सब ताकतें, इंसानी हों या रूहानी, छोटी पड़ जाती हैं। शायद ही कभी इस अपराध की शिकायत दर्ज होती होगी। औरतों को मजबूत बनाने के बजाय हमारा कानूनी तंत्र इतने कम मामलों में सज़ा सुनाता है कि वह खुद सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है।

ऐसा अपराध करने वाले, यानी बलात्‍कारी भी, बलात्‍कार के बारे में उतना ही कम या बराबर जानते हैं जितना कि पीडि़त। वे गिरफ्तारी से, लोगों की नज़र से, शर्मिंदगी से बच निकलते हैं, और यही बात उनके मनोविकार को बढ़ावा देती है। शायद वे जानते हों, या शायद नहीं भी, कि बलात्‍कार सेक्‍स का नहीं, दरअसल सत्‍ता का मसला है।

कानून बनाने वालों को नहीं पता कि ऐसे मामलों में क्‍या करना है। दुनिया की सबसे प्रबुद्ध सरकारें भी बलात्‍कार की सबसे कम सज़ा सुनाती हैं।

मीडिया इसे लेकर उतना ही उत्‍तेजित रहता है जितना और चीज़ों के बारे में। लेकिन उसकी सारी रिपोर्टिंग, सारा एक्टिविज्‍म किसी काम का नहीं है, उससे कुछ नहीं होगा क्‍योंकि वह जल्‍द ही दूसरे मसलों में उलझ जाएगा।

प्रदर्शनकारी बलि का बकरा तलाश कर संतुष्‍ट हो जाते हैं। कभी-कभार उन्‍हें कामयाबी मिल जाती है, अकसर नहीं भी। वे खराब कानून व्‍यवस्‍था का मुद्दा उछालते हैं और उन पर आंसू गैस छोड़ दी जाती है क्‍योंकि सरकार को लगता है वे अशांति फैला रहे हैं।

बलात्‍कार की शिकार जानती हैं कि उनके ज़ख्‍म कभी नहीं भरने वाले (बशर्ते वे ज़ख्‍मों के चलते दम न तोड़ दें या फिर खुदकुशी न कर बैठें)। बलात्‍कार उनके ऊपर, उनके रिश्‍तों पर, बच्‍चों पर कितने तरीकों से असर डालता है, यह समझने में ही उन्‍हें बरसों लग सकते हैं। अपराधी को मिला दंड उनके लिए सांत्‍वना पुरस्‍कार जैसा होता है। यह बात अलग है कि अपराध के आंकड़ों के मुताबिक कुछ साल ऐसे रहे जब दर्ज कराए गए मामलों में आधे से कम में ही सज़ा हो पाई।

कुछ ज्‍यादा गुस्‍साए हुए लोगों का मानना है कि फांसी की सज़ा इसका एक हल हो सकती है, लेकिन यह बलात्‍कार के खिलाफ कारगर हो, ऐसा नहीं है। मसलन, एक चार साल की बच्‍ची का बलात्‍कार आप नहीं रोक सकते यदि बलात्‍कारी परिवार के भीतर ही बैठा हो क्‍योंकि ऐसी हालत में उस बच्‍ची को शिकार होने से कोई नहीं बचा सकता। फांसी की सज़ा ऐसे किसी आदमी को नहीं रोक सकती जो बरसों की दमित यौन इच्‍छा और यौन शिक्षा के अभाव के चलते महिलाओं को उपभोग की वस्‍तु के रूप में देखता हो। यह मनोविकार हालांकि सामाजिक रूप से हमारे यहां स्‍वीकार्य है। भले ही उस आदमी को आप जेल भेज दें, लेकिन दरअसल उसे अंदाज़ा ही नहीं है कि वह किस किस्‍म का अपराध कर रहा था। दुर्भाग्‍य से उसके बाद की पीढ़ी के आदमी और औरत भी इस बात को नहीं समझ पाएंगे। चूंकि इंसाफ शायद ही कभी होता दिखता है, इसलिए फांसी पर लटकाना किसी भी दूसरी सज़ा के बराबर ही साबित होगा। कुछ लोग शायद इस बात से खुश हो सकते हैं, भले ही हमें एक भी राक्षस से छुटकारा मिले या न मिले।

महिलाएं अपने बलात्‍कारी बेटों, पिताओं, और कभी-कभार पतियों को बचाती ही रहेंगी। वे जानती हैं कि परिवार के भीतर एक दुराचारी आदमी के खिलाफ खड़ा होना सभी के लिए सब कुछ को हमेशा के लिए बदल देगा, और उन्‍होंने अपने प्रशिक्षण से जो सीखा है वह दरअसल इसका ठीक उलटा है। वो यह, कि लंबी दौड़ में चीज़ों को नज़रंदाज़ करना, उनसे मुंह मोड़े रखना ही शायद सब के लिए बेहतर है- और शायद ऐसा ही है भी। और इस तरह, अन्‍याय का दुश्‍चक्र पूरा हो जाता है।

इस दुनिया में बेशक ऐसे आदमी हैं (इस देश की बात छोडि़ए) जो शायद जानते हैं कि अपनी बीवियों और बेटियों के मुकाबले अपनी कारों और पालतू जानवरों के साथ बेहतर व्‍यवहार कैसे किया जाता है।  

बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता... और यही इसकी तार्किक परिणति है।

 

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सम्पादकीय तकनीक ही लगता है यह पत्र.... पोलिटिकली ज्यादा ही करेक्ट है इसलिए शक हो रहा है...

बेनामी ने कहा…

सम्पादकीय तकनीक ही लगता है यह पत्र.... पोलिटिकली ज्यादा ही करेक्ट है इसलिए शक हो रहा है...

raju ने कहा…

चाहे तरकीब से लिखा गया हो या सच्चाई से -- मूल मुद्दा बहुत अच्छे से रखा गया है

रचना ने कहा…

http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/12/blog-post_26.html

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें