1/31/2013

Free speech gets a major boost (in the a**)





So, young Indians cannot tell their friends in what they like on Facebook, without being “pre-screened” by Harvard types (or hauled into a police station by Shiv Sena goons). So, bloggers cannot publish their “online private diaries” without the sword of 66(A) hanging over their heads.

So, tweeters can be blocked and Savita bhabhi‘s enviable lifestyle is subject to some faceless babu’s sense of humour (or voyeurism). So, the Mahatma‘s life is beyond scrutiny in the land of you-know-who. So (oh!), Aamir Khan‘s film will miraculously not be screened, also in the land of you-know-who.

Or his TV show.

So, TV stations cannot show protests without threatened by the information and broadcasting ministry (or corporate titans). So, newspapers cannot report what their reporters see without being told that the tap of government advertisements could be turned off.

So, M.F. Husain cannot die in his own country. So, A.K. Ramanujam‘s interpretation of the Ramayana hurts somebody.

So, Ashis Nandy cannot drop his pearls on corruption without offending Dalits, tribals and OBCs. So, Salman Rushdie cannot go to a lit-fest in Jaipur (or Calcutta) without offending Islamist fundoos. So, Shah Rukh Khan cannot write what’s in his heart without offending.

So, Kamal Hassan‘s new film can be banned by a government run by a former film actor.

Sometimes, you do have to remind yourself it is a free country, don’t you?



Image: courtesy R. Prasad/ Mail Today

Courtesy

1/26/2013

टोबा टेक सिंह इत्‍थे है!


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


प्राथमिक की किताबों में हमें बताया गया है कि भारत एक 'गणराज्‍य' है। गणराज्‍य का बुनियादी अर्थ ग्रीक दार्शनिक सिसेरो के मुताबिक वह राज्‍य है जहां की सरकार दरअसल जनता का मसला होती है न कि किसी शासक की बपौती। जनवरी के तीसरे सप्‍ताह में दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे भारत रंग महोत्‍सव के दौरान पाकिस्‍तान की दो नाट्य मंडलियों को मंचन करने से भारत की सरकार ने रोक दिया। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय ने कहा, कि चूंकि वह सरकारी संस्‍था है इसलिए उसे सरकार का आदेश मानना होगा। अब यदि हम सरकार को जनता का मसला मानते हैं यानी भारत को गणराज्‍य मानते हैं, तो पाकिस्‍तानी नाटक मंडली पर लगी रोक ज़ाहिर है जनता द्वारा लगाई गई होगी। हमारे मानने या न मानने का सवाल भी यहां उतना नहीं है क्‍योंकि हमारी सरकार जनता की चुनी हुई सरकार है, लिहाजा उसका कोई भी आदेश जनता का आदेश है और जनता का आदेश मतलब गणराज्‍य का आदेश। इसे सिर आंखों पर रखना जनता का परम कर्त्‍तव्‍य है। इसलिए कायदा यह बनता था कि पाकिस्‍तानी नाट्य मंडलियां बिना कोई देरी किए एनएसडी के दिए हुए वापसी के टिकट लेकर बैरंग अपने मुल्‍क लौट जातीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी गणराज्‍य के कुछ अमनपसंद लोगों की वजह (जो ज़ाहिर है इस देश की जनता का ही हिस्‍सा हैं) से अजोका समूह द्वारा मंटो पर आधारित ''कौन है ये गुस्‍ताख'' का मंचन हुआ। बेशक, वह दिल्‍ली में ही हुआ, कांग्रेस और गांधी खानदान के साथ पुराने रिश्‍तों के लिए परिचित गोपाल शरमन के अक्षरा थिएटर के प्रांगण में संसद से महज़ एक किलोमीटर हुआ। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू के नाम पर कांग्रेसी समाजवाद को बचाए रखने के लिए बनाए गए जेएनयू में भी ग्रुप ने नाटक किया। और यह सब ऐन उसी दिन हुआ यानी 19 दिसंबर को, जिस दिन अजोका को एनएसडी में प्रस्‍तुति देनी थी। ऐसा कैसे हो सकता है कि जो गणराज्‍य किसी पर पाबंदी लगाता है, वही राजधानी में अपनी ही ज़मीन पर कुछ लोगों को इसका मखौल उड़ाने की छूट दे देता है। इसे चेक एंड बैलेंस का लोकतंत्र कह कर टाला जा सकता है। इसे ट्रैक-2 डिप्‍लोमेसी के नाम पर 'जस्टिफाई' किया जा सकता है। लेकिन विडंबना देखिए कि भारतीय गणराज्‍य का आदेश इतना कमजोर हो चुका है कि पाकिस्‍तान की नाटक मंडली उस जनता के समर्थन से नाटक कर पाती है जिसने पाबंदी का आदेश दिया था। कहीं कुछ घपला जरूर है।

दिल्‍ली के अक्षरा थिएटर में अजोका ग्रुप 

मसलन, पहली संभावना यह हो सकती है कि नाटक का आयोजन करने में, आयोजन के लिए जगह देने में और नाटक देखने के लिए आने वाले लोगों में कोई भी इस गणराज्‍य का नहीं था। यदि ऐसा ही है तो यह तकरीबन एबटाबाद में अमेरिका के जबरन घुसकर लादेन की हत्‍या जैसी संगीन दखलंदाजी वाली कार्रवाई मानी जाएगी जो कि गणतांत्रिक मूल्‍यों और संप्रभुता की उसकी बुनियाद के खिलाफ जाती है। ऐसे में तो भारतीय गणराज्‍य को इस नाटक के मंचन से जुडे तमाम लोगों को राजद्रोही ठहरा देना चाहिए, जनद्रोही ठहरा देना चाहिए। गणराज्‍य में जनता को उसी की राजाज्ञा से हटकर कुछ गलत करने की छूट नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि जिन्‍होंने आदेश जारी किया वे जनता से ताल्‍लुक न रखते हों या सारी की सारी जनता से ताल्‍लुक न रखते हों। यह बात कुछ बेहतर लगती है क्‍योंकि इस गणराज्‍य का चुनाव आयोग कहता है कि सरकार के जिस नुमाइंदे के दस्‍तखत से नाटक मंडली या पाकिस्‍तानी हॉकी टीम को वापस भेजने का आदेश आया वह सरकार इस देश के 23.5 फीसदी के वोट पर टिकी है। यह तो दिलचस्‍प है। यानी जिसे हम गणराज्‍य कह रहे हैं, उसमें से 76.5 फीसदी जनता गायब है। क्‍या भारत 23.5 फीसदी गणराज्‍य है?  

इस बात को बेहतर समझने के लिए 20 जनवरी 2013 के टाइम्‍स ऑफ इंडिया की एक खबर पर नज़र डाल लेना दुरुस्‍त होगा। अखबार कहता है कि कुछ हफ्ते पहले भारत के वित्‍त मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को बताया था कि वह नई खरीद के लिए आवंटित किए जाने वाले बजट में दस हज़ार करोड़ रुपए की कटौती करने जा रहा है। इसके अलावा उसके राजस्‍व बजट में भी पांच से दस फीसदी की कटौती लागू की जाएगी। रक्षा मंत्रालय का इस साल के लिए बजट 79,579 करोड़ था लेकिन वित्‍त वर्ष की आखिरी तिमाही में ए‍क भी रक्षा सौदा पूरा न कर पाने की अजीब स्थिति के चलते अब वित्‍त मंत्रालय उस पर बजट कटौती का दबाव बना रहा है। रक्षा मंत्रालय ऐसा कभी नहीं होने देना चाहेगा और अपनी बात को साबित करने के लिए वह खराब सुरक्षा स्थिति से लेकर उपकरणों के पुराने पड़ जाने तक कोई भी कारण गिना सकता है। खबर में सूत्र भी बताते हैं कि वह अपनी बात वित्‍त मंत्रालय को समझाने में लग गया है। सोचिए कि रक्षा मंत्रालय की बजट कटौती का सीधा असर किस पर पड़ेगा। ज़ाहिर है, सामरिक हथियार और रक्षा उपकरण विक्रेताओं पर। यह अनायास नहीं है कि टाइम्‍स नाउ नाम के आक्रामक समाचार चैनल में रक्षा मसले पर चर्चा करने के लिए प्राइम टाइम पर जिन विशेषज्ञों को बुलाया जाता है, उनमें एक के हथियार कंपनी का मालिक होने का उद्घाटन हाल में हुआ है। बंबई के एक शरद शाह ने इस बाबत राष्‍ट्रीयप्रसारण संघ (एनबीए) को एक शिकायत भेजी है, जिसके बाद उक्‍त रक्षा विशेषज्ञ की असली पहचान खुल सकी।

बनाना रिपब्लिक!
बहरहाल, आखिर दोनों बातों का सिरा कहां जाकर जुड़ता है? जैसा कि चर्चाएं आम हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि हाल में पाकिस्‍तान के साथ नियंत्रण रेखा पर जो तनाव पैदा हुआ और दो भारतीय फौजियों के सिर काटे जाने की खबर से देश में युद्धोन्‍मादी अंधराष्‍ट्रवादी हवाएं बहने लगीं, वह कोई सुनियोजित षडयंत्र हो? यह सिर्फ संदेह है लेकिन इसके ठोस कारण हैं। इस घटना के हवाले से रक्षा मंत्रालय बजट कटौती न करने के अपने तर्क को मज़बूत कर सकेगा और हथियार लॉबी का भारत से ठेका प्रभावित नहीं होगा। अगर यह साजि़श है, तो इस पर राष्‍ट्रवाद का मुलम्‍मा चढ़ाने के लिए टीवी के परदे पर छद्म युद्ध रच देने वाले वीरबालक मौजूद हैं और हथियार विक्रेता भी, जो सामरिक विश्‍लेषण के आवरण में रक्षा मंत्रालय को देश के सामने खुलेआम नुस्‍खे दे रहे हैं। याद रहे कि सीमा पर तनाव के बहाने ही पाकिस्‍तान की हॉकी टीम पर पाबंदी लगाई गई है और एनएसडी में दो पाकिस्‍तानी नाटक मंडलियों पर भी, गो‍कि सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान और खेलों का कोई सीधा संबंध सीमा के तनाव से वैसे भी नहीं होना चाहिए जबकि इस मामले में तो सरकार के प्रतिबंधात्‍मक आदेश के आधार को ही टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रपट से चुनौती मिलती दिख रही है। इस आलोक में ज़रा देखिए कि भारतीय गणराज्‍य किसके लिए और किसके खिलाफ काम कर रहा है? आपने पांच साल से चली आ रही पाकिस्‍तान के साथ विश्‍वास बहाली की प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया, सांस्‍कृतिक समूह, खेल टीम सबके साथ विद्वेष पैदा कर डाला, समूचे देश में पाकिस्‍तान विरोधी (और कहना न होगा मुस्लिम विरोधी) माहौल पैदा कर दिया और इस आड़ में कॉमनवेल्‍थ से शुरू होकर मुसल्‍सल चले आ रहे घोटालों के खेल पर 'स्‍मोकस्‍क्रीन' डाल दिया। यह सब किसके हित? सिर्फ निजी पूंजी के, और किसी के नहीं। हथियार बेचने वाली कंपनियां निजी पूंजी का उद्यम हैं जिन्‍हें इस माहौल का लाभ मिलेगा। कॉमनवेल्‍थ, 2जी, कोयला घोटाला, सब कुछ निजी पूंजी और जनता की चुनी हुई सरकार के घालमेल की दास्‍तान है और इस माहौल में सारा फायदा उन्‍हीं का है जिनका सिर पिछले चार साल के दौरान भ्रष्‍टाचार के दलदल में फंसा था। याद है, रतन टाटा ने क्‍या कहा था? 'बनाना रिपब्लिक'!   

मैंगो पीपॅल?
तो गणराज्‍य अब या तो 23.5 फीसदी रह गया है या फिर 'बनाना' हो गया है। अंग्रेज़ी में एक कहावत है, 'लुक हू इज़ स्‍पीकिंग' (देखो कौन बोल रहा है)। ठीक है कि भारत में निजी पूंजी के सबसे सम्‍मानित नाम और गणतंत्र के सबसे बड़े लाभुक रतन टाटा ने भारत के लिए 'बनाना रिपब्लिक' का इस्‍तेमाल किया जब उन्‍हीं की टांग फंस गई। उसका बेहतरीन जोड़ीदार जवाब इस गणराज्‍य के दामाद रॉबर्ट वढेरा ने गणराज्‍य बनाने वालों को 'मैंगो पीपॅल' कह कर दिया, जब उनकी गरदन भ्रष्‍टाचार में फंस गई। इस जवाबी कव्‍वाली को भी समझना होगा। कोई और नहीं है जो भारतीय गणराज्‍य और गणराज्‍य की आत्‍मा यानी भारतीय जनता को नई परिभाषा दे रहा हो। ये वही लोग हैं जिन्‍होंने गणराज्‍य का यह हाल किया है। ये किसी तीसरे को कुछ कहने का मौका ही नहीं देते, क्‍योंकि जो सबसे पहले बोलता है, जो सबसे तेज़ बोलता है, वही सच्‍चा और साफ होता है। इस देश में शुरू से ऐसा होता रहा है।

नगा नेता अंगामी ज़ापु फिज़ो 
भारतीय गणराज्‍य आज़ादी के ऐन बाद से कभी भी 100 फीसदी का नहीं रहा। आज़ादी की तो छोडि़ए, उससे पहले गणराज्‍य की परिकल्‍पना तक को इस देश की सौ फीसदी जनता ने अपनी सहमति नहीं दी थी। इस क्‍लासिकल और ऐतिहासिक बात को सौ साल पूरे होने में सिर्फ पांच साल बाकी हैं। बात 1918 की है जब कुछ पढ़े-लिखे नगाओं ने कोहिमा में नगा क्‍लब नाम से एक संगठन बनाया था। उन्‍होंने भारत आए साइमन कमीशन को 1929 में एक ज्ञापन देकर कहा था कि भारत के संवैधानिक ढांचे से नगाओं को अलग रखा जाए। आज़ादी से एक साल पहले यही नगा क्‍लब एनएनसी यानी नगा नेशनल काउंसिल में तब्‍दील हो गया जिससे बाद में चल कर अलगाववादी पार्टी नेशनल सोशलिस्‍ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) बनी। बहरहाल, भारत की आज़ादी से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्‍त 1947 को नगालैंड ने एनएनसी के नेतृत्‍व में अपनी आज़ादी की घोषणा कर डाली थी और भारत की आज़ादी के बाद उसका हिस्‍सा होने को मानने से इनकार कर दिया। नतीजा तय था। 1948 में एनएनसी के लोकप्रिय नेता फिज़ो को बग़ावत के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और भारतीय सेना व इंटेलिजेंस ने अपनी पूरी ताकत से पूर्वोत्‍तर में सबसे पहले नगालैंड की जनता पर हमला बोला। फिज़ो को विदेश भाग जाना पड़ा। आखिरकार 1975 में जाकर एनएनसी के कुछ नेताओं ने भारत सरकार से समझौता कर लिया, जिसे एनएससीएन(आइएम) अब तक विश्‍वासघात का नाम देता है। फिज़ो को लंदन में मरे आज 23 साल हो रहे हैं, नगालैंड की समस्‍या समूचे पूर्वोत्‍तर समेत कश्‍मीर में समान रूप में जारी है जहां एक गणराज्‍य अपनी ही जनता का गला घोंटने का आदी हो चुका है। और इस गणराज्‍य के आधुनिक अपराधी आज इसे ही अलग-अलग नामों से संबोधित कर रहे हैं। क्‍या यह गणराज्‍य पैदाइशी ही नाजायज़ नहीं था? एक नाजायज़ संतान के ज़रायमपेशा बनने का खतरा सबसे ज्‍यादा रहता है। ज़रायमों के गवाह तो हम पर्याप्‍त हैं।

कैप्‍टन जयपाल सिंह मुंडा 
हिंदुस्‍तान न तो ओ.हेनरी की कल्‍पना का अंचूरिया है, न ही उनके अनुभवों का हॉन्‍डुरास। यहां न यूरोप के जैसे केले होते थे, न यहां निजी कंपनियों और सरकारों के बीच हॉन्‍डुरास जैसे पारंपरिक रिश्‍ते थे। यहां निजी पूंजी की लूट भी बाकायदा उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से शुरू हुई हैं। फिर चूक कहां हुई? मामला सिर्फ नगाओं के अस्‍वीकार का नहीं है। भारत का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा बनी, तो उसमें कैप्‍टन जयपाल सिंह नाम के एक शख्‍स को रखा गया था। 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत को हाकी का पहला स्वर्ण पदक जिस टीम ने दिलाया था, जयपाल सिंह उसके कैप्टन थे। बाद में बतौर आदिवासी नेता मशहूर हुए और संविधान सभा के सदस्य चुने गए। 13 सितंबर 1946 को संविधान सभा में दिया गया कैप्टन जयपाल सिंह का मशहूर भाषण देखें:

"अगर भारतीय जनता के किसी समूह के साथ सबसे बुरा व्यवहार हुआ है तो वो मेरे लोग (आदिवासी) हैं। पिछले छह हजार सालों से उनके साथ उपेक्षा और अमानवीय व्यवहार का ये सिलसिला जारी है। मैं जिस सिंधु घाटी सभ्यता की संतान हूं, उसका इतिहास बताता है कि बाहरी आक्रमणकारियों ने हमें जंगलों में रहने के लिए मजबूर किया। हमारा पूरा इतिहास बाहरियों के शोषण और कब्जे से भरा है जिसके खिलाफ हम लगातार विद्रोह करते रहे। बहरहाल, मैं पं .नेहरू और आप सब के इस वादे पर भरोसा करता हूं कि हम एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। ऐसा भारत बनाने जा रहे हैं जहां सभी को अवसर की समानता होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी।"

कैप्‍टन जयपाल सिंह ने पंडित नेहरू की बात पर वैसे ही भरोसा किया जैसे उलगुलान के नेताओं ने अंग्रेज़ों पर किया था, कश्‍मीरियों ने भारत सरकार पर किया था, सोनी सोरी के परिवार ने रमण सिंह की सरकार पर किया था और पाकिस्‍तानी नाटक समूह ने एनएसडी पर किया था। ये सारी बातें अलहदा नहीं हैं, बिल्‍कुल एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। गणराज्‍य में भरोसा करना जनता का काम है, इसमें कुछ भी मौलिक और नया नहीं। मौलिक तब होता है जब जनता का यह भरोसा गणराज्‍य तोड़ देता है और उसी क्रम में अपनी वैधता खो देता है। जो गणराज्‍य आज़ादी के पहले से वैधता के बगैर पूंजीवादी लोकतंत्र के रूप में विकसित हुआ, उसमें जनता का भरोसा टूटना अपरिहार्य है, तय है।

ज़रा टूटे हुए भरोसे के लोकप्रिय चेहरों को याद करें, सबसे पहले कौन याद आता है? इरोम शर्मिला, जो 12 साल से अहिंसा और सच की खुराक पर जि़ंदा है। सोनी सोरी, जो दिल्‍ली की बलात्‍कार कांड पीडि़ता से बस इस मामले में अलहदा है कि वह मर नहीं गई, बदतर इस मामले में कि जेल में है और उसका ऐसा हाल करने वाले पुलिस अफसर अंकित गर्ग को गणतंत्र दिवस के दिन पिछले ही साल राष्‍ट्रपति ने तमगे पहनाए हैं। मनोरमा, जिसके विरोध ने गणतंत्र को नंगा कर दिया। या फिर जीतेन मरांडी का चार साल का बेटा, जिसकी गलती सिर्फ इतनी है कि उसने किसी गैर आदिवासी के घर जन्‍म नहीं लिया। और संसद पर हमले का आरोपी अफ़ज़ल गुरु जो अपनी मौत के इंतज़ार में रोज़ मर रहा है, ज़रा उसे खास तौर से याद कर लें क्‍योंकि इस गणतंत्र की सबसे बड़ी अदालत ने उसके बारे में यह कहा था, ''अफ़ज़ल गुरु किसी आतंकी संगठन का सदस्‍य नहीं है, लेकिन इस राष्‍ट्र की सामूहिक चेतना को संतुष्‍ट करने के लिए उसे फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए।'' किस गणतंत्र की बात कर रहे हैं हम?


अनगिनत चेहरे हैं जो गणतंत्र की औकात को आपके सामने खोल कर रख देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ हमें याद हैं, चूंकि यातना और जबर ने उनका चेहरा और निखार दिया है। दूसरे या तो बाहर हैं, बचे हुए हैं या फिर अपनी मौत मरने को छोड़ दिए गए हैं। अगर फिर भी इस देश में जो है वह गणतंत्र है, तो घोटालों के खिलाफ जो लोग सड़कों पर उतरे, बलात्‍कार के खिलाफ जिन लोगों ने गणतंत्र के इतिहास में पहली बार रायसीना पर धूल उड़ाई, अजोका का नाटक जिन लोगों ने करवाया, वे सब इस देश की जनता नहीं। इस देश की जनता वे हैं जिनका गणराज्‍य है। गणराज्‍य उनका है जिन्‍हें इसके गणराज्‍य होने से फायदा है। फायदा उन्‍हें है जो इस गणराज्‍य के नुमाइंदा चेहरों को बदले में बनाए रखते हैं। ये वही साढ़े 23 फीसदी लोग हैं, जिनकी बात हमने शुरू में की थी। अरुंधती रॉय ने अपनी किताब को 'ब्रोकेन रिपब्लिक' का गलत नाम दिया था और उसका अनुवाद 'आहत देश' और गलत था। कहीं कुछ भी टूटा नहीं है क्‍योंकि इसके बनने में ही गड़बड़ थी।

टोबा टेक सिंह का कोई चेहरा नहीं है आज 
उदय प्रकाश का मोहनदास जिंदगी भर साबित करता रह गया कि वही मोहनदास है। अंतत: मोहनदास की केंचुल में कोई और स्‍थापित हो गया। मंटो का ईशर सिंह लगातार पूछता रहा, 'टोबा टेक सिंह कित्‍थे है?' किसी ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया। सब उसी के जैसे पागल थे जिन्‍हें यह बात समझ नहीं आती थी कि बैठे-बैठे वे हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान कैसे आ गए। उसने इतनी बार ये सवाल पूछा कि उसका नाम टोबा टेक सिंह पड़ गया। मोहनदास बेनाम अपने जीते जी अप्रासंगिक हो गया। ईशर सिंह टोबा टेक सिंह बन कर 'नो मैंस लैंड' पर ढेर हो गया। मंटो का टोबा टेक सिंह आज भी जिंदा है। अपने एक अरब अलग-अलग चेहरों के साथ वह रोज़ इस गणतंत्र को झूठा साबित कर रहा है। उसकी कोई पहचान नहीं, कोई नाम नहीं, कोई नागरिकता नहीं। 'नो मैंस लैंड' पर जीना उसकी नियति है।

गणतंत्र दिवस से ऐन पहले समूचे देश में पटाखे फूट रहे हैं क्‍योंकि राहुल गांधी नाम के एक अधेड़ को देश की सबसे पुरानी पार्टी का सबसे युवा उपाध्‍यक्ष बनाया गया है। गणतंत्र के राजकुमार का उदय हो चुका है। उसके बरक्‍स खड़ा है वह शख्‍स जिसकी आकांक्षाएं हज़ारों हत्‍याओं और सैकड़ों बलात्‍कारों की कब्र पर शीशम हो चुकी हैं। नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी नाम का यह शख्‍स गुजरात से दिल्‍ली के लिए कूच कर चुका है। कभी सोचा है आपने कि एक ऐसे राज्‍य का एक पिछड़ा नेता इतना कद्दावर कैसे बन गया जहां से आने वाले एक शख्‍स ने लाठी के दम पर नाजायज़ गणतंत्र को पैदा किया था और जहां से आने वाले एक दूसरे शख्‍स ने आने वाली अनगिन पीढि़यों को तकसीम का कैंसर मुफ्त में दे दिया था? आज गांधी और जिन्‍ना की रूह जहां कहीं होगी, मंटो को याद कर रही होगी। गुजरात से ही एक और शख्‍स उभरा था जिसकी पत्‍नी ने इस राष्‍ट्र के इतिहास में पहली और इकलौती बार जनता के राज का गला घोंट कर आपातकाल लागू किया था। फिरोज़ गांधी सिर्फ नाम के गांधी थे, इसलिए हरिदास मूंदड़ा और बेनेट कोलमैन को आईना दिखाने के ईमानदार चक्‍कर में अपनी सियासी हत्‍या करवा बैठे। बचे स्‍वमूत्र पीने की राष्‍ट्रीय सलाह देने वाले मोरारजी देसाई, तो उनके बाद से इतिहास जिस करवट बैठा बाबरी विध्‍वंस तक उसी कोने बना रहा। गुजरात वह जगह है जहां से गणतंत्र का इतिहास शुरू होता है, तकसीम होता है, चोटिल होता है, कोमा में जाता है और अपने आखिरी दांव के तौर पर नरेंद्रभाई मोदी को पैदा करता है। मोदी गणतंत्र की पैदाइश हैं, उसी गणतंत्र की जो कांग्रेस और अंग्रेज़ी साम्राज्‍य की नाजायज़ संतान है। और गणतंत्र कभी भी अपनी बागडोर नहीं छोड़ता, अदृश्‍य हाथों से थामे रहता है और इतिहास के अहम पड़ावों पर अपने हित एकाध दुश्‍मन पैदा कर लेता है ताकि उसकी गाड़ी अबाध चलती रह सके। दुश्‍मन को गढ़ना गणतंत्र के बुनियादी कामों में एक है। दुश्‍मन को इतना बड़ा बना दो कि गणतंत्र सुहाने लगे।

गणतंत्र के नए राजकुमार 

राहुल गांधी के भाषण पर लहालोट होता हिंदुस्‍तानी अवाम और पाकिस्‍तान के खिलाफ हुआं-हुआं करते लोग दरअसल वे ही हैं जिनके लिए यह गणतंत्र काम कर रहा है। साढ़े तेईस फीसदी का असल चेहरा देखने के लिए बस केले को छीलने की देरी है, लेकिन जिन्‍हें ये काम करना है वे वहां हैं जहां कोई नहीं रहता- टोबा टेक सिंह की धरती पर। जो गणतंत्र की धरती है, उसके बारे में रघुवीर सहाय को याद कर लेना काफी होगा, ''खतरा होगा / खतरे की घंटी होगी / उसे बादशाह बजाएगा, रमेश!''  

क्‍या समझ आया? टोबा टेक सिंह इत्‍थे है, इत्‍थे!!!

नो मैन्‍स लैंड पर ढेर टोबा टेक सिंह!





1/24/2013

Joint Public Statement on Hindutva Terror


24 January 2013

While one may or may not agree with the terminology employed by the Home Minister in his recent speech at Jaipur, we feel that for long prejudice has ruled investigations, obscuring the role of organizations and their multiple affiliates in planning and executing of attacks and bombings in the country. The veneer of 'nationalism' -- narrow, exclusionary and based on hatred for minorities as it is-- cannot hide the violence that Sangh and its affiliates beget and peddle. 

Civil rights groups have been arguing for long that the investigations into bomb blasts and terror attacks have degenerated into communal witch-hunts. Bomb blasts are followed predictably by mass arrests of Muslim youth, raids in Muslim-dominated localities, detentions, arrests and torture; media trials, charge sheets and prosecution based on custodial confessions and little real evidence. It has been assumed, and accepted widely, that no further proof of guilt need be offered than the fact that the accused belonged to a particular community. Leads which pointed to the hands of groups affiliated to Sangh organisations and their complicity in planning and executing acts of terror were ignored, never seriously pursued. The agencies, showing their abject bias, instead chose to pursue the beaten track of investigating Islamic terrorist organizations such—despite clear evidence pointing in the opposite direction. This was true of Nanded blasts in 2006, as well as of Mecca Masjid and Ajmer Sharif bombings.

The only exception was Maharashtra ATS chief Hemant Karkare, who had, as far back as 2008 conclusively brought into the public domain the nefarious designs of Abhinav Bharat and its foot soldiers of hate: (Sadhvi) Pragya Singh of the ABVP, serving army officer Col. Purohit, and Sunil Joshi, Indresh and Swami Aseemanand belonging to the RSS. Karkare had communicated to the Hyderabad Police the sensational claim by Col. Purohit that he had procured RDX from an army inventory when he was posted in Jammu and Kashmir in 2006. The Hyderabad Police however ignored his messages, having already detained close to 70 youth belonging to the Muslim community.
We demand that:
  • Although the Indian government has belatedly acknowledged the heinous terrorist acts of the Sangh groups we feel that a genuine probe must also perforce encompass a thorough enquiry into the terror nexus straddling Abhinav Bharat, RSS, VHP, BJP and Bajrang Dal leaders together with sections of the Indian intelligence and security agencies who deliberately subverted the probes as well as the due process of law.
  • It must also be investigated whether the network of Hindutva terrorists have been provided not just political but also financial and logistical support by various governments
  • There must be a thorough investigation into the foreign sources of funding of the Hindutva organizations.

We hope that the acknowledgement of Hindutva terror will not remain a statement only but that the investigations will be seriously and sincerely pursued. 

Signatories

Manisha Sethi, Jamia Teachers’ Solidarity Association
Shabnam Hashmi, Act Now for Harmony and Democracy (ANHAD)   
Mahtab Alam, People’s Union of Civil Liberties (PUCL)
Mansi Sharma, Activist, Delhi   
Subhash Gatade, Activist and Author, Godse's Children: Hindutva Terror in India
Rajeev Yadav, Adv. Mohd. Shoaib and Shahnawaz Alam, Rihai Manch, UP
Amit Sen Gupta, Senior Journalist, Delhi
Abu Zafar, Journalist, Delhi
Harsh Kapoor, South Asian Citizens Web
Seema Mustafa, Senior Journalist, Delhi
Ram Puniyani, Activist and Author, Mumbai
Sukumar Muralidharan, Senior Journalist
Syed Zafar Mehdi, Journalist
Dr. John Dayal, All India Christian Council
Prof. Kamal Mitra Chenoy, JNU
Navaid Hamid, Member, National Integration Council, GoI
Prof Anuradha Chenoy, JNU
Saba Naqvi, Senior Journalist, Delhi
Wilfred Dcosta, Indian Social Action Forum (INSAF)
Harsh Dobhal, Human Rights Law Network (HRLN)
Kavita Krishnan, All India Progressive Women Association (AIPWA)

    

1/23/2013

उदय प्रकाश और आनंद स्‍वरूप वर्मा की टिप्‍पणी: संदर्भ अरविन्‍द गौड़

(''समकालीन रंगमंच'' पत्रिका के हंगामाखेज़ लोकार्पण के बाद इसके संपादक राजेश चंद्र के दो पत्रों (एक एनएसडी निदेशक के नाम और दूसरा मित्रों के, दोनों जनपथ पर शाया) से शुरू  हुई बहस के क्रम में दो अहम प्रतिक्रियाएं आई हैं। नेपाल विशेषज्ञ वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा ने एक पत्र जनपथ के मॉडरेटर के नाम भेजा है और हिंदी के इकलौते ग्‍लोबल लेखक उदय प्रकाश ने राजेश चंद्र के पोस्‍ट पर सीधे टिप्‍पणी की है। ये दोनों प्रतिक्रियाएं बहस को पर्सपेक्टिव में लाने के लिहाज से अहम हैं क्‍योंकि राजेश चंद्र ने पिछले पत्र में अरविन्‍द गौड़ के हवाले से जिन तीन व्‍यक्तियों का नाम लिया है, उनमें आनंद स्‍वरूप वर्मा जी और उदय प्रकाश जी भी हैं। ये दोनों प्रतिक्रियाएं एक के बाद एक नीचे प्रकाशित की जा रही हैं- मॉडरेटर) 


आनंद स्‍वरूप वर्मा जी की प्रतिक्रिया 

अभिषेक जी,

आनंद स्‍वरूप वर्मा 
साथी राजेश चंद्र का पत्र देखा जिसमें उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की है। मुझे लगता है कि लोकार्पण के दिन जो कुछ हुआ उसे लेकर वह जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं। उनका यह सोचना बिल्कुल गलत है कि उस दिन की घटना से गहरे रंगमंचीय विमर्श की असीम संभावनाओं के साथ सामने आयीपत्रिका के भविष्य पर कुठाराघात हुआ।जब भी कोई ऐसा कार्यक्रम होगा जिसमें एकदम विपरीत धाराओं के लोग एक मंच पर होंगे और उन्हें बोलने का अवसर मिलेगा तो इस तरह की घटनाएं स्वाभाविक हैं। यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि जिस पत्रिका का लोर्कापण हो रहा है, उसमें छपी सामग्री पर ही बातचीत होगी और विषय से संबंधित अन्य मुद्दों पर किसी विमर्श की गुंजाइश नहीं रहेगी। इसके अलावा दो विरोधी विचारों के लोगों के मन में एक-दूसरे के काम के प्रति पूर्वाग्रह होते ही हैं और उनकी अभिव्यक्ति अगर किसी रूप में होती है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। यह कहना कि वक्ताओं को केवल पत्रिका तक अपने को केन्द्रित रखना चाहिए था अनुचित और असंभाव्य है। बेशक, अभिव्यक्ति के तरीके पर बातचीत हो सकती है और होनी भी चाहिए। संजय उपाध्याय ने शालीन ढंग से और अरविंद गौड़ ने उग्र ढंग से एक-दूसरे पर प्रहार किया था, इस पर भी आपने ध्यान दिया होगा। दोनों का कांटेंट एक जैसा था, अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न थे। व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूं कि अरविंद गौड़ अगर अपनी बात को थोड़ा शांत ओर सहज ढंग से रखते तो ज्यादा अच्छा होता। लेकिन हर व्यक्ति की अपनी शैली होती है और उस पर किसी दूसरे की शैली नहीं थोपी जा सकती।

राजेश चंद्र ने अपने पत्र में लिखा है कि मैंने बकौल अरविंद गौड़ उनके वक्तव्य और बर्ताव को बिल्कुल जायज़ ठहराया हैऔर उनसे कहा है कि इसके लिए अफसोस ज़ाहिर करने की ज़रूरत नहीं है। लोकार्पण वाली घटना के तीसरे दिन अरविंद गौड़ का मेरे पास फोन आया था और उनसे लंबी बातचीत हुई। किसी वेबसाइट पर उनके खिलाफ जो कुछ आया था उस पर ही वे बात कर रहे थे और उसे लेकर वे बेहद आहत और गुस्से में थे। मैंने उक्त वेब साइट को तब तक नहीं देखा था। उन्होंने बताया कि उक्त वेबसाइट में उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला गया है और यह भी बताया कि किस तरह की अनर्गल बातें कहीं गयी हैं (यहां मीडियाखबर और भड़ास4मीडिया पर छपी खबरों का जि़क्र है- मॉडरेटर)। मेरी बातचीत जितनी देर भी हुई, केवल वेबसाइट की सामग्री पर केन्द्रित रही और मैंने उन्हें सलाह दी कि इससे वे उत्तेजित न हों। लोकार्पण वाली घटना के बारे में या उस दिन के उनके व्यवहार के बारे में न तो चर्चा हुई और न मैंने अपनी कोई राय दी। वेबसाइट में जो कुछ छपा था और जिसकी मुझे जानकारी दी गयी उसके आधार पर मैंने निश्चित तौर पर अरविंद गौड़ का समर्थन किया था।

अरविंद गौड़ को मैं पिछले तकरीबन 25 वर्षों से जानता हूं और उनकी पत्रकारिता (पहले वह इस पेशे से जुड़े थे) और रंगकर्म से अच्छी तरह परिचित हूं। अतीत में कई मोर्चों पर हम लोगों ने साथ-साथ काम किया है और मैं उन्हें एक संघर्षशील, जनपक्षीय और ईमानदार व्यक्ति मानता हूं। उनके कुछ नाटक भी मैंने देखे हैं और मैं उन नाटकों से काफी प्रभावित हुआ हूं। मैंने उनकी मुफलिसी के दिन भी देखे हैं जब उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि नाटकों के रिहर्सल के लिए वह जगह ले सकें और इधर-उधर भटकते रहते थे। इन सबके बावजूद उन्होंने अपना रंगकर्म जारी रखा और अपने ग्रुप को एक सम्मानित स्थान दिलाया। व्यस्तताएं बढ़ने के साथ-साथ हम दोनों का मिलना उस तरह नहीं रहा जैसा 10-15 वर्ष पहले होता था इसलिए मुझे यह नहीं पता कि आज वह अपने थियेटर को कैसे चला रहे हैं लेकिन उनके नाटकों को मैंने अभी हाल तक देखा है। जो लोग इस तरह काम करते हैं उनके स्वभाव और व्यवहार में एक तल्खी आ जाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सिस्टम नकली लोगों को हर तरह की सुविधाएं पहुंचा रहा है और उन जैसे लोग निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। चूंकि यह संघर्ष करने वाले व्यक्ति का खुद का च्वायस होता है इसलिए उसके अंदर पैदा इस तल्खी को मैं सही नहीं मानता। यह सारा कुछ कहने के बाद मैं यह कहना चाहूंगा कि लोकार्पण के अवसर पर अगर अरविंद गौड़ ने अपनी तल्खी को व्यक्त करने में थोड़ा संयम से काम लिया होता तो ज्यादा अच्छा होता। उन्होंने अगर ऐसा नहीं किया तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा जिसे लेकर आप सब लोग इतने उत्तेजित हैं। साथ ही राजेश चंद्र एक जनपक्षीय रंगकर्मी हैं और उनका यह संकल्प लेना कि अब अरविंद गौड़ के साथ व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में किसी भी किस्म का कोई संबंध नहीं रखेंगे’, मेरे लिए दुखद खबर है। समान सोच के लोगों के बीच में एकता होनी चाहिए लेकिन यहां बिल्कुल विपरीत स्थिति दिखायी दे रही है। अरविंद जी से भी मैं कहूंगा कि अगर केवल उनके खेद व्यक्त करने से राजेश जी को संतोष होता है तो वह अपने को सही बताने की ही जिद पर क्यों अड़े हैं।

मैं एक बार फिर यही चाहूंगा कि इस विवाद को यहीं समाप्त किया जाए और दोनों मित्र ठंडे दिमाग से एक दूसरे को समझने की कोशिश करें।

- आनंद स्वरूप वर्मा

उदय प्रकाश जी की प्रतिक्रिया 

उदय प्रकाश 
''मैं जहाँ एक तरफ पाकिस्तान के नाटक और कलाकारों के साथ अपमानजनक बर्ताव के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का विरोध करता हूँ वही दूसरी तरफ दोहरे आचरण और जीवन मूल्यों की वकालत करने वाले तथा नैतिकता को राजनीति के बरक्स कोरी भावुकता से अधिक नहीं मानने वाले श्री अरविन्द गौड़ जी का भी विरोधी हो गया हूँ। आज के बाद मेरा उनसे व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में किसी भी किस्म का कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा।'' यह कहना है आपका तो क्या आप यही उद्घोषणा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए भी कर सकते हैं? इसी से यह भी स्पष्ट होगा कि रंगकर्म के प्रति आपके समर्पण और निष्ठा में कितनी गहराई और सच्चाई है।
(यह टिप्‍पणी राजेश चंद्र के दूसरे पत्र पर थी- मॉडरेटर)  

यह घटना जैसी भी रही हो, (मैंने भरसक पूरा प्रसंग देखा) ...मैं अरविंद गौड़ के पक्ष में हूँ। शायद 1986-87 से उन्हें जानता हूँ, निकट से। पीटीआई में वे मेरे सहयोगी भी थे। उनके संघर्षों और उपलब्धियों को मैं ही नहीं, हर वह रंगकर्मी जानता है, जो सरकारी संस्थानों पर नहीं, अपनी मेहनत , प्रतिभा, लगन और जागरूकता की वजह से अपनी जगह बनाता है। वे रंगमंच के बाबा नागार्जुन हैं और मेरे साथी हैं। भले ही उनके 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आन्दोलन में अन्ना हजारे या अरविन्द केजरीवाल की टीम में उनके सम्मिलित होने से मेरा इत्तिफ़ाक न हो। अरविन्द का रंगकर्म एनएसडी के बिना है।

(यह टिप्‍पणी राजेश चंद्र के पहले पत्र पर थी- मॉडरेटर) 


संबंधित पोस्‍ट 

1/22/2013

''पॉलिटिकली करेक्‍ट'' अरविन्‍द गौड़ ने नैतिकता की मिट्टी पलीद कर दी!



राजेश चंद्र 

मित्रो,
15वें भारत रंग महोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में विगत 14 जनवरी को आयोजित "समकालीन रंगमंच" पत्रिका के लोकार्पण समारोह में आदरणीय रंगकर्मी श्री अरविन्द गौड़ जी के अशालीन, दुर्भावनापूर्ण, हिंसक और कुल मिला कर निंदनीय बर्ताव के पश्चात् एक आयोजक, रंगकर्मी और पत्रिका के संपादक होने के नाते जिस त्रासद और असहज स्थिति ने मुझे आ घेरा, उसके बाद मेरे पास इसके अलावा और कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था कि मैं इस अराजकता और उत्पात की नैतिक ज़िम्मेदारी लूँ और उन लोगों से औपचारिक तौर पर माफ़ी मांगूं जिन्होंने मेरी राजनीतिक विचारधारा और विरोधी स्वभाव से भली भांति परिचित होते हुए भी मुझे अपनी जगह का लोकार्पण के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की छूट दी और मेरे बुलावे पर आयोजन में शामिल भी हुए। निश्चित रूप से उन्हें यह विश्वास था कि आयोजन में कोई गड़बड़ी नहीं होगी और न ही उनके अति-महत्त्वाकांक्षी भारत रंग महोत्सव पर कोई असर पड़ेगा। उनके इस विश्वास का क्या हश्र हुआ यह किसी से छिपा हुआ नहीं है- इसके बावजूद कि सारा दोष मेरी विनम्रता और सहज विश्वासी स्वभाव का था।

इस पूरे घटनाक्रम ने मेरे सामने जो मूल सवाल खड़ा किया वह नैतिकता बनाम राजनीति का था। मेरी नैतिकता ने मुझे प्रेरित किया कि मैं इस घटना का नैतिक दायित्व अपने सर लूँ और जो लोग इससे अकारण प्रभावित हुए उनसे क्षमा मांगूं। मैंने ऐसा ही किया। ऐसा करते हुए मैं नैतिक रूप से तो सही साबित हो गया पर मेरी राजनीति गलत साबित हो गई- वह भी एक ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक वक़्त में जब साम्प्रदायिकता के पक्ष में आत्मसमर्पण करते हुए तथा इस प्रकार उसे वैधानिक स्वीकृति देते हुए हमारी केंद्र सरकार और उसके अधीनस्थ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने भारत रंग महोत्सव में शामिल पाकिस्तानी और मंटो के जीवन पर आधारित दो महत्वपूर्ण नाटकों को अपमानजनक तरीके से समारोह से बाहर निकल दिया था। मेरी राजनीति और रचनाशीलता ऐसी कायरता को सहनीय नहीं मानती रही है और आज भी उसकी कठोर भर्त्सना करती है।

लोकार्पण वाली घटना के पश्चात् मैंने अपने पत्र में (जिसे बाद में सार्वजनिक भी किया गया) आदरणीय अरविन्द गौड़ जी से यही अपेक्षा रखी थी कि वे उस दिन के अपने लोकार्पण-विरोधी, अनैतिक एवं भड़काऊ आचरण के लिए- जिसके कारण एक अच्छा-भला उत्सवधर्मी समारोह राजनीतिक नूरा-कुश्ती का अखाड़ा बन गया और एक नवजात पत्रिका जो गहरे रंगमंचीय विमर्श की असीम संभावनाओं के साथ सामने आई थी उसके भविष्य पर कुठाराघात हुआ- नैतिक ज़िम्मेदारी लें और सार्वजनिक तौर पर अफ़सोस प्रकट करें। यदि उन्होंने ऐसा किया होता, अगर उन्होंने नैतिक साहस दिखाया होता, तो जहाँ एक तरफ वे नैतिक रूप से सही साबित होते, मैं भी राजनीतिक रूप से सही साबित होता। परन्तु लम्बे इंतज़ार के बाद भी उन्होंने ऐसी कोई मंशा नहीं दिखाई। अरविन्द जी कुल मिला कर राजनीतिक रूप से तो सही रहे पर उन्होंने नैतिकता की मिट्टी पलीद कर डाली। उन्होंने सबके सामने यही आदर्श प्रस्तुत किया कि व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक व्यवहार में, कथनी और करनी में किसी भी किस्म का मेल रखना उचित नहीं, और अगर यह जीवन मूल्य है तो काफी पिछड़ा हुआ है।

'समकालीन रंगमंच' का लोकार्पण करते हुए संजय उपाध्‍याय, देवेंद्रराज अंकुर, भानु भारती, अरविन्‍द गौड़ और दिनेश खन्‍ना 

इतने दिनों के बाद इस पूरे प्रकरण पर आज उन्होंने मुझसे फ़ोन पर करीब एक घंटे तक बातचीत की और इस बातचीत का लब्बोलुबाब यही था कि उन्हें अभी भी अपने कृत्य में कुछ भी अफसोसजनक नहीं लगता। अरविन्द जी ने मुझे बताया कि वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद स्वरुप वर्मा और वरिष्ठ नाटककार श्री राजेश कुमार ने फोन पर हुई बातचीत में लोकार्पण समारोह में उनके वक्तव्य और बर्ताव को बिल्कुल जायज ठहराया है और कहा है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसके लिए अफ़सोस जताने की ज़रुरत है। अरविन्द जी ने वरिष्ठ कथाकार श्री उदयप्रकाश के नाम की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने भी मेरे बर्ताव और वक्तव्य का समर्थन किया है और जनपथ डॉट कॉम पर अपना मत भी प्रस्तुत किया है। अरविन्द जी ने मुझे समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, सम्बन्ध, मानवीयताएं निकृष्ट किस्म की थोथी भावनाएं भर हैं। यदि जीवन में आगे बढ़ना है, सफलता हासिल करनी है तो हमें इन "क्षुद्रताओं" और "निकृष्टताओं" से ऊपर उठना होगा। मैंने यह बात उनसे भी कही और आज सार्वजनिक रूप से दोहराता हूँ कि जिन मूल्यों और मानवीयताओं और संबंधों को वे "निकृष्ट" और "क्षुद्र" कह रहे हैं, मेरी राजनीति और मेरा व्यक्तित्व उनसे अविच्छिन्न है और रहेगा भी।

अब यह बात सार्वजनिक तौर पर कहना ज़रूरी हो गया है कि मैं जहाँ एक तरफ पाकिस्तान के नाटक और कलाकारों के साथ अपमानजनक बर्ताव के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का विरोध करता हूँ वही दूसरी तरफ दोहरे आचरण और जीवन मूल्यों की वकालत करने वाले तथा नैतिकता को राजनीति के बरक्स कोरी भावुकता से अधिक नहीं मानने वाले श्री अरविन्द गौड़ जी का भी विरोधी हो गया हूँ। आज के बाद मेरा उनसे व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में किसी भी किस्म का कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा। अरविन्द जी से अंतिम बार यह विनम्र निवेदन है कि वे अब कभी भी मुझसे संपर्क या बातचीत करने का प्रयास न करें और अपनी शुभेच्छा किसी और ज़रूरतमंद के लिए बचा कर रखें। मैं उनकी शुभेच्छा के बगैर भी रह लूंगा।

आदर सहित,
राजेश चन्द्र
रंगकर्मी और संपादक,
समकालीन रंगमंच, दिल्ली।



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