1/22/2013

''पॉलिटिकली करेक्‍ट'' अरविन्‍द गौड़ ने नैतिकता की मिट्टी पलीद कर दी!



राजेश चंद्र 

मित्रो,
15वें भारत रंग महोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में विगत 14 जनवरी को आयोजित "समकालीन रंगमंच" पत्रिका के लोकार्पण समारोह में आदरणीय रंगकर्मी श्री अरविन्द गौड़ जी के अशालीन, दुर्भावनापूर्ण, हिंसक और कुल मिला कर निंदनीय बर्ताव के पश्चात् एक आयोजक, रंगकर्मी और पत्रिका के संपादक होने के नाते जिस त्रासद और असहज स्थिति ने मुझे आ घेरा, उसके बाद मेरे पास इसके अलावा और कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था कि मैं इस अराजकता और उत्पात की नैतिक ज़िम्मेदारी लूँ और उन लोगों से औपचारिक तौर पर माफ़ी मांगूं जिन्होंने मेरी राजनीतिक विचारधारा और विरोधी स्वभाव से भली भांति परिचित होते हुए भी मुझे अपनी जगह का लोकार्पण के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की छूट दी और मेरे बुलावे पर आयोजन में शामिल भी हुए। निश्चित रूप से उन्हें यह विश्वास था कि आयोजन में कोई गड़बड़ी नहीं होगी और न ही उनके अति-महत्त्वाकांक्षी भारत रंग महोत्सव पर कोई असर पड़ेगा। उनके इस विश्वास का क्या हश्र हुआ यह किसी से छिपा हुआ नहीं है- इसके बावजूद कि सारा दोष मेरी विनम्रता और सहज विश्वासी स्वभाव का था।

इस पूरे घटनाक्रम ने मेरे सामने जो मूल सवाल खड़ा किया वह नैतिकता बनाम राजनीति का था। मेरी नैतिकता ने मुझे प्रेरित किया कि मैं इस घटना का नैतिक दायित्व अपने सर लूँ और जो लोग इससे अकारण प्रभावित हुए उनसे क्षमा मांगूं। मैंने ऐसा ही किया। ऐसा करते हुए मैं नैतिक रूप से तो सही साबित हो गया पर मेरी राजनीति गलत साबित हो गई- वह भी एक ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक वक़्त में जब साम्प्रदायिकता के पक्ष में आत्मसमर्पण करते हुए तथा इस प्रकार उसे वैधानिक स्वीकृति देते हुए हमारी केंद्र सरकार और उसके अधीनस्थ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने भारत रंग महोत्सव में शामिल पाकिस्तानी और मंटो के जीवन पर आधारित दो महत्वपूर्ण नाटकों को अपमानजनक तरीके से समारोह से बाहर निकल दिया था। मेरी राजनीति और रचनाशीलता ऐसी कायरता को सहनीय नहीं मानती रही है और आज भी उसकी कठोर भर्त्सना करती है।

लोकार्पण वाली घटना के पश्चात् मैंने अपने पत्र में (जिसे बाद में सार्वजनिक भी किया गया) आदरणीय अरविन्द गौड़ जी से यही अपेक्षा रखी थी कि वे उस दिन के अपने लोकार्पण-विरोधी, अनैतिक एवं भड़काऊ आचरण के लिए- जिसके कारण एक अच्छा-भला उत्सवधर्मी समारोह राजनीतिक नूरा-कुश्ती का अखाड़ा बन गया और एक नवजात पत्रिका जो गहरे रंगमंचीय विमर्श की असीम संभावनाओं के साथ सामने आई थी उसके भविष्य पर कुठाराघात हुआ- नैतिक ज़िम्मेदारी लें और सार्वजनिक तौर पर अफ़सोस प्रकट करें। यदि उन्होंने ऐसा किया होता, अगर उन्होंने नैतिक साहस दिखाया होता, तो जहाँ एक तरफ वे नैतिक रूप से सही साबित होते, मैं भी राजनीतिक रूप से सही साबित होता। परन्तु लम्बे इंतज़ार के बाद भी उन्होंने ऐसी कोई मंशा नहीं दिखाई। अरविन्द जी कुल मिला कर राजनीतिक रूप से तो सही रहे पर उन्होंने नैतिकता की मिट्टी पलीद कर डाली। उन्होंने सबके सामने यही आदर्श प्रस्तुत किया कि व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक व्यवहार में, कथनी और करनी में किसी भी किस्म का मेल रखना उचित नहीं, और अगर यह जीवन मूल्य है तो काफी पिछड़ा हुआ है।

'समकालीन रंगमंच' का लोकार्पण करते हुए संजय उपाध्‍याय, देवेंद्रराज अंकुर, भानु भारती, अरविन्‍द गौड़ और दिनेश खन्‍ना 

इतने दिनों के बाद इस पूरे प्रकरण पर आज उन्होंने मुझसे फ़ोन पर करीब एक घंटे तक बातचीत की और इस बातचीत का लब्बोलुबाब यही था कि उन्हें अभी भी अपने कृत्य में कुछ भी अफसोसजनक नहीं लगता। अरविन्द जी ने मुझे बताया कि वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद स्वरुप वर्मा और वरिष्ठ नाटककार श्री राजेश कुमार ने फोन पर हुई बातचीत में लोकार्पण समारोह में उनके वक्तव्य और बर्ताव को बिल्कुल जायज ठहराया है और कहा है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसके लिए अफ़सोस जताने की ज़रुरत है। अरविन्द जी ने वरिष्ठ कथाकार श्री उदयप्रकाश के नाम की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने भी मेरे बर्ताव और वक्तव्य का समर्थन किया है और जनपथ डॉट कॉम पर अपना मत भी प्रस्तुत किया है। अरविन्द जी ने मुझे समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, सम्बन्ध, मानवीयताएं निकृष्ट किस्म की थोथी भावनाएं भर हैं। यदि जीवन में आगे बढ़ना है, सफलता हासिल करनी है तो हमें इन "क्षुद्रताओं" और "निकृष्टताओं" से ऊपर उठना होगा। मैंने यह बात उनसे भी कही और आज सार्वजनिक रूप से दोहराता हूँ कि जिन मूल्यों और मानवीयताओं और संबंधों को वे "निकृष्ट" और "क्षुद्र" कह रहे हैं, मेरी राजनीति और मेरा व्यक्तित्व उनसे अविच्छिन्न है और रहेगा भी।

अब यह बात सार्वजनिक तौर पर कहना ज़रूरी हो गया है कि मैं जहाँ एक तरफ पाकिस्तान के नाटक और कलाकारों के साथ अपमानजनक बर्ताव के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का विरोध करता हूँ वही दूसरी तरफ दोहरे आचरण और जीवन मूल्यों की वकालत करने वाले तथा नैतिकता को राजनीति के बरक्स कोरी भावुकता से अधिक नहीं मानने वाले श्री अरविन्द गौड़ जी का भी विरोधी हो गया हूँ। आज के बाद मेरा उनसे व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में किसी भी किस्म का कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा। अरविन्द जी से अंतिम बार यह विनम्र निवेदन है कि वे अब कभी भी मुझसे संपर्क या बातचीत करने का प्रयास न करें और अपनी शुभेच्छा किसी और ज़रूरतमंद के लिए बचा कर रखें। मैं उनकी शुभेच्छा के बगैर भी रह लूंगा।

आदर सहित,
राजेश चन्द्र
रंगकर्मी और संपादक,
समकालीन रंगमंच, दिल्ली।



1 टिप्पणी:

Uday Prakash ने कहा…

''मैं जहाँ एक तरफ पाकिस्तान के नाटक और कलाकारों के साथ अपमानजनक बर्ताव के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का विरोध करता हूँ वही दूसरी तरफ दोहरे आचरण और जीवन मूल्यों की वकालत करने वाले तथा नैतिकता को राजनीति के बरक्स कोरी भावुकता से अधिक नहीं मानने वाले श्री अरविन्द गौड़ जी का भी विरोधी हो गया हूँ। आज के बाद मेरा उनसे व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में किसी भी किस्म का कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा। '' यह कहना है आपका तो क्या आप यही उद्घोषणा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए भी कर सकते हैं? इसी से यह भी स्पष्ट होगा कि रंगकर्म के प्रति आपके समर्पण और निष्ठा में कितनी गहराई और सच्चाई है।

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