1/26/2013

टोबा टेक सिंह इत्‍थे है!


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


प्राथमिक की किताबों में हमें बताया गया है कि भारत एक 'गणराज्‍य' है। गणराज्‍य का बुनियादी अर्थ ग्रीक दार्शनिक सिसेरो के मुताबिक वह राज्‍य है जहां की सरकार दरअसल जनता का मसला होती है न कि किसी शासक की बपौती। जनवरी के तीसरे सप्‍ताह में दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे भारत रंग महोत्‍सव के दौरान पाकिस्‍तान की दो नाट्य मंडलियों को मंचन करने से भारत की सरकार ने रोक दिया। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय ने कहा, कि चूंकि वह सरकारी संस्‍था है इसलिए उसे सरकार का आदेश मानना होगा। अब यदि हम सरकार को जनता का मसला मानते हैं यानी भारत को गणराज्‍य मानते हैं, तो पाकिस्‍तानी नाटक मंडली पर लगी रोक ज़ाहिर है जनता द्वारा लगाई गई होगी। हमारे मानने या न मानने का सवाल भी यहां उतना नहीं है क्‍योंकि हमारी सरकार जनता की चुनी हुई सरकार है, लिहाजा उसका कोई भी आदेश जनता का आदेश है और जनता का आदेश मतलब गणराज्‍य का आदेश। इसे सिर आंखों पर रखना जनता का परम कर्त्‍तव्‍य है। इसलिए कायदा यह बनता था कि पाकिस्‍तानी नाट्य मंडलियां बिना कोई देरी किए एनएसडी के दिए हुए वापसी के टिकट लेकर बैरंग अपने मुल्‍क लौट जातीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी गणराज्‍य के कुछ अमनपसंद लोगों की वजह (जो ज़ाहिर है इस देश की जनता का ही हिस्‍सा हैं) से अजोका समूह द्वारा मंटो पर आधारित ''कौन है ये गुस्‍ताख'' का मंचन हुआ। बेशक, वह दिल्‍ली में ही हुआ, कांग्रेस और गांधी खानदान के साथ पुराने रिश्‍तों के लिए परिचित गोपाल शरमन के अक्षरा थिएटर के प्रांगण में संसद से महज़ एक किलोमीटर हुआ। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू के नाम पर कांग्रेसी समाजवाद को बचाए रखने के लिए बनाए गए जेएनयू में भी ग्रुप ने नाटक किया। और यह सब ऐन उसी दिन हुआ यानी 19 दिसंबर को, जिस दिन अजोका को एनएसडी में प्रस्‍तुति देनी थी। ऐसा कैसे हो सकता है कि जो गणराज्‍य किसी पर पाबंदी लगाता है, वही राजधानी में अपनी ही ज़मीन पर कुछ लोगों को इसका मखौल उड़ाने की छूट दे देता है। इसे चेक एंड बैलेंस का लोकतंत्र कह कर टाला जा सकता है। इसे ट्रैक-2 डिप्‍लोमेसी के नाम पर 'जस्टिफाई' किया जा सकता है। लेकिन विडंबना देखिए कि भारतीय गणराज्‍य का आदेश इतना कमजोर हो चुका है कि पाकिस्‍तान की नाटक मंडली उस जनता के समर्थन से नाटक कर पाती है जिसने पाबंदी का आदेश दिया था। कहीं कुछ घपला जरूर है।

दिल्‍ली के अक्षरा थिएटर में अजोका ग्रुप 

मसलन, पहली संभावना यह हो सकती है कि नाटक का आयोजन करने में, आयोजन के लिए जगह देने में और नाटक देखने के लिए आने वाले लोगों में कोई भी इस गणराज्‍य का नहीं था। यदि ऐसा ही है तो यह तकरीबन एबटाबाद में अमेरिका के जबरन घुसकर लादेन की हत्‍या जैसी संगीन दखलंदाजी वाली कार्रवाई मानी जाएगी जो कि गणतांत्रिक मूल्‍यों और संप्रभुता की उसकी बुनियाद के खिलाफ जाती है। ऐसे में तो भारतीय गणराज्‍य को इस नाटक के मंचन से जुडे तमाम लोगों को राजद्रोही ठहरा देना चाहिए, जनद्रोही ठहरा देना चाहिए। गणराज्‍य में जनता को उसी की राजाज्ञा से हटकर कुछ गलत करने की छूट नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि जिन्‍होंने आदेश जारी किया वे जनता से ताल्‍लुक न रखते हों या सारी की सारी जनता से ताल्‍लुक न रखते हों। यह बात कुछ बेहतर लगती है क्‍योंकि इस गणराज्‍य का चुनाव आयोग कहता है कि सरकार के जिस नुमाइंदे के दस्‍तखत से नाटक मंडली या पाकिस्‍तानी हॉकी टीम को वापस भेजने का आदेश आया वह सरकार इस देश के 23.5 फीसदी के वोट पर टिकी है। यह तो दिलचस्‍प है। यानी जिसे हम गणराज्‍य कह रहे हैं, उसमें से 76.5 फीसदी जनता गायब है। क्‍या भारत 23.5 फीसदी गणराज्‍य है?  

इस बात को बेहतर समझने के लिए 20 जनवरी 2013 के टाइम्‍स ऑफ इंडिया की एक खबर पर नज़र डाल लेना दुरुस्‍त होगा। अखबार कहता है कि कुछ हफ्ते पहले भारत के वित्‍त मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को बताया था कि वह नई खरीद के लिए आवंटित किए जाने वाले बजट में दस हज़ार करोड़ रुपए की कटौती करने जा रहा है। इसके अलावा उसके राजस्‍व बजट में भी पांच से दस फीसदी की कटौती लागू की जाएगी। रक्षा मंत्रालय का इस साल के लिए बजट 79,579 करोड़ था लेकिन वित्‍त वर्ष की आखिरी तिमाही में ए‍क भी रक्षा सौदा पूरा न कर पाने की अजीब स्थिति के चलते अब वित्‍त मंत्रालय उस पर बजट कटौती का दबाव बना रहा है। रक्षा मंत्रालय ऐसा कभी नहीं होने देना चाहेगा और अपनी बात को साबित करने के लिए वह खराब सुरक्षा स्थिति से लेकर उपकरणों के पुराने पड़ जाने तक कोई भी कारण गिना सकता है। खबर में सूत्र भी बताते हैं कि वह अपनी बात वित्‍त मंत्रालय को समझाने में लग गया है। सोचिए कि रक्षा मंत्रालय की बजट कटौती का सीधा असर किस पर पड़ेगा। ज़ाहिर है, सामरिक हथियार और रक्षा उपकरण विक्रेताओं पर। यह अनायास नहीं है कि टाइम्‍स नाउ नाम के आक्रामक समाचार चैनल में रक्षा मसले पर चर्चा करने के लिए प्राइम टाइम पर जिन विशेषज्ञों को बुलाया जाता है, उनमें एक के हथियार कंपनी का मालिक होने का उद्घाटन हाल में हुआ है। बंबई के एक शरद शाह ने इस बाबत राष्‍ट्रीयप्रसारण संघ (एनबीए) को एक शिकायत भेजी है, जिसके बाद उक्‍त रक्षा विशेषज्ञ की असली पहचान खुल सकी।

बनाना रिपब्लिक!
बहरहाल, आखिर दोनों बातों का सिरा कहां जाकर जुड़ता है? जैसा कि चर्चाएं आम हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि हाल में पाकिस्‍तान के साथ नियंत्रण रेखा पर जो तनाव पैदा हुआ और दो भारतीय फौजियों के सिर काटे जाने की खबर से देश में युद्धोन्‍मादी अंधराष्‍ट्रवादी हवाएं बहने लगीं, वह कोई सुनियोजित षडयंत्र हो? यह सिर्फ संदेह है लेकिन इसके ठोस कारण हैं। इस घटना के हवाले से रक्षा मंत्रालय बजट कटौती न करने के अपने तर्क को मज़बूत कर सकेगा और हथियार लॉबी का भारत से ठेका प्रभावित नहीं होगा। अगर यह साजि़श है, तो इस पर राष्‍ट्रवाद का मुलम्‍मा चढ़ाने के लिए टीवी के परदे पर छद्म युद्ध रच देने वाले वीरबालक मौजूद हैं और हथियार विक्रेता भी, जो सामरिक विश्‍लेषण के आवरण में रक्षा मंत्रालय को देश के सामने खुलेआम नुस्‍खे दे रहे हैं। याद रहे कि सीमा पर तनाव के बहाने ही पाकिस्‍तान की हॉकी टीम पर पाबंदी लगाई गई है और एनएसडी में दो पाकिस्‍तानी नाटक मंडलियों पर भी, गो‍कि सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान और खेलों का कोई सीधा संबंध सीमा के तनाव से वैसे भी नहीं होना चाहिए जबकि इस मामले में तो सरकार के प्रतिबंधात्‍मक आदेश के आधार को ही टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रपट से चुनौती मिलती दिख रही है। इस आलोक में ज़रा देखिए कि भारतीय गणराज्‍य किसके लिए और किसके खिलाफ काम कर रहा है? आपने पांच साल से चली आ रही पाकिस्‍तान के साथ विश्‍वास बहाली की प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया, सांस्‍कृतिक समूह, खेल टीम सबके साथ विद्वेष पैदा कर डाला, समूचे देश में पाकिस्‍तान विरोधी (और कहना न होगा मुस्लिम विरोधी) माहौल पैदा कर दिया और इस आड़ में कॉमनवेल्‍थ से शुरू होकर मुसल्‍सल चले आ रहे घोटालों के खेल पर 'स्‍मोकस्‍क्रीन' डाल दिया। यह सब किसके हित? सिर्फ निजी पूंजी के, और किसी के नहीं। हथियार बेचने वाली कंपनियां निजी पूंजी का उद्यम हैं जिन्‍हें इस माहौल का लाभ मिलेगा। कॉमनवेल्‍थ, 2जी, कोयला घोटाला, सब कुछ निजी पूंजी और जनता की चुनी हुई सरकार के घालमेल की दास्‍तान है और इस माहौल में सारा फायदा उन्‍हीं का है जिनका सिर पिछले चार साल के दौरान भ्रष्‍टाचार के दलदल में फंसा था। याद है, रतन टाटा ने क्‍या कहा था? 'बनाना रिपब्लिक'!   

मैंगो पीपॅल?
तो गणराज्‍य अब या तो 23.5 फीसदी रह गया है या फिर 'बनाना' हो गया है। अंग्रेज़ी में एक कहावत है, 'लुक हू इज़ स्‍पीकिंग' (देखो कौन बोल रहा है)। ठीक है कि भारत में निजी पूंजी के सबसे सम्‍मानित नाम और गणतंत्र के सबसे बड़े लाभुक रतन टाटा ने भारत के लिए 'बनाना रिपब्लिक' का इस्‍तेमाल किया जब उन्‍हीं की टांग फंस गई। उसका बेहतरीन जोड़ीदार जवाब इस गणराज्‍य के दामाद रॉबर्ट वढेरा ने गणराज्‍य बनाने वालों को 'मैंगो पीपॅल' कह कर दिया, जब उनकी गरदन भ्रष्‍टाचार में फंस गई। इस जवाबी कव्‍वाली को भी समझना होगा। कोई और नहीं है जो भारतीय गणराज्‍य और गणराज्‍य की आत्‍मा यानी भारतीय जनता को नई परिभाषा दे रहा हो। ये वही लोग हैं जिन्‍होंने गणराज्‍य का यह हाल किया है। ये किसी तीसरे को कुछ कहने का मौका ही नहीं देते, क्‍योंकि जो सबसे पहले बोलता है, जो सबसे तेज़ बोलता है, वही सच्‍चा और साफ होता है। इस देश में शुरू से ऐसा होता रहा है।

नगा नेता अंगामी ज़ापु फिज़ो 
भारतीय गणराज्‍य आज़ादी के ऐन बाद से कभी भी 100 फीसदी का नहीं रहा। आज़ादी की तो छोडि़ए, उससे पहले गणराज्‍य की परिकल्‍पना तक को इस देश की सौ फीसदी जनता ने अपनी सहमति नहीं दी थी। इस क्‍लासिकल और ऐतिहासिक बात को सौ साल पूरे होने में सिर्फ पांच साल बाकी हैं। बात 1918 की है जब कुछ पढ़े-लिखे नगाओं ने कोहिमा में नगा क्‍लब नाम से एक संगठन बनाया था। उन्‍होंने भारत आए साइमन कमीशन को 1929 में एक ज्ञापन देकर कहा था कि भारत के संवैधानिक ढांचे से नगाओं को अलग रखा जाए। आज़ादी से एक साल पहले यही नगा क्‍लब एनएनसी यानी नगा नेशनल काउंसिल में तब्‍दील हो गया जिससे बाद में चल कर अलगाववादी पार्टी नेशनल सोशलिस्‍ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) बनी। बहरहाल, भारत की आज़ादी से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्‍त 1947 को नगालैंड ने एनएनसी के नेतृत्‍व में अपनी आज़ादी की घोषणा कर डाली थी और भारत की आज़ादी के बाद उसका हिस्‍सा होने को मानने से इनकार कर दिया। नतीजा तय था। 1948 में एनएनसी के लोकप्रिय नेता फिज़ो को बग़ावत के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और भारतीय सेना व इंटेलिजेंस ने अपनी पूरी ताकत से पूर्वोत्‍तर में सबसे पहले नगालैंड की जनता पर हमला बोला। फिज़ो को विदेश भाग जाना पड़ा। आखिरकार 1975 में जाकर एनएनसी के कुछ नेताओं ने भारत सरकार से समझौता कर लिया, जिसे एनएससीएन(आइएम) अब तक विश्‍वासघात का नाम देता है। फिज़ो को लंदन में मरे आज 23 साल हो रहे हैं, नगालैंड की समस्‍या समूचे पूर्वोत्‍तर समेत कश्‍मीर में समान रूप में जारी है जहां एक गणराज्‍य अपनी ही जनता का गला घोंटने का आदी हो चुका है। और इस गणराज्‍य के आधुनिक अपराधी आज इसे ही अलग-अलग नामों से संबोधित कर रहे हैं। क्‍या यह गणराज्‍य पैदाइशी ही नाजायज़ नहीं था? एक नाजायज़ संतान के ज़रायमपेशा बनने का खतरा सबसे ज्‍यादा रहता है। ज़रायमों के गवाह तो हम पर्याप्‍त हैं।

कैप्‍टन जयपाल सिंह मुंडा 
हिंदुस्‍तान न तो ओ.हेनरी की कल्‍पना का अंचूरिया है, न ही उनके अनुभवों का हॉन्‍डुरास। यहां न यूरोप के जैसे केले होते थे, न यहां निजी कंपनियों और सरकारों के बीच हॉन्‍डुरास जैसे पारंपरिक रिश्‍ते थे। यहां निजी पूंजी की लूट भी बाकायदा उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से शुरू हुई हैं। फिर चूक कहां हुई? मामला सिर्फ नगाओं के अस्‍वीकार का नहीं है। भारत का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा बनी, तो उसमें कैप्‍टन जयपाल सिंह नाम के एक शख्‍स को रखा गया था। 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत को हाकी का पहला स्वर्ण पदक जिस टीम ने दिलाया था, जयपाल सिंह उसके कैप्टन थे। बाद में बतौर आदिवासी नेता मशहूर हुए और संविधान सभा के सदस्य चुने गए। 13 सितंबर 1946 को संविधान सभा में दिया गया कैप्टन जयपाल सिंह का मशहूर भाषण देखें:

"अगर भारतीय जनता के किसी समूह के साथ सबसे बुरा व्यवहार हुआ है तो वो मेरे लोग (आदिवासी) हैं। पिछले छह हजार सालों से उनके साथ उपेक्षा और अमानवीय व्यवहार का ये सिलसिला जारी है। मैं जिस सिंधु घाटी सभ्यता की संतान हूं, उसका इतिहास बताता है कि बाहरी आक्रमणकारियों ने हमें जंगलों में रहने के लिए मजबूर किया। हमारा पूरा इतिहास बाहरियों के शोषण और कब्जे से भरा है जिसके खिलाफ हम लगातार विद्रोह करते रहे। बहरहाल, मैं पं .नेहरू और आप सब के इस वादे पर भरोसा करता हूं कि हम एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। ऐसा भारत बनाने जा रहे हैं जहां सभी को अवसर की समानता होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी।"

कैप्‍टन जयपाल सिंह ने पंडित नेहरू की बात पर वैसे ही भरोसा किया जैसे उलगुलान के नेताओं ने अंग्रेज़ों पर किया था, कश्‍मीरियों ने भारत सरकार पर किया था, सोनी सोरी के परिवार ने रमण सिंह की सरकार पर किया था और पाकिस्‍तानी नाटक समूह ने एनएसडी पर किया था। ये सारी बातें अलहदा नहीं हैं, बिल्‍कुल एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। गणराज्‍य में भरोसा करना जनता का काम है, इसमें कुछ भी मौलिक और नया नहीं। मौलिक तब होता है जब जनता का यह भरोसा गणराज्‍य तोड़ देता है और उसी क्रम में अपनी वैधता खो देता है। जो गणराज्‍य आज़ादी के पहले से वैधता के बगैर पूंजीवादी लोकतंत्र के रूप में विकसित हुआ, उसमें जनता का भरोसा टूटना अपरिहार्य है, तय है।

ज़रा टूटे हुए भरोसे के लोकप्रिय चेहरों को याद करें, सबसे पहले कौन याद आता है? इरोम शर्मिला, जो 12 साल से अहिंसा और सच की खुराक पर जि़ंदा है। सोनी सोरी, जो दिल्‍ली की बलात्‍कार कांड पीडि़ता से बस इस मामले में अलहदा है कि वह मर नहीं गई, बदतर इस मामले में कि जेल में है और उसका ऐसा हाल करने वाले पुलिस अफसर अंकित गर्ग को गणतंत्र दिवस के दिन पिछले ही साल राष्‍ट्रपति ने तमगे पहनाए हैं। मनोरमा, जिसके विरोध ने गणतंत्र को नंगा कर दिया। या फिर जीतेन मरांडी का चार साल का बेटा, जिसकी गलती सिर्फ इतनी है कि उसने किसी गैर आदिवासी के घर जन्‍म नहीं लिया। और संसद पर हमले का आरोपी अफ़ज़ल गुरु जो अपनी मौत के इंतज़ार में रोज़ मर रहा है, ज़रा उसे खास तौर से याद कर लें क्‍योंकि इस गणतंत्र की सबसे बड़ी अदालत ने उसके बारे में यह कहा था, ''अफ़ज़ल गुरु किसी आतंकी संगठन का सदस्‍य नहीं है, लेकिन इस राष्‍ट्र की सामूहिक चेतना को संतुष्‍ट करने के लिए उसे फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए।'' किस गणतंत्र की बात कर रहे हैं हम?


अनगिनत चेहरे हैं जो गणतंत्र की औकात को आपके सामने खोल कर रख देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ हमें याद हैं, चूंकि यातना और जबर ने उनका चेहरा और निखार दिया है। दूसरे या तो बाहर हैं, बचे हुए हैं या फिर अपनी मौत मरने को छोड़ दिए गए हैं। अगर फिर भी इस देश में जो है वह गणतंत्र है, तो घोटालों के खिलाफ जो लोग सड़कों पर उतरे, बलात्‍कार के खिलाफ जिन लोगों ने गणतंत्र के इतिहास में पहली बार रायसीना पर धूल उड़ाई, अजोका का नाटक जिन लोगों ने करवाया, वे सब इस देश की जनता नहीं। इस देश की जनता वे हैं जिनका गणराज्‍य है। गणराज्‍य उनका है जिन्‍हें इसके गणराज्‍य होने से फायदा है। फायदा उन्‍हें है जो इस गणराज्‍य के नुमाइंदा चेहरों को बदले में बनाए रखते हैं। ये वही साढ़े 23 फीसदी लोग हैं, जिनकी बात हमने शुरू में की थी। अरुंधती रॉय ने अपनी किताब को 'ब्रोकेन रिपब्लिक' का गलत नाम दिया था और उसका अनुवाद 'आहत देश' और गलत था। कहीं कुछ भी टूटा नहीं है क्‍योंकि इसके बनने में ही गड़बड़ थी।

टोबा टेक सिंह का कोई चेहरा नहीं है आज 
उदय प्रकाश का मोहनदास जिंदगी भर साबित करता रह गया कि वही मोहनदास है। अंतत: मोहनदास की केंचुल में कोई और स्‍थापित हो गया। मंटो का ईशर सिंह लगातार पूछता रहा, 'टोबा टेक सिंह कित्‍थे है?' किसी ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया। सब उसी के जैसे पागल थे जिन्‍हें यह बात समझ नहीं आती थी कि बैठे-बैठे वे हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान कैसे आ गए। उसने इतनी बार ये सवाल पूछा कि उसका नाम टोबा टेक सिंह पड़ गया। मोहनदास बेनाम अपने जीते जी अप्रासंगिक हो गया। ईशर सिंह टोबा टेक सिंह बन कर 'नो मैंस लैंड' पर ढेर हो गया। मंटो का टोबा टेक सिंह आज भी जिंदा है। अपने एक अरब अलग-अलग चेहरों के साथ वह रोज़ इस गणतंत्र को झूठा साबित कर रहा है। उसकी कोई पहचान नहीं, कोई नाम नहीं, कोई नागरिकता नहीं। 'नो मैंस लैंड' पर जीना उसकी नियति है।

गणतंत्र दिवस से ऐन पहले समूचे देश में पटाखे फूट रहे हैं क्‍योंकि राहुल गांधी नाम के एक अधेड़ को देश की सबसे पुरानी पार्टी का सबसे युवा उपाध्‍यक्ष बनाया गया है। गणतंत्र के राजकुमार का उदय हो चुका है। उसके बरक्‍स खड़ा है वह शख्‍स जिसकी आकांक्षाएं हज़ारों हत्‍याओं और सैकड़ों बलात्‍कारों की कब्र पर शीशम हो चुकी हैं। नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी नाम का यह शख्‍स गुजरात से दिल्‍ली के लिए कूच कर चुका है। कभी सोचा है आपने कि एक ऐसे राज्‍य का एक पिछड़ा नेता इतना कद्दावर कैसे बन गया जहां से आने वाले एक शख्‍स ने लाठी के दम पर नाजायज़ गणतंत्र को पैदा किया था और जहां से आने वाले एक दूसरे शख्‍स ने आने वाली अनगिन पीढि़यों को तकसीम का कैंसर मुफ्त में दे दिया था? आज गांधी और जिन्‍ना की रूह जहां कहीं होगी, मंटो को याद कर रही होगी। गुजरात से ही एक और शख्‍स उभरा था जिसकी पत्‍नी ने इस राष्‍ट्र के इतिहास में पहली और इकलौती बार जनता के राज का गला घोंट कर आपातकाल लागू किया था। फिरोज़ गांधी सिर्फ नाम के गांधी थे, इसलिए हरिदास मूंदड़ा और बेनेट कोलमैन को आईना दिखाने के ईमानदार चक्‍कर में अपनी सियासी हत्‍या करवा बैठे। बचे स्‍वमूत्र पीने की राष्‍ट्रीय सलाह देने वाले मोरारजी देसाई, तो उनके बाद से इतिहास जिस करवट बैठा बाबरी विध्‍वंस तक उसी कोने बना रहा। गुजरात वह जगह है जहां से गणतंत्र का इतिहास शुरू होता है, तकसीम होता है, चोटिल होता है, कोमा में जाता है और अपने आखिरी दांव के तौर पर नरेंद्रभाई मोदी को पैदा करता है। मोदी गणतंत्र की पैदाइश हैं, उसी गणतंत्र की जो कांग्रेस और अंग्रेज़ी साम्राज्‍य की नाजायज़ संतान है। और गणतंत्र कभी भी अपनी बागडोर नहीं छोड़ता, अदृश्‍य हाथों से थामे रहता है और इतिहास के अहम पड़ावों पर अपने हित एकाध दुश्‍मन पैदा कर लेता है ताकि उसकी गाड़ी अबाध चलती रह सके। दुश्‍मन को गढ़ना गणतंत्र के बुनियादी कामों में एक है। दुश्‍मन को इतना बड़ा बना दो कि गणतंत्र सुहाने लगे।

गणतंत्र के नए राजकुमार 

राहुल गांधी के भाषण पर लहालोट होता हिंदुस्‍तानी अवाम और पाकिस्‍तान के खिलाफ हुआं-हुआं करते लोग दरअसल वे ही हैं जिनके लिए यह गणतंत्र काम कर रहा है। साढ़े तेईस फीसदी का असल चेहरा देखने के लिए बस केले को छीलने की देरी है, लेकिन जिन्‍हें ये काम करना है वे वहां हैं जहां कोई नहीं रहता- टोबा टेक सिंह की धरती पर। जो गणतंत्र की धरती है, उसके बारे में रघुवीर सहाय को याद कर लेना काफी होगा, ''खतरा होगा / खतरे की घंटी होगी / उसे बादशाह बजाएगा, रमेश!''  

क्‍या समझ आया? टोबा टेक सिंह इत्‍थे है, इत्‍थे!!!

नो मैन्‍स लैंड पर ढेर टोबा टेक सिंह!





4 टिप्‍पणियां:

fundoo ने कहा…

बेहतरीन विवेचना जिसे हर युवा को अवश्य पढना चाहिए खासकर उस मध्य वर्गीय युवा को जिसमे अब सड़कों पर उतर कर भ्रष्टाचार और बलात्कार जैसे मुद्दों पर लम्बे विरोध प्रदर्शन द्वारा निरंकुश सता को झुकाने की हिम्मत आ गयी है। लेकिन अपनी इस हिम्मत को टिकाऊ बनाये रखने के लिए उसे मूल सवालों से रूबरू होना ज़रूरी है।

पीयूष पन्त

शहरोज़ ने कहा…

भाई गज़ब लिखा आप ने इसे ही सभ्याता-समिक्षा सम्भवता कहा जाता है।

kritti ने कहा…

behad shaandaar!!!
kriti

www.kritisansar.noblogs.org ने कहा…

समस्या की नब्ज पे हाथ रख दी है. बहुत ही उम्दा लेख है. हिंदी में ऐसे लेखो की सख्त जरूरत है. बस एक छोटी सी बात मुझे कहनी है. नाजायज संतान जैसी कोई चीज नहीं होती. यह शब्द पितृसत्ता की देन है. हमारे भाषा संस्कार के कारण ऐसी गल्तिया हो जाती है.
एक बार फिर शानदार लेख के लिए आपको बधाई.
कृति
www.kritisansar.noblogs.org

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें