2/18/2013

निजामुद्दीन: देवी प्रसाद मिश्र की कविता

देवी प्रसाद मिश्र
देवी प्रसाद मिश्र हिंदी के अपने किस्‍म के एक कवि हैं जो आम तौर से हिंदी जगत की हलचलों और आयोजनों में कम दिखते/पाए जाते हैं। पिछली बार देवी जी का लिखा मैंने जो पूरा और सुरुचिपूर्वक पढ़ा था, और शायद कई और लोगों में भी वह कम ही चर्चा का विषय रहा, वह 'तद्भव' में छपी उनकी कहानी थी 'पिता के मामा के यहां'। उस अद्भुत कहानी के बाद उनकी यह लंबी कविता एक बार फिर इसी पत्रिका में छपी है। निजामुद्दीन के बहाने अपने देश-काल के बारे में लिखी शायद यह दुर्लभ कविता होगी, जिसके मायने व्‍यापक हैं। इसका पोस्‍टमॉर्टम तो बाद में आलोचक करेंगे ही, लेकिन पहले इस कविता को पूरा पढ़ जाना ज़रूरी लगता है- मॉडरेटर   


पतली सी गली में गाय और उसकी बगल से एक औरत एक दूसरे
को लगभग छूते हुए गुजर जा रहे हैं और दोनों ही के पेट में बच्चा
है और दोनों ही थके हुए हैं और दोनों में से किसी को घर पहुंचने
की जल्दी नहीं है और इन दोनों के बीच से एक आदमी निकल
रहा है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पुलिस का आदमी है
और लोगों पर निगाह रखने का काम करता है और इन तीनों के
बगल से पतंगों को लेकर तेजी के साथ एक लड़का निकला और
फिर बुर्के में एक औरत सामने से आती हुई दिखी जिसके पास
ये सहूलियत तो है ही कि वह जिस तरह से चाहे रो ले या कितने
भी वाहियात तरीके से हंस ले। गली में बहादुर शाह जफर को
गिरफ्तार किये जाने की खबर नयी जैसी ही है और उतनी ही नयी
है बम धमाके के मामले में एक आदमी की गिरफ्तारी की खबर।
कोने के रेस्तरां में एक आदमी एक मेज पर कोहनी रख कर बैठा
है जिसका आमलेट उसके सामने पड़ा है। ठंडा और खत्म। इसका
पता हो सकता है कम को हो कि एक सुरंग खोदी गयी है जिससे
होकर लोग गुजरात से निजामुद्दीन आया जाया करते हैं। यह सुरंग
अंदर ही अंदर खोने और होने की तरह रही है। कई अफवाहें रही
हैं निजामुद्दीन के बारे में।

(2)
गली से निकला तो एक
पेड़ मिल गया और गिन कर
बता सकूं तो इक्कीस चिडि़यां
थोड़ा और बढ़ा
तो पता लगा सत्रह बच्चे मिले

और एक पेड़ के बाद इक्कीस और पेड़

यह उस रास्ते का हाल है जिसे मैं हिन्दी साहित्य की तरह बियाबान
वगैरह कहता रहा था

फिर जो लड़की मिली वह तो
तीसरी या चैथी परम्परा सरीखी थी। दुबली सी।

पता ये लगा कि वह जीनत थी
जो मेरठ युनिवर्सिटी से बीए करने के बाद
इंदिरा गांधी ओपन युनिवर्सिटी से
अंग्रेजीजी में एमए करना चाहती थी

मतलब कि जिस लड़की ने कभी
1857 में अंग्रेजों को बाहर करने की मुहिम चलायी थी

वही

(3)
रहीम के मकबरे में टहलते हुए ये लगता है कि रहीम अब मिले कि तब। वो नहीं मिलते हैं और एक कवि के दूसरे कवि से मिलने का हादसा फिलहाल तो टल जाता है। मकबरे में घूमते हुए कबूतरों के फड़फड़ाने की आवाजें गूंज रही हैं और इस तरह की आवाजें कि भइये पानी रखना! मकबरे में मैं घूम रहा हूं। वहां कोई आने वाला है कि मैं किसी के चले जाने की गूंज में टहल रहा हूं। कि जैसे हिन्दी के बियाबान में अपनी ही कब्र के चारों तरफ। एक फोन आ रहा है - हो सकता है इस बात का कि जो कयामत हिन्दी कविता को तबाह कर देगी वह आ रही है और सराय काले खां तक वह पहुंच भी गयी है।

(4)
हेलो... ठीक है... हम दोनों निजामुद्दीन में गालिब की कब्र के पास की चाय की दुकान में चले चलेंगे। वहां आसपास शोर तो बहुत होता है और बच्चे ऐसा कोहराम मचा रहे होते हैं कि पूछिये मत - लगता है कि मरदूदों को खुश होने से कोई नहीं रोक सकता। भूख तक नहीं। लेकिन अब और कहां मिला भी जाय - शहर में एक ढंग की जगह मिलेगी भी तो उससे पचास गज की दूरी पर एक औरत के उलटी करने की गोंगों सुनाई न पड़ जायेगी इसकी क्या गारंटी।

अब आप से क्या छिपाना
मार्क्सवाद से मैं भी निजात पा लेना चाहता हूं

बस, आप मिलिए और

शिनाख्त के लिए बता दूं कि चाय की दुकान में
मैं लाल रंग की पतंग लेकर मिलूंगा जो
इस रंग से मेरा आखिरी नाता होगा

उसके बाद मैं उसे उड़ा दूंगा। हमेशा के लिए।
जाहिर है आसमान में।

लेकिन आपको मैं पहले ही आगाह किये देता हूं
कि आपको मुझे ढंग से समझाना होगा
केवल एक वक्त का दाल चावल खाकर
मैं आपका होने से रहा

(5)
इंतजार में बैठे बैठे बहुत तेज जमुहाई आयी मन में
क्यों कोहराम मचा है दिन का कचरा रात गंवायी कहां
बहुरिया गुम है बालम बल्लम दिखता नोंक दिखायी
जिन्दा रह कर क्या कर पाए मरने पर क्यों तोप चलायी
कौन इलाका बदले अपना कव्वाली में कजरी गायी पूंजी
इतना गूंजी है कि जो भी थी आवाज गंवायी आओ
खुसरो इस झोपड़ में जो चूता है सेज सजायी गालिब
यहीं कहीं होते हैं लोग नहीं तो बकरी आयी

(6)
अब इसका क्या किया जाय कि शायरों की कब्रों पर बकरियां काफी घूमा करती हैं फिर वो नजीर की कब्र हो या एक वक्त में गालिब की ही। असद जैदी ने अपने शरारती अंदाज में जब यह ठहाके लगाते हुए कहा तो मैंने उनसे ये नहीं कहा कि इस बात को हिन्दी कविता के तौर पर कह देने में तो कोई हर्ज नहीं। यों भी मैं यह थोड़े ही कह रहा था कि हिन्दी कविता में बाजाबिता नजीर अकबराबादी को शामिल किया जाय गोकि इस मांग पत्र की कोई न कोई कार्बन कॉपी मेरे पास होती जरूर है और वह मेरे मरने के बाद मेरी किसी जेब में मिलेगी फिर आप मुझे गाड़ें, जलाएं या फिर चीलों के हवाले कर दें। मतलब कि आप गाडेंगे तो वहां बकरियां आया करेंगीं, जलायेंगे तो मुझे गंगा के नाले के हवाले होना पड़ेगा। लेकिन आप तक यह बात किस अफवाह की तरह पहुंची कि चील माने हिन्दी के कई आलोचक जो सबसे ज्यादा सत्ता के शव पर मंडराते हैं। लब्बो-लुआब ये कि मैं चीलों से तो बच जाऊंगा।

मैं कमहैसियत।

(7)
पता नहीं यह किस्सा गालिब ने कभी सुनाया भी या कि कभी नहीं सुनाया कि एक आदमी सत्ता का गुलाम हो जाया करता था और उसको इसका नुकसान यह हुआ कि उसका फायदा कम होता ही नहीं था।

(8)
गालिब ने और क्या कहा था या क्या नहीं कहा था ये सोचते न सोचते मैं जा रहा था कि निजामुद्दीन की एक इंतिहापसंद गली में ये जूता मिला। किसी जैदी का ये जूता है। अमां वही जैदी जिसने एक जूता बुश पर फेंका था। दूसरा बच गया और यहां निजामुद्दीन में पड़ा मिला। अब आपने यह कह कर मेरे मन में फांक डाल दी कि हो सकता है यह जूता जैन अल आबिदीन का हो जो खुदा खैर करे मोहम्मद साहब के पड़पोते होते थे और जैद कहलाते थे। लेकिन देख ये रहा हूं कि ये तिलिस्म गहराता जा रहा है कि किसका ये जूता है क्योंकि जूता तो ये असदउल्ला गालिब का भी हो सकता है जो गौर तो आपने भी किया होगा कि अक्सर एक ही जूता पहने मिलते थे और दूसरा उन्होंने कमजर्फों की जानिब फेंका होता था और जिनकी कब्र जहां ये जूता मिला वहां से एक फर्लांग भी न होगी। लेकिन यह भी तो हो सकता है यह जूता निजामुद्दीन नाम के हजरत का हो जो अल्ला खैर करे कम मुतमव्विज तो कतई न थे। ये भी कहा जाता है कि वो भी अपना एक जूता किसी हाकिम की जानिब फेंके होते थे। और अफवाह तो ये तक है कि एक बार तो उन्होंने ये कारनामा अलाउद्दीन खलजी जैसे हुक्मरान के साथ कर दिखाया। अब अगर आखिरी बात तक पहुंच सकूं तो वो ये है कि एक जूता लेकर मैं निजामुद्दीन से घर लौट रहा हूं। और इस वक्त तो दिमाग में यही फितूर चल रहा है कि सारे आलिम फाजिल एक ही पैर में जूता पहनते हैं। दूसरा वो हुक्मरानों की जानिब फेंकते हैं।

(9)
जो मेरा हुक्मरान हो वो मेरा कौन हुआ
मैं किसी हिज्र की सी फिक्र में हुआ सा हूं
वो लियाकत जो मेरे काम बहुत न आयी
मुझको भी इल्म कहां मैं किसी दवा सा हूं
जो मुझे दोस्त करे और मेरी मुश्किल हो
मैं किसी ऐसे फलसफे पे क्यों फिदा सा हूं
ये तेरा साथ मेरे साथ में क्या क्या करता
मैं तेरे साथ में किस बात पे पहुंचा सा हूं
मैं निजामुद्दीन रहूं और करूं जिक्रे खैर मैं
भी क्यों होश में बेहोश या हवा सा हूं

(10)
ये मेरे होश में क्यों इतनी गड़बड़ी सी है
ये मेरे जोश में क्यों इतनी हड़बड़ी सी
है ये किसी से जो कहूं तो भी कहना
बाकी ये मेरी फिक्र किस उजाड़ की
घड़ी सी है ये कहीं से जो उठायी तो
कहीं रक्खी सी ये कोई बात थी जो यूं
ही क्यों पड़ी सी है मेरे लिखने पे मेरे
यार तेरा क्या लिखना वो कोई जिद है
जो हमसे कहीं बड़ी सी है ये जो बदली
नहीं दुनिया तो मैं बदला बदला वो मेरी
शक्ल किस सियाह में मढ़ी सी है मेरे
होने का हुनर और मेरा ये होना क्योंकि
छोटी हो बहर नज्म तो बड़ी सी है लाल
है वो कि खुदाया हुआ दलाल भी है
शक्ल हो अक्ल हो कि हाल में पढ़ी सी
है मैं निजामुद्दीन हुआ और हुआ और
हुआ वो कोई हद नहीं अनहद की जो
कड़ी सी है

(11)
तू मुझे देखता है क्या कि मैं कुछ बम सा हूं
तू मुझे देखता है क्यों कि मैं कुछ कम सा
हूं मैं कहीं हूं तो कभी हूं तो कोई भी होकर
इतना बहता है पसीना तो मैं कुछ नम सा हूं
वो जो है इत्मिनान और सुकूं और तराश मैं
हूं क्यों इतना अचानक कि मैं कुछ धम सा
हूं मुझको वो फिक्र नहीं क्योंकि मेरा जिक्र
नहीं इतना पीकर भी कहूं क्योंकि मैं कुछ
खम सा हूं अब तो ये वक्त है कि वक्त
कुछ बचा भी नहीं मैं अकेला ही सोचता
हूं कि मैं कुछ हम सा हूं मैं भी देखा किया
दरगाह में बैठे बैठे मैं किसी कोने में उखड़ा
हुआ बे-दम सा हूं

(12)
ये मेरी हसरत का वाकया है तुम्हारी हसरत भी जान लूं मैं
किसी सड़क पर अगर मिलो तो ये सूखी रोटी ही बांट लूं
मैं ये किस तरफ से निकल पड़े हो बहुत खुशी तो कभी
नहीं थी जो देखा ऊपर तो देखा नीचे कि कैसे रहते कि
छत नहीं थी अभी किसी से कहूं तो क्या कि कहां से मैंने
शुरू किया था जो हाथ लिखता है वो हाथ मैंने किसी को
यूं ही क्यूं दे दिया था ये किस्सा इतना है जितना जानो ये
मेरे हिस्से की रोशनी है ये मेरी चादर है तेरी चादर बहुत
पसीने में खूं सनी है

(13)
वो तुमने किस तरह देखा मैंने तो यूं देखा
तुमने क्या देखा जहां मैंने बदायूं देखा तुम
तो न्यूयार्क या इस्तानबुल या पिक्काडिली
मैंने इलाहाबाद न देखा तो क्यों हर सू देखा
मैं जो दाखिल हुआ उस माल में बेगाना सा
मैंने यक बोझ के नीचे फंसा सा कूं देखा
तुमने भी देख लिया मेरा अकेला पड़ना मैंने
जो खुद को हटाया तो मैंने हूं देखा जिस
तरह खत्म हुआ जश्न तो फिर शक भी हो
तुमने जो दांत दिखाया तो मैंने खूं देखा मैंने
जो देख लिया तो जो मेरा हाल हुआ मैं भी
कहता हूं निजामुद्दीन मैंने यूं देखा मैं भी
क्यों हद में नहीं और ये मेरा बेहद क्यों मैंने
इश्क न देखा जो मैंने तूं देखा

(14)
सबकी तरफ से लिखने का अंजाम देख लो
ये काम कितना बढ़ गया ये काम देख लो
कितना ही कहा कह गये तो कितना कम
कहा कहने को हुआ नाम तो ये नाम देख लो
बाजार में भी बैठ गये और कहा जी जो लग
गये वो दाम जरा दाम देख लो सबकी तरफ
से बोलने का रोजगार ये हमको जो देखो देख
कर नाकाम देख लो मकसद है कोई और
तो फिर सोचना फिजूल जो सुबह सी दिख
जाये तो ये शाम देख लो अब मार्क्स हो कि
माल हो कि कर सको बहस अब लालगढ़
को देख लो, आवाम देख लो जो गिर गयी
मस्जिद तो अब आराम बहुत हो अब रह
रहे हैं राम तो बदनाम देख लो

(15)
मुशायरा रात भर चलता रहा। लोगों का ये हाल था कि जैसे मय्यत में होकर लौटे हों। एक जबान जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि बीस पचास साल से ज्यादा नहीं बचने वाली उसमें इतना कोहराम था कि पूछिये मत। मतलब कि कोहराम ऐसा था कि अगर जबान नहीं भी बची रही तो कोहराम बचा रहेगा। ऐसी आम राय थी। मुशायरे के खत्म होते न होते पानी बरसने लगा और एक कराह की तरह अल्ला हू अकबर गूंजा जो टूटे दरवाजों, फटे कपड़ों, कांपती तसबीह, संकरी गलियों के बीच से होता मुंडेरों के ऊपर से मुर्गों के पंखों और एक लड़की के सात दिनों से झूलते दुपट्टे को छूता निकल गया। जिस लड़की के दुपट्टे का जिक्र है वह पिछले पांच दिनों से बुखार में पड़ी है और छत पर आ नहीं सकी है और आना भी नहीं चाहती है और दिन भर रोती रहती है और मर जाना चाहती है और फिरोजाबाद की चूड़ी की फैक्टरी से निकाल दी गयी है और ताई के यहां से लौट आयी है और मामू के यहां मुरादाबाद जाना नहीं चाहती और न ही कतर और कुछ बताती नहीं कि क्या। कि क्या कुछ। कि क्या नहीं। मरी यही कहती है कि मर जाने दो। कि भाई उड़ा उड़ा रहता है। कि पता नहीं क्या चाहता है। कि इस बीच कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है। तीन चार पुलिस वाले शायरों को ये गाली देते हुए गली से निकले कि कलाम को ये छोटा नहीं कर सकते थे क्या। जल्दी निपट जाते। एक पुलिस वाला फुटपाथ पर पड़े एक आदमी के पास खड़ा हो गया है और ये जानने की कोशिश कर रहा है कि आदमी सो रहा है या मर रहा है।

(16)
लौटते हुए
गुजरते हुए बगल से दरगाह के
मैंने बहुत सारी मनौतियां
मांगीं। कि।
कि मेरा राजनीतिक एकांत आंदोलन में बदल जाये।
मेरा दुःख अम्बानी की विपत्ति में।
मुंतजर अल जैदी को अपना दूसरा जूता मिल जाये।
बुश के घर की छत उड़ जाये।
वित्त मंत्री एक भूखे आदमी का
वृत्तांत बताते हुए रोने लग जाय
मेरा बेटा घड़ा बनाना सीख जाये।
एक कवि का अकेलापन हिन्दी की शर्म में बदल जाये।

मैंने मन्नतें मांगी कि
नये को ब्राह्मण की रसोई में घुस आये
कुकुर की तरह दुरदुराया न जाये और
हिन्दी में अलग थलग पड़ी विपत्ति की
एक कहानी और एक कविता
सारे विशेषांकों पर भारी पड़ जाये

गरीबी की रेखा के नीचे रहता हर आदमी
रेखा के नीचे नीचे नीचे
चलता चलता चलता
निजामुद्दीन पहुंच जाये जहां गांव को
गुड़गांव में न बदला जाये बेशक
आजमगढ़ को लालगढ़ में बदल दिया जाये मतलब कि
शहरों को फिर से बसाया जाय

और

और सोचा जाय
और सोचा जाय
और सोचा जाय

और सोचा जाय लेकिन फेनान की तरह
और रहा जाय लेकिन किसान की तरह
और गूंजा जाय लेकिन बियाबान की तरह

अब घर लौटा जाय
निजामुद्दीन के साथ।
फरीद के साथ। नींद के साथ।
बियाबान में गूंजती हारमोनियम की
आवाजों जैसी नागरिकता की पुकारों के साथ।
गुहारों के साथ।

घर लौटा जाय
और घर छोड़ा जाय
जिसके लिए मैंने मनौती मांगी है कि
वह आदिवास में बदल जाये और मेरा बेटा
संथालों के मेले में खो जाये।


(साभार: तद्भव) 

2/13/2013

उसने 'सत्‍यमेव जयते' कहा, और उसका परिवार बच गया!


अफज़ल गुरु को हुई फांसी के बाद अब तक उठी तमाम बहसों में  उसके द्वारा अपने वकील सुशील कुमार को लिखी गई चिट्ठी का जि़क्र बार-बार आया है। यह चिट्ठी अब एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है, क्‍योंकि इसमें एक आत्‍मसमर्पित आतंकवादी समूची राज्‍य व्‍यवस्‍था पर कुछ सवाल खड़े करता है, उसके काम करने के तरीकों को उजागर करता है और आखिरकार यह स्‍वीकार करता है कि उसकी नियति दरअसल अपने परिवार को बचाने की उसकी सदिच्‍छा का परिणाम थी। यह चिट्ठी अक्‍टूबर 2006 में दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सार्वजनिक की गई थी जिसके आधार पर मैंने साप्‍ताहिक पत्रिका 'सहारा समय' के आखिरी अंक (8 अक्‍टूबर 2006) में एक स्‍टोरी भी की थी। अफज़ल के मामले पर खर्च किए गए लाखों शब्‍दों पर यह इकलौती चिट्ठी भारी पड़ती है। विडंबना यह है कि अक्‍टूबर 2006 से लेकर अब फांसी दिए जाने के बीच सात साल के दौरान हालांकि यह चिट्ठी मीडिया में तकरीबन दबी ही रही, आज भले इसकी चर्चा हो रही हो लेकिन उसका शायद कोई मोल नहीं है। साथ में उस वक्‍त की कुछ तस्‍वीरें भी हैं। (अभिषेक श्रीवास्‍तव) 

अंग्रेज़ी में यह पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 



माननीय श्री सुशील कुमार,
नमस्कार

मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद महसूस करता हूं कि आपने मेरे मुकदमे को अपने हाथ में लेकर मेरा बचाव करने का फैसला लिया। इस मुकदमे की शुरुआत से ही मेरी उपेक्षा की गई है और कभी भी मुझे मीडिया या न्यायालय के समक्ष सचाई उजागर करने का मौका नहीं दिया गया। तीन अर्जियों के बावजूद अदालत ने मुझे वकील मुहैया नहीं करवाया। उच्च न्यायालय में एक मानवाधिकार अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अफज़ल की इच्छा फांसी से लटकने की बजाय नशीला इंजेक्शन लेने की है। यह बात सरासर गलत है। मैंने अपने वकील को कभी ऐसा कुछ नहीं बताया था। चूंकि वह वकील मेरे या मेरे परिवार का चुनाव नहीं था, बल्कि मेरी असहायता और एक उपयुक्त वकील तक पहुंच न हो पाने का नतीजा था। उच्च सुरक्षा वाली जेल में कैद किए जाने और उस मानवाधिकार अधिवक्ता से कोई संवाद न होने की स्थिति में मैं उसे बदल नहीं सका या उच्च न्यायालय के सामने अपनी मृत्यु इच्छा संबंधी आपत्तियों को दर्ज नहीं करा सका चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही यह बात मुझे पता चली। 

संसद पर हमले वाले मामले में मुझे कश्मीर की स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया था। यहां दिल्ली में निर्धारित न्यायालय ने विशेष पुलिस के उस बयान के आधार पर मुझे फांसी की सजा सुनाई जो एसटीएफ के साथ मिलकर काम करती है और जिस पर मीडिया का खासा प्रभाव था जिसके समक्ष मुझे विशेष पुलिस एसीपी राजबीर सिंह के दबाव और खौफ के चलते अपराध कबूल करवाया गया। इस खौफ और दबाव की पुष्टि न्यायालय के समक्ष 'आज तक' के साक्षात्कर्ता शम्स ताहिर ने भी की। 

जब मुझे श्रीनगर बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया तो मुझे एसटीएफ के मुख्यालय ले जाया गया। यहां से एसटीएफ और विशेष पुलिस मुझे दिल्ली ले आई। श्रीनगर के पारमपोरा पुलिस स्टेशन पर मुझसे मेरी सभी चीजें छीन ली गईं, मेरी पिटाई की गई और मुझे धमकी दी गई कि यदि मैंने किसी के भी सामने सचाई बयान की तो मेरी पत्नी और परिवार के लिए नतीजे बुरे होंगे। यहां तक कि मेरे छोटे भाई हिलाल अहमद गुरु को भी बगैर किसी वारंट इत्यादि के गिरफ्तार कर लिया गया और 2-3 महीनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यह बात सबसे पहले मुझे राजबीर सिंह ने बताई थी। विशेष पुलिस ने मुझसे कहा कि यदि मैं उनके मुताबिक बयान देता हूं तो मेरे परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह झूठा आश्वासन भी दिया कि वे मेरे मुकदमे को कमजोर कर देंगे जिससे कुछ दिनों बाद मैं रिहा हो जाऊंगा। 

अफज़ल का बेटा 
मेरी प्राथमिकता मेरे परिवार को सुरक्षित रखने की थी क्योंकि पिछले सात साल से मैं देख रहा हूं कि किस तरह एसटीएफ के लोग कश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं, उन्होंने युवाओं को गायब किया है और उसके बाद पुलिस हिरासत में उन्हें मार डाला है। इन तमाम प्रताड़नाओं और हिरासत में मौतों का मैं एक जीता-जागता प्रत्यक्षदर्शी हूं और खुद एसटीएफ के खौफ और प्रताड़ना का शिकार हूं। चूंकि, मैं पहले जेकेएलएफ का आतंकवादी था और मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था, मुझे विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों जैसे सेना, बीएसएफ और एसटीएफ ने मिलकर उत्पीड़ित, प्रताड़ित और खौफज़दा किया है। लेकिन, चूंकि एसटीएफ असंगठित बल है और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित लुटेरों का एक गुट है, वे कश्मीर के किसी भी घर और किसी भी परिवार में किसी भी वक्त घुस जाते हैं। अगर एसटीएफ ने किसी को भी उठा लिया और उसके परिवार को इसकी जानकारी मिल जाती है, तो फिर परिजन सिर्फ लाश की ही उम्मीद रखते हैं और उसका इंतजार करते हैं। लेकिन अमूमन वे यह कभी नहीं जान पाते कि अपहृत व्यक्ति का ठिकाना क्या है। छह हजार जवान लड़के इस तरीके से गायब हो चुके हैं। 

इन्हीं परिस्थितियों और भयपूर्ण वातावरण में मेरे जैसे लोग एसटीएफ के हाथों कोई भी गंदा खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं जिससे कम से कम जान बची रहे। जो लोग पैसे खिलाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें मेरी तरह बुरे काम करने को मजबूर नहीं किया जाता चूंकि मैं पैसे देने में अक्षम रहा था। यहां तक कि पारमपोरा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी अकबर ने तो मुझसे 5 हजार रुपए फिरौती की मांग की थी। यह बात संसद पर हमले से बहुत पहले की है। उसने मुझे धमकी दी थी कि फिरौती की रकम न मिलने पर वह मुझे नकली दवाएं और चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा। मैं 2000 में सोपोर में इनका व्यापार करता था। वह भी यहां निर्धारित न्यायालय के समक्ष पेश हुआ था और उसने मेरे खिलाफ बयान दिया था। संसद पर हमले से बहुत पहले से वह मुझे जानता था। अदालत के कक्ष में उसने मुझे कश्मीरी में बताया कि मेरा परिवार सही सलामत है। दरअसल, यह एक छुपी हुई धमकी थी जिसे अदालत समझ नहीं पाई थी, नहीं तो मैंने जरूर अदालत के समक्ष उससे सवाल पूछा होता जब उसने अपना बयान दर्ज कराते वक्त यह बात मुझे बताई थी। पूरे मुकदमे के दौरान मैं मूक और असहाय दर्शक बना रहा जबकि सभी गवाह, पुलिस और यहां तक कि जज भी मिलकर मेरे खिलाफ एक हो गए थे। मैं अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित और असमंजस में रहा। अब मैंने अपने परिवार को बचा लिया है, भले ही यह झूठ बोलने के लिए मुझे मौत दी जा रही है तो क्या!

1997-98 में मैंने दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों का एक व्यापार कमीशन के आधार पर चालू किया, चूंकि एक आत्मसमर्पित आतंकवादी होने के नाते मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। आत्मसमर्पित आतंकवादियों को नौकरियां नहीं मिलतीं। उन्हें या तो एसटीएफ के साथ विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के तौर पर काम करना होता है या सुरक्षा बलों और पुलिस के संरक्षण में लुटेरों की मंडली में शामिल होना होता है। रोज ही ये विशेष पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के हाथों मारे जाते थे। ऐसी स्थिति में मैंने अपना कमीशन आधारित व्यापार शुरू किया जिससे महीने में 4-5 हजार की कमाई हो जाती थी। चूंकि, एसपीओ अक्सर उन आत्मसमर्पित आतंकवादियों को प्रताड़ित करते हैं जो एसटीएफ के साथ काम नहीं करते, लिहाजा 1998 से 2000 के बीच मुझे अमूमन 300 से 500 रुपए स्थानीय एसपीओ को देने पड़ते जिससे मैं अपना काम-धंधा जारी रख सकता था। नहीं तो ये एसपीओ मुझे सुरक्षा एजेंसियों के सामने ले जाते। एक एसपीओ ने तो मुझे एक दिन बताया भी था कि उसे अपने अधिकारियों को पैसे देने पड़ते हैं। मैंने मेहनत से काम किया और मेरा व्यापार चमक गया। एक दिन सुबह 10 बजे मैं दो महीने पहले ही अपने नए खरीदे स्कूटर से जा रहा था। मुझे एसटीएफ के लोगों ने घेर लिया और एक बुलेटप्रूफ जिप्सी में पलहल्लन शिविर ले गए। वहां डीएसपी विनय गुप्ता ने मुझे प्रताड़ित किया, बिजली के झटके दिए, ठंडे पानी में डाला, पेट्रोल और मिर्च का इस्तेमाल भी किया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास हथियार हैं। शाम को उनके एक इंस्पेक्टर फारुक ने मुझे कहा कि यदि मैं उन्हें 10 लाख रुपए दे देता हूं तो मुझे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा वे मुझे जान से मार देंगे। इसके बाद वे मुझे हमहामा एसटीएफ शिविर में ले गए जहां डीएसपी दरविंदर सिंह ने भी मुझे प्रताड़ित किया। उन्हीं के एक इंस्पेक्टर शैंटी सिंह ने नंगा करके मुझे तीन घंटों तक मुझे बिजली के झटके दिए और उसी दौरान जबर्दस्ती पानी भी पिलाया। 

आखिरकार मैं उन्हें दस लाख रुपए देने को तैयार हो गया जिसके लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के गहने बेचने पड़े। इसके बावजूद केवल 80 हजार का ही इंतजाम हो पाया। इसके बाद वे मेरा स्कूटर ले गए जो मैंने 2-3 महीने पहले ही 24 हजार रुपए में खरीदा था। एक लाख रुपए पाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा लेकिन अब मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसी हमहामा एसटीएफ शिविर में तारिक नाम का एक और शिकार था उसने मुझे सलाह दी थी कि मैं हमेशा एसटीएफ का सहयोग करूं, नहीं तो वे मुझे प्रताड़ित करेंगे और सामान्य जिंदगी नहीं जीने देंगे। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मैंने वैसे ही जीने का फैसला कर लिया जैसे मुझे तारिक ने बताया था। 1990 से 1996 तक मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और विभिन्न कोचिंग सेन्टरों और घरों पर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था। यह जानकारी बड़गाम के एसएसपी अशफ़ाक हुसैन के साले अल्ताफ़ हुसैन को थी, चूंकि इसी ने मेरे परिवार और हमहामा के डीएसपी दरविंदर सिंह के बीच दलाल की भूमिका निभाई थी। अल्ताफ़ ने मुझे कहा कि मैं उसके दो बच्चों को पढ़ाऊं चूंकि आतंकवादियों के खौफ़ की वजह से वे ट्यूशन पढ़ने नहीं जा पाते। इनमें एक दसवीं में था, दूसरा बारहवीं में। इस तरह अल्ताफ से मेरी नजदीकियां बढ़ीं। एक दिन अल्ताफ मुझे डीएसपी दरविंदर सिंह के पास ले गया और बताया कि मुझे उनके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। 

काम यह था कि एक आदमी को दिल्ली ले जाना था और उसे वहां एक किराए का घर दिलवाना था, चूंकि मैं दिल्ली को बेहतर तरीके से जानता था। मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था, लेकिन मुझे संदेह था कि वह कश्मीरी नहीं है क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोलता था। लेकिन मैं असहाय था और मुझे दरविंदर का काम करना ही था। मैं उसे दिल्ली ले गया। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है। मैं उसे करोलबाग लेकर गया। उसने कार खरीदी। दिल्ली में वह तमाम लोगों से मिलता था और हम दोनों को दरविंदर सिंह के फोन कॉल आते रहते थे। एक दिन मोहम्मद ने मुझे बताया कि अगर मैं कश्मीर जाना चाहूं तो जा सकता हूं। उसने मुझे पैंतीस हजार रुपए भी दिए और कहा कि यह मेरे लिए एक उपहार है। 

अफज़ल गुरु की पत्‍नी
छह या आठ दिन पहले मैंने इंदिरा विहार में अपने परिवार के लिए एक किराए का कमरा ले लिया था। चूंकि मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब दिल्ली में ही रहूंगा क्योंकि मैं अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं था। मैंने किराए के मकान की चाबियां अपनी मकान मालकिन को थमा दीं और उसे बताया कि मैं ईद के बाद 14 दिसंबर को लौटूंगा क्योंकि संसद पर हमले के बाद वहां काफी तनाव था। मैंने श्रीनगर में तारिक से संपर्क किया। शाम को उसने मुझसे पूछा कि मैं कब वापस आया। मैंने बताया कि मुझे आए हुए सिर्फ एक घंटा हुआ है। अगली सुबह जब मैं सोपोर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था, श्रीनगर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। तारिक वहां एसटीएफ के साथ मौजूद था। उन्होंने मेरी जेब से 35000 रुपए निकाल लिए, मेरी पिटाई की और सीधे मुझे एसटीएफ मुख्यालय ले गए। वहां से मुझे दिल्ली लाया गया। मेरी आंखों को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यहां मैंने खुद को विशेष पुलिस के उत्पीड़न कक्ष में पाया। 

विशेष सेल की हिरासत में मैंने उन्हें मोहम्मद इत्यादि के बारे में सब कुछ बताया लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मैं, शौकत, उसकी पत्नी नवजोत (अफशां) और गिलानी ही संसद पर हमले के पीछे हैं। उन्होंने मेरे परिवार को लेकर मुझे धमकाया और उनमें से एक इंस्पेक्टर ने बताया कि मेरा छोटा भाई हिलाल अहमद गुरु भी एसटीएफ की हिरासत में हैं और यदि मैंने उनका सहयोग नहीं किया तो वे मेरे दूसरे परिजनों को भी उठवा लेंगे। इसके बाद उन्होंने मेरे ऊपर दबाव डाला कि मैं शौकत, उसकी पत्नी और गिलानी को दोषी ठहराऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। फिर उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गिलानी के निर्दोष होने के बारे में चुप रहना है। कुछ दिनों बाद मुझे मीडिया के सामने पेश किया गया। वहां एनडीटीवी, आज तक, जी न्यूज, सहारा टीवी आदि थे। एसीपी राजबीर सिंह भी वहां थे। जब एक साक्षात्कर्ता ने मुझे बताया कि संसद पर हमले में गिलानी की क्या भूमिका है, तो मैंने भी ऐसे ही कह दिया कि गिलानी निर्दोष हैं, ठीक इसी वक्त एसीपी राजबीर सिंह अपनी घूमती हुई कुर्सी से उठे, मेरे ऊपर चिल्लाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे पहले ही हिदायत दी गई थी कि मीडिया के सामने गिलानी के बारे में कुछ नहीं बोलना है। राजबीर के व्यवहार ने मेरी असहायता को प्रदर्शित कर दिया और कम से कम मीडिया के लोग यह जान गए कि अफजल जो भी बयान दे रहा है वह दबाव और खौफ में दे रहा है। इसके बाद राजबीर सिंह ने टीवी के लोगों से अनुरोध किया कि गिलानी वाला सवाल दिखाया न जाए। 

शाम के वक्त राजबीर सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या मैं परिवार से बात करना चाहता हूं। मैंने हां में जवाब दिया। फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। फोन करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं अपनी पत्नी और परिवार को जिंदा देखना चाहता हूं तो हर कदम पर उनका सहयोग करूं। वे मुझे दिल्ली में तमाम जगहों पर ले गए। वहां उन्होंने मुझे वे जगह दिखाईं जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। वे मुझे कश्मीर ले गए और हम वहां से बगैर कुछ किए वापस आ गए। उन्होंने मुझसे कम से कम 200-300 कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए। 

मुझे निर्धारित कोर्ट में अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं दिया गया। जज ने मुझे बताया कि मुकदमे के अंत में मुझे बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा, लेकिन आखिरकार न तो उन्होंने मेरे बयानों को दर्ज किया और न ही अदालत ने दर्ज किए गए बयान मुझे मुहैया कराए। यदि ध्यान से रिकॉर्ड किए गए फोन नंबरों को देखा जाता तो अदालत यह जान जाती कि वे एसटीएफ के फोन नंबर थे। 

अब मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मेरी असहाय स्थिति और उस सचाई को समझ सकेगा जिससे मैं गुजरा हूं। एसटीएफ ने अपने और कुछ अन्य अज्ञात लोगों द्वारा निर्मित और निर्देशित इस आपराधिक गतिविधि में मुझे बलि का बकरा बना दिया। इस पूरे खेल में विशेष पुलिस निश्चित तौर पर एक हिस्सा है चूंकि हर वक्त उन्होंने मेरे ऊपर चुप रहने का दबाव डाला। मुझे भरोसा है कि मेरी इस चुप्पी को सुना जाएगा और मुझे न्याय मिलेगा। 

मैं एक बार फिर आपको दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरा बचाव किया। 

सत्यमेव जयते। 


मोहम्मद अफज़ल 
पुत्र हबीबुल्ला गुरु
वार्ड न. 6 (उच्च सुरक्षा वार्ड)
जेल न. 1, तिहाड़
नई दिल्ली-110064 

...और उसने अपना परिवार बचा लिया : अफज़ल के परिजन और अधिवक्‍ता एनडी पंचोली (सबसे दाएं) 

2/11/2013

'आपातकाल' से उबरे संपादक की दिक्‍कतें


अश्वत्थामा




हू इज़ प्रोड्यूसर ऑफ़ 8 पीएम शो?’  जी...जी मैं. यू’… ‘दिस इज़ बिगेस्ट शो प्लैन्ड टुडे, शो मी व्हॉट हैव यू डन?’

घड़ी पौने 8 बजा रही थी, और आंखों में खून का कतरा लिए नए बॉस न्यूज़रूम में दाखिल थे.
ये क्या कूड़ा लिखा है? रबिश... तुम्हारी डिक्शनरी में बस इतने शब्द हैं, तुम्हें प्रोग्राम किसने दे दिया?’

वो मन ही मन बुदबुदाया— स्क्रिप्टिंग में अगर 2 गुणा 2 चार ही होते, तो बताता क्या लिखा है?
वो कुछ और सोचता, उससे पहले बॉस ने अगला सवाल दागा— 'गेस्ट लिस्ट कहां है?'

सर, नोएडा से मसूद-उल-हसन काज़मी, इमाम काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन...

ओके...

सर, दिल्ली से शिबानी कश्यप, फर्स्ट वुमैन गिटारिस्ट ऑफ़ इंडिया।

हू डज़न्ट नो हर प्रोफाइल?’, घूरती आंखों से बॉस ने कहा. और कौन?’

सर, मुंबई से सोना महापात्रा...

हूं..बॉस ने कुछ सोचने के अंदाज़ में सिर झुकाया. मिनट भर बाद खामोशी टूटी तो अगला सवाल था कि, ‘कौन है ये सोना महापात्रा?’

सर, सिंगर...

कौन सा गाना गाया है?’ अगले ही पल बिना जवाब का इंतज़ार किए हुए बॉस फिर बोले- तुमने तो नाम ही पहली बार सुना होगा...

बस बॉस ने मैदान मार लिया था. बॉस अगर उस वक़्त पूछ लेते कि लता मंगेशकर कौन है, और उन्होंने कौन से गाने गाए हैं, तो वो उसका भी जवाब नहीं दे पाता. न्यूज़रूम की दमकती रोशनी में, बॉस की बिलौटे सी चमकती आंखों को देखकर उसे रतौंधी सी हो रही थी. 

ये देखो, प्रोड्यूसर हैं, और इन्हें प्रोग्राम के गेस्ट्स के बारे में पता ही नहीं’, बॉस चीखे, लेकिन पता नहीं क्यों चीख में कुछ हंसी मिली हुई थी. न्यूज़रूम में मानो हवा से बातें करते हुए बॉस अबकी बार बोल पड़े, ये शॉट-बाइट कटाने लायक है, और शॉट-बाइट कटाने के लिए हमको प्रोड्यूसर नहीं चाहिए. अब आगे से इसे किसी ने काम दिया, तो इसकी नौकरी तो जानी ही है, उसकी नौकरी भी जाएगी.

दिस शो मस्ट बी फेयरवेल ऑफ़ हिम.

बॉस 10 साल के करियर पर माटी पोत कर जा चुके थे. वो माथे पर हाथ रखकर सोच रहा था-बीवी-बच्चे का पेट कैसे पालेगा, मकान की ईएमआई कहां से भरी जाएगी?

... लेकिन वो अकेला नहीं है. न्यूज़रूम की जब से सत्ता बदली है, हुवां-हुवां लोमड़ियां चीख रही हैं, सिटिर-पिटिर मधुमक्खियां कानों में बज रही हैं, कलेजे में कुत्ते भूंक रहे हैं, और लाल बुझक्कड़ों को छोड़ बाकी सब लथपथ हैं पसीने से- सिर से पांव तक. हर कोई जानता है कि न्यूज़रूम इन दिनों कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ है, जहां नए बॉस धर्मयुद्ध खेल रहे हैं.

आवाज़ आती है- अर्जुन, हर कोई ऐसे चौंकता है कि मानो कोई आग्नेय कीड़ा शिराओं पर रेंग गया हो. इज़ इट ऑल ओके, एनी प्रॉब्लम?’ नो-नो... सर...’, सीनियर-जूनियर के बीच न्यूज़रूम में इन दिनों ऐसा ही वार्तालाप हो रहा है. जूनियर जानता है कि सीनियर अपनी फटी को सिलने के लिए इस जुमले को हैबिट में ला चुका है.

नए बॉस क़ातिल हो चुके हैं, वो न्यूज़रूम में घुसते हैं, तो हर कोई एक-दूसरे को देखकर आंखों ही आंखों में पूछता है—कालिया, आज किसका नंबर?’ 

पिछले दिनों स्वेट इक्विटी को स्वीट इक्विटी कह जाने के गुनाह पर 12 साल, और 3 चैनलों का एक्सपीरियंस रखने वाले एंकर की एंकरिंग ख़त्म हो चुकी है. 

गैंग रेप के मामले में मोज़ैक होने के बावजूद, ठीक से चेहरा मोज़ैक न करने के ज़ुर्म में प्रोड्यूसर और स्पेशल करस्पॉन्डेंट को नौकरी गंवानी पड़ी है. 

एक कैचलाइन अच्छी न लगने पर बॉस ने एक सीनियर प्रोड्यूसर को कुछ यूं बेइज़्ज़त किया, कि न्यूज़रूम में इंटर्न से लेकर एडिटर तक की पोस्ट वालों को बुला-बुलाकर उस कैचलाइन का मर्म पूछते रहे, और अपने सामने चुप रहने में भलाई समझने वाले हर एक चेहरे की ख़ामोशी को अपने ज्ञान और सीनियर प्रोड्यूसर की बेवकूफ़ी की नुमाइश मान बैठे. ये और बात है कि बॉस ने भी कोई दूसरी कैचलाइन नहीं सुझाई. हालांकि वो भरे न्यूज़रूम में कह चुके हैं, कि बस वो और चंद और उनके जैसे ही पत्रकार हैं, बाकी सब कंघी-चूड़ी बेचने वाले.

बॉस अपनी पैनी निगाहों से इन दिनों तथाकथित नकारों को छांट रहे हैं, और पहले से दोगुनी कीमत पर नए प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर भर्ती करते जा रहे हैं.

बॉस पिछले दिनों जेल में थे. उनके मुताबिक उनकी गिरफ़्तारी आपातकाल जैसी थी. उनके ऊपर 100 करोड़ की रंगदारी के आरोप हैं तो क्या, वो माननीय संपादक हैं, कहीं भाग थोड़े जाते? बहरहाल, ये खीज कैसी है, पता नहीं, लेकिन सब कुछ बदल डालूंगा के अंदाज़ में बॉस ने न्यूज़रूम को हिला रखा है.


(घटनाएं सौ फीसदी सच्ची हैं, लेखकीय स्वतंत्रता ली गई है) 
(लेखक ज़ी न्यूज़ में प्रोड्यूसर हैं)

2/09/2013

What happened at Jantar Mantar today


Shehla Rashid


Here’s why I protested

Afzal Guru was hanged today. Days after Narendra Modi managed to “enchant” students at SRCC, Delhi. I woke up to this horrible news and felt really low. I wanted to talk to someone, express my grievances, express my sadness. With the murderers of thousands of innocent Kashmiris roaming around freely, I felt enraged as a Kashmiri. Afzal Guru was hanged for political gains alone, not because the Congress loves the Nation a lot. Yes, the Parliament attack was an attack on the Indian nation. So was the cold-blooded murder of Jaleel Andrabi– an attack on Kashmiri nationalism. When they raped the women at Kunan Poshpora, they raped a nation. The cover-up that was given to the murderers of Jaleel Andrabi, Asiya and Neelofar was an attack on our dignity. When the government of India refused to give sanction to prosecute the perpetrators of Pathribal fake encounter, our dignity was lost forever. So was our faith in the Indian judicial system. Two men implicated in Lajpat Nagar blasts were acquitted of all charges after more than a decade of detention and after two years of being on death row!

The murderers of Graham Staines, who along with his two little kids was burnt to death, were not awarded death penalty as the court refused to term it rarest of rare! The perpetrator of 1984 riots, Sajjan Kumar is still free. Maya Kodnani and Babu Bajrangi were given a life sentence and not death as they were not directly involved. So, why Afzal Guru? Was it the symbolism of the attack? Was the Nation and the very idea of it not attacked when Muslims were brutally murdered and raped in Gujarat? Was the symbolism of that attack any less? There are apprehensions that his trial was not fair. Even his death sentence was not carried out in a fair manner. His last wish was to meet his family. But his family was informed through speed post. They could not even see his body as he was buried in Tihar Jail!

What happened at Jantar Mantar

A dispersed bunch of people gathered at Jantar Mantar today to express their sadness. To our left were Bajrang Dal goons with saffron colored scarves and tilaks (vermillion) on their foreheads. Initially we did not even have placards. Then some activists brought in the placards and the media immediately got enthusiastic about our protest. They finally got something colorful to show on TV. The police followed, with lathis and elaborate riot control tools. No sooner had the media and the police arrived, the Bajrang Dal goons started attacking us. Initially the police tried to push them back. But finally the goons were let loose on us. One of the goons jumped into the space between the cameras and us and started abusing us. We were still calm. He then tore off the posters. We didn’t react. When he finally attacked one of us physically, a brawl erupted.
We were pushed away. Then the police stopped intervening. We were getting pushed further and further towards the left. The goons kept attacking us, we didn’t hit back. We were only protecting ourselves. I was holding a placard that said, Afzal Guru was not given a fair trial. One of the goons jumped at me and tore off my poster. I just said, ‘bastard’ quietly and didn’t hit him in the balls.

We gathered again. But we were getting pushed to the wall. Quite literally. We were squeezed between a wall and the cameras and the goons who were attacking us over and over again. Two young Kashmiri boys, realising their helplessness, broke down. I, in a moment of rage, went berserk and started screaming at the top of my voice against the police. I think that moment was when the riot police tore off our posters. I screamed, “Sir yeh bomb nahi hai, poster hai” (Sir, this is a poster not a bomb), “Sir, aap hamein kyun rok rahe ho, in ko kyun nahi rok rahe” (Sir, why are you stopping us, and not them?). They were probably shocked by my screams for a while. They said, “dekhiye aap yeh sab nahi karo” (See, please don’t do all this), I screamed again, “Sir kya nahi karein, hum ne kiya kya hai, hamara toh peaceful protest bhi aapko terrorism lag raha hai aur jo hamein peet rahe hain un ka kya” (Sir, what is it that you want us to stop doing? Our peaceful protest looks like terrorism to you and what about the people who are beating us up?).

After a while, mud was thrown at us. Before I realised, I was being taken away by female cops. No, I wasn’t courting arrest. I just wanted a space to express my feelings. I have protested at Jantar Mantar before. For causes other than Kashmir. Since this time it was Kashmir, I was a terrorist by default who had to be detained. I kept asking them why they are detaining us rather than controlling and detaining those goons. I was put in a van along with one other JNU student. I was released after being detained for a while. I narrated the whole incident to Vrinda Grover, Gautam Navlakha, among others and told them that there might be others who were detained. While I was talking to him, another goon stealthily came up and smeared mud on Gautam Navlakha’s face.



Yes, they blackened his face. I realised that I was released only because the police brought in a huge bus in which they started taking protesters away. The police van in which I was detained did not seem enough. A boy who voluntarily sat in the van was asked to get down. I was released after a while. I did not court arrest. I came away because it is important to narrate the story as Indian media might not show what happened.

Picture Courtesy : Tehelka | Gautam Navlakha, with his face blackened by a miscreant. I'm farther behind in the picture, wincing.
They won’t tell you how the Delhi police protected goons in saffron and detained us instead. They won’t tell you that the police tore off our posters and asked us to stop! They won’t tell you all this. Many protesters have been arrested and lodged at Mandir Marg police station. On my way back, I saw many police barricades enroute Jantar Mantar with cops who were on the look out for Kashmiri-looking-men-and-women, potential protesters and I did spot a few of them heading in auto rickshaws toward Jantar Mantar, their eyes eager and their faces betraying a helpless look.



More Sources:

Mainstream media have started taking note of the issue. Will keep updating news and other sources here

The Hindu : http://www.thehindu.com/news/national/afzal-guru-hanging-voice-of-affirmation-across-political-spectrum/article4397059.ece

Dainik Bhaskar : http://www.bhaskar.com/article/c-99-131730-NOR.html?seq=2&OTS

Video of protest : https://www.facebook.com/photo.php?v=115670631947437 (No clue why the URL says ‘photo’)

Tehelka Photo Album : https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10151414460534061&set=a.10151414453009061.502596.374918609060&type=1&theater



Courtesy: Shehla  Rashid Online


2/04/2013

Vishwaroopam: Reinforcing Global Communal Stereotypes & justification for the US Empire

Feroze Mithiborwala

I was a little benumbed whilst watching this technically advanced, but socio-politically regressive movie. Kamal Hassan has lied to all of us when he had stated that this movie is his tribute to Indian Muslims & will make them proud. This movie had me even more worried than earlier! 

The message propagated all through the course of this slick production is basically – “One Good Muslim, All the rest - Bad Muslims”.

The hero, Taufik is an Indian Muslim who saves the world, whilst the rest of the Muslims portrayed in the movie, are all committed to destruction & mayhem, all in the name of their religion.  

This is the state of the world – Vishwaroopam.




Yet, let me categorically state that I do not support any cuts, or further censorship of the mobs, but will certainly strive to counter this movie & all like it – intellectually & on the ideological plane, where the true battle lies.

This movie also justifies the US wars & occupation of Afghanistan in ways that even Hollywood would have felt ashamed of portraying. All this for the NRI audience I would tend to venture. My first opposition to the movie stemmed from the fact that the posters prominently posited the infamous ‘stars & stripes’ in the background & I knew that trouble was brewing. Mind you, the Indian Tri-colour is far less prominent & even missing for the most . . . so much for NRI nationalism, or for that matter that of the RNI’s, the Resident Non-Indians, the chatterati where these communal stereotypes hold sway.

And coming back to the movie, I have never ever seen so many scenes of Namaz in any single film & there is certainly a sickeningly strong overdose of Islamic imagery & the overwhelming majority of it linked to negativity & violence. The movie is one big screenplay of Namaz & Bombs, Namaz & Terror, Namaz & Violence. I wonder as to how Kamal Hassan, who is also the scriptwriter, thought that this would help the cause of Indian Muslims, knowing full well what the community has been through for the past two decades & more. The way the entire community has been ‘terrorized by the terror’ & this has led to their further demonization & isolation.

More so, the script is deeply flawed, lacks intelligence & an honest research. One would have tended to expect a little more from Bollywood after certain good movies dealing with this genre, such as ‘Dhoka’ (Mahesh Bhatt), ‘New York’ (Kabeer Khan), ‘Qurbaan’ (Saif Ali Khan), ‘My Name is Khan’ (Karan Johar & Shahrukh Khan), ‘Agent Vinod’ (Saif Ali Khan) & last but not the least ‘Tere Bin Laden’ (Abhishek Sharma), certainly the best political satire in a generation. It also had a far more genuine Bin Laden look-alike than the ones that appear in the CIA produced videos.

All of the above movies were good honest efforts & there is a common thread as well as a degree of intelligent sensitivity that has gone into researching these scripts & directing these movies, none of which faced any public opprobrium or ire, even though they were far more complex than this ignominious, outrageous ill-conceived prejudiced charade called Vishwaroopam.

Yet, I want no cuts here . . . 

The two lines attributed to Rahul Bose, whom many of us consider to be our own, are the most dangerous & misleading of all the dialogues in the movie.

Rahul Bose, who plays Umar (alluding to Mullah Umar, the leader of the Taliban, I would presume), is facing an assault on his village. The Taliban have captured a few American soldiers & are on the move. The US army, attack the village where they have been led by a trace, with the help of Kamal Hassan, who plays Taufik, a RAW agent. Taufik has infiltrated the ranks of the Taliban to rise to be the ipso facto No. 2.

Wonder what the RAW itself has to comment here.

With the US helicopter gunships blazing away as they did in Vietnam & Iraq, as they do in Somalia, Yemen & Libya - & hope to in Syria - the Taliban are on the run. Here Rahul Umar Bose makes a statement to assure his fellow Talibani’s – “Don’t worry, the Americans do not kill women & children”.

All I could think of in that Shakespearian moment was - “Et Tu Rahul!!” To what extent can an artist such as Rahul Bose sell himself, his very moral intellect, is a question that he & many others need to seriously ponder upon.

This dialogue would be considered ridiculous & even blasphemous by the Americans themselves, who always refer to the deaths of civilians as ‘collateral damage’, but Kamal Hassan in his willful pandering has gone even beyond the worst in Hollywood.

Thus the movie further portrays the US soldier manning the gunship, feeling sorry for killing innocents, whilst the Afghans are all portrayed as dehumanized killing machines. I do not think our immediate neighbours are going to appreciate this movie very much. But who cares, our movies are a reflection of our skewed foreign policy as it does appear. And the Afghans are not exactly a market yet.

The second statement by Rahul Umar Bose is even more dangerous for Indian Muslims & for all the secular activists who have stood by the community as it was demonised, isolated & entrapped into the false-flag terror attacks that we have witnessed since the post-9/11 world. This was the phase of ‘controlled chaos’ & ‘unending perpetual state of wars’ - to use Neoconservative terms.

Here whilst talking to Kamal Taufik Hassan, Rahul Umar Bose smilingly & nonchalantly mentions that “We were also involved in the terror attacks of Malegaon, Bombay & other Indian cities”. In the Tamil & Telegu versions, Coimbatore & Madurai are mentioned.

‘Good God!!’, I exclaimed to myself, even dropping my popcorn – this movie is basically stating that the Taliban & Al Qaeda are active in India & thus certain sections of the Indian Muslim population are certainly enmeshed with the global terror network. This will prove to be catastrophic in the subconscious perceptions that tend to get ingrained deep into our reality. This, Mr. Kamal Hassan, is going to be disastrous for Indian Muslims & we can all assure you that.

But where is the research may we ask? Have you not heard of ATS Chief Hemant Karkare, who even served in the RAW? Are you not aware that since 2007 the role of the Abhinav Bharat & Sanatan Sanstha in terror attacks across the country is being probed? Particularly in Malegaon, Nanded, Samjhauta Express, Mecca Masjid, Ajmer, Goa & another 10 more as per the statements of the Home Ministry. Actually there are more than 16 recorded cases, but we will leave that for later. All of which are further linked to the right-wing Manuwadi Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)?

Are you really unaware of these facts? Are you planning to leave the country, or had you already left India & were living in New York & are thus so ill-informed whilst writing the script, which lacks even an iota of honesty & responsibility? And this is thus a question that we as secular activists must ask ourselves. Many Hollywood movies with a geopolitical strategic agenda are produced in tandem with the Pentagon, so as to further the Imperial agenda of global hegemony & the advancement of the Military-Security-Industrial-Corporate-Media Complex.

The Zionist dominated Hollywood target & portray Palestinians & Arabs in particular & Muslims in general as terrorists & fanatics & thus these societies need to be invaded & civilized - & their resources taken over for good measure.

This movie by Kamal Hassan in my estimation also certainly falls in that category of disinformation & propaganda to serve the cause of the Empire & to justify the wars, occupation & the genocide of the Afghan nation, as well as the people of Pakistan. Thus not even a fleeting reference to the drone attacks & the killings of innocents, of women & children – thus & as to how it continues to create & foster more & more militants & terrorists.


Then comes the part where there is a meeting between the leadership of the Taliban led by Rahul Umar & Al Qaeda-Osama Bin Laden. Here again I would request all those who have been taken in by the recent supposed assassination of OBL at the staged operation at Abbotabad, to read the excellent & well researched book by David Ray Griffin - ‘Osama Bin Laden Dead or Alive?’ (http://www.globalresearch.ca/osama-bin-laden-dead-or-alive/15601). According to many honest experts, OBL has been dead since December 15, 2001. It is also time, actually high time, for the Indian peace movement to address the issues of the 9/11 false-flag terror attack, which has been central, seminal & defining moment of the 21st century, changing the very trajectory of international politics & leading to an era of wars, occupation & genocide. (http://www.ae911truth.org).

Recently more than 12,500 police stations across America received petitions by peace activists stating that the attack on WTC 1, 2 & 7 were an inside job & demanding that the investigation be reopened. This movement is being spearheaded by more than 1700 architects & engineers & they have the support of many prominent intellectuals, scholars, and human-rights activists, whistle-blowers from within the CIA-FBI, as well as vast sections of American society & the numbers are growing. (http://www.ae911truth.org/downloads/documents/AE911Truth_Police_Letter.pdf)

The reason as to why we will have to grapple with these issues is that, I personally know of Muslim youth who have been quizzed about their positions on 9/11, Bin Laden & Al Qaeda. The youth have been perplexed & horrified & left wondering as to what a job application in the engineering, IT & telecom sectors have to do with their knowledge or lack off, on these issues. With Muslim children who have tried to step out of their ghettoes & seek admission in a multi-cultural milieu, being denied & told to go back where they came from. Of Muslims being denied housing in secular neighbourhoods. All these discriminative practices have also increased in the last decade – thanks to the dominant paradigm of terror.

Now, let us get back to the movie.

Soon after the carnage at Rahul Umar’s village, we are transported into America. Here Kamal Taufik Hassan is working incognito singing & dancing to songs written by Javed Akhtar (Lyricist), as any good Muslim should be. Then a terror network begins to unravel & here we have Rahul Umar now planning to explode a Dirty-Bomb made of waste radioactive material, which the good Muslim does foil, but after saying his Namaz! Whilst in the room inside wherein lies the Dirty-Bomb, is a bad Muslim, an African-American of Nigerian descent, busy offering Namaz before he is to blow the city to kingdom come.

Herein lies another serious problem with this film & that is the tarnishing of African-American Muslims as part of the global terror network. In most Hollywood movies, they are sensitive enough to portray the African American as the FBI boss, under whom the White officers serve. But here the RAW agent is working with only Whites, presumably Anglo-Saxon agents, whilst the African-American Muslim, is in tandem with the Taliban. 


Another case of out-sourcing I guess.

Yet again, Kamal Hassan fails in his research. The terror attacks portrayed in the film have never occurred. Also the FBI has been entrapping Muslim youth from various ethnic backgrounds & this too is a documented fact. Since there are no serious terror threats to America, the FBI actually manufactures them, as there is no other way to justify Homeland Security & it’s vast gargantuan powers & budget. FBI agents, informers, or ex-convicts working in tandem with the FBI are sent into Muslim communities with an attempt to create terrorists. During the course of the year, a couple of youth, mainly with a criminal background do get entrapped due to intensive indoctrination about the crimes of the American Empire against their people. These youth are then further induced & provided training to carry out a terror attack. Targets are indentified, funds, bombs & ammunition provided & the day that they do carry out the attack, they are apprehended red-handed. The bombs turn out to be fake & so do the guns & that is how stupid this supposed terrorists are.
(http://www.nytimes.com/2012/04/29/opinion/sunday/terrorist-plots-helped-along-by-the-fbi.html?pagewanted=all&_r=0)

This information is now available in the mainstream corporate media & should have been studied by Kamal Taufik Hassan, before trying to give the FBI a positive image in India.  

This movie thus is basically a propaganda tool for the FBI, as well as the US Empire. And now apart from Hollywood, they even have some of the best known names from Bollywood to do their bidding. I wonder as to how much of the financial backing of this movie came from sources such as these & this question must be asked in all seriousness.
The plot foiled, America saved, sorry, the world saved – Rahul Umar & his Taliban cohorts decide to flee to – India for God’s sake!! Thus we end with the inevitability of Vishwaroopam II-India!

Actually Kamal Taufik Hassan, might even consider shifting the next locale to Qatar, where the ‘Good Taliban’ now have a functioning office. Here they will all have ample security as the US has a vast network of naval & airforce bases. (http://news.xinhuanet.com/english/2003-03/20/content_789607.htm).

So Rahul Umar Bose, the FBI-CIA & Kamal Taufik Hassan can actually sort out all their problems there itself, without dragging India into the picture.

But therein lies the threat, the clear & present danger to all of us. You can imagine the next movie where Mullah Umar is in Mumbai, or Delhi, maybe in Chennai (threatening Jayalalitha for the way she dealt with Kamal Hassan), or in Malegaon, or in Srinagar, or Hyderabad, or in the Samjhauta Express, or in Ajmer. Thus taking the blame for all the terror attacks, that now are alleged to be the handiwork of the right-wing Abhinav Bharat & Sanatan Sanstha, as per the National Investigation Agency (NIA) & certain Anti-Terror Squads (ATS).

And then, is Osama Bin Laden & his dreaded Al-Qaeda far behind in reaching India? The fear that it will instill amongst the ordinary masses of India & the further fear & isolation towards which will be driven the Muslim community is apparent to many.

The terror of the politics of terror . . . 


Also a little sincere & not-so-secret advice to film producers, directors, financiers & aspiring writers. In case you are sure that your film (or a book) is going to bomb at the box-office, be sure to include a few scenes that you may think may be offensive to the emotions of the Muslim community. Then arrange a screening prior to the release, even though your film has been cleared by the censor board - & rest assured that a few Muslims will fall prey to your trap & voila – you have your much needed controversy.

My sincere advice to the Muslim community is the following. Islam is to great a religion for one book or a movie to harm our faith. Let us overcome our insecurities & notice that the tide is turning in our favour. The protests against the film have harmed the image of the Muslim community, even more than Vishawaroopam was planned to. We need to learn to ignore certain barbs hurled at us & do not need to fall for the traps laid for us every time.

We have every right to protest & this is our constitutional & democratic right. Our strategy should have been to evoke support & call for a debate on the movie, whilst pointing out its flaws & distortions. Demanding the cuts after the censor board had cleared the movie, has harmed our image & further portrayed the community as extremist & undemocratic.

The problem with Vishwaroopam, is that it has projected only a miniscule part of the reality of the Afghan quagmire over a period of more than three decades. But one cannot deny that today the Taliban & their ilk, do represent a form of a vitiated, extremist & a violent form of Islam. From the destruction of the Bamiyan Buddha’s, to the attacks on schools & clinics, to the enforced imposition of a regressive barbaric code on women, to the public flogging & stoning, to the sectarian hatred & killings, to the destruction of Sufi Mazar’s & the genocide of the Shia’s – all this is being waged in the name of Islam.  This cannot be denied by any honest God-loving/fearing Muslim.

This form of extremism is indeed alien & against the very letter, grain & spirit of Islam. Let us all stand up in unison & condemn this debasement & defilement of Islam. This we really do not venture into often enough – do we honestly?

In the course of the last 2-3 years, the truth about the terror attacks is being revealed & this is due to the sustained struggle of Muslim organizations, in tandem with our secular allies, despite all the odds, with the entire media & dominant sections of the Government-intelligence-security apparatus ranged against us – but yet we have overcome all these odds. Now is the time to reach out to all the communities that make up this great & dynamic nation & expose the true facts of the terror networks that are now being revealed. (http://www.indianexpress.com/news/joining-the-dots/1068448/)

If India is not to go the way of Pakistan, with its assorted Lashkar-Frankensteins, then we have to put a stop to those religious extremist forces that threaten to destroy the unity & social fabric of our nation. Now after the statement by the Union Home Minister, the tide has clearly changed in our favour & thus let’s not undermine our struggle by isolating ourselves any further by taking to the streets in the manner that we have & I was personally both angry & ashamed at the public spectacle. There is a certain degree of double-standards, intolerance & hypocrisy within the Muslim community as well.

Also I would want to appeal here to all those who rightly advised the Muslim community on the values of freedom of expression, democracy & modernity. Kindly stand up, script & produce a movie based on the charge-sheet filed by Hemant Karkare, in a movie that can be titled ‘Bharatroopam’. I would love to see as to how many takers there would be from Bollywood, especially all the ones shouting ‘cultural terrorism’.

In terms of soft-targets, the Muslim community is far more of a soft-target, than many film makers & writers.

Yet, I will not ask for a cut, even though both my mind & my heart have suffered a few deep searing cuts.

This is because I have immense faith in the great legacy of this country. I have great faith in the teachings of Krantiveer Jyotiba Phule, Mahatma Gandhi, Maulana Azad, Dr. Babasaheb Ambedkar & Shaheed Bhagat Singh. I have great faith in the people of India, in our secular democracy.

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