3/10/2013

Sunday Review SBGR: ''अब हम खड़े हो गए हैं, तो और झेलाएंगे''



यू टू ब्रूटस...


व्‍यालोक 
साहब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स देखने के बाद निष्कर्ष के तौर पर दो-तीन बातें बिल्कुल साफ समझ में आती हैं। पहली, तो सामान्यीकरण का खतरा उठाते हुए भी यह कहना चाहिए कि सीक्वल हमेशा पहली फिल्म से लचर होती है, वह कभी भी पहले भाग के टक्कर की नहीं हो सकती, वह आपको निराश करेगी ही (हिंदी फिल्मों से लेकर हॉलीवुड तक यह सत्य है)। दूसरी बात भी इससे मिलती-जुलती है कि हरेक जीनियसआखिरकार सामान्य होने को अभिशप्त होता है, हरेक सर्जना अंततः समझौते की ओर झुक जाती है। यह बात तब और भी सच होती है, अगर हम बात मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के संदर्भ में करें। तीसरी, और आखिरी बात यह कि हिंदी सिनेमा के बारे में अब तक जानता आया एक सच भी मिथक है। वह मिथक यह है कि हिंदी सिनेमा के कास्टिंग में (पोस्टर वगैरह की बात नहीं कर रहा) कम-से-कम वर्तनी की अशुद्धि नहीं रहती। पहली बार किसी फिल्म में हिंदी की वर्तनी गलत लिखी दिखी। अगर आप उन लोगों में हैं, जो मानते आए हैं कि हिंदी सिनेमा के गीतों को सुनकर और कास्टिंग देखकर वर्तनी सीख सकते हैं, तो आपके सावधान होने का वक्त आ गया है। इस फिल्म में रिटर्न्स को रिटर्नस लिखा गया है।

तो, शुरुआत फिर अंत से करते हैं। फिल्म इंटरवल के बाद निहायत धीमी या कहें कुछ हद तक लचर भी है। अंत बिल्कुल ही हड़बड़ी में किया गया लगता है, मानो निर्देशक को समझ में ही नहीं आया है कि इस फिल्म को लेकर वह करे क्या? इरफान का चरित्र जिस तरह से गढ़ा गया है- क्रूर, शातिर, महत्वाकांक्षी और अपने भले के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाला- उसके हिसाब से अंत में इरफान की आत्महत्या को तार्किक चलिए मान भी लें (हालांकि, उस चरित्र के लिए आत्महत्या न पचने वाली बात है), तो भी उसका आखिरी में सेंटी होकर सोहा को मोबाइल रिकॉर्डिंग भेजना कुछ समझ नहीं आता।

इसी बिंदु पर अपने पहले सामान्यीकरण की बात करें कि हरेक जीनियस आखिरकार सामान्य हो ही जाता है, हरेक Non-conformist आखिरकार लकीर का फकीर बन ही जाता है। हरेक संघर्षशील तिग्मांशु धूलिया कुछ हासिल करने के बाद साहब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स ही बना सकता है। जैसा कि फिल्मकार ने अपने हालिया साक्षात्कारों में इस बात को स्वीकारा भी है कि इसमें उन्हें पैसों की दिक्कत नहीं हुई है और उसी वजह से वह भव्यता दिखाने में भी सफल हुए हैं। बाजार ने धूलिया को पैसा तो दिया ही, उनको मुंबइया फिल्मों के फॉर्मूले अपनाने पर भी बाध्य कर दिया। वरना, अच्छी-भली फिल्म में बी-ग्रेड की हीरोइन का तथाकथित आइटम सांग डालने का तर्क समझ के परे है। आप कह सकते हैं कि करोड़ों रुपए फूंकने वाला प्रोड्यूसर और बनिया तो अपने पैसे वापस चाहेगा ही। इसी दुष्चक्र की ओर तो हमारा भी इशारा है। आखिर यही तिग्मांशु पानसिंह तोमर भी बनाते हैं, साहब, बीवी... का पहला भाग भी बनाते हैं। वे फिल्में भी इसी मायानगरी में बनीं और दर्शकों ने उनको भी चाहा, पैसा लौटाया, तो फिर इस बार क्यों

यह ठीक वही तर्क है, जो पत्र-पत्रिकाओं के घटिया संपादक देते हैं, घटिया टीवी धारावाहिकों के निर्देशक देते हैं- साहब, दर्शक यही देखना चाहते हैं, पाठक यही पढ़ना चाहते हैं। हालांकि, हमें यह पता है कि दरअसल सभी अपनी कमज़ोरी को किसी और के बहाने से छुपा रहे होते हैं। तिग्मांशु ने जिस तरह के कलाकार (सितारे नहीं) और शानदार स्क्रिप्ट के साथ अपनी फिल्म को उतारने की कोशिश की, उसके बाद उनके लिए बाज़ार का सजदा कोई ज़रूरी नहीं था। ज़रूरी था- ऑल आउट ऑफेंसिव। यहीं वे चूक जाते हैं। खामखां, वह अपनी फिल्म में सेंटी तत्व घुसेड़ने लगते हैं। इरफान का बदला किसी भी तरीके से होता तो वह जायज़ था, उनकी आत्महत्या फिल्म का सबसे कमज़ोर पक्ष है।

फिल्म का पहला हाफ दर्शक के सारे अप्रिहेंशंस (सीक्वल को लेकर) को तोड़ता है। कसी हुई कहानी, घोड़े की सी रफ्तार से भागती पटकथा, चुस्त और कसे डायलॉग्स (तिग्मांशु को लेखक के तौर पर 10 में 10 अंक) और बेबाक-ज़ोरदार अभिनय, इन सारी चीजों की वजह से ही दर्शक दूसरे हाफ में ये दिल मांगे मोर कहता है। तिग्मांशु यहीं पर आकर ढेर हो जाते हैं। इंटरवल के पहले की तमाम कसावट दूसरे हाफ में बिखर जाती है और फिल्म औंधे मुंह गिर जाती है। 

यह बात निर्देशक के साथ ही अभिनेताओं के लिए भी उतनी ही मौजूं है कि बाज़ार आपको पैसा देने के साथ ही किस तरह आपकी अभिवृत्ति (एटीट्यूड) को खोखला (लैक्सिकल) बना देता है। 'हासिल' के दौर में इरफान शायद वैनिटी वैन वाले सितारे नहीं रहे हों, इतने नामचीन भी नहीं थे। इसी वजह से साहब, बीवी... में इरफान थोड़े सुस्त से हो गए लगते हैं। उनके डाइ-हार्ड फैन्स की जानकारी के लिए बता दिया जाए कि वे इरफान हैं और इसीलिए निकष उनके हिसाब से ही कसा जाएगा, हर्डल उनके लिए हरेक बार ऊंचा ही होगा। यह ठीक है कि उनको कुछ साबित नहीं करना है, वह पहले ही कर चुके हैं, लेकिन इसी वजह से दर्शकों के प्रति उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। हमेशा की तरह इस फिल्म में भी इरफान ने पावरहाउस परफॉरमेंस दी है, लेकिन वह अपनी ही कसौटी से पीछे रह जाते हैं। वहीं, अंडररेटेड जिमी शेरगिल नए प्रतिमान गढ़ते नज़र आते हैं। सुरेंद्र वर्मा के शब्द थोड़े से तोड़-मरोड़ दें तो, रंगमंच के प्रांगण में डरे-सहमे मृगशावक की तरह प्रवेश करने वाला जिमी अब अभिनय के मैदान में क्रुद्ध शेर की तरह शिकार कर रहा है। 

इस फिल्म में वे मानो सबको अपने लाजवाब अभिनय से छह इंच छोटा कर देते हैं। इसकी वजह ही यही है कि जिमी को बहुत कुछ पाना बाकी है, बहुत कुछ साबित करना है और उनकी भूख अभी मरी नहीं है। इसका सबूत चाहिए, तो ज़रा वह सीन रिप्ले करके देखिए जहां वे व्हील-चेयर से खड़े होते हैं इस डायलॉग के साथ- अब हम खड़े हो गए हैं, तो और डराएंगे। यहां उनकी संवाद-अदायगी देखिए, आंखें देखिए, अंदाज़ देखिए और फिदा हो जाइए। माही गिल पहली फिल्म के मुकाबले केवल एक सुधार कर पायी हैं, और वह है उनकी चाल। उनकी लड़खड़ाहट बस उतनी ही है, जितनी होनी चाहिए- एक शराबी की। बाकी, वह औसत रही हैं। पुराने माहिर राज बब्बर तो बस एक शब्द और एक सीन से ही महफिल लूट ले जाते हैं। जब वह मुग्धा के आयटम के दौरान त्रस्त स्वर में तिवारी पुकारते हैं, तो समझ में आ जाता है कि राज बब्बर होने का मतलब क्या है।

फिल्म की तमाम खामियों के बीच धूलिया खुद को सिद्ध करते हैं इसके डायलॉग्स से। लंबे समय बाद ऐसी फिल्म आयी है जिसके संवाद सिनेमा देखकर बाहर निकलने के बाद भी आपके साथ रहते हैं। माही गिल का वह संवाद किसे भूलेगा- मुझे हमेशा मर्द ही क्यों मिलते हैं, शायर क्यों नहीं मिलते। इरफान को तो मानो धूलिया ने खज़ाने की चाबी ही दे दी है। चाहे उनका माही को यह कहना हो, 'लोग इश्क करते नहीं, इश्क में होते हैं और दिखते हैं।' या फिर, 'आप राज कीजिए, राजनीति हम कर लेंगे।' इनके अलावा भी ढेर सारे संवाद हैं, जिनके ज़रिए तिग्मांशु अपनी पुरानी अदा दिखाते हैं।

बहरहाल, मसला फिर से सर्जनात्मकता, बाज़ार और जीनियस का है। यह बात पता नहीं क्यों जेहन में पैठी सी लगती है कि जीनियस जहां बाज़ार से मिलता है, वहीं फिसल जाता है। 'खामोशी द म्यूजिकल' बनाने वाला भंसाली 'गुजारिश' बना बैठता है, 'सांवरिया' जैसा अपराध करता है, 'देव-डी' और 'गुलाल' देने वाला अनुराग कश्यप वासेपुर में रपटने लगता है, तो तिग्मांशु धूलिया भी साहब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स में फिसल जाते हैं, फिजूल के गाने, आइटम सांग और सुस्त रफ्तार के शिकार हो जाते हैं। इसीलिए तो हमें कहना पड़ता है- एत ते ब्रूटस यानी, यू टू ब्रूटस!!!


4 टिप्‍पणियां:

raju ने कहा…

सटीक निरीक्षण. हर बात के साथ सहमति न हो तब भी अंदाज़-ऐ-नज़र की दाद देना चाहूँगा.

raju ने कहा…

अभिषेक श्रीवास्तव : इस ब्लॉग पर 'मटरू की बीजली का मंडोला' पर कुछ लिखा जाएगा यह उम्मीद थी/रहेगी.

Unknown ने कहा…

व्यालोक... बहोत कम लोग हैं जो इतनी अच्छी तरह से लिख पाते हैं... पढ़ने वालों को खीज नहीं होती... लिखते रहो...

avtansh chitransh ने कहा…

असरदार

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