4/30/2013

मराठवाड़ाः काल तुझ से होड़ है मेरी!

अप्रैल के तीसरे सप्‍ताह में मैं मराठवाड़ा के दौरे पर रहा। वहां जो कुछ देखा, सुना, समझा, वह राष्‍ट्रीय मीडिया में सूखे पर आ रही खबरों से मिलता-जुलता भी था और दूसरे स्‍तर पर बिल्‍कुल अलहदा भी था। इसे हम या तो मुख्‍यधारा के मीडिया की सीमाएं कह कर टाल सकते हैं या फिर घटनाओं की अधिकता और खबरों की अफरा-तफरी में एक ज्‍वलंत सामाजिक मसले को दरकिनार कर दिए जाने की सुनियोजित साजि़श के तौर पर भी देख सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में मराठवाड़ा का यथार्थ जो है, वह बदलता नहीं है। आगे जो कहानी मैं सुनाने जा रहा हूं, वह समकालीन तीसरी दुनिया के मई अंक में आवरण कथा के तौर पर प्रकाश्‍य है, लेकिन इस कहानी को जनपथ पर सुनाने के लिए 1 मई से बेहतर तारीख और नहीं हो सकती है। सात किस्‍तों में मराठवाड़ा की यह आंखों देखी कहानी उन लाखों गन्‍ना मज़दूरों को समर्पित है जो अपनी जि़ंदगी बचाने की जद्दोजेहद में  पश्चिमी महाराष्‍ट्र की दैत्‍याकार चीनी मिलों में काम करने को और अपना खून चूसने वाले दानवों को बार-बार वोट देने को मजबूर हैं क्‍योंकि मौत से बचने का उनके पास और कोई विकल्‍प नहीं।  



अभिषेक श्रीवास्तव
(औरंगाबाद, अहमदनगर, जालना, बीड, परभणी, नांदेड़ से लौटकर)

''शब्दों और उनके अर्थ का रिश्ता तकरीबन टूट चुका है। जिनके लेखन से यह बात झलकती है, वे आम तौर से एक सामान्य भाव का संप्रेषण कर रहे होते हैं- कि वे एक चीज़ को नापसंद करते हैं और किसी दूसरी चीज़ के साथ खड़े होना चाहते हैं- लेकिन वे जो बात कह रहे होते हैं उसकी सूक्ष्मताओं में उनकी दिलचस्पी नहीं होती।''

-जॉर्ज ऑरवेल, पॉलिटिक्स एंड दि इंग्लिश लैंग्वेज, 1946



अकाल! इस शब्द से जुड़ी छवियां क्या हो सकती हैं? शायद सबसे पहले केविन कार्टर की सोमालिया-1993 की मशहूर तस्वीर दिमाग में कौंध जाए जहां एक कुपोषित बच्चे को खाने के लिए उसकी ओर बढ़ता गिद्ध है। हो सकता है बंगाल के अकाल की कुछ छवियां हों या फिर कालाहांडी के जीर्ण-शीर्ण पुरुष, स्त्री और बच्चे। ऐसी पूर्वस्थापित छवियों से आगे बढ़ें तो इस साल की शुरुआत में समाचार माध्यमों में महाराष्ट्र के गांव के गांव खाली होने संबंधी आई खबरों से भी कुछ धूसर सी छवियां बनी होंगी। हमें बताया गया कि बांध सूख गए हैं, तो सूखे बांध की एक छवि ज़रूर दिमाग में होगी। अकालदरअसल काल की निरंतरता का निषेध है, अनवरत सामान्य से असामयिक विचलन है। इसलिए जब यह शब्द साथ लेकर आप बाहर निकलते हैं तो ऐसी ही अतिरेकपूर्ण और असामान्य छवियों की तलाश में जुट जाते हैं जिनसे पूर्वाग्रहों की गठरी और भारी होती हो। जॉर्ज ऑरवेल कहते हैं कि एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए तो फिर पलटती नहीं यानी हमारी चुनी हुई भाषा आने वाली छवियों को अपने हिसाब से गढ़ती है और बदले में छवियां हमारी भाषा को और भ्रष्ट करते जाती हैं। इस प्रक्रिया के तहत एक ही देश-काल के भीतर अकालकी खोज करना बाध्यता बन जाती है और हाथ से यथार्थ फिसल जाता है। मराठवाड़ा के बारे में अब तक जो कुछ भी हमें मुख्यधारा के माध्यमों में बताया गया, दिखाया गया या समझाया गया है, वह इसी मायने में संकटग्रस्त है, अधूरा है, संदर्भहीन है।

मराठवाड़ा में अकाल नहीं, दुष्काल है। यह शब्द वहीं का है। सारे मराठी लोग दुष्कालका इस्तेमाल करते हैं। मराठवाड़ा के छह जिलों को देखने-समझने के बीच एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी ने अकालका नाम गलती से भी लिया हो। अकालऔर दुष्कालदरअसल इस क्षेत्र को बाहर से और भीतर से देखने का मामला है। भीतर का आदमी खुद को कालबाह्य नहीं मान सकता। उसके लिए यह एक दौर है जो कुछ बुरी सौगातें लेकर आया है। जैसे आया है वैसे ही चला जाएगा। इसीलिए वह दुष्कालकी न तो किसी अतिरेकपूर्ण व्याख्या में विश्वास करता है, न ही उसके किसी इंकलाबी इलाज में। वह अपने अतीत से कोई सबक भी नहीं लेता। भविष्य के लिए कोई तैयारी भी नहीं करता। उसका वर्तमान दरअसल उसके तईं उसके अतीत का ही विस्तार है जहां पुराने अवसर भले गायब हों, लेकिन कुछ नए अवसर अचानक जिंदा हो गए हैं। इन अवसरों को उन्होंने पैदा किया है जो इसे अकालके रूप में देखते, सुनते और बताते हैं। इसीलिए यहां सारा मामला फिलहाल अवसरों को पकड़ पाने का बन जाता है। कह सकते हैं कि 2013 का मराठवाड़ा एक ऐसा विशाल और जटिल प्रहसन है जिसका हर चरित्र अपनी-अपनी भूमिका से बाहर है। हर कोई आधा दर्शक है और बाकी निर्देशक। इस प्रहसन के सर्वाधिक दिलचस्प, दर्दनाक और अनपेक्षित अध्याय से परदा उठता है जालना जिले में, जो मराठवाड़ा के सबसे बड़े शहर औरंगाबाद से करीब साठ किलोमीटर की दूरी पर है।

दुष्काल का प्रहसन

स्‍कूल के इकलौते बोरिंग से प्‍यास बुझाता पूरा गांव 
हमारी गाड़ी जहां रुकती है, ठीक वहीं पर करीब दो दर्जन औरतें और लड़कियां एक मोटे और काले से पाइप पर झुकी हुई हैं। करीब तीसेक बड़े-छोटे बरतन भरे जाने के इंतज़ार में एक-दूसरे से टकराकर भरी दोपहर में टन्न-टुन्न की बेतरतीब आवाज़ें पैदा कर रहे हैं। उनके पीछे विट्ठल मंदिर का बड़ा सा चबूतरा है जो तेज़ धूप को जलते हुए बल्ब से चुनौती दे रहा है। यानी बिजली भी आ रही है और पानी भी। दाहिने हाथ पर एक प्राथमिक पाठशाला है। यहां भी बल्ब जल रहे हैं। यह जालना के अम्बड़ तालुका का सोनकपिंपल गांव है। कहते हैं कभी यहां सोने का पीपल रहा होगा, आज हालांकि पूरा गांव सिर्फ एक बोरवेल से पानी भरता है जो स्कूल के प्रांगण में खुदा हुआ है। स्कूल प्रशासन जब चाहे तब मोटर चालू करता है और बंद कर देता है। उसी के हिसाब से लोग भी पानी भर लेते हैं। मराठवाड़ा-2013 की मशहूर परिघटना के रूप में बहुप्रचारित पानी का टैंकर यहां नहीं आता। ज़ाहिर है, किसी मेहमान के लिए ग्राम पंचायत से ज्यादा महत्व की चीज़ यहां का स्कूल है। बच्चे जा चुके हैं और शिक्षक काम निपटा कर अतिथियों का इंतज़ार कर रहे हैं। हमें यहां लाने वाले 28 वर्षीय युवा बाबासाहेब पाटील जिगे को स्थानीय लोग नेता मानते हैं। उन्होंने पहले ही प्रधानाचार्य को ताकीद कर दी थी, इसलिए हमें सीधे एक बड़े से सभागार में ले जाया जाता है और सबसे पहली सूचना यह दी जाती है कि मराठवाड़ा का यह पहला स्कूल है जहां एलसीडी प्रोजेक्टर से पढ़ाई शुरू हुई। सारी उंगलियां कमरे की छत की ओर मुड़ जाती हैं जहां एप्सन का एक प्रोजेक्टर लगा हुआ है। सामने की दीवार पर बड़ा सा सफेद परदा है। पहले से तय कार्यक्रम के आधार पर एक शैक्षणिक वीडियो हमें दिखाया जाता है जिसमें हृदय के काम करने के तरीके को एनिमेशन से समझाया गया है। वॉयस ओवर अमेरिकी अंग्रेज़ी में किसी विदेशी का है। कमरे के बाहर गांव के बच्चे उसे देखने के लिए इकट्ठा हो गए हैं और शिक्षक उन्हें हांकने और चुप कराने में जुटे हैं।

प्‍यासे गांव का नाम रोशन करता स्‍कूल 
‘‘क्या बच्चे यह भाषा समझ जाते हैं’’, हमने प्रधानाचार्य से पूछा। जवाब एक शिक्षक ने दिया, ‘‘हां, परदे पर देख कर लेसन जल्दी समझ में आ जाता है।’’ स्कूल का एक चक्कर लगाने के बाद हम चलने को होते हैं, तो स्कूल की ओर से एक शिक्षक श्यामजी उगले हमसे आग्रह करते हैं, ‘‘आप इस प्रोजेक्टर के बारे में ज़रूर लिखिएगा। मैंने उत्सुकता से पूछा, ‘‘क्यों? पानी के बारे में क्यों नहीं?’’ उनकी ओर से हमारे साथ आए जिगे जवाब देते हैं, ‘‘यह इस गांव की उपलब्धि है। विकास हो रहा है यहां। पानी का प्रॉब्लम तो हर जगह है न।’’ हम गाड़ी में चढ़ने को होते हैं कि इसी गांव के रहने वाले एक स्थानीय अखबार के पत्रकार धीरे से कान में फुसफुसाते हैं कि इस गांव में एक औरत ने पिछले महीने कर्ज के चलते खुदकुशी कर ली थी, उसके घर जरूर जाइएगा। हमने जिगे से इस बारे में जानने की कोशिश की, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। बोले, ‘‘ये सब छोटे पत्रकार हैं। अपने फायदे के लिए कुछ भी बोलते रहते हैं। इनकी बात पर ध्यान मत दीजिए।’’ 

पर्वताबाई अर्जुनराव डुबल 
वापसी में अम्बड़ तालुका के जिस बाजार में जिगे को हमसे विदा लेना था, वहां तक बात दिमाग में अटकी रही। उन्हें विदा करने के बाद हमने गाड़ी मुड़वाई और वापस चालीस किलोमीटर दोबारा सोनकपिंपल पहुंच गए। करीब दस साल के एक बच्चे से पूछने पर घटना सही निकली। पत्रकार का नंबर हमने एक दुकान से लिया, उसे बुलवाया और सीधे चल दिए उस घर की ओर जो विकास के प्रोजेक्टर से पूरी तरह गायब था। करीब सोलह साल का एक लड़का मुस्कराते हुए हमारी ओर आया। यह दीपक था। इस घर पर मौत की छाया साफ देखी जा सकती थी। ओसारे में एक महिला गेहूं फटक रही थी। बाजू में उसका छोटा बच्चा शांत बैठा था। यह दीपक की भाभी थी। दीपक और उसके बड़े भाई प्रभु की मां पर्वताबाई अर्जुनराव डुबल ने मार्च की 15 तारीख को ज़हर खाकर जान दे दी थी। सरकारी फेहरिस्त में जिन किसानों ने दुष्काल के कारण खुदकुशी की है, उनमें अब तक ज्ञात सारे नाम पुरुषों के हैं। पर्वताबाई की कहानी स्थानीय टीवी-9 चैनल पर आ चुकी थी, यह बात हमें दीपक ने गर्व से बताई। 

मृत पर्वताबाई के पति (बीच में) और दोनों बेटे 
इस परिवार पर करीब डेढ़ लाख रुपए का कर्ज़ है। खेती 12 एकड़ है, लेकिन सूखे के कारण तबाह हो चुकी है। आम तौर पर यहां छोटे किसान साहूकारों से कर्ज़ लेते हैं, लेकिन इस परिवार पर स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद का कर्ज़ था। सरकारी बैंकों के कर्ज़दारों का खुदकुशी कर लेना उतना आम नहीं है, खासकर जब वह महिला हो। पूछने पर दीपक कहते हैं, ‘‘मम्मी बहुत परेशान रहती थी, सारा काम वही करती थी, इसलिए उसने जान दे दी।’’ ‘‘आपके पिता क्या करते हैं’’, मैंने पूछा। ‘‘कुछ नहीं’’, और उसकी नज़र मेरे पीछे अचानक आ खड़े हुए खिचड़ी दाढ़ी वाले एक शख्स की ओर चली गई। यह अर्जुनराव डुबल थे, पर्वता के पति। हमने दो-तीन सवाल उनसे पूछे, उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। सिर्फ मुस्कराते रहे। उन्हें देखकर दीपक और प्रभु भी मुस्कराते रहे। अर्जुनराव सूरज ढलने से पहले ही नशे में थे। यह बात 16 अप्रैल की है, पर्वता की खुदकुशी के ठीक एक माह बाद।

हमारे पास पूछने को कुछ और नहीं था। स्थानीय पत्रकार सज्जन तब तक आ चुके थे। उनके चेहरे पर खुशी थी कि उनकी दी सूचना पर हम लौट कर आए। हमने इस बात पर अचरज ज़ाहिर किया कि इस गांव में हमें लाने वाले बाबासाहेब जिगे ने हमसे यह बात क्यों छुपाई। उन्होंने कहा, ‘‘बाबासाहेब को मैं अच्छे से जानता हूं। उसके लोग यहां के स्कूल में हैं, इसलिए आपको यहां लाया था। इसके पहले भी नागपुर की एक पत्रकार को ला चुका है। उसकी नज़र खराब है।’’ इस बात को समझने में हमें उतना वक्त नहीं लगा, हालांकि समझ लेने का पूरा दावा भी मुमकिन नहीं। दरअसल, गाड़ी में सुबह बातचीत के दौरान जिगे से हमने अचानक ही पूछ लिया था कि क्या उनकी शादी हो गई। उन्होंने कहा था, ‘‘दोबारा बनाना है न।’’ 

तब उसके बड़े भाई और जालना में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव देविदास जिगे भी हमारे साथ चल रहे थे। हमने विस्तार से जानना चाहा, तो अनमने ढंग से बाबासाहेब ने बताया कि शादी के एक महीने बाद ही उनकी पत्नी ने खुदकुशी कर ली थी। बात को संभालते हुए बड़े भाई देविदास ने कहा कि पूरे परिवार को उसने दहेज हत्या के केस में फंसा दिया है और आज तक तारीख पर जाना पड़ता है। रास्ते में देविदास के हमसे विदा लेने के बाद हम इस गांव में बाबासाहेब के साथ आए थे। तब उन्होंने उत्साहित होकर बताया था कि लड़की देखने उन्हें कल जाना है। कल फाइनल हो गया तो चार दिन में शादी बना लेंगे। ‘‘इतनी जल्दी?’’ वे बोले, ‘‘हां तो! क्या करना है? बीस आदमी को ही तो बुलाना है। पानी तो है नहीं गांव में कि बड़ा प्रोग्राम करें।’’

ऐसे में होने वाली शादियां जल्‍दी निपटती हैं 


4/29/2013

Bijnor Film Festival in memory of Dushyant Kumar


 4-5 May, 2013
Ejaz Ali Auditorium, Nagarpalika, Bijnor




आम लोगों के बीच सिनेमा के माध्‍यम से बदलाव की चेतना को ले जाने की अपनी सांस्‍कृतिक मुहिम के क्रम में 'अवाम का सिनेमा' ने इस बार बिजनौर की ऐतिहासिक धरती को चुना है। यहां आगामी 4-5 मई को कवि दुष्‍यंत कुमार की स्‍मृति में बिजनौर फिल्‍म फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है जिसमें कुछ युवा फिल्‍मकारों की बेहतरीन फिल्‍मों का प्रदर्शन किया जाएगा।

हिंदी जगत के साथ बिजनौर का रिश्‍ता सबसे मज़बूती से जोड़ने का काम कवि और शायर दुष्‍यंत कुमार ने किया था। वे इसी जिले के राजपुर नवादा गांव में पैदा हुए थे। आज चाहे सिनेमा हो या आंदोलन, हर जगह कवि दुष्‍यंत कुमार की गज़लें उनकी मौत के तीन दशक बाद भी लोगों की ज़बान पर चढ़ी हुई मिलती हैं। यह वर्ष कवि दुष्‍यंत कुमार का अस्‍सीवां जन्‍मवर्ष है और अवाम का सिनेमा बिजनौर फिल्‍म फेस्टिवल को उनकी स्‍मृति में समर्पित कर के गौरवान्वित महसूस कर रहा है।   


दुष्‍यंत की इंकलाबी ग़ज़लों की परंपरा को अगर हमारे समय में किसी ने भी आगे ले जाने का काम किया है, तो निर्विवाद रूप से उनमें बल्‍ली सिंह चीमा का नाम सबसे आगे आता है। 'ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के' नामक गीत आज पहाड़ से लेकर समुद्र तक देश में चल रहे जल, जंगल और ज़मीन के तमाम आंदोलनों का केंद्रीय प्रेरणा गीत बन चुका है। बल्‍ली दा के हाथों इस फिल्‍म महोत्‍सव का उद्घाटन अपने आप में दुष्‍यंत कुमार को एक श्रद्धांजलि होगी।

यह फिल्म उत्सव जिस दौर में हो रहा है, भारत के सत्ता तंत्र ने आम लोगों के सामने नई और कठिन चुनौतियां पेश कर रखी हैं। प्रतिरोध के स्वरों को या तो दबा दिया जा रहा है या फिर सत्ता उन्‍हें अपना गुलाम बना ले रही है। संस्‍कृति के मोर्चे पर हालत यह है कि कॉरपोरेट पूंजी और मुनाफे से चलने वाला मीडिया व सिनेमा जनता की चेतना को और कुंद किए दे रहा है। किसान, मजदूर, आम मेहनतकश के बीच चौतरफा पस्‍तहिम्‍मती का आलम है। अगले लोकसभा चुनाव के बाद आने वाले दिनों में देश की तस्‍वीर कैसी होने जा रही है, इसका सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। ऐसे कठिन वक्‍त में दुष्‍यंत और बल्‍ली दा की कविताएं जोर-जुल्म से टक्कर में सडकों पर दो-दो हाथ करने का हौसला आम मेहनतकश को देती हैं।

दुष्‍यंत कहते हैं, ''मेरी कोशिश है ‍कि ये सूरत बदलनी चाहिए'', लेकिन सूरत बदलने के लिए क्‍या ज़रूरी है उसका जवाब बल्‍ली दा ने अपनी एक मशहूर ग़ज़ल में दिया है- ''तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो, आदमी के पक्ष में हो या फिर आदमखोर हो।'' बिजनौर फिल्‍म उत्‍सव का उद्देश्‍य एक ऐसे सांस्‍कृतिक विकल्‍प का निर्माण करना है जो आदमी के पक्ष में और आदमखोरों के खिलाफ खड़ा हो, जो सिर्फ हंगामा खड़ा करने के बजाय सड़क से लेकर संसद तक समूची सूरत को बदलने का संघर्ष करता हो। हमारी कोशिश होगी कि फिल्मों, डाक्यूमेंटरी, पोस्टर और कला के विभिन्न माध्यमों के जरिये मौजूदा ज्वलंत सवालों को समझा जाए।

'अवाम का सिनेमा' चार और पांच मई को बिजनौर के सभी जनपक्षीय जनसरोकारी लोगों को इस फिल्‍म फेस्टिवल में आमंत्रित करते हुए हर्ष का अनुभव करता है। हमारा विश्‍वास है कि बदलाव की कोई भी प्रक्रिया लोगों को साथ लेकर ही आगे बढ़ सकती है। हमें उम्‍मीद है कि बिजनौर के अमनपसंद लोग हमारे विश्‍वास को बनाए रखेंगे। 


Screenings: 


The Man Who Moved The Mountain/Kundan Ranjan/26Min.

Synopsis: The Man who broke the mountain- Baba Dashrath Manji,a simple frail Bihari, was like any ordinary labourer eking out a meagre living from back-breaking work until an accident befell his family. His wife , who had to climb across a mountain, literally travel miles in order to collect water for drinking and cooking fell and broke the matka and also lost her life in the process. It was the most telling moment of Baba Dashrath Manji’s life. He realised that if a road was cut across the mountain, these sort of tragedies could well be avoided. He knew that petitioning the government would be to no avail. So he endeavored to undertake the phenomenal act himself. 

Painstakingly cutting the centre of the mountain down to size in a chisel and hammer career that lasted for 22 odd years. At the end of it, he had managed to carve a rough road of 1 km length between two villages which were seperated by a mountain width of over 80n kms. The village and the world around him recognised his incredible feat but his family remained impoverished. When he was offered a house by the state government of Bihar, he asked them whether the offer was only for him or for his entire village. Within days the state governmenmt allotted 22 houses for the whole village. His family’s grouse is that he never asked for anything for them. But Manji’s counter is that the whole state is his home and every child within is his child. So how can he ask for anything just for a few members of his family.

But this is something that can never be redressed. Great people almost always are known to have neglected their families. Baba is no different. But Baba could not be reigned in even after completing his most incredible feat. He next decided to build a brif\dge over the river that cost his villagers their lives when in spate. For this purpose he walked 1100 miles all the way to Delhi, along the railway tracks in order to get the central government to sanction money for the bridge. The central government was humbled into acquisence. But Baba did not live long enough to fulfill all his dreams. He wanted to create a resource centre for granting jobs to the youth from the state. Baba Manji’s dream may remain unfi\ulfilled but his single most path-breaking feat will remain in the hearts and minds of his villagers for years to come! 




The Vehicle With the Soul of a Man/Balaka Ghosh/19Min.

Synopsis: In the Himalayas, at a height of 4000 metres, one of the holiest places of Hinduism is located: Kedarnath, or Shiva’s grave. Every year, thousands of pilgrims visit this place, but the road to the sanctuary leads along a narrow path that rises very steeply for fifteen kilometres. Most pilgrims literally have themselves carried up the mountain. There are two kinds of sedan chairs: the dandi with four bearers and the pitthu with a single bearer who carries the pilgrim in a basket on his shoulders.


Ram Bahadur is one of these pitthu bearers, hauling up pilgrims six months a year like a human vehicle, in order to earn enough money for the whole year. His slow upward gait looks like a religious ritual and is shown without any comment or interviews, but with solemn background music. A visual account of a serene trip that is made silently through a gorgeous stretch of unspoilt nature.



Swaraj (The Little Republic)/ Anwar Jamal/90Min.

Synopsis: The film is about a small village community in Rajasthan, India, where not only the low castes but even the women have little say in the affairs of the village. Four strong-willed women come forward through the democratically elected panchayats (village councils) to change the way their lives are run by the patriarchs of the community. It is a microcosm of democratic process, a parable for the world today.


My Body My Weapon/Kavita Joshi/11Min.

Synopsis: Irom Sharmila is a young woman of Manipur who has been on a fast-to-death for nearly 7 years now. She has been demanding the removal of a brutal law from her land. Manipur is a north-east Indian state (bordering Myanmar), riven for decades by insurgency and armed separatist movements. The Government of India has attempted to control the situation militarily, granting drastic powers to the security forces. The Armed Forces (Special Powers) Act enforced in the region lets people be arrested, shot and even killed - on suspicion alone. But Sharmila is willing to stake everything – even her life – to restore justice and dignity to her people.


Floating Lamp of the Shadow Valley/Harry Bal, Rajesh S. Jala/64Min

Synopsis: More than 80,000 dead, over 350,000 driven away from their homes, more than one million mentally disabled and over 400,000 security officers. This is the sad state of affairs in Kashmir, the much-disputed province on the border of India and Pakistan. The rigid opening statement of this otherwise hopeful portrait contrasts sharply with the almost idyllic scenes that follow: the gorgeous scenery of the region, delicate and robust at the same time, and a nine-year-old boy who canoes up and down the lake as a ferryman. The boy's life story is less idyllic, a voice-over tells us. He lives with his three little brothers, sister and mother in a small hut on the bank of the river. Arif talks candidly about his situation. The conflict over Kashmir does not only play a role in the background of this film - sometimes, it affects Arif's life directly. His father was one of the fighters (terrorists, Arif calls them), and on his way to his aunt's house, he witnesses some bloody fighting. And he does not escape the devastating earthquake in 2005, either: his house sustains heavy damages. Nevertheless, Arif keeps on working imperturbably on a better future for his mother, brothers and sister.

Charandas Chor (Charandas the Thief)/ Shyam Benegal/156 min

Synopsis: The film is derived from a classic folk tale, originally narrated by Vijaydan Detha, and interpreted as folk play by Habib Tanvir. The film charts the tumultuous life of a petty thief, Charandas (Lalu Ram). Curiously he is a man of principles – an honest thief with a strong sense of integrity and professional efficiency. He makes four vows to his Guru, that he would never eat in a gold plate, never lead a procession that is in his honour, never become a king and never marry a princess, thinking all of them are far out possibilities for him. Later, his guru adds a fifth one - never to tell a lie and sets him of on his life's journey which leads him to a kingdom, where the turn of events make him famous, and eventually he is offered the seat of political power which he has to refuse. Later, the local princess (Smita Patil) gets enchanted by him, and proposes to marry him. This is when his refusal costs him his life. As he is put to death, he illustrates the inherent paradox in human existence, where truthful existence becomes an impossibility, for the truthful and the accidentally truthfuls, alike.      


Little Terrorist/Ashvin Kumar/15 min

Synopsis: The movie revolves around Jamal (played by Salim), a 10 year old Pakistani Muslim boy. While playing cricket near the Indo Pakistani border, the cricket ball is tossed over to the Indian side of the border separated by a fence.

Jamal crosses the fence to fetch the ball. He is however spotted by the Indian security forces and shot at. He hides in an Indian village where he is provided shelter by Bhola (Sushil Sharma), a devout Hindu Brahmin. Both Bhola and his niece, Rani (Megnaa Mehtta), are sceptical about allowing a Muslim boy in their home.

However, when the security forces come looking for Jamal in the village, he is protected by Bhola and Rani. Jamal does manage to return to Pakistan in the end.


MOMBATTI/ Puneet Prakash/ 21M 30Sec.

Synopsis: The film tries to take you in the life of the family of an ignored policeman who died in the line of duty.

Pintu, a 10-year-old boy from a small village in the interiors of India takes his father, a policeman as a hero. He dies in a confrontation with Naxalites.

He is very disappointed when he sees on television how the Shaheeds of 26/11 attacks in Mumbai are given respect and their families are honored while his family and father are being ignored by the society and the system.

What will Pintu do? Will he come to the terms with the ignorance of the society for his family's sacrifice, will he fight back or will he do something that no body ever expected from a 10-year-old boy. It is the story of innocence, determination, courage and growing up of Pintu.


My Friend Heera/ Amit Gupta/ 19 min 58 sec

Synopsis: Set in one of the villages of the North Indian Plains, the film takes us beyond the boundaries of inter-human relationships. Rahee, the protagonist of the film, is a seven year old boy who is no different from the other village boys of his age. Sometimes it is his mischievousness that puts him at bay with the villagers, other times it is his excellence that makes his friends envy of him. Also his carefree nature quite often lands him in trouble at home too. Finally he finds solace in Heera, a mango tree stood at some distance from his home. Friendship with Heera takes Rahee onto a journey where he gets the chance to interact with Nature. He experiences the moments he had remained untouched with, almost like everyone, despite living in the same surroundings. Gradually their friendship develops into an inseparable bond, inspiring the other village boys to join them. But Time had some other plans to disclose. The arms of love that had stretched further to spread its warmth get chopped off. Practicality wins over sentiments. Heera dies, leaving behind his memories to live up with. But this does not stops Rahee from growing further. His progressive step towards life becomes the real crux of the whole film.


For queries contact:

Shah Alam
(Cinema Activist)DIRECTORATE OF FILM FESTIVALS320 SARYU KUNJ DURAHI KUWAAYODHYA-224123 (UP)www.awamkacinema.org+91 9454909664


4/25/2013

ADB Quit India! Quit Asia!





Our planet is not for sale!
ADB Quit India! Quit Asia!




We, peoples’ movements, mass organisations, struggle groups, trade unions, community organisations and many others from India and the Asia-Pacific region, call for a protest against the 46th Annual Board of Governors’ Meeting (AGM) of the Asian Development Bank (ADB) in Greater Noida, Delhi during May 2-5, 2013. The AGM will make decisions on key development issues for the Asia-Pacific region, that will affect all of us now and in the future.  India, which is touted as ‘the emerging power in the region’ and in the ADB, is hosting the AGM for the third time to showcase and endorse a ‘development through empowerment’ model put forth by the ADB. In fact, over the years, the Indian ruling class has been working hand in glove with the ADB in a mutually beneficial complicity at the expense of hundreds of millions of poor, marginalised and other toiling sections of the society.

The ADB has earned the notorious title of actually being an “Anti-human Destructive Bank,” whose devastating acts are not limited to India, but are evident across the Asia-Pacific region and also at the global level in collusion with the World Bank, International Monetary Fund (IMF) and other institutions of global capitalism. Likewise, our protest and resistance is not limited to the ADB but extends to all International Financial Institutions (IFIs) whose primary missions are to appropriate and commodify the natural, human and social wealth of the planet, and force nations into indebtedness and political subordination.

A self-acclaimed "development" financial institution, the ADB claims to combat poverty in the region. But its poverty reduction strategy is merely a masquerade for prescribing  a doomed model of rapid economic growth powered by the privatisation, commodification and financialisation of natural resources and basic needs like water, power, education, etc.  Under the guise of “good governance,” the ADB supports profit-mongering, un-accountable and non-transparent private sectors. The Long-Term Strategy Framework (Strategy 2020) of the Bank is a recipe for the transfer of wealth, means and capacities from the poor and middle classes to the wealthy, upper classes. Using grand slogans such as ‘inclusive growth’, ‘environmental sustainability’ and ‘regional integration’, the Strategy 2020 focuses on private sector development and explicitly advocates private sector participation in ADB and borrower operations. In 2011, the Bank spent nearly $6 billion as private sector finance. Not surprisingly, in India the number of billionaires rose from 2 with a combined worth of $2 billion in the mid-1990s, to 46 in 2012 with a total net worth of $176 billion!

With nearly $22 billion in annual financial investment for nearly 350 projects (loans, grants, equity investments and Technical Assistance) in Asia-Pacific, governments have given the ADB a mandate to direct the development path for the region.  Under the pretext of addressing environmental and climate crises and alleviating poverty, the ADB continues to displace and alienate large numbers of people from their lands, homes, water sources and forests, and violates their rights to livelihood, ctizenship and participation in decision making.

Join hands against the ADB AGM

While it is our governments who borrow, the onus of debt repayment falls on the public exchequer and the people of the country, and is transferred to subsequent generations and the environment. Debt repayment depletes scarce foreign exchange reserves, and redirects national revenues away from spending on essential public goods such as education, health, housing, water, sanitation, electricity and job-creation towards servicing an upward spiralling illegitimate debt.

The struggles, movements and campaigns against ADB funded projects in West Bengal, Chhattisgarh, Odisha, Tamil Nadu, Kerala, Karnataka, Gujarat, Maharashtra, Jharkhand, J&K, Himachal Pradesh, and the North Eastern States take this opportunity to expose the ADB’s collusion with the Indian Government to enable the concentration of wealth, resources and capacities in the hands of the economic-political elites. People led by vibrant struggles in these states to halt nuclear power, land and water grabbing, forced evictions, anti-people laws, farmers suicides and environmental destruction send out this appeal to challenge the asymmetrical, ill-designed and anti-people development prescriptions of the ADB.

The 2013 ADB AGM in Delhi offers a much-needed opportunity for us to come together to expose the destructive developmental model promoted by the ADB and our governments. We invite all of you to join us in voicing our opposition to institutions like the ADB, which mutilate our democratic institutions, perpetrate untold violence on our societies and foster continuing marginalization and pauperization of our peoples.

ADB QUIT INDIA! QUIT ASIA!

PEOPLES FRONT against IFIs (International Financial Institutions)

  




***************************DRAFT PROGRAMME******************************************
PEOPLES
FORUM against IFIs - May 2013, New Delhi
organised by: Peoples Front against IFI's
Venue: Auditorium - YMCA, Greater Noida (http://newdelhiymca.in/gnpc.php)
2 May 2013 (Thursday) - "ADB: Quit India & Asia!"
08.30 am: Demonstrations & protest meetings outside ADB-AGM venue (Greater Noida)
Protest demonstrations, public meetings etc. in different parts of India

OPEN FORUM: 01.30 am - 05600 pm: Understanding the Political Economy of IFIs

3 May 2013 (Friday)
08.30 am - 09.30 am: Demonstrations outside ADB-AGM venue
11.00 am - 01.30 pm: Panel on "ADB vision & mission - Alienating people and urban poor, encouraging private capital"
02.30 pm - 05.30 pm: Panel on "Contributing to Climate Change - ADB's Climate Hypocricy"

4
May 2013 (Saturday)
08.30 am - 09.30 am: Demonstrations outside ADB-AGM venue
11.00 am - 01.30 pm: Panel on "ADB & natural resources: Resisting ADB's privatisation agenda"
02.30 pm - 05.30 pm: Panel on "Are IFI's accountable to citizen's & democratic institutions? Trade Unions and political parties demanding public oversight and social audit of IFI projects & programs"

5 May 2013 (Sunday)
08.30 am - 09.30 am: Demonstrations outside ADB-AGM venue
11.00 am - 02-00 pm: Concluding Open Session: "Ways forward in resisting IFIs - the struggle continues"
VIBGYOR - mini film festival: "Celebrating Resistances against IFIs & Globalisation" curated by film-maker K P Sasi: 2 May - 4 May: 2.00 pm to 08.00 pm in "Meeting Room - P4"

Secretariat:
Indian Social Action Forum (INSAF),New Delhi, India, www.insafindia.net

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