5/13/2013

मार्क्‍स के बहाने: एक थी हेलन और एक था फ्रेडी


पिछले कुछ वर्षों के दौरान, खासकर 2008 में आई वैश्विक मंदी के बाद से कार्ल मार्क्‍स को खूब याद किया गया है। जिसकी जैसी चिंताएं, उसके वैसे आवाहन। एक बात हालांकि सारे आवाहनों में समान यह रही है कि मार्क्‍स को एक व्‍यक्ति के तौर पर याद नहीं किया गया। उसकी एक स्‍वाभाविक वजह यह है कि जब विचार, व्‍यक्ति से बड़ा हो जाता है तो व्‍यक्ति के बारे में बात करना गौड़ हो जाता है। बावजूद इसके, एक व्‍यक्ति के निजी जीवन प्रसंगों और सार्वजनिक जीवन में उसके प्रतिपादित दर्शन के बीच का विपर्यय हमेशा से आम पाठक की दिलचस्‍पी का विषय रहा है। हमेशा कुछ उत्‍साही जन हिटलर से लेकर सार्त्र और गांधी से लेकर नेहरू तक के निजी जीवन प्रसंगों में खुर्दबीन करते मिल जाएंगे। ऐसे लेखन का उद्देश्‍य तो बहुत साफ नहीं होता, अलबत्‍ता उक्‍त शख्सियत के प्रति एक प्रच्‍छन्‍न संदेह अवश्‍य होता है जो उसे सामान्‍य मनुष्‍य न मानते हुए एक आदर्श के खांचे में फिट करने और ऐसा न कर पाने के चलते उसके प्रति उपजी अवमानना से शायद पैदा होता हो। 
ऐसा ही एक लेख पत्रकार विश्‍वदीपक लेकर आए हैं कार्ल मार्क्‍स के बारे में। विश्‍वदीपक पिछले दिनों जर्मनी में नौकरी कर रहे थे, जहां से उन्‍होंने मार्क्‍स के बारे में कुछ सूचनाएं जुटाई हैं जो सामान्‍यत: हिंदी के पाठकों के लिए नई कही जा सकती हैं। इस लेख में कार्ल मार्क्‍स की एक ''अवैध'' संतान के बारे में जानकारी दी गई है और उसके माध्‍यम से मार्क्‍स के मुक्ति के दर्शन पर सवाल उठाया गया है।   प्रेम, विवाह, यौन संबंध या किसी भी निजी प्रसंग का किसी व्‍यक्ति की राजनीति से कितना लेना-देना है, यह सवाल उतना ही पुराना है जितना पुराना ''विचार'' है। एक मनुष्‍य के भीतर और बाहर सब कुछ ''होमोजीनियस'' होने की मांग कितनी मानवीय है, एक सवाल यह भी है और उतना ही पुराना है। इन अनसुलझे सवालों के बीच ऐसे लेखों और सूचनाओं के प्रकाशन के संदर्भ में बस एक खतरा यह बना रहता है कि इस संकटग्रस्‍त और मनुष्‍यरोधी समय में बाड़ के उस पार घात लगाए बैठे कुछ शिकारी निजी प्रसंगों का इस्‍तेमाल कहीं विचारधारा के खिलाफ विषवमन के लिए न करने लग जाएं। ऐसे लोकप्रियतावादी लेखन के संदर्भ में इन खतरों की वास्‍तविकता के प्रति हमें हमेशा सजग रहना होगा। (मॉडरेटर)    



इसका संबंध प्रेम से है। इसका संबंध इतिहास के पुनर्लेखन से है। इसका संबंध पत्नी से बेवफाई, राज्य- परिवार और संपत्ति की अवधारणा (फ्रिडरिश एंगेल्स की किताब का नाम) से है। इसका संबंध इतिहास के प्रखरतम विचारक कार्ल मार्क्स से है। "दास कैपिटल" के लेखक कार्ल मार्क्स को लोग मुक्ति का मसीहा मानते हैं, खासतौर से उनके अनुयायी। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मसीहा भी आखिरकार इंसान ही होता है। देवत्व का आरोपण किसी विचारक को प्रश्नातीत बना सकता है, पर क्या भगवान की मानवीय कमज़ोरियों को इतिहास भुला सकता है? शायद नहीं। जितनी बड़ी भगवत्ता होगी उतना ही बड़ा प्रभाव भी होगा।

जर्मनी के ऊंघते हुए शहर ट्रियर में पैदा हुए कार्ल मार्क्स के बारे में भारतीय वामपंथ का रवैया जितना पुराना है उतना ही अतार्किक और कृपण भी है। किसी पौराणिक आख्यान में वर्णित भगवान-भक्त संबंध से परे शायद मार्क्स को समझने की कोशिश नहीं की गई। अगर की गई होती तो मार्क्स के प्रति मुख्यधारा में अछूत-दुश्मनी का भाव या तो नहीं होता या कम होता। तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना के विकास के तमाम दावों के बाद भी (सांस्थानिक) मार्क्सवादियों के बीच पसरी कट्टरता की वजह यही व्यक्तिवादी अंध आस्था है। मूल रूप से धार्मिक इस प्रवृत्ति ने कई ''मार्क्सवादी ब्राह्मणों-राजपूतों'' को जन्म दिया है जिसका इतिहास पर क्या असर हुआ है, इसका समुचित अध्ययन किया जाना बाकी है।

ज्यादातर लोग जानते हैं कि मार्क्स कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के रचयिता थे। रूस, चीन, क्यूबा जैसे देशों की क्रांतियां मार्क्स के सिद्धांतों (भले ही न्यूनतम) की रोशनी में पूरी की गईं। दुनिया का सबसे लोकप्रिय नारा- ''मजदूरों एक हो जाओ तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है''- ये भी मार्क्स का दिया हुआ है। पर क्या मार्क्स का होना इसी के इर्द-गिर्द था? मार्क्स का जन्मस्थान और उनके विकास को देखने के बाद तो यही लगा कि बिल्कुल नहीं। 

मार्क्स की क्रांतिकारी सोच स्वप्नदर्शिता, संवेदना की राह तक जाने वाली भावुकता की बुनियाद पर खड़ी हुई थी। यह बात अलग है कि "भावुकता" को मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र में बुरी तरह खारिज किया गया। धीरे-धीरे यह प्रक्रिया इतनी जड़ हो गई कि संवेदनशीलता को भी भावुकता का पर्याय समझा जाने लगा। पूंजीवाद के रहस्यों से पर्दा उठाकर क्रांति का सूत्रपात करने वाले मार्क्स का जीवन विपर्यय, त्रासदी और संघर्षशीलता की अजब खिचड़ी था।

विपर्यय ये कि मार्क्स निजी जीवन में संतान, नैतिकता, प्रेम, परिवार, यौन संबंध आदि विषयों पर उसी तरह की सोच रखते थे या उसी बचाव-दुराव से ग्रस्त थे जो हिंदुस्तान के किसी भी मध्यवर्गीय क्रांतिकारी में देखी जा सकती है (यहां जर्मनी और भारत का क्रांतिकारी एक है) जबकि सोच के स्तर पर वे सर्वहारा क्रांति की रोशनी में हर तरह के स्तंभ (पूंजीवादी) को ढहाने के लिए प्रयासरत थे।

मार्क्‍स की नौकरानी डेमुथ 
फ्रेडी उर्फ हेनरी फ्रिडरिश डेमुथ को कितने लोग जानते हैं? इस शख्स का नाम मार्क्सवादी बैठकखानों में भी कम ही लिया जाता है। जो जानते भी हैं वे इस पर मौन रखते हैं या फिर इसकी चर्चा कम करते हैं। इतिहास के अंधेरे में विलीन डेमुथ वो नाम है जिसे मार्क्स की अवैध संतान कहा जाता है। कार्ल मार्क्स की उनकी नौकरानी हेलन के साथ यौन संबंध थे और उसी से पैदा हुआ था डेमुथ, हालांकि मार्क्स ने इस बात को स्वीकार कभी नहीं किया। माना जाता है कि एंगेल्स को भी मार्क्स के इस प्रेम संबंध के बारे में पता था लेकिन मार्क्स की प्रतिष्ठा और कम्युनिस्ट आंदोलन के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एंगेल्स इस मसले पर अंतिम दम तक चुप्पी बरकरार रखी। मौत से कुछ समय पहले उन्होंने मार्क्स की बेटी एलिनॉर के सामने इसका जि़क्र किया था (जर्मनी के समाजवादी नेता कार्ल काउट्स्की की पत्नी लुइस फ्रे बर्गर ने 2-4 सितंबर 1898में लिखे पत्र में इसका जिक्र किया है)।

सवाल घरेलू नौकरानी के साथ यौन संबंध की वजह से मार्क्स को नैतिकता के कठघरे में खड़े करने का नहीं है। सवाल कर्तृत्व के बारे में जिम्मेदारी का है (भारतीय वामपंथ के गैर-जिम्मेदाराना रवैये और नकारोक्ति के मूल बीज यहां देखे जा सकते हैं)। गांधी इसी बिंदु पर मार्क्स से अलग और संभवत: बड़े हो जाते हैं। गांधी ने जो भी किया उसकी जिम्मेदारी ली। प्रयोग करते रहे और परिणामों की विवेचना कर खुद को दुरुस्त करते रहे। नीत्शे के अलावा गांधी दुनिया के दूसरे विचारक हैं जो खुद को काटते रहे। गांधी एक शख्सियत से ज्यादा जीते जी एक सतत प्रक्रिया बन गए थे।

हेलन डेमुथ को लेकर अगर मार्क्स के चरित्र का मूल्यांकन किया जाए तो वे भारतीय परंपरा के धीरोदात्त नायक नजर आते हैं- अध्ययनशील, तार्किक, धैर्यवान लेकिन अदृढ़। हेलन के साथ संबंधों को लेकर उनका रवैया खासतौर से अस्पष्ट और ढुलमुल था। मार्क्स की पत्नी जेनी हमेशा उनके साथ रहीं। मार्क्स उन्हे बेइंतहा प्यार भी करते थे। लड़कपन से ही दोनों का प्यार था फिर भी मार्क्स और हेलन के बीच प्रेम संबंध बने। क्यों? साहचर्य, संवेदनशीलता और यौनाकर्षण इसकी वजहें हो सकती हैं। पता नहीं नारीवादियों का ध्यान हेलन की ओर गया है या नहीं। कार्ल मार्क्स जैसी शख्सियत को बचाने के लिए चुपचाप उपेक्षा और तिरस्कार सहने वाली हेलन का मूल्यांकन नारीवादी विमर्श के लिए एक अच्छा विषय हो सकता है।

हेलन मार्क्स की घरेलू नौकरानी थी लेकिन उसका काम मालकिन जैसा था। वह मार्क्स के बेटे-बेटियों और नाती-पोतों (मार्क्स की बेटियों जेनी और लॉरा के बच्चों) को संभालती थी और घर का हिसाब किताब भी रखती थी। वह मार्क्स के ससुराल से आई थी- बहुत खूबसूरत तो नहीं लेकिन आकर्षक जरूर थी। जो विवरण मिलता है उसके मुताबिक वह पढ़ी-लिखी और विनोदी स्वभाव की थी। लोग उसे निमी कहकर भी बुलाते थे। शायद मार्क्स को उसका मज़ाकिया लहजा ही सबसे ज्यादा पसंद आता था। हमेशा किताब और पढ़ाई-लिखाई में डूबे रहने वाले मार्क्स के लिए हेलन उदासीन दिनचर्या में एक बदलाव की तरह थी।

मार्क्स के सास-ससुर ने हेलन को जेनी की देखभाल के लिए उसके साथ भेजा था। जब वह छोटी थी तब जेनी के घर में नौकरानी बनकर आई और जीवन भर उसके साथ रही। 1840 में जब मार्क्स ब्रसेल्स में थे तब वह भी मार्क्स परिवार की देखभाल के लिए ब्रसेल्स आ गई थी। इसके बाद आखिरी सांस तक साये की तरह मार्क्स के साथ ही रही। मार्क्स की मौत हो गई तो वो रहने के लिए एंगेल्स के घर आ गई जहां वो आखिरी वक्त तक रही। सत्‍तर साल की उम्र में जब वह मर रही थी तब मार्क्स से पैदा हुआ उसका बेटा फ्रेडी करीब 40 का हो रहा था। यानी हेलन 30 की रही होगी जब मार्क्स और उसके बीच प्रेम संबंध बने थे।

कार्ल मार्क्‍स की वंशावली 
यह पता नहीं चल सका है कि हेलन ने फ्रेडी को उसके बाप के बारे में बताया था या नहीं लेकिन कहा जाता है कि फ्रेडी अपने पिता के बारे में किसी से बात करना पसंद नहीं करता था। उसके जन्म प्रमाण पत्र में भी पिता का नाम नहीं लिखा गया था। फ्रेडी की मुसीबतों का सिलसिला जन्म के बाद से ही शुरू हो गया था। पैदा होने के बाद से ही उसे मां से अलग कर दिया गया था क्योंकि मार्क्स नहीं चाहते थे कि कुंवारी नौकरानी के बेटे की परवरिश उनके घर में हो। दूसरा मामला आर्थिक कठिनाई का था। मार्क्स खुद अपने खर्चे-पानी के लिए एंगेल्स पर निर्भर थे, ऐसे में एक और बच्चे का लालन-पालन उनके वश में कतई नहीं था।

यहां पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि हेलन ने आखिर क्यों अपनी ममता की कीमत पर मार्क्स परिवार को तवज्जो दीक्यों उसने मां के बजाय नौकरानी बनकर जीना उचित समझा? कहते हैं मार्क्स परिवार हेलन जैसी वफादार नौकरानी को नहीं खोना चाहता था और हेलन मार्क्स परिवार के घर से मिल रही आजीविका को। आज जबकि न मार्क्स हैं, न हेलन और न फ्रेडी, यह समझना आसान लगता है कि मार्क्स के घर में हेलन के बने रहने की वजह सिर्फ वफादारी नहीं बल्कि उसका समर्पण भी था (मार्क्स के प्रति?)।

फ्रेडी को जन्म के बाद पालन-पोषण के लिए दूसरों के दे दिया गया था लेकिन मार्क्स के घर उसका आना-जाना बना रहता था। कहते हैं मार्क्स के घर में जब भी फ्रेडी आता था उसे पिछले दरवाजे से ही घर के भीतर जाने की इजाज़त थी। वह सामने वाले दरवाज़े से नहीं जा सकता था। मार्क्स की बेटियों से फ्रेडी का दोस्ताना था। सबसे छोटी बेटी एलिनॉर तो खासतौर से उसे लेकर चिंतित रहती थी। इस बारे में वह अपनी बहनों से जब-तब पत्र व्यवहार भी किया करती थी। एक बार उसने 1892 में लॉरा (मार्क्स की दूसरी बेटी) को लिखा थाहो सकता है मैं बहुत भावुक होऊं लेकिन मैं यह कहने से खुद को नहीं रोक सकती कि फ्रेडी के साथ बहुत अन्याय हुआ है।

यही अन्याय वो शब्द है जिसके आधार पर कहा जाता है कि एलिनॉर को इस बात की जानकारी थी कि फ्रेडी के पिता कार्ल मार्क्स ही थे। यह दावा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि एलिनॉर ही एंगेल्स की मौत के वक्त मौजूद थी। मौत से पहले एंगेल्स ने कागज़ के एक टुकड़े पर लिखकर बताया था कि मार्क्स ही फ्रेडी के पिता थे, हालांकि इस बारे में पुख्ता सबूत आज तक नहीं मिले हैं। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि इससे संबंधित सभी सबूत एंगेल्स ने नष्ट कर दिए थे। इस दावे में दम लगता है क्योंकि ऐतिहासिक महत्व की छोटी-छोटी बात को सहेजकर रखने वाले एंगेल्स ने इतनी बड़ी बात की उपेक्षा कैसे कर दीयह समझ नहीं आता। कहा तो ये भी जाता है कि एंगेल्स ने मरने से पहले यह रहस्योद्घाटन इसलिए किया ताकि फ्रेडी के मामले में उनका दामन साफ रहे। कम से कम उन्हें फ्रेडी का पिता न समझा जाय। 

अब जबकि फिर से इस बारे में लिखा जाने लगा है, फ्रेडी के प्रति मार्क्स की उपेक्षा को इतिहास कैसे याद रखेगा एक सवाल यह भी बनता है। क्या मजदूर वर्ग की मुक्ति की बात करने वाले मार्क्स के मन में फ्रेडी की मुक्ति की बात कभी आई थी? (फ्रेडी भी मजदूर ही था) क्या समानता और साम्यवादी राज्य की परिकल्पना पेश करने वाले मार्क्स ने भी फ्रेडी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कोई योजना बनाई थी? मार्क्स, फ्रेडी के प्रति क्या सोचते थे यह स्पष्ट नहीं है। हां, एंगेल्स ज़रूर फ्रेडी से खूब कुढ़ते रहते थे। हो सकता है इस वजह से कि मार्क्स के कहने पर उन्हें फ्रेडी का खर्चा भी उठाना पड़ रहा था।

मार्क्स का रवैया सिर्फ फ्रेडी के प्रति ही अन्यायकारी नहीं था। वे अपनी बेटियों के प्रति भी उदार नहीं थे- एक हद तक मर्दवादी सोच से ग्रस्त। बेटियों के जन्म की सूचना मार्क्स ने एंगेल्स को जिन शब्दों में दी है उससे साबित होता है कि मार्क्स का मन लड़के और लड़कियों में विभेद करता था। तीसरी संतान के जन्म के समय मार्क्स ने एंगेल्स को लिखा, अफसोस, मेरी पत्नी ने एक बार फिर बच्चे के बजाय बच्ची को जन्म दिया है। और इस पर भी अफसोस की बात ये है कि वो बहुत कमज़ोर है।

सबसे छोटी बेटी एलिनॉर 'टुसी' मार्क्‍स 
मार्क्स की सबसे छोटी बेटी एलिनॉर का प्रेम संबंध भी मार्क्स की अकड़ की भेंट चढ़ गया था। मार्क्स को अपनी बेटी का प्रेम संबंध मंजूर नहीं था। वह एक फ्रांसीसी इतिहासकार ओलिवियर लिसागारे (पेरिस कम्यून का इतिहासकार) से शादी करना चाहती थी। दस साल तक ओलिवियर का उसके साथ प्रेम संबंध भी चला लेकिन मार्क्स इसके खिलाफ थे। आखिरकार, एलिनॉर मार्क्स की इच्छा के आगे झुक गई और उसने अपने संबंध खत्म कर लिए। इसके बाद वह ब्रिटेन के मजदूर आंदोलन में काम करने वाले एडवर्ग एवेलिंग के संपर्क में आई। बीमारी, प्रेम विच्छेद और हताशा से आजिज़ आकर 1898 में उसने आत्महत्या कर ली। क्या एलिनॉर जिंदा रहती अगर वह अपने मन से शादी कर पाती

इतिहास सवाल पूछने का मौका देता है, मनमाफिक व्याख्या की भी इजाज़त देता है, लेकिन फिर से उसी बिंदु पर पहुंचने की इजाज़त नहीं देता जहां से यात्रा शुरु हुई थी। हेलन ने अपनी जीवन यात्रा जेनी (मार्क्स की पत्नी) के घर से शुरू की थी और समाप्ति एंगेल्स (मार्क्स के दोस्त) के घर पर हुई। दोनों के बीच उसे मार्क्स मिले थे, और मिली थी मार्क्स की प्रेम निशानी। मरने के बाद हेलन ने अपनी कुल संपत्ति (महज 95 पाउंड) फ्रेडी के लिए रख छोड़ी थी। मार्क्स से दो साल छोटी हेलन जब मर रही थी तब उसके पास कुछ नहीं था सिवाय एक तमन्ना के, और वो ये कि मरने के बाद उसे मार्क्स के बगल में दफनाया जाए। मार्क्स के प्रिय मित्र एंगेल्स ने उसकी इस आखिरी ख्वाहिश को पूरा किया।

बकौल गालिब: 

ये मरना ये कफन ये कब्र तो रस्म-ए-शरीयत है ग़ालिब 
मर तो हम तब गए थे, जब हसरत-ए-इश्क दिल में जगी थी...

18 टिप्‍पणियां:

अनिता भारती (Anita Bharti) ने कहा…

बेहद अच्छा आलेख- मार्क्स के व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता हुआ। शुक्रिया विश्वदीपक.

कृति ने कहा…

इस लेख का प्रयोजन समझ में नहीं आया.
कृति
http://kritisansar.noblogs.org/

एक मार्क्सवादी ने कहा…

न कोई सन्दर्भ, न किसी के हवाले से कोई बात। बस जो मन किया लिख दिया। लिखने वाला तो पहले से ही गधा था छापने वाला उससे भी बड़ा निकला। खैर, रब रक्खा।
एक मार्क्सवादी

Ramji Yadav ने कहा…

इस लेख को किस संदर्भ से पढ़ा जाय ? क्या इसे पढ़ने के बाद पूंजीवाद और असमानता के खिलाफ सोचना बंद कर दिया जाय क्योंकि मार्क्स ने प्रेम किया था ? क्या लेख में वर्णित मार्क्स और एंगेल्स की 'चालाकियों'से उन्हें गांधी से कमतर मानना शुरू किया जाय ? क्या मार्क्स को खलनायक मान लिया जाय ? क्या मनमोहन सिंह को महान मान लिया जाय क्योंकि अभी उनके प्रेमप्रसंग बाहर नहीं हुये हैं ? क्या आडवाणी और अटल जी आदि को महान विचारक मान लिया जाय ?
ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला लेख है जो जर्मनी में रहकर लिखा गया है बल्कि पश्चिम की सामान्य लेखन परंपरा का यह एक मौलिक गुण है । अपने यहाँ हिन्दी में विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा। जैसी दुर्लभ पुस्तक लिख डाली ।
लेखक ने एक सवाल उठाया है कि मार्क्स-भक्तों ने उनके इस पक्ष पर कुछ नहीं लिखा और सोचा ! लेकिन इस निजी प्रसंग का महत्व पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में किस प्रकार है या हो सकता है इसे लेखक को बताना चाहिए । लेकिन पूंजीवाद जब किसी को सामान्य जन की नज़र से गिराना चाहता है तो वह उसके निजी प्रसंगों का प्रचार करता है । यह उसका अचूक हथियार है और इसे चलाकर वह चोरी, शोषण, भ्रष्टाचार और दमन पर आधारित अपनी नैतिकता की रक्षा कर लेता है । मुझे लगता है इस लेख का पवित्र उद्देश्य पूंजीवादी नैतिकता को ही बचाना है और बेशक इसमें वह सफल है ।
तार्किक रूप से यह एक कमजोर लेख है जो तर्क और सबूतों की बजाय आभासों और जनधारणाओं के आधार पर लिखा गया है । ये आभास और धारणायेँ मार्क्स के बारे में दुनियाभर में मिल सकती हैं क्योंकि सभी को 1848 के भूत से डर लगता है ।
एक बात इस लेख को पढ़ते हुये और भी सामने आती है कि अविवाहित हेलेन की भी कभी कोई प्रेम या यौन-आकांक्षा रही होगी या मार्क्स ने ही ज़बरदस्ती की होगी ? अगर दोनों ने प्रेम किया और बच्चा पैदा कर उसे लोकलाज से दूर रखा तो इसका दोष केवल एक ही व्यक्ति के ऊपर कैसे मढ़ा जा सकता है ? किसी अन्य लेख में जेनी के सीजोफ़्रेनिक होने का जिक्र किया गया था और उसमें भी ठीक यही कारण दिया गया था । तो फिर मार्क्स ने छिपा कैसे लिया होगा और अगर वे फ्रेडी को नापसंद करते थे तो वह हमेशा पिछले दरवाजे से क्यों आता था ? आता ही क्यों था ? हेलेन की वफादारी किसी डर की वजह से थी ? लेखक ने ही बताया है कि मार्क्स 'खर्चे-पानी' के लिए एंगेल्स पर निर्भर थे तो वे फ्रेडी के लिए कौन सी संपत्ति खड़ी कर सकते थे । यह बहुत प्रचलित तथ्य है कि उन्होने आजीवन दरिद्रता झेली । फ्रेडी को आखिर किसने पाला ? ये सब सवाल ऐसे हैं जिनका आभासी जवाब भी यहाँ इस लेख में नहीं है जिस कारण यह संदिग्ध हो जाता है और इसका स्वर कीचड़-उछालू बन जाता है । लेखक से थोड़े अधिक होमवर्क और समझ की उम्मीद स्वाभाविक है ।
अंत में यह कि मार्क्स के इस पहलू पर ध्यान देने से क्या नारिवाद लहलहा उठेगा ? क्या नारिवाद ऐसे ही खाद पानी पाता रहा है और उसका कोई उसूल नहीं है ?

Ramji Yadav ने कहा…

इस लेख को किस संदर्भ से पढ़ा जाय ? क्या इसे पढ़ने के बाद पूंजीवाद और असमानता के खिलाफ सोचना बंद कर दिया जाय क्योंकि मार्क्स ने प्रेम किया था ? क्या लेख में वर्णित मार्क्स और एंगेल्स की 'चालाकियों'से उन्हें गांधी से कमतर मानना शुरू किया जाय ? क्या मार्क्स को खलनायक मान लिया जाय ? क्या मनमोहन सिंह को महान मान लिया जाय क्योंकि अभी उनके प्रेमप्रसंग बाहर नहीं हुये हैं ? क्या आडवाणी और अटल जी आदि को महान विचारक मान लिया जाय ?
ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला लेख है जो जर्मनी में रहकर लिखा गया है बल्कि पश्चिम की सामान्य लेखन परंपरा का यह एक मौलिक गुण है । अपने यहाँ हिन्दी में विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा। जैसी दुर्लभ पुस्तक लिख डाली ।
लेखक ने एक सवाल उठाया है कि मार्क्स-भक्तों ने उनके इस पक्ष पर कुछ नहीं लिखा और सोचा ! लेकिन इस निजी प्रसंग का महत्व पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में किस प्रकार है या हो सकता है इसे लेखक को बताना चाहिए । लेकिन पूंजीवाद जब किसी को सामान्य जन की नज़र से गिराना चाहता है तो वह उसके निजी प्रसंगों का प्रचार करता है । यह उसका अचूक हथियार है और इसे चलाकर वह चोरी, शोषण, भ्रष्टाचार और दमन पर आधारित अपनी नैतिकता की रक्षा कर लेता है । मुझे लगता है इस लेख का पवित्र उद्देश्य पूंजीवादी नैतिकता को ही बचाना है और बेशक इसमें वह सफल है ।
तार्किक रूप से यह एक कमजोर लेख है जो तर्क और सबूतों की बजाय आभासों और जनधारणाओं के आधार पर लिखा गया है । ये आभास और धारणायेँ मार्क्स के बारे में दुनियाभर में मिल सकती हैं क्योंकि सभी को 1848 के भूत से डर लगता है ।
एक बात इस लेख को पढ़ते हुये और भी सामने आती है कि अविवाहित हेलेन की भी कभी कोई प्रेम या यौन-आकांक्षा रही होगी या मार्क्स ने ही ज़बरदस्ती की होगी ? अगर दोनों ने प्रेम किया और बच्चा पैदा कर उसे लोकलाज से दूर रखा तो इसका दोष केवल एक ही व्यक्ति के ऊपर कैसे मढ़ा जा सकता है ? किसी अन्य लेख में जेनी के सीजोफ़्रेनिक होने का जिक्र किया गया था और उसमें भी ठीक यही कारण दिया गया था । तो फिर मार्क्स ने छिपा कैसे लिया होगा और अगर वे फ्रेडी को नापसंद करते थे तो वह हमेशा पिछले दरवाजे से क्यों आता था ? आता ही क्यों था ? हेलेन की वफादारी किसी डर की वजह से थी ? लेखक ने ही बताया है कि मार्क्स 'खर्चे-पानी' के लिए एंगेल्स पर निर्भर थे तो वे फ्रेडी के लिए कौन सी संपत्ति खड़ी कर सकते थे । यह बहुत प्रचलित तथ्य है कि उन्होने आजीवन दरिद्रता झेली । फ्रेडी को आखिर किसने पाला ? ये सब सवाल ऐसे हैं जिनका आभासी जवाब भी यहाँ इस लेख में नहीं है जिस कारण यह संदिग्ध हो जाता है और इसका स्वर कीचड़-उछालू बन जाता है । लेखक से थोड़े अधिक होमवर्क और समझ की उम्मीद स्वाभाविक है ।
अंत में यह कि मार्क्स के इस पहलू पर ध्यान देने से क्या नारिवाद लहलहा उठेगा ? क्या नारिवाद ऐसे ही खाद पानी पाता रहा है और उसका कोई उसूल नहीं है ?

अशोक भल्ला ने कहा…

मार्क्स की कलम उनके दिमाग से संचालित थी , जिसका असर मज़दूर मस्तिष्क पर , असरदार रहा ,
कोई भी सोच पूर्ण नही होती , इसीलिये भारत के समाजवादी चिंतक डॉ . राममनोहर लोहिया ने मार्क्स का अपनी एक अधूरी पुस्तक --- अर्थशास्त्र मार्क्स से आगे -- में बड़ा सार्थक विश्लेषण किया है .
जहाँ तक मार्क्स के व्यक्तिगत जीवन का सवाल है , तो भाई , छिद्र तो देवताओं के जीवन में भी है
.

विश्वदीपक ने कहा…

"एक मार्क्सवादी"--तुम कितने कायर और निकृष्ट हो.तुम्हारे अंदर इतना भी साहस नहीं कि खुलकर अपना नाम लिखते हुए सामने आते और विरोध करते.आसानी से समझा जा सकता है कि मार्क्सवाद का पतन भारत में क्यों हुआ!!!
तुम्हे लगता होगा कि तुम मार्क्सवादी हो लेकिन तुम मार्क्सवाद के परजीवी हो.तुम्हारे जैसे लोगों को देखकर ही लोग इस विचारधारा से बिदकते हैं.
तुम मेगामाइंड खाओ या शंखपुष्खापी का सीरप पीओ.तुम्हारा दिमाग कमजोर है.संदर्भ समझ नहीं आते.

संदीप राउज़ी ने कहा…

ऐसा लेख जिसका न कोई प्रसंग है और न अर्थ, जो, मानों इसलिए लिखा गया कि लव सेक्स और धोखा के सम्मिश्रण की सारी कहानियां बेहूदा और बचकाना हो चुकी हैं, कुछ नया करने की तम्मना से वशीभूत लिखा गया है। हो सकता है अगली किश्त गांधी पर आए..
समझ में नहीं आता कि विश्वदीपक ने इस समय इस लेख को क्यों लिखा और मेरे लिए इससे भी ज्यादा न समझने वाली बात है जनपथ के माडरेटर का इसे छापने का निर्णय लेना। माडरेटर गोलमोल लिखने के बजाय स्पष्ट करें कि इसे छापने से कौन सी बहस को अंजाम देना चाहते हैं..नहीं तो यही समझा जाएगा कि यह कीचड़ उछालू और पापुलिस्ट करतब है...

एक मार्क्सवादी ने कहा…

ऐ पगलौल, जरा सुनो, जो तोका नाम बतैदेव ते कछु बाल उखाड़ लीब हमार। जो अबकी गरिया ना तो हम सचमे तोका आफन नाम बतैदेव फिर तोहार और फजीहत होव। कछु समझे।

उज्ज्वल भट्टाचार्य ने कहा…

हो सकता है कि हिंदी में इस पर न लिखा गया हो, लेकिन ये तथ्य आम तौर पर सबको मालूम हैं. इस पूरे लेख में एक ही दिलचस्प बात उभरकर आती है, कि अगर अटकलें सच हों तो उनसे अभिजात मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले मार्क्स का ढुलमुलापन सामने आ जाता है. इस सिलसिले में यह भी याद रखना ज़रूरी है कि कम्युनिस्ट के नैतिक चरित्र का सवाल यूरोपीय कामगार आंदोलन में कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा. लेनिन द्वारा प्रतिपादित पार्टी ऑफ़ ए न्यू टाइप के तहत कम्युनिस्ट के चरित्र के सवाल को भी पहली बार प्रमुखता दी गई, लेकिन वहां भी चरित्र का अवस्थान नाड़े के नीचे नहीं था.
लेखक अगर यह भी बताते कि वे ट्रीयर में कितने दिन रहे और वहां उन्हें अचानक किन स्रोतों से अज्ञात जानकारियां मिली तो यह पाठकों के लिये दिलचस्प होता. वैसे इस लेख में इस तथ्य को बड़ी आसानी से छिपा दिया गया कि एंगेल्स ने फ़ेडेरिक लूइस डेमुथ का पितृत्व स्वीकार किया था. यानी कम से कम औपचारिक रूप से एंगेल्स उसके पिता थे.
जहां तक इस लेख का सवाल है तो इसके अधिकांश वक्तव्य विकीपीडिया पर आधारित हैं. यह ज़रूर महत्वपूर्ण है कि हिंदी में इसे लिखा गया है. इन बातों को जानना पूरी तरह से गैरज़रूरी नहीं हैं. साथ ही, जिन्हें इन मामलों में ज़्यादा दिलचस्पी है वे इस पर मनन-चिंतन भी करते रहेंगे.

समर ने कहा…

मोडरेटर साहब- सबसे पहले इस लिखे को 'लेख' कहने पर आपत्ति दर्ज करें. यह अगर लेख है तो सत्यकथा और मनोहरकथाओं में छपने वाली तमाम 'रोमांचक और रोमांटिक' कहानियों को लेख का दर्जा देना पड़ जाएगा और भले ही उम्र के एक मोड़ पर बगिया में ट्यूबवेल वाले कमरे में छिप के हम भी वे कहानियां पढ़ते रहे हों, उन्हें लेख समझने की गलती नहीं की.
दूसरी बस एक बात- कि मध्यवर्गीय नैतिकता के अलंबरदारों(प्रसंगवश, भाई विश्वदीपक माओवादी-अन्नावादी हैं, इन्होने माओवादियों से अन्ना आन्दोलन का समर्थन करवा के प्रेस विज्ञप्ति महान पत्रिका मोहल्ला में छपवा दी थी और उसके फर्जी पाए जाने पर गजब कलटी मारी थी) कि अपनी नैतिकता इतनी तो होनी ही चाहिए कि गलतबयानी न करें.मसलन यह की इनके झूठ के ठीक उलट एंगेल्स ने फ़ेडेरिक लूइस डेमुथ को सामजिक रूप से अपना पुत्र स्वीकारा ही था और मुझे इसके आगे उनके बेडरूम में घुसने की जरूरत नहीं लगती भले ही विश्वदीपक जी जैसों को लगती हो.
तीसरे यह.. कि साहब सवाल क्या पूछना चाह रहे हैं? यौन नैतिकता पर विमर्श चाहते हैं या स्त्री की अपनी अस्मिता, अपनी एजेंसी पर? हेलेन ने जिंदगी में अपने चुनाव किये थे(दफनाये जाने तक की उनकी इच्छा मार्क्स के बगल में ही थी. विश्वदीपक जी को लगता है कि हेलेन को यह उनसे पूछ कर करना चाहिए था?
अंत में सिर्फ यह-- कि सहमती के संबंधों में भी 'चरित्र विमर्श' कौन करता है और क्यों करता है क्या यह समझना इतना कठिन है?

Jai Prakash ने कहा…

विश्वदीपक जी , दुनिया के मेहनत कशों के विरोधी और पूंजीपतियों की राज्य सत्ताओं की सुरक्षा के पहरेदार व पूंजीपतियों के बडवे अर्थशास्त्री ,समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स को मिटाने के लिए यह काम तब से करते आरहे है , तब आप पैदा भी नहीं हुए थे ,इस पर तो क्या बहस करे जो आपने उठाई है , मैंने कहा की कोई नई बात बताये यह तो सब जानते है ! आपके पास कोई विकल्प है , पूंजीवाद का ? यदि है तो बताये ! नहीं तो हम समझेंगे की आप कोरी लफ्फाजी कर रहे ! आप क्या कर रहे हो सकता है ........खैर छोडिये , घोड़े को तनहाल जड़ी जा रही थी , तो मेंढकी
ने भी पैर उठाया.

Jai Prakash ने कहा…

विश्वदीपक जी , दुनिया के मेहनत कशों के विरोधी और पूंजीपतियों की राज्य सत्ताओं की सुरक्षा के पहरेदार व पूंजीपतियों के बडवे अर्थशास्त्री ,समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स को मिटाने के लिए यह काम तब से करते आरहे है , तब आप पैदा भी नहीं हुए थे ,इस पर तो क्या बहस करे जो आपने उठाई है , मैंने कहा की कोई नई बात बताये यह तो सब जानते है ! आपके पास कोई विकल्प है , पूंजीवाद का ? यदि है तो बताये ! नहीं तो हम समझेंगे की आप कोरी लफ्फाजी कर रहे ! आप क्या कर रहे हो सकता है ........खैर छोडिये , घोड़े को तनहाल जड़ी जा रही थी , तो मेंढकी
ने भी पैर उठाया.

जे. पी. नरेला ने कहा…

विश्वदीपक जी , दुनिया के मेहनत कशों के विरोधी और पूंजीपतियों की राज्य सत्ताओं की सुरक्षा के पहरेदार व पूंजीपतियों के बडवे अर्थशास्त्री ,समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स को मिटाने के लिए यह काम तब से करते आरहे है , तब आप पैदा भी नहीं हुए थे ,इस पर तो क्या बहस करे जो आपने उठाई है , मैंने कहा की कोई नई बात बताये यह तो सब जानते है ! आपके पास कोई विकल्प है , पूंजीवाद का ? यदि है तो बताये ! नहीं तो हम समझेंगे की आप कोरी लफ्फाजी कर रहे ! आप क्या कर रहे हो सकता है ........खैर छोडिये , घोड़े को तनहाल जड़ी जा रही थी , तो मेंढकी
ने भी पैर उठाया.

Jai Prakash ने कहा…

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जे.पी.नरेला. ने कहा…

विश्व दीपक , कार्ल मार्क्स ने दुनिया के मजदूरों का मुक्ति का दर्शन दिया ! वे महा मनीषी ,जीनियस और अपने समय के अर्थशास्त्रियों ,समाजशास्त्रियों ,दार्शनिको से संघर्ष करते हुए ,दुनिया के समस्त उत्पीडित तबकों की मुक्ति का रास्ता बताकर एक दुनिया के पैमाने पर महान योगदान किया, और उन्ही के सिधांत के आधार पर धरती के दो बड़े मुल्को में वैज्ञानिक स्माज्वज के प्रयोग हुए ! कार्ल मार्क्स के सिधांत का विकल्प उनके बाद आज तक कोई भी दे नहीं पाया है, अब यह जो काम आप कर रहे हो , यह कार्य पूंजीवादी सत्ताओं के पहरेदार और उनके भाड़े के टट्टू और उनके भडुवे 60 वर्षों से भी ज्यादा समय से करते आ रहे है , यानी जब तुमने इस दुनिया में आंख भी नहीं खोली थी , साफ -साफ यह तय करना होता है ,कि आप पूंजीवाद के साथ खड़े है या समाजवाद के साथ इसमें आप सर्वहारा एवं उत्पीडित वर्गों की विचारधारा के साथ न खड़े होकर पूंजीवाद के साथ सीधे- सीधे खड़े है .शायद आप यह जानते ही होंगे कि यह कार्य आप क्यों और किसलिए कर रहे है ,यह कर कर आप क्या साबित करना चाहते है और यह आपके बूते का मामला है भी नहीं , जो मार्क्स के विरोधी है , सिर्फ वाही इसमें आनन्द लेंगे , मार्क्सवादी तो जानते कि कार्ल मार्क्स ने कितना महान योदन किया , उनके लिए वह महत्व पूरण है ओए आपके लिए यह जो आप कर रहे है ,विश्व दीपक जी , घोड़े को तनहाल जड़ी जा रही थी , तो मेंढकी ने भी पर उठाया !

Jai Prakash ने कहा…

विश्व दीपक , कार्ल मार्क्स ने दुनिया के मजदूरों का मुक्ति का दर्शन दिया ! वे महा मनीषी ,जीनियस और अपने समय के अर्थशास्त्रियों ,समाजशास्त्रियों ,दार्शनिको से संघर्ष करते हुए ,दुनिया के समस्त उत्पीडित तबकों की मुक्ति का रास्ता बताकर एक दुनिया के पैमाने पर महान योगदान किया, और उन्ही के सिधांत के आधार पर धरती के दो बड़े मुल्को में वैज्ञानिक स्माज्वज के प्रयोग हुए ! कार्ल मार्क्स के सिधांत का विकल्प उनके बाद आज तक कोई भी दे नहीं पाया है, अब यह जो काम आप कर रहे हो , यह कार्य पूंजीवादी सत्ताओं के पहरेदार और उनके भाड़े के टट्टू और उनके भडुवे 60 वर्षों से भी ज्यादा समय से करते आ रहे है , यानी जब तुमने इस दुनिया में आंख भी नहीं खोली थी , साफ -साफ यह तय करना होता है ,कि आप पूंजीवाद के साथ खड़े है या समाजवाद के साथ इसमें आप सर्वहारा एवं उत्पीडित वर्गों की विचारधारा के साथ न खड़े होकर पूंजीवाद के साथ सीधे- सीधे खड़े है .शायद आप यह जानते ही होंगे कि यह कार्य आप क्यों और किसलिए कर रहे है ,यह कर कर आप क्या साबित करना चाहते है और यह आपके बूते का मामला है भी नहीं , जो मार्क्स के विरोधी है , सिर्फ वाही इसमें आनन्द लेंगे , मार्क्सवादी तो जानते कि कार्ल मार्क्स ने कितना महान योदन किया , उनके लिए वह महत्व पूरण है ओए आपके लिए यह जो आप कर रहे है ,विश्व दीपक जी , घोड़े को तनहाल जड़ी जा रही थी , तो मेंढकी ने भी पर उठाया

रोहित ने कहा…

अपनी जो थोड़ी बहुत इतिहास पढने की समझ है उसे किनारे रख कर इस आलेख को पढ़ा जाय तो लगता है की एंगेल्स जीवन भर उस सृजनात्मक चिंतन में, जिसके चलते उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण रचनाएं दी, के बजाय इसी तिकड़म में दिमाग भिड़ाते रहे होंगे कि मार्क्स की प्रतिष्ठा और कम्युनिस्ट आंदोलन के 'भविष्य' के लिए कहाँ कहाँ चुप रहा जाय।
पूरे आलेख में कुछ तारीखों और अन्य कुछ सामान्य बातों को छोड़कर (मसलन हेलेन मार्क्स की नौकरानी थी) सिर्फ दो जगह 'तथ्य' हैं, जिन्हें एतिहासिक माना जा सकता है. एक मार्क्स की बेटियों का पत्र संवाद, और दूसरा मार्क्स का, तीसरी बेटी के जन्म के दौरान एंगेल्स को पत्र. इसके इतर एंगेल्स का एलिनॉर को मरते समय कागज के टुकड़े में यह बताना कि मार्क्स ही फ्रेडी का पिता है, जितना नाटकीय और फ़िल्मी टाइप है अन्य बातें भी तकरीबन ईएसआई ही लगती हैं. लेकिन, पूरे आलेख में लेखक (चाहे वह जर्मनी रह आया हो, पता नहीं मॉडरेटर ने इस तथ्य को क्यों कर बताया है?) ने जिस तरह अधिकतर कल्पित प्रतीत होती बातों/तथ्यों पर लेश मात्र भी संदेह किये बगैर अपने आलेख के मूल मकसद को कायम करने के लिए इन्हें पुख्ता एतिहासिक तथ्यों की तरह प्रयोग किया है, इसके बाद उपरोक्त दो तथ्य जो कि सरसरे तौर पर एतिहासिक लगते हैं की प्रमाणिकता पर भी संदेह होने लगता है. लगता है कि अपनी सुविधा से इन तथ्यों/शब्दों या उसके भाव को गढ़ा गया है.

यूँ तो मार्क्स के सन्दर्भ में जो बात यहाँ स्थापित करने की कोशिश की गई है, वह स्थापित हो जाने के बाद भी मार्क्स के योगदान और महत्व को कहीं भी कम नहीं करती है. और मूलतः यह बात लेखक भी समझ ही रहा है. लेकिन यह आलेख यूँ ही नहीं फूट पड़ा है, इसकी कई सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक वजहें हैं. जिनसे लेखक की पोलिटिक्स समझ आती है.
लेकिन जो बात समझ नहीं आती वह यह है कि यह आलेख जनपथ में क्यूँकर लगाया गया है? जबकि जनपथ, जनसत्ता के खिलाफ शंकर शरण के आलेख के मसले पर भरपूर आक्रामक दिखाई दिया था... क्या यह आलेख अपनी (छुपी हुई) राजनीति में शंकर शरण के आलेख से कहीं कमतर नजर आता है?

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