5/14/2013

पूंजीवाद विरोधी संघर्ष में निजी प्रसंगों की अहमियत कैसे है?

रामजी यादव 

कार्ल मार्क्‍स पर लिखे विश्‍वदीपक के लेख पर अपेक्षित प्रतिक्रियाएं आई हैं। लेखिका अनिता भारती को छोड़कर शेष सभी प्रतिक्रियाएं इस लेख को 'संदर्भहीन' और 'कीचड़-उछालू' बता रही हैं। अनिता भारती की सराहना उनके राजनीतिक लोकेशन से आती है इसलिए अपेक्षित ही है। जहां तक संदर्भ का सवाल है, लेखक द्वारा न सही लेकिन मॉडरेटर इंट्रो में एक संदर्भ (बेहतर कहें तो डिसक्‍लेमर) देने की कोशिश की गई थी जिसे लगता है ध्‍यान से नहीं पढ़ा गया। इस लेख को छापने के निर्णय पर एक सामान्‍य जवाब यह बनता है कि जो लिखा गया अगर वह छपा नहीं, तो कौन जानेगा कि कौन व्‍यक्ति क्‍या और क्‍यों लिख रहा है। बेशक इसका मतलब यह नहीं कि हर लिखी चीज़ छाप दी जाए, लेकिन जिन मसलों से हमारा सरोकार है (यहां मार्क्‍स) उन पर लिखी बातों का प्रकाशन ज़रूरी है। संदीप राउज़ी के मुताबिक 'पॉपुलिस्‍ट' तरीके से बहस खड़ी करने का जहां तक सवाल है, तो यह हमेशा और अनिवार्यत: बुरा नहीं होता है। इसे 'पॉपुलिस्‍ट' कहें या जो भी नाम दें, लेकिन हमारे समय की लेखकीय विडंबनाओं और विकृतियों (खासकर नए लेखकों के संदर्भ में) का सामने आना, उस पर विवेक का सामूहिक रंदा चलाना और इस क्रम में व्‍यक्ति को छील कर उसकी जगह विचार को दोबारा स्‍थापित किए जाने का काम न सिर्फ विचार की महत्‍ता के लिहाज से ज़रूरी है बल्कि आने वाले लेखकों के लिए एक नज़ीर पेश करने के संदर्भ में भी अहम है।   

बहरहाल, सर्वाधिक तार्किक और संतुलित प्रतिक्रिया एक्टिविस्‍ट कहानीकार रामजी यादव की ओर से आई है। उन्‍होंने कुछ ज़रूरी सवाल खड़े किए हैं और विश्‍वदीपक की ओर से इनके विस्‍तृत जवाब अगर आते हैं, तो शायद लेखक का पक्ष, संदर्भ और उद्देश्‍य समझने में सभी को आसानी होगी। इसे हम नीचे पूरा चिपका रहे हैं। (मॉडरेटर) 



इस लेख को किस संदर्भ से पढ़ा जाय? क्या इसे पढ़ने के बाद पूंजीवाद और असमानता के खिलाफ सोचना बंद कर दिया जाय क्योंकि मार्क्स ने प्रेम किया था? क्या लेख में वर्णित मार्क्स और एंगेल्स की 'चालाकियोंसे उन्हें गांधी से कमतर मानना शुरू किया जाय? क्या मार्क्स को खलनायक मान लिया जाय? क्या मनमोहन सिंह को महान मान लिया जाय क्योंकि अभी उनके प्रेम प्रसंग बाहर नहीं हुये हैं? क्या आडवाणी और अटल जी आदि को महान विचारक मान लिया जाय?

ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला लेख है जो जर्मनी में रहकर लिखा गया है बल्कि पश्चिम की सामान्य लेखन परंपरा का यह एक मौलिक गुण है। अपने यहां हिन्दी में विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा' जैसी दुर्लभ पुस्तक लिख डाली।

लेखक ने एक सवाल उठाया है कि मार्क्स-भक्तों ने उनके इस पक्ष पर कुछ नहीं लिखा और सोचा! लेकिन इस निजी प्रसंग का महत्व पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में किस प्रकार है या हो सकता है इसे लेखक को बताना चाहिए। लेकिन पूंजीवाद जब किसी को सामान्य जन की नज़र से गिराना चाहता है तो वह उसके निजी प्रसंगों का प्रचार करता है। यह उसका अचूक हथियार है और इसे चलाकर वह चोरी, शोषण, भ्रष्टाचार और दमन पर आधारित अपनी नैतिकता की रक्षा कर लेता है। मुझे लगता है इस लेख का पवित्र उद्देश्य पूंजीवादी नैतिकता को ही बचाना है और बेशक इसमें वह सफल है।

तार्किक रूप से यह एक कमजोर लेख है जो तर्क और सबूतों की बजाय आभासों और जनधारणाओं के आधार पर लिखा गया है। ये आभास और धारणायेँ मार्क्स के बारे में दुनिया भर में मिल सकती हैं क्योंकि सभी को 1848 के भूत से डर लगता है।

एक बात इस लेख को पढ़ते हुये और भी सामने आती है कि अविवाहित हेलेन की भी कभी कोई प्रेम या यौन-आकांक्षा रही होगी या मार्क्स ने ही ज़बरदस्ती की होगी? अगर दोनों ने प्रेम किया और बच्चा पैदा कर उसे लोकलाज से दूर रखा तो इसका दोष केवल एक ही व्यक्ति के ऊपर कैसे मढ़ा जा सकता है? किसी अन्य लेख में जेनी के सीजोफ़्रेनिक होने का जिक्र किया गया था और उसमें भी ठीक यही कारण दिया गया था। तो फिर मार्क्स ने छिपा कैसे लिया होगा और अगर वे फ्रेडी को नापसंद करते थे तो वह हमेशा पिछले दरवाजे से क्यों आता था? आता ही क्यों था? हेलेन की वफादारी किसी डर की वजह से थी

लेखक ने ही बताया है कि मार्क्स 'खर्चे-पानी' के लिए एंगेल्स पर निर्भर थे, तो वे फ्रेडी के लिए कौन सी संपत्ति खड़ी कर सकते थे। यह बहुत प्रचलित तथ्य है कि उन्होंने आजीवन दरिद्रता झेली। फ्रेडी को आखिर किसने पाला? ये सब सवाल ऐसे हैं जिनका आभासी जवाब भी यहां इस लेख में नहीं है जिस कारण यह संदिग्ध हो जाता है और इसका स्वर कीचड़-उछालू बन जाता है। 

लेखक से थोड़े अधिक होमवर्क और समझ की उम्मीद स्वाभाविक है।

अंत में यह कि मार्क्स के इस पहलू पर ध्यान देने से क्या नारीवाद लहलहा उठेगा? क्या नारीवाद ऐसे  ही खाद पानी पाता रहा है और उसका कोई उसूल नहीं है?

5 टिप्‍पणियां:

JANARDANGOND ने कहा…

behatrin tippdi hai...

समर ने कहा…

विश्वदीपक जी की पहली खोज नहीं है यह, इसके पहले यह माओवादियों से अन्ना हजारे का समर्थन भी करवा चुके हैं और उस समर्थन का गुब्बारा फोड़ देने पर रवीश कुमार जी जैसे महान वामपंथी चिन्तक का लेख पेश कर चुके हैं.
कुल मिला कर यह.. कि भाई साहब 'माओवादी' हैं यह भी ख्याल रखा जाय तो इनकी उद्भट विद्वता के विस्फोट वाला यह लेख समझने में आसानी होगी.

अनिता भारती (Anita Bharti) ने कहा…

क्या पूंजीवाद विरोधी संधर्ष में नीजि जीवन शैली या संबंधो पर बात करना गुनाह है। यह कौन सी उदारवादी मनोवृति है कि अगर कोई सवाल खडे करे तो उसकी मंशा को कीचड़ उछालना और बदनाम करना ही समझा जाए? रिश्तों में सामंतवाद और उस सामंतवाद से उनसे उपजी तथाकथित विवशताओं को यह कहकर लताड़ देना कहा तक उचित है कि इससे पूंजीवाद विरोधी संघर्ष की धार कुंद पड़ जायेगी। कमाल के उदार है आप लोग!चलो हम मान लेते है कि मार्क्स भगवान थे और उनमें कोई व्यक्तिगत कमजोरी नही थी। ठीक..

अनिता भारती (Anita Bharti) ने कहा…

खैर अगर मैं कम्युनिस्ट होती तो शायद मेरे लिए यह टिप्पणी नही की जा सकती थी कि - अनिता भारती की सराहना उनके राजनीतिक लोकेशन से आती है इसलिए अपेक्षित ही है।

प्रवीण कर्ण ने कहा…

विश्वदीपक के 'लेख' जैसा कि कुछ लोग इसे लेख कहे जाने पर भी सवाल उठा रहे हैं ....ये एक और किस्म का "VIOLENCE" ही है। अफसोस की बात ये है जो लोग काल मार्क्स के बहाने पर बहस कर रहे हैं वे न तो पूंजीवादी नैतिक मूल्यों की समझ रहे हैं और समाजवादी आर्दश, विचार और व्यवहार तो इनके 'पुरखों' को भी समझ नहीं आ पाया था। विश्वदीपक को लेख लिखने मे रिसर्च और इसके प्रोटोकॉल का ख्याल रखना चाहिए था क्योंकि कई बार पढ़ने के बाद भी ये समझ नहीं आ रहा कि ये लेखन क्या कह रहा है बावजूद अपने अनगढ़ लेख के विश्वदीपक जरूरी सवाल उठा जाते हैं .. मसलन हेलन और मार्क्स के रिश्ते और दुनिया के मजदूरों को लेकर मार्क्स के यूटोपिया की हकीकत.. सबसे बड़ी बात जो अनगढ़ और बिना पर्याप्त रिसर्च के लिखे लेख से साबित होती है कि अगर मार्क्सवीदी साहित्य और मार्क्स के विचारधारा में स्त्रीवादी विर्मश की जो कमियां हैं वो मार्क्स और हेलन प्रसंग से साफ होता है। अगर मार्क्स अपने इस रिश्ते पर पर्दा डालते और उस सच से नहीं भागते तो शायद आज दुनिया को हिलाने वाले इस ताकत की तस्वीर कुछ और ही होती ... ..

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