5/04/2013

मराठवाड़ा यात्रा: चौथी किस्‍त


(गतांक से आगे) 

सूखे की जड़ें


कल की उपेक्षा करने और वर्तमान में जीने का संकट अकेले दुष्काल का संकट नहीं है। यह संकट समूचे देश-काल का केंद्रीय संकट है। यही सामाजिक संकट भी है। इसी संकट का एक संस्करण मराठवाड़ा-2013 है। जिस सूखे की बात आज हो रही है, वह अचानक नहीं बल्कि एक प्रक्रिया में आया है। महाराष्ट्र में 1972 के दुष्काल के बाद से जल भंडारण क्षमता काफी बढ़ी है, लेकिन सारा का सारा पानी गन्ने की खेती की ओर मोड़ दिया गया है। 1972 में महाराष्ट्र में गन्ने का औसत रकबा 1.66 लाख हेक्टेयर था। आज यह दस लाख हेक्टेयर पार कर चुका है। इसके अलावा बड़ी बात है कि दुनिया भर में महाराष्ट्र इकलौती जगह है जहां बहते हुए पानी से गन्ने की सिंचाई होती है। बाकी जगहों पर कुएं या वर्षावन के पानी से सिंचाई होती है। चूंकि यह बहुत बड़ा उद्योग है, सरकार इसे काफी समर्थन देती है और यह राजनीतिक नियंत्रण को सीधे रास्ता देता है, इसलिए इसका कोई विकल्प फिलहाल नहीं है। दिक्कत यह है कि किसान भी गन्ने की खेती बहुत खुश रहता है। इसमें मेहनत नहीं लगती, एक बार बीज डालने के बाद सिर्फ पानी और यूरिया छोड़ना होता है। कपास की तरह इसमें लगातार लगे नहीं रहना पड़ता। कीमतों की भी गारंटी अधिकतर किसानों को रहती है। समूचा दुष्काल इसी से जुड़ा है और इस पर कहीं बात नहीं होती। उद्योगों को पानी दिए जाने की जो बात अकसर इस बीच उठाई गई है, उसमें बहुत ज्यादा दम नहीं है क्योंकि कुल उपलब्ध पानी का सिर्फ सात से आठ फीसदी ही उद्योगों को जा रहा है। असल मसला नकदी फसलों के लिए जल संपदा के केंद्रीकरण का है।

इस बात को औरंगाबाद के मजदूरों के बीच लंबे समय से काम कर रहे लोकप्रिय कम्युनिस्ट नेता डॉ. भालचंद्र कांगो बहुत विस्तार से समझाते हैं। वे उस्मानाबाद जिले का उदाहरण देते हैं जहां बारिश कम होती है। जितना पानी वहां गन्ने के खेतों को दिया जाता है, उसे अगर पेयजल के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो इस शहर की 14 साल तक प्यास बुझाई जा सकती है। गन्ने के बाद राज्य में कपास, फल और सोया को सबसे ज्यादा पानी दिया जाता है। नकदी फसलों की परंपरा यहां अंग्रेज़ों के आने से शुरू हुई थी। वे बंबई के रास्ते इस क्षेत्र में आए। उन्हें कपास चाहिए था, तो उन्होंने विदर्भ, जलगांव और धूलिया जैसे इलाकों में कपास उगाना अनिवार्य कर दिया। कुछ आदिवासियों ने जब कपास उगाने से इनकार कर दिया, तो उनकी ज़मीनें लेकर गुजरात के लेउवा पाटिल किसानों को दे दी गईं। पचास के दशक के बाद धनंजय राव गाडगिल जैसे लोगों ने सहकारी आंदोलन शुरू किया। वही आंदोलन आज इतना बड़ा हो गया है कि राज्य की सत्ता उससे नियंत्रित होती है। मसलन, बीजेपी के नितिन गडकरी के पास मराठवाड़ा में पांच चीनी मिलें हैं और गोपीनाथ मुंडे के पास 14 चीनी मिलें हैं। अजित पवार को भी इसी वजह से गुस्सा आया क्योंकि जिस उजनी बांध से सोलापुर के इलाके के कारखानों को पानी मिलता है, सब के सब राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं के हैं।

पलायन के दृश्‍य देखने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है 
जैसी स्थितियां हैं, उनमें लंबे समय से यहां हो रहा पलायन स्वाभाविक है। ऐसा नहीं कि पहली बार मराठवाड़ा से पलायन हो रहा है। 1970 में औरंगाबाद की आबादी एक लाख थी। अनुमान लगाया गया था कि 2003 तक यह अधिकतम तीन लाख तक होगी, लेकिन आज यह तेरह लाख पर पहुंच चुकी है। अंतर यह आया है कि शहरों का विस्तार पहले उद्योगों के विस्तार पर निर्भर था। आज जालना और बीड जैसे जिलों में बिना उद्योग के ही शहर का विस्तार हो रहा है। लोगों की आकांक्षाएं, शिक्षा की जरूरत, इसकी कई वजहें हैं। कांगो कहते हैं, ‘‘यहां दो किस्म के पलायन हैं। एक जरूरत के कारण और दूसरा उम्मीदों के कारण। इसीलिए पहले कोई अगर गांव से औरंगाबाद आता है, तो फिर उसके बाद नासिक जाएगा, पुणे जाएगा और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने मुंबई जाएगा। इससे निपटने के लिए हमारे पास कोई योजना नहीं है। ठीक यही बात गन्ने की खेती के बारे में भी सही है। यहां चीन जैसी सरकार नहीं है कि आपने आदेश दिया कि गन्ना नहीं उगाना है और गन्ने की खेती बंद हो गई। लोकतंत्र है न!’’  

इसी लोकतंत्र ने धरती के भीतर पिछले चालीस साल में काफी तबाही मचाई है। पहले पर्याप्त मात्रा में भूजल था, लेकिन समय के साथ बोरवेल बढ़ने के कारण अब जमीन के भीतर का पानी सूख चुका है। कांगो आंध्र प्रदेश के एक गांव का दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं जहां जितनी आबादी थी, उसके तीन गुना बोरवेल थे। बात छह-सात साल पहले की है जब वहां एक व्यक्ति की पत्नी ने अदालत में अर्जी दी थी कि उसके पति को और ज्यादा बोरिंग खोदने से रोकने का आदेश दिया जाए। इसी बीच सफेद शर्ट में एक सज्जन उठकर कांगो के पास आते हैं, उनका अभिवादन करते हैं और मराठी में अपनी कोई समस्या बताते हैं। उनके जाने के बाद पता चलता है कि सत्तर के दशक में महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम को 200 एकड़ जमीनें देने वाले किसानों में ये भी एक थे। इनकी उस वक्त 20 एकड़ जमीन गई थी। तब इस प्लॉट पर लम्ब्रेटा स्कूटर का कारखाना था जो बाद में बंद हो गया। औरंगाबाद से लेकर जालना, बीड तक ऐसी तमाम जमीनें हैं जिन्हें लिया तो उद्योगों के लिए गया था लेकिन उद्योग बंद होने के बाद नेताओं की मिलीभगत से उनका भू-उपयोग बदल कर व्यावसायिक और आवासीय परिसरों में तब्दील कर दिया गया। उक्त किसान की शिकायत यह थी कि उनसे ज़मीन 50 पैसा प्रति वर्ग फुट की दर से ली गई थी लेकिन सरकार ने अब इसे 3600 रुपए प्रति वर्ग फुट की दर से बेच दिया है। ऐसे ढेरों किसान हैं जो आज की तारीख में बढ़े हुए मुआवजे की मांग कर रहे हैं, जबकि इन जमीनों पर धड़ल्ले से आवासीय परिसर और व्यावसायिक मॉल पनप रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इस दिशा में सोचा ही नहीं जा रहा कि इन परिसरों के रहवासियों को पानी कहां से मिलेगा क्योंकि भूजल स्तर दो-दो सौ फुट से नीचे गिर चुका है।

धरती की छाती चूसते बोरवेल 
विडंबना यह है कि शहर के अपार्टमेंट में रहने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं क्योंकि प्रतिमाह लाखों की दर पर उन्हें टैंकर से पानी मिल रहा है। हमारे एक पत्रकार साथी बंगलुरु का एक किस्सा सुनाते हैं जहां के एक अपार्टमेंट में रोज़ाना टैंकर से पानी आता है। प्रतिमाह एक लाख रुपया सारे निवासी मिलकर टैंकर कंपनी को देते हैं। रोज़ाना टैंकर से पानी घरों की टंकियों में भरा जाता है जिसका पूरा इस्तेमाल लोग एक दिन में नहीं कर पाते। अगले दिन जब सुबह टैंकर आता है तो अपने चुकाए पैसे के लोभ में पिछले दिन का पानी हर घर की टंकी से बहा दिया जाता है।

विडंबना की मार

ऐसी विडंबनाएं बंगलुरु से होते हुए जालना जैसे छोटे शहरों तक पहुंच चुकी हैं, जहां हर बीस दिन पर शहरवासियों को पानी मिलता है। बहुत दिन नहीं हुए जब शहर के पचास हज़ार लोगों ने पेयजल संकट के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया था। सरकार ने जल्दबाजी में जायकवाड़ी से एक पाइपलाइन शहर तक बिछा दी। जिस दिन इस पाइपलाइन का परीक्षण होना था, उसी दिन प्रदर्शनकारियों ने इसे बीच में से तोड़ दिया और सारा पानी सड़कों पर बह गया। इधर शहर में पानी बह रहा था, उधर शहर से कुछ किलोमीटर दूर साल भर टैंकर के पानी पर जिंदा रहने वाले कर्ज़त गांव में कुंडलिक बंसोड़े की विधवा के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

कुडलिक बंसोड़े ने पेड़ से लटक कर जान दे दी 
जालना के अम्बड़ तालुका में कर्ज़त नाम का गांव राजस्थान में शूट की गई किसी फिल्म का धूसर आभास देता है। एक छोटी सी कोठरी में करीब बीस साल का युवक गणेश अपनी कृशकाय मां के साथ बैठा है जिसकी आंखें लगातार झर रही हैं। हमें देखकर वह अपने दुख को थाम ले, इतना श्लील इस परिवार में नहीं बचा। परिवार के नाम पर बस मां और एक बेटा हैं। इकलौते कमाऊ पुरुष यानी गणेश के पिता कुंडलिक कोंडिवा बंसोड़े ने मार्च की 21 तारीख को अपने एक एकड़ के खेत में नीम के पेड़ से लटक कर फांसी लगा ली। उनके ऊपर ढाई लाख का कर्ज था जो उन्होंने बड़ी बिटिया की शादी और गणेश की पढ़ाई के लिए पिछले साल स्थानीय साहूकार से 60 फीसदी सालाना की ब्याज दर पर लिया था। महज एक एकड़ में लगी कपास की फसल बारिश ना होने के चलते तबाह हो गई। खुदकुशी के वक्त गणेश मुंबई में था। वहां से उसने डी.एड (अध्‍यापन में डिप्लोमा) की पढ़ाई की है। आज उसके पास इस डिग्री के उपयोग का कोई अवसर नहीं है क्योंकि घर में मां अकेली है, लगातार रोती रहती है और उसके दो बड़े काका खुद आत्महत्या के कगार पर पड़ोस में दिन-रात चारपाई पर पड़े हुए हैं। घर में सिर्फ डेढ़ माह का अनाज बचा हुआ है।

बाएं से गणेश बंसोड़े, उसके मामा और दुख में डूबी मां 
खुदकुशी के बाद सरपंच और स्थानीय नेता आश्वासन लेकर आए थे कि सरकार आठ दिनों के भीतर उन्हें मदद देगी। करीब महीना भर होने के बाद आज दोबारा उन्होंने चेहरा नहीं दिखाया, अलबत्ता जिस दिन हम यहां पहुंचे गणेश के मामा अम्बड़ बाजार से मिठाई लेकर आए हुए थे। यहां के मराठा परिवारों में परंपरा है कि पति की मौत होने पर पत्नी का भाई महीने भर के भीतर मीठा लेकर आता है। इसका प्रतीकात्मक महत्व बस इतना है कि जो हुआ उसे भूल जाओ और आगे की सोचो। कुछ न कह पाने की स्थिति में हमने भी गणेश की मां से यही कहा, तो वह रोते हुए मराठी में बोली कि भूल तो तब जाएं जब आगे की कोई राह हो। वास्तव में आगे की राह इस परिवार के पास कोई नहीं है। नरेगा का काम यहां ठप है। कुछ दिनों का राशन बचा हुआ है। गणेश की नौकरी की कोई संभावना है नहीं और गांव छोड़ कर कहीं और जाना अकल्पनीय है। इस गांव को दो और मौतों का इंतज़ार है।

मराठवाड़ा में हर एक मौत हर दूसरी मौत से अलग है। इसी अम्बड़ तालुके में हुई पर्वताबाई की खुदकुशी के महीने भर में उनके पति और बेटे मुस्कराते दिखते हैं जबकि गणेश और उसकी मां के सामने कुछ बोल पाना भी मुहाल लगता है। इस बात की ताकीद परभणी जिले में पिछले पिछले एक साल में आधिकारिक आंकड़े के हिसाब से हुई 74 मौतें करती हैं जिनमें अब तक सिर्फ 40 को ही मुआवजा मिला है। बीड जिले में लंबे समय से किसानों के बीच काम कर रहे कॉमरेड नामदेव चवण कहते हैं, ‘‘जरूरी नहीं है कि सारी आत्महत्याएं सूखे और दुष्काल के चलते हो रही हों, लेकिन दुष्काल में होने वाली हर खुदकुशी को इससे जोड़ने से लाभ मिलने की संभावना रहती है। इसलिए खुदकुशी के मामले बहुत पुष्ट नहीं होते।’’ इसका क्लासिकल उदाहरण म्हस्के बस्ती नाम का एक गांव है जो बीड जिले से 32 किलोमीटर की दूरी पर पाटोदा तालुके में स्थित है। म्हस्के मराठों की एक जाति है। 2001 की जनगणना के मुताबिक सिर्फ 200 की आबादी वाले इस गांव में म्हस्के जाति का बाहुल्य है। बाकी पुरुषों की तरह सरपंच भी खुले में ही आराम करते दिख जाते हैं। विशाल काया, चेहरे पर अधपकी घनी दाढ़ी और सौम्य मुस्कान से वे हमारा स्वागत करते हुए बताते हैं कि बावली में जो पानी दिख रहा है, वह सरकारी टैंकर से आया है। वे बताते हैं, ‘‘सरकार पिछली जनगणना के हिसाब से 200 लोगों के लिए ही एक टैंकर पानी भेजती है, हालांकि पिछले दस साल में आबादी बढ़ गई है इसलिए पानी का संकट है।’’

म्‍हस्‍के गांव की 200 साल पुरानी इकलौती बावली जो टैंकर से भरी जाती है 
पूरे गांव में एक भयावह सन्नाटा चीख रहा है। सूखा जमीन पर ही नहीं, लोगों की आंखों में दिखता है। चलते-चलते हम एक छोटे से कमरे के आगे ठहर जाते हैं। कमरे के भीतर अंधेरा है, कुछ रोशनी दरवाजे से आ पा रही है जिसमें बेतरतीब बिखरे बरतन, अनाज के डेढ़ बोरे और उकड़ूं बैठे तीन प्राणी दिख जाते हैं। एक विट्ठल म्हस्के की पत्नी हैं आशाबाई म्हस्के और दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की। कच्ची जमीन पर बैठक लग जाती है। सरपंच हमें दो अन्य पुरुषों से मिलवाते हैं, ‘‘ये विट्ठल के दोनों भाई हैं।’’ इसके बाद हमारे सामने मराठी मिश्रित टूटी-फूटी हिंदी में जो कहानी आती है, वह एक खुदकुशी के बहाने अभावों के समाजशास्त्र को खोल कर रख देती है।

विट्ठल रघुनाथ म्‍हस्‍के की पत्‍नी और बच्‍चे 
विट्ठल रघुनाथ म्हस्के ने इसी कमरे में बीते 24 मार्च को खूंटे से लटक कर खुदकुशी की थी। तब उनकी पत्नी और दोनों भाई घर पर नहीं थे। समूचे गांव की तरह वे भी गन्ना काटने पुणे गए हुए थे। विट्ठल भी उनके साथ थे। अचानक उन्होंने लौटने की योजना बना ली। उनकी पत्नी कहती हैं, ‘‘वे बोले कि सत्संग में जा रहा हूं। दो दिन बाद उनकी मौत की खबर आई।’’ विट्ठल ने जिस सत्संग की बात कही थी, उसका पीला परचा इस कमरे के बाहर दीवार पर अब भी चस्पां है। दोनों बच्चे यहीं गांव में पढ़ते हैं। वे मजदूरी नहीं करते। गांव में इस परिवार की आधा एकड़ जमीन है जिससे गुजारा होना नामुमकिन है इसलिए हर साल अक्टूबर में गन्ना का सीजन शुरू होने पर यहां के लोग पलायन कर जाते हैं और आम तौर पर मई में अक्षय तृतीया पर्व पर लौट कर आते हैं। हर बार मुकद्दम यानी साहूकार से गन्ना मजदूर अग्रिम राशि लेते हैं जिससे साल भर घरबार का काम चलता है। इस बार चूंकि पानी की कमी के कारण गन्ने का काम जल्दी निपट गया, इसलिए कर्ज चुकाना संभव नहीं हो सका। विट्ठल के सिर पर साहूकार का दो लाख का कर्ज था, फसल की उम्मीद नहीं थी और अगला काम अब अगले सीजन में ही शुरू होने की उम्मीद है, इसलिए उसने जान दे दी।

खुदकुशी जिस कमरे में हुई, वहां आज भी लगा है सत्‍संग का पोस्‍टर 
तकरीबन 300 की आबादी वाले इस गांव में कोई भी व्यक्ति रोजगार गारंटी योजना में पंजीकृत नहीं है। यह पूछे जाने पर कि आपने जॉब कार्ड क्यों नहीं बनवाया, सरपंच मुस्करा देते हैं। उनका जवाब हमें स्थानीय पत्रकार अतुल कुलकर्णी देते हैं, ‘‘ये मराठा लोग हैं। जान दे देंगे लेकिन मनरेगा में काम नहीं करेंगे।’’ वे बताते हैं कि इस इलाके की मिट्टी ठोस बसाल्ट की है, इसलिए इसे खोदना मुश्किल है। मनरेगा में एक ट्रैक्टर मिट्टी भरने के बदले 145 रुपये की मजदूरी मिलती है। मराठा को इतनी मेहनत पर इतनी कम मजदूरी गवारा नहीं। इसीलिए उसे साहूकार से कर्ज लेना बेहतर लगता है जिसके बदले वह गांव से बाहर जाकर हर साल गन्ना काट आता है। इस साल साढ़े आठ लाख टन के मुकाबले सिर्फ साढ़े चार लाख टन गन्ना हुआ है और चीनी मिलें छह माह के बजाय चार माह में ही काम निपटा चुकी हैं। लिहाजा, कर्ज़ सबके सिर पर है। खेती का रकबा इतना छोटा है कि बैंक लोन नहीं देते। नतीजा, विट्ठल जैसे लोगों को सालाना साठ फीसद की ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ता है जिसका हासिल मौत के सिवाय कुछ और नहीं हो सकता।

फिलहाल, विट्ठल के परिवार में पत्नी के अलावा काम करने वाला कोई नहीं है। पानी है नहीं, अनाज कुछ दिन का बचा है और काम का कोई ठिकाना नहीं। बावजूद इसके इस गांव के लोग पास के पंढरपुर में भगवान विट्ठल की शोभायात्रा में जाने की तैयारी में जुटे हुए हैं। हमसे कुछ दिन पहले यहां आसाराम बापू आकर गए थे और जिस डोंगरकिन्ही गांव के अंतर्गत म्हस्के बस्ती आता है, वहां आजकल लगातार सत्संग-कीर्तन के दौर चालू हैं।

मौत पर भारी मराठा आत्‍मसम्‍मान: म्‍हस्‍के गांव के बुलंद सरपंच 
हमने सरपंच से पूछा, ‘‘आप किसे वोट देते हैं?’’ ‘‘दादा की पार्टी को’’, जवाब आता है। यहां दादा का मतलब अजित पवार है। हमारे लिए यह आश्चर्य से कम नहीं था। सूखे बांध में पेशाब करने की इच्छा रखने वाले अजित पवार को आखिर यहां वोट क्यों पड़ते हैं? विट्ठल के भाई हंसते हुए बताते हैं कि इसका कोई विकल्प नहीं है। चीनी और गन्ने के पूरे धंधे पर पश्चिमी महाराष्ट्र के नेताओं का कब्जा है। इन्हें वोट ना दिया जाए तो ये अपने शहर में घुसने नहीं देंगे गन्ना काटने के लिए। और यह कहानी सिर्फ म्हस्के बस्ती के 300 लोगों की नहीं है, बीड जिले के करीब चार लाख गन्ना मजदूरों की है। कहते हैं कि बीड मराठवाड़ा का राजस्थान है। पूरे मराठवाड़ा से पांच लाख पलायन हुआ है और अकेले बीड से साढ़े तीन लाख। विट्ठल की कहानी लाखों लोगों की मजबूरी और मराठा आत्मसम्मान के आगे बहुत छोटी पड़ जाती है।

गांव सूखा है, लेकिन सरपंच की बोलेरो टंच है 
मराठवाड़ा में मजबूरियां और भी हैं। मसलन, पाटोदा तालुका के ही चुंबली गांव में सरपंच अच्युत पवल के खिलाफ दबी जबान में भले एकाध युवक बोल लेते हैं, लेकिन ग्रामीण उन्हें वोट दिए जाने को सही ठहराते हैं। इस गांव के पास प्रशासन की ओर से टंटामुक्त ग्राम का सर्टिफिकेट है। आम तौर पर ऐसे प्रमाणपत्र का अर्थ यह होता है कि यहां की लड़ाइयां आपस में मिलकर सुलझा ली जाती हैं। ज़ाहिर है, सत्ता का एक मजबूत केंद्र यानी सरपंच की ताकत ऐसे प्रमाण पत्रों से पता चलती है। बारहवीं पास कर चुके गांव के ही युवक ऋषिकेश बताते हैं कि नया सरपंच पुराने वाले से कम भ्रष्ट है इसलिए उसे बनाए रखने में लोगों की दिलचस्पी है। यहां ज्यादा भ्रष्ट का मतलब चुनाव में वोटरों को बांटे गए 34 लाख रुपए और कम भ्रष्ट का मतलब सिर्फ 15 लाख। सरपंच खुद बताते हैं, ‘‘हम सब लोग एनसीपी को वोट देते हैं।’’ क्यों? इस सवाल का जवाब गांव के बड़े-बुजुर्ग यही देते हैं कि ऐसा ना करें तो गन्ना काटने पश्चिमी महाराष्ट्र में घुसने नहीं दिया जाएगा। रोज़गार और राजनीति के इस आपसी रिश्ते को बीड के सीपीआई जिला सचिव नागरगोजे कुछ इस तरह बयां करते हैं, ‘‘मैंने पानी संकट पर एक मोर्चा निकालने की तैयारी की थी। सब लोग एक दिन पहले तक तैयार थे कि वे मोर्चे में आएंगे। ऐन मोर्चे के वक्त कोई नहीं आया।’’ 

यहां मोर्चा निकालने की फुरसत किसे है : टंटामुक्‍त ग्राम चुबली का एक दृश्‍य 



1 टिप्पणी:

batrohi ने कहा…

पहली क़िस्त को उस दिन सरसरी तौर पर पढ़ा और जॉर्ज ऑरवेल का उद्धरण देते हुए मैंने अपनी व्यथा लिखी जिसमें मराठवाड़ा के दुष्काल से अधिक अपने उपन्यास को लेकर मित्रों की चुप्पी को लेकर अवसाद था. करीब पांच बजे पहली क़िस्त पढने के बाद सो गया. करीब सात बजे उठा तो देखा प्रभात रंजन ने उसे अपने ब्लॉग 'जानकीपुल' में प्रकाशित किया था. पूरे शरीर में टूटन और हरारत महसूस हुई. शाम से बुखार तेज हो गया और ऐसे मौकों पर ताक में बैठी रहने वाली पाइल्स की बीमारी ने हमला कर ही दिया. दो दिन तक पढ़ना-लिखना करीब-करीब बंद. पता नहीं बुखार का हमला सामान्य वायरल था या लेख का असर!
शायद तीसरी क़िस्त में अभिषेक ने लिखा है, ''यह सारा विमर्श दरअसल सूखे या दुष्काल का नहीं है, सामाजिक संकट का है। यह बदलते हुए समाज की तस्वीर है।'' आज रात के सवा दो बजे चौथी क़िस्त पढ़ते हुए सोचने लगा, किस समाज का बदलता हुआ परिदृश्य है यह? शरद पंवार, अम्बेदकर और ठाकरे के महाराष्ट्र का या समूचे हिंदुस्तान में नए पनप रहे समाज का? हमारे उत्तराखंड की हालत क्या इससे फर्क है? पंकज जी ने कुछ महीने पहले 'समयांतर' में टिहरी बांध को लेकर विस्तार से कई लेख छापे थे. चारू तिवारी, गीता गैरोला, महिपाल सिंह और खुद पंकज ने इस मुद्दे पर लम्बी प्रभावशाली टिप्पणियां की थीं. मजेदार बात यह है कि पहाड़ की कविता की 'जान' समझे जाने वाले जगूड़ी जी (जिन्हें यहाँ के लोग सम्मान के साथ 'जुगाड़ी जी' कहते है) मुख्यमंत्री बहुगुणा की गोद में जा बैठे हैं और उनके दो-एक अन्य छोटे बिरादर-कवि हिंदी के 'खरे' बहसबाजों के साथ हिंदी की नामवर राष्ट्रीय कविता पर अपने स्पष्टीकरण दे रहे हैं. मैंने अपने उपन्यास में अभिषेक की तर्ज पर यही तो कहा है कि जिस तरह मराठवाड़ा में टैंकरों में पानी बिक रहा है, उत्तराखंड में सरकारी जमीनें हथिया कर यहाँ के पुरोहित देवताओं के मंदिर बेच रहे हैं. मंदिरों की खपत पूरी हो जाएगी तो अगला नंबर कुकिंग गैस के टैंकरों में हिमालय की शुद्ध हवा की खपत का ही होगा.

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