7/31/2013

हंस की गोष्‍ठी पर वरवर राव का खुला पत्र

क्रांतिकारी कवि वरवर राव
प्रेमचंद जयंती पर हंस के सालाना कार्यक्रम में आए कई लोग जानते थे कि अरुंधति राय की सहमति के बगैर उनका नाम आमंत्रण में छपा था इसलिए वे नहीं आ रही हैं। कुछ लोगों को यह भी पता था कि वरवर राव दिल्‍ली आ चुके हैं लेकिन यहां आने पर उन्‍हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करने के बारे में पता चला है, इसलिए उन्‍होंने कार्यक्रम का बहिष्‍कार किया है। इतना जानने के बावजूद जानने वाले चुप रहे और हंस के संपादक राजेंद्र यादव अंत तक जनता को झूठ बोलकर बरगलाते रहे। आखिरकार कार्यक्रम खत्‍म होने के बमुश्किल घंटे भर बाद वरवर राव की ओर से कार्यक्रम में न शामिल होने पर एक खुला पत्र जारी किया गया जिसे हम पूरा नीचे चिपका रहे हैं। पढि़ए और समझिए कि सफेद हंस के काले चश्‍मे से आखिर सच्‍चाई कैसी दिखती है, कैसी दिखाई जाती है और इस चश्‍मे के भीतर कितने झूठ पैबस्‍त हैं।   (मॉडरेटर) 



मुक्तिबोध की हजारों बार दुहराई गई पंक्ति को एक बार फिर दुहरा रहा हूं: ''उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे/ तोड़ने ही होंगे/ गढ़ और मठ/सब।'' 

कुछ साल पहले की बात है जब मेरे साथ अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक समिति और अखिल भारतीय जनप्रतिरोध मंच में काम करने वाले क्रांतिकारी उपन्यासकार और लेखक विजय कुमार ने आगरा से लेकर गोरखपुर तक हिंदी क्षेत्र में प्रेमचंद की जयंती पर एक सांस्कृतिक यात्रा आयोजित करने का प्रस्ताव दिया था। यह हिंदुत्व फासीवाद के उभार का समय था, जो आज और भी भयावह चुनौती की तरह सामने खड़ा है। उस योजना का उद्देश्‍य उभर रही फासीवाद की चुनौती से निपटने के लिए प्रेमचंद को याद करना और लेखकीय परम्परा को आगे बढ़ाकर इसके खिलाफ़ एक संगठित सांस्कृतिक आंदोलन को बनाना था।

जब ‘हंस’ की ओर से प्रेमचंद जयंती पर 31 जुलाई 2013 को ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया तो मुझे लगा कि अपनी बात रखने का यह अच्छा मौका है। प्रेमचंद और उनके संपादन में निकली पत्रिका ‘हंस’ के नाम के आकर्षण ने मुझे दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया। इस आयोजन के लिए चुना गया विषय ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' ने भी मुझे आकर्षित किया। जब से मैंने नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के प्रभाव में लेखन और सांस्कृतिक सक्रियता में हिस्सेदारी करनी शुरू की तब से मेरी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगता ही रहा है। यह स्वाभाविक था कि इस पर विस्तार से अपने अनुभवों को आपसे साझा करूं। 

मुझे ‘हंस’ की ओर से 11 जुलाई 2013 को लिखा हुए निमंत्रण लगभग 10 दिन बाद मिला। इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेंद्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण कार्ड में डाल देने की घोषणा कर रखी थी। बहरहाल, मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन, क्यों और किस मंशा से बुला रहा है? मेरे साथ मंच पर इस विषय पर बोलने वाले कौन हैं?

आज दोपहर में दिल्ली में आने पर ''हंस'' की ओर से भेजे गए व्यक्ति के पास छपे हुए निमत्रंण कार्ड को देखा तब पता चला कि मेरे अलावा बोलने वालों में अरुंधति राय के साथ अशोक वाजपेयी व गोविंदाचार्य का भी नाम है। प्रेमचंद जयंती पर होने वाले इस आयोजन में अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य का नाम वक्ता के तौर पर देखकर हैरानी हुई। अशोक वाजपेयी प्रेमचंद की सामंतवाद-फासीवाद विरोधी धारा में कभी खड़े  होते नहीं दिखे। वे प्रेमचंद को औसत लेखक मानने वालों में से हैं। अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कारपोरेट सेक्टर के साथ जुड़ाव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी तरह क्या गोविंदाचार्य के बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है? हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया!

मंच पर बाएं से संचालक अजय नावरिया, राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी और के.एन. गोविंदाचार्य (खड़े) भाषण देने के बाद   

मैं इस आयोजन में हिस्सेदारी कर यह बताना चाहता था कि अभिव्यक्ति पर सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का खतरा उठा रहे लोगों की हत्या तक की जा रही है। आंध्र प्रदेश में खुद मेरे ऊपर, गदर पर जानलेवा हमला हो चुका है। कितने ही सांस्कृतिक, मानवाधिकार संगठन कार्यकर्ता और जनसंगठन के सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। हजारों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। अभी चंद दिनों पहले हमारे सहकर्मी गंटि प्रसादम् की क्रूर हत्या कर दी गई। गंटी प्रसादम् जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा-आरडीएफ के उपाध्यक्ष, शहीद बंधु मित्र में सक्रिय सहयोगी और विप्लव रचियता संघम् के अभिन्न सहयोगी व सलाहकार और खुद लेखक थे। विरसम ने उनकी स्मृति में जब एक पुस्तक लाने की योजना बनाई और इस संदर्भ में एक वक्तव्य जारी किया तब हैदराबाद से कथित ''छत्तीसगढ चीता'' के नाम से विरसम सचिव वरलक्ष्मी को जान से मारने की धमकी दी गई। इस धमकी भरे पत्र में वरवर राव, प्रो. हरगोपाल, प्रो. शेषैया, कल्याण राव, चेलसानी प्रसाद सहित 12 लोगों को जान से मारने की चेतावनी दी गई है। लेखक, मानवाधिकार संगठन, जाति उन्मूलन संगठनों के सक्रिय सदस्यों को इस हमले में निशाना बनाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस खतरे के खिलाफ हम एकजुट होकर खड़े हुए और हमने गंटी प्रसादम् पर पुस्तक और उन्हें लेकर सभा का आयोजन किया। इस सभा के आयोजन के बाद एक बार फिर आयोजक को जान से मार डालने की धमकी दी गई। अभिव्यक्ति का यह भीषण खतरा साम्राज्यवादी-कारपोरेट लूट के खिलाफ अभियान, राजकीय दमन की खिलाफत और हिंदुत्व फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के चलते आ रहा है। यह जन आंदोलन की पक्षधरता और क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा को आगे ले जाने के चलते हो रहा है। 

हैदराबाद में अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ एक सभा को संबोधित करने के समय हिंदुत्व फासीवादी संगठनों ने हम पर हमला किया और इसी बहाने पुलिस ने हमें गिरफ्तार किया। इसी दिल्ली में जंतर-मंतर पर क्या हुआ, आप इससे परिचित होंगे। अफजल गुरू के शरीर को ले जाने की मांग करते हुए कश्‍मीर से आई महिलाओं और अन्य लोगों को न तो जंतर-मंतर पर एकजुट होने दिया गया और न ही मुझे और राजनीतिक जेल बंदी रिहाई समिति के सदस्यों को प्रेस क्लब, दिल्ली में बोलने दिया गया। प्रेस क्लब में जगह बुक हो जाने के बाद भी प्रेस क्लब के आधिकारिक कार्यवाहक, संघ परिवार व आम आदमी पार्टी के लोग और पुलिस के साथ साथ खुद मीडिया के भी कुछ लोगों ने हमें प्रेस काफ्रेंस नहीं करने दिया और वहां धक्कामुक्की की। 

मैं जिस जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा का अध्यक्ष हूं, वह संगठन भी आंध्र प्रदेश, ओडिशा में प्रतिबंधित है। इसके उपाध्यक्ष गंटी प्रसादम् को जान से मार डाला गया। इस संगठन के ओडिशा प्रभारी दंडोपाणी मोहंती को यूएपीए सहित दर्जनों केस लगाकर जेल में डाल दिया गया है। इस संगठन का घोषणापत्र सबके सामने है। पिछले सात सालों से जिस काम को किया है वह भी सामने है। न केवल यूएपीए बल्कि गृह मंत्रालय के दिए गये बयानों व निर्देशों में बार-बार जनआंदोलन की पक्षधरता करने वाले जनसंगठनों, बुद्धिजीवितयों, सहयोगियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, प्रतिबंधित करने, नजर रखने का सीधा अर्थ हमारी अभिव्यक्ति को कुचलना ही है। हम ‘लोकतंत्र’ की उसी हकीकत की आलोचना कर रहे हैं जिससे सारा देश वाकिफ है। जल, जंगल, जमीन, खदान, श्रम और विशाल मध्यवर्ग की कष्टपूर्ण बचत को लूट रहे साम्राज्‍यवादी-कारपोरेट सेक्टर और उनकी तानाशाही का हम विरोध करते हैं। हम वैकल्पिक जनवादी मॉडल की बात करते हैं। हम इस लूट और तबाही और मुसलमान, दलित, स्त्री, आदिवासी, मेहनतकश पर हमला करने वाली और साम्राज्यवादी विध्वंस व सामूहिक नरसंहार करने वाली हिंदुत्व फासीवादी राजनीति का विरोध करते हैं। 

हम ऐसे सभी लोगों के साथ हैं जो जनवाद में भरोसा करते हैं। हम उन सभी लोगों के साथ हैं जो अभिव्यक्ति का खतरा उठाते हुए आज के फासीवादी खतरे के खिलाफ खड़े हैं। हम प्रेमचंद की परम्परा का अर्थ जनवाद की पक्षधरता और फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के तौर पर देखते है। प्रेमचंद की यही परम्परा है जिसके बूते 1930 के दशक में उपनिवेशवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी लहर की धार इस सदी में हमारे इस चुनौतीपूर्ण समय में उतनी ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रेरक बनी हुई है।

अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्‍ट क्या है? बहरहाल, कारपोरेट सेक्टर की संस्कृति और हिंदूत्व की राजनीति करने वाले लोगों के साथ मंच पर एक साथ खड़ा होने को मंजूर करना न तो उचित है और न ही उनके साथ ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' जैसे विषय पर बोलना मौजूं है।

प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जो भी लोग मुझे सुनने आए उनसे अपनी अनुपस्थिति की माफी दरख्वास्त कर रहा हूं। उम्मीद है आप मेरे पक्ष पर गौर करेंगे और अभिव्यक्ति के रास्ते आ रही चुनौतियों का सामना करते हुए हमसफर बने रहेंगे।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
वरवर राव
31 जुलाई 2013, दिल्ली 

7/30/2013

मोर्चा संभालो अपना, वीरेनदा!

पलाश बिस्‍वास 
कविता कैसे लिखी जाए या कोई व्‍यक्ति कवि कैसे कहलाए, इससे कहीं ज्‍यादा अहम बात यह है कि जो लिखा जा रहा है उसमें कविताई कितनी है। वह आपको कितना जोड़ पा रहा है। उसमें पढ़ने वाले को खुद से जोड़ने की संवेदना कितनी है। पलाश बिस्‍वास उर्फ पलाशदा बरसों से कलकत्‍ता में रह रहे हैं और जनसत्‍ता में नौकरी करते हुए बामसेफ आदि मंचों से लगातार सरोकार के विषयों पर स्‍वतंत्र हस्‍तक्षेप करते रहे हैं। खूब लिखते हैं, खूब मेल करते हैं और रोज़ रात को हमारे मेलबॉक्‍स इनकी मेल से भर जाते हैं। लेकिन इस बार इन्‍होंने जो लिखा है, वह न सिर्फ अद्भुत है, जबरदस्‍त प्‍यार और संवेदना को दर्शा रहा है, वैश्विक चिंताओं को आवाज़ दे रहा है और साथ ही निजी स्‍मृतियों का आवाहन भी कर रहा है। किसी प्रियजन पर कैसे एक बेहतरीन कविता लिखी जा सकती है, कवि वीरेन डंगवाल पर पलाशदा की लिखी इन दुर्लभ पंक्तियों से इसे समझा जा सकता है। संदर्भ है आगामी 5 अगस्‍त को वीरेनदा के 67वें जन्‍मदिन पर दिल्‍ली में होने वाला एक जुटान।  (मॉडरेटर) 


वीरेनदा के लिए 


क्या वीरेनदा, ऐसी भी नौटंकी क्या जो तुमने आज तक नहीं की

गये थे रायगढ़ कविता पढ़ने और तब से

लगातार आराम कर रहे हो

अस्वस्थता के बहाने

कब तक अस्वस्थ रहोगे वीरेन दा

यह देश पूरा अस्वस्थ है

तुम्हारी सक्रियता के बिना

यह देश स्वस्थ नहीं हो सकतावीरेन दा


राजीव अब बड़ा फिल्मकार हो गया

फिल्म प्रभाग का मुख्य निदेशक है इन दिनों

फोन किया कि वीरेनदा का जन्मदिन मनाने दिल्ली जाना होगा

बल्कि, सब लोग जुटेंगे दिल्ली में

भड़ास पर पगले यशवंत ने तो विज्ञापन भी टांग दिया

किमो तो फुटेला को भी लगे बहुत

देखो कैसे उठ खड़ा हुआ

और देखो कैसे टर्रा रहा है जगमोहन फुटेलावीरेन दा!


आलसी तो तुम शुरू से हो

कंजूस रहे हो हमेशा लिखने में

अब अस्वस्थ हो गये तो क्या

लिखना छोड़ दोगे?

ऐसी भी मस्ती क्या?

मस्ती मस्ती में बीमार ही रहोगे

हद हो गयी वीरेनदा!


एक गिरदा थे

जिसे परवाह बहुत कम थी सेहत की

दूजे तुम हुए लापरवाह महान

सेहत की ऐसी तैसी कर दी

अब राजधानी में डेरा डाले होंबरेली को भूल गये क्या वीरेन दा?


अभी तो जलप्रलय से रूबरू हुआ है यह देश

अभी तो ग्लेशियरों के पिघलने की खबर हुई है

अभी तो सुनायी पड़ रही घाटियों की चीखें

अभी तो डूब में शामिल तमाम गांव देने लगे आवाज़


बंध नदियां रिहाई को छटफटा रही हैं अभी

लावारिस है हिमालय अभी

गिरदा भी नहीं रहा कि

लिखता खूब

दौड़ता पहाड़ों के आर-पार

हिला देता दिल्ली-लखनऊ-देहरादून

अभी तुम्हारी कलम का जादू नहीं चला तो

फिर कब चलेगा वीरेनदा?

कुछ गिरदा के अधूरे काम का ख्याल भी करो वीरेनदा!


तुमने कोलकाता भेज दिया मुझे

कहा कि जब चाहोगे

अगली ट्रेन से लौट आना

सबने मना किया था

पर तुम बोले, भारत में तीनों नोबेल कोलकाता को ही मिले

नोबेल के लिए मुझे कोलकाता भेजकर

फिर तुम भूल गये वीरेनदा!


अभी तो हम ठीक से शुरू हुए ही नहीं

कि तुम्हारी कलम रुकने लगी है वीरेनदा!

ऐसे अन्यायीबेफिक्र तो तुम कभी नहीं थे वीरेनदा!


चूतिया बनाने में जवाब नहीं है तुम्हारा वीरेनदा!

हमारी औकात जानते हो

याद है कि

नैनी झील किनारे गिरदा संग

खूब हुड़दंग बीच दारू में धुत तुमने कहा थावीरेनदा!


पलाशतू कविता लिख नहीं सकता!


तब से रोज़ कविता लिखने की प्रैक्टिस में लगा हूं वीरेनदा

और तुम हो कि अकादमी पाकर भी खामोश होने लगे हो वीरेनदा!


तुम जितने आलसी भी नहीं हैं मंगलेश डबराल

उनकी लालटेन अभी सुलग रही है

तुम्हारा अलाव जले तो सुलगते रहेंगे हम भी वीरेनदा!


नज़रिया के दिन याद हैं वीरेन दा

कैसे हम लोग लड़ रहे थे इराक युद्ध अमेरिका के खिलाफ

तुम्हीं तो थे कि वह कैम्पेन भी कर डाला

और लिख मारा `अमेरिका से सावधान'

साम्राज्यवादविरोधी अभियान के पीछे भी तो तुम्हीं थे वीरेनदा!


अब जब लड़ाई हो गयी बहुत कठिन

पूरा देश हुआ वधस्थल

खुले बाजार में हम सब नंगे खड़े हैं आदमजाद!

तब यह अकस्मात तुम

खामोशी की तैयारी में क्यों लगे हो वीरेनदा?


आलोक धन्वा ने सही लिखा है!

दुनिया रोज़ बनती है, सही है

लेकिन इस दुनिया को बनाने की जरूरत भी है वीरेनदा!


दुनिया कोई यूं ही नहीं बन जाती वीरेनदा!

अपनी दुनिया को आकार देने की बहुत जरूरत है वीरेनदा!

तुम नहीं लिक्खोगे तो

क्या खाक बनती रहेगी दुनिया, वीरेनदा!



इलाहाबाद में खुसरोबाग का वह मकान याद है?

सुनील जी का वह घर

जहां रहते थे तुम भाभी के साथ?

तुर्की भी साथ था तब

मंगलेश दा थे तुम्हारे संग

थोड़ी ही दूरी पर थे नीलाभ भी

अपने पिता के संग!


इलाहाबाद का काफी हाउस याद है?

याद है इलाहाबाद विश्वविद्यालय?

तब पैदल ही इलाहाबाद की सड़कें नाप रहा था मैं

शेखर जोशी के घर डेरा डाले पड़ा था मैं

100, लूकरगंज में

प्रतुल, बंटी और संजू कितने छोटे थे

क्या धूम मचाते रहे तुम वीरेनदा!

तब हम ख्वाबों के पीछे

बेतहाशा भाग रहे थे वीरेनदा!

अब देखोहकीकत की ज़मीन पर

कैसे मजबूत खड़े हुए हम अब!

और तुम फिर ख्वाबों में कोन लगे वीरेनदा!


अमरउ जाला में साथ थे हम

शायद फुटेला भी थे कुछ दिनों के लिए

तुम क्यों चूतिया बनाते हो लोगों को?

हम तुम्हारी हर मस्ती का राज़ जानते हैं वीरेनदा!

कोई बीमारी नहीं है

जो तुम्हारी कविता को हरा दे, वीरेनदा!

अभी तो उस दिन तुर्की की खबर लेने बात हुई वीरेनदा!

तुम एकबार फिर दम लगाकर लिक्खो तो वीरेनदा!


तुमने भी तो कहा था कि धोनी की तरह

आखिरी गेंद तक खेलते जाना है!

खेल तो अभी शुरू ही हुआ है, वीरेनदा!


जगमोहन फुटेला से पूछकर देखो!

उससे भी मैंने यही कहा था वीरेन दा!

अब वह बंदा तो बिल्कुल चंगा है

असली सरदार से ज्यादा दमदार

भंगड़ा कर रहा है वह भी वीरेनदा!


यशवंत को देखो

अभी तो जेल से लौटा है

और रंगबाजी तो देखो उसकी!

जेलयात्रा से पहले

थोड़ा बहुत लिहाज करता था

अब किसी को नहीं बख्शता यशवंत!

मीडिया की हर खबर का नाम बन गया भड़ासवीरेनदा!

अच्छे-अच्छों की बोलती बंद है वीरेनदा!


हम भी तो नहीं रुके हैं

तुमने भले जवानी में बनाया हो चूतिया हमें

कि नोबेल की तलाश में चला आया कोलकाता!

अपने स्वजनों को मरते-खपते देखा तो

मालूम हो गयी औकात हमारी!


यकीन करो कि हमारी तबीयत भी कोई ठीक

नहीं रहती आजकल

कल दफ्तर में ही उलट गये थे

पर सविता को भनक नहीं लगने दी

संभलते ही तु्म्हारे ही मोरचे पर जमा हूंवीरेनदा!


तुम्हारी जैसी या मंगलेश जैसी

प्रतिभा हमने नहीं पायी

सिर्फ पिता के अधूरे मिशन के कार्यभार से

तिलांजलि दे दी सारी महत्वाकांक्षाएं

और तुरंत नकद भुगतान में लगा हूंवीरेनदा!


दो तीन साल रह गये

फिर रिटायर होना है

सर पर छत नहीं है

हम दोनों डायाबेटिक

बेटा अभी सड़कों पर

लेकिन तुमहारी तोपें हमारे मोर्चे पर खामोश नहीं होंगी वीरेनदा!

तुमने चेले बनाये हैं विचित्र सारे के सारेवीरेनदा!

उनमें कोई खामोशी के लिए बना नहीं है वीरेनदा!

तुम्हें हम खामोशी की इजाज़त कैसे दे दें वीरेनदा!



बहुत हुआ नाटक वीरेन दा!

सब जमा होंगे दिल्ली में

सबका दर्शन कर लो मस्ती से!

फिर जम जाओ पुराने अखाड़े में एकबार फिर

हम सारे लोग मोर्चाबंद हैं एकदम!

तुम फिर खड़े तो हो जाओ एकबार फिर वीरेनदा!


फिर आजादी की लड़ाई लड़ी जानी है

गिरदा भाग निकला वक्त से पहलेवीरेनदा!


और कविता के मोर्चे पर तुम्हारी यह खामोशी

बहुत बेमज़ा कर रही है मिजाज़ वीरेनदा!


तुम ऐसे नहीं मानोगे

तो याद है कि कैसे अमर उजाला में

मैंने जबरन तुमसे अपनी कहानी छपवा ली थी!


अब बरेली पर धावा बोल तो नहीं सकता

घर गये पांच साल हो गये

पर तुमने कहा था कि

पलाशतू कविता लिख ही नहीं सकता!


तुम्हारी ऐसी की तैसी वीरेनदा!

अब से एक से बढ़कर एक खराब कविता लिक्खूंगा वीरेनदा!

भद तुम्हारी ही पिटनी है

इसलिए बेहतर हैवीरेनदा!

जितना जल्दी हो एकदम ठीक हो जाओ,वीरेनदा!


और मोर्चा संभालो अपनावीरेनदा!

हम सभी तुम्हारे मोर्चे पर मुस्‍तैद हैं वीरेनदा!


और तुम हमसे दगा नहीं कर सकते वीरेनदा!



7/27/2013

हिंदी के लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, संस्‍कृतिकर्मियों और पाठकों का सामूहिक बयान

हम हिंदी के लेखक, कवि, बुद्धिजीवी, सांस्कृतिक कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार  और इंटरनेट पर सक्रिय पाठक देश के समक्ष उपस्थित तमाम चुनौतियों पर एतद्द्वारा अपना पक्ष रख रहे हैं तथा सम्बंधित सरकारों/अधिकारियों के समक्ष अपनी मांगे प्रस्तुत कर रहे है. यह कोई सांगठनिक कार्यवाही न होकर एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में हमारी सामूहिक कार्यवाही है.

१-     हम उत्तराखंड में आई भयावह प्राकृतिक आपदा पर गहरा शोक प्रकट करते हैं और उत्तराखंड की राज्य सरकार तथा संघीय सरकार से मांग करते हैं कि न सिर्फ़ पीड़ितों को मुआवज़ा दिलाया जाय, पुनर्वास की पूरी व्यवस्था करे बल्कि पहाड़ों पर विकास के नाम पर अंधाधुंध निर्माण और लूट की व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार करते हुए पर्यावरण के अनुकूल नई नीतियाँ बनाए जिससे भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सके.  

२-     हम बिहार में विषाक्त मध्याह्न भोजन के चलते हुई बच्चों की दर्दनाक मृत्यु पर गहरा शोक और क्षोभ प्रकट करते हैं. यह किसी भी सभ्य समाज के लिए एक शर्मनाक घटना है. हमारे प्रशासन इतने नाकाबिल, नाकारा और असंवेदनशील हो चुके हैं कि इस तरह बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करते भी नहीं चूकते. हम बिहार की राज्य सरकार तथा संघीय सरकार से यह मांग करते हैं कि इस घटना की पूरी जाँच करा दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा तो दी ही जाय साथ ही मध्याह्न भोजन का बजट बढाया जाय ताकि बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार मिल सके और इस योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए शीघ्र आवश्यक क़दम उठाये जाए. साथ ही हम देशभर में एक समान शिक्षा की नीति बनाने तथा इस क्षेत्र में निजीकरण पर रोक लगाने की मांग करते हैं.


३-     हम छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के मामले में हो रही न्याय में देरी के प्रति गहरी चिंता प्रकट करते हैं तथा माननीय उच्च न्यायालय से यह अपील करते हैं कि इस मामले में जल्दी से जल्दी और न्यायपूर्ण फ़ैसला सुनाया जाय. हम छत्तीसगढ़ सरकार तथा संघीय सरकार से मांग करते हैं कि इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराई जाय तथा दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय.

४-     हम कश्मीर में ज़ारी हालिया हिंसा पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं तथा कश्मीर की राज्य सरकार व संघीय सरकार से मांग करते हैं कि कश्मीर नीति पर पुनर्विचार करते हुए ऐसे प्रयास किये जाँय कि न सिर्फ़ घाटी में शान्ति स्थापित हो बल्कि कश्मीर से विस्थापित जन के पुनर्वास के लिए माहौल भी बनाया जा सके. हम घाटी के हिंसा पीड़ित लोगों के लिए और कश्मीर से विस्थापित जन के लिए  न्याय की मांग करते हैं. हम संघीय सरकार से AFSPA पर पुनर्विचार करने की मांग करते हैं.


५-     हम पूर्वोत्तर में ज़ारी हिंसा पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता एवं कवयित्री इरोम शर्मिला के प्रति अपना समर्थन और अपनी संवेदना प्रकट करते हुए संघीय सरकार से मांग करते हैं कि उनसे बातचीत की प्रक्रिया शुरू की जाय, उनकी माँगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाय और ऐसे हालत बनाए जाँय जिससे वह अपना अनशन समाप्त करने के लिए राज़ी हों.

६-     इशरत जहाँ तथा देश भर में फर्जी मुठभेड़ के शिकार लोगों के लिए न्याय की मांग करते हैं. इस मामले में ऐसी पहलकदमी की मांग करते हैं जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके. साथ ही यह मांग करते हैं कि  देश भर में फर्जी मुकदमें में बंद लोगों, खासतौर पर आदिवासी, अल्पसंख्यक, तथा दलितों पर पुनर्विचार कर दोषमुक्त पाए जाने पर रिहा किया जाये .


७-     इलाहाबाद में कार्यालय महालेखाकार में पदस्थ जाने-माने हिंदी के कवि यश मालवीय के अमानवीय उत्पीड़न पर अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हैं तथा माननीय राष्ट्रपति महोदय तथा महालेखाकार महोदय से इस मामले में हस्तक्षेप करने तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग करते हैं.  

हस्ताक्षर  (सहमति के क्रम में)

१-     वीरेन्द्र यादव
२-     राजेश जोशी
३-     अरुण कमल
४-     केशव तिवारी
५-     शिरीष कुमार मौर्य
६-     विमलेश त्रिपाठी
७-     समर अनार्य
८-     राशिद अली
९-     अनघ शर्मा
१०-                        अभिनव श्रीवास्तव
११-                        कुमार अनुपम
१२-                        आदित्य प्रकाश
१३-                        अमित उपमन्यु
१४-                        कपिल शर्मा
१५-                        दिनेश राय द्विवेदी
१६-                        सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी
१७-                        अभिषेक ठाकुर
१८-                        आनंद कुमार द्विवेदी
१९-                        संदीप मील
२०-                        रामजी यादव
२१-                        पंकज मिश्रा
२२-                        राजेश कुमार खोबरा
२३-                        मनिका मोहिनी
२४-                        अरुण मिश्र
२५-                        दिगंबर ओझा
२६-                        हिमांशु पांड्या
२७-                        मनोज पाण्डेय
२८-                        रामजी तिवारी
२९-                        सचिन कुमार जैन
३०-                        अमलेंदु कुमार उपाध्याय
३१-                        शिव कुमार गांधी
३२-                        संज्ञा उपाध्याय
३३-                        निधि मेहरोत्रा
३४-                        आशीष मिश्रा
३५-                        विपिन चौधरी
३६-                        शैलेन्द्र श्रीवास्तव
३७-                        रजनीश साहिल
३८-                        अशोक मिश्र
३९-                        नूर ज़हीर
४०-                        अमर नदीम
४१-                        नीरज जैन
४२-                        राजेश गुप्ता
४३-                        सुनीता सानाढ्य पाण्डेय
४४-                        संदीप वर्मा
४५-                        मंजरी श्रीवास्तव
४६-                        देवयानी भारद्वाज
४७-                        कृष्ण कांत
४८-                        सौमित्र सक्सेना
४९-                        अमर नदीम
५०-                        अलका भारतीय
५१-                        रश्मि कीर्ति
५२-                        रामजी तिवारी
५३-                        केशव तिवारी
५४-                        संतोष चतुर्वेदी
५५-                        उमराह अज़ीज़
५६-                        निष्ठा सक्सेना
५७-                        अजन्ता देव
५८-                        मिथिलेश शरण चौबे
५९-                        मुकेश कुमार
६०-                        चन्दन भारद्वाज
६१-                        पुष्य मित्र
६२-                        अरुण अनिल सिंह
६३-                        विवेक भटनागर
६४-                        रोहिणी अग्रवाल
६५-                        गुलज़ार हुसैन
६६-                        जाय श्री राय
६७-                        अतुलेश अतुल ‘
६८-                        नीलाम्बुज सिंह
६९-                        विनीता मलिक
७०-                        आसिफ़ खान
७१-                        रिया सेन
७२-                        हरिओम राजोरिया
७३-                        उषा राय
७४-                        राकेश बिहारी
७५-                        देव यादव
७६-                        पल्लव
७७-                        पंकज चतुर्वेदी
७८-                        राजेश उत्साही
७९-                        कुलदीप अंजुम
८०-                        शम्भू यादव
८१-                        राजेश परेवा
८२-                        विजय शर्मा
८३-                        विनोद कुमार सिंह
८४-                        उद्भव मिश्र
८५-                        अस्स्मुरारी नंदन मिश्र
८६-                        प्रमोद कुमार तिवारी
८७-                        विमल चन्द्र पाण्डेय
८८-                        विनय अम्बर
८९-                        खुर्शीद अनवर
९०-                        अरविन्द चतुर्वेद
९१-                        लोकेश मालती प्रकाश
९२-                        प्रताप दीक्षित
९३-                        नलिन रंजन सिंह
९४-                        मुकुल सरल
९५-                        गंगा सहाय मीणा
९६-                        राजन विरूप
९७-                        मनोज कुमार झा
९८-                        सिद्धांत सूचित
९९-                        प्रेमचंद गांधी
१००-                   शशिकांत चौबे
१०१-                   अरुणाकर पाण्डेय
१०२-                   मलखान सिंह
१०३-                   महेश चन्द्र पुनेठा
१०४-                   नन्द किशोर नीलम
१०५-                   अनीता भारती
१०६-                   संजीव कुमार
१०७-                   सुधा ओम ढींगरा
१०८-                   मृत्युंजय प्रभाकर
१०९-                   अभिषेक श्रीवास्तव
११०-                   अभिनव आलोक
१११-                   कृष्णा मेनन
११२-                   महेंद्र मिहोन्वी
११३-                   सुबोध शुक्ला
११४-                   ओम निश्चल
११५-                   सविता सिंह
११६-                   सबा दीवान
११७-                   सुनील यादव
११८-                   नरेंद्र तोमर
११९-                   विशाल श्रीवास्तव
१२०-                   मदन कश्यप
१२१-                   गिरिराज किराडू
१२२-                   अशोक कुमार पाण्डेय
123-          मंगलेश डबराल
124-           विनोद कुमार तिवारी
125-           अग्नि शेखर
126-           आशुतोष कुमार
127-           लीना मल्‍होत्रा
128-           सुनील गज्‍जाणी
129-           सुभ कुमार
130-           रवींद्र कात्‍यायन
131-          मनोहर चमोली

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें