8/13/2013

डॉ. धर्मवीर पर मित्ररंजन का मूल लेख यहां पढ़ें

रविवार 11 अगस्‍त के जनसत्‍ता में मित्ररंजन का एक लेख छपा था ''गढ़े हुए तथ्‍यों का तूमार'', जिसमें डॉ. धर्मवीर के लिखे की आलोचना की गई थी। यह लेख जनसत्‍ता में संपादित कर के छापा गया था। इसका मूल लेख हम अविकल नीचे दे रहे हैं जो एक संक्षिप्‍त टिप्‍पणी के साथ मित्ररंजन ने जनसत्‍ता को प्रेषित किया था। (मॉडरेटर) 



तर्कहीन लेखन और थोथे बौद्धिक प्रदर्शन के नाम पर येनकेन प्रकारेण स्त्रियों की अस्मिता और पूरे वजूद पर निरर्थक प्रहारों का मौका खोजते रहनेवाले डॉ धर्मवीर ने प्रेमचंद की कहानी बालक का विश्लेषण करते हुए एक बार फिर अपनी कुंठित मनोग्रन्थि का परिचय दिया है। ऐसा वे प्रेमचंद की ही कहानी कफ़न के सन्दर्भ में स्वसृजित काल्पनिक तथ्यों का सहारा लेकर कहानी का नया पाठ प्रस्तुत करते हुए पहले कर चुके हैं। विगत दिनों प्रकाशित प्रोफेसर तुलसी राम की चर्चित आत्मकथा मुर्दहिया का विश्लेषण भी उन्होंने कुछ इसी तर्ज पर किया है जिसमें वर्णित कटु सामजिक यथार्थों, भारतीय सामाजिक संरचना में हाशिये की ज़िंदगी जीता दलित-वंचित समाज और उसे बनाये रखने के लिए जिम्मेदार मनुवादी वर्णव्यवस्था के खांचे में कैद पितृसत्तात्मक-सामंती ढांचे की पड़ताल और उससे टकराने व तोड़ने के कारगर हथियारों की खोज के बजाय वे महिलाओं के खिलाफ अपना विषवमन जारी रखते हैं। धर्मवीर जी की नजरों में दुनिया की हर दूसरी स्त्री नैतिक पतन का शिकार है। ऐसा वह अपनी आत्मकथा मेरी पत्नी और भेड़िया  में पहले ही कह चुके हैं। मानसिक पंगुता से ग्रस्त और स्वनिर्मित बौद्धिक श्रेष्ठता के दर्प से आत्ममुग्ध ऐसे व्यक्ति के बारे में क्या कहा जाये! पर इससे भी बड़ा सवाल ये है कि तथाकथित लोकतान्त्रिक उदारता को पल्लवित पुष्पित करने के नाम पर एक बड़े अखबार के नामचीन संपादक महोदय भी क्यों इन ‘मौलिक विचारों‘ को जगह देने पर तुले हैं? क्या आधी दुनिया के चरित्र हनन में उन्हें भी आत्मतोष प्राप्त हो रहा है? 

खैर, इस पर एक संक्षिप्त टिप्पणी। आगे धर्मवीर जी का वक्तव्य और प्रेमचन्द की कहानी भी संलग्न है।

प्रेमचंद के बहाने एक मूढ़मगज का आत्मालाप 


प्रेमचंद रचित बालक कहानी पर ४ अगस्त, २०१३ के जनसत्ता में मतान्तर में लिखी डॉ. धर्मवीर की टिप्पणी देख कर कुछ बातें साझा करना जरूरी लगा।

पहली बात तो यह कि धर्मवीर जी कुछ ऐसे ज्ञानी व्यक्ति हैं जो किस्म-किस्म के संदेहों के दलदल में फंसे हैं (पहले भवसागर में डूब-उतरा रहे हैं, लिखना चाहता था पर उनके लिए दलदल शब्द ही ठीक है जिससे बाहर निकलने की कोशिशों में आदमी धंसता जाता है और ये महाशय तो खैर अपने बनाये चैखटे से बाहर निकलना ही नहीं चाहते)।

जनसत्‍ता में छपे संपादित अंश 
अगर इस मर्मस्पर्शी कहानी में वो नवजात बालक के प्रति निरक्षर कहे जाने वाले नायक का अतुलनीय स्नेह नहीं देख पाते, अगर इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा रचे गए नियम-कानूनों से मजबूर और क्रूर हमलों से घायल गोमती देवी सरीखी स्त्रियों की वेदना नहीं समझ पाते और उसके प्रति गंगू के निश्छल प्रेम को मन की गहराइयों से महसूस नहीं कर पाते और इसमें भी वो तथाकथित जारकर्म की बू सूंघ लेते हैं तो उनके दिमाग की दाद देनी पड़ेगी। गंगू के मालिक का मानस तो कहानी का अंत आते-आते बदल जाता है पर धर्मवीर जी हमेशा की तरह इस कहानी में भी फेंटा बांध कर स्त्रियों की नैतिकता और शुचिता की खोज परीक्षा में लगे रहते हैं। अचरज नहीं कि धर्मवीर जी ने अपनी जिस लेखनी और अप्रतिम मेधा का परिचय अपनी जीवनी (मेरी पत्नी और भेड़िया) में दिया है और मानसिक दिवालियेपन व स्त्री विरोधी कुंठाओं से लबरेज हजार पृष्ठों की उनकी जिस ‘अनमोल कृति‘ को अविकल छापने का अद्भुत साहस वाणी प्रकाशन ने दिखाया है (इन विचारहीन मौलिक असहमतियों को जगह देनेवाले थानवी साहब भी ऐसे साहस के मामले में कोई अपवाद नहीं हैं जो आजकल अपने अखबार में लोकतान्त्रिक उदारता के नाम पर अनर्गल प्रलापों को चुन-चुन कर जगह दे रहे हैं), उस विचारहीन ठस मौलिकता की छाप उनकी तमाम मीमांसाओं में मिलती है।

कफ़न कहानी का जो कुपाठ धर्मवीर जी पहले ही पेश कर चुके हैं वो तो अपनी मौलिकता और स्वसृजित अनोखे तथ्यों की वजह से साहित्य के क्षेत्र में मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो ही चुका है। अपने काल्पनिक तथ्यों के सहारे सामनेवाले पर सुदर्शन चक्र चलाकर उसको मटियामेट कर देने के भ्रम में जीते धर्मवीर जी ने कुछ ऐसा ही कारनामा अपनी पत्रिका बहुरि नहीं आवना के जनवरी-सितम्बर २०११ के अंक में प्रोफेसर तुलसी राम जी की आत्मकथा मुर्दहिया की विवेचना में भी किया है जब वे उनकी माँ की चारित्रिक नैतिकता पर आक्षेप लगाने की कोशिश में सारे तर्कों और तथ्यों को सर के बल खड़ा कर देते हैं। यहां वे पितृसत्तात्मक सोच से उपजे पिता के आधारहीन संदेह और उसके बिना पर किये जा रहे माँ के निरंतर उत्पीड़न के खिलाफ़ विद्रोह पर उतारू बालक का साहस व आक्रोश नहीं देखते। वे यह भी नहीं देख पाते कि मुर्दहिया के लेखक का जीवन जिस पीड़ा, जिन अमानवीय कठिनाइयों से होकर गुजरा है वह केवल उस लेखक की कहानी नहीं कहता बल्कि अपने वक्त और समाज का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है।

समाज के वर्गीय ढांचे में सबसे निचले पायदान पर खड़े हर तरफ से तिरस्कृत दलितों-महादलितों की आर्थिक-सामाजिक स्थितियों और नितांत दुरूह हालात में जीवन जी लेने भर की उनकी मनोदशा के विकास साथ-साथ पुरुषवादी दंभ से भरे इस समाज में स्त्रियों के प्रति सदियों से जारी दुव्र्यवहार की भी झलक दिखलाता है, उसी समाज में जिसकी सदासहिष्णुता के हम गीत गाते नहीं अघाते। पर अजीब बात है कि मुर्दहिया जिस बड़े कलेवर को समेटता है उसमें भी धर्मवीर को एक ही काम नजर आता है - विभिन्न पात्रों के जैविक खानदान और संततियों की खोज। यही काम वो कफ़न में भी करते नजर आते हैं। उन्हें ये नजर नहीं आता कि प्रसववेदना से छटपटाकर मरती बुधिया के प्रति घीसू-माधव की घोर निष्ठुरता का चित्रण करते हुए प्रेमचंद ने बड़ी बारीकी व अंतर्मन को झकझोर देनेवाली कलात्मक संवेदना के साथ भारतीय सामाजिक संरचना में जाति एवं लिंग के स्तर पर मौजूद संस्थाबद्ध उत्पीड़न की उलझी हुई गांठों को खोल कर रख दिया है। घीसू और माधव समाज के उस तबके से आते हैं जो सदियों से गरीबी और अभाव में जीने को मजबूर है। उनकी छाया भर से उच्चवर्णी समाज अपवित्र हो जाता है। आज इक्कीसवीं सदी में भी उनकी आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी व बुनियादी हक जैसे सरल सवाल पर वह बौखला उठता है। घीसू और माधव दमन व शोषण पर आधारित इसी घोर असंवेदनशील सामाजिक व्यवस्था की उपज हैं जिसने उनकी सारी मानवीय संवेदनाओं को पत्थर कर डाला है। बुधिया भी उसी दलित समाज का हिस्सा है, जिसे स्त्री होने के कारण पितृसत्तात्मक वर्चस्ववादी हमले का दोहरा अभिशाप झेलना पड़ता है।

दरअसल, वह सामाजिक मानवीय मूल्यबोध व मर्यादा से रहित आत्माभिमान खो चुके एक ऐसे उत्पीड़ित चरित्र के उत्पीड़न की शिकार है, जिसका संवेदना के हर स्तर पर अपने आप से भी विलगाव हो चुका है। बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं कि ये वो कृतियाँ हैं जिन पर तमाम बहसें हो सकती हैं पर ये दलित-वंचित समाज के पैरों में मनुवादी वर्णव्यवस्था और पुरुष वर्चस्व वाले सामंती ढांचे द्वारा खूब सोच समझ कर डाली गयी बेड़ियों का पर्दाफाश करती हैं इसमे संदेह नहीं। ऐसा कहते वक्त हम इस तथ्य से भी आंख नहीं मूंद सकते कि लैंगिक आधार पर उत्पीड़न का ढांचा दलित समाज के भीतर भी उतना ही गहरा है। लेकिन दलितों की वैचारिक रहनुमाई का ढिंढोरा पीटनेवाले धर्मवीर जी शायद कुछ खास चश्मा पहन कर चीजों को देखते-समझते हैं। दलितों की असली समस्याओं से दूर आत्ममुग्ध वैचारिकी से ग्रस्त किसी और लोक में विचरण करते हुए वो हर चीज का उत्स जारकर्म और हल उसके निराकरण में तलाशते फिरते हैं। दरअसल, अपनी पुस्तक सामंत का मुंशी में प्रेमचंद की रचना की चीर-फाड़ करते हुए बुधिया को मरते हुए छोड़ देने बल्कि एक तरह से उसकी हत्या की हिमायत करते हुए धर्मवीर खुद ही अपनी आपराधिक संवेदनहीनता व पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे को बरकरार रखने के प्रति अपने गहरे अनुराग को बेनकाब कर देते हैं।

दूसरी तरफ, इस किताब की शुरुआत में जब वे कहते हैं कि मेरे लिए यही मुख्य बात है कि प्रेमचंद कायस्थ थे। भारत के जातीय वातावरण में किसी लेखक की जाति जानने से उसके साहित्य को समझने में काफी मदद मिलती है। सही मूल्यांकन के लिए साहित्यकार की पैदाईश जानने से लाभ ही लाभ होते हैं तो वे समाज में व्याप्त गैरबराबरी व जातिगत संरचना पर प्रहार की हर कोशिश को झुठलाते हुए सामंती ढांचे के पुरजोर हिमायती के रूप में नजर आते हैं। यह न केवल समाज की जड़ मान्यताओं और जातीय पदानुक्रम के रूप में स्थापित मानवनिर्मित ढांचागत असमानताओं को तोड़ने के लिए साहित्य, कला व सामाजिक आंदोलनकारी गतिविधियों जैसे विभिन्न स्तरों पर जारी प्रगतिशीलता के विभिन्न आयामों के प्रति उनकी नासमझी व कूपमंडूकता को दर्शाता है बल्कि साहित्य के प्रति उनकी सीमित समझ और किसी रचना के मूल पाठ को गायब कर अपने गढ़े हुए तथ्यों (जमींदार द्वारा बुधिया के गर्भवती होने का काल्पनिक प्रसंग) के जरिये साहित्यिक समाज में घुसपैठ कर विवादों के केंद्र में बने रहने और उसके जरिये शोहरत बटोरने की खतरनाक प्रवृत्ति को भी रेखांकित करता है।

सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, गबन, गोदान सरीखे उपन्यासों व सैकड़ों कहानियों में अलग-अलग भावभूमियों की सहज व्याख्या करते हुए ह्रदय की कोमलतम संवेदनाओं को छूते और तकरीबन हर सामायिक सामाजिक राजनीतिक मुद्दे पर टिप्पणी करनेवाले प्रेमचंद किस परंपरा के वाहक हैं ये साबित करने की जरूरत नहीं। मतान्तर दूसरी बात है और असहमति के नाम पर पाठकों को कूड़ा स्नान कराना और बात ... बहरहाल, फेसबुक पर अमर नदीम जी ने ठीक फरमाया है कि ऐसे विश्लेषणों की जगह किसी कूड़ेदान और गटर में ही हो सकती है।
धर्मवीर जी, अपनी हास्यास्पद उलटबांसियों का प्रक्षेपास्त्र चलाने की जगह अगर कुछ सार्थक लेखन कर सकें तो बेहतर होगा अन्यथा ईदगाह और गोदान के लेखकों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर अपनी इस लेखनी के साथ आप तो भेड़ियों की जमात में ही जगह पा सकेंगे।

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