9/29/2013

विकास रैली की पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट: दिल्‍ली, 29 सितंबर 2013

अभिषेक श्रीवास्‍तव

हाल ही में एक बुजुंर्ग पत्रकार मित्र ने मशहूर शायर मीर की लखनऊ यात्रा पर एक किस्‍सा सुनाया था। हुआ यों कि मीर चारबाग स्‍टेशन पर उतरे, तो उन्‍हें पान की तलब लगी हुई थी। वे एक ठीहे पर गए और बोले, ''ज़रा एक पान लगाइएगा।'' पनवाड़ी ने उन्‍हें ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, फिर बोला, ''हमारे यहां तो जूते लगाए जाते हैं हुज़ूर।'' दरअसल, यह बोलचाल की भाषा  का फ़र्क था। लखनऊ में पान बनाया जाता है। लगाने और बनाने के इस फ़र्क को समझे बगैर दिल्‍ली से आया मीर जैसा अदीब भी गच्‍चा खा जाता है। ग़ालिब, जो इस फ़र्क को बखूबी समझते थे, बावजूद खुद दिल्‍ली में ही अपनी आबरू का सबब पूछते रहे। दिल्‍ली और दिल्‍ली के बाहर के पानी का यही फ़र्क है, जिसे समझे बग़ैर ग़यासुद्दीन तुग़लक से दिल्‍ली हमेशा के लिए दूर हो गई। गर्ज़ ये, कि इतिहास के चलन को जाने-समझे बग़ैर दिल्‍ली में कदम रखना या दिल्‍ली से बाहर जाना, दोनों ही ख़तरनाक हो सकता है। क्‍या नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात कोई जाकर समझा सकता है? चौंकिए मत, समझाता हूं...।  

सवेरे आठ बजे पार्क में पहुंचते घोड़े और पुलिसवाले 

अगर आपने राजनीतिक जनसभाएं देखी हैं, तो ज़रा आज की संज्ञाओं का भारीपन तौलिए और मीडिया के जिमि जि़प कैमरों के दिखाए टीवी दृश्‍यों से मुक्‍त होकर ज़रा ठहर कर सोचिए: जगह दिल्‍ली, मौका राजधानी में विपक्षी पार्टी भाजपा की पहली चुनावी जनसभा और वक्‍ता इस देश के अगले प्रधानमंत्री का इकलौता घोषित प्रत्‍याशी नरेंद्र मोदी। सब कुछ बड़ा-बड़ा। कटआउट तक सौ फुट ऊंचा। दावा भी पांच लाख लोगों के आने का था। छोटे-छोटे शहरों में रैली होती है तो रात से ही कार्यकर्ता जमे रहते हैं और घोषित समय पर तो पहुंचने की सोचना ही मूर्खता होती है। मुख्‍य सड़कें जाम हो जाती हैं, प्रवेश द्वार पर धक्‍का-मुक्‍की तो आम बात होती है। दिल्‍ली में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। न कोई सड़क जाम, न ही कोई झड़प, न अव्‍यवस्‍था। क्‍या इसका श्रेय जापानी पार्क में मौजूद करीब तीन हज़ार दिल्‍ली पुलिसबल, हज़ार एसआइएस निजी सिक्‍योरिटी और हज़ार के आसपास आरएएफ के बलों को दिया जाय, जिन्‍होंने कथित तौर पर पांच लाख सुनने आने वालों को अनुशासित रखा? दो शून्‍य का फ़र्क बहुत होता है। अगर हम भाजपा कार्यकर्ताओं, स्‍वयंसेवकों, मीडिया को अलग रख दें तो भी सौ श्रोताओं पर एक सुरक्षाबल का हिसाब पड़ता है। ज़ाहिर है, पांच लाख की दाल में कुछ काला ज़रूर है।     

साढ़े आठ बजे 
आयोजन स्‍थल पर जो कोई भी सवेरे से मौजूद रहा होगा, वह इस काले को नंगी आंखों से देख सकता था। मोदी की जनसभा का घोषित समय 10 बजे सवेरे था, जबकि वक्‍ता की लोकप्रियता और रैली में अपेक्षित भीड़ को देखते हुए मैं सवेरे सवा सात बजे जापानी पार्क पहुंच चुका था। उस वक्‍त ईएसआई अस्‍पताल के बगल वाले रोहिणी थाने के बाहर पुलिसवालों की हाजि़री लग रही थी। सभी प्रवेश द्वार बंद थे। न नेता थे, न कार्यकर्ता और न ही कोई जनता। रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्‍टेशन वाली सड़क से पहले तक अंदाज़ा ही नहीं लगता था कि कुछ होने वाला है। अचानक मेट्रो स्‍टेशन वाली सड़क पर बैनर-पोस्‍टर एक लाइन से लगे दिखे, जिससे रात भर की तैयारी का अंदाज़ा हुआ। बहरहाल, आठ बजे के आसपास निजी सुरक्षा एजेंसी एसआइएस के करीब हज़ार जवान पहुंचे और उनकी हाजि़री हुई। नौ बजे तक ट्रैक सूट पहने कुछ कार्यकर्ता आने शुरू हुए। गेट नंबर 11, जहां से मीडिया को प्रवेश करना था, वहां नौ बजे तक काफी पत्रकार पहुंच चुके थे। गेट नंबर 1 से 4 तक अभी बंद ही थे। सबसे ज्‍यादा चहल-पहल मीडिया वाले प्रवेश द्वार पर ही थी। दिलचस्‍प यह था कि तीन स्‍तरों के सुरक्षा घेरे का प्रत्‍यक्ष दायित्‍व तो दिल्‍ली पुलिस के पास था, लेकिन कोई मामला फंसने पर उसे भाजपा के कार्यकर्ता को भेज दिया जा रहा था। तीसरे स्‍तर के सुरक्षा द्वार पर भी भाजपा की कार्यकर्त्री और एक स्‍थानीय नेतानुमा शख्‍स दिल्‍ली पुलिस को निर्देशित कर रहे थे।

यह अजीब था, लेकिन दिलचस्‍प। साढ़े नौ बजे पंडाल में बज रहे फिल्‍मी गीत ''आरंभ है प्रचंड'' (गुलाल) और ''अब तो हमरी बारी रे'' (चक्रव्‍यूह) अनुराग कश्‍यप व प्रकाश झा ब्रांड बॉलीवुड को उसका अक्‍स दिखा रहे थे। इसके बाद ''महंगाई डायन'' (पीपली लाइव) की बारी आई और भाजपा के सांस्‍कृतिक पिंजड़े में आमिर खान की आत्‍मा तड़पने लगी। जनता हालांकि यह सब सुनने के लिए नदारद थी। सिर्फ मीडिया के जिमी जि़प कैमरे हवा में टंगे घूम रहे थे। अचानक मिठाई और नाश्‍ते के डिब्‍बे बंटने शुरू हुए। कुछ कार्यकर्ता मीडिया वालों का नाम-पता जाने किस काम से नोट कर रहे थे। फिर पौने दस बजे के करीब अचानक एक परिचित चेहरा दर्शक दीर्घा में दिखाई दिया। यह अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण को चैंबर में घुसकर पीटने वाली भगत सिंह क्रांति सेना का सरदार नेता था। उसकी पूरी टीम ने कुछ ही देर में अपना प्रचार कार्य शुरू कर दिया। ''नमो नम:'' लिखी हुई लाल रंग की टोपियां और टीशर्ट बांटे जाने लगे। कुछ ताऊनुमा बूढ़े लोगों को केसरिया पगड़ी बांधी जा रही थी। कुछ लड़के भाजपा का मफलर बांट रहे थे। जनसभा के घोषित समय दस बजे के आसपास पंडाल में भाजपा कार्यकर्ताओं, स्‍वयंसेवकों और मीडिया की चहल-प‍हल बढ़ गई। सारी कुर्सियां और दरी अब भी जनता की बाट जोह रही थीं और टीवी वाले जाने कौन सी जानकारी देने के लिए पीटीसी मारे जा रहे थे।


सवा दस बजे एक पत्रकार मित्र के माध्‍यम से सूचना आई कि नरेंद्र मोदी 15 मिनट पहले फ्लाइट से दिल्‍ली के लिए चले हैं। यह पारंपरिक आईएसटी (इंडियन स्‍ट्रेचेबल टाइम) के अनुकूल था, लेकिन आम लोगों का अब तक रैली में नहीं पहुंचना कुछ सवाल खड़े कर रहा था। साढ़े दस बजे के आसपास माइक से एक महिला की आवाज़़ निकली। उसने सबका स्‍वागत किया और एक कवि को मंच पर बुलाया। ''भारत माता की जय'' के साथ कवि की बेढंगी कविता शुरू हुई। फिर एक और कवि आया जिसने छंदबद्ध गाना शुरू किया। कराची और लाहौर को भारत में मिला लेने के आह्वान वाली पंक्तियों पर अपने पीछे लाइनें दुहराने की उसकी अपील नाकाम रही क्‍योंकि कार्यकर्ता अपने प्रचार कार्य में लगे थे और दुहराने वाली जनता अब भी नदारद थी।
 
पौने ग्‍यारह बजे की स्थिति यह थी कि आयोजन स्‍थल पर बमुश्किल दस से बारह हज़ार लोग मौजूद रहे होंगे। एक पुलिस सब-इंस्‍पेक्‍टर ने (नाम लेने की ज़रूरत नहीं) बताया कि कुल सात हज़ार के आसपास सुरक्षाबल (सरकारी और निजी), 500 के आसपास मीडिया, तीन हज़ार के आसपास कार्यकर्ता और स्‍वयंसेवक व छिटपुट और लोग होंगे। ''लोग नहीं आए अब तक?'', मैंने पूछा। वो मुस्‍कराकर बोला, ''सरजी संडे है। हफ्ते भर नौकरी करने के बाद किसे पड़ी है। टीवी में देख रहे होंगे।'' फिर उसने अपने दो सिपाहियों को चिल्‍लाकर कहा, ''खा ले बिजेंदर, मैं तुम दोनों को भूखे नहीं मरने दूंगा।'' ग्‍यारह बज चुके थे और पंडाल के भीतर तकरीबन सारे मीडिया वाले और पुलिसकर्मी भाजपा के दिए नाश्‍ते के डिब्‍बों को साफ करने में जुटे थे। मंच से कवि की आवाज़ आ रही थी, ''मोदी मोदी मोदी मोदी''। उसने 14 बार मोदी कहा। मंच के नीचे पेडेस्‍टल पंखों और विशाल साउंड सिस्‍टम के दिल दहलाने वाले मिश्रित शोर का शर्मनाक सन्‍नाटा पसरा था और हरी दरी के नीचे की दलदली ज़मीन कुछ और धसक चुकी थी।   


कुछ देर बाद हम निराश होकर निकल लिए। मोदी सवा बारह के आसपास आए और दिल्‍ली में हो रही जोरदार बारिश के बीच एक बजे की लाइव घोषणा यह थी कि रैली में पांच लाख लोग जुट चुके हैं। मोदी ने कहा कि ऐसी रिकॉर्ड रैली आज तक दिल्‍ली में नहीं हुई। इस वक्‍त मोबाइल पर उनका लाइव भाषण देखते हुए हम बिना फंसे रिंग रोड पार कर चुके थे। पंजाबी बाग से रोहिणी के बीच रास्‍ते में गाजि़याबाद से रैली में आती बैनर, पोस्‍टर और झंडा बांधे कुल 13 बसें दिखीं। अधिकतर एक ही टूर और ट्रैवल्‍स की सफेद बसें थीं। निजी वाहनों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हरेक बस में औसतन 20-25 लोग थे। लाल बत्तियों पर लगी कतार को छोड़ दें तो पूरी रिंग रोड (जो हरियाणा को दिल्‍ली से जोड़ती है), रोहिणी से धौला कुआं वाली रोड (गुड़गांव वाली), कुतुब से बदरपुर की ओर जाती सड़क (जो फरीदाबाद को दिल्‍ली से जोड़ती है) और बाद में उत्‍तर प्रदेश से दिल्‍ली को जोड़ने वाली आउटर रिंग रोड खाली पड़ी हुई थी। और यह दिल्‍ली की बारिश में था जबकि जाम एक सामान्‍य दृश्‍य होता है।

रैली में आखिर लाखों लोग आए कहां से? क्‍या सिर्फ 26 मेट्रो से? बसों और निजी वाहनों से तो जाम लग जाता, जबकि ग़ाजि़याबाद से रोहिणी और वहां से वापस रिंग रोड, आउटर रिंग रोड व भीतर की पंजाबी बाग वाली रोड को कुल 125 किलोमीटर हमने पूरा नापा। ग़ाजि़याबाद का जि़क्र इसलिए विशेष तौर पर किया जाना चाहिए क्‍योंकि राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं और पिछले दो दिनों से बड़े पैमाने पर यहां रैली की तैयारियां चल रही थीं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी की जनसभा में जितने भी नेताओं के कटआउट आए थे, सब ग़ाजि़याबाद से आए थे जिन्‍हें एक ही कंपनी ''आज़ाद ऐड'' ने बनाया था। सवेरे साढ़े आठ बजे तक ये कटआउट यहां ट्रकों में भरकर पहुंच चुके थे, हालांकि ग़ाजि़याबाद से श्रोता नहीं आए थे। वापस पहुंचने पर इंदिरापुरम, ग़ाजि़याबाद के स्‍थानीय भाजपा कार्यकर्ता टीवी पर मोदी का रिपीट भाषण सुनते मिले।

बहरहाल, मोदी जब बोल चुके थे तो भाजपा कार्यालय के एक प्रतिनिधि ने फोन पर बताया कि रैली में आने वालों की कुल संख्‍या 50,000 के आसपास थी। अगर हम इसे भी एकबारगी सही मान लें, तो याद होगा कि इतने ही लोगों की रैली पिछले साल फरवरी में दिल्‍ली में कुछ मजदूर संगठनों ने की थी और समूचा मीडिया यातायात व्‍यवस्‍था और जनजीवन अस्‍तव्‍यस्‍त हो जाने की त्राहि-त्राहि मचाए हुए था। अजीब बात है कि बिना हेलमेट पहने और लाइसेंस के बतौर भारत का झंडा उठाए दर्जनों बाइकधारी नौजवानों के आज सड़क पर होने के बावजूद कुछ भी अस्‍तव्‍यस्‍त नहीं हुआ, लाखों लोग रोहिणी जैसी सुदूर जगह पर आ भी गए और चुपचाप चले भी गए। यह नरेंद्रभाई मोदी की रैली में ही हो सकता है। उत्‍तराखंड की बाढ़ में फंसे गुजरातियों को जिस तरह उन्‍होंने एक झटके में वहां से निकाल लिया था, हो सकता है कि ऐसा ही कोई जादू चलाकर उन्‍होंने दिल्‍ली की विकास रैली में लाखों लोगों को पैदा कर दिया हो। ऐसे चमत्‍कार आंखों से दिखते कहां हैं, बस हो जाते हैं।

जब जनता आगे देखती है और नेता पीछे, तो ऐसा ही होता है 
ऐसे चमत्‍कारों का हालांकि खतरा बहुत होता है। उत्‍तराखंड वाले चमत्‍कार में ऐपको नाम की जनसंपर्क एजेंसी का भंडाफोड़ हो चुका है। दिल्‍ली में किस एजेंसी को भाजपा ने यह रैली आयोजित करने के लिए नियुक्‍त किया, यह नहीं पता। देर-सवेर पता चल ही जाएगा। मेरी चिंता हालांकि यह बिल्‍कुल नहीं है। मैं इस बात से चिंतित हूं कि मोदी जैसा कद्दावर शख्‍स दिल्‍ली में बोल गया और दिल्‍लीवाले नहीं आए। वजह क्‍या है? कहीं तुग़लक जैसी कोई समस्‍या तो इसके पीछे नहीं छुपी है? मोदी दिल्‍लीवालों को न समझें न सही, क्‍या विजय गोयल आदि आयोजकों से भी कोई चूक हो गई? ठीक है, कि टीवी चैनलों के हवा में लटकते पचास फुटा कैमरों ने टीवी देख रहे लोगों को काम भर का भरमाया होगा, जैसा कि उसने अन्‍ना हज़ारे की गिरफ्तारी के समय किया था। अन्‍ना से याद आया- वह भी तो रोहिणी जेल का ही मामला था जहां दो-चार हज़ार लोगों को कैमरों ने एकाध लाख में बदल दिया था। इत्‍तेफाक कहें या बदकिस्‍मती, कि रोहिणी में ही इतिहास ने खुद को दुहराया है। मोदी चाहें तो किसी ज्‍योतिषी से रोहिणी पर शौक़ से शोध करवा सकते हैं। वैसे रोहिणी तो एक बहाना है, असल मामला दिल्‍ली के मिजाज़ का है जिसे भाजपा (प्रवृत्ति और विचार के स्‍तर पर इसे अन्‍ना आंदोलन भी पढ़ सकते हैं) समझ नहीं सकी है। 


भाजपा और संघ के पैरोकार वरिष्‍ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने आज तक एक ही बात ऐसी लिखी है जो याद रखने योग्‍य है। उन्‍होंने कभी लिखा था कि इस देश का दक्षिणपंथ जनता की चेतना से बहुत पीछे की भाषा बोलता है और इस देश का वामपंथ जनता की चेतना से बहुत आगे की भाषा बोलता है। इसीलिए इस देश में दोनों नाकाम हैं। कहीं मोदी समेत भाजपा की दिक्‍कत यही तो नहीं? कहीं वे भी तो शायर मीर की तरह ''लगाने'' और ''बनाने'' का फर्क नहीं समझते? मुझे वास्‍तव में लगने लगा है कि किसी को जाकर नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात गंभीरता से समझानी चाहिए कि 29 सितंबर, 2013 को दिल्‍ली के जापानी पार्क में उनकी ''बनी'' नहीं, ''लग'' गई है। ग़ालिब तो शेर कह के निकल लिए, इस ''भारत मां के शेर'' का संकट उनसे कहीं बड़ा है। दिल्‍लीवालों ने आज संडे को टीवी देखकर मोदी और भाजपा की आबरू का सरे दिल्‍ली में जनाज़ा ही निकाल दिया है। 

9/18/2013

नियमगिरि में 'निज़ामुद्दीन'

अभिषेक श्रीवास्‍तव 


दैनिक जनसत्‍ता में बीते 15 सितंबर को प्रकाशित रविवारी आवरण कथा ''नियमगिरि के नियम'' की यह मूल प्रति है जिसे अखबार को भेजा गया था। मूल लेख में शीर्षक और आखिरी पैरा में उद्धृत देवी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां आपस में जुड़ते हैं और एक अर्थ सम्‍प्रेषण करते हैं, लेकिन प्रकाशित लेख में सुविधा के हिसाब से दोनों को ही उड़ा दिया गया है। बाकी लेख पूरा का पूरा साबुत छपा है, यही सुखद है। मूल लेख नीचे पढ़ें और जनसत्‍ता में प्रकाशित लेख यहां पढ़ें। 


नियमगिरि की तलहटी में बसे राजुलगुडा गांव में वह हमारी पहली सुबह थी। गांव से कुछ दूरी पर पानी से लबालब इकलौते तालाब से नहा धोकर हम वापस आए और सुखाने के लिए आदतन गीले कपड़े अपने मेजबान की झोपड़ी की छत पर डालने लगे। अचानक सोमनाथ दौड़ते हुए हमारे पास आए और अपनी उडि़या में हमें ऐसा करने से मना करने लगे। वे हमें तेज़ी से दूसरी झोपड़ी के पास लेकर गए और वहां टंगी हुई अलगनी पर कपड़े सुखाने का इशारा किया। कुछ खास समझने-बूझने की कोशिश किए बिना हमने वैसा ही किया। फिर हमने हिंदी में उनसे मना करने का कारण पूछा, तो वे जमीन की ओर इशारा करते हुए अपनी भाषा में कुछ बोले जिसमें एक ही शब्‍द समझ आया, ''धरनी पेनु...।'' मैं और दिल्‍ली के मेरे हमनाम साथी ने इसका आशय अपने दुभाषिए नौजवान साथी अंगद से पूछा, तो उसने साफ किया कि ये लोग धरती और उससे जुड़ी चीज़ों पर कपड़े नहीं सुखाते हैं। धरती इनके लिए ''धरनी मां'' है जो इनके सर्वोच्‍च ईश नियम राजा से भी ऊंचा स्‍थान रखती है।

जिस धार्मिकता और आस्‍था की कहानियां हम नियमगिरि के कोंध आदिवासियों के संदर्भ में लगातार पढ़ते-सुनते आ रहे थे, उसके एक नमूने से यह हमारा पहला सीधा साक्षात्‍कार था। हम शहरों में रहने वाले लोगों को मीडिया और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं की रिपोर्टों में बार-बार यही बताया गया है कि बहुराष्‍ट्रीय कंपनी वेदांता की ओड़ीशा में बॉक्‍साइट खनन परियोजना से डोंगरिया, कुटिया और झरनिया कोंध आदिवासियों की धार्मिक आस्‍था को ठेस पहुंचेगी। हमें बताया गया है कि नियमगिरि पर्वत इनका नियम राजा है, नियम देवता है। वे उसकी पूजा करते हैं। और सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अप्रैल के फैसले में सरकार को पता लगाने को कहा है कि वेदांता की खनन परियोजना से कहीं इन आदिवासियों के धार्मिक अधिकार, सामुदायिक अधिकार और निजी अधिकार तो नहीं छिनने जा रहे। इसमें धार्मिक अधिकार का मसला जाने किस प्रक्रिया में केंद्रीय बन गया और बाकी अधिकारों पर चर्चा की गुंजाइश कम कर दी गई। क्‍या ये अधिकार एक दूसरे से वाकई अविच्छिन्‍न हैं? आदिवासियों के संदर्भ में आजीविका और जीवन के आदिम स्रोतों पर उनकी आस्‍था का सवाल अहम बनाकर क्‍या हम इस सवाल को ''डाइल्‍यूट'' नहीं कर रहे?


आदिवासी विमर्श में आजकल लोग मरहूम प्रो. रामदयाल मुंडा को कम याद करते हैं। प्रो. मुंडा ने रतनसिंह मानकी के साथ मिलकर एक किताब लिखी थी ''आदि धरम''। राजकमल प्रकाशन से इस पुस्‍तक को छपे हुए महज़ चार साल हुए हैं। भारतीय आदिवासियों की धार्मिक आस्‍थाओं पर केंद्रित साढ़े चार सौ पन्‍ने की इस मोटी किताब को आप पलटते जाइए, धार्मिक अनुष्‍ठानों के नाम कुछ यूं मिलेंगे: 'भेलवापूजन', 'ग्राम पूजन', 'फागुआ आखेट', 'सरहुल पूजन', 'प्रथम बोआई', 'प्रथम रोपनी', 'प्रथम मिसाई', 'बड़पहाड़ी पूजन', आदि। इनके अलावा दैनिक जीवन से जुड़े जन्‍म, ब्‍याह और मृत्‍यु के कुछ संस्‍कार भी पुस्‍तक में वर्णित हैं। ध्‍यान देने वाली बात यह है कि तकरीबन सभी धार्मिक अनुष्‍ठान प्रकृति से जुड़े हैं जिनमें जल, जंगल, ज़मीन, पहाड़, फसल, फल-फूल, अनिवार्यत: उपादान बन कर आते हैं। कहीं कोई बाहरी ईश्‍वर नहीं, कोई कृत्रिम संरचना नहीं। जो जीवन का हिस्‍सा है, वही धर्म है। प्रो. मुंडा इसे ''सृष्टि के अन्‍य अवदानों के साथ पारस्‍परिक सम्‍पोषण संबंध'' का नाम देते हैं। इसी सम्‍पोषण से आचार, व्‍यवहार, परिधान, सामाजिकता, सामूहिकता की ठोस संरचनाएं बनती हैं। कहीं कुछ भी निराधार और अकारण नहीं होता, जैसे झोपड़ी पर कपड़े न सुखाने वाली बात!

आप नियमगिरि के ऊपर चढ़ते जाइए और जंगलों में भीतर घुसते जाइए, झोपड़ी पर कपड़े न सुखाने वाली हिदायत भी धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती चली जाती है। क्‍यों? वहां सृष्टि से जुड़े बिल्‍कुल बुनियादी मूल्‍य बचे रहे जाते हैं। ढकोसले खत्‍म होते जाते हैं। मसलन, डोंगरिया कोंध के गांव में कुछ भी अकेले खाना वहां के हिसाब से कुरीति है। हमने ऊपर के पांच गांवों में देसी मुर्गा खाने की इच्‍छा जताई, लेकिन वह पूरी नहीं हो सकी। यहां मुर्गे, बकरे, सब प्राणी तब तक पूज्‍य हैं जब तक साल में एक बार इनकी बलि नहीं दे दी जाती। वह प्रकृति को प्रकृति की भेंट होती है। इसमें विशिष्‍ट से विशिष्‍ट मेहमान के लिए कहीं किसी विचलन की गुंजाइश नहीं है। यह मनुष्‍य, सभी जीव-जंतुओं, सभी वनस्‍पतियों, पहाड़ों, जंगलों का एक ऐसा अघोषित समाजवाद है जहां हर इकाई दूसरी इकाई पर निर्भर है। यही ''सिम्बियॉसिस'' यानी सम्‍पोषण है।

इस सम्‍पोषण का एक व्‍यावहारिक पक्ष देखिए। गांव की सारी कुंवारी लड़कियां एक कोठरी में सोती हैं। गांव के सारे कुंवारे लड़के भी एक कोठरी में सोते हैं। अधिकांश परिवार एकल हैं या फिर विस्‍तारित हैं। कुंवारी लड़कियों को किसी बाहरी प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं। ठीक वैसे ही कुंवारे लड़के भी एक-दूसरे से ही जीवन की रीति सीख रहे हैं। जिसे हम अंग्रेज़ी में आधुनिक शहरी पदावली में ''पीयर लेसन'' कहते हैं, वह यहां आदिम रूप में बहुत पहले से मौजूद है। ''पीयर लेसन'' है, तो ''पीयर प्रेशर'' भी काम करता है। यह समूह की नैतिकता को अक्षुण्‍ण रखता है। मैंने डोंगरियों के बातुड़ी गांव में रहने वाले नौजवान मंटू से दुभाषिए के माध्‍यम से एक बात पूछी थी कि क्‍या यहां अपराध होते हैं। उसे मेरा सवाल समझ में नहीं आया। फिर मैंने स्‍पष्‍ट किया, ''चोरी, छिनैती, बलात्‍कार, लूटपाट?'' वह मुस्‍करा दिया। उसके लिए ये चारों शब्‍द अबूझ थे। यहां किसी तरह के शुद्धतावाद का आग्रह किए बगैर यह जानना दिलचस्‍प है कि किसी भी घर में ताला क्‍यों नहीं पाया जाता। यह बात जितनी सहजता से कही और सुनी जा सकती है, उतनी ही ज्‍यादा असहज करने वाली है। बात यह नहीं कि किसी के पास किसी दूसरे के मुकाबले ज्‍यादा संग्रह नहीं या अमानती चीज़ें नहीं हैं। असल बात यह है कि सारी अमानतों का स्रोत एक ही जंगल, धरनी और पहाड़ है और वह सबको कमोबेश उसकी मेहनत के हिसाब से देता है। यहां किसी के लिए कुछ भी कम नहीं पड़ता।

अद्भुत बात यह है कि यह एक ऐसा समाजवाद है जहां आपको जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत यानी अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट है। मसलन, किसी गांव में उत्‍सव होता है। दूसरे गांव के नौजवान आते हैं। नाच-गाना होता है। महुआ-मांडिया पी जाती है। भात-दालमा-बांस की सब्‍ज़ी खाई जाती है। दूसरे गांव से आए किसी लड़के की नज़र अगर मेजबान गांव की किसी लड़की पर टिक गई तो वह उस पर अपना गमछा उछाल देता है। यह गमछा उसे एक कमरे में ले जाता है और वहीं जीवन भर के रिश्‍ते की नींव पड़ जाती है। इस प्रथा में कोई दगा नहीं करता क्‍योंकि यह कुदरत की दी हुई नेमतों में से अपने चुनाव के प्रति सम्‍मान और ईमानदारी बरतने का सवाल है। इस सम्‍मान और ईमानदारी को एक सूत की साड़ी में से झांकती आदिवासी देह नहीं डिगा सकती, यह बात हमारे देश में कानून बनाने वाली सर्वोच्‍च संस्‍था तक ने स्‍वीकार किया है।

याद हो तो आज से करीब ढाई साल पहले 5 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आपराधिक अपील को खारिज करते हुए तारीखी बयान दिया था, ''इन लोगों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्‍याय को उलट देने का वक्‍त आ चुका है।'' संदर्भ संविधान में मान्‍य भील आदिवासी समुदाय का था और घटना थी 1994 की, जिसमें एक गर्भवती भील महिला नंदाबाई को उसके गांव के ''ताकतवर समुदाय'' के तीन पुरुषों और एक महिला ने निर्वस्‍त्र कर के मारा-पीटा था और गांव भर में घुमाया था। मामला बंबई उच्‍च न्‍यायालय में गया और वहां नाकामी हाथ लगने पर दोषी सुप्रीम कोर्ट आए। यहां सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं ने एक दलील दी थी कि ''भील समुदाय के सदस्‍य फटे हुए कपड़े पहनते हैं क्‍योंकि उनके पास पहनने को ठीक कपड़े नहीं होते।'' इस दलील के माध्‍यम से कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की गई थी कि भील महिला को सार्वजनिक तौर पर निर्वस्‍त्र करना कोई गंभीर अपराध नहीं है, यह तब अपराध होता जब किसी दूसरे समुदाय की महिला के साथ ऐसा किया जाता। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा, ''आधुनिक भारत में आदिवासियों को तुच्‍छ या अवमानवीय मानने की मानसिकता पूरी तरह अस्‍वीकार्य है।'' इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सत्रहवीं सदी में भील आदिवासियों के हुए सुनियोजित सफाए का जि़क्र करते हुए नंदाबाई की घटना को आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक और सामाजिक अन्‍याय के परिप्रेक्ष्‍य में देखा था।

यह संयोग है कि नियमगिरि के डोंगरिया कोंध आदिवासियों को जो भी तात्‍कालिक कामयाबी मिली है, वह एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की ही देन है। आखिर ऐसा क्‍यों होता है कि हर बार आदिवासी और ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे समुदायों को न्‍यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है? जानकारी का अभाव होना एक अलग बात है, लेकिन लोकतंत्र की सूचित, सुविज्ञ और सुस्‍थापित संस्‍थाओं में वह ''मानसिकता'' कहां से आती है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्‍पणी की थी? आदिवासियों के संदर्भ में चलने वाले सनातन विमर्श के भीतर जो ''विकास'' वाली धारा है, जो आदिवासी को शिक्षित करने, संपन्‍न करने और सूचित करने पर ज़ोर देती है, क्‍या उसका यह आग्रह एक समाज को सपाट-समरूप बनाने की ओर लक्षित नहीं है? आखिर हर इंसान को हर दूसरे इंसान की तरह होना क्‍यों ज़रूरी हो, जबकि मुख्‍यधारा के दूसरे छोर से वैसी मांग ही न उठ रही हो?

जंगल में हमारा साथी अंगद कहता है, ''हम लोग शिक्षा और सड़क के खिलाफ हैं क्‍योंकि इससे आदिवासी भ्रष्‍ट होता है।'' 'भ्रष्‍ट' का मतलब आपको उन गांवों में ज्‍यादा समझ आएगा जहां से शहर या कस्‍बे तक राह जाती है या जहां किसी आदिवासी घर में ही सही स्‍कूल के नाम पर उडि़या बोलने वाला एक मास्‍टर आता है। बातुड़ी में सिर्फ एक नौजवान है जो हिंदी बोलता-समझता है, केसरपाड़ी में तीन हैं और सुदूरतम जरपा में कोई नहीं। बिल्‍कुल सीधा हिसाब। यह सड़क और हिंदी का रिश्‍ता है। बातुड़ी में मास्‍टर आता है, तो उसने वहां की बच्चियों की नाक से तीन नथ पहनना छुड़वा दिया है। औरतें यहां साड़ी पहन रही हैं। एक, सिंदूर भी लगाती है।

इस 'भ्रष्‍टता' की भयावहता देखनी हो तो 26 अगस्‍त का जनसत्‍ता पलट लें। खबर है कि देश में 50 साल के भीतर 250 भाषाएं विलुप्‍त हो चुकी हैं। भाषाविद गणेश देवी के भाषा संस्‍थान द्वारा करीब सौ साल बाद किए गए 35000 पन्‍नों में कैद भारतीय भाषा सर्वे की यह रिपोर्ट पांच सितंबर को शिक्षक दिवस पर जारी होनी है। इस सर्वे में उन भाषाओं को भी शामिल किया गया है जिनके बोलने वालों की संख्‍या दस हज़ार से कम है और जिनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। माना जाना चाहिए कि डोंगरिया कोंध की भाषा 'कुई' भी इसमें शामिल होगी जिसे बोलने वाले आठ से दस हज़ार के बीच आदिवासी नियमगिरि पहाड़ों में रहते हैं। देवी के मुताबिक भाषाएं अलग-अलग वजहों से बड़ी तेजी से मर रही हैं। ये अलग-अलग वजहें क्‍या हैं, समझना मुश्किल नहीं है। जब एक इंसान मरेगा, तो उसकी भाषा को बोलने वाला एक प्राणी कम होगा। जो पहले से ही बेहद सीमित संख्‍या में हैं और मुख्‍यधारा के साथ जिनका अनुकूलन नहीं हुआ है, उनके समुदाय में एक मौत कहीं ज्‍यादा बड़ी मौत होती है। प्रजनन का कुदरती नियम ऐसे समाजों में भाषा और उससे जुड़ी संरचनाओं को बचाने के काम नहीं आता।

जीते जी भले हम उस भाषा को ना जान पाएं, लेकिन कभी-कभार ऐसी भाषाएं अपनी मौत के बाद बोलने लगती हैं। अंदमान की दस बड़ी भाषाओं में रही 'बो' को बोलने वाली इकलौती और आखिरी महिला बोआ सीनियर जब 2010 की शुरुआत में गुज़री, तो यह महज एक मनुष्‍य और एक भाषा की मौत नहीं थी। यह 65,000 साल पुरानी इंसानी परंपरा, सभ्‍यता, उसकी विश्‍वदृष्टि और सामूहिक अभिव्‍यक्ति की मौत थी। जिस देश में रोज़ाना हज़ारों लोग सड़क हादसों में, लाखों इलाज के अभाव में और इतने ही कुदरती आपदाओं अनावश्‍यक मारे जाते हों, वहां दस हज़ार डोंगरिया कोंध की कीमत कुछ भी नहीं। सवाल किसी कंपनी की परियोजना का है ही नहीं। बुनियादी सवाल प्रकृति और मनुष्‍य के सनातन रिश्‍ते से उपजी सामाजिक, धार्मिक, सामुदायिक, भाषायी और निजी संरचनाओं का है जो एक झटके में सिर्फ इसलिए हमेशा के लिए विलुप्‍त हो सकती हैं क्‍योंकि हम अपनी सामाजिक ''लोकेशन'' से इन्‍हें व्‍याख्‍यायित करने में जुटे हैं।

बहरहाल, नियमगिरि से लौट आने के बाद मेरे एक फेसबुक स्‍टेटस पर किसी ने तंज़ किया था कि लौट क्‍यों आए, वहीं रह जाते। घर लौटने के लिए होता है, यह बात दुहराने के लिहाज़ से बहुत घिस चुकी है। ''निज़ामुद्दीन'' शीर्षक से लिखी कविता में देवी प्रसाद मिश्र की आखिरी ख्‍वाहिश से मैं कहीं ज्‍यादा मुतमईन हूं:

''...अब घर लौटा जाए
निज़ामुद्दीन के साथ।
फ़रीद के साथ। नींद के साथ।

बियाबान में गूंजती हारमोनियम की
आवाज़ों जैसी नागरिकता की पुकारों के साथ।
गुहारों के साथ ।

घर लौटा जाए
और घर छोड़ा जाए
जिसके लिए मैंने मनौती मांगी है कि
वह आदिवास में बदल जाए और मेरा बेटा
संथालों के मेले में खो जाए।''
    

9/10/2013

वजूद की जंग: आखिरी किस्‍त


जरपा गांव में मोर्चा संभालने के लिए आते सीआरपीएफ के जवान 

सोमवार 19 अगस्त, 2013  का दिन उस गांव के लिए शायद उसके अब तक के इतिहास में सबसे खास था। आंध्र प्रदेश की सीमा से लगने वाले ओडिशा के आखिरी जिले रायगढ़ा से 85 किलोमीटर उत्तर में नियमगिरि के जंगलों के बीच ऊंघता सा गांव जरपा- जो पहली बार एक साथ करीब पांच सौ से ज्यादा मेहमानों के स्वागत के लिए रात से ही जगा था। सबसे पहले आए कुछ आदिवासी कार्यकर्ता और उनकी सांस्कृतिक टीम। फिर एनडीटीवी की टीम, दो-चार अन्य पत्रकार और कुछ स्थानीय कैमरामैन व फोटोग्राफर। पीछे-पीछे सीआरपीएफ के जवानों की भारी कतार। एक के बाद एक इनसास राइफलों से लेकर क्लाशनिकोव और मोर्टार व लॉन्चर कंधे पर लादे हुए, गोया कोई सैन्य ऑपरेशन शुरू होने जा रहा हो। सवेरे दस बजे तक घने जंगलों के बीच झाड़ियों में इन जवानों ने अपनी पोजीशन ले ली थी। ओडिशा पुलिस अलग से आबादी के बीच घुली-मिली सब पर निगाह रखे हुए थी। सुनवाई 11 बजे शुरू होनी थी और उससे आधा घंटा पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैनात जिला न्यायाधीश एस.सी. मिश्रा ने प्लास्टिक की कुर्सी पर अपनी जगह ले ली थी। सरकारी महकमा आगे के आयोजन के लिए तंबू गाड़ रहा था। टीवी कैमरे डोंगरिया कोंध के विचित्र चेहरों और साज-सज्जा को कैद करने में चौतरफा दौड़ रहे थे जबकि नौजवान आदिवासी लड़कियां बची-खुची खाली कोठरियों में अपना मुंह छुपा रही थीं। यह ''जरपा लाइव'' था, फिल्म से बड़ा यथार्थ और फिल्म से भी ज्यादा नाटकीय। और ये सब कुछ किसके लिए हो रहा था? एक विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए, जिसे यहां के जंगल चाहिए, पहाड़ चाहिए और उनके भीतर बरसों से दबा हुआ करोड़ों टन बॉक्साइट चाहिए।

जिला जज एस.सी. मिश्रा अपने अर्दली और अंगरक्षक के साथ 
जिन गांवों में भी ग्रामसभा लगी है, वहां सभी के लिए खाना बनता रहा है। हम दो घंटे की मशक्कत के बाद यहां पहुंचे तो गरमागरम चावल और दालमा से हमारा स्वागत हुआ। दालमा को आप दाल और आलू की सब्जी का मिश्रण कह सकते हैं। यही यहां का फास्ट फूड है। धीरे-धीरे आंदोलन के बड़े नेताओं का आगमन शुरू हो चुका था। नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेता लिंगराज आज़ाद और लिंगराज प्रधान, सत्या महार, कुमटी मांझी और अंत में आदिवासियों का अपना नायक लोदो सिकाका अपनी चमचमाती कुल्हाड़ियों वाली नौजवान फौज के साथ यहां पहुंचे। सभी मान कर चल रहे थे कि ग्रामसभा तो मात्र औपचारिकता है, जीत तय है। यही हुआ भी। महज 12 वोटरों के इस गांव ने देखते-देखते जज के सामने कंपनी को ठुकरा दिया और तेज़ बारिश के बीच लाल कपड़े और फेंटे में सजेधजे संस्कृतिकर्मियों का जश्न चालू हो गया। ''वेदांता के ताबूत में आखिरी कील है जरपा'', यही कहा था लिंगराज आज़ाद ने। क्या वाकई ऐसा है

भाकपा(माले)-एनडी के भालचंद्र
हमें एक नेता ने बताया कि जब ग्रामसभा कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था, तो माओवादियों (सीपीआई-माओवादी) ने इसके बहिष्कार का आह्वान करते हुए गांवों में पोस्टर चिपकाए थे। उनका पुराना तर्क था कि यह सारी कवायद पूंजीवादी लोकतंत्र के सब्ज़बाग से ज्यादा कुछ नहीं है और असली सवाल राज्यसत्ता को उखाड़ फेंकने का है। इस एक तथ्य से यह बात तो साफ हो गई थी कि इस इलाके में माओवादी मौजूद हैं। माओवादियों के दिल्ली स्थित एक समर्थक बताते हैं कि 2009 में पहली बार 150 काडरों का एक समूह इस इलाके में छत्तीसगढ़ से काम करने आया था। अब वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, इस बारे में कोई ठोस जानकारी उनके पास नहीं है। इतना तय है कि नियमगिरि सुरक्षा समिति के घटक संगठनों के साथ उनका कोई कार्यकारी रिश्ता फिलहाल नहीं है। इसकी दो वजहें हैं। पहली वजह खुद इस आंदोलन के नेता गिनाते हैं। उनका कहना है कि जब माओवादियों ने ग्रामसभाओं के बहिष्कार का आह्वान किया, तो नियमगिरि सुरक्षा समिति ने ग्रामसभाओं का खुलकर समर्थन किया। एक नेता के शब्दों में, ''इससे राज्य सरकार के सामने एक बात साफ हो गई कि नियमगिरि का आंदोलन माओवादियों का समर्थन नहीं करता।'' भालचंद्र कहते हैं,  ''ग्रामसभा का बहिष्कार करने के कारण माओवादियों का यहां से काम लगभग खत्म ही हो गया है।'' इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है। नियमगिरि आंदोलन के अगुवा संगठनों के साथ माओवादियों का रिश्ता न होने की दूसरी वजह बिल्कुल साफ है,  कि इस आंदोलन का अधिकांश नेतृत्व निजी तौर पर समाजवादी जन परिषद और भाकपा(माले)-न्यू डेमोक्रेसी से ताल्लुक रखता है। दोनों ही संगठनों के माओवादियों से वैचारिक मतभेद हैं और माओवादियों को इस आंदोलन में कोई भी स्पेस देना दरअसल अपनी जगह को ही खत्म कर देना होगा। तो क्या इस आंदोलन में माओवादियों का कोई स्टेक नहीं हैसवाल उठता है कि यदि बारहों ग्रामसभाओं का फैसला वेदांता के ताबूत में आखिरी कील साबित नहीं हुआ तब? इसका जवाब फिलहाल 19 अक्टूबर को आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले में छुपा है, लेकिन माओवादियों ने बहिष्कार का आह्वान करते वक्त जो दलील दी थी उसे इतनी आसानी से नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
सजप के नेता लिंगराज आज़ाद 

दरअसल, नियमगिरि का सवाल अपने आप में कोई स्वायत्त और स्वतंत्र सवाल नहीं है। यह 40,000 करोड़ रुपये के निवेश का मामला है जिसमें अंतरराष्ट्रीय पूंजी समेत सरकारों की इज्जत भी दांव पर लगी हुई है। मीडिया की सतही अटकलों के आधार पर कोई कह सकता है कि कांग्रेस जब तक केंद्र की सत्ता में है और बीजू जनता दल जब तक ओड़िशा की सत्ता में है, तब तक मामला फंसा रहेगा। यह तो हुई सियासी दलों के आपसी अंतर्विरोध की बात, लेकिन इस बात को तो सभी समझते हैं कि पूंजी की चमक के आगे ऐसे सारे अंतर्विरोध मौके-बेमौके हवा भी हो जाते हैं। ज़ाहिर है राहुल गांधी की ज़बान रखने के लिए 40,000 करोड़ को लात नहीं मारी जा सकती। यह नूराकुश्ती अस्थायी है। असल सवाल यह है कि देश में ऐसे सैकड़ों नियमगिरि हैं जहां बुनियादी विरोधाभास ग्लोबल पूंजी के हितों और स्थानीय संसाधनों पर मालिकाने के बीच है। नियमगिरि सिर्फ इस मामले में विशिष्ट हो गया है कि यहां आज़ादी के बाद पहली बार न्यायिक फैसले के आधार पर स्थानीय लोग विकास की लकीर खींच रहे हैं। लेकिन इस लकीर को राज्य सरकार ने घपला कर के कितना छोटा कर दिया है, यह भी हम देख चुके है। जो ग्रामसभा 112 गांवों में होनी चाहिए थी, उसे 12 में ही निपटा दिया गया और आदिवासी मंत्रालय समेत कानून मंत्रालय और न्यायालय सब मुंह ताकते रह गए। इस सच्चाई को आंदोलन का नेतृत्व अच्छे से समझता है, तभी आज़ाद कहते हैं, ''नियमगिरि को छूने के लिए कंपनी को हज़ारों आदिवासियों का खून बहाना पड़ेगा और हम अपनी धरनी का एक-एक इंच बचाने के लिए जान दे देंगे।'' राज्यसत्ता को ऐसी भाषा माओवादियों से मेल खाती दिखती है और नतीजतन वह महज 12 वोटरों के एक गांव में अपनी न्यायिक प्रक्रिया की निगरानी के लिए तीन बटालियनें उतार देती है। 


यह ''परसेप्शन'' का फर्क है। आंदोलन का नेतृत्व यह सोचता है कि उसने माओवादियों के बहिष्कार का विरोध कर के खुद को उनसे अलगा लिया है और यही संदेश राज्यसत्ता को भी जा चुका है, जबकि सरकार ऐसा नहीं सोचती क्योंकि सीआरपीएफ और पुलिसबल से गांवों को पाट देने की कवायद एक ही चश्मे से आती है जिसके उस पार सरकारी योजना का विरोध करने वाला हर शख्स माओवादी दिखता है। इस मामले में हम कह सकते हैं कि नियमगिरि सुरक्षा समिति का नेतृत्व एक स्तर पर खुशफहमी में है, लेकिन आंदोलन के बौद्धिक दिशानिर्देशक लिंगराज प्रधान इस बात को कुछ ऐसे रखते हैं, ''यह रणनीति का सवाल है। हम देख रहे हैं कि जहां-जहां माओवादी आंदोलन हो रहे हैं, वहां राज्य का दमन इतना बढ़ा है कि डेमोक्रेटिक स्पेस खत्म हो गई है। उड़ीसा में अब भी गंदमारदन किसान आंदोलन आदि ऐसे उदाहरण हैं जहां लोकतांत्रिक दायरे में कामयाबी हासिल की गई है। यह लड़ाई प्रतिरोध के जनवादी स्पेस को बचा ले जाने की है।'' वे हालांकि यह भी मानते हैं कि इस ''खुशफहमी'' की वजह बस इतनी है कि अब तक यहां जनता के साथ दगा नहीं हुआ है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इसीलिए आस्था बची हुई है, जिसके चलते 12वीं ग्रामसभा के फैसले को ''ताबूत में आखिरी कील'' मान लिया जा रहा है। लेकिन इस इलाके में संघर्षों का इतिहास कुछ और ही कहता है।

चासी मुलिया के सबक

स्थानीय अखबारों पर नज़र दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि पिछले कुछ महीनों के दौरान अचानक कोरापुट जिले से चासी मुलिया आदिवासी संघ (किसानों, बंधुआ मजदूरों और आदिवासियों के संघ) के सदस्यों के सामूहिक आत्मसमर्पण संबंधी खबरों में काफी तेज़ी आई है। मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक जनवरी 2013 के बाद संघ के 1600 से ज्यादा सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया है। ये सभी कोरापुट जिले के नारायणपटना ब्लॉक के निवासी हैं। संघ के मुखिया नचिकालिंगा के सिर पर ईनाम है। उनके नाम के ''मोस्ट वॉन्‍टेड'' पोस्टर भुवनेश्वर में लगे हैं। पिछले साल 24 मार्च को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने कोरापुट के टोयापुट गांव से एक विधायक झिना हिकोका को अगवा कर लिया था और उनकी रिहाई के बदले चासी मुलिया के 25 सदस्यों को रिहा करने की मांग कर डाली थी। इसके बाद अचानक यह संदेश गया था कि चासी मुलिया को माओवादियों का समर्थन है। उसके बाद से आत्मसमर्पणों का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे आम धारणा बनी कि यहां माओवादियों का आधार सरक रहा है। नियमगिरि आंदोलन के नेता इसी परिघटना के पीछे माओवादियों द्वारा ग्रामसभाओं के बहिष्कार के आह्वान का हवाला देते हैं, जो अपनी तात्कालिकता में भले सच हो लेकिन करीबी अतीत में चली प्रक्रिया से बेमेल है।

चासी मुलिया के मुखिया नचिकालिंगा, सौजन्‍य तहलका 
असल में चासी मुलिया आदिवासी संघ ओड़िशा में कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है, इसलिए इसके सदस्यों की गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण का मुद्दा चौंकाने वाला है। पुलिस मानती है कि चासी मुलिया माओवादी पार्टी का जनसंगठन है और माओवादी इसी के सहारे कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा जिले के कुछ हिस्सों में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ा रहे हैं। चूंकि रायगढ़ा के सात गांवों में पल्लीसभा हुई है, इसलिए यहां सीआरपीएफ और पुलिस को भारी संख्या में उतारना सरकारी नज़रिये का ही स्वाभाविक परिणाम था। दूसरी ओर संघ के मुखिया नचिकालिंगा जो आजकल भूमिगत हैं, माओवादियों के साथ अपने रिश्ते की बात को खुले तौर पर नकारते हैं। पिछले साल ''तहलका'' को एक गुप्त स्थान से दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने यह कहा था। इस पृष्ठभूमि में यह पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है कि क्या चासी मुलिया आदिवासी हितों के लिए काम करने वाला एक स्वतंत्र संगठन है या फिर इसके माओवादियों से वाकई कुछ रिश्ते हैं। इसी आलोक में हम जान पाएंगे कि चासी मुलिया के प्रति नियमगिरि आंदोलन के नेतृत्व का उभयपक्षी नजरिया नियमगिरि के भविष्य में कौन सी राजनीतिक इबारत लिख रहा है।

चासी मुलिया आदिवासी संघ का जन्म आंध्र प्रदेश के किसान संगठन राइतु कुली संगम (आरसीएस) से हुआ था जिसे माओवादी समर्थक नेताओं ने विजयानगरम में गठित किया था। आरसीएस की एक शाखा 1996 में ओड़िशा के कोरापुट जिले के बंधुगांव ब्लॉक में भास्कर राव ने शुरू की। शुरुआत में बंधुगांव और नारायणपटना ब्‍लॉक के किसानों और बंधुआ मजदूरों का इसे काफी समर्थन हासिल हुआ। भाकपा(माले-कानू सान्याल गुट) (यह खुद को भाकपा(माले) ही कहता है) के कुछ अहम नेता जैसे गणपत पात्रा आरसीएस के साथ काफी करीबी से जुड़े रहे हैं। आरसीएस-कोरापुट ने भाकपा(माले) के नेताओं के सहयोग से ही यहां जल, जंगल और जमीन का आंदोलन चलाया था। जब आंध्र प्रदेश में भाकपा(माओवादी) और उसके जनसंगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया था, उसके ठीक बाद 17 अगस्त, 2005 को आरसीएस को भी वहां प्रतिबंधित कर दिया गया। ओड़िशा में भी आरसीएस को ऐसे ही प्रतिबंध का अंदेशा था, सो उसने 2006 में अपना नाम बदल कर चासी मुलिया आदिवासी संघ रख लिया। संघ ने 2006 से 2008 के बीच खासकर नारायणपटना और बंधुगांव ब्‍लॉकों में गैर-आदिवासी जमींदारों से जमीनें छीन कर गरीब आदिवासियों में बांटने का काफी काम किया, शराबबंदी के लिए रैलियां कीं और भ्रष्ट सरकारी अफसरों के खिलाफ अभियान चलाया। 2008 आते-आते संघ की नेता कोंडागिरि पैदम्मा को दरकिनार कर के बंधुगांव के अर्जुन केंद्रक्का और नारायणपटना के नचिकालिंगा ने संगठन की कमान संभाल ली, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि संगठन के भीतर अपने आप दो धड़े भी बन गए। अर्जुन केंद्रक्का बड़े जमींदारों से भूदान के पक्ष में थे जबकि नचिकालिंगा उनसे जमीनें छीनने में विश्वास रखते थे। इस तरह दोनों धड़ों के बीच मतभेद बढ़ते गए। इसकी परिणति इस रूप में हुई कि केंद्रक्का ने 2009 के चुनाव में खड़े होने का मन बना लिया और संसदीय लोकतंत्र. में अपनी आस्था जता दी। नचिकालिंगा ने इसका विरोध किया। माना जाता है कि इसकी दो वजहें रहीं। पहली यह कि नचिकालिंगा माओवादी विचारधारा से प्रभावित थे। दूसरी वजह यह थी कि वे खुद भाकपा(माले) के टिकट पर कोरापुट की लक्ष्मीपुर संसदीय सीट से लड़ना चाहते थे। हुआ यह कि अर्जुन केंद्रक्का को भाकपा(माले) से टिकट मिल गया, हालांकि वे बीजू जनता दल के झिना हिकोका से हार गए। इसके बाद चासी मुलिया के दो फाड़ हो गए। वरिष्ठ नेताओं और सलाहकारों ने भी अपना-अपना पक्ष तय कर लिया। मसलन, कोंडागिरि पैदम्मा ने अर्जुन धड़े को चुना तो भाकपा(माले) के पात्रा ने नचिकालिंगा के गुट में आस्था जताई।

यही वह समय था जब कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा में माओवादियों का एक जत्था बाहर से आया और यहां की राजनीति में उसने पैठ बनानी शुरू की। 20 नवंबर, 2009 को नारायणपटना पुलिस थाने पर नचिकालिंगा ने सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों के दमन के खिलाफ धावा बोला और गोलीबारी हुई जिसमें संघ के दो नेताओं की मौत हो गई, कई ज़ख्मी हुए और पुलिस ने 37 को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से नचिकालिंगा भूमिगत हैं। इसी मौके का लाभ माओवादियों ने इस गुट में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में उठाया। एक सरकारी संस्था इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ अनालिसिस (आईडीएसए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक माओवादियों ने नचिकालिंगा को अपने साये तले पुलिस से संरक्षण दे दिया और बदले में समूचे गुट को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस बात को लिंगराज प्रधान भी मानते हैं कि दक्षिणी ओड़िशा के इस इलाके में चासी मुलिया के नेतृत्व में चल रहे जमीन के आंदोलनों को माओवादियों ने ''हाइजैक'' कर लिया। नचिकालिंगा ने हमेशा माओवादियों के साथ अपने रिश्ते को नकारा हैख्‍ लेकिन नियमगिरि आंदोलन के नेता इस बात की पुष्टि करते हैं। इसके अलावा, चुनाव हारकर सरकारी मशीनरी के विश्वासपात्र बन चुके अर्जुन केंद्रक्का की 9 अगस्त, 2010 को भाकपा(माओवादी) की श्रीकाकुलम इकाई द्वारा की गई हत्या भी इस बात को साबित करती है कि चासी मुलिया (नचिकालिंगा) में माओवादियों की पैठ बन चुकी थी। इस हत्या के बाद संघ की बंधुगांव इकाई निष्क्रिय हो गई और माओवादियों की मदद से नचिकालिंगा गुट ने वहां और नारायणपटना ब्‍लॉक में 6000 एकड़ ज़मीनें कब्जाईं।

इस साल चासी मुलिया से काडरों के बड़े पैमाने पर हो रहे आत्मसमर्पण एकबारगी यह संकेत देते हैं कि इस इलाके में माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ रही है, लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि यह नचिकालिंगा गुट और भाकपा(माओवादी) की एक रणनीति भी हो सकती है। कुछ स्थानीय लोगों के मुताबिक नचिकालिंगा ने अगर संसदीय राजनीति की राह पकड़ ली, तब भी माओवादियों के अभियान पर यहां कोई खास असर नहीं पड़ने वाला क्योंकि उन्होंने मिनो हिकोका के रूप में चासी मुलिया संघ में नेतृत्व की दूसरी कतार पहले से तैयार की हुई है। इसके अलावा एक उभरता हुआ गुट सब्यसाची पंडा का है जिन्होंने पिछले दिनों भाकपा(माओवादी) को छोड़ कर उड़ीसा माओवादी पार्टी बना ली है। प्रधान इसे लेकर हालांकि चिंतित नहीं दिखते, ''यह तो सरवाइवल के लिए बना समूह है। पंडा या तो सरेंडर कर देंगे या फिर एनकाउंटर में मारे जाएंगे। उनका इस इलाके की राजनीति पर कोई असर नहीं होने वाला।'' 

इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि सारी लड़ाई आदिवासियों, किसानों और बंधुआ मजदूरों के हितों के लिए जमीन कब्जाने से शुरू हुई थी। विडंबना यह है कि नचिकालिंगा खुद एक बंधुआ मजदूर था जिसके मालिक के घर में आज सीमा सुरक्षा बल की चौकी बनी हुई है। यह लड़ाई महज चार साल के भीतर माओवादियों के कब्जे में आ चुकी है और मोटे तौर पर तीन जिलों कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा में उनका असर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा है। मजेदार यह है कि जमीन की बिल्कुल समान लड़ाई नियमगिरि की तलहटी वाले गांवों में चल रही है जहां माले का न्यू डेमोक्रेसी धड़ा और खुद लिबरेशन भी अलग-अलग इलाकों में सक्रिय हैं। लड़ाई का मुद्दा एक है और जमीन कब्जाने की रणनीति भी समान, लेकिन इलाके अलग-अलग हैं और ''मोस्ट वांटेड'' संगठन चासी मुलिया के प्रति माले के धड़ों का नजरिया भी अलग-अलग है। 

लिंगराज प्रधान: आंदोलन का बौद्धिक नेतृत्‍व 
लिंगराज प्रधान इसे ''पर्सनालिटी कल्ट'' का संकट बताते हैं जहां नेतृत्व संगठन से बड़ा हो जाता है। इस जटिल इंकलाबी राजनीति के आलोक में नियमगिरि का आंदोलन, जो आज की तारीख में वैश्विक प्रचार हासिल कर चुका है, माओवाद से अछूता रह जाए (या रह गया हो) यह संभव नहीं दिखता। लिंगराज प्रधान इसे ''रूल आउट'' नहीं करते, ''हमारे नेता आज़ाद के पास माओवादियों के फोन आते हैं। वे कहते हैं कि तुम चिंता मत करो, हम तुम्हारे साथ हैं।'' फिर वे कहते हैं, ''दरअसल, अभी तक नियमगिरि में प्रतिरोध का सिलसिला सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के सहारे और छिटपुट आंदोलनों के बल पर ही चलता रहा है जो गंदमारदन जैसी भीषण शक्ल नहीं ले सका है और अपेक्षाकृत सौम्य है, इसमें कामयाबी भी मिलती ही रही है, इसीलिए माओवादियों को यहां घुसने की स्पेस नहीं बन पा रही है। जनवादी राजनीति की यही कामयाबी है।'' 

जहां बड़े आंदोलन होते हैं, वहां अफवाहें भी बड़ी होती हैं। कहते हैं कि नियमगिरि के कुछ डोंगरिया गांवों में राइफलें भी हैं। यह बात गलत हो या सही, इससे फर्क नहीं पड़ता। असल फर्क यह समझने से पड़ता है कि नियमगिरि की लड़ाई किसी कोने में अलग से नहीं लड़ी जा रही है। यह कोई पवित्र गाय नहीं है जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही बड़ी पूंजी के खिलाफ जीत हासिल की जा सके। सवाल यहां भी जल, जंगल और जमीन का ही है। विरोधाभास यहां भी लोकल बनाम ग्लोबल का है और अब तक तो कोई ऐसी नज़ीर इस देश में पेश नहीं हुई जहां न्यायिक सक्रियता के चलते बड़ी पूंजी की स्थायी वापसी संभव हुई हो।


नियम की तासीर

नियमगिरि का नायक लोदो सिकाका 
ऐसा नहीं कि आंदोलन के नेताओं लिंगराज आज़ाद या लोदो सिकाका को जन्नत की हकीकत नहीं मालूम। संजय काक की फिल्म में लोदो सिकाका की एक बाइट हैः ''सरकार हमें माहबादी (माओवादी) कहती है। अगर हमारा नेता लिंगराजा माहबादी है, तो हम भी माहबादी हैं।'' यह चेतना का उन्नत स्तर ही है जो दुनिया की दुर्लभ आदिवासी प्रजाति डोंगरिया कोंध के एक सदस्य से ऐसी बात कहलवा रहा है। संघर्षों से चेतना बढ़ेगी तो कल को माओवादी पोस्टरों के मायने भी समझ में आएंगे और मोबाइल पर बजता गीत-संगीत भी। अभी तो दोनों ही आकर्षण का विषय हैं और इनसे निकल रहा बदलाव नियमगिरि की फिज़ा में साफ दिख रहा है। लड़के दहेज ले रहे हैं, औरतें सिंदूर लगा रही हैं, बच्चियां अपने स्कूली शिक्षकों के कहने पर तीन नथ पहनना छोड़ रही हैं तो सभ्य दिखने के लिए आदिवासी बच्चे अपने लंबे बाल कटवा रहे हैं। इन छवियों के बीच मुझे अस्पताल में पड़े साथी और नियमगिरि के जंगलों में अपने मार्गदर्शक अंगद की कही एक बात फिर से याद आ रही है, ''हम लोग सड़क और स्कूली शिक्षा का विरोध इसीलिए करते हैं क्योंकि उससे आंदोलन कमज़ोर होता है।'' इससे दो कदम आगे उनके नेता आज़ाद की बात याद आती है जो उन्होंने अपने साक्षात्कार में कही थी, ''विकास का मतलब अगर बाल कटवाना होता है तो पहले मनमोहन सिंह की चुटिया काटो।'' सख्त वाम राजनीति के चश्मे से देखने पर ग्रामसभाओं में वेदांता की हार ऊपर-ऊपर भले ही ग़ालिब का खयाली फाहा जान पड़ती हो, लेकिन नियमगिरि की तासीर पर्याप्त गर्म है। यही डोंगरियों के नियम राजा का असली मर्म है।


(समाप्‍त)  

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