9/10/2013

वजूद की जंग: आखिरी किस्‍त


जरपा गांव में मोर्चा संभालने के लिए आते सीआरपीएफ के जवान 

सोमवार 19 अगस्त, 2013  का दिन उस गांव के लिए शायद उसके अब तक के इतिहास में सबसे खास था। आंध्र प्रदेश की सीमा से लगने वाले ओडिशा के आखिरी जिले रायगढ़ा से 85 किलोमीटर उत्तर में नियमगिरि के जंगलों के बीच ऊंघता सा गांव जरपा- जो पहली बार एक साथ करीब पांच सौ से ज्यादा मेहमानों के स्वागत के लिए रात से ही जगा था। सबसे पहले आए कुछ आदिवासी कार्यकर्ता और उनकी सांस्कृतिक टीम। फिर एनडीटीवी की टीम, दो-चार अन्य पत्रकार और कुछ स्थानीय कैमरामैन व फोटोग्राफर। पीछे-पीछे सीआरपीएफ के जवानों की भारी कतार। एक के बाद एक इनसास राइफलों से लेकर क्लाशनिकोव और मोर्टार व लॉन्चर कंधे पर लादे हुए, गोया कोई सैन्य ऑपरेशन शुरू होने जा रहा हो। सवेरे दस बजे तक घने जंगलों के बीच झाड़ियों में इन जवानों ने अपनी पोजीशन ले ली थी। ओडिशा पुलिस अलग से आबादी के बीच घुली-मिली सब पर निगाह रखे हुए थी। सुनवाई 11 बजे शुरू होनी थी और उससे आधा घंटा पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैनात जिला न्यायाधीश एस.सी. मिश्रा ने प्लास्टिक की कुर्सी पर अपनी जगह ले ली थी। सरकारी महकमा आगे के आयोजन के लिए तंबू गाड़ रहा था। टीवी कैमरे डोंगरिया कोंध के विचित्र चेहरों और साज-सज्जा को कैद करने में चौतरफा दौड़ रहे थे जबकि नौजवान आदिवासी लड़कियां बची-खुची खाली कोठरियों में अपना मुंह छुपा रही थीं। यह ''जरपा लाइव'' था, फिल्म से बड़ा यथार्थ और फिल्म से भी ज्यादा नाटकीय। और ये सब कुछ किसके लिए हो रहा था? एक विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए, जिसे यहां के जंगल चाहिए, पहाड़ चाहिए और उनके भीतर बरसों से दबा हुआ करोड़ों टन बॉक्साइट चाहिए।

जिला जज एस.सी. मिश्रा अपने अर्दली और अंगरक्षक के साथ 
जिन गांवों में भी ग्रामसभा लगी है, वहां सभी के लिए खाना बनता रहा है। हम दो घंटे की मशक्कत के बाद यहां पहुंचे तो गरमागरम चावल और दालमा से हमारा स्वागत हुआ। दालमा को आप दाल और आलू की सब्जी का मिश्रण कह सकते हैं। यही यहां का फास्ट फूड है। धीरे-धीरे आंदोलन के बड़े नेताओं का आगमन शुरू हो चुका था। नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेता लिंगराज आज़ाद और लिंगराज प्रधान, सत्या महार, कुमटी मांझी और अंत में आदिवासियों का अपना नायक लोदो सिकाका अपनी चमचमाती कुल्हाड़ियों वाली नौजवान फौज के साथ यहां पहुंचे। सभी मान कर चल रहे थे कि ग्रामसभा तो मात्र औपचारिकता है, जीत तय है। यही हुआ भी। महज 12 वोटरों के इस गांव ने देखते-देखते जज के सामने कंपनी को ठुकरा दिया और तेज़ बारिश के बीच लाल कपड़े और फेंटे में सजेधजे संस्कृतिकर्मियों का जश्न चालू हो गया। ''वेदांता के ताबूत में आखिरी कील है जरपा'', यही कहा था लिंगराज आज़ाद ने। क्या वाकई ऐसा है

भाकपा(माले)-एनडी के भालचंद्र
हमें एक नेता ने बताया कि जब ग्रामसभा कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था, तो माओवादियों (सीपीआई-माओवादी) ने इसके बहिष्कार का आह्वान करते हुए गांवों में पोस्टर चिपकाए थे। उनका पुराना तर्क था कि यह सारी कवायद पूंजीवादी लोकतंत्र के सब्ज़बाग से ज्यादा कुछ नहीं है और असली सवाल राज्यसत्ता को उखाड़ फेंकने का है। इस एक तथ्य से यह बात तो साफ हो गई थी कि इस इलाके में माओवादी मौजूद हैं। माओवादियों के दिल्ली स्थित एक समर्थक बताते हैं कि 2009 में पहली बार 150 काडरों का एक समूह इस इलाके में छत्तीसगढ़ से काम करने आया था। अब वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, इस बारे में कोई ठोस जानकारी उनके पास नहीं है। इतना तय है कि नियमगिरि सुरक्षा समिति के घटक संगठनों के साथ उनका कोई कार्यकारी रिश्ता फिलहाल नहीं है। इसकी दो वजहें हैं। पहली वजह खुद इस आंदोलन के नेता गिनाते हैं। उनका कहना है कि जब माओवादियों ने ग्रामसभाओं के बहिष्कार का आह्वान किया, तो नियमगिरि सुरक्षा समिति ने ग्रामसभाओं का खुलकर समर्थन किया। एक नेता के शब्दों में, ''इससे राज्य सरकार के सामने एक बात साफ हो गई कि नियमगिरि का आंदोलन माओवादियों का समर्थन नहीं करता।'' भालचंद्र कहते हैं,  ''ग्रामसभा का बहिष्कार करने के कारण माओवादियों का यहां से काम लगभग खत्म ही हो गया है।'' इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है। नियमगिरि आंदोलन के अगुवा संगठनों के साथ माओवादियों का रिश्ता न होने की दूसरी वजह बिल्कुल साफ है,  कि इस आंदोलन का अधिकांश नेतृत्व निजी तौर पर समाजवादी जन परिषद और भाकपा(माले)-न्यू डेमोक्रेसी से ताल्लुक रखता है। दोनों ही संगठनों के माओवादियों से वैचारिक मतभेद हैं और माओवादियों को इस आंदोलन में कोई भी स्पेस देना दरअसल अपनी जगह को ही खत्म कर देना होगा। तो क्या इस आंदोलन में माओवादियों का कोई स्टेक नहीं हैसवाल उठता है कि यदि बारहों ग्रामसभाओं का फैसला वेदांता के ताबूत में आखिरी कील साबित नहीं हुआ तब? इसका जवाब फिलहाल 19 अक्टूबर को आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले में छुपा है, लेकिन माओवादियों ने बहिष्कार का आह्वान करते वक्त जो दलील दी थी उसे इतनी आसानी से नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
सजप के नेता लिंगराज आज़ाद 

दरअसल, नियमगिरि का सवाल अपने आप में कोई स्वायत्त और स्वतंत्र सवाल नहीं है। यह 40,000 करोड़ रुपये के निवेश का मामला है जिसमें अंतरराष्ट्रीय पूंजी समेत सरकारों की इज्जत भी दांव पर लगी हुई है। मीडिया की सतही अटकलों के आधार पर कोई कह सकता है कि कांग्रेस जब तक केंद्र की सत्ता में है और बीजू जनता दल जब तक ओड़िशा की सत्ता में है, तब तक मामला फंसा रहेगा। यह तो हुई सियासी दलों के आपसी अंतर्विरोध की बात, लेकिन इस बात को तो सभी समझते हैं कि पूंजी की चमक के आगे ऐसे सारे अंतर्विरोध मौके-बेमौके हवा भी हो जाते हैं। ज़ाहिर है राहुल गांधी की ज़बान रखने के लिए 40,000 करोड़ को लात नहीं मारी जा सकती। यह नूराकुश्ती अस्थायी है। असल सवाल यह है कि देश में ऐसे सैकड़ों नियमगिरि हैं जहां बुनियादी विरोधाभास ग्लोबल पूंजी के हितों और स्थानीय संसाधनों पर मालिकाने के बीच है। नियमगिरि सिर्फ इस मामले में विशिष्ट हो गया है कि यहां आज़ादी के बाद पहली बार न्यायिक फैसले के आधार पर स्थानीय लोग विकास की लकीर खींच रहे हैं। लेकिन इस लकीर को राज्य सरकार ने घपला कर के कितना छोटा कर दिया है, यह भी हम देख चुके है। जो ग्रामसभा 112 गांवों में होनी चाहिए थी, उसे 12 में ही निपटा दिया गया और आदिवासी मंत्रालय समेत कानून मंत्रालय और न्यायालय सब मुंह ताकते रह गए। इस सच्चाई को आंदोलन का नेतृत्व अच्छे से समझता है, तभी आज़ाद कहते हैं, ''नियमगिरि को छूने के लिए कंपनी को हज़ारों आदिवासियों का खून बहाना पड़ेगा और हम अपनी धरनी का एक-एक इंच बचाने के लिए जान दे देंगे।'' राज्यसत्ता को ऐसी भाषा माओवादियों से मेल खाती दिखती है और नतीजतन वह महज 12 वोटरों के एक गांव में अपनी न्यायिक प्रक्रिया की निगरानी के लिए तीन बटालियनें उतार देती है। 


यह ''परसेप्शन'' का फर्क है। आंदोलन का नेतृत्व यह सोचता है कि उसने माओवादियों के बहिष्कार का विरोध कर के खुद को उनसे अलगा लिया है और यही संदेश राज्यसत्ता को भी जा चुका है, जबकि सरकार ऐसा नहीं सोचती क्योंकि सीआरपीएफ और पुलिसबल से गांवों को पाट देने की कवायद एक ही चश्मे से आती है जिसके उस पार सरकारी योजना का विरोध करने वाला हर शख्स माओवादी दिखता है। इस मामले में हम कह सकते हैं कि नियमगिरि सुरक्षा समिति का नेतृत्व एक स्तर पर खुशफहमी में है, लेकिन आंदोलन के बौद्धिक दिशानिर्देशक लिंगराज प्रधान इस बात को कुछ ऐसे रखते हैं, ''यह रणनीति का सवाल है। हम देख रहे हैं कि जहां-जहां माओवादी आंदोलन हो रहे हैं, वहां राज्य का दमन इतना बढ़ा है कि डेमोक्रेटिक स्पेस खत्म हो गई है। उड़ीसा में अब भी गंदमारदन किसान आंदोलन आदि ऐसे उदाहरण हैं जहां लोकतांत्रिक दायरे में कामयाबी हासिल की गई है। यह लड़ाई प्रतिरोध के जनवादी स्पेस को बचा ले जाने की है।'' वे हालांकि यह भी मानते हैं कि इस ''खुशफहमी'' की वजह बस इतनी है कि अब तक यहां जनता के साथ दगा नहीं हुआ है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इसीलिए आस्था बची हुई है, जिसके चलते 12वीं ग्रामसभा के फैसले को ''ताबूत में आखिरी कील'' मान लिया जा रहा है। लेकिन इस इलाके में संघर्षों का इतिहास कुछ और ही कहता है।

चासी मुलिया के सबक

स्थानीय अखबारों पर नज़र दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि पिछले कुछ महीनों के दौरान अचानक कोरापुट जिले से चासी मुलिया आदिवासी संघ (किसानों, बंधुआ मजदूरों और आदिवासियों के संघ) के सदस्यों के सामूहिक आत्मसमर्पण संबंधी खबरों में काफी तेज़ी आई है। मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक जनवरी 2013 के बाद संघ के 1600 से ज्यादा सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया है। ये सभी कोरापुट जिले के नारायणपटना ब्लॉक के निवासी हैं। संघ के मुखिया नचिकालिंगा के सिर पर ईनाम है। उनके नाम के ''मोस्ट वॉन्‍टेड'' पोस्टर भुवनेश्वर में लगे हैं। पिछले साल 24 मार्च को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने कोरापुट के टोयापुट गांव से एक विधायक झिना हिकोका को अगवा कर लिया था और उनकी रिहाई के बदले चासी मुलिया के 25 सदस्यों को रिहा करने की मांग कर डाली थी। इसके बाद अचानक यह संदेश गया था कि चासी मुलिया को माओवादियों का समर्थन है। उसके बाद से आत्मसमर्पणों का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे आम धारणा बनी कि यहां माओवादियों का आधार सरक रहा है। नियमगिरि आंदोलन के नेता इसी परिघटना के पीछे माओवादियों द्वारा ग्रामसभाओं के बहिष्कार के आह्वान का हवाला देते हैं, जो अपनी तात्कालिकता में भले सच हो लेकिन करीबी अतीत में चली प्रक्रिया से बेमेल है।

चासी मुलिया के मुखिया नचिकालिंगा, सौजन्‍य तहलका 
असल में चासी मुलिया आदिवासी संघ ओड़िशा में कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है, इसलिए इसके सदस्यों की गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण का मुद्दा चौंकाने वाला है। पुलिस मानती है कि चासी मुलिया माओवादी पार्टी का जनसंगठन है और माओवादी इसी के सहारे कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा जिले के कुछ हिस्सों में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ा रहे हैं। चूंकि रायगढ़ा के सात गांवों में पल्लीसभा हुई है, इसलिए यहां सीआरपीएफ और पुलिस को भारी संख्या में उतारना सरकारी नज़रिये का ही स्वाभाविक परिणाम था। दूसरी ओर संघ के मुखिया नचिकालिंगा जो आजकल भूमिगत हैं, माओवादियों के साथ अपने रिश्ते की बात को खुले तौर पर नकारते हैं। पिछले साल ''तहलका'' को एक गुप्त स्थान से दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने यह कहा था। इस पृष्ठभूमि में यह पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है कि क्या चासी मुलिया आदिवासी हितों के लिए काम करने वाला एक स्वतंत्र संगठन है या फिर इसके माओवादियों से वाकई कुछ रिश्ते हैं। इसी आलोक में हम जान पाएंगे कि चासी मुलिया के प्रति नियमगिरि आंदोलन के नेतृत्व का उभयपक्षी नजरिया नियमगिरि के भविष्य में कौन सी राजनीतिक इबारत लिख रहा है।

चासी मुलिया आदिवासी संघ का जन्म आंध्र प्रदेश के किसान संगठन राइतु कुली संगम (आरसीएस) से हुआ था जिसे माओवादी समर्थक नेताओं ने विजयानगरम में गठित किया था। आरसीएस की एक शाखा 1996 में ओड़िशा के कोरापुट जिले के बंधुगांव ब्लॉक में भास्कर राव ने शुरू की। शुरुआत में बंधुगांव और नारायणपटना ब्‍लॉक के किसानों और बंधुआ मजदूरों का इसे काफी समर्थन हासिल हुआ। भाकपा(माले-कानू सान्याल गुट) (यह खुद को भाकपा(माले) ही कहता है) के कुछ अहम नेता जैसे गणपत पात्रा आरसीएस के साथ काफी करीबी से जुड़े रहे हैं। आरसीएस-कोरापुट ने भाकपा(माले) के नेताओं के सहयोग से ही यहां जल, जंगल और जमीन का आंदोलन चलाया था। जब आंध्र प्रदेश में भाकपा(माओवादी) और उसके जनसंगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया था, उसके ठीक बाद 17 अगस्त, 2005 को आरसीएस को भी वहां प्रतिबंधित कर दिया गया। ओड़िशा में भी आरसीएस को ऐसे ही प्रतिबंध का अंदेशा था, सो उसने 2006 में अपना नाम बदल कर चासी मुलिया आदिवासी संघ रख लिया। संघ ने 2006 से 2008 के बीच खासकर नारायणपटना और बंधुगांव ब्‍लॉकों में गैर-आदिवासी जमींदारों से जमीनें छीन कर गरीब आदिवासियों में बांटने का काफी काम किया, शराबबंदी के लिए रैलियां कीं और भ्रष्ट सरकारी अफसरों के खिलाफ अभियान चलाया। 2008 आते-आते संघ की नेता कोंडागिरि पैदम्मा को दरकिनार कर के बंधुगांव के अर्जुन केंद्रक्का और नारायणपटना के नचिकालिंगा ने संगठन की कमान संभाल ली, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि संगठन के भीतर अपने आप दो धड़े भी बन गए। अर्जुन केंद्रक्का बड़े जमींदारों से भूदान के पक्ष में थे जबकि नचिकालिंगा उनसे जमीनें छीनने में विश्वास रखते थे। इस तरह दोनों धड़ों के बीच मतभेद बढ़ते गए। इसकी परिणति इस रूप में हुई कि केंद्रक्का ने 2009 के चुनाव में खड़े होने का मन बना लिया और संसदीय लोकतंत्र. में अपनी आस्था जता दी। नचिकालिंगा ने इसका विरोध किया। माना जाता है कि इसकी दो वजहें रहीं। पहली यह कि नचिकालिंगा माओवादी विचारधारा से प्रभावित थे। दूसरी वजह यह थी कि वे खुद भाकपा(माले) के टिकट पर कोरापुट की लक्ष्मीपुर संसदीय सीट से लड़ना चाहते थे। हुआ यह कि अर्जुन केंद्रक्का को भाकपा(माले) से टिकट मिल गया, हालांकि वे बीजू जनता दल के झिना हिकोका से हार गए। इसके बाद चासी मुलिया के दो फाड़ हो गए। वरिष्ठ नेताओं और सलाहकारों ने भी अपना-अपना पक्ष तय कर लिया। मसलन, कोंडागिरि पैदम्मा ने अर्जुन धड़े को चुना तो भाकपा(माले) के पात्रा ने नचिकालिंगा के गुट में आस्था जताई।

यही वह समय था जब कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा में माओवादियों का एक जत्था बाहर से आया और यहां की राजनीति में उसने पैठ बनानी शुरू की। 20 नवंबर, 2009 को नारायणपटना पुलिस थाने पर नचिकालिंगा ने सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों के दमन के खिलाफ धावा बोला और गोलीबारी हुई जिसमें संघ के दो नेताओं की मौत हो गई, कई ज़ख्मी हुए और पुलिस ने 37 को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से नचिकालिंगा भूमिगत हैं। इसी मौके का लाभ माओवादियों ने इस गुट में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में उठाया। एक सरकारी संस्था इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ अनालिसिस (आईडीएसए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक माओवादियों ने नचिकालिंगा को अपने साये तले पुलिस से संरक्षण दे दिया और बदले में समूचे गुट को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस बात को लिंगराज प्रधान भी मानते हैं कि दक्षिणी ओड़िशा के इस इलाके में चासी मुलिया के नेतृत्व में चल रहे जमीन के आंदोलनों को माओवादियों ने ''हाइजैक'' कर लिया। नचिकालिंगा ने हमेशा माओवादियों के साथ अपने रिश्ते को नकारा हैख्‍ लेकिन नियमगिरि आंदोलन के नेता इस बात की पुष्टि करते हैं। इसके अलावा, चुनाव हारकर सरकारी मशीनरी के विश्वासपात्र बन चुके अर्जुन केंद्रक्का की 9 अगस्त, 2010 को भाकपा(माओवादी) की श्रीकाकुलम इकाई द्वारा की गई हत्या भी इस बात को साबित करती है कि चासी मुलिया (नचिकालिंगा) में माओवादियों की पैठ बन चुकी थी। इस हत्या के बाद संघ की बंधुगांव इकाई निष्क्रिय हो गई और माओवादियों की मदद से नचिकालिंगा गुट ने वहां और नारायणपटना ब्‍लॉक में 6000 एकड़ ज़मीनें कब्जाईं।

इस साल चासी मुलिया से काडरों के बड़े पैमाने पर हो रहे आत्मसमर्पण एकबारगी यह संकेत देते हैं कि इस इलाके में माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ रही है, लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि यह नचिकालिंगा गुट और भाकपा(माओवादी) की एक रणनीति भी हो सकती है। कुछ स्थानीय लोगों के मुताबिक नचिकालिंगा ने अगर संसदीय राजनीति की राह पकड़ ली, तब भी माओवादियों के अभियान पर यहां कोई खास असर नहीं पड़ने वाला क्योंकि उन्होंने मिनो हिकोका के रूप में चासी मुलिया संघ में नेतृत्व की दूसरी कतार पहले से तैयार की हुई है। इसके अलावा एक उभरता हुआ गुट सब्यसाची पंडा का है जिन्होंने पिछले दिनों भाकपा(माओवादी) को छोड़ कर उड़ीसा माओवादी पार्टी बना ली है। प्रधान इसे लेकर हालांकि चिंतित नहीं दिखते, ''यह तो सरवाइवल के लिए बना समूह है। पंडा या तो सरेंडर कर देंगे या फिर एनकाउंटर में मारे जाएंगे। उनका इस इलाके की राजनीति पर कोई असर नहीं होने वाला।'' 

इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि सारी लड़ाई आदिवासियों, किसानों और बंधुआ मजदूरों के हितों के लिए जमीन कब्जाने से शुरू हुई थी। विडंबना यह है कि नचिकालिंगा खुद एक बंधुआ मजदूर था जिसके मालिक के घर में आज सीमा सुरक्षा बल की चौकी बनी हुई है। यह लड़ाई महज चार साल के भीतर माओवादियों के कब्जे में आ चुकी है और मोटे तौर पर तीन जिलों कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा में उनका असर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा है। मजेदार यह है कि जमीन की बिल्कुल समान लड़ाई नियमगिरि की तलहटी वाले गांवों में चल रही है जहां माले का न्यू डेमोक्रेसी धड़ा और खुद लिबरेशन भी अलग-अलग इलाकों में सक्रिय हैं। लड़ाई का मुद्दा एक है और जमीन कब्जाने की रणनीति भी समान, लेकिन इलाके अलग-अलग हैं और ''मोस्ट वांटेड'' संगठन चासी मुलिया के प्रति माले के धड़ों का नजरिया भी अलग-अलग है। 

लिंगराज प्रधान: आंदोलन का बौद्धिक नेतृत्‍व 
लिंगराज प्रधान इसे ''पर्सनालिटी कल्ट'' का संकट बताते हैं जहां नेतृत्व संगठन से बड़ा हो जाता है। इस जटिल इंकलाबी राजनीति के आलोक में नियमगिरि का आंदोलन, जो आज की तारीख में वैश्विक प्रचार हासिल कर चुका है, माओवाद से अछूता रह जाए (या रह गया हो) यह संभव नहीं दिखता। लिंगराज प्रधान इसे ''रूल आउट'' नहीं करते, ''हमारे नेता आज़ाद के पास माओवादियों के फोन आते हैं। वे कहते हैं कि तुम चिंता मत करो, हम तुम्हारे साथ हैं।'' फिर वे कहते हैं, ''दरअसल, अभी तक नियमगिरि में प्रतिरोध का सिलसिला सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के सहारे और छिटपुट आंदोलनों के बल पर ही चलता रहा है जो गंदमारदन जैसी भीषण शक्ल नहीं ले सका है और अपेक्षाकृत सौम्य है, इसमें कामयाबी भी मिलती ही रही है, इसीलिए माओवादियों को यहां घुसने की स्पेस नहीं बन पा रही है। जनवादी राजनीति की यही कामयाबी है।'' 

जहां बड़े आंदोलन होते हैं, वहां अफवाहें भी बड़ी होती हैं। कहते हैं कि नियमगिरि के कुछ डोंगरिया गांवों में राइफलें भी हैं। यह बात गलत हो या सही, इससे फर्क नहीं पड़ता। असल फर्क यह समझने से पड़ता है कि नियमगिरि की लड़ाई किसी कोने में अलग से नहीं लड़ी जा रही है। यह कोई पवित्र गाय नहीं है जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही बड़ी पूंजी के खिलाफ जीत हासिल की जा सके। सवाल यहां भी जल, जंगल और जमीन का ही है। विरोधाभास यहां भी लोकल बनाम ग्लोबल का है और अब तक तो कोई ऐसी नज़ीर इस देश में पेश नहीं हुई जहां न्यायिक सक्रियता के चलते बड़ी पूंजी की स्थायी वापसी संभव हुई हो।


नियम की तासीर

नियमगिरि का नायक लोदो सिकाका 
ऐसा नहीं कि आंदोलन के नेताओं लिंगराज आज़ाद या लोदो सिकाका को जन्नत की हकीकत नहीं मालूम। संजय काक की फिल्म में लोदो सिकाका की एक बाइट हैः ''सरकार हमें माहबादी (माओवादी) कहती है। अगर हमारा नेता लिंगराजा माहबादी है, तो हम भी माहबादी हैं।'' यह चेतना का उन्नत स्तर ही है जो दुनिया की दुर्लभ आदिवासी प्रजाति डोंगरिया कोंध के एक सदस्य से ऐसी बात कहलवा रहा है। संघर्षों से चेतना बढ़ेगी तो कल को माओवादी पोस्टरों के मायने भी समझ में आएंगे और मोबाइल पर बजता गीत-संगीत भी। अभी तो दोनों ही आकर्षण का विषय हैं और इनसे निकल रहा बदलाव नियमगिरि की फिज़ा में साफ दिख रहा है। लड़के दहेज ले रहे हैं, औरतें सिंदूर लगा रही हैं, बच्चियां अपने स्कूली शिक्षकों के कहने पर तीन नथ पहनना छोड़ रही हैं तो सभ्य दिखने के लिए आदिवासी बच्चे अपने लंबे बाल कटवा रहे हैं। इन छवियों के बीच मुझे अस्पताल में पड़े साथी और नियमगिरि के जंगलों में अपने मार्गदर्शक अंगद की कही एक बात फिर से याद आ रही है, ''हम लोग सड़क और स्कूली शिक्षा का विरोध इसीलिए करते हैं क्योंकि उससे आंदोलन कमज़ोर होता है।'' इससे दो कदम आगे उनके नेता आज़ाद की बात याद आती है जो उन्होंने अपने साक्षात्कार में कही थी, ''विकास का मतलब अगर बाल कटवाना होता है तो पहले मनमोहन सिंह की चुटिया काटो।'' सख्त वाम राजनीति के चश्मे से देखने पर ग्रामसभाओं में वेदांता की हार ऊपर-ऊपर भले ही ग़ालिब का खयाली फाहा जान पड़ती हो, लेकिन नियमगिरि की तासीर पर्याप्त गर्म है। यही डोंगरियों के नियम राजा का असली मर्म है।


(समाप्‍त)  

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