9/08/2013

वजूद की जंग: चौथी किस्‍त

पत्रकार साथी अभिषेक रंजन सिंह के साथ ''ऊपर'' के गांवों की ओर 

हमें 16 अगस्त की सुबह ''ऊपर'' जाना था और हमें भी अंगद ने यही बताया था कि वहां पैसा, मोबाइल, एटीएम, संपर्क, कुछ नहीं चलता। यह ''ऊपर'' उत्तराखंड या हिमाचल वाले ऊपर से गुणात्मक तौर पर भिन्न है। यहां इसका मतलब हैं डोंगर यानी पहाड़ के गांवों में जाना, जहां एक बार जाने के बाद आप तभी नीचे आते हैं जब आपको इरादतन नीचे आना होता है। हमें चूंकि 19 तारीख की आखिरी ग्रामसभा में शरीक होना था जो जरपा नाम के डोंगरियों के गांव में होनी थी, लिहाजा एक बार ऊपर जाकर 19 से पहले नीचे आने की कोई तुक नहीं बनती थी। इसका मतलब यह था कि हमें कम से कम तीन रातें और चार दिन डोंगरिया कोंध आदिवासियों के साथ उन्हीं के गांवों में बिताने थे। झारखंड-छत्तीसगढ़ आदि के पहाड़ों पर बसे गांवों में तो साप्ताहिक हाट बाज़ार भी लगने की परंपरा है, यहां हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसी हिदायत के बाद हमने अपनी समझ से कुछ बिस्कुट, चाय की पत्ती, चीनी, नींबू और मैगी के पैकेट रख लिए। बटुए और मोबाइल को स्थायी रूप से अपने झोले में डाल दिया और तड़के निकल पड़े ''ऊपर'', जहां हमारा पहला पड़ाव था बातुड़ी गांव। राजुलगुड़ा से करीब दस किलोमीटर ऊपर की ओर बसे कुल 22 घरों के इस गांव में छठवीं पल्लीसभा हुई थी जहां के कुल 40 में से उपस्थित 31 वोटरों ने वेदांता की परियोजना को खारिज कर दिया था।

बातुड़ी में साड़ी और सिंदूर का प्रवेश हो चुका है 
बातुड़ी डोंगरिया कोंध का गांव है, लेकिन यहां आबादी का पहनावा मिश्रित है। अपने पारंपरिक एक सूत के सफेद कपड़े में लिपटी आदिवासी औरतों के अलावा साड़ी पहनी और सिंदूर लगाए औरतें भी यहां दिख जाएंगी। नौजवान भी पारंपरिक पहनावे में कम ही दिखे। गांव में एक सोलर पैनल लगा है जिससे बिजली के दो खंबे चलते हैं। कुल 22 घर हैं और समूचे गांव में सिर्फ चार बुजुर्ग। यहां आकर आपको पहली बार और पहली ही नज़र में डोंगरिया आदिवासी गांवों की एक विशिष्टता पता चलती है। वो यह, कि यहां इंसानों से ज्यादा आबादी पालतू जानवरों की होती है। कुत्ता, बिल्ली, बकरी, सुअर, मुर्गा-मुर्गी, गाय, भैंस सब आबादी के बीच इस तरह घुलमिल कर रहते हैं कि शाम को जब पूरा गांव दो तरफ बने घरों के बीच की पगडंडी पर नुमाया होता है तो एकबारगी इनके बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। बातुड़ी जिंदा प्राणियों का एक ऐसा जिंदा समाजवाद पेश करता है जिससे मनुष्यता के नाते एकबारगी जुगुप्सा होती है तो अगले ही पल आप खुद उसका हिस्सा बन जाते हैं और इसका पता नहीं लगता। बारिश हो जाने पर हालांकि जुगुप्सा का भाव सारी उदारता पर भारी पड़ जाता है। उस शाम जम कर पानी बरसा था और हम एक बरसाती में खटिया डाले सकुचाती लड़कियों की तस्वीरें उतार रहे थे, कि अचानक किसी के मोबाइल से मैथिली गीत बजा। ''यहां भी मोबाइल!'' पहली प्रतिक्रिया यही थी। हमारे पीछे तीन नौजवान कैमरे की व्यूस्क्रीन में ताकझांक करते पाए गए। एक हिंदी बेहतर समझता था। वह मुस्करा दिया। उसका नाम मंटू मासू था। फिर उड़िया और कुई मिश्रित टूटी-फूटी हिंदी में बातचीत का सिलसिला चल निकला।

एक साइकिल लकड़ी 200 रुपये में बिकती है 
इस गांव में पांच लड़के मुनिगुड़ा तक लकड़ी बेचने जाते हैं। जिस सखुआ की लकड़ी को शहरों में इमारतसाज़ी के लिए आदर्श माना जाता है, वह यहां इफरात में है। एक साइकिल लकड़ी के बदले इन्हें सिर्फ 200 रुपये मिलते हैं। एक साइकिल का मतलब साइकिल के त्रिकोणीय ढांचे में जितने भी लकड़ी के टुकड़े समा सकें, सब! रोज़ सुबह चार बजे मंटू अपने चार साथियों को लेकर यहां से 25 किलोमीटर दूर मुनिगुड़ा के बाजार तक साइकिल ढलकाता हुआ ले जाता है और दिन में 10 बजे तक लौट आता है। इन पांच में से तीन युवकों के पास मोबाइल हैं और इनका भी उपयोग मूल्य नीचे की ही तरह बदल चुका है। इस पर गाने सुने जाते हैं और वीडियो देखे जाते हैं। मनोरंजन की पूरी दुनिया 100 रुपये के चिप में आती है जिसका मतलब इन्हें समझ नहीं आता, लेकिन इस वीराने में शाम उसके भरोसे कट जाती है। एक घर में साउंड बॉक्स भी है। टीवी यहां नहीं है। मोबाइल सोलर पैनल से चार्ज होता है। ये नौजवान भी नियमगिरि के अलावा बहुत कुछ अपनी परंपरा के बारे में नहीं जानते हैं। कुछ विरोधाभासी बातें भी इनसे संवाद कर के समझ में आती हैं। मसलन, ये मुर्गे-मुर्गियों को तो बेचते नहीं क्योंकि साल में एक बार पड़ने वाले उत्सव में ही इनकी बलि चढ़ाने की परंपरा है, लेकिन इन्हें मुर्गों का दाम जरूर मालूम है। मंटू बताता है, ''एक मुर्गा 500 रुपये के बराबर है।'' यानी लकड़ी बेचकर मौद्रिक चेतना यहां पर्याप्त आ चुकी है।

रात में गांव की कुंवारी लड़कियां मिलकर हमारे लिए बड़े स्नेह से भात और बांस के मशरूम की सब्ज़ी पकाती हैं। साउंड बॉक्स वाले घर में हमारे सोने की व्यवस्था है। भोजन के काफी बाद तक हिंदी के गाने बजते रहते हैं। सवेरे उठने पर गांव पुरुषों से खाली मिलता है। धीरे-धीरे औरतें भी काम पर चली जाती हैं और हम निकल पड़ते हैं अपने दूसरे पड़ाव केसरपाड़ी गांव की ओर, जहां हुई दूसरी ग्रामसभा में कुल 36 वोटरों के बीच उपस्थित 33 ने वेदांता को खारिज कर दिया था। इन 33 में से 23 महिलाएं और 10 पुरुष थे। बातुड़ी से केसरपाड़ी का रास्ता बेहद खतरनाक है क्योंकि एक पहाड़ से नीचे उतर कर तकरीबन सीधी चढ़ाई पर दूसरे पहाड़़ के पार जाना होता है। यह दूरी छह किलोमीटर के आसपास है। अपेक्षाकृत साफ-सुथरे से दिखने वाले इस गांव में भरी दोपहर आबादी के नाम पर सिर्फ दो औरतें और एकाध बच्चे दिखते हैं। गांव से मुनिगुड़ा का एक सीधा रास्ता है जो 15 किलोमीटर दूर है। गांव की शुरुआत में नीले रंग का एक मकान है। इस पर ताला लगा है। अंगद बताते हैं कि यह एक ईसाई मिशनरी का मकान है जो यहां धर्म परिवर्तन के वास्ते काफी पहले आया था लेकिन अपनी पहल में नाकाम रहने के बाद गांव छोड़कर चला गया। अब इसमें मूवमेंट के लोग आकर रहते हैं। इस गांव में कुल 16 घर हैं।

केसरपाड़ी में ईसाई मिशनरी का मकान जिस पर ताला लगा है 
आदिवासी इलाकों में मिशनरियों का काम नया नहीं है। खासकर ओड़िशा के इस इलाके में साठ के दशक में ही ऑस्ट्रेलियाई मिशनरियों का आगमन हो गया था। रायगढ़ा के करीब बिसमकटक में बाकायदे ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी अब भी कार्यरत हैं। लांजीगढ़ रोड पर एक मिशनरी ने कुष्ठ आश्रम बना रखा है लेकिन उसका आसपास के इलाकों में खास असर नहीं है। हिंदू धर्म प्रचारकों का काम यहां न के बराबर है। अब तक हिंदू प्रतीक के रूप में हमें इकलौती चीज़ अगर कोई दिखी है तो वो है ''जय हनुमान खैनी''जिसे बिना चूके यहां के मर्द-औरत सब बड़े चाव से खाते हैं। सबकी लुंगी या लुगदी में खैनी का लाल पाउच खोंसा हुआ दिख जाएगा। शहर जाने वाले मर्द सबके लिए यह खैनी लेकर आते हैं। कुछ देर इस गांव में सुस्ताने के बाद हम निकल पड़े यहां से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित सिरकेपाड़ी गांव की ओर, जिसे 19 की ग्रामसभा के लिए हमारा बेस कैम्प होना था।

लगातार चालू इस सफर में अब तक अंगद की तबियत काफी बिगड़ चुकी थी। उसे लगातार हिचकियां आ रही थीं और वह जो कुछ खा रहा था, सब उलट दे रहा था। उसे ते़ज़ बुखार हो चला था। सिरकेपाड़ी पहुंचते ही उसने हिम्मत छोड़ दी। उसका शरीर टूट चुका था। यह लड़का पिछली ग्यारह ग्रामसभाओं में लगातार तैनात रहा था लेकिन आखिरी ग्रामसभा में जश्न मनाना इसकी सेहत को गवारा नहीं था। यह तय हुआ कि अगले दिन यानी 18 अगस्त को जो लोग शहर से आएंगे, उन्हीं की गाड़ी से लौटती में अंगद को भिजवा दिया जाएगा। दरअसल, 19 की ग्रामसभा जरपा में होनी थी जहां करीब सात किलोमीटर चलकर दुर्गम रास्तों से सिरकेपाड़ी से ही पहुंचा जा सकता था। सिरकेपाड़ी तक चारपहिया वाहनों के आने का रास्ता बना हुआ है, इसलिए पत्रकार से लेकर न्यायाधीश और सुरक्षाबल तक सबको इसी गांव से होकर गुजरना था। अंगद पर दवाओं का असर अब नहीं हो रहा था। तेज़ बारिश, कंपकंपाती हवाओं और अंगद की दहलाती हिचकियों के बीच खुले ओसारे में 17 अगस्त की रात यहां गुजारने के बाद हमें शहर से आने वाली पहली गाड़ी का बेसब्री से इंतज़ार था ताकि किसी तरह अंगद को रवाना किया जा सके। 

नियमगिरि की पहाडि़यों के बीच 18 की सुबह तक सुनसान सिरकेपाड़ी गांव 


एथिक्स की एक रात

यह संयोग नहीं था कि अगले 12 घंटे में सारा जमावड़ा एक बार फिर सिरकेपाड़ी में ही होने जा रहा था। इस गांव में महीना भर पहले सबसे पहली पल्लीसभा हुई थी। अब तक 11 गांवों ने जो वेदांता को ना कहा था, उसकी शुरुआत यहीं से हुई थी। यह इकलौता गांव था जिसने अपनी भाषा कुई में ग्रामसभा आयोजित किए जाने का दबाव प्रशासन पर डाला था, जिसके बाद यह नज़ीर बन गया और अब तक की हर ग्रामसभा में कुई भाषा का एक अनुवादक मौजूद रहा था। लिहा़ज़ा, डोंगरियों का यह मोबाइलरहित गांव मूवमेंट के हर चेहरे को पहचानता था। ऐसे ही कुछ चेहरों का आगमन 18 की सुबह 11 बजे के आसपास यहां हुआ। एक जीप रुकी जिसमें से ढपली-नगाड़े और चावल-आलू व सब्जियां लिए हुए एक सांस्कृतिक टीम उतरी। इसमें अधिकतर किशोर उम्र की लड़कियां थीं, जिन्होंने आते-आते अनपेक्षित रूप से सबसे पहले हमारा पैर छुआ। अब तक हम हाथ मिलाते आ रहे थे, जिंदाबाद कहते आ रहे थे। बेशक, यह सांस्कृतिक टीम कुछ ज्यादा ''विकसित'' और ''सभ्य'' रही होगी। उनकी गाड़ी से वापसी में अंगद नीचे चला गया और हमने चैन की सांस ली। इसके बाद इस गांव में जो कुछ हुआ, वह इतिहास है।

कैमरों के लिए दोबारा तैयार होती सांस्‍कृतिक टीम 
दिल ढल चुका था, कार्यकर्ताओं की कई टीमें आ चुकी थीं, कि एक स्‍कॉर्पियो अचानक गांव के बाहर आकर रुकी। उसमें से एक कैमरामैन, एक असिस्टेंट और शर्ट-पैंट पहने एक आधुनिक दिखने वाली महिला उतरी। पता चला कि यह एनडीटीवी की टीम थी। एआईकेएमएस के नेता भालचंद्र षड़ंगी से उस महिला ने हाथ मिलाया और पूछा, ''आप लाल सलाम नहीं बोलते'' षड़ंगी ने सकुचाते हुए जवाब दिया, ''अपने साथियों के बीच बोलते हैं। आप तो बाहर की हैं...।'' एक व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ महिला ने हमारी तरफ इशारा करते हुए प्राथमिक विद्यालय के किसी मास्टर द्वारा उपस्थिति जांचने के अंदाज़ में उंगली उठाकर पूछा, ''आर देयर एनीओज़? जर्नलिस्ट्स? ऐक्टिविस्ट्स?'' हमारी ओर से जवाब नहीं आने पर उसने दोबारा वही सवाल किया। मैंने हाथ उठाकर जवाब दिया, ''जर्नलिस्ट्स'', और ऐसा लगा कि वो संतुष्ट हो गई हो। वहां हम कुल पांच पत्रकार थे- मेरे अलावा एक मेरे हमनाम साथी और दूरदर्शन के दो पत्रकार ऋतु वर्मा और मंजीत ठाकुर, जो कुछ देर पहले ही पहुंचे थे। इसके अलावा हमारे साथ उड़िया पत्रिका ''समदृष्टि'' के एक पत्रकार तरुण भी थे। साथ में दिल्ली विश्वविद्यालय का एक छात्र सौरभ भी था जो वहां की जनसुनवाइयों का दस्तावेजीकरण करने के लिए महीने भर से डेरा डाले हुए था। इन दोनों का परिचित एक संभ्रांत नौजवान पेरिस से वहां पहुंचा था, जिसका कहना था कि वह एफडीआई के खिलाफ भारत में चल रहे आंदोलनों पर शोध के सिलसिले में आया हुआ है।

एनडीटीवी के आने से गांव की रंगत बदल चुकी थी। पूरे गांव में अचानक अफरातफरी का माहौल बन गया था। ऐसा लग रहा था गोया कैमरामैन को कुछ अजूबे हाथ लग गए हों और वो एक के बाद एक झोपड़ियों के घुस-घुस कर शूट करते जा रहा था। उधर दिल्ली से आई रिपोर्टर, जिनका नाम आंचल वोहरा था, सांस्कृतिक टीम से बार-बार अनुरोध कर रही थीं कि उनके सामने एक बार आदिवासी नृत्य का प्रदर्शन किया जाए ताकि वे शूट कर सकें। कुछ देर पहले ही टीम ने अपना रिहर्सल पूरा किया था और वह बिल्कुल इसे दुहराने के मूड में नहीं थी। कैमरे की महिमा और कुछ नेताओं का ज़ोर था कि दोबारा इस रिहर्सल को पेश करने की सहमति बन गई। शाम धुंधला रही थी और झीनी-झीनी बारिश के साथ ठंडी हवा चलनी शुरू हो गई थी। किसी खाद्य इंस्पेक्टर की तरह अंग्रेज़ी में पूरे गांव का मुआयना करने के बाद आंचल हमारी ओर आईं और सबसे औपचारिक परिचय हुआ।

सिरकेपाड़ी में कैमरों के लिए आदर्श दृश्‍य पेश करने की कवायद
''वाइ डोंट वी हैव द बॉनफायर हियर?'' और देखते ही देखते सिरकेपाड़ी गांव पिकनिक के लिए तैयार हो गया। अंधेरे में अलाव जला दिया गया और कैमरों के सामने सांस्कृतिक टीम ने एक बार फिर ढपली की ताल पर आग के इर्द-गिर्द नाचना शुरू कर दिया। कैमरों को यही चाहिए था, सो मिल गया। पूरा गांव सहमा सा इस मंज़र का गवाह बना हुआ था और रिपोर्टर एक के बाद एक पीस टु कैमरा दागे जा रही थी, ''वी आर हियर इन सिरकेपाड़ी विलेज एंड टुनाइट इज़ दि रन अप टु द फाइनल मैच बींग हेल्ड टुमॉरो...।'' 

इस रन अप मैच का छक्का अभी बाकी था। खाने का वक्त हुआ और सबको बुलाया गया। मैडम ने पूछा, ''क्या हम इन गरीब लोगों का पीडीएस का चावल खाएंगे?'' भालचंद्र जी ने मुस्करा कर हां में जवाब दिया। फिर आंचल ने कहा, ''तब तो हमारे सिर पर इनका कर्ज चढ़ जाएगा।'' ''बेशक!'' भालचंद्र ने कहा, ''तो कर्ज उतार दीजिएगा इनके पक्ष में लिखकर।'' छूटते ही मैडम ने जवाब दिया, ''नो, नो... इनके पक्ष में लिखना तो अनएथिकल हो जाएगा।'' मुझे असहजता सी महसूस हुई, सो मैंने बीच में टोका, ''अनएथिकल क्यों?'' ''मतलब, ये जो कहेंगे मैं तो उसे ही दिखाऊंगी'', उन्होंने बात को संभाला। शायद उन्हें अब तक नहीं पता चला था कि वे जो कहेंगे, वह उनके समेत किसी की भी समझ में नहीं आने वाला क्योंकि उनकी भाषा अलग है।


आदिवासियों के पक्ष में खबर दिखाना एनडीटीवी के लिए ''अनएथिकल'' क्यों था, इसका आशय खंगालने की बहुत जरूरत नहीं पड़ी। अगले ही दिन यानी 19 अगस्त को जब आखिरी ग्रामसभा में हुई जीत का जश्न कुदरत मना रही थी और आदिवासियों के नियम राजा मुसल्सल बरसे जा रहे थे, दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित लीला होटल में एनडीटीवी के मालिक डॉ. प्रणय रॉय और वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल एक मंच से कन्या शिशु को बचाने के लिए एक साझा प्रचार अभियान का उद्घाटन कर रहे थे। ''एनडीटीवी वेदांताः आवर गर्ल्‍स आवर प्राइड'' नाम के इस अभियान का ब्रांड एम्बेसडर फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को घोषित किया गया है और दोनों कंपनियों की यह भागीदारी वेदांता के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी कार्यक्रम ''खुशी'' का एक विस्तार है। बहरहाल, एनडीटीवी की रिपोर्टर ने इकलौता ''एथिकल'' काम यह किया कि अपने सिर पर आदिवासियों का कर्ज नहीं चढ़ने दिया। उन्होंने 18 की रात और 19 की सुबह दोनों वक्त गांव का बना खाना नहीं खाया। उनके पास मेरीगोल्ड बिस्कुट की पर्याप्त रसद जो थी। (जारी) 

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