2/04/2014

संदिग्‍ध है सुबोध गुप्‍ता की दुर्बोध कला!

धातु की चमक पर फिसलता अतीत का उन्मादी सुख


अंजनी कुमार 
कला की दुनिया में सुबोध गुप्‍ता एक व्‍यक्ति नहीं, परिघटना का नाम है। एक ऐसी परिघटना, जिसकी पैदाइश और जिसका उत्‍कर्ष भारत में नवउदारवाद के आने और उसके छा जाने के बीच सिमटा हुआ है। एक शख्‍स जो मुक्‍त बाज़ार की हवा के साथ खाली हाथ बिहार से दिल्‍ली आता है, हज़ार रुपये के वजीफे पर पढ़ाई करता है, 1996 में अखिल भारतीय पेंटिंग प्रतियोगिता जीतता है, 2008 में पहली बार जिसकी कलाकृति की भारत में सबसे महंगी बोली 5.7 करोड़ की लगती है और 2012 में वह राजधानी दिल्‍ली के बीचोबीच सौ करोड़ से भी महंगा एक बंगला खरीद लेता है। बमुश्किल पंद्रह साल में इतना सब कुछ? गुप्‍ता ज़रूर अपने भीतर कुछ, या कहें सारा रहस्‍य छुपाए हुए हैं। उनकी ताज़ा प्रदर्शनी 'एवरीथिंग इज़ इनसाइड’ (चालू मुहावरे में कहें तो, सब अंदर की बात है) पर अंजनी कुमार की कला-परंपरा से हटकर एक टिप्‍पणी।  




स्टील और पीतल- इन दो धातुओं से सुबोध गुप्ता ने अतीत, जीवन और सुख को अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें आकार में ढाला है। इनके साथ गोबर के कंडे/उपले भी हैं जिनसे एक घर बना हुआ है, मां की याद दिलाता हुआ। इनमें सबसे चर्चित है स्टील का बना हुआ बरगद का एक पेड़ दादाऔर दूसरा- उपलों जिसे पूर्वांचल के इलाकों में चिपरी कहते हैं, से बना हुआ एक घर माई मदर एण्ड मी। इन कलाकृतियों में एक और आकर्षण है रेज्’- एक विशाल स्टील की बाल्टी ऊंचे आसमान से अथाह बर्तन-भांडे पलट रही है। इसी सिरीज़ में ‘ऑल इन द सेम बोटको देखा जा सकता है जिसमें मानो ब्रह्माण्‍ड और धरती के सारे बर्तन को एक नाव मां की तरह या कह सकते हैं घर की तरह अपने में समेटे हुए है। इसके अलावा देअर इज़ आलवेज़ सिनेमाऔर ए ग्लास ऑफ वाटर’ सिरीज़ की कलाकृतियां हैं। सब कुछ स्टील और पीतल का बना हुआ। गुंथा हुआ आटा, सीकर से लटकी हुई बटलोइयां, रिक्‍शा और रिक्‍शे पर लदा हुआ बर्तनों का रेला, अनजाने स्रोत से बहती हुई आ रही बर्तनों की धाराएं, समय को रेखांकित करते कमोड और सिनेमा की रीलें, और भी बहुत कुछ। कुछ टिफिन हैं जो संगमरमर के बने हुए हैं, अपवाद हैं। बुलेट और प्रिया स्कूटर और उन पर लदे हुए दूध ढोने वाले बर्तन स्टील और पीतल के दुहराव के साथ निर्मित हुए हैं- एक तयशुदा समय को दो हिस्सों में विभाजित करता हुआ। 

इन सभी के साथ है कैनवास पर गोबर पोत कर बनाया गया सुबोध गुप्ता का सेल्फ पोर्टेट बिहारी’, जो इलेक्ट्रॉनिक लेड से लगातार लिखता रहता है: बि हा री बिहारी। सुबोध गुप्ता के शब्‍दों में यह एक पहचान है। दुनिया के स्तर पर भारत की जैसी पहचान है वैसी ही भारत के भीतर बिहार की पहचान है।’ सुबोध गुप्ता बताते हैं कि उनकी कलाकृतियां माइग्रेशन यानी प्रवास, उजाड़ और समय, अतीत और यादें, घर और जीवन के संबंधों की भंगिमाओं को प्रदर्शित करती हैं। उनकी कलाकृतियों में प्यास है, विभाजित होता समय है और पीछा करता हुआ अतीत है, अतीत का संग्रहण है, कुछ सुख है जिसे बांध लेने की आकांक्षा है और इन सबको बांधकर उलट-पुलट करती एक विशाल बाल्टी है और इन्हें आसमान टांग कर खड़ा चिकना, चमकदार, निस्पृह, अकेला स्टील का वटवृक्ष है। 

सुबोध गुप्ता बिहार में पटना के पास स्थित एक छोटे से कस्बे खगौल से आते हैं जहां आर्यभट्ट हुए थे। एक गरीब परिवार में पले-बढ़े इस कलाकार की शिक्षा-दीक्षा पटना आर्ट्स कॉलेज से हुई। सुबोध गुप्ता पर आर्यभट्ट और बिहार के मेधावी गणितज्ञों की जितनी छाया दिखती है उतनी ही उनके आसपास के जीवन की छाया भी दिखती है। 2004 तक की पेंटिंग में उतरे हुए बर्तन और आमजीवन 2000 के बाद धातुओं में ठोस में रूप में ढलने लगते हैं। रंग, लय, रोशनी, छाया, स्पर्श- सब कुछ धातुओं की घिसाई, मोड़ाई, सज्जा, कोण और स्पेसिंग में बदल जाता है। कला एक उन्मादी सुख में बदल जाती है। सैकड़ों सजी थालियों के सामने अघाई बैठी गाय और पीतल का बंद दरवाज़ा एक ही अर्थ देते हैं- अघाई हुई निस्पृहता!


इन कलाकृतियों में कुछ ऐसा है जो संदेह पैदा करता है और ऐसी कलाकृतियां अपने आप में संदिग्ध हो उठती हैं। यदि सुबोध गुप्ता इन्हें खास स्थान, समय और प्रस्तुति से नहीं जोड़ते तो यह समस्या नहीं बनती। मसलन दूध ढोने के लिए प्रिया स्कूटर और बुलेट का प्रयोग बिहार के संदर्भ में खटकता है। दलित और मध्यम जातियों के उभार के समय तक पटना या ऐसे शहरों में इनका प्रयोग न के बराबर था और बाद में भी बिहार में इन गाड़ियों का प्रयोग देखा नहीं गया। इनका प्रयोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में लंबे समय से ज़रूर होता रहा है। सुबोध गुप्ता जिस समय को विभाजित करते हैं, उसके स्थान की तलाश संदेह और संदिग्धता लिए हुए आती है। इसी तरह फिल्म के प्रोजेक्टर, रीले, खाली चकरौने न तो म्यूजि़यम जैसे दिखते हैं और न ही किसी ध्वस्त सिनेमा हॉल के अंदरखाने का दृश्‍य और न ही कबाड़ में बिकने के लिए इंतजार करता यह ठोस समय। आप इस कलाकृति के सामने खड़े होकर खुद संदिग्ध स्थिति में होते हैं कि हम हैं कहां और यह कलाकृति सामने आकर क्यों खड़ी हो गई है।

नेशनल आर्ट गैलरी में इन कलाकृतियों को लाने के लिए क्रेन की ज़रूरत पड़ी। इन्हें बनाने के लिए टनों स्टील और पीतल का प्रयोग किया गया। भारी मशीनों, घिसाई और जोड़ाई का लंबा काम हुआ। सैकड़ों मजदूरों और कलाकारों की मेहनत से धीरे-धीरे इन आकृतियों ने एक अर्थ ग्रहण किया। जाहिर सी बात है कि कलाकृति में इन बातों का जिक्र नहीं होता है। इन कलाकृतियों का पूरा प्रोडक्‍शन एक फिल्म के बनने की याद दिलाता है जिसमें श्रम और पूंजी के साथ मिलकर कला एक चलचित्र में ढल जाती है। फिल्म में उपस्थिति और अनुपस्थित का अजब मिश्रण होता है जिससे उस फिल्म की विशिष्‍टता निर्मित होती है। सुबोध गुप्ता की कलाकृतियों में उपस्थिति सिर्फ नायक कलाकार और उस कलाकृति की है। अन्य सारे कलाकार, श्रम, दृश्‍य से गायब हैं और पूंजी, कला के साथ मिलकर बाजार में आसमान छूते मुनाफे के लिए कॉरपोरेट घरानों में चक्कर मार रही है, बोलियों का इंतज़ार कर रही है- गोया किसी महान आत्मतुष्ट घराने का स्पर्श हासिल कर महान बन जाने के लिए लालायित हो।



सुबोध गुप्ता समय, जीवन, सुख और प्रवास की जिस अवधारणा पर कलाकृतियों को बनाते हैं और अथाह मात्रा में स्टील जैसी धातुओं का प्रयोग करते हैं, ठीक उसी अवधारणा का एक विलोम पक्ष भी है। इन्हीं लोहा, स्टील, पीतल, बॉक्साइट आदि धातुओं के लिए समय, जीवन, सुख और प्रवास का एक घिनौना व्यापार भी चल रहा है। जिंदल, मित्तल, टाटा आदि पूरे मध्य भारत को हथियार के बल पर भारत की सेना, पुलिस, गुप्‍तचर तंत्र, कानून और इस देश की संसद का प्रयोग कर काबिज होने का अभियान चलाए हुए हैं। पेड़ों की कटाई, पशुओं की हत्या से लेकर आम आदिवासी समुदाय और उनके देवस्वरूप पेड़ और पहाड़, गर्भ में जीवन समेटे हुए धरती का शिकार सलवा जुडुम से लेकर ऑपरेशन ग्रीनहंट जैसे अभियानों के माध्यम से चलाया जा रहा है। युद्ध की विभीषिका और मौत के कारोबार के पीछे यही धातु और इन्हें गलाने के लिए उपयोग में लाया जा रहा कोयला है। इस देश की सारी रोशनी, सारा कारोबार, सारा जीवन, अतीत और वर्तमान और इसकी जगमग; इन धातुओं, इससे पैदा होने वाला मुनाफा, इससे बनने वाली पूंजी और उस पर काबिज होते साम्राज्यवादी निगम और उनके दलालों का कारोबार और उनका अघाया हुआ जीवन देश के आम लोगों व आदिवासी जीवन की शर्त पर फल-फूल रहा है। कोई भी कलाकृति अपने साथ बिम्ब, प्रतीक, समय, समाज और एक उद्देश्‍य के साथ आती है। सुबोध गुप्ता की कलाकृतियां इससे अलग नहीं हैं। 

दिल्ली के उजाड़ में करोड़ों रूपये का चिकना, चमकदार, रोशनी में झलमल और विशाल निस्पृह वटवृक्ष देश के किन पेड़ों का, किन बड़े-बूढ़ों का, अतीत और वर्तमान जोड़ते हुए किस इतिहास निर्माता का प्रतिनिधित्व करता है? ऑपरेशन ग्रीनहंट के बाद बचे हुए जीवन और उसके इतिहास, बचे रह गए आसमान में लटके हुए बर्तन-भांडे और उजाड़ के बाद बची रह गई सफेदी का यह बिम्ब है या टाटा, जिंदल, मित्तल के स्टील प्लांट की जीत का यह लहराता हुआ झंडा है? ये विशाल आकृतियां अपना स्पेस हासिल करने के लिए जमीन और आसमान पर काबिज हो जाने के लिए आतुर दिखती हैं- एक स्रोत से शुरू होकर फैलाव की ओर बढ़ती हुई। ये किन्हें संबोधित करेंगी और कहां काबिज होंगी? करोड़ों-अरबों रूपए के कला बाजार में इन धातुओं का व्यापार और मुनाफा बटोरने वाले कॉरपोरेट घरानों (जिसमें सरकारें भी शामिल हैं) को निश्‍चय ही ये कलाकृतियां लुभा रही हैं और बोलियां भी लग रही हैं। हमें तो इनमें खून के छींटे दिखाई दे रहे हैं। 


सुबोध गुप्ता की एक कलाकृति है जिसमें एक रिक्‍शे पर बर्तनों का विशाल भंडार लदा हुआ। पटनहिया रिक्‍शा भार से चरमराता हुआ दिख रहा है और चरमराहट में स्थिर खड़ा है, सिर झुकाए। सचमुच एक समय दो हिस्सों में विभाजित है। इस विभाजन में बिम्ब, प्रतीक, जीवन, सुख भी विभाजित हैं। इन धातुओं का प्रयोग, कारोबार और इससे प्रभावित होने वाला जीवन भी प्रभावित है। सुबोध गुप्ता के प्रवास का सुख एक उन्माद में बदल गया है, कॉरपोरेट घरानों के सान्निध्‍य में सफेदी और पीलापन लिए हुए एक आत्मजर्जर सुख! 
(समाप्‍त) 

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1 टिप्पणी:

शिवप्रसाद जोशी ने कहा…

इस लेख के लिए शुक्रिया अंजनी आपका और अभिषेक आपका भी. सुबोध गुप्ता के कला कर्म पर ये एक सार्थक टिप्पणी है. ये लेख सच्ची कलाओं की उन्मुक्तता का आह्वान करता है और उन कला उपक्रमों पर तीखे सवाल छोड़ता है जो चाहे अनचाहे एक बहुत बड़ी कल्चरल हेजेमनी का हिस्सा हैं. सुबोध एक बनावटी दुख का इस्पात लाते हैं. काश वो प्रतिरोध की रचना भी अपनी अनूठी कला सामर्थ्य में करते. वो न जाने क्यों इतना क्षीण है वहां.
सादर

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