3/23/2014

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता

अर्जुन प्रसाद सिंह

‘अंग्रेजों की जड़े हिल चुकी हैं। वे 15 सालों में चले जायेंगे, समझौता हो जायेगा, पर इससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरा-तफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आयेगी।’


शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने यह बात 1931 में फांसी के फंदे पर लटकाये जाने के कुछ ही दिन पहले कही थी। उनका अनुमान सही निकला और करीब 16 साल बाद 1947 में एक समझौता हो गया। इस समझौते के तहत अंग्रजों को भारत छोड़ना पड़ा और देश की सत्ता की बागडोर ‘गोरे हाथों से भूरे हाथो में’ आ गई। इसके बाद सचमुच ‘अफरा-तफरी में’ काफी साल-यानी 67 साल बीत चुके हैं। अब देश की शोषित-पीड़ित जनता एवं उनके सच्चे राजनीतिक प्रतिनिधियों को भगत सिंह की याद ज्यादा सताने लगी है।

इस साल देश की तमाम देशभक्त, जनवादी व क्रान्तिकारी ताकतें भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव की शहादत की 83वीं वर्षगांठ मना रही हैं। खासकर, क्रान्तिकारी शक्तियां इस अवसर पर केवल अनुष्ठानिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर रहीं हैं, जैसा कि पंजाब सरकार हर साल 23 मार्च को उक्त अमर शहीदों के हुसैनीवाला स्थित समाधि-स्थल पर करती है। वे भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों को देश की शोषित-पीड़ित व मिहनतकश जनता के बीच ले जाने के लिए विभिन्न प्रकार के जन कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं।

भगत सिंह ने कहा था- ‘वे (अंग्रेज) सोचते हैं कि मेरे शरीर को नष्ट कर, इस देश में सुरक्षित रह जायेंगे। यह उनकी गलतफहमी है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, लेकिन वे मेरी आंकाक्षाओं को दबा नहीं सकते।’ सचमुच हमारे देश में न अंग्रेज सुरक्षित रह सके और न ही भगत सिंह के विचारों व आकांक्षाओं को दबाया जा सका। इतिहास साक्षी है कि ‘मरा हुआ भगत सिंह जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक’ साबित हुआ और उनके क्रान्तिकारी विचारों से नौजवान पीढ़ी ‘मदहोश’ और ‘आजादी एवं क्रान्ति के लिए पागल’ होती रही। वह लाठियां-गोलियां खाती रही और शहीदों की कतारें सजाती रही।

1947 के सत्ता हस्तान्तरण या आकारिक आजादी के बाद जनता के व्यापक हिस्से को लगा था कि देश व उनके जीवन की बदहाली रूकेगी और समृद्धि व खुशियाली का एक नया दौर शुरू होगा। लेकिन मात्र कुछ सालों में ही यह अहसास हो गया कि जो दिल्ली की गद्दी पर बैठे हैं वे उनके प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्होंने देश व जनता के विकास की जो आर्थिक नीतियां अपनाईं और उनका जो नतीजा सामने आया, उससे साफ पता चल गया कि वे बड़े जमीन्दारों व बड़े पूंजीपतियों के साथ-साथ साम्राज्यवाद के भी हितैषी हैं। उनका मुख्य उद्देश्य मिहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना है और शोषक-शासक वर्गों की तिजोरियां भरना है। भगत सिंह देश के विकास की इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझते थे। तभी तो उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस जिस तरह आन्दोलन चला रही है उस तरह से उसका अन्त अनिवार्यतः किसी न किसी समझौते से ही होगा।’ उन्होंनेे यह भी कहा था कि ‘यदि लाॅर्ड रीडिंग की जगह पुरूषोत्तम दास’ और ‘लार्ड इरविन की जगह तेज बहादुर सप्रू’ आ जायें तो इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ेगा और उनका शोषण-दमन जारी रहेगा। उन्होंने भारत की जनता को आगाह किया था कि हमारे देश के नेता, जो शासन पर बैठेंगे, वे ‘विदेशी पूंजी को अधिकाधिक प्रवेश’ देंगे और ‘पूंजीपतियों व निम्न-पूंजीपतियों को अपनी तरफ’ मिलायेंगे।‘ उन्होंने यह भी कहा कि ’निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग और उसके नेताओं को विदेशी शासकों के साथ जाते देखेंगे, तब उनमें शेर और लोमड़ी का रिश्ता नहीं रह जायेगा।’

सचमुच ‘आजाद भारत’ के विकास की गति इसी प्रकार रही है। 1947 में 248 विदेशी कम्पनियां हमारे देश में कार्यरत थीं, जिनकी संख्या आज बढ़कर करीब 15 हजार हो गई हंै। आज विदेशी पूंजी एवं भारतीय दलाल पूंजी का गठजोड़ अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है। खासकर, 1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया चली उससे हमारे देश के शासक वर्गों का असली साम्राज्यवाद परस्त चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो गया। आज औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ कृषि व सेवा क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी का ‘अधिकाधिक प्रवेश’ हो रहा है। करोड़ों रू. का लाभ अर्जित करने वाली ‘नवरत्नों’ समेत दर्जनों सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेशीकरण किया जा रहा है और उनके शेयरों को मिट्टी के मोल बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, सिंचाई, व्यापार, सड़क, रेल, हवाई व जहाजरानी परिवहन, बैंकिंग, बीमा व दूरसंचार आदि सेवाओं का धड़ल्ले से निजीकरण किया जा रहा है और इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में 74 से 100 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी लगाने की छूट दे दी गई है। कृषि, जो आज भी देश की कुल आबादी के कम से कम 65 प्रतिशत लोगों की जीविका का मुख्य साधन बना हुआ है, को मोन्सेन्टो व कारगिल जैसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का चारागाह बना दिया गया है। ‘निगमीकृत खेती’, बड़ी-बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं एवं ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ के नाम पर बड़े पैमाने पर किसानों व आदिवासियों की जमीन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सुपूर्द की जा रही है। पहले ये कम्पनियां खेती में खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं व अन्य कृषि उपकरणों की आपूर्ति करती थीं, अब कृषि उत्पादों के खरीद व व्यापार में भी वे अहम् भूमिका निभा रही हैं। आज कृषि समेत हमारी पूरी अर्थव्यवस्था विश्व बैंक, आई.एम.एफ. व विश्व व्यापार संगठन जैसी साम्राज्यवादी संस्थाओं के चंगुल में बुरी तरह फंस गई है। नतीजतन, लाखों कल-करखाने बंद हो रहे हैं, दसियों लाख मजदूरों-कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है और विगत 20 सालों में करीब 5 लाख  किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा है। और जब किसान-मजदूर व जनता के अन्य तबके अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष छेड़ते हैं, तो उन पर लाठियां व गोलियां बरसाई जाती हैं और उनकी एकता को खंडित करने के लिए धार्मिक उन्माद, जातिवाद व क्षेत्रवाद को भड़काया जाता है।

जाहिर है कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण व लूट-खसोट के इस भयानक दौर में भगत सिंह के विचार काफी प्रासंगिक हो गये हैं। खासकर, साम्राज्यवाद, धार्मिक-अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता, जातीय उत्पीड़न, आतंकवाद, भारतीय शासक वर्गों के चरित्र, जनता की मुक्ति के लिए एक क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण व क्रान्ति की जरूरत, क्रान्तिकारी संघर्ष के तौर-तरीके और क्रान्तिकारी वर्गों की भूमिका के बारे में उनके विचारों को जानना और उन्हें आत्मसात करना आज क्रान्तिकारी समूहों का फौरी दायित्व हो गया है। आइये, अब हम भगत सिंह के कुछ मूलभूत विचारों पर गौर करें।

साम्राज्यवाद के बारे में

वैसे भगत सिंह ने अपने अनेक लेखों व वक्तव्यों में साम्राज्यवाद व खासकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दमनकारी चरित्र के बारे में चर्चा की है, लेकिन लाहौर षड़यन्त्र केस से सम्बन्धित विशेष ट्रिब्यूनल के समक्ष 5 मई, 1930 को दिये गए बयान में उन्होंने साम्राज्यवाद की एक सुस्पष्ट व्याख्या की है। इस बयान में कहा गया- ‘साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजिश के अलावा कुछ नहीं है। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालयों एवं कानूनों को कत्ल करते हैं, बल्कि भयंकर हत्याकांड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग जैसे खौफनाक अपराध भी करते हैं।... शान्ति व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति व्यवस्था भंग करते हैं।’ खासतौर पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा गया कि ‘ब्रिटिश सरकार, जो असहाय और असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गई है, गुण्डों, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों की टोली है, जिसने कत्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार की शक्तियां जुटाई हुई हैं। शांति-व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियों या रहस्य खोलने वालों को कुचल देती है।’ इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि भगत सिंह साम्राज्यवाद को मनुष्य व राष्ट्र के शोषण की चरम अवस्था एवं लूट-खसोट, अशान्ति व युद्ध का स्रोत मानते थे। उनकी यह व्यख्या साम्राज्यवाद की वैज्ञानिक व्याख्या के काफी करीब है।

भारतीय पूंजीपतियों के चरित्र के बारे में

क्रान्तिकारी खेमों के बीच भारत के पूंजीपतियों के चरित्र को लेकर काफी विवाद है। कुछ संगठन व दल इसे ‘स्वतंत्र पूंजीपति वर्ग’ की संज्ञा से विभूषित करते हैं, तो कुछ इसे ‘दलाल’ व ‘राष्ट्रीय पूंजीपतियों’ के वर्ग में विभाजित करते हैं। इसी तरह कुछ इसे ‘साम्राज्यवाद के सहयोगी’ एवं ‘आश्रित वर्ग’ के रूप में भी चिह्नित करते हैं। लेकिन भगत सिंह व उनके साथियों ने इसके समझौता परस्त व घुटना टेकु चरित्र को काफी पहले पहचान लिया था। ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के घोषणा-पत्र (जिसे मुख्यतः भगवतीचरण बोहरा ने लिखा था) में साफ शब्दों में कहा गया- ‘भारत के मिहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है। उसके सामने दोहरा खतरा है-एक तरफ से विदेशी पूंजीवाद का और दूसरी तरफ से भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का। भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनैतिक नेताओं का ‘डोमिनियन’ स्वरूप को स्वीकार करना भी हवा के इसी रूख को स्पष्ट करता है। भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपतियों से, विश्वासघात की कीमत के रूप में, सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चहता है।’ और सचमुच टाटा व बिड़ला जैसे बड़े पूंजीपतियों एवं उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों ने 1947 में भारतीय जनता के साथ विश्वासघात और बड़े जमीन्दारों के साथ सांठ-गांठ कर सत्ता की प्राप्ति की।

धार्मिक अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता के बारे में

धार्मिक अंधविश्वास व कट्टरपंथ ने राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में एक बड़े बाधक की भूमिका अदा की है। अंग्रेजों ने धार्मिक उन्माद फैलाकर साम्प्रदायिक दंगे करवाये और जनता की एकता को खंडित किया। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का व्यापक प्रचार शुरू किया। खासकर, 1924 में कोहट में भीषण व अमानवीय हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए तो सभी प्रगतिशील व क्रान्तिकारी ताकतों को इस विषय पर सोचने को मजबूर होना पड़ा।

भगत सिंह ने मई, 1928 में ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ शीर्षक एक लेख लिखा जो ‘किरती’ में छपा। इसके बाद उन्होंने जून, 1928 में ‘साम्प्रदायिक दंगे और उसका इलाज’ शीर्षक लेख लिखा। अन्त में गदर पार्टी के भाई रणधीर सिंह (जो भगत सिंह के साथ लाहौर जेल में सजा काट रहे थे) के सवालों के जबाब में भगत सिंह ने 5-6 अक्तूबर, 1930 को ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ शीर्षक काफी महत्वपूर्ण लेख लिखा। इन लेखों में उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया। उन्होंने कहा कि ‘ईश्वर पर विश्वास रहस्यवाद का परिणाम है और रहस्यवाद मानसिक अवसाद की स्वाभाविक उपज है।’ उन्होेंने धार्मिक गुरूओं से प्रश्न किया कि ‘सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान अन्याय, अत्याचार, भूख, गरीबी, शोषण, असमानता, दासता, महामारी, हिंसा और युद्ध का अंत क्यों नहीं करता?’ उन्होंने माक्र्स की विख्यात उक्ति को कई बार दुहराया - ‘धर्म जनता के लिए एक अफीम है।’ उन्होंने धार्मिक गुरूओं व राजनीतिज्ञों पर आरोप लगाया कि वे अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक दंगे करवाते हैं। उन्होंने अखबारों पर भी आरोप लगाया कि वे ‘उत्तेजनापूर्ण लेख’ छापकर साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं। उन्होंने इसके इलाज के बतौर ‘धर्म को राजनीति से अलग रखने’ पर जोर दिया और कहा कि ‘यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं, धर्मों में हम चाहें अलग-अलग ही रहें।’ उनका दृढ मत था कि ‘धर्म जब राजनीति के साथ घुल-मिल जाता है, तो वह एक घातक विष बन जाता है जो राष्ट्र के जीवित अंगों को धीरे-धीरे नष्ट करता रहता है, भाई को भाई से लड़ता है, जनता के हौसले पस्त करता है, उसकी दृष्टि को धुंधला बनाता है, असली दुश्मन की पहचान कर पाना मुश्किल कर देता है, जनता की जुझारू मनःस्थिति को कमजोर करता है और इस तरह राष्ट्र को साम्राज्यवादी साजिशों की आक्रमणकारी यातनाओं का लाचार शिकार बना देता है।’ आज जब हमारे देश में राजसत्ता की देख-रेख में बाबरी मस्जिद ढाही जाती है और गुजरात जैसे वीभत्स जनसंहार रचाये जाते हैं, तब भगत सिंह की इस उक्ति की प्रासंगिकता सुस्पष्ट हो जाती है।

जातीय उत्पीड़न के बारे में

जातीय उत्पीड़न के सम्बन्ध में भगत सिंह ने अपना विचार मुख्य तौर पर ‘अछूत-समस्या’ शीर्षक अपने लेख में व्यक्त किया है। यह लेख जून, 1928 में ‘किरती’’ में प्रकाशित हुआ था। उस वक्त अनुसूचित जातियों को ‘अछूत’ कहा जाता था और उन्हें कुओं से पानी नहीं निकालने दिया जाता था। मन्दिरों में भी उनका प्रवेश वर्जित था और उनके साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था। उच्च जातियों, खासकर सनातनी पंडितों द्वारा किए गए इस प्रकार के अमानवीय व विभेदी व्यवहार का उन्होंने कड़ा विरोध किया। उन्होंने बम्बई काॅन्सिल के एक सदस्य नूर मुहम्मद के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए प्रश्न किया- ‘जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इन्कार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते-तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकार की मांग करो।’ छुआछूत के व्यवहार पर भी आपत्ति जाहिर करते हुए कहा- ‘कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है, हमारी रसोई में निःसंग फिरता है। लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है।’ जब हिन्दू व मुस्लिम राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूत्र्ति के लिए ‘अछूतों’ को धर्म के आधार पर बांटने लगे, और फिर उन्हें मुस्लिम या ईसाई बनाकर अपना धार्मिक आधार बढ़ाने लगे, तो उन्हें काफी नाराजगी हुई। उन्होंने अछूत समुदाय के लोगों का सीधा आह्वान किया- ‘संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो, दूसरे के मुंह की ओर मत ताको।’ लेकिन साथ ही साथ, उन्होंने नौकरशाही से सावधान करते हुए कहा- ‘नौकरशाही के झांसे में मत पड़ना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चहती है। यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है।’ इसी सिलसिले में उन्होंने उनकी अपनी ताकत का भी अहसास दिलाया। उन्होंने कहा- ‘तुम असली सर्वहारा हो। तुम ही देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोये हुए शेरों उठो, और बगावत खड़ी कर दो।’ भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है-खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हंै।

आतंकवाद के बारे में

भगत सिंह एवं उनके साथियों पर कई राजनैतिक कोनों से आतंकवादी होेने का आरोप लगाया जाता रहा है। यहां तक कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश सरकार की तरह उन्हें एक आतंकवादी मानते थे। इसीलिए उन्होंने 5 मार्च, 1931 को सम्पन्न हुए ‘गांधी-इरविन समझौता’ में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी की सजा रद्द करने पर जोर नहीं दिया। उल्टे, उन्होंने वायसराय इरविन को सलाह दी कि उन्हें कांग्रेस के करांची अधिवेशन से पहले फांसी की सजा दे दी जाये। और अंग्रेजों ने करांची अधिवेशन के शुरू होने के एक दिन पहले उन्हें फांसी पर लटका दिया। अगले दिन, यानी 24 मार्च, 1931 को करांची रवाना होने से पहले ‘अहिंसा के पुजारी’ महात्मा गांधी ने प्रेस में बयान दिया- ‘मेरी व्यक्तिगत राय में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी से हमारी शक्ति बढ़ गई है।’ इसी बयान में उन्होंने नौजवानों को अगाह किया कि ‘वे उनके पथ का अवलम्बन न करें।’ लेकिन देश की जनता, खासकर नौजवानों ने पूरे देश में फांसी की सजा का तीखा प्रतिवाद किया। करांची में भी नौजवानों ने गांधी को काला झंडे दिखाये और उनके खिलाफ आक्रोशपूर्ण नारे लगाये।

भगत सिंह ने असेम्बली हाॅल में फंेके गए पर्चे एवं सेंशन व हाईकोर्ट में असेम्बली बम कांड में दिये गए बयानों और ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेखों में अपने उपर लगाये गए इस आरोप (आतंकवादी होने) का माकूल जबाब दिया है। भगवतीचरण बोहरा ने गांधी के लेख ‘बम की पूजा’ (जिसमें असेम्बली बम कांड की तीखी आलोचना की गई थी) के जबाब में ‘बम का दर्शन’ शीर्षक एक सारगर्मित लेख लिखा, जिसमें गांधी के तमाम तर्कों का बखिया उधेड़ा गया। इस लेख को अन्तिम रूप भगत सिंह ने प्रदान किया।
भगत सिंह ने अपने बयानों व लेखों में साफ शब्दों में स्वीकार किया कि शुरूआती दौर में वे एक रोमानी क्रान्तिकारी थे और उन पर रूसी नेता बाकुनिन का प्रभाव था। लेकिन बाद में वे एक सच्चे क्रान्तिकारी बन गए। उन्होंने फरवरी, 1931 में लिखे गए ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेख में कहा- ‘आतंकवाद हमारे समाज में क्रान्तिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है, या एक पछतावा। इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ था। इसने राजनीति में आमूल बदलाव लाया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलंत रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई एवं शक्ति को जाहिर करने का अवसर मिला। लेकिन वह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद) इतिहास असफलता का इतिहास है-फ्रांस, रूस, जर्मनी स्पेन में हर जगह इसकी यही कहानी है।’ इस उक्ति से जाहिर है कि भगत सिंह आतंकवादी नहीं बल्कि क्रान्तिकारी थे, जिनका कुछ निश्चित विचार, निश्चित आदर्श और क्रान्ति का एक लम्बा कार्यक्रम था।
ज्ञातव्य है कि आज भी भगत सिंह के सच्चे अनुयायियों, यानी नक्सलवादियों को, भारत सरकार व अमेरिकी साम्राज्यवादी ‘आतंकवादी’ करार देकर तरह-तरह की यातना का शिकार बना रहे हैं। उन्हें फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारा जा रहा है और उनके नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों को कुचलने के लिए स्पेशल कमाण्डो फोर्स के साथ-साथ एयर फोर्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका ‘अपराध’ यही है कि वे भगत सिंह की तरह ‘अन्याय पर टिकी व्यवस्था का आमूल परिर्वतन’ करना चाहते हैं।

हिंसा के प्रयोग के बारे में

भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में हिंसा के इस्तेमाल पर महात्मा गांधी एवं भगत सिंह व उनके साथियों के बीच काफी गंभीर चर्चा हुई है। महात्मा गांधी का मानना था कि क्रान्तिकारियों के हिंसात्मक आन्दोलन से एक तो सरकार का सैनिक खर्च बढ़ गया है, जिसका बोझ आम नागरिकों पर पड़ रहा है, और दूसरे, उनके नेतृत्व में चल रहे अहिंसात्मक आन्दोलन को काफी क्षत्ति पहुंची है। उन्होंने सुखदेव के पत्र का जबाब देते हुए लिखा कि ‘यदि देश का वातावरण पूर्णतया शान्त रहता तो हम अपने लक्ष्य को अब से पहले ही प्राप्त कर चुके होते। जबकि भगत सिंह की समझ थी कि ‘अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है, लेकिन यह अतीत की चीज है। जिस स्थिति में हम आज हैं, सिर्फ अहिंसा के रास्ते से कभी भी आजादी प्राप्त नहीं कर सकते। दुनिया सिर से पांव तक हथियारों से लैस है, लेकिन हम जो गुलाम हैं हमंे ऐसे झूठे सिद्धांतों के जरिए अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए।’ उन्होंने टर्की और रूस की सशस्त्र क्रान्ति का उदाहरण देकर बताया कि जिन देशों में हिंसात्मक तरीके से संघर्ष किया गया, उनकी सामाजिक प्रगति हुई और उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता की भी प्राप्ति हुई। हालांकि वे यह भी मानते थे कि ‘क्रान्ति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है।’ (देखें- सेशन कोर्ट में 6 जून, 1929 का बयान)

वे अच्छी तरह समझते थे कि क्रान्ति का तरीका शासकों के रूख से तय होता है। उन्होंने घोषणा की कि ‘जहां तक शान्तिपूर्ण या अन्य तरीकों से क्रान्तिकारी आदर्शों की स्थापना का सवाल है, इसका चुनाव तत्कालीन शासकों की मर्जी पर निर्भर है। क्रान्तिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी हैं। ...क्रान्तिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम आवश्यकता से पैदा होती है और ऐसा आखिरी दांव के तौर पर होता है।’’

सचमुच जब शासक वर्ग क्रान्तिकारियों के तमाम शांति प्रस्तावों पर संगीन रख देता है तो उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचता है, सिवाय प्रतिक्रान्तिकारी हिंसा का जबाब क्रान्तिकारी हिंसा से देने का। आज जब यही जबाब नक्सलवादियों द्वारा शासक वर्गों की हत्यारी जमात को दिया जा रहा है, तो शासक वर्गों के साथ-साथ कुछ बुद्धिजीवीगण एवं नागरिक व मानवाधिकार संगठन भी ‘हिंसा’ या ‘अत्यधिक हिंसा’ का सवाल खड़ा कर रहे हैं।

हाल के वर्षों में हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील व जनतान्त्रिक जमातों ने भी हिंसा के प्रश्न पर भगत सिंह की समझ को लेकर एक नई बहस छेड़ी है। उनका कहना है कि जेल जाने के बाद भगत सिंह ने जब काफी अध्ययन व मनन किया तो वे एक ‘रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी’ से एक ‘वैज्ञानिक क्रान्तिकारी’ बन गए और उन्होंने क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसात्मक तरीका अपनाये जाने का विरोध किया। इस तथ्य को साबित करने के लिए वे आमतौर पर भगत सिंह की दो उक्तियों को पेश करते हैं। पहली उक्ति जनवरी, 1930 में लाहौर हाईकोर्ट में दिए गए उनके बयान से ली गई है जो इस प्रकार है- ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ से हमारा वह उद्देश्य नहीं था जो आम तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है।’ दूसरी उक्ति ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ शीर्षक लेख से ली गई है जो 5-6 अक्तूबर, 1930 को लिखा गया था। यह उक्ति इस प्रकार है- ‘इस समय मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे, अब अपने कन्धों पर जिम्मेदारी उठाने का समय आया था। कुछ समय तक तो, अवश्यम्भावी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पार्टी का अस्तित्व ही असम्भव-सा दिखा। उत्साही कामरेडों- नहीं नेताओं-ने भी हमारा उपहास करना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो मुझे यह डर लगा कि एक दिन मैं भी कहीं अपने कार्यक्रम की व्यर्थता के बारे में आश्वस्त न हो जाऊँ। वह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूंज रही थी- विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिए अध्ययन करो। अपने मत के समर्थन में तर्क देने के लिए सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। हिंसात्मक तरीकों को अपनाने का रोमांस, जो कि हमारे पुराने साथियों मंे अत्यधिक व्याप्त था, की जगह गम्भीर विचारों ने ले ली। अब रहस्यवाद और अन्धविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं रहा। यथार्थवाद हमारा आधार बना। हिंसा तभी न्ययोचित है जब किसी विकट आवश्यकता में उसका सहारा लिया जाये। अहिंसा सभी जन आन्दोलनों का अनिवार्य सिद्धान्त होना चाहिए’।

जहां तक पहली उक्ति का सम्बन्ध है वह भगत सिंह ने जज को ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का सही अर्थ बतालने और साथ ही साथ क्रान्ति में विचारधारा के महत्व को समझाने के लिए कहा था, न कि क्रान्ति में हिंसात्मक संघर्ष की भूमिका को नकारने के लिए। दूसरी बात यह है कि इसी बयान में भगत सिंह ने साफ शब्दों में कहा था कि ‘सेशन जज की अदालत में हमने जो लिखित बयान दिया था, वह हमारे उद्देश्य की व्याख्या करता है और उस रूप में हमारी नीयत की भी व्याख्या करता है।’ हम देख्ंों कि सेशन कोर्ट में दिए गए बयान में उन्होंने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि हमारा लक्ष्य है ‘क्रान्ति’, यानी ‘अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन’। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि ‘अगर वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जन शक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना होगी।’ क्या इस बयान में भगत सिंह एक ऐसे ‘भयंकर युद्ध’ की कल्पना कर रहे थे जो पूरी तरह अहिंसक होगी और जिसमें सिर्फ विचारों की तलवार चलेगी?

जहां तक दूसरी उक्ति का प्रश्न है, उसका तो संदर्भ ही पूरी तरह भिन्न है। यह उक्ति एक ऐसे लेख से ली गई है जिसमें ंभगत सिंह ने ईश्वर, धर्म, सम्प्रदाय, रहस्यवाद व अंधविश्वास के बारे में अपने वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत किया है। इस लेख में क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसा के प्रयोग पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं खड़ा किया गया है। इसमें भगत सिंह ने 1925 के पूर्व की कारवाईयों की समीक्षा एवं उस समय की अपनी राजनैतिक स्थिति को पेश किया है। 1925 में काकोरी एक्शन के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। इसके बाद पार्टी की जिम्मेदारी भगत सिंह एवं उनके साथियों के कंधों पर आ गई थी और उनके सामने कई गंभीर सवाल व समस्याएं मुंहबाये खड़ी थीं। इन सवालों व समस्याओं का हल ढूंढने के लिए उन्होंने देश व विश्व के क्रान्तिकारी आन्दोलनों का गंभीर अध्ययन व विश्लेषण किया और भारत के क्रान्तिकारी आन्देालन को ‘रहस्यवाद व धार्मिक अंधविश्वास’ एवं ‘हिंसात्मक तरीके अपनाने के रोमांस’ (जिनसे एच.आर.पी. के प्रायः सभी पुराने नेता ग्रसित थे) से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने क्रान्तिकारी संघर्ष में जनता की व्यापक भागीदारी पर जोर दिया और कहा कि जनता मुख्यतः अहिंसात्मक तरीके से लड़ेगी, लेकिन विशेष हालत में उसकी हिंसात्मक कार्रवाई भी जायज होगी। यही दूसरी उक्ति की अन्तिम दो पंक्तियों का असली मतलब है। इस पूरी उक्ति के सही अर्थ को समझने के लिए राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ शीर्षक किताब की जगमोहन सिंह व चमन लाल द्वारा लिखित भूमिका को पढ़ना चाहिए। इस भूमिका में अन्तिम दो पंक्तियों को एक संयुक्त वाक्य के रूप में इस प्रकार रखा गया है- ‘किसी विशेष हालत में हिंसा जायज हो सकती है, लेकिन जन आन्दोलनों का मुख्य हथियार अहिंसा होगी।’

इस तरह स्पष्ट है कि भगत सिंह के उक्त दोनों वक्तव्य यह साबित नहीं करते कि उन्होंने क्रान्तिकारी संग्राम में हिंसात्मक तरीके अपनाने का विरोध किया था। अगर वे ऐसा करते तो ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ के बाद लिखे गए ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक दस्तावेज (2 फरवरी, 1931) में नौजवानों से ‘सैनिक विभाग’ गठित करने का आह्वान नहीं करते। साथ ही साथ, वे क्रान्तिकारी पार्टी के एक कार्यभार के रूप में ‘ऐक्शन कमिटी’ बनाने (जिसका प्रमुख काम हथियार संग्रह करना, विद्रोह का प्रशिक्षण देना और शत्रु पर गुप्त हमला करना होगा) की बात नहीं करते। (देखें- भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, पेज नं.- 404, राजकमल प्रकाशन का पेपरबैक संस्करण)

इसके अलावा फांसी पर लटकाये जाने के 3 दिन पूर्व 20 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव द्वारा पंजाब के गवर्नर को भेजे गए पत्र में वे नहीं लिखते कि ‘हमने निश्चित रूप से युद्ध में भाग लिया, अतः हम युद्ध बंदी हैं। ... निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह निर्णायक होगा।... यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने उपर गर्व करते हैं।’(देखें वही किताब- पेज नं. 379-80)

कानून एवं न्यायपालिका के बारे में

‘‘हमारा विश्वास है कि अमन और कानून मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य अमन और कानून के लिए।....कानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों का एक पुर्जा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्व खो बैठता है। न्याय प्रदान करने के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का खात्मा होना चाहिए। ज्यों ही कानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना बंद कर देता है त्यों ही जुल्म और अन्याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे कानूनों को जारी रखना सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्भपूर्ण जबरदस्ती के सिवाय कुछ नहीं है।’’

शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने यह बात कमिश्नर, विशेष ट्रिब्यूनल (लाहौर षड़यन्त्र केस) को 5 मई 1930 को लिखी थी। उस दिन सरकार के अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल की कार्रवाई पूंछ हाउस में शुरू हुई थी। सरकार ने पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में इस ट्रिब्यूनल का गठन इसलिए किया था, ताकि भगत सिंह और उनके साथियों पर चल रहे मुकदमे की तेजी से सुनवाई की जा सके। जबकि भगत सिंह व उनके साथी चाहते थे कि मुकदमे की कार्रवाई धीमी गति से चले, ताकि उन्हें आम जनता तक अपने विचारों को ले जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय मिल सके। हालांकि वे अच्छी तरह जानते थे कि विशेष ट्रिब्यूनल ‘न्याय नहीं दे सकता’ और यह ‘कानून का एक खूबसूरत फरेब’ के सिवाय कुछ नहीं है। वे मुकदमे के परिणाम से भी अच्छी तरह वाकिफ थे।

उस दिन भगत सिंह और उनके साथी क्रान्तिकारी गीत गाते हुए और नारे लगाते हुए अदालत में हाजिर हुए थे। भगत सिंह ने मांग की थी कि उन्हें ट्रिब्यूनल के ‘गैर कानूनी’ होने सम्बंधी दलील पेश करने हेतु 15 दिनों का समय दिया जाये। लेकिन उन्हें यह समय नहीं दिया गया और मुकदमे  की कार्रवाई शुरू कर दी गई। भगत सिंह व उनके साथियों ने कोई वकील रखने से साफ इन्कार कर दिया। इसके बाद उन्हें 12 मई 1930 को हथकड़ी लगाकर ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किया गया। जब उन्होंने हथकड़ी लगाने का विरोध किया तो ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने गाली देते हुए इन क्रान्तिकारियों को पीटने का आदेश दिया। पुलिस ने प्रेस संवाददाताओं एवं आम लोगों के समक्ष उन्हें, खासकर भगत सिंह को लाठियों व जूतों से पीटा। सरेआम अदालत में इस प्रकार की पिटाई की दुनिया भर में काफी चर्चा हुई। पूरे भारत में इसके विरोध में आवाजें उठीं। नतीजतन इस विशेष ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष को ‘लम्बी छुट्टी’ पर जाना पड़ा और सरकार को इसे पुनर्गठित करना पड़ा।

इसी पुनर्गठित ट्रिब्यूनल में जब भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने एक आवेदन देकर बचाव पेश करने की मांग की तो इससे भगत सिंह को काफी दुःख हुआ। उन्होंने इस बाबत 4 अक्तूबर 1930 को अपने पिता के नाम एक कड़ा पत्र लिखा। इस पत्र में भगत सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सम्बंध में इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है-निचले दर्जे की कमजोरी। ...मैं जानता हूं कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत की आजादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखायी, यह बात मैं समझ नहीं पाता ?’

दरअसल भगत सिंह एवं उनके साथी ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित न्यायालयों की साम्राज्यवादपक्षीय व जन विरोधी भूमिका से अच्छी तरह वाकिफ थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार के कानून औपनिवेशिक शासन के हितों के अनुकूल चलते हैं और उनके न्यायालय साम्राज्यवादी शोषण के ही एक औजार हैं। इसीलिए उन्होंने कहा था कि ‘हर भारतीय की यह जिम्मेदारी बनती है कि इन कानूनों को चुनौती दे और इनका उल्लंघन करे।’ इसीलिए मुकदमे की सुनवाई के दौरान उन्होंने गोर्की के पावेल की तरह अपनी सफाई में कुछ भी कहने से इन्कार किया था। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार न तो न्याय पर आधारित है और न ही कानूनी आधार पर। इसलिए इस सरकार द्वारा संचालित किसी भी न्यायिक प्रक्रिया को वे कहीं से भी न्यायोचित नहीं मानते थे।  

लेकिन भगत ंिसंह एवं उनके साथी अदालतों का बहिष्कार नहीं करते थे। वे ब्रिटिश अदालतों का भी एक राजनैतिक मंच के रूप में उपयोग करते थे। इस सम्बंध में भगत सिंह के सुनिश्चित विचार थे, जिसे उन्होंने अपने एक साथी को जेल से लिखे एक पत्र में व्यक्त किया था। उनका यह पत्र जून 1931 में लाहौर से प्रकाशित ‘पीपुल्स’ नामक एक अंग्रेजी साप्ताहिक में छपा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि ‘राजनैतिक बन्दियों को अपनी पैरवी स्वयं करनी चाहिए’, ‘राजनैतिक महत्व के केस में व्यक्तिगत पहलू को राजनैतिक पहलू से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए’ और ‘गिरफ्तारी के बाद उसके काम का राजनैतिक महत्व समाप्त नहीं होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी लिखा कि राजद्रोह के मुकदमों में ‘हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और स्वतंत्र भाषण का अधिकार मांगना चाहिए।’ उन्होंने क्रान्तिकारियों को सावधान किया कि अगर हम ऐसे मुकदमों में अपना बचाव यह कहकर करेंगे कि ‘हमने कुछ कहा ही नहीं’, तो यह बात ‘हमारे अपने ही आन्दोलन के हितों के विरूद्ध’ होगी। इसी पत्र में उन्होंने वकीलों से भी अपील की- ‘वकीलों को उन नौजवानों की जिन्दगियां, यहां तक कि मौतों को भी खराब करने में इतने आत्महीन विशेषज्ञ नहीं होना चाहिए, जो दुःखी जनता की मुक्ति के पवित्र काम में अपने आप न्योछावर करने के लिए आते हैं।’ उन्होंने राजनैतिक मुकदमे में ज्यादा फीस लेने पर भी आश्चर्य व्यक्त किया- ‘भला एक वकील किसी राजनैतिक मुकदमें में यकीन न आने वाली फीस क्यों मांगे!’

इन्हीं उपर्युक्त विचारों के साथ भगत सिंह व उनके साथियों ने जब भी मौका मिला, अदालतों का भरपूर राजनैतिक उपयोग किया। इस सम्बन्ध में असेम्बली बम काण्ड पर दिल्ली सेशन कोर्ट एवं लाहौर हाईकोर्ट में दिये गए उनके बयान काफी महत्वपूर्ण हैं। भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने  6 जून, 1929 को दिल्ली सेशन जज के समक्ष एक ऐतिहासिक बयान दिया। इस बयान में न केवल ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ एवं ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ के असली जन विरोधी व मजदूर विरोधी चरित्र पर प्रकाश डाला गया, बल्कि ‘काल्पनिक हिंसा’ ‘आमूल परिवर्तन’ एवं ‘क्रान्ति’ के बारे में क्रान्तिकारियों के विचार भी रखे गए। साथ ही साथ, ‘बहरी’ अंग्रेजी हुकूमत को ‘सुनाने’ और ‘सामयिक चेतावनी’ देने के लिए असेम्बली में बम फेंकने के औचित्य की भी व्याख्या की गई।

दिल्ली सेशन जज ने जब इस केस में आजीवन कारावास की सजा सुना दी तो इसके खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में अपील की गई। इस सजा के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करते हुए भगत सिंह ने हाईकोर्ट में काफी महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने प्रसिद्ध कानून विशेषज्ञ सालोमान के हवाले से कहा कि ‘किसी व्यक्ति को उसके अपराधी आचरण के लिए उस समय तक सजा नहीं मिलनी चाहिए, जब तक उसका उद्येश्य कानून विरोधी सिद्ध न हो जाये।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाये तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण हत्यारे नजर आयेंगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल का अभियोग लगेगा।’ इस बयान में उन्होंने असेम्बली में बम फेंकने के अपने पवित्र व जनपक्षीय उद्देश्य एवं ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के असली मतलब को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने दलील दी कि चूंकि उन्होंने असेम्बली के खाली स्थान पर बम फेंकने के ‘मुश्किल काम’ को अंजाम दिया है, इसलिए उन्हें ‘बदले की भावना से’ सजा देने की बजाय ‘इनाम’ दिया जाये।

जैसा कि हम जानते हैं, ब्रिटिश न्यायालय ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरू व अन्य क्रान्तिकारियों के साथ न्याय नहीं किया (और वह कर भी नहीं सकता था) और उनमें से कईयों को मौत की बर्बर सजा सुना दी। जेल की काल-कोठरियों में बंद इन क्रान्तिकारियों ने अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए काफी तीखे संघर्ष किए और न्यायालय के समक्ष कई मांगे भी पेश कीं। ब्रिटिश न्यायालय उनकी तमाम न्यायप्रिय मांगों को ढुकराता रहा। अन्ततः 23 मार्च 1931 को (अदालत द्वारा नियत तिथि में एक दिन पूर्व) भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह के पार्थिव शरीर को तो नष्ट कर दिया लेकिन उनके क्रान्तिकारी विचार आज भी काफी प्रासंगिक हैं। आज हमारे ‘आजाद भारत’ की न्यायपालिका भी आमतौर पर शासक वर्गों के हितों का ही संरक्षण करती हैं। हमारे देश में आज भी ब्रिटिश जमाने के जेल मैन्यूअल, भारतीय दंड विधान, अपराधिक दण्ड विधान व अन्य कानून कुछ मामूली सुधारों के साथ लागू हंै। आज भी भारतीय न्यायालयों व जेलों में क्रान्तिकारियों के साथ प्रायः उसी प्रकार का गैर कानूनी व अमानवीय व्यवहार किया जाता है, जैसा कि ब्रिटिश काल में होता था। भगत सिंह के रास्ते पर चलने वाले भारत के क्रान्तिकारियों के साथ-साथ आम जनता को भी तय करना है कि इस शासक वर्ग पक्षीय न्यायपालिका के साथ क्या व्यवहार किया जाये।

क्रान्ति के बारे में 

अपने बयानों और लेखों में भगत सिंह ने क्रान्ति की अवधारणा एवं क्रान्तिकारी संग्राम में विभिन्न वर्गों व समूहों की भूमिका के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने कहा कि अगर कोई सरकार जनता को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का आवश्यक दायित्व बन जाता है कि वह न केवल ऐसी सरकार को समाप्त कर दे, बल्कि वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने हेतु उठ खड़ी हो। उन्होंने क्रान्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा- ‘क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुई है, बदलनी चाहिए।... क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अन्ततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो, तथा एक विश्व संघ मानव जाति को पूंजीवाद के बंधन से और साम्राज्यवादी युद्धों में उत्पन्न होने वाली बरबादी और मुसीबतों से बचा सके।’ यह बयान उन्होंने सेशन अदालत में तब दिया था जब जज ने उनसे क्रान्ति का मतलब पूछा था। इस बयान से स्पष्ट होता था कि क्रान्ति के बारे में उनका दृष्टिकोण कितना व्यापक था।

क्रान्ति में जनता के विभिन्न वर्गों व समूहों की भूमिका के बारे में भी उनका दृष्टिकोण काफी साफ था। वे ऐसी क्रान्ति करना चाहते थे ‘जो जनता के लिए हो और जिसे जनता ही पूरी करे’, और जिसका मतलब ‘जनता के लिए, जनता के द्वारा राजनीतिक सत्ता पर कब्जा’ करना हो। इस तरह भगत सिंह का यह दृष्टिकोण माओ की इस उक्ति से मेल खाती है कि जनता और केवल जनता ही क्रान्ति की प्रेरक शक्ति होती है। भगत सिंह क्रान्ति में किसानों-मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका को बखूबी समझते थे। वे कहते थे कि ‘गांवों के किसान और कारखानों के मजदूर ही असली क्रान्तिकारी सैनिक हैं।‘ खासतौर पर वे श्रमिकों की भूमिका पर जोर देते थे। उन्होंने कहा कि ‘साम्राज्यवादियों को गद्दी से उतारने का भारत के पास एकमात्र हथियार श्रमिक क्रान्ति है।’ इसी सन्दर्भ में वे क्रान्ति के बाद ‘सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता’ की स्थापना करना चाहते थे। वे नौजवानों को भूमिका को भी अच्छी तरह समझते थे। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र में यह कहा गया कि ‘देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुःख सहने की तत्परता, उनकी वेखौफ बहादुरी और लहराती कुर्बानी दर्शाती है कि भारत का भविष्य उनके हाथ सुरक्षित है।’ इन वर्गों व समूहों के अलावा भगत सिंह ने ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेख में बुद्धिजीवियों, दस्तकारों व महिलाओं को भी संगठित करने पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने ‘कांग्रेस के मंच का लाभ उठाने’, ‘ट्रेड यूनियनों में काम करने एवं उन पर कब्जा जमाने’ और सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों (यहां तक कि सहकारिता समितियों) में गुप्त रूप से काम करने का दिशा-निर्देश दिया।

जहां तक क्रान्ति की मंजिल का प्रश्न है, इस पर भगत सिंह के खेमे एवं उसके बाहर के क्रान्तिकारियों के बीच काफी मतभेद थे। कुछ लोग ‘राष्ट्रीय क्रान्ति’ की वकालत करते थे तो कुछ लोग ‘समाजवादी क्रान्ति’ की। भगत सिंह इस बहस में आमतौर पर ‘समाजवादी क्रान्ति’ का पक्ष लेते थे, लेकिन उन्होंने इस क्रान्ति की व्याख्या इस रूप में की थी- ‘कोई भी राष्ट्र गुलाम हो तो वह वर्गहीन समाज की स्थापना नहीं कर सकता, शोषण का खात्मा नहीं कर सकता और मनुष्यों के बीच समानता कायम नहीं कर सकता। अतः ऐसे किसी राष्ट्र की पहली जरूरत साम्राज्यवादी गुलामी के बंधनों को तोड़ने की होती है। दूसरे शब्दों में, किसी गुलाम देश में क्रान्ति साम्राज्यवाद विरोधी और उपनिवेशवाद विरोधी होती है।’ इस उक्ति से स्पष्ट है कि वे सामन्तवाद को लक्षित  नहीं करते थे, हालांकि ‘सामन्तवाद की समाप्ति’ को भी क्रान्ति के एक ‘बुनियादी काम’ के रूप में पेश करते थे।

हमारे देश में आज भी क्रान्ति की मंजिल के बारे में यह बहस जारी है। कुछ क्रान्तिकारी समूह ‘नव जनवादी क्रान्ति’ को अपनी मंजिल मानते हैं तो कुछ ‘समाजवादी क्रान्ति’ को। ‘नव जनवादी क्रान्ति’ को मानने वाले ‘सामन्तवाद-साम्राज्यवाद-दलाल नौकरशाह पूंजीवाद’ को लक्षित करते हैं तो ‘समाजवादी क्रान्ति’ को मानने वाले मूलतः भारतीय पूंजीवाद को।

भगत सिंह ने क्रान्ति को सफल होने के लिए लेनिन की तरह तीन जरूरी शत्र्तें बताई- 1. राजनैतिक-आर्थिक परिस्थिति, 2. जनता के मन में विद्रोह की भावना और 3. एक क्रान्तिकारी पार्टी, जो पूरी तरह प्रशिक्षित हो और परीक्षा के समय जनता को नेतृत्व प्रदान कर सके। उनका मानना था कि भारत में पहली शत्र्त तो मौजूद है, लेकिन दूसरी और तीसरी शर्त अन्तिम रूप में अपनी पूर्ति की प्रतीक्षा कर रहा है। वे तरह-तरह के जन संगठनों का निर्माण कर एवं पहले से स्थापित संगठनों में ‘फ्रेक्शनल’ काम कर जनता के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह की भावना जगाना चाहते थे और ‘पेशेवर क्रान्तिकारियों’ से लैश सही मायने में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करना चाहते थे। वे अध्ययन व वैचारिक संघर्ष पर काफी जोर देते थे और एक ऐसी पार्टी का निर्माण करना चाहते थे जिसका वैचारिक व राजनैतिक पक्ष सबसे उन्नत हो और जिसमें तमाम दकियानुसी व प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं को परास्त करने की क्षमता हो। इस सन्दर्भ में उनकी यह उक्ति काफी महत्वपूर्ण है- ‘इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ वे जोर देकर कहा करते थे कि ‘एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्वास करता है। आज की परिस्थिति में जब क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक व सैद्धान्तिक पक्ष उतना मजबूत नहीं है व उसमें एकरूपता का भी अभाव है, और साथ ही साथ, जब नेतृत्व व कार्यकत्र्ता अध्ययन-मनन व वैचारिक संघर्ष पर जोर देने के बजाय ज्यादा से ज्यादा व्यवहारिक व रूटीनी कामों में ही व्यस्त रहते हैं, भगत सिंह की यह उक्ति काफी महत्व रखती है।

भगत सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके उपर्युक्त विचार न केवल हमारे बीच कायम हैं बल्कि आज की परिस्थिति में काफी हद तक प्रासंगिक भी हंै। भगत सिंह व उनके साथियों ने क्रान्ति का जो बिगुल फूंका था, उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई पड़ रही है। भगत सिंह की शहादत के बाद क्रान्तिकारी संग्राम खत्म नहीं हुआ, वह आज भी टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजरता हुआ जारी है। भगत सिंह ने ठीक ही कहा था- ‘न तो हमने इस लड़ाई की शुरूआत की है और न ही यह हमसे खतम होगी।’ यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक ‘आदमी द्वारा आदमी का’ एवं ‘साम्राज्यवादी राष्ट्र द्वारा कमजोर राष्ट्रों का ‘ शोषण व दोहन जारी रहेगा। आज जरूरत इस बात की है कि भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों को आत्मसात् किया जाये और उन्हें जनता के बीच कारगर तरीके से ले जाकर भौतिक ताकत में तब्दील किया जाये। यही भगत सिंह व उनके साथियों के प्रति सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।

3/20/2014

क्‍या बनारस से काशीनाथ सिंह की उम्‍मीदवारी वास्‍तविकता बन सकती है?

काशीनाथ सिंह 



मैं पूरी गंभीरता से एक सवाल या कहें खुला प्रस्‍ताव आप सब के सामने रख रहा हूं:

''क्‍या लेखक काशीनाथ सिंह को बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ कांग्रेसी/निर्दलीय उम्‍मीदवार बनाया जा सकता है?''

ज़रा इन बिंदुओं पर सोचिए... ...

1. एक ओर जबकि पैराशूट से कुछ चमत्‍कारिक बाहरी उम्‍मीदवार बनारस में गिराए जा रहे हों, काशी की सांस्‍कृतिक-साहित्यिक पहचान का नाम काशीनाथ सिंह, मोदी विरोधी प्रतीक के तौर पर क्‍या बुरा है?

2. काशीनाथ जी ने बीबीसी के चढ़ाए गए इंटरव्‍यू पर जबकि अपनी सफ़ाई दे दी है, क्‍यों नहीं उन्‍हें ख़ुद आगे आकर यह ऐतिहासिक जि़म्‍मेदारी अपने कंधों पर लेनी चाहिए जो जितनी प्रतीकात्‍मक है उतनी ही वास्‍तविक भी? कम से कम दिग्विजय सिंह के कांग्रेसी प्रहसन से तो लाख गुना बेहतर?

3. क्‍या हिंदी का व्‍यापक साहित्यिक-सांस्‍कृतिक समाज बनारस की सेकुलर बौद्धिकता और ज्ञान की विरासत को बचाने हेतु खुद आगे आकर यह पहलकदमी करने की स्थिति में है?

4. क्‍यों नहीं प्रलेस, जलेस, जसम और तमाम लेखकीय मोर्चे एकजुट होकर काशीनाथ को निर्दलीय उम्‍मीदवार के तौर पर बनारस से परचा भरवा सकते हैं और संस्‍थानों में काम करने वाले सारे हिंदीजीवी अपनी एक माह की तनख्‍वाह काशीजी के प्रचार में लगा सकते हैं?

5. हिंदी लिखने-पढ़ने वाले व्‍यापक प्रगतिशील समाज के सामने क्‍या मोदी को रोकने से बड़ी ऐतिहासिक जिम्‍मेदारी कोई है फि़लहाल? अगर नहीं, तो यह प्रस्‍ताव क्‍या बुरा होगा?

बनारस में चुनाव 12 मई को है। समय पर्याप्‍त है। क्‍या इस प्रस्‍ताव पर विचार कर के, इसे आगे बढ़ा के, प्रसार कर के, एक सहमति बनाई जा सकती है? कांग्रेस नहीं, निर्दलीय सही। 

बस आखिरी बात यह समझ लेने की है कि काशीनाथ सिंह का बनारस से खड़ा होना पूरे पूर्वांचल के मतदान पैटर्न पर असर डाल सकता है क्‍योंकि राजनाथ सिंह ने बलिया से लेकर बनारस तक भाजपा के ठाकुर प्रत्‍याशियों की फसल खड़ी की हुई है। काशी का आना पूर्वांचल में भाजपा का जाना हो सकता है।

एक बार ज़रूर सोचिएगा।

सादर,
अभिषेक श्रीवास्‍तव 

3/18/2014

गांधीवाद को भ्रम की टोपी पहना रहे आनंदमार्गी प्रोफेसर!

अभिषेक रंजन सिंह 
जनता को सब्ज़बाग़ दिखाने में माहिर आम आदमी पार्टी अब गांधीवादियों को भी बरग़लाने लगी है. हाथ में तिरंगा, सिर पर गांधी टोपी और मुंह से राजनीतिक शुचिता की बात करने वाले पार्टी नेताओं के दर्शन, आचरण और सिद्धांत में गांधीवाद की कोई झलक नहीं मिलती. लोकसभा चुनावों में चंद सीटों का इंतज़ाम कैसे हो, इसके लिए आम आदमी पार्टी हर किस्म का प्रयोग करना चाहती है. पार्टी की ओर से अब तक घोषित ज़्यादातर लोकसभा उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि देखें, तो वे विदेशी अनुदान से संचालित होने वाले एनजीओ से जुड़े रहे हैं. ऐसे में गांधीवादी मूल्यों पर अद्वितीय राजनीति करने का दंभ भरने वाले केजरीवाल को यह बताना चाहिए कि पूंजीवाद के मार्ग पर चलते हुए गांधीवाद के लक्ष्य को कैसे पूरा किया जा सकता है।   



पिछले महीने दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में गांधीजनों की दो दिवसीय बैठक आयोजित की गई थी. विशुद्ध गांधीवादियों की इस बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों में उनकी क्या भूमिका होनी चाहिए, इस पर विस्तृत चर्चा हुई. उक्त बैठक में वयोवृद्ध गांधीवादी नारायण देसाई, गांधी स्मारक निधि के सचिव रामचंद्र राही, एस एन सुब्बाराव, सर्व सेवा संघ की पूर्व अध्यक्ष राधा भट्ट और अमरनाथ भाई के अलावा गांधीवादी लेखक-पत्रकार कुमार प्रशांत और गिरिराज किशोर भी शामिल थे.

अगले दिन कुछ अख़बारों में यह ख़बर प्रकाशित हुई कि गांधीवादी लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सशर्त समर्थन देंगे. जब इस बाबत गांधीवादी बुद्धिजीवियों से पूछा गया, तो उन्होंने इस तरह की बातों को नकार दिया. 

दरअसल, गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुई उक्त बैठक में जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) के प्रोफेसर प्रो. आनंद कुमार भी शामिल थे. यह पूरी तरह ग़ैर-राजनीतिक था, लेकिन प्रो. आनंद कुमार की मौजूदगी और उनके संबोधन से आम आदमी पार्टी को समर्थन देने संबंधी भ्रम पैदा हुआ. किसी ज़माने में समाजवादी छात्र राजनीति करने वाले और अब आम आदमी पार्टी के थिंक टैंक कहे जाने वाले प्रो. आनंद कुमार को पार्टी ने उत्तरी-पश्‍चिमी दिल्ली से लोकसभा का टिकट दिया है. 

आम आदमी पार्टी को हर वर्ग के लोगों और बुद्धिजीवियों का समर्थन कैसे मिले, इसके लिए वह निरंतर प्रयास करते रहते हैं. ग़ौरतलब है कि वयोवृद्ध गांधीवादी नारायण देसाई के ज्येष्ठ पुत्र नचिकेता भी आम आदमी पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं. नारायण देसाई गुजरात में रहते हैं. नचिकेता के ज़रिए ही इस बैठक से पहले प्रो. आनंद कुमार नारायण देसाई से मिलने अहमदाबाद आए और आम आदमी पार्टी के लिए गांधीवादियों का समर्थन मांगा. सूत्रों के मुताबिक़, नारायण देसाई ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि वह सर्व सेवा संघ से जुड़े हैं, इसलिए किसी पार्टी को समर्थन करना उनके सिद्धांत के विरूद्ध है.

प्रो. आनंद कुमार को क़रीब से जानने वाले बताते हैं कि वह छात्र राजनीति के समय से ही संदिग्ध रहे हैं. उन दिनों समाजवादी युवजन सभा में भी दो गुट थे. एक मधु लिमये का तो दूसरा राजनारायण का. प्रो. आनंद कुमार राजनारायण के गुट में शामिल थे. वर्ष 1972 के बीएचयू छात्रसंघ चुनाव में संतोष कुमार कपूरिया ने बतौर निर्दलीय छात्रसंघ के अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की. हालांकि, कुछ ही समय बाद संतोष कुमार कपूरिया की हत्या कर दी गई. लिहाज़ा बीएचयू में छात्रसंघ अध्यक्ष का पद रिक्त हो गया. 

उस समय प्रो. आनंद कुमार ने भी छात्रसंघ का चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. छात्रनेता कपूरिया की हत्या के बाद प्रो. कुमार को उनके स्थान पर अध्यक्ष बनाया गया. छात्रसंघ चुनाव के इतिहास में संभवतः यह पहला मौक़ा था, जब किसी पराजित उम्मीदवार को अध्यक्ष बना दिया गया. हालांकि, बाद में बीएचयू छात्रसंघ चुनाव के नियमावली में संशोधन किया गया. नए प्रावधानों के मुताबिक़, छात्रसंघ के उपाध्यक्ष का पद सृजित किया गया, ताकि अध्यक्ष की मृत्यु या उनके इस्ती़फे के बाद छात्रों द्वारा चुना गया व्यक्ति ही अध्यक्ष बन सके न कि कोई पराजित उम्मीदवार. 




प्रो. आनंद कुमार को लेकर बातें यहीं ख़त्म नहीं होती. अमरचंद्र जोशी उन दिनों काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय के कुलपति थे. उस समय किसी मुद्दे को लेकर बीएचयू के छात्रों ने काफ़ी बड़ा आंदोलन किया. छात्रों के इस रवैये से नाराज़ विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने आनंद कुमार समेत कई छात्रों को निष्काषित कर दिया था. ऐसे समय में छात्रों के साथ खड़ा होने के बजाय प्रो. आनंद कुमार ने गोपनीय रूप से कुलपति अमरचंद्र जोशी से मुलाक़ात की और उनसे माफ़ी मांगी. उसके बाद उनका निष्काषण वापस लिया गया. उनके इस व्यवहार से बीएचयू के छात्रों में बेहद निराशा और नाराज़गी हुई. उसके बाद बीएचयू कैंपस में आनंद कुमार माफ़ी कुमार के नाम से पुकारे जाने लगे. 

जेपी आंदोलन के समय प्रो. आनंद कुमार नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) आ गए. यहां वह समाजवादी युवजन सभा के बजाय फ्री थिंकर्स नामक संगठन के बैनर तले छात्र राजनीति करने लगे. उन्होंने जेएनयू में छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव भी फ्री थिंकर्स के टिकट पर लड़ा और जीत हासिल की. बाद में स्टूडेंट्स फॉर डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म बना, जिसमें दिग्विजय सिंह, चेंगल रेड्डी, जसवीर सिंह और सुनील जैसे छात्र नेता उन दिनों शामिल थे.

जेपी आंदोलन के समय ही राष्ट्रीय स्तर की छात्र युवा संघर्ष समिति बनी थी, जिसमें अरुण जेटली संयोजक और आनंद कुमार सह-संयोजक थे. वर्ष 1975 में देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई. इसी दौरान प्रो. आनंद कुमार आंदोलन बीच में ही छोड़कर उच्च शिक्षा हासिल करने शिकागो पहुंच गए. उनके अमेरिका जाने से छात्रों ने एक बार फिर ठगा हुआ महसूस किया. यही वजह थी कि उन दिनों जेएनयू के वामपंथी छात्र इसे लेकर समाजवादी छात्र नेताओं पर खूब व्यंग्य करते थे. 

बहरहाल, कुछ वर्षों बाद प्रो. आनंद कुमार शिकागो से पढ़कर स्वदेश वापस लौटे और बीएचयू में अध्यापक बन गए. हालांकि, इस बीच उनकी सियासी महत्वकांक्षा पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ चुकी थी. यही वजह थी कि वह स्वार्थवश कभी मुलायम सिंह यादव से नज़दीकियां बढ़ाने की कोशिश करते रहे तो कभी चंद्रशेखर से. प्रो. आनंद कुमार की इसी अवसरवादी स्वभाव से मोहन सिंह और कपिलदेव सिंह जैसे खांटी समाजवादी नेता उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा करते थे.

 (चौथी दुनिया से साभार) 

3/08/2014

नांदेड़ से लौटती पंजाबी लड़की के लिए






ये 18 अप्रैल सन 2013 की तपती दोपहर है
और मैं नांदेड़ से चली उस ट्रेन के स्‍लीपर डिब्‍बे में बैठा हूं
जिसकी पहली से लेकर आखिरी बोगी तक
चौड़े प्रिंट वाले बिरंगे सूट पहने
अधेड़ उम्र की पंजाबी औरतें अपनी बेढब
लेकिन ठोस चितकबरी देह से
अवसाद उगल रही हैं।

पंजाबी औरतें डरावनी होती हैं
इस ट्रेन में चढ़ने से पहले मैं ऐसा ही सोचता था
सिर पर कफन की शक्‍ल में बांधे दुपट्टा
कमर से लटकता कृपाण
औसतन पांच किलो के पर्स
ट्रेन के गलियारों को तकरीबन छेक लेती उनकी विशाल काया
हाथों में दमकता कड़ा
और आंखों में...
हां, आंखों पर मैं ठहर जाता हूं।

किसी सुलगते इतिहास की जि़ंदा राख हैं आंखें
पंजाबी औरतों की... नहीं?
कि जैसे जला दी गई हो कोई फसल ऐन आंखों के सामने
और ठोस काली जमीन में गड़ गई हों पुतलियां... कुछ ऐसा?
या फिर, एक तारीख के इंतज़ार में मत्‍था टेकते-टेकते अमृतसर से नांदेड़ तक
पानी ही न बचा हो...

... हां, पानी से याद आया।
पंजाबी औरतों की आंख
आंख न हुई गोया नांदेड़ के किसी ऊसर खेत में खुदी कोई बावली
जिसमें झांक कर पिछले चार घंटे से मैं हिलता पानी खोज रहा हूं।  
14 अप्रैल सन 2013 को मराठवाड़ा से आती एक पंजाबी औरत
औरत नहीं, अकाल है
जहां पानी मर चुका है, और
जिसमें कभी दमकने वाला आकाश आज गुम है। 

देखते हुए इन्‍हें-
-जबकि बार-बार घूम जाते हैं विधवा कॉलोनी के कुछ परिचित चेहरे
त्रिलोकपुरी से तिलक नगर तक
-जबकि बार-बार याद आता है मुझे सुच्‍चा सिंह
और उसकी रोटी के लिए चूल्‍हा फूंकती नवेली बीवी
(शायद ऐसी ही किसी तपती दोपहर)
-जबकि बार-बार हिलता है किसी अदालत का दरवाज़ा
जिसके बाहर खड़ी औरतों के हाथों में कड़े के अलावा सिर्फ प्‍लेकार्ड है
-जबकि बार-बार दे दी जाती है तारीख
और किन्‍हीं दो तारीखों के बीच लखविंदर कौर कर आती है तीर्थ...  
सोचता हूं-
3 नवंबर 1984 के बाद से
कैसे जी रहे होंगे कुछ पति मौत से सर्द बंद कमरों के भीतर
अपनी-अपनी बेवाओं के साथ?

ये सवाल हो सकता है फितूर
संवेदना का अतिरेक
अटकलबाज़ी भी
या फिर गलत लीक
कुछ भी हो, लेकिन आंखें
झूठ नहीं कहतीं।

पंजाब का तीर्थ अगर नांदेड़ में हो सकता है
तो पंजाब की औरत भी हो सकती है मराठवाड़ा
यह ट्रेन हो सकती है कडकडडूमा की अदालत
अप्रैल हो सकता है नवंबर
और 2013 हो सकता है 1984
क्‍या फर्क पड़ता है इस सब से
वास्‍तव में
जब ब्‍याहता औरत को देख कर अवसाद पनपता हो?  
नांदेड़ से पंजाब को चली इस ट्रेन में
मुझे चिंता उनकी नहीं
वास्‍तव में, उनकी कतई नहीं है।

इस अवसाद से भरे वक्‍त में मेरा दिल
उस जवान और खूबसूरत लड़की के लिए धड़क रहा है
पीछे की बर्थ पर लेटे-लेटे जिसकी देह
अपनी मां बनने को बेताब है
मुझे डर है
क्‍योंकि वह इस छोटी उम्र में ही
नांदेड़ होकर आई है।



(अभिषेक श्रीवास्‍तव)  




3/05/2014

लोकतांत्रिक व्‍यभिचार का राष्‍ट्रीय प्रहसन

अभिषेक श्रीवास्‍तव 

इतिहास गवाह है कि प्रतीकों को भुनाने के मामले में फासिस्‍टों का कोई तोड़ नहीं। वे तारीखें ज़रूर याद रखते हैं। खासकर वे तारीखें, जो उनके अतीत की पहचान होती हैं। खांटी भारतीय संदर्भ में कहें तो किसी भी शुभ काम को करने के लिए जिस मुहूर्त को निकालने का ब्राह्मणवादी प्रचलन सदियों से यहां रहा है, वह अलग-अलग संस्‍करणों में दुनिया के तमाम हिस्‍सों में आज भी मौजूद है और इसकी स्‍वीकार्यता के मामले में कम से कम सभ्‍यता पर दावा अपना जताने वाली ताकतें हमेशा ही एक स्‍वर में बात करती हैं। यह बात कितनी ही अवैज्ञानिक क्‍यों न जान पड़ती हो, लेकिन क्‍या इसे महज संयोग कहें कि जो तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कालिख की तरह यहां के फासिस्‍टों के मुंह पर आज से 12 साल पहले पुत गई थी, उसे धोने-पोंछने के लिए भी ऐन इसी तारीख का चुनाव 12 साल बाद दिल्‍ली से लेकर वॉशिंगटन तक किया गया है?

मुहावरे के दायरे में तथ्‍यों को देखें। 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्‍टेशन पर साबरमती एक्‍सप्रेस जलाई गई थी जिसके बाद आज़ाद भारत का सबसे भयावह नरसंहार किया गया जिसने भारतीय राजनीति में सेकुलरवाद को एक परिभाषित करने वाले केंद्रीय तत्‍व की तरह स्‍थापित कर डाला। ठीक बारह साल बाद इसी 27 फरवरी को 2014 में नरेंद्र मोदी की स्‍वीकार्यता को स्‍थापित करने के लिए दो बड़ी प्रतीकात्‍मक घटनाएं हुईं। गुजरात नरसंहार के विरोध में तत्‍कालीन एनडीए सरकार से समर्थन वापस खींच लेने वाले दलित नेता रामविलास पासवान की दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी से मुलाकात और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन; तथा अमेरिकी फासीवाद के कॉरपोरेट स्रोतों में एक प्‍यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी किया गया चुनाव सर्वेक्षण जो कहता है कि इस देश की 63 फीसदी जनता अगली सरकार भाजपा की चाहती है। प्‍यू रिसर्च सेंटर क्‍या है और इसके सर्वेक्षण की अहमियत क्‍या है, यह हम बाद में बताएंगे लेकिन विडंबना देखिए कि ठीक दो दिन पहले 25 फरवरी 2014 को न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस नामक एक कांग्रेस समर्थित टीवी चैनल द्वारा 11 एजेंसियों के ओपिनियन पोल का किया गया स्टिंग किस सुनियोजित तरीके से ध्‍वस्‍त किया गया है!  ठीक वैसे ही जैसे रामविलास पासवान का भाजपा के साथ आना पिछले साल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी के खिलाफ नीतिश कुमार के एनडीए से निकल जाने के बरक्‍स एक हास्‍यास्‍पद प्रत्‍याख्‍यान रच रहा है।


कहीं किसी कॉन्‍सपिरेसी की गुंजाइश नहीं है, न ही हम इन तथ्‍यों और घटनाओं में कोई साजिश जबरन सूंघने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, समय का एक चक्र पूरा हो चुका है। बीते 12 साल में उठी भ्रम की धूल बैठ चुकी है। स्थिति शीशे की तरह साफ है। 2002 में सांप्रदायिकता के मसले पर एनडीए की सरकार से हाथ खींच लेने वाले रामविलास पासवान दोबारा बीजेपी के साथ हैं। दलित राजनीति का सबसे साफ-शफ्फाक़ पढ़ा-लिखा चेहरा उदित राज मय पार्टी आज भाजपा का दलित चेहरा बन चुका है। स्‍थापित सत्‍ता के खिलाफ़ जनांदोलन खड़ा करने के लिए वेलफेयर इकनॉमिक्‍स के गुर सीखने 2002 में विदेश गए अरविंद केजरीवाल ने जनता को भ्रम में डालने वाले कुछ प्रयोगों के बाद आखिरकार धनकुबेरों की सभा में अपनी विचारधारा की घोषणा कर दी है। विदेश के पैसे से जमीनी राजनीति करने वाली कुछ बेचैन आत्‍माएं उनके साथ जुड़ चुकी हैं। पुराने किस्‍म की राजनीति करने वाले लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव आदि कांग्रेस की टुच्‍ची साजिशों में फंस कर अपना अस्तित्‍व बचाने में जुटे हैं। और इस समूचे परिदृश्‍य में वामपंथी दल आज भी एक आखिरी उम्‍मीद के साथ सेकुलरवाद की दरक चुकी नाव को थामे हुए हैं ताकि सांप्रदायिक-फासिस्‍ट ताकतों का हौवा खड़ा कर के किसी तरह दो-चार सवारों को इस पर बैठने और पार जाने के लिए मनाया जा सके जबकि उनके ढह चुके गढ़ से ममता बनर्जी की शक्‍ल में प्रतिक्रियावादी राजनीति की ऐसी राष्‍ट्रीय कोंपल फूट चुकी है जिसे खाद-पानी देने वाला और कोई नहीं बल्कि जीते जी अपनी प्रतिमा लगवाने के लिए राजनाथ सिंह से सिफारिश करने वाले बुजुर्ग अन्‍ना हज़ारे हैं, जो फिलवक्‍त एक पुराने भ्रष्‍ट संपादक के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि संसदीय वामपंथ की नाव को इस बार डूबना ही होगा, चूंकि उस पर मुलायम सिंह यादव, नीतिश और जयललिता जैसे प्रधानमंत्री पद का सपना पाले सवार लदे हैं जो कभी भी अपनी आस्‍थाएं बदल सकते हैं। कहने का लब्‍बोलुआब यह है कि 2014 में बाकी सबके पास विकल्‍प ही विकल्‍प हैं, अकेले संसदीय वाम विकल्‍पहीन है।


यह स्थिति अपने आप नहीं बनी है। इसे बाकायदा लाया गया है और इसके लिए चौतरफा काफी मेहनत हुई है। बीती 26 फरवरी को अगर विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के नरेंद्र मोदी पर दिए ''नपुंसक'' वाले बयान (की आदर्श स्थिति में निंदा करते हुए) का सहारा लेकर कहें, तो दरअसल इस समाज में व्‍यापक पैमाने पर नैतिक और वैचारिक ''नपुंसकता'' बीते दशक में फैली है। दिलचस्‍प यह है कि ऐसी नपुंसकता का आधार तर्क खुद लोकतंत्र ही बना है। इसे समझने के लिए सिर्फ रामविलास पासवान और उदित राज का उदाहरण काफी होगा। 23 फरवरी को जब खबरनवीसों के बीच यह चर्चा आम हुई कि पासवान और उदित राज भाजपा के साथ जाने वाले हैं, तो पहचान की राजनीति के कुछ बौद्धिक हरकारों ने बाकायदा यह तर्क अपने लिखे में फेसबुक से लेकर तमाम अनौपचारिक मंचों पर रखा कि अगर सवर्ण लोग बुर्जुआ पार्टियों में आवाजाही कर सकते हैं, तो दलित क्‍यों नहीं। उनके तर्क के हिसाब से यह तो सबका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वो जहां चाहे वहां जाए और रहे। इस तर्क से सहमत होने वालों की कमी नहीं है। साहित्‍य और संस्‍कृति के क्षेत्र में आवाजही के लोकतंत्र का यह तर्क और इस पर बहस अब कुछ साल पुरानी हो चुकी है और इस बारे में अच्‍युतानंदन जैसे खांटी वामपंथी नेताओं को छोड़ दें तो अब कोई गंभीर भी नहीं रहा। यह महज संयोग नहीं है कि कभी समाजवादी राजनीति करने वाले और अब आम आदमी पार्टी के चाणक्‍य बन चुके विनम्र बुद्धिजीवी योगेंद्र यादव ने खुलेआम मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के नेताओं को बेहद अश्‍लील और विवेकहीन तरीके से अपनी पार्टी में आने का न्‍योता दे डाला। उन्‍होंने माकपा के नेताओं से कहा कि वे चाहे तो ''डेपुटेशन'' पर आआपा में आ सकते हैं और अगर वे चुनाव में हार गए तो वापस कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में वापस जा सकते हैं। क्‍या कभी ऐसा कहीं भी इस दुनिया में हुआ था जो आज भारत में देखने में आ रहा है? अद्भुत यह है कि अश्‍लीलता की इस पराकाष्‍ठा पर अच्‍युतानंदन के अलावा और किसी ने भी कड़ाई से जवाब नहीं दिया। बौद्धिक जगत ऐसे प्रहसनों पर खामोश है।

वैचारिक रूप से नपुंसक आवाजाही के इस लोकतंत्र के विशिष्‍ट संदर्भ में ही हमें आम आदमी पार्टी नाम की खतरनाक परिघटना को अवस्थित कर के देखना होगा और यहीं से समझना होगा कि वोट बैंक के लिए ही सही, लेकिन सेकुलरवाद के नाम पर संसदीय लोकतंत्र की जो आखिरी दृश्‍य मर्यादा और नैतिकता भारतीय राजनीति में बची हुई थी, वह कैसे 2014 में अस्‍त हुई है। बात को समझने के लिए ज़रा पीछे चलते हैं और समकालीन तीसरी दुनिया के अक्‍टूबर 2013 अंक में प्रकाशित इसी लेखक के नरेंद्र मोदी पर लिखे लेख के कुछ अंश दोबारा देखते हैं ताकि चीज़ों को संदर्भ में रखने में आसानी हो सके:

''सोनिया गांधी इस देश की सियासत के लिए तकनीकी तौर पर अजनबी थीं, बावजूद इसके वे नेहरू खानदान की बहू थीं। उनके विदेशी मूल के मसले पर जिन शरद पवार ने राष्‍ट्रवादी कांग्रेस बनाई, आज वे यूपीए का हिस्‍सा इसी वजह से हैं। आडवाणी तब तक इस देश की सियासत में अजनबी बने रहे जब तक अटल बिहारी वाजपेयी का व्‍यक्तित्‍व उन्‍हें घेरे रहा। अटल के अवसान के बाद उन्‍होंने अपनी छवि को स्‍वीकार्य बनाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर डाला। जिन्‍ना की तारीफ़ कर के और अपनी छवि को नुकसान पहुंचा कर वे कम विश्‍वसनीयता के साथ ही सही भाजपा के बाकी नेताओं की कतार में एक और अदद चेहरा बन कर उभरे अलबत्‍ता ज्‍यादा उम्र के चलते सबसे आगे, लेकिन सबसे अलग नहीं। ऐसा वे दरअसल प्रधानमंत्री बनने के लिए नहीं कर रहे थे। उन्‍होंने देखा था कि इस देश ने धुप्‍पल में मनमोहन सिंह जैसे अजनबी को प्रधानमंत्री और किन्‍हीं प्रतिभा देवीसिंह पाटील को राष्‍ट्रपति बनाए जाने पर कभी कोई उंगली नहीं उठाई थी। यह कांग्रेसी आचरण उस जन धारणा के अनुकूल था जिसमें एक परिवार होता है (गांधी परिवार) और एक पार्टी (कांग्रेस पार्टी) जहां व्‍यक्ति की महत्‍ता नहीं होती, भले वह अर्जुन सिंह जैसा कद्दावर क्‍यों न हो। आडवाणी पिछले एक दशक में दरअसल भाजपा का इसी तर्ज पर कांग्रेसीकरण कर रहे थे जहां एक परिवार रहता (संघ परिवार) और एक पार्टी होती (भाजपा)। वे इसमें काफी हद तक सफल हो चुके थे और सिर्फ अपने उम्र और तजुर्बे के बल पर लॉटरी लग जाने की फि़राक में थे। तभी राष्‍ट्रीय फ़लक पर मोदी आते हैं और...।

दरअसल, पिछले दो दशक के दौरान कांग्रेस, बीजेपी और फिर कांग्रेस का केंद्र में सरकार चलाना उस जन धारणा की उपज है (विकल्‍पहीनता के अतिरिक्‍त) जो ''कंटेंट'' के स्‍तर पर दोनों दलों को समान मानती और जानती है। सत्‍ता परिवर्तन के मूल में कारण के तौर पर फर्क सिर्फ ''फॉर्म'' का रहा है (याद करें बीजेपी का नारा ''पार्टी विद ए डिफरेंस''), जिसे आडवाणी ने सायास एकरूप बनाने का प्रयास किया (''डिफरेंस'' को कमतर करते गए) और उस क्रम में खुद की छवि को भी ''डाइल्‍यूट'' किया। इस तरह राष्‍ट्रीय फ़लक पर जो राजनीतिक संस्‍कृति पिछले एक दशक में अटल बिहारी वाजपेयी के अवसान के बाद पैदा हुई, वह एक सेकुलर-साम्‍प्रदायिक सम्मिश्रण से बनी थी जिसके कांग्रेस और भाजपा मूर्त्‍त घटक थे। इस पूरी प्रक्रिया में ''2002 का गुजरात नरसंहार और नरेंद्र मोदी'' नामक आख्‍यान एक ऐसा अभूतपूर्व विचलन रहा जिसने इस सम्मिश्रण को बार-बार चुनौती दी।''  

जिस सेकुलर-साम्‍प्रदायिक सम्मिश्रण की बात यहां की गई है, उसकी इकलौती चुनौती के रूप में हमारे सामने ''2002 का गुजरात नरसंहार और नरेंद्र मोदी'' का आख्‍यान था। यह आख्‍यान इतना निर्णायक था कि सेकुलर-साम्‍प्रदायिक सम्मिश्रण के भीतर रह-रह कर ध्रुवीकरण पैदा कर देता था। चूंकि कंटेंट के स्‍तर पर भाजपा और कांग्रेस में कोई फ़र्क नहीं रह गया था और कुछ मुद्दों पर वामपंथी पार्टियों के स्‍टैंड को छोड़ दें तो बाकी और दलों की नैतिकता भी नरेंद्र मोदी के संदर्भ में सेकुलरवाद की राजनीति से तय होती थी, इसलिए जैसा कि हमने ऊपर बताया, सेकुलरवाद भारतीय राजनीति की ''आखिरी दृश्‍य मर्यादा और नैतिकता'' के रूप में बचा हुआ था। इसी मर्यादा और नैतिकता की दुहाई देकर 16 जून 2013 को जनता दल (युनाइटेड) ने भाजपा के साथ 17 साल से चल रहा अपना संयुक्‍त खाता अचानक बंद कर दिया था, जिसके बाद दिसंबर आते-आते स्थिति यह हो गई थी कि औपचारिक-अनौपचारिक बहसों में भाजपा के साथ शिवसेना और अकाली के अलावा कोई तीसरा सहयोगी खोजने के लिए लोगों को काफी सिर खपाना पड़ा। जेडीयू के अलग हो जाने के बाद एक धारणा बन रही थी कि मोदी के नाम पर भाजपा के साथ कोई नहीं आएगा और 2014 में एनडीए की सरकार बनना मुश्किल होगी। वजह? वही, संसदीय राजनीति की ''आखिरी दृश्‍य मर्यादा और नैतिकता'', जिसका नाम सेकुलरवाद है। इस मर्यादा को दो ही तरीकों से तोड़ा जा सकता था। या तो मोदी दंगों के लिए बेशर्त माफ़ी मांग लेते या फिर उन्‍हें माफ़ कर दिया जाता।

ज़ाहिर है, दोनों में से कुछ नहीं हुआ। अलबत्‍ता 2013 के अंत में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिन्‍होंने इस मर्यादा को भंग करने की ज़मीन बना दी। पहली घटना: 26 दिसंबर 2013 को गुजरात दंगों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआइटी ने ज़किया ज़ाफ़री की याचिका पर नरेंद्र मोदी को क्‍लीन चिट दे दी। दूसरी घटना इसके दो दिन बाद घटी, जब अपने अतिसंक्षिप्‍त राजनीतिक जीवन में एक बार भी सेकुलर-कम्‍यूनल का नाम लिए बगैर सिर्फ भ्रष्‍टाचार-भ्रष्‍टाचार चिल्‍लाते-चिल्‍लाते अरविंद केजरीवाल ने दिल्‍ली में मुख्‍यमंत्री की शपथ ले ली। छत्‍तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान तो भाजपा की मुट्ठी में पहले ही थे। दिल्‍ली में केजरीवाल की सरकार बनने का चुम्‍बकीय असर देखने में आया। अब तक उन्‍हें लेकर संशय में रहीं गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई राजनीतिक ताकतें अपने आप आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ने लगीं। पूरे देश में राजनीतिक लोगों की आवाजाही आआपा की ओर काफी तेज़ हुई और इसके बरक्‍स सेकुलर राजनीति के एक ध्रुव के तौर पर कांग्रेस निरीह दिखने लगी। दूसरी तरफ चूंकि मोदी को क्‍लीन चिट मिल चुकी थी और इसका पर्याप्‍त प्रचार भी किया जा चुका था, तो मामला बस जनधारणा में इस बात को पैठा देने का बचा था। यह काम जनवरी के तीसरे सप्‍ताह से शुरू हुए ओपिनियन पोल के सिलसिले ने कर डाला। हर ओपिनियन पोल ने भाजपा को 200 के आसपास सीटें दिखाईं और परिचर्चाओं में पैनल पर बैठे भाजपाइयों ने जम कर ''क्‍लीन चिट'' की खुराक जनता को दी। इस दौरान अरविंद केजरीवाल का मुख्‍यमंत्री के तौर पर दिया धरना और फिर इस्‍तीफा आदि भी टीवी और अन्‍य माध्‍यमों में छाया रहा। कुछ टीवी पत्रकारों की मानें तो जनवरी में उनके ऊपर नरेंद्र मोदी के भाषण और खबरें चलाने का दबाव उनके प्रबंधन की ओर से डाला जा रहा था, जिससे बचने के लिए उन्‍होंने अपने ''विवेक'' से आम आदमी पार्टी को खूब कवरेज दी। कवरेज के पैटर्न के आधार पर समाजवादी, गांधीवादी और वामपंथी यह समझते रहे कि आम आदमी पार्टी नरेंद्र मोदी को ''खा'' गई है, जबकि टीवी लगातार एक दुधारी तलवार का काम कर रहा था।

भाजपा और आआपा के बीच टीवी और अन्‍य माध्‍यमों से चलाई गई इस रोमांचक और तीव्र गति की राजनीति का मूल एजेंडा सिर्फ एक ही था: जनधारणा को प्रभावित करना। समझने वाली बात यह है कि जिस तरह अरविंद केजरीवाल की शहरी मध्‍यवर्ग के वोटर में स्‍वीकार्यता जनमाध्‍यमों की बनाई धारणा पर टिकी हुई है, उसी तरह मोदी के बारे में आम धारणा ''लोगों के दिमाग के किसी कोने में 2002 नंबर के खूंटे से टंगी हुई है''। तथ्‍यों के पार सारा खेल इन्‍हीं धारणाओं को ''मैनेज'' करने का है। यह धारणा सबसे पहले हमें टूटती दिखी राष्‍ट्रवादी कांग्रेस के मुखिया शरद पवार के बयान में, जिन्‍होंने कह डाला कि सुप्रीम कोर्ट से क्‍लीन चिट मिल जाने के बाद 2002 पर बात करने का कोई मतलब नहीं है। इसकी परिणति गोधरा कांड की 12वीं बरसी से एक दिन पहले रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान के बयान में हुई है। इन दो बयानों के बीच आवाजाही का जो ''लोकतांत्रिक'' खेल आआपा ने शुरू किया था, वह दिल्‍ली से निकल कर देशव्‍यापी हो चला है और संसदीय दलों की सीमाएं लांघ चुका है। कुछ उदाहरण देखें: लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल से पहले 13 विधायकों के टूट कर जेडीयू में जाने की खबर आती है। फिर अगली रात तक नौ विधायकों के घर वापसी की खबर लालू सुनाते हैं और अगले दिन विजयी मुद्रा में टेलीविज़न पर ''साम्‍प्रदायिकता'' को सबसे बड़ा दुश्‍मन बताते हैं। पश्चिम बंगाल में सीपीएम और भाजपा के बीच आवाजाही जारी है। गुजरात में कांग्रेस का तकरीबन लोप ही होने वाला है क्‍योंकि उसके तमाम नेता भाजपा में जा चुके हैं। 

वेदांता के प्रवक्‍ता और टाटा के सीएसआर सलाहकार डॉ. धनदकांत मिश्र व बिस्‍मय महापात्र (जो क्रमश: ओडिशा के बरहमपुर और भुबनेश्‍वर से आआपा के प्रत्‍याशी हैं) से लेकर सत्‍ता और माओवाद के बीच फंसी सोनी सोरी तक; कुडनकुलम में न्‍यूक्लियर प्‍लांट विरोधी राजनीति करने वाले एस.पी. उदयकुमार से लेकर झारखंड में दयामनी बरला तक, हर कोई आआपा में जा चुका है। डीएमके से अन्‍नाद्रमुक में जाने का सिलसिला नेताओं का जारी है जबकि डीएमके खुद भाजपा को समर्थन के बारे में सोचने लगा है। तेलंगाना बनने के बाद टीआरएस का कांग्रेस को समर्थन तय है। बीती 27 फरवरी को तेलुगुदेशम के तीन विधायक टीआरएस में चले गए हैं। इधर उत्‍तर प्रदेश में सपा के एक मज़बूत नेता मोदी के साथ लखनऊ रैली में मंच साझा करते पाए गए हैं। इन तमाम राजनीतिक व्‍यभिचारों के बीच रामविलास पासवान का भाजपा के साथ जाना सबसे अहम है क्‍योंकि वह नरेंद्र मोदी को 27 फरवरी 2002 की कालिख साफ़ करने का एक प्रतीक मुहैया करा रहा है।

राष्‍ट्रीय प्रहसन का आखिरी दृश्‍य 

यह 2014 का नया लोकतंत्र है जिसमें मर्यादा लुप्‍त है, नैतिकता सुप्‍त है। सिर्फ पाले मौजूद हैं और आपको सिर्फ इतना तय करना है कि आप किस पाले में हैं। इस समूची स्थिति को प्रहसन में तब्‍दील करती है आंध्र प्रदेश में अचानक चिटफंड के गर्भ से पैदा हुई एक नई राजनीतिक पार्टी जिसका नाम है ''इंडियन क्रिश्चियन सेकुलर पार्टी''। यह नए दौर का सेकुलरवाद है, जो कुछ भी हो सकता है। एक और सेकुलरवाद है, जो मुजफ्फरनगर दंगों के बाद कुछ स्‍वयंभू गांधीवादियों द्वारा वहां काटी गई समर्थन की फसल के बाद आआपा की उम्‍मीदवारी में लहलहाने वाला है। इसके समानांतर सेकुलरवाद की नई उलटबांसी नरेंद्र मोदी गढ़ रहे हैं, जिन्‍होंने 2 मार्च को लखनऊ रैली में भाजपा को सबसे बड़ा सेकुलर बताया और बाकी सभी पार्टियों को छद्म सेकुलर, जो कि दंगे करवाती हैं। इस व्‍यभिचारी परिदृश्‍य की वैचारिक दिशा क्‍या है? क्‍या यह विचारधारा का अंत जैसी कोई बात है? क्‍या यह संक्रमण का कोई दौर है जिसमें से कुछ अच्‍छा निकलना है? आखिर हो क्‍या रहा है?

वापस लेख की शुरुआत में चलते हैं। सारे ओपिनियन पोल की पोल खोले जाने के बावजूद 27 फरवरी को गोधरा की 12वीं बरसी पर जो इकलौता विदेशी ओपिनियन पोल मीडिया में जारी किया गया है, उसकी जड़ों तक जाना होगा जिससे कुछ फौरी निष्‍कर्ष निकाले जा सकें। एक पोल एजेंसी के तौर पर अमेरिका के प्‍यू रिसर्च सेंटर का नाम भारतीय पाठकों के लिए अनजाना है। इस एजेंसी ने मनमाने ढंग से चुने गए 2464 भारतीयों का सर्वेक्षण किया और निष्‍कर्ष निकाला कि 63 फीसदी लोग भाजपा की सरकार चाहते हैं तथा 78 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। सवा अरब के देश में ढाई हज़ार के इस सर्वेक्षण को जारी करने की तारीख चुनी गई 27 फरवरी, जिस दिन रामविलास और मोदी दोनों अपने जीवन का एक चक्र पूरा करने वाले थे। क्‍या कोई संयोग है? कतई नहीं।



उपर्युक्‍त तथ्‍यों से एक बात साफ़ है कि आज की तारीख में अब तक भारत में जो कुछ भी देखने में आ रहा है, वह एक विश्‍वव्‍यापी फासिस्‍ट एजेंडे के तहत उसे पोसने वाली संस्‍थाओं का किया-धरा है। गुजरात-2002 की कालिख छुड़ाने में जुटे नरेंद्र मोदी हों या खुद को सीआइआइ के सामने पूंजीवाद का समर्थक बताने वाले फोर्ड अनुदानित अरविंद केजरीवाल या फिर नवउदारवादी पूंजीवाद को देश में लागू करने वाली कांग्रेस पार्टी, तीनों एक ही वैश्विक एजेंडे का हिस्‍सा हैं। इस दुश्‍चक्र से निजात दिलाने वाली सिर्फ एक ही ताकत है जो इस खेल को समझ रही है या समझाए जाने पर समझ सकती है। वो हैं वामपंथी राजनीति करने वाली तमाम ताकतें। 2014 के लोकसभा चुनावों के आलोक में अगर आज ईमानदार और देसी राजकाज की कोई भी जनपक्षीय उम्‍मीद बनती है तो इन्‍हीं ताकतों से, जिनके पंडाल में अहं और जोड़तोड़ के असंख्‍य छेद हो चुके हैं। 


(समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च अंक से) 

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