5/08/2014

Benares Grapevine-3: यथार्थ का जादू और धारा-144



यथार्थ तब तक यथार्थ है जब तक उसके आगे कल्‍पना का अंश जुड़ा है। आप यथार्थ को सपनों से काट दीजिए, तो ज़मीन पर कटी हुई उंगली की तरह तड़फड़ाता और बिलबिलाता जो कुछ भी रिसते हुए बचेगा, वह खंडित सत्‍य होगा जो जुगुप्‍सा पैदा करेगा। आप सपने को यथार्थ के बगैर पढि़ए, तो वह प्रहसन बन जाएगा। यथार्थ को उसके समूचे विस्‍तार के साथ रख देने पर भी बात नहीं बनेगी। उसका समकालीन होना आवश्‍यक है।

अब तक हमने रियल पॉलिटिक पर बात की। इसमें सपना गायब था। यह जुगुप्‍साजनक था। हमने सपने पर बात की। सपना मोदी को हराने का, जिससे प्रेरित सर्वे आम आदमी पार्टी को हफ्ते भर पहले ही कागज़ पर जितवा देता है। यह प्रहसन था। आज हम यथार्थ पर उसके संपूर्ण विस्‍तार के साथ बात करेंगे जो काल से कटा हुआ, या काल निरपेक्ष, धूल भरी प्राचीन कोठरियों में जाकर अय्यारी बन जाता है।

परसों देर रात हम लोग एक ऐसी बहस में मुब्तिला थे जिसका चुनाव इत्‍यादि से कोई लेना-देना नहीं था। दरवाज़ा खुला हुआ था। रात के एक बजे थे कि अचानक विष्‍णु खरे के कमरे से व्‍योमेश शुक्‍ल निकलते हुए दिखे। हमने चर्चा में उन्‍हें भी घसीट लिया। उनका पक्ष पहले से तय था। मेरे विरोधी रोहित प्रकाश को एक हमदर्द पाकर राहत मिली। व्‍योमेश नहीं आते तो शायद रात भर बहस चलती। उनके अचानक प्रकट होने से नींद बच गई। व्‍योमेश को दो शिकायतें थीं। पहली तो यह, कि कबीर मठ वाले कार्यक्रम में आयोजन समिति की ओर से विष्‍णु खरे के बयान पर खेद उन्‍होंने नहीं जताया था (जैसा मैंने लिखा) बल्कि संजय श्रीवास्‍तव ने। मेरे पास रिकॉर्डिंग थी, लेकिन मैंने माना कि गलती हो सकती है। फिर पुलिस को मार्च रोकने से राज़ी करने में वी.एन. राय की अकेली भूमिका के बारे में मेरे लिखे पर उन्‍हें एतराज़ था। मेरे पास तस्‍वीरें थीं। मैंने माना कि इसमें भी चूक संभव है। अब, जो मैंने देखा और समझा वह बेशक उनके देखे और समझे से अलग रहा, लेकिन यथार्थ एक ही था। उसके दो विस्‍तार थे। और भी रहे होंगे। यही खूबी है मनुष्‍य की, जो यथार्थ को अपनी-अपनी कल्‍पनाओं के हिसाब से विस्‍तारित कर लेता है और एकाधिक कल्‍पनाओं के टकराव में मूल पाठ गायब हो जाता है। 4 तारीख का फासीवाद विरोधी सम्‍मेलन अब लोगों की कल्‍पनाओं का हिस्‍सा है। तीन दिनों में गंगा में बहुत पानी बह चुका है।

रियलपॉलिटिक की जमीन पर अजय राय गायब हैं। कांग्रेस लड़ाई से बाहर दिख रही है। केजरीवाल अब तक लोगों की कल्‍पना का हिस्‍सा नहीं बन पाए है, अलबत्‍ता ज़मीन पर वे ही दिख रहे हैं। नरेंद्र मोदी लोगों की कल्‍पनाओं से लेकर वास्‍तविकता की ज़मीन पर हर कहीं मौजूद हैं। अब भी, उन्‍हें चुनौती मिलती तो नहीं दिख रही। बजरडीहा जैसी विशाल बुनकर कॉलोनी में भी युवाओं को भाजपा की टोपी लगाए देखा जा सकता है। बात करते वक्‍त वे टोपी उतार देते हैं। मकानों पर आम आदमी पार्टी के सफेद झंडे टंगे हैं। बच्‍चा-बच्‍चा केजरीवाल की टोपी पहने हुए है। एक बुजुर्ग अशफ़ाक का कहना है, ''यहां के चार में से एक वार्ड पर भाजपा का पार्षद है। लोग उसे इसलिए जिताते हैं क्‍योंकि वो काम करता है।'' अरविंद केजरीवाल इस सीज़न में इकलौते नेता रहे जिनकी तकिया मैदान में हुई सभा पूरी भरी हुई थी। अशफ़ाक कहते हैं, ''ये ऐतिहासिक रहा। अइसा तो आज तक कभी नहीं हुआ।'' वहीं कोने में दिन भर काम कर के खड़े आसिफ़ कहते हैं, ''जलवा तो है।'' लेकिन वोट किसे पड़ेगा? आसिफ़ मेरा हाथ पकड़ पर दूसरे हाथ से मेरी हथेली को ठोंकते हैं। दुर्गाकुंड पर जहां केजरीवाल रुके हुए हैं, वहां पान की दुकान वाला एक सिपाही को कुछ समझा रहा था, ''... वो ही के वोट दियाई... ओकर अंडरकरेंट हौ।'' पान वाले के मुंह से अंडरकरेंट सुनकर मुझमें दिलचस्‍पी जगती है। मैं पूछता हूं, ''केकर अंडरकरेंट हो?'' करीब दस सेकंड मेरा चेहरा देखने के बाद वो कहता है, ''आप क...।'' उसकी दुकान पर अजय राय का स्टिकर सटा हुआ था।  
शाम को टाइम्‍स खबर देता है कि अजय राय लड़ाई से बाहर हो चुके हैं। अस्‍सी पर मिले मित्र अजय यादव बताते हैं कि केजरीवाल जीत रहा है। मोदी दूसरे नंबर पर रहेगा। वे कहते हैं कि मदनपुरा से लेकर तमाम गांवों और मुसलमान इलाकों में केजरीवाल ही केजरीवाल है। एक  आशंका यह हो सकती है कि आखिरी दिनों में भाजपाई इन मुसलमान इलाकों में जाकर केजरीवाल के लिए वोट मांगकर उनका खेल बिगाड़ दें। इसी बीच डॉक्‍टर लेनिन फोन करते हैं। वे बताते हैं कि रोहनिया इलाके में ठाकुर, ब्राह्मण, मुसलमान और भूमिहार सबको अजय राय ने मैनेज कर लिया है। बजरडीहा वाले कह रहे थे कि अजय राय एक बार भी उस इलाके में इस बार नहीं आए। बीती शाम गुलाम नबी आज़ाद की रेवड़ी तालाब इलाके में सभा होनी थी। वहां के कांग्रेसी कार्यकर्ता जमाल भाई पर इसकी जिम्‍मेदारी थी। जमाल कहते हैं, ''आप लोग पार्टी तक ये बात पहुंचवाइए कि वो लोग सीरियस हों। बताइए, कितनी बेइज्‍जती हुई हमारी लोगों में। सब तैयारी कर लिए थे की सभा की, जनता इंतज़ार कर रही थी और नेता ही नहीं आए। अइसे थोड़ी होता है।'' नेता इलाके में बगैर गए कैसे वोटों को मैनेज कर लेते हैं, यह मेरे लिए अब तक रहस्‍य है।

रहस्‍य और भी हैं। मसलन, दोपहर ढल रही थी। चार बज रहे थे। बीएचयू में सिर्फ धूल उड़ रही थी। कला संकाय के पुराने भवन के बाहर दो-चार लोग बैठे पकौड़ी खा रहे थे। बाकी चारों ओर सन्‍नाटा था। ऐसा लग रहा था गोया कोई खंडहर हो जिसमें एकाध सैलानी पहुंचे हों। हम कला संकाय के लिए बाएं मुड़े ही थे कि फ्रेंच विभाग के पास से एक बेहद दुबला-पतला छात्र साइकिल को लहराते हुए गुज़रा। कुछ करीब आया तो पता चला कि वो गाना गा रहा था। और करीब आया तो उसके मुंह से बिल्‍कुल किसी अपरिचित राग में सुनाई दिया, ''मोदी-मोदी''। काफी दूर तक वो इसे गुनगुनाते हुए जाता रहा। उसकी साइकिल नज़र से ओझल हुई कि सामने तेलुगु विभाग के गेट पर समयांतर के संपादक पंकज बिष्‍ट और कथाकार प्रेमपाल शर्मा गाड़ी से उतरते दिखे। मैंने इससे पहले कभी भी दिल्‍ली के लेखकों को बनारस में नहीं देखा था। उत्‍कंठा में हमने कदम तेज़ कर दिए। विभाग में घुसते ही भूलभुलैया जैसा अहसास होने लगा। हर तरफ सन्‍नाटा था। हर ओर धूल थी। एक चपरासी ने बताया कि कार्यक्रम पहले तल पर है। ऊपर पहुंचे तो एक सभागार में करीब चालीस लोग जुटे हुए थे और बरसों पुराने रैली कंपनी के पंखों के बीच इकलौता एसी हांफ-हांफ कर चल रहा था। गोलमेज के एक छोर पर पंकज बिष्‍ट और प्रेमपालजी बैठे थे। जादुई यथार्थवाद पर इनका वक्‍तव्‍य शुरू होने वाला था।

सबसे पहले मालवीयजी की मूर्ति पर माल्‍यार्पण हुआ। फिर हमेशा की तरह विश्‍वविद्यालय का कुलगीत गाया गया। तीन छात्राओं की बेहद सुरीली आवाज़ में गाया गया यह गीत मुझे नोस्‍टेल्जिक कर गया। कमज़ोर एसी के बावजूद पसीना सूख चुका था, ठंडक दिल तक पहुंच चुकी थी और रामाज्ञा शशिधर ने विषय प्रवर्तन के लिए चंद्रकला त्रिपाठी को आमंत्रित कर दिया था। चंद्रकलाजी ने बोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ पकड़ में नहीं आ रही थी। उनकी आवाज़ पहले से बहुत कमज़ोर हो गई है। कोई शब्‍द हम तक पहुंच नहीं पा रहा था, इसलिए ऐसा लग रहा था मानो अब भी ''मधुर मोहर अतीव सुन्‍दर...'' ही बज रहा हो। ऐसा लगा गोया विलायत खान सम पर पहुंच गए हों। इतिहास के किसी उपेक्षित कोने सा वह सभागार अपनी प्राचीन महक में धीरे-धीरे कुछ फुट ऊपर उठ गया। ज़मीन पर चुनाव जारी था, हवा में व्‍याख्‍यान। मुझे नींद आ चुकी थी। पता तब चला, जब मित्र नवीन ने मुझे खोदा। आंख खुली तो कुछ लोग मेरी ओर देख रहे थे। सन्‍नाटे को चीरती अचानक बजी मेरी नाक ने जादू को तोड़ दिया था। यथार्थ मेरी ओर खिंची लोगों की निगाहों में बिलबिला रहा था।

किसी हादसे की प्रत्‍याशा में हम लोग बाहर निकल आए। बाहर से देखने पर वह सभागार फिर पहले जैसा दिखने लगा था। उसमें जो चल रहा था, वह सिर्फ उसके भीतर चल रहा था। जो बाहर चल रहा था, वह भीतर गायब था। बीएचयू का एनी बेसेंट सभागार और बाकी बनारस चुनावी यथार्थ के दो अलग-अलग विस्‍तार थे। कुछ जादुई घट रहा था दोनों जगह।


सभागार के बाहर वाले बनारस में नरेंद्र मोदी की रैली पर रोक लग चुकी थी। बिड़ला छात्रावास के छात्र अनुशासित तरीके से आइपीएल मैच देखने में व्‍यस्‍त थे। बीएचयू के गेट पर आरएएफ की टुकडि़यां और ओबी वैनें तैनात हो गई थीं। शहर का आदमी मोदी की राह देख रहा था। शहर की औरतें घरों कैद में केजरीवाल की सलामती के बारे में सोच रही थीं। बच्‍चे किसिम किसिम की टोपियां लगाए खुश थे। उन्‍हें नहीं पता कि शहर में आज धारा 144 लागू है। 

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1 टिप्पणी:

Ankur Jain ने कहा…

रोचक प्रस्तुति।।।

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