5/09/2014

Benares Grapevine-4: रोडशो का झूठ और झाड़ू चलने का डर

माना जा रहा है कि नरेंद्रभाई मोदी बनारस से जीत रहे हैं, लेकिन उनकी जीत का जश्‍न मनाने वाले इस शहर में इतने भी नहीं कि बीएचयू गेट से रविदास गेट तक की सड़क को जाम कर सकें। कल पूरा का पूरा शहर धारा 144 की गिरफ्त में था और हजारों अडि़यों पर दर्जनों लोगों के भगवा झुंड कानून को ठेंगा दिखा रहे थे। शहर में कल तीन सहूलियतें थीं। पहली, बाइक पर भाजपा का झंडा या पोस्‍टर लगाकर कोई पांच लोगों को भी बैठाकर धूल उड़ा सकता था। दूसरी, टीवी पर आई जाम और भीड़ की खबरों का बहाना बनाकर कोई भी स्‍थानीय नागरिक अपने काम से कटने की मौज ले सकता था। तीसरी सहूलियत ये रही कि इस भीड़ के बहाने अफ़वाहों का बाज़ार पर्याप्‍त गरम हो गया और किसी के पास किसी भी ख़बर की  पुष्टि करने का वक्‍त ही नहीं बचा।

तो पहली ख़बर लंका स्थित टंडनजी की अड़ी पर उड़ते-उड़ते ये पहुंची कि कांग्रेस के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा भारतीय जनता पार्टी में चले गए हैं। वहां सनातन मौजूद मन से समाजवादी और चोले से कांग्रेसी जनता ने इसे अपेक्षित बताते हुए दो-चार गालिया मिश्रा को जड़ दीं और पहले की तरह नरेंद्रभाई के आगमन की प्रतीक्षा में लीन हो गई। चाय पर चाय और पान पर पान भिड़ाती जनता को मोदीजी का बेसब्री से इंतज़ार था। उनके आने से पहले पर्याप्‍त मनोरंजन हुआ। पहला दृश्‍य टीएमसी की प्रत्‍याशी इंदिरा तिवारी का था, जो बदहवास सी भागती हुई पैदल ही लंका से निकल लीं। उनके निकलने के बाद भाजपाइयों के हमले की खबर आई। इसके बाद अचानक नूपुर शर्मा अकेली टहलती हुई दिखाई दीं। एक सज्‍जन ने उन्‍हें पहचान लिया और बोले, ''बनारस में बाहर का आदमी कितना अकेला होता है। देखिए, इसको पहचानने वाला भी यहां कोई नहीं।'' पीछे-पीछे नलिन कोहली दर्जन भर मुश्‍टंडों से घिरे झुके चले आ रहे थे। तपती सड़क और आग बरसाते आकाश के बीच उनकी खल्‍वाट खोपड़ी और चेहरा टमाटर की तरह दिखता था। सज्‍जन ने फिर दुहराया, ''कितनी मेहनत करनी पड़ रही है बेचारों को। इससे तो बेहतर होता कि मोदी को सीधे राज्‍यसभा में भेजकर प्रधानमंत्री बना देते।'' यह बात कुछ लोगों को जंच गई। पपीता बेच रहे एक ठेलेवाले ने झट से कहा, ''हां यार, ई काहे चुनाव लड़त हौ सरवा? झुट्ठो एतना मेहनत...।''

मोदी के चुनाव लड़ने के औचित्‍य पर चर्चा शुरू हो चुकी थी और मालवीयजी की मूर्ति के पास कुछ हलचल सी हो रही थी। देखा कि दो-चार बड़ी-बड़ी गाडि़या धड़धड़ाते हुए रविदास गेट की तरफ निकलीं। इनमें अमित शाह और अरुण जेटली बैठे थे। कांग्रेसियों का मानना था कि प्रोग्राम खतम हो गयल। भाजपाइयों का कहना था कि मोदीजी के लेवे ई कुल जात हउवन। एक पत्रकार ने बताया कि  मोदीजी तो अभी शहर में आए ही नहीं हैं। इन गाडि़यों के काफिले के पीछे ढेर सारे समर्थक दौड़ पड़े। सबको लगा कि कुछ होने वाला है। कुछ मोटरसाइकिलें भी चल पड़ीं। रविदास गेट तक जाकर सब वापस आ गए। दोबारा जूस-वूस पीकर नारे लगाने लगे। मोदी को आने में अभी देर थी।

सूरज चढ़ चुका था। माथा भनभना रहा था। हर ओर भगवा माहौल था। अचानक परिदृश्‍य में सर्वश्री शैलेंद्र सिंह माथे पर फेटा बांधे प्रकट हुए और उन्‍होंने सूचना दी कि स्‍वयंवर वाटिका में रामाज्ञा राय का फासीवाद विरोधी सम्‍मेलन चल रहा है। हमने उनसे चलने का आग्रह किया तो बोले कि वे तो नोटा पार्टी के हैं, इसलिए फासीवाद से उन्‍हें कोई मतलब नहीं। और बगल में पिच्‍च से थूकते हुए अपना गमछा खोलकर उन्‍होंने पेट पर बांध लिया। हमने सोचा क्‍यों न एक बार स्‍वयंवर वाटिका हो आवें। पहुंचे तो रांची से तीन  गाडि़यां बदल कर यहां आए आलोचक रविभूषणजी का वक्‍तव्‍य चल रहा था। करीब दो दर्जन लोगों की इस प्रतिरोध सभा में कुछ देर तो पालथी मार कर बैठा गया, लेकिन पिछले दिन की तरह नींद के झोंके आने से पहले ही मैं सतर्क होकर उठ गया। कुर्सी पर जाकर बैठा तो फिर प्रेमपाल शर्मा ने बोलना शुरू किया। फिर नींद आने लगी। अचानक कान में मोबाइल कैमरा क्लिक होने जैसी आवाज़ आई। आंख खोलते ही सामने अविनाश दास दिखे। वे हमेशा मेरी ऐसी ही तस्‍वीरों की खोज में रहते हैं। मुझे जगा देखकर वे हंस दिए। मैं उठकर निकल लिया।

चायपान कर के लौटा तो सभा तकरीबन खतम हो चुकी थी। कुछ लोगों से बात-मुलाकात हुई। रामाज्ञा जी खुश दिख रहे थे। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में कहा भी था कि जब बाहर पूरी सड़क पर फासीवाद उतरा पड़ा है, इस शहर के बुद्धिजीवी यहां पर उसके विरोध का ऐतिहासिक हस्‍तक्षेप कर रहे हैं। लोगों ने इस बयान पर गड़गड़ा दिया था। कार्यक्रम खतम होते ही हम बाहर निकले तो आकाश में एक हेलीकॉप्‍टर मंडराता दिखा। लगा कि कुछ होने वाला है। तभी मेरे एक बनारसी मित्र का फोन आया। वह अपने एक भगवाधारी साधु मित्र के साथ मोदीजी के दर्शन करने आया था हेलीकॉप्‍टर का पीछा करते-करते। उसका अंदेशा सही था। मोदी बीएचयू में उतर चुके थे। हम वैशाली स्‍वीट्स के पास यानी रविदास गेट और बीएचयू गेट के मध्‍य में खड़े थे। बाईं ओर अरविंद केजरीवाल की सफेद सभा सज रही थी। दाईं तरफ से मोदीजी आने वाले थे। बीच की खाली सड़क पर रह-रह कर मोदीभक्‍तों के जत्‍थे पैदल या बाइकों से माहौल बना रहे थे।

अचानक सड़क के दोनों तरफ की जनता ऊंचे से डिवाइडर पर जमने लगी। हमने भी मौका देखकर कसरत कर डाली और खुद को डिवाइडर पर टिका लिया। पहले कहा गया कि मोदीजी रॉंग साइड यानी सड़क की दूसरी तरफ से आने वाले हैं। करीब किलोमीटर भर लंबी कतार उधर मुंह कर के खड़ी हो गई डिवाइडर पर। फिर किसी ने हवा बनाई कि नहीं, वे राइट साइड से ही आएंगे। अचानक यह खबर कानोकान फैली और किलोमीटर भर लंबी कतार राइट की ओर मुड गई। आशंका सही साबित हुई जब जैमर आता दिखा। हूटर बजा। सड़क के किनारे कुछ मोटी और गोरी मध्‍यवर्गीय महिलाएं खड़ी थीं। जैसे जंग से फौज लौट रही हो और उसका स्‍वागत करना हो, कुछ ऐसा नज़ारा था। मोदी आए। आए और निकल गए। खिड़की से उनके सिर की एक झलक मिली। मोदी आगे-आगे, जनता पीछे-पीछे। रविदास गेट पर  मोदी के पहुंचते ही सफेद फौज ने नारा लगाया, ''जो हिटलर की बात करेगा, वो हिटलर की मौत मरेगा।'' मोदी की गाड़ी अटक चुकी थी और यह नारा पारे की तरह उनके कान में घुलता जा रहा था। सारे भाजपाई मना रहे थे कि जल्‍दी सफेद टोपी वाले हटें और मोदीजी निकल पाएं।

मोदी को निकलना था, सो वे निकल लिए। पहली बार उन्‍हें अपने खिलाफ़ नारे सुनने पड़े। इसके बाद लंका तो क्‍या, बनारस से भगवा रंग साफ़ हो गया। जनता जान गई कि ये रोड शो नहीं था क्‍योंकि मोदीजी गाड़ी के भीतर बैठे थे और जनता को अपने पीछे दौड़ा रहे थे। टीवी ने इसे रोड शो बताया। आज तक की इलेक्‍शन एक्‍सप्रेस नामक लाल वाली बस के ऊपर भाजपाइयों की बैठक हो रही थी और एक कैमरामैन ड्रोन कैमरा उड़ा-उड़ा कर भीड़ को पचास हजार साबित करने पर तुला था। पांच हजार से भी कम लोग अपने-अपने ठिकानों की ओर जा चुके थे। कहीं कोई जाम नहीं लगा। सड़कें राहत भरी थीं। शहर पहले जैसा था। मोदीजी गाड़ी के भीतर बैेठे रह गए।

शहर की आखिरी बहस इस बात को लेकर थी कि क्‍या मोदीजी के रोड शो से भाजपा के वोट बढ़े हैं या कम हुए हैं। गोदौलिया पर एक पुराने बनारसी विद्वान सुरेंद्र सिंह ने मास्‍टर स्‍ट्रोक जड़ा, ''कइसन रोड शो? गडि़या से बाहर निकल के देखतन, त समझ  में आवत कि के उनके बचावेला। हम्‍मे त डर लगत हौ भाय कि कहीं झाड़ू न चल जाए ए शहर में...।''

झाड़ू चलने का डर रात से पैदा हो चुका है। बनारस के भाजपाई अपने-अपने घरों में हैं। जो भगवा दिख रहा है, सब बाहर का है।

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