6/30/2014

आख़िर, वह ‘शहर’ बन गया...

व्‍यालोक 
इस शहर का मौसम बदल गया है। अब यह शहर हो गया है, सही मायनों में और पहले जो मेरा मोहल्ला होता था, वह अब कॉलोनी में बदल गया है। पहले यहां के बच्चे अपने मुहल्ले के झाजी चा, कर्ण चाची, महतो भैया और रामेसर काका इत्यादि को अपनी हाथ की उंगली की तरह पहचानते थे, लेकिन अब मेरे बगल वाले घर में कौन सा परिवार रहने आया है, नहीं जानता? पहले इस मुहल्ले में कोई शराब नहीं पीता था, लेकिन अब शायद ही कोई घर हो, जहां कोई नहीं पीता है। महज 10-12 साल पहले तक, जब इस मुहल्ले के किसी लड़के को गुटखा भी खाना होता था, तो वह छिपकर जाता था। अब इसी कॉलोनी की चौक पर ही जाम टकराए जाते हैं-खुलेआम।



मेरे मुहल्ले में कदंब का एक पेड़ हुआ करता था। उस पर सावन के महीने में लड़कियां झूला नहीं झूलती थीं, लेकिन हां, वह अपनी जगह खड़ा था- अपनी मस्ती में झूमता, अपने फलों की सुंगंध पर इतराता, इठलाता। कई साल पहले वह काट दिया गया। विकास के लिए जगह बनानी थी। अब उसकी ठूंठ पर एक मोबाइल कंपनी का टावर उग आया है। रिहाइश के बीचोंबीच उस टावर के लगाने वक्त कानाफूसी भी हुई, पर सबने- मैं ही क्यों?’- सोचकर विरोध नहीं किया। हां, लोग इस बात पर सहमत ज़रूर हैं कि मोबाइल टावर से नुकसान ही होगा, फायदा नहीं।

हमारी इसी कॉलोनी या मुहल्ले (क्या लिखूं, समझ नहीं आता) में एक पुराना मंदिर भी था। आस्था की छोड़िए, वह सामाजिक गतिविधियों का केंद्र भी था। वहां अब दो-चार जुआ खेलनेवालों के अलावा कोई नहीं जाता। मंदिर की दीवारों से पीपल और बरगद की जड़ें झांकने लगी हैं....उसकी चारदीवारी भी जगह-जगह से टूट गयी है, जिससे अहाते में गाय-भैंस-बकरी-सूअर, सब का अबाध प्रवेश होने लगा है। मंदिर के ठीक सामने का पोखर आधा भर दिया गया है और सार्वजनिक सहमति से बाकी बचे को पूरी कॉलोनी का कूड़ेदान बना दिया गया है। पोखर के आसपास की ज़मीन के टुकड़ों की प्लॉटिंग कर उस पर अट्टालिकाएं खड़ी हो गयी हैं। जिस मैदान की छाती को कूटकर ये इमारतें बनायी गयीं हैं, वहीं कहीं हमारा बचपन भी दफ्न है। अब मुहल्ले के लड़कों को खेलने के लिए मैदान नहीं मयस्सर है। वैसे, अब मुहल्ले में बच्चों के लिए खेल के मैदान की ज़रूरत भी नहीं। अव्वल तो, हरेक घर में केवल बूढ़े ही बच गए हैं, जवान अपने बेटों सहित दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरू-हैदराबाद निकल गए हैं।

इस मुहल्ले का सरकारी स्कूल अब बड़ा हो गया है। खपरैल की जगह अब ईंट की पक्की इमारत बन गयी है। हालांकि, लोग कहते हैं कि प्रिंसिपल साहब ने इसके बनने में काफी रक़म बनायी है। हमारे बचपन में सवर्ण-अवर्ण कोई भी, प्रोफेसर से चपरासी तक की संतान इसी में पढ़ते हैं। अब सरकारी स्कूल में केवल तथाकथित पिछड़ी जातियों के बच्चे पढ़ते हैं। वह भी पढ़ते कम हैं, स्कूल ड्रेस लेने, लड़कियां साइकिल लेने और दोपहर की खिचड़ी खाने आते हैं। तथाकथित सवर्णों के बच्चे अब शहर के कान्वेंट में पढ़ने जाते हैं। मेरा शहर अब सचमुच शहर हो गया है। यहां पचीसों कान्वेंट खुल गए हैं। सरकारी स्कूलों में मास्टर साब और मैम मक्खियां मारते अपना वक्त गुज़ारते हैं....वही सरकारी स्कूल, जिसे हमारी पीढ़ी गर्व से सेंट बोरिस कहती थी, क्योंकि वहां बोरा लेकर जाना होता था।  

मेरा शहर बदल गया है...बड़ा हो गया है, सचमुच का शहर हो गया है। सार्वजनिक उत्सवों के सारे बहाने अब लगभग बंद हो गए हैं। हमारे शहर को चारों ओर से पुराने राजा के महल की चार दीवारों ने घेर रखा था। अब उसे जगह-जगह तोड़ कर कूबड़ की तरह कई बदशक्ल मकान निकल आए हैं। कहने को एक स्टेडियम भी बना दिया गया है, लेकिन उसमें बारिश का पानी ही जमा होता है। बाक़ी समय वहां नेताओं का हेलीकॉप्टर उतरता है या कुछ अनाम बच्चे अभी भी टी. रहमान बनने की ख्वाहिश में रहते हैं। टी. रहमान यानी तारिकुर्रहमान.....हमारे ज़माने का हीरो, हमारे ज़माने का सबसे ऊंचा क्रिकेटर...शायद रणजी में भी खेला था। अब के युवा आज तक उसी नोस्टैल्जिया में जी रहे हैं।

वैसे, हमारा शहर अब सचमुच शहर हो गया है। बड़ा अच्छा लगता है। अब यहां तीन मॉल खुल गए हैं। यह बात दीगर कि बिजली नहीं होने की वजह से अक्सरहां उसका ए.सी. बंद ही रहता है। तो, महानगरों की तरह केवल विंडो शॉपिंग के लिए जाना भी थोड़ा पीड़ादायक हो सकता है। हां, यहां अपार्टमेंट की संस्कृति भी आ गयी है। शहर से थोड़ी ही दूर अपार्टमेंट बनाए जाने लगे हैं। लोग उसे लेकर तरह-तरह की बातें भी कर रहे हैं। पुराना बस-स्टैंड कुछ ही दिनों का मेहमान है। उसे शहर से दूर बसाने की बात है। ख़ाली होनेवाली ज़मीन पर भू-माफिया की नज़रें अभी से गड़ गयी हैं। लोग इसे लेकर काफी रोमांचित महसूस कर रहे हैं। पहले का शांत शहर अब गतिविधियों से भरा-पूरा है। अच्छा लगता है।

जिस शहर में कभी भूले-भटके अपराध की घटनाएं होती थीं, अब रोजाना ही अपहरण, लूट, हत्या की ख़बरें आती हैं। शहर बड़ा हैपनिंग हो गया है। तंग गलियों पर ट्रैफिक की भरमार से रोड रेज़ की घटनाएं भी सामने आ रही हैं, शहर अब सचमुच का शहर हो गया है।

हरेक हाथ में मोबाइल और कानों में इयरप्लग लग चुका है। स्मार्टफोन से लेकर चायनीज मॉडल तक, सब के पास मोबाइल है।

लोग बोल बहुत ज्यादा रहे हैं, कह कुछ भी नहीं पा रहे। पहले वे मुहल्ले और कस्बे में रहते थे। अब वे कॉलोनी और शहर वाले हो गए हैं।

मेरा शहर सचमुच का शहर हो गया है।


6/20/2014

ग्रामीणों की ऐतिहासिक जीत : कोका कोला मेहदीगंज का प्लांट बंद



आख़िरकार 12 वर्ष लम्बे संघर्ष का परिणाम रंग लाया और  भूजल व् प्रदुषण के लिए जिम्मेदार कोका कोला प्लांट मेंहदीगंज राजा तालाब वाराणसी को गत 6 जून 2014 को प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड उ ० प्र ० के आदेश के द्वारा बंद कर दिया गया है, उक्त कंपनी को बंद करने की मांग को लेकर विगत एक दशक से मेंहदी गंज व आसपास के स्थानीय ग्रामीण आन्दोलनरत थे, जिनके प्रयास से कोकाकोला कंपनी बंद हुई।

आंदोलन की शुरुआत 2002 से हुई।  अनगिनत बार धरना प्रदर्शन हुए।  200 -200 किलोमीटर की कई बार पदयात्राएं हुई।  अहिंसात्मक रूप से प्रदर्शन करने वाले ग्रामवासियों पर लाठियां बरसाई गयी।  तीन बार सैकड़ों महिला पुरुषों जेल जाना पड़ा।  उनके ऊपर अनगिनत फर्जी मुकदमे लादे गये। आंदोलन को दबाने के लिये लोगों को प्रलोभन दिए गए यहाँ तक कि ग्रामवासियों में मतभेद पैदा करने के लिए यह भी दुष्प्रचार किया गया कि यह आंदोलन पैसों के लिए किया जा रहा है।

प्रदेश सरकार से लेकर दिल्ली सरकार के सम्बन्धित कार्यालयों में   अनगिनत बार हजारों की तादात में जाकर गुहार लगाई गयी।  जलदोहन प्रदूषण धोखाधड़ी के मुद्दों पर सरकारी जाँच  एजेंसियों से लेकर प्राइवेट जाँच  एजेंसियों से जाँच कराई गयी लेकिन कोका कोला के खिलाफ सारे सबूत होने के बावजूद कंपनी के दबाव में कोई भी विभाग कम्पनी पर कार्यवाही करने से बचती रही।  लेकिन इसके बावजूद ग्रामवासियों ने हिम्मत नही छोड़ा और कंपनी के खिलाफ आंदोलन करते रहे।  अंततः प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड उ ० प्र ० को स्वीकार करना पड़ा और कंपनी को तुरन्त बंद करने का आदेश दे दिया है.

हालाँकि कोका कोला कंपनी  इस आदेश के खिलाफ पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाला फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल में सुनवाई चल रहा है।  हमें पूरी उम्मीद है की हमलोगों को यहाँ भी न्याय मिलेगा लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा की चुनाव के पहले तक कोका कोला को बंद करने की माँग को लेकर धरना प्रदर्शन करने वाली नई भाजपा सरकार का क्या रुख होता है यहाँ यह भी जानना जरुरी है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री माननीय अरुण जेठली जी कोका कोला कंपनी के वकील रह चुके है और दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी जी इस समय  नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल में कोका कोला की तरफ से केस देख रहे है वही अपने पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलनों में अपने कार्यकर्ताओं को कोका कोला और पेप्सी वहिष्कार करने वाली प्रदेश सरकार क्या  फैसला लेती है ?

 साथियों की जानकारी के लिए बता दूँ कि कोका कोला के भूजल दोहन के कारण यहाँ पानी का भयंकर संकट हो गया है गांव के ज्यादातर कुएं हैण्डपम्प बोरवेल जबाब दे चुके है जिसके कारण  इस ब्लाक को सरकार ने  क्रिटिकल जोन घोषित कर दिया है और किसान के नये बोरवेल हैण्डपम्प लगाने पर पाबन्दी लगा दिया है दूसरी तरफ कोका कोला अभी तक जितना पानी लेती थी उसका पाँच गुना ज्यादा एक हजार फ़ीट की गहराई से पानी निकालने की अनुमति मांग रहा है साथ ही कंपनी से निकलने वाला कचरा और जहरीला पानी यहाँ के मिट्टी और पानी को जहरीला बना रहा है। कोका कोला कम्पनी ग्रामसभा के करोङो की सार्वजनिक जमीन पर अवैध रूप से काबिज है साथ ही सरकार को तीन करोड़ पचास लाख से ज्यादा की स्टाम्प चोरी करके चुना लगाया है सैकड़ो लोगों को रोजगार देने का दावा करने वाली कोका कोला कम्पनी के कर्मचारी जब अपना मजदुर यूनियन बनाकर स्थाई नौकरी की माँग किये तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर उनके ऊपर फर्जी मुकदमे लाद दिया और वे आज भी कोर्ट का चक्कर लगा रहे है।

खैर  प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड उ ० प्र ० ने कम्पनी को बंद कराकर ग्रामवासियों को बहुत राहत दिया है अब हम सब दोगुने उत्साह से इस संघर्ष को जारी रखेंगे क्योंकि लड़ाई अभी बहुत बाकी है. सभी आंदोलनकारी साथियों को इस जीत की बधाई और धन्यवाद। आंदोलन की कुछ यादगार तस्वीरें और बंद करने का आदेश की कापी देखें जिन्दाबाद !

साभार: संघर्ष संवाद 

6/15/2014

पिता पर कुछ और कविताएं

अभिषेक श्रीवास्‍तव 






1

मेरी पत्‍नी जब सोती है चैन से
बिलकुल बच्‍चे की तरह निर्दोष
तब याद आते हैं पिता...

क्‍योंकि तब,
मेरी मां
ले रही होती है करवटें अपने कमरे में

सुबह का इंतजार करते।


2

मेरे मन में मां को लेकर कोई आदर्श छवि नहीं है
कि उसे ऐसा होना चाहिए या वैसा
पिता को लेकर जरूर है।

इसीलिए मुझे अपने पिता से ज्‍यादा प्रेम है
और मां
बगैर यह जाने
दुखी रहती है सनातन।

मैं नहीं चाहता कभी वह जाने
मेरे दिल की बात।


3

लोग कहते हैं मुझसे
मां ने तुम्‍हारे लिए जिंदगी लगा दी, 
उसे मत देना कभी दुख।

मैं
पूछ भी नहीं पाता मां से
कि उसे दुख किससे है
मुझसे
या पिता के नहीं होने से।

अब भी मनाता हूं
कि उसे हो जाए किसी से प्रेम
भाग जाए वह घर से
किसी के साथ
आलोक धन्‍वा की लड़कियों की तरह

और कटे मेरा पाप
उसका दुख
एक साथ।





6/01/2014

अभिव्‍यक्ति के बाज़ार में एक मौन संपादकीय

बीती 16 मई को जब लोकसभा चुनाव के नतीज़े सामने आए थे, तो बहुत लोग बहुत कुछ बोलने को बेताब थे और बहुत से दूसरे लोग कुछ भी कहने से बच रहे थे। कई और लोग थे जो कुछ कहना तो चाह रहे थे लेकिन वे चुप थे। आज एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद अखबारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों और वेबसाइटों पर लाखों शब्‍द 16 मई के सदमे को पहचानने-परखने में खर्च किए जा चुके हैं। दर्जनों संपादकीय लिखे जा चुके हैं। दर्जनों लिखे जाने के इंतज़ार में होंगे। अभिव्‍यक्ति के इतने सघन स्‍पेस में हालांकि बस एक संपादकीय अब तक ऐसा दिखा है जो खुद संपादक का लिखा हुआ नहीं है। 

जून 2014 के समकालीन तीसरी दुनिया का संपादकीय कोई विश्‍लेषण नहीं, कोई ज्ञान नहीं, कोई उपदेश नहीं है। वह महज़ सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की एक कविता है। आज के दौर में जब पत्रकारिता अपने नए-नए आयामों में खुद को प्रकट कर रही है, एक कविता का संपादकीय बन जाना अद्भुत, सुखद और हैरतनाक है। इसके कई मायने हो सकते हैं। बहरहाल, सारे अर्थ अपनी जगह, फि़लहाल यह कविता यानी समकालीन तीसरी दुनिया का ताज़ा संपादकीय पढ़ें।  


 ''उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे'' 

सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना 





अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के
करीब आ गया है
यह जो हल्की सी आहट
खुनकती हंसी में लिपटी
तुम सुन रहे हो
वह उसकी लपलपाती जीभ
और खूंखार नुकीले दांतों की
रगड़ से पैदा हो रही है।
इसे कुछ और समझने की
भूल मत कर बैठना,
जरा सी गलत गफलत से
यह तुम्हारे बच्चे को उठाकर भाग जाएगा
जिसे तुम अपने खून पसीने से
पोस रहे हो।
लोकतंत्र अभी पालने में है
और लकड़बग्घे अंधेरे जंगलों
और बर्फीली घाटियों से
गर्म खून की तलाश में
निकल आए हैं।
उन लोगों से सावधान रहो
जो कहते हैं
कि अंधेरी रातों में
अब फरिश्ते जंगल से निकलकर
इस बस्ती में दुआएं बरसाते
घूमते हैं
और तुमहारे सपनों के पैरों में चुपचाप
अदृश्य घुंघरू बांधकर चले आते हैं
पालने में संगीत खिलखिलाता
और हाथ-पैर उछालता है
और झोंपड़ी की रोशनी तेज हो जाती है।

इन लोगों से सावधान रहो।
ये लकड़बग्घे से
मिले हुए झूठे लोग हैं
ये चाहते हैं
कि तुम
शोर न मचाओ
और न लाठी और लालटेन लेकर
इस आहट
और खुनकती हंसी
का राज समझ
बाहर निकल आओ
और अपनी झोंपड़ियों के पीछे
झाड़ियों में उनको दुबका देख
उनका काम-तमाम कर दो।

इन लोगों से सावधान रहो
हो सकता है ये खुद
तुम्हारे दरवाजों के सामने
आकर खड़े हो जाएं
और तुम्हें झोंपड़ी से बाहर
न निकलने दें,
कहें-देखो, दैवी आशीष बरस
रहा है
सारी बस्ती अमृतकुंड में नहा रही है
भीतर रहो, भीतर, खामोश-
प्रार्थना करते
यह प्रभामय क्षण है!

इनकी बात तुम मत मानना
यह तुम्हारी जबान
बंद करना चाहते हैं
और लाठी तथा लालटेन लेकर
तुम्हें बाहर नहीं निकलने देना चाहते।
ये ताकत और रोशनी से
डरते हैं
क्योंकि इन्हें अपने चेहरे
पहचाने जाने का डर है।
ये दिव्य आलोक के बहाने
तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं।
और पालने में पड़े
तुम्हारे शिशु के कल्याण के नाम पर
उसे अंधेरे जंगल में
ले जाकर चीथ खाना चाहते हैं।
उन्हें नवजात का खून लजीज लगता है।
लोकतंत्र अभी पालने में है।

तुम्हें सावधान रहना है।
यह वह क्षण है
जब चारों ओर अंधेरों में
लकड़बग्घे घात में हैं
और उनके सरपरस्त
तुम्हारी भाषा बोलते
तुम्हारी पोशाक में
तुम्हारे घरों के सामने घूम रहे हैं
तुम्हारी शांति और सुरक्षा के पहरेदार बने।
यदि तुम हांक लगाने
लाठी उठाने
और लालटेन लेकर बाहर निकलने का
अपना हक छोड़ दोगे
तो तुम्हारी अगली पीढ़ी
इन लकड़बग्घों के हवाले हो जाएगी
और तुम्हारी बस्ती में
सपनों की कोई किलकारी नहीं होगी
कहीं एक भी फूल नहीं होगा।
पुराने नंगे दरख्तों के बीच
वहशी हवाओं की सांय-सांय ही
शेष रहेगी
जो मनहूस गिद्धों के
पंख फड़फड़ाने से ही टूटेगी।
उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे
तुम्हारी जबान बोलना भूल जाएगी
लाठी दीमकों के हवाले हो जाएगी
और लालटेन बुझ चुकी होगी।
इसलिए बेहद जरूरी है
कि तुम किसी बहकावे में न आओ
पालने की ओर देखो-
आओ आओ आओ
इसे दिशाओं में गूंज जाने दो
लोगों को लाठियां लेकर
बाहर आ जाने दो
और लालटेन उठाकर
इन अंधेरों में बढ़ने दो
हो सके तो
सबसे पहले उन पर वार करो
जो तुम्हारी जबान बंद करने
और तुम्हारी आजादी छीनने के
चालाक तरीके अपना रहे हैं
उसके बाद लकड़बग्घों से निपटो।

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के करीब
आ गया है।

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