8/29/2014

नरेंद्र मोदी के नाम फुकुशिमा से एक पत्र


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक नाभिकीय समझौते को अंतिम रूप देेने जापान गए हैं। निकलने से पहले उन्‍होंने जापानी में ट्वीट किया था जिसकी मीडिया में खूब चर्चा है। अब ख़बर आ रही है कि जापान इस समझौते को रद्द करने जा रहा है। इस संबंध में नाभिकीय ऊर्जा विरोधी एक्टिविस्‍ट कुमार सुंदरम ने 29 अगस्‍त की सुबह अपनी फेसबुक वॉल पर सूचना दी है:





भारत-जापान की इस प्रस्‍तावित संधि का जापान की जनता में गहरा विरोध है। इससे पहले कल जापान के फुकुशिमा से एक महिला युकिको ताकाहाशी ने नरेंद्र मोदी के नाम एक पत्र भेजा था जिसमें उन्‍होंने अपने यहां का हाल बताते हुए मोदी को कहा था कि वे भारत की संस्‍कृति को नाभिकीय ऊर्जा से तबाह न करें। पत्र जापानी में था जिसकी मूल प्रति और अंग्रेज़ी तर्जुमा DiaNuke.org पर प्रकाशित है। उस पत्र का हिंदी तर्जुमा हम नीचे जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं।   

8/27/2014

कौन है योजना आयोग का असली दुश्‍मन?

अभिषेक श्रीवास्‍तव 



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को तमाम हितोपदेश देने के साथ-साथ जो इकलौती कार्यकारी घोषणा की थी वह योजना आयोग को समाप्‍त किए जाने की थी। इस पर हफ्ते भर के भीतर काम काफी तेजी से शुरू हो चुका है। एक थिंक टैंक की बात बार-बार आ रही है जो आयोग की जगह लेगा। सवाल उठता है कि योजना आयोग को खत्‍म करने के पीछे प्रधानमंत्री के पास कोई वाजिब तर्क है या फिर यह उनकी निजी नापसंदगी का मसला है।

8/15/2014

प्रधान सेवक का 'मेड इन इंडिया' फॉर्मूला

अभिषेक रंजन सिंह 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से 15 अगस्‍त को दिए अपने भाषण में जितनी भी बातें कहीं, उनमें एक अहम बात विदेशी कंपनियों के लिए थी कि वे हमारे देश में आएं और यही अपना माल बनाएं, फिर चाहे कहीं भी ले जाकर उसे दुनिया में बेच दें। देश के 65 फीसदी युवाओं के लिए उनका पलटकर संदेश यह रहा कि वे इतना काम करें कि पूरी दुनिया 'मेड इन इंडिया' उत्‍पादों से पट जाए। ज़ाहिर है, 65 फीसदी युवा आबादी के भरोसे विदेशी कंपनियों को भारत में उत्‍पादन का न्‍योता देना यहां के श्रम कानूनों के साथ गहरा जुड़ाव रखता है। प्रधानमंत्री का सीधा आशय यह है कि यहां श्रमिकों की कोई कमी नहीं, बस माल बनाने वाली बाहरी ताकतों की ज़रूरत है। इस न्‍योते की कानूनी और तथ्‍यात्‍मक पृष्‍ठभूमि को समझने के लिए अभिषेक रंजन सिंह की यह त्‍वरित टिप्‍पणी बहुत महत्‍वपूर्ण है जो उन्‍होंने खास जनपथ के लिए भेजी है। 

8/12/2014

'सरफ़रोशी की तमन्‍ना' का कौन है बिस्मिल?

शाह आलम 
बात उन दिनों की है जब मैं जामिया केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोध छात्र था। 2009 के नवंबर का महीना था। उन दिनों हम लोग शाम को जामिया के पश्चिमी छोर पर स्थित चाय की एक दुकान पर एकाध घण्टे तो गुजार ही दिया करते थे। इस दुकान पर बैठने के लिए कोई बेंच नही होती थी। पत्थरों और ज़मीन पर लोग जमे रहते थे। यहां बैठने वाले इस जगह को लाल चौक कहते थे। उस दौरान मैं 19 दिसम्बर को शहादत दिवस पर होने वाले कार्यक्रम की तैयारी में लगा था। दिसंबर की यह तारीख़ काकोरी के नायकों की शहादत का दिन है। इस दिन हम लोग अयोध्या में तीन दिनी फिल्म उत्सव करते हैं। यह उत्सव अमर शहीद अशफाकउल्लाह खान और पं. राम प्रसाद बिस्मिल की याद में होता है। कार्यक्रम दोनों क्रांतिकारियों की दोस्ती को समर्पित होता है।

8/09/2014

'फिलिस्‍तीन की अनारकली' और काठमांडो से एक रपट


नरेश ज्ञवाली 

अमरीकी साम्राज्यवाद के छतरीनुमा कंकाल के भीतर खुद को सुरक्षित रख न्याय के पक्षधरों की धज्जियां उड़ाने को बेताब इज़रायली तानाशाह बेन्जामिन नेतन्याहु के युद्ध अपराधों की छानबीन तथा निर्दोष फिलिस्‍तीनी जनता की जीवन रक्षा की मांग करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडो में पत्रकार, लेखक, कलाकार तथा साहित्यकारों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के भवन के आगे धरना दिया और फिलिस्‍तीनी जनता के पक्ष में हस्ताक्षर संकलन करते हुए इज़रायल और अमरीकी नीतियों का जमकर विरोध किया। 

8/07/2014

PM Modi failed to break with the past in Nepal

Vishnu Sharma

Despite beginning his speech in Nepali, acknowledging Lumbini as Gautam Buddha’s birthplace and reuniting Jeet Bahadur with his family, Prime Minister Narendra Modi’s Nepal visit was an absolute failure in terms of everything India wanted to see him achieve. People in India as well as Nepal expected from PM Modi that he would break with the old tradition in India-Nepal relationship where Nepal always has to play younger brother role and usher it in an era of equality in both countries’ relationship. Sadly, as at home he couldn’t deliver abroad. 

8/06/2014

नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा


आनंद स्‍वरूप वर्मा 

शायद ही किसी देश का समूचा नेतृत्व इस कदर हीनताबोध का शिकार हो जैसा मोदी की यात्रा के दौरान नेपाल में देखने को मिला। संविधान सभा भवन में मोदी के भाषण के दौरान एक जादुई सम्मोहन में डूबे सभासद हतप्रभ थे। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि अपने दबदबे से आक्रांत रखने वाले ‘विस्तारवादी’ भारत का कोई प्रधानमंत्री इतनी प्यार-मोहब्बत की बातें उनसे कर सकता है। वे नरेन्द्र मोदी को पहली बार रू-ब-रू देख रहे थे, पहली बार सुन रहे थे... 

8/05/2014

यह अतिशयोक्ति नहीं, सच है!

नई सरकार का 'रिपोर्ट कार्ड' या आरएसएस की रणनीति के 'दूसरे चरण' का आग़ाज़? 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


यह बात 1970 की है। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं का तीसरे वर्ष का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था। यह वह चरण होता है जिसके बाद कोई व्यक्ति पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता बन जाता है। शिविर का संचालन यादवराव जोशी कर रहे थे जो उस वक्त समूचे दक्षिण भारत में संघ कार्यकर्ताओं के प्रमुख हुआ करते थे। एक प्रशिक्षु ने प्रश्न सत्र में जोशी से एक सवाल किया था, ‘‘हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिंदू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और भारत हिंदुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि मुसलमानों और ईसाइयों को अपना-अपना धर्म मानते रहने की छूट है और वे इसी तरह तब तक रह सकते हैं जब तक उन्हें इस देश से प्यार है। आखिर हमें उनको यह रियायत देने की जरूरत ही क्यों है? आखिर क्यों नहीं हम स्पष्ट रूप से कह देते कि चूंकि हम हिंदू राष्ट्र हैं इसलिए उनके लिए यहां कोई जगह नहीं है?’’

8/03/2014

हिंदी लेखक होने का मतलब

अभिषेक श्रीवास्‍तव 


हम कहानी, कविता, उपन्यास, रिपोर्ताज, खबरें, आलेख, टिप्पणियां, प्रतिक्रियाएं, संस्मरण, वृत्तांत आदि लिखने वाला मानते हैं। इसमें शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापकीय कार्य करने वाले भी शामिल हैं, जो लिखें या न लिखें, लेकिन उनसे लिखने की अपेक्षा होती है। इनमें अखबारों और पत्रिकाओं के वे संपादक भी शामिल हैं, जिन्होंने बरसों से कुछ नहीं लिखा, फिर भी उनसे लेखन की अपेक्षा की जाती है। इसके अलावा इस बिरादरी में वे भी शामिल माने जाएं, जो किसी निजी या सार्वजनिक हादसे या विवशता के चलते लेखन-कर्म से जुड़ गए, भले उनकी चेतना इसके लिए तैयार नहीं थी। यह अलग बात है कि सतत और सचेत लेखन से अपने आप परिष्कृत चेतना का निर्माण होता जाता है। सवाल है कि लेखक होने और न होने के बीच क्या फर्क है

8/01/2014

वै‍कल्पिक राजनीति के एंटी-क्‍लाइमैक्‍स

हंस की सालाना गोष्‍ठी : 31 जुलाई, 2014


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


मैंने जितनी कविताएं लिखी हैं/ उससे कहीं ज्‍यादा देखे हैं हाथ/ कृपया मेरी बात सुनकर हँसें नहीं/ मैंने अपना हाथ भी देखा है/ मेरा भविष्‍य आपके हाथ में है...।

यह एक ताज़ा मरे हुए कवि की पंक्तियां हैं। कवि के मरने के बाद इस पंक्ति का क्‍या अर्थ बनता है? एक मरे हुए कवि का भविष्‍य क्‍या हो सकता है? अगर वह इस देश में मनुष्‍यों की औसत आयु पूरी कर के मरा हो, तब? अपनी उम्र जीकर मर चुके किसी भी व्‍यक्ति के भविष्‍य पर क्‍या कोई बात संभव है

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