10/31/2014

दुनिया को खत्‍म करने वालों के खिलाफ़ बारूदी सुरंग है कविता

पलाश विश्‍वास


सवा बजे रात को आज मेरी नींद खुल गयी है। गोलू की भी नींद खुली देख, उसकी पीसी आन करवा ली और फिर अपनी रामकहानी चालू। जो मित्र अमित्र राहत की सांसें ले रहे थे, नींद में खलल पड़ने से बचने के ख्याल से बचने के लिए, उनकी मुसीबत फिर शुरू होने वाली है अगर मैं सही सलामत कोलकाता पहुंच गया तो, यानि आज से फिर आनलाइन हूं।

10/14/2014

फॉरवर्ड प्रेस प्रकरण: सैद्धांतिक समर्थन के साथ कुछ ज़रूरी सवाल

अभिषेक श्रीवास्‍तव 




आज से कोई साढ़े आठ साल पहले यानी 2006 के फरवरी में ''सीनियर इंडिया'' नाम की एक व्‍यावसायिक पाक्षिक पत्रिका के दफ्तर पर छापा पड़ा था। उसका विवादास्‍पद अंक ज़ब्‍त कर लिया गया था। संपादक आलोक तोमर समेत प्रकाशक को जेल हुई थी। आरोप था कि पत्रिका ने डेनमार्क के कार्टूनिस्‍ट का बनाया मोहम्‍मद साहब का कथित विवादित कार्टून छापा है जिससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। सच्‍चाई यह थी कि उस वक्‍त दुनिया भर में चर्चित इस कार्टून पर पत्रिका ने एक कोने में करीब दो सौ शब्‍द की अनिवार्य टिप्‍पणी की थी जिसके साथ कार्टून का एक थम्‍बनेल प्रकाशित था, जिसे आधार बनाकर दिल्‍ली पुलिस कमिश्‍नर ने अपने ही सिपाही से पत्रिका के खिलाफ एक एफआइआर इसलिए करवा दी क्‍योंकि दो अंकों से पत्रिका की आवरण कथा कमिश्‍नर के खिलाफ़ छप रही थी जिसे मैंने (स्‍टाफ के तौर पर) और पत्रकार अवतंस चित्रांश ने (स्‍वतंत्र तौर पर) संयुक्‍त रूप से अपने नाम से लिखा था। स्‍पष्‍टत: यह दिल्‍ली पुलिस द्वारा बदले की कार्रवाई थी, लिहाज़ा प्रभाष जोशी से लेकर राहुल देव तक पूरी पत्रकार बिरादरी का आलोकजी के समर्थन में उतर आना बिल्‍कुल न्‍यायसंगत था।

10/08/2014

कविता का एजेंडा या एजेंडे पर कविता: एक अपील


बहसें पुरानी पड़ सकती हैं, लेकिन नए संदर्भ नित नए सिरे से बहस किए जाने की ज़रूरत को अवश्‍य पैदा कर सकते हैं। मसलन, कुछ लोगों की इधर बीच की कविताएं देखकर कुछ लोगों के बीच एक योजना बनी कि कविता पाठ किया जाए। चूंकि उन कविताओं में एक ही सिरा बराबर मौजूद था (नया संदर्भ), इसलिए तय पाया गया कि उस नए सिरे को पकड़े रखा जाए। विषय रखा गया ''कविता: 16 मई के बाद'' और कुछ कवियों से स्‍वीकृति लेकर फेसबुक पर एक ईवेन्‍ट बनाकर डाल दिया गया। ज़ाहिर है, सवाल उठने थे सो उठे। बात को शुरू करने के लिए सवाल ज़रूरी हैं। तो एक सवाल कवि चंद्रभूषणजी ने अपनी टिप्‍पणी में उठाया कि ''काफी टाइम टेबल्‍ड कविता-दृष्टि लगती है''। तो क्‍या कविता-दृष्टि समय/काल निरपेक्ष होनी चाहिए? ऐसे ही एक और मित्र ने कहा कि अगर कविताएं 16 मई के बाद की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर हैं तो आप क्‍यों सिर्फ आलोचनात्‍मक कविताएं ही लेंगे? अगर किसी ने नई परिस्थितियों के समर्थन में लिखा है तो उसे भी लेना चाहिए। क्‍या नई परिस्थितियां वाकई समर्थन के लायक हैं? क्‍या ये जनपक्षीय हालात हैं? 

10/06/2014

हैदर: हसीन वादियों में खूंरेज़ी की दास्‍तान

व्‍यालोक 
हैदर नाम की इस फिल्म को अगर आप कश्मीर-समस्या के बरक्स देखेंगे, तो कई तरह की गलतफहमी पैदा होने के अंदेशे हैं। यह मुख्यतः और मूलतः एक व्यक्तिगत बदले की कहानी है, जिसके इर्द-गिर्द विशाल भारद्वाज ने कश्मीर की हिंसा और उसकी समस्या को उकेरने की कोशिश की है। चूंकि, विशाल एक बड़ा नाम हैं, तो उनके साथ इस फिल्म को इस कदर नत्थी कर दिया गया है, जैसे उन्होंने कश्मीर पर अपनी राय का अनुवाद इस फिल्म के माध्यम से करने का किया है।



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